वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 921–930
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 921–930
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वेदार्थपारिजातः १८१ ९ कुरुवशस्य राजानं दातुमर्हसि ॥ ' ( म ० भा० १| १०५।११ ) 'तं माना पुनरेवान्यमेकं पुत्रमयाचत । ' ( म० भा० १।१०५ / २० ) अत्र तपोबलेनैव पुत्रं दातु समर्थो व्याम 1 तत एव तासा शुद्धयर्थं व्रताचरणमुपदिष्टम् । 'व्रत चरेता ते देव्यो निर्दिष्टमिह यन्मया । संवत्सर यथान्यायं तत शुद्धे भविष्यत । नहि मामव्रतोपेता उपेयात् काचिदङ्गना ।' ( म० भा० १।१०५।४२।४३ ) । यत्तु — 'सा तु रूप च गन्ध च महर्षे प्रविचिन्त्य च । नाकरोचन देव्या भयात्सुरमुतोपमा ॥ ' ( म० भा० १।१०६।२४ ), ‘ ततः स्वैर्भूषणैर्दासी भूषयत्वाप्सरोपमाम् । प्रेषयामास कृष्णाय ( व्यासाय ) ततः काशिपते सुता ॥ ' ( म० भा० १।१०६/ २५ ), सा तमृषिमनुप्राप्त प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च ॥ सविवेशाभ्यनुज्ञाता सत्कृत्योपचचार ह ॥ कामोपभोगेन रहस्तस्या तुष्टिमगादृषिः ।' ( म ० भा० १११०६/२६ ) इह श्रीव्यासस्य कामोपभोग एव स्पष्ट । ततो नियोगे मैथुन न सम्भव- तीति रिक्तं वचः' इति, तन्न, अत्र कामोपभोगोल्लेखादेव ततः पूर्वं तदभावेन पाण्डुघृतराष्ट्रोत्पत्तिसिद्धे ॥ यत्कामोपभोगवर्णनं तत्तु दासीविषयं न कुलाङ्गनाविषयम् । मन्वादिभिर्द्विजातीना कृते मैथुनयुक्तनियोगनिषेधात् । नायं निषेधो दास्याः कृते । 'नान्यस्मिन् विधवानारी नियोक्तव्या द्विजातिभिः । अन्यस्मिन् हि नियुञ्जाना धर्मं हन्युः सनातनम् ॥ ' ( म० ९ ६४ ) अतो दास्या कामोपभोगाङ्गीकारेपि न हानिः । वस्तुतस्तु तत्रापि दृष्टिमात्रेणैव सन्तानोत्पादनमभ्युपगन्तव्यम्, न मैथुनेन । नियोगे कामोपभोगस्य वर्जनात् । ' नियुक्तौ यो विधि त्यक्त्वा वर्तेयाता तु कामत । तावुभौ पतितौ स्याता स्नुषागगुरुतल्पगो ॥ ' ( म० ९ ६३ ) इति मनूक्तेः । यदि कामोपभोग कुर्यात्तदा व्यासस्यापि पातित्यापत्तिः । व्यासेन तु स्पष्टमुक्तम्- ' तस्मादह त्वन्नियोगाद् धर्ममुद्दिश्य कारणम् ।' ( म० भा ० १।१०५ /४० ) अत्र धर्मोद्देश्येन तत्प्रवृत्तिर्न कामोपभोगोद्देश्येन । अतोऽत्र कामोपभोगशब्दस्य न मैथुन- मर्थः, किन्तु इच्छापूर्तिरेव । कामः प्रद्युम्नः ( अमरकोषः १/७/२८ ) । काम इच्छा' तर्कसङ्ग्रहः । कामधेनुः, कामदुधा, जाती 1। मित्रावरुण के समान प्रभावशाली पुत्रो को दूंगा, यहा पर भी पुत्रदान के लिये दिव्यविधि का हो आश्रय लिया गया है । व्यास जी से माता ने धश की रक्षा के लिये एक और पुत्र प्रदान करने की प्रार्थना की । इसका भी स्पष्ट अभिप्राय यही है कि व्यास अपनी तपस्या के बल से ही पुत्र देने में समर्थ थे । इसीलिये उन्होने विचित्रवीर्य की पत्नियो को शुद्धि के लिए एक वर्ष पर्यन्त व्रत का अनुष्ठान करने के लिए कहा था । कुछ लोग प्रश्न उठाते हैं कि महर्षि व्यास के भयानक रूप तीव्र गन्ध आदि का ध्यान कर विचित्रवीर्य की पत्नी ने अपनी सास की आज्ञा का पालन न कर अपने स्थान पर दासी को वस्त्रालकार से सजा कर भेज दिया । उस दासी ने महर्षि का अभिवादन आदि के साथ स्वागत किया । उनके साथ एकान्त मे एक आसन पर बैठ कर कामोपभोग किया, जिससे कि ऋषि सतुष्ट हुए । इस प्रकरण में व्यास के कामोपभोग का स्पष्ट वर्णन मिलता है । अत नियोग मे मैथुन विहित नही है, ऐसा कहना सही नही माना जा सकता । किन्तु यह कथन इसलिये गलत है कि यहा पर जो कामोपभोग का वर्णन है, यही सिद्ध करता है कि इससे पहले पाण्डु और धृतराष्ट्र की उत्पत्ति के समय उसका आश्रय नही लिया गया था । दासी के साथ ही कामोपभोग का वर्णन है, कुलागना के साथ नही । मनु प्रभृति ने द्विजाति के लिये हो मैथुनयुक्त नियोग को निषिद्ध माना है । यह निषेध दासी के लिये नही है | अतः दासी यदि कमोपभोग को स्वीकार करती है, तो इसमें कोई दोष नही है । वास्तव में देखा जाय तो यहाँ पर भी दृष्टिमात्र से ही सन्तान उत्पत्ति की बात माननी चाहिये, मैथुन से नही । नियोग में कामोपभोग वर्जित है । मनु ने स्पष्ट कहा है कि नियोग के लिये पास आये हुए स्त्री पुरुष यदि कामोपभोग में प्रवृत्त हो जाते हैं, तो उसी तरह से पतित माने जाते है, जैसे कि स्नुषागामी और गुरुतल्पगामी । यदि कामोपभोग में प्रवृत्त होते तो व्यास जी भी पतित हो जाते । व्यास ने स्पष्ट कहा है-'इसलिये मै तुम्हारी आज्ञा से इस धर्म कार्य को करता हूँ' । यहाँ पर धर्म को प्रधान मान कर ही वे प्रवृत्त हुए हैं, कामोभोग को नहीं । अतः कामोपभोग शब्द का अर्थ मैथुन न होकर इच्छापूर्ति होगा । अमरकोष में काम का अर्थ प्रद्युम्न है और तर्कसंग्रह में इच्छा । कामधेनु, कामदुधा, पुत्रकामा, श्रीकाम प्रभृति शब्दों में भी काम पद का अर्थ इच्छा ही है । उप- 5 1
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वेदार्थपारिजात' १८२० पुत्रकामा, श्रीकाम इत्यादि शब्देषु कामशब्दस्येच्छेवार्थः । उपभोगशब्दस्यापि ' भुजपालनाभ्यवहारयोः ' इति धातुनिष्पन्नस्य पालनमुपयोगो वार्थं । तेन इच्छापालनम् इच्छापूर्तिरेवार्थं । यजुर्वेदे २१ । ६० मन्त्रे दयानन्देन भोग उपभोग इत्यर्थः कृतः । स्नेहप्रणयसम्भोगै समा हि मम मातरः ।' ( श्री० वा० रा० २ २६ ३२ ) अत्र रामायणे मातृसम्भोग उक्त । किमत्र सम्भोगशब्दस्य मैथुनमर्थः? यदि भोगशब्दस्य मैथुनमेवार्थः स्यात्तदा 'स्त्रीणां भोगे च मैथुने ' ( म० ८१०० ) इत्यत्र पुन- रुक्तिः स्यात् । 'न कामभोगात् परमान्नालङ्कारार्थंसञ्चयात् । तथा हितं न मन्यन्ते यथा रतिपरिग्रहात् ॥ ' ( शि० पु ० उमा सहिता २५२५।| ३३३३ ) इत्यत्र कामभोगाद्भिन्नत्वेन रतिपरिग्रहस्य वर्णनभुक्तम् ॥ तस्मात् प्रकृतेऽपि कामोपभोगपदस्य इच्छापूर्तिरेवार्थः । अत्रैकान्ते यथाविधिसम्यगासीनया दृष्टिः सम्मुखे कत्तंभ्या भवति । तया तथा करणान्मुनेरिष्टपूर्तिर्जाता । 'कामोपभोगेन रहस्तस्यां तुष्टिमगादृषिः । प्रथमया कौसल्यया तदीयं तेजः सोदुमसमर्थया नेत्रे निमीलिते । 'तस्य कृष्णस्य कपिलां जटां दीप्ते च लोचने । बभ्रूणि चैव श्मश्रूणि दृष्ट्वा देवी न्यमीलयत् ॥ भयात् काशिसुता त तु नाशक्नोद-भिवीक्षितुम् ॥ ' ( भ० भा० १११०६।५-६ ) इत्यत्र नेत्रनिमीलनेन दृष्ट्या दृष्टिसंयोगस्यापूर्णत्वादेव सन्ताने जातेऽपि तस्य ' ' ( नेत्रराहित्यम् । तदुक्तम्— प्रोवाचातीन्द्रियज्ञानो विधिना सम्प्रचोदितः । किन्तु वैगुण्यादन्ध एव भविष्यति ॥ म० मा० १।१०६ ८ १० ) । एतेनात्र दृष्टिसंयोगेनैव नियोगविधिः सम्पादितः । 'महातपस्विनः' ( म० भा० १ १०५ / १ ९ ) 'महातेज-स्विनः' ( म० भा ० १ | १०५।४८ ) मुनेः शक्तिस्तदानी नेत्रयोः केन्द्रितासीत् । तस्मिन् विधाने वैगुण्याद् इष्टपूर्तिर्न जाता । नेत्रनिमीलनादेव काशिराजसुताया अन्धपुत्रोत्पत्ति । दृष्टियोगस्यैवात्र विधानमासीत् । तद्व्यतिक्रमात् सन्तानोत्पत्ती त्रुटिर्जाता | अम्बालिकासमीपगमनेऽपि दृष्टिसयोग एवाभीष्ट आसीत् । यद्यपि तया नेत्रनिमीलनं न कृत किन्तु सापि भयात् पिङ्गलतां गता । विधिवैषम्यात्तत्रापि पाण्डुः पुत्र सञ्जातः । ( म० भा० ११०६।१६-२० ) काशिराजप्रेरिता दासी तु मुनेरिच्छां पूरितवती । सा मुने रूपं गन्धं च सोवा निर्भयासती दृष्ट्या दृष्टि योजयित्वा स्थिरा आसीत् । अत एव भोग शब्द पालन और अभ्यवहार अर्थवाची भुज धातु से बनता है, अतः उसका अर्थ पालन अथवा उपभोग होगा । फलतः इच्छा का पालन, इच्छा की पूर्ति ही यहाँ पर उपभोग पद का अर्थ होगा । यजुर्वेद ( २१।६० ) के मन्त्र की व्याख्या में दयानन्द ने भोग शब्द का अर्थ उपभोग किया है । वाल्मीकि रामायण में माताओं के लिये स्नेह, प्रणय और संभोग शब्दों का प्रयोग किया गया है । मातृ - संभोग का अर्थ वहाँ पर मैथुन नही है । यदि भोग शब्द का अर्थ मैथुन किया जाता तो उस दशा में मनुस्मृति ( ८1१०० ) में भोग और मैथुन शब्द का अलग अलग प्रयोग करने पर पुनरुक्ति दोष आ जाता । शिवपुराण को उमासहिता में कामोपभोग और रति- परिग्रह का अलग अलग उल्लेख किया गया है । इसलिये प्रकृत स्थल में भी कामोपभोग पद का अर्थ इच्छा की पूर्ति ही मानना चाहिये । नियोग के समय एकान्त में यथाविधि बैठकर आँख से आँख मिलानी पड़ती है । दासी ने ऐसा किया, अत मुनि की इच्छा पूरी हो गई, वे उस पर प्रसन्न हो गये । पहले कौसल्या उनके तेज को सहन न कर सकी । उसने अपनी आँखें मूँद ली । वेदव्यास की पीली जटा प्रदीप्त नेत्र, चितकबरी डाढी-मूँछ देखकर भय के मारे वह उनकी तरफ देख न सकी । आँखें मूंद लेने के कारण आँखों से आँखें ठीक से मिल न सकी और इसीलिये सन्तान के उत्पन्न होने पर भी वह अन्धी हुईं । वेदव्यास अतीन्द्रिय ज्ञान-संपन्न थे । उन्होंने इस बात की सूचना पहले ही दे दी थी । इससे यह सिद्ध होता है कि यहाँ पर दृष्टिमात्र से नियोग की विधि पूरी कर दी गई थी । महान् तपस्वी, महान् तेजस्वी मुनि की शक्ति तब नेत्रों में केन्द्रित हो गई थी । इस विधि में दोष आ जाने से अभीप्सित सन्तान की प्राप्ति नही हुई । आँख मूँद लेने के कारण ही काशिराज की पुत्री के अन्धा पुत्र उत्पन्न हुआ । इस नियोग में दृष्टि की हो प्रधानता थी । उसमें त्रुटि आ जाने से सन्तान में भी दोष आया । अम्बालिका के पास जाने में भी दृष्टि सयोग ही अभीष्ट था । यद्यपि उसने आँखें नहीं मूदी, किन्तु डर के मारे वह भी पीली पड़ गई थी । विधि की विडम्बना से उसका पुत्र भी पाण्डुवर्ण का हुआ । दासी ने मुनि की इच्छा पूरी की । उसने मुनि के रूप और गन्ध को सहन कर लिया और निर्भय होकर मुनि की आँखों में अपनी आँखें
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वेदार्थपरिजात १८२१ ' ' ( ) ' पाण्डवानभिलक्ष्य भारतसारे न च मैथुनसम्भूता निष्पापा पाण्डवा मता ५५ ३१ महाभारते च संयुक्ता ( ) सा हि धर्मेण योगमूर्तिधरेण च । लेभे पुत्र वरारोहा १।१२३।५ अत्र योगबलेन पुत्रदान स्पष्टं भवति । ' धर्मेण सयुक्तेति न मैथुनमभिप्रेतम् योगमूर्तिधरेणेति विशेषणवैयर्थ्यात् । देवाश्चैश्वर्यवन्तो वै शरीराण्याविशन्ति च' ( म ० भा -१५।३०।२१ ), ' सन्ति देवनिकायाश्च सङ्कल्पाज्जनयन्ति च । वाचा दृष्ट्या तथा स्पर्शात् सङ्घर्षेणेति पञ्चधा ॥ ' इति । पूर्वमेवोक्त मुनिना - 'यदि पुत्र प्रदातव्यो मया भ्रातु • । विरूपता मे सहतां तयोरेतत्परं व्रतम् ॥ यदि मे सहते गन्धं रूपं वेष तथा वपु ।' ( म० भा० १।१०५ / ४६-४७ ) एषैवेच्छापूर्ति कामोपभोगशब्देन विवक्षिता । इष्टपूर्ते- र्व्यतिक्रमाभावादेव तस्याः पुत्रो विदुरो निर्दोषो जातः । ' धर्मात्मा भविता लोके सर्वबुद्धिमतांवरः ।' ( म० भा० ११०६ २८ ) कामोपभोगपदस्य मैथुनार्थत्वे कामसम्बन्धेन नियोगदूषणेन तस्याः पातिव्रत्यभङ्गो महर्षेः पातित्यं च स्याताम् । तथात्वे विदुरस्य गुणवत्त्वमपि न स्यात् । एवमेव 'सम्बभूव तया सार्धं मातुः प्रियचिकीर्षया । ' ( म० भा० १।१०६।६ ) इत्यत्र सम्बभूवेत्यस्य तया सह एकस्थाने स्थित इत्येवार्थी, न मैथुनम् ॥ यथा -'कृष्णो द्वितीय. केशव सम्बभूव' ( ), ': ' ( / - ), म० भा ० ११ ९९ १३४ एवमेते पाण्डवा सम्बभूवुः । म० भा० १८ ९ ३६ यथा नात्र मैथुनमर्थः तथैव प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । मैथुनशब्दस्यापि एतादृशे प्रसङ्गे मिथुनीभावः सङ्गतिरेवार्थः । पतिपत्न्योर्युगलेऽपि मिथुनशब्दप्रयोगो-, ' ' ( ) भवति । भ्रातृभगिन्योरप्येकत्र स्थिती युग्मबोधनायापि मिथुनपदं प्रयुज्यते । मिथुनानां विसर्गादो नि० ३।४ 'प्रेहि मां राज्ञि पृषति मिथुनं त्वामुपस्थितम्' ( म० भा० १| १६ ९ / ३६ ), ( मिथुना सरण्य ( ऋ ० सं ० १०११७ २ ), 'भ्रातृ- भगिन्योर्युग्मं मैथुनं सङ्गते रतौ' ( अमरकोषे ३ | ३| १२२ ) सङ्गतावपि मिथुनशब्दः प्रयुज्यते । दृष्टिसंयोगेनापि गर्भाधानं मिलाये रखी । दृष्टि के प्रसाद से उत्पन्न होने के कारण ही भारतसार में पाण्डवों के लिये लिखा गया है कि मैथुन से उत्पन्न न होने के कारण पाण्डव निष्पाप है । महाभारत में भी योगबल से पुत्रदान की बात स्पष्ट कही गई है । धर्म से संयोग का अर्थ मैथुन नही है, क्योकि उस अवस्था में धर्मराज का 'योगमूर्तिधर' यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा । इसी तरह से यह कथन भो व्यर्थ हो जायगा कि देवगण अपने ऐश्वर्य के प्रभाव से शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं । ऐसे भी देवनिकाय होते है, जो कि संकल्प , स्पर्श द्वारा तथा संघर्ष के द्वारा इन पांच विधियों में से किसी भी एक विधि से सन्तान देने में मात्र से, वाणी से, दृष्टि से समर्थ होते हैं । व्यास मुनि ने पहले ही कह दिया था कि मै अपने भाई की पत्नियों को पुत्र अवश्य प्रदान करूँगा, किन्तु इसके लिये वे मेरी कुरूपता, तीक्ष्ण गन्ध और विकृत वेष को सहन करें । मुनि की इस इच्छा की पूर्ति ही यहाँ कामोपभोग शब्द से कही गई है । इस इच्छा केपूर्ण होने में कोई व्यतिक्रम न आने से ही दासीदासी केके पुत्रपुत्र विदुरविदुर निर्दोषनिर्दोष हुएहुए ॥ मुनिमुनि ने इसके लिये भी भविष्यवाणी कर दी थी कि इससे उत्पन्न होने वाला पुत्र धर्मात्मा और बुद्धिमानो में श्रेष्ठ होगा । कामोपभोग पद का अर्थ मैथुन करने पर नियोग दूषित हो जायगा, दासी का पातिव्रत्य नष्ट हो जायगा और महर्षि में भी पातित्य दोष आयेगा और ऐसी स्थिति में विदुर के गुणवान् होने की 1 संभावना ही कहाँ रह जाती । इसीलिये ' सम्बभूव' इस क्रिया का अर्थ दासी के साथ एक स्थान पर बैठे, यही अर्थ होगा, मैथुन किया, यह अर्थ नही । 'कृष्णो द्वितीय ', 'एवमेते ' इत्यादि उद्धरणों में भी संबभूव शब्द का अर्थ उत्पत्ति मात्र है, मैथुन नही; उसी तरह से प्रकृत स्थल में भी समझना चाहिये । ऐसे प्रसंगो मे मैथुन शब्द का अर्थ भी मिथुनीभाव, अर्थात् एक साथ बैठना ही होगा । पति-पत्नी का एक साथ बोध कराने के लिये भी मिथुन शब्द प्रयुक्त होता है, भाई-बहिन की एक जगह स्थिति बताने के लिये भी और किसी युगल का बोध कराने के लिये भी । ऊपर निरुक्त, महाभारत और ऋग्वेद के उद्धरणो मे इन सभी अर्थों में मिथुन शब्द का प्रयोग हुआ है । अमरकोष में रति के लिये समागम के अर्थ में भी यह शब्द प्रयुक्त है । दृष्टि के संयोग से भी गर्भाधान होता है । ऐसी स्थिति में इस तरह के समागम के
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१८२२ वेदार्थपारिजात सम्भवत्येव, तथा सति क्वचित् समागमे सम्भोगशब्दप्रयोगेऽपि न क्षतिः । यथा मुखेनोषधग्रहण सूच्यापि तद्ग्रहण सम्भवत्येव, तथैव दिव्यदृष्ट्या व्यासेन गर्भाधानं कृतम् । 'ता स दीर्घतमाङ्गेषु स्पृष्ट्वा देवी यथाब्रवीत् । भविष्यति कुमारस्ते तेजसादित्य- वर्चस ॥ ' ( म० मा० ११०४/५२ ) अत्र महर्षिर्दीर्घतमा स्पर्शेनैव गर्भधारण कृतवान् । अत्र स्पष्ट मैथुनाभावेऽपि दीर्घत- मसा हस्तस्पर्शेनैव। दित्यवर्चस कुमारा उत्पादिता । 'वृद्धाय प्राहिणोत्तदा' ( म० भा० ९ | १०४| ४६ ), / अन्ध वृद्ध च तं मत्वा न सा देवी जगाम ह।' ( म० भा० १११०४।४६ ) वृद्धस्य मैथुनसामर्थ्यमपि नासीत् । ब्रह्मवैवर्तेऽपि ' मुने. करस्पर्शमात्रात् सद्यो गर्भो बभूव ह । ( २०४६ | ६२ ), ' मषिः सविदं कृत्वा सम्बभूव तथा सह । देव्या दिव्येन विधिना वशिष्ठः श्रेष्ठया ऋषि ॥ ' ( म० भा० १।७९ /४५ ) 'तेनैव विधिना' ( म० भा ० १ । १०६ । १५ ) सर्वत्र मैथुनमन्तरैव दिव्यन विधिना सृष्टिरुक्ता । वायुपुराणेऽपि - 'तासा विशुद्धात्सङ्कल्पाज्जायन्ते मिथुना प्रजा: ।' ( ८/५२ ) प्राचीनकाले अमेथुन्यः सृष्टय. स्मर्यन्ते । 'न चैषा मिथुनो धर्मो बभूव भरतर्षभ । सङ्कल्पादेव चैतेषामपत्यमुपपद्यते ॥ ' (म० भा० शा० १० २७।३८ ) ' ततस्त्रे- तायुगे...संस्पर्शाज्जायते प्रजा । नह्यभून्मैथुनोधर्मंस्तेषामपि जनाधिप ॥ ' ( म० भा० १२ २०७२३९ ), द्वापरे मैथुनो धर्म. प्रजानामभवन्नृप । तथा कलियुगे राजन् द्वन्द्वमापेदिरे जनाः ॥ ' ( म० भा० १२२०७/४० ) द्वापरेऽपि विशिष्टा मुनयो योगिनश्च दिव्येन विधिना प्रजाः सृजन्तिस्म । यदि ग्राम्यधर्मेणैव सृष्टि रिष्टा स्यात्तदा बलवतो यूनः क्षत्रियानपहाय वृद्धान् कृशान् तपस्विनो ब्राह्मणान् किमर्थमाकान्ते स्म? महाभारते मन्त्रशक्त्येव स्त्रियमन्तरापि पुत्राः समुत्पादिता: । ' याजस्तु ' ( | ) हवनस्यान्ते देवीमाज्ञापयत्तदा । प्रेहि मा राज्ञि पृषति मिथुनं त्वामुपस्थितम् ॥ म ० भा ० ११ १६९ तदानी रजस्वला द्रुपदपत्नी सडकेत नोक्तवती - 'अवलिप्तं मुख ब्रह्मन् दिव्यान् गन्धान् बिभर्मि च । सुतार्थेनोपलभ्यास्मि तिष्ठ याज मम श्रिये ॥ ' याजेनोक्तम् – ' याजेन श्रपितं हव्यमुपयाजाभिमन्त्रितम् । कथ काम न सन्दध्यात् सा त्वं विपेहि तिष्ठ वा ॥ ' ( म० भा ० १ | १ | ६ ९।३८ ) ' एवमुक्त्वा याजेन हुते हविषि संस्कृते । उत्तस्थौ पावकात्तस्मात् कुमारो ( धृष्टद्युम्न ) देवसन्निभ ॥ लिये संभोग शब्द का प्रयोग किया जाय, तो उसमे कोई दोष नही है । जैसे मुंह के द्वारा और इंजेक्शन के द्वारा भी औषधी ली जाती है, उसी तरह से दिव्य दृष्टि के द्वारा व्यास ने गर्भाधान किया । दीर्घतमा महर्षि ने भी स्पर्श के द्वारा गर्भाधान किया था । स्पष्ट है कि बिना मैथुन के दीर्घतमा ऋषि ने हाथ के स्पर्शमात्र से सूर्य के समान तेजस्वी पुत्रों को पैदा किया था । वे अन्धे और वृद्ध थे । वृद्ध मनुष्य में मैथुन की शक्ति रह भी नही जाती । ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी मुनि के कर स्पर्श मात्र से गर्भस्थापन की बात कही गई । महा- भारत में दिव्य विधि से गर्भाधान करने की बात कही है । इस तरह से शास्त्रों में सर्वत्र मैथुन के बिना दिव्य विधि से ही गर्भाधान करने की बात वर्णित है । वायुपुराण में भी वर्णित है कि ऋषियो के विशुद्ध संकल्प से मैथुन सृष्टि होती हैं । प्राचीन काल में बिना ही मैथुन के सकल्प मात्र से सृष्टि हुआ करती थी । त्रेतायुग मे स्पर्शमात्र से प्रजा हो जाती थी, उस समय भी मैथुन धर्म प्रवृत्त नही था । द्वापर युग में मैथुन धर्म की प्रवृत्ति हुई और कलियुग में तो इसके लिये कलह भी होने लगा । द्वापर युग में भी विशिष्ट मुनि और योगीजन थे, जो कि दिव्य विधि से प्रजा की सृष्टि करते थे । यदि इन स्थलो पर मैथुन धर्म से सृष्टि करने की बात होती, तो इसकेलिये बलवान् क्षत्रिय युवक को छोड़कर वृद्ध दुर्बल तपस्वी ब्राह्मणो की क्यो खोज होती । महाभारत मे ऐसे भी प्रसंग है, जहाँ पर कि स्त्री के बिना भी मन्त्रशक्ति के प्रभाव से पुत्र उत्पन्न हुए है । द्रुपदराज के यहाँ बाज नामक महर्षि ने यज्ञ कराया था । हवन के अन्त में उन्होंने का आह्वान किया । द्रुपदपत्नी के यह संकेत देने पर कि रजस्वला होने के कारण वह यज्ञस्थल मे उपस्थित होने में असमर्थ है, याजदेवी अपने छोटे भाई उपयाज के द्वारा अभिमन्त्रित हवि की आहुति दे दी और उससे कहा कि तुम यहाँ उपस्थित ने,यह हवि व्यर्थ नहीं जा सकती । संस्कृत हवि की अति में आहुति देने के साथ ही उस यज्ञीय अग्नि से एक कुमाररहो अथवा न रहो एक कुमारी ( द्रौपदी ) का प्रादुर्भाव हुआ । इन सब उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि बिना मैथुन के दिव्य( विधिघृष्टद्युम्नसे महर्षि) और-
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वेदार्थपारिजातः १८२३ कुमारी चापि पाञ्चाली वेदिमध्यात् समुत्थिता' ( म० भा० १११६ ९| ४४ ) तस्मान्मेथुत्यन्तरर दिव्येन विधानेन महर्षयः क्षत्रियाणा पुत्रान् उत्पादयन्ति स्म । कलियुगे तदसम्भवात् सर्वया निषिद्धो नियोग | यद्वा -' मन. कृतं कृतं राम न शरीरकृतं कृतम् । येनेवालिङ्गयते कान्ता तेनैव दुहिता पि च ॥' इति रीत्या महर्षीणां कामभावनाऽभावे शरीरेण लौकिक मैथुनेऽपि न तन्मैथुनम्, सुनालिङ्गनवत् । यथा कर्तृत्वभो त्वनानात्वबुद्ध्यभावे- नाहङ्काराभिनिवेशराहित्येन च लोकदृष्ट्या कर्मापि न कर्म भवति, वृश्चिकस्य विषकण्टकनाशे लोकदृष्ट्या वृश्चिकत्वेऽपि यथा न वृश्चिकत्वम्, तथैव कामवृत्त्यभावेन मैथुनस्याप्यमैथुनत्वमेव, 'सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते । ' ( म० गी० ) वैदिके यज्ञेऽग्नीषोमीयादिपश्वालम्भनेऽप्याम्नायवचनादहिंसा प्रतीयते, तथैव कामवासनाया उद्देश्याभावेऽपि मैथुनमपि मैथुनं न भवति । ' अत्रापि विधिरुक्तश्च मुनिभिर्मांसभक्षणे । देवताना पितॄणाञ्च भुङ्क्ते दत्त्वापि य. सदा ॥ यथाविधि यथाश्रद्धं न प्रदुष्यति भक्षणात् ।' ( म० भा० ३।२०८/ १५ ), 'अमासाशी भवत्येवमित्यपि श्रूयते श्रुति । भार्या गच्छन् ब्रह्मचारी ऋतो भवति ब्राह्मण: । ' ( म० भ० ३।२०८ १५) कलियुगे छद्मप्राययुगे तदसम्भवान्निषिद्धो नियोग | व्यामोहेन चेतन- त्वादमोघवीर्यत्वाभावाच्चाऽनेकधा प्रवृत्तौ विषयप्रसक्तिरेव सम्भाव्यते । अद्यत्वे वैज्ञानिकगर्भाधानेऽपि छलछद्मादिसम्भवात् दिव्यत्वाभावाच्च कलिवर्ज्यत्वमेव मन्तव्यम् । गण क्षत्रियो को सन्तान दिया करते थे । कलियुग मे ऐसा करना सम्भव नही है, अत इस काल मे नियोग को निषिद्ध मान लिया गणा है । अथवा योगवासिष्ठ मे महर्षि वसिष्ठ श्रीराम को उपदेश देते हैं कि हे राम, ससार में मन के द्वारा किये गये कर्म की ही प्रधानता मानी जाती है, शरीर के द्वारा किये गये की नहीं । एक ही मनुष्य स्त्री का भी आलिंगन करता है और अपनी पुत्री का भी । यहाँ पर शारीरिक क्रिया के समान रहते भी मानसिक भाव भिन्न भिन्न प्रकार के रहते हैं । इसी पद्धति से महर्षियों में कामभावना नही रहती, अतः उनके द्वारा शरीर से किया गया मैथुन, मैथुन नही माना जाता", जैसे कि पुत्री का आलिंगन सदोष नही माना जाता । जैसे कि कर्ता, भोक्ता आदि नानात्व बुद्धि के न रहने से, अहकार और अभिनिवेश के अभाव में किया गया कर्म; कर्म नही रह जाता । विच्छू के डंक के काट देने पर भी वह विच्छू ही कहलाता है, किन्तु वास्तव में उसका वृश्चिकत्व नष्ट हो जाता है, उसी तरह से कामवृत्ति के अभाव में किया गया मैथुन भी मैथुन नही कहलाता है । गीता में कहा गया है कि सभी प्राणियो मे अपनी आत्मा को देखने वाला योगी कर्म करते हुए भी उसके फल से लिप्त नही होता । वैदिक यज्ञ मे अग्रीषोमीय आदि पशुओ का आलंभन होने पर भी जैसे शस्त्र के वचन के अनुसार इसमे हिंसा नही होती, उसी तरह से कामवासना के निमित्त न होने पर किया मैथुन भी मैथुन नही माना जाता । महाभारत में मास- भक्षण के विषय में बताया गया है कि देवता और पितृगण के निमित्त यथा विवि अर्पित करके प्रसाद के रूप में 1 उसका ग्रहण करने में कोई दोष नही है, ऐसा मुनियो ने बताया है । श्रुति मे भी बताया गया है कि ऐसा करने वाला मासभक्षी नही कहा जाता । ऋतुकाल में अपनी भार्या के साथ सहवास करने वाला व्यक्ति बह्मचारी ही कहलाता है । कलियुग छल-कपट से भरा हुआ है । उसमें इन सब नियमों का पालन कर पाना कठिन है । व्यामोह में पढकर और अमोघ वीर्य न होने से पुरुष नियोग-क्रिया मे बार- बार प्रवृत्त हो सकता है और इस तरह से उसकी विषय-भोग में प्रवृत्ति बढ़ सकती है । आजकल वैज्ञानिक पद्धति से गर्भाधान की वही चर्चा है, किन्तु इसमें भी छल-कपट की संभावना ही अधिक है । दिव्य विधि न होने से कलिकाल में इसको भी निषिद्ध मानना ही उचित है ।
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परिशिष्टम्-२ युधिष्ठिरमीमांसकमतखण्डनम् यत्तु युधिष्ठिरमीमासकः कश्चित्समाजी - 'भारतीयेतिहासानुसारेण समेषां शास्त्राणामाद्य उपदेष्टा भगवान् ब्रह्मासीत् । तस्योपदेश एव शास्त्र शासनमुच्यते । अतिविस्तृतत्वात्तस्य तन्त्रमित्यप्येक नाम भवति । तदनन्तरं देशकाल-परिस्थित्यनुसारेण उत्तरकालवर्तिभिर्ऋषिभिर्यच्छास्त्राणामुपदेशः कृतः, तस्य मूल ब्रह्मोपदेश एव । तस्मात्तेषामुपदेशोऽनु-शासनमनुतन्त्रं स्मृतिर्वोच्यते । शास्त्रत्वधर्मस्य साम्येऽपि यद्यपि तत्र शास्त्रतन्त्रशब्दयोरपि प्रयोगो भवति, तथाप्यनुशास्त्रमनु-तन्त्रमेव तज्ज्ञातव्यम् । ब्रह्मोत्तरवत्युपदेशः प्रवचनमुच्यते । प्रवचनरूपस्योपदेशस्येद वैशिष्टयं भवति यत्तत्र प्रवक्ता स्वपूर्व-ग्रन्थस्य देशकालपरिस्थित्यनुसारेण किञ्चिन्न्यूनमधिकं वाशं समावेश्य तस्य नव्य रूप विदधाति । एतत्प्रवचन सस्कार-पदेनाप्युच्यते । तदेतच्चरकसंहितायामुक्तम्- ' विस्तारयति लेशोकं सक्षिपत्यति विस्तरम् । सस्कर्ता कुरुते तन्त्रं पुराणं च पुनर्नवम् ||' (चर० सिद्धिस्थाने, १२/ ६५-६६ ) इति । प्रवचनात् संस्काराद्वा हेतोः प्रतिवचनं यत्र नवीनांशानां समावेशस्तत्रैव प्राचीनोंशोऽपि सुरक्षितो भवति । एतत्प्रवचनमृषिमुनिभिरेव कर्त्तुं शक्यते । तेषामुच्छेदात् प्रवचनविद्याया अपि उच्छेदो जातः' इति । तदेतत् सर्वं सर्वथाऽशुद्धमसङ्गतं कौटिल्यमूलकञ्च, निर्मूलत्वात् । तथाहि — कश्च तावद् भारतीयेतिहास:? न वेदः, तस्य समाजिभिरितिहासत्वानभ्युपगमात् । नापि रामायण भारतं वा तयोरपि तैः प्रामाण्यानभ्युपगमात् । तत्र पदे पदे प्रक्षेपाङ्गीकारात् । नापि पुराणानामपि तत्त्वम्, तेषामपि प्रामाण्यानभ्युपगमात् । नापि ब्राह्मणारण्यकादीनामपि तत्वम्, तेषामपि पौरुषेयत्वाभ्युपगमेनाप्रामाण्यशङ्कास्कन्दितत्वात् । प्रामाण्ये वा ततो मूर्तिपूजाश्राद्धावतारादिसिद्धया तदनिष्ट-प्रसङ्गात् । नाप्याधुनिकस्येतिहासस्य प्रामाण्यम्, तस्यानेकदोषदुष्टत्वात् । तद्रत्यावेदरामायणभारतादीनामर्वाचीनत्वापत्तेः । युधिष्ठिर मीमांसक के मत का खण्डन युधिष्ठिर मीमासक एक आर्यसमाजी विद्वान् है, इन्होने अभी हाल मे मोमासा के शाबर भाष्य का संस्करण प्रकाशित कराया है । उनका कहना है कि भारतीय इतिहास के अनुसार सभी शास्त्रो के प्रथम उपदेष्टा ब्रह्मा थे । उन्हीं के उपदेश को शास्त्र अथवा शासन कहा जाता है । यह शास्त्र अत्यन्त विस्तृत है, अतः इसको तन्त्र भी कहते हैं । इसके बाद देश, काल और परिस्थिति के अनुसार उत्तर काल के ऋषियों ने जिस शास्त्र का उपदेश किया, उसका आधार ब्रह्मा का वह उपदेश ही है । इसलिये उनका उपदेश अनुशासन, अनुतन्त्र अथवा स्मृति कहा जाता है । ब्रह्मा के बाद ऋषियो का उपदेश प्रवचन के नाम से प्रसिद्ध है । इसकी यह विशेषता है कि इसमे प्रवचन कर्ता अपने पूर्ववर्ती ग्रन्थ के कुछ अंशों का समावेश कर देश, काल और परिस्थिति के अनुसार, उनका परिष्कार कर अपने ग्रन्थ में समावेश करता है । इस तरह के प्रवचन को ग्रंथ का संस्कार कहा जाता है । जैसा कि चरकसंहिता में कहा गया है—ग्रंथ का संस्कर्ता संक्षेप में कही गई बात को विस्तार से समझाता है । विस्तृत अंश को सक्षिप्त कर देता है और पुराने ग्रंथ को नया बना देता है । इस प्रतिसंस्कार मे नई बातों का तो समावेश होता ही है, प्राचीन अंश भी सुरक्षित रहता है । इस तरह का प्रवचन ऋषि-मुनि ही करते हैं । उनके अभाव में अब प्रवचन की पद्धति भी उच्छिन्न हो गई है । यह सारा कथन असंगत, अशुद्ध और कुटिलता से प्रेरित है, निराधार है । वह भारतीय इतिहास कोनसा है? वेद में आर्य- समाजी इतिहास को नही मानते । रामायण-महाभारत को भी वे प्रमाण नहीं मानते, क्योंकि उनके मत के अनुसार इनके अनेक अंश पुरुष- प्रक्षिप्त हैं । पुराणो को तो वे प्रमाण मानते ही नहीं । ब्राह्मण, आरण्यक भी उनके मत मे प्रमाण नही हो सकते, क्योंकि उनके मत के अनुसार ये निर्मित ग्रंथ हैं और इसीलिये इनकी प्रामाणिकता संदिग्ध हो जाती है । यदि वे इनको प्रमाण मानने लगें तो मूर्तिपूजा, श्राद्ध अवतार आदि की सिद्धि होने से यह बात उनके मत के विपरीत पड़ेगी । अनेक दोषों से भरे होने के कारण आधुनिक इतिहास भी
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वेदार्थपारिजात १८२५ नचाधुनिकैराद्य उपदेष्टा ब्रह्मा कश्चिदभ्युपेयते, न च दयानन्देन तदीये व मनुष्येभ्यो मिन्ना ब्रह्माऽग्निवाय्वादित्या वा अभ्युपेयन्ते । तथा च ब्रह्मादयो मनुष्या कदा कीदृशाः क वाऽऽसन्निति सर्वथापि न तैर्वर्णयितुं शक्यते, निर्मूलत्वात् । न चोपदेशमन्तरा मनुष्याणा ज्ञान सम्भवति । न च मनुष्या सर्वथा अभ्रान्ताः सम्भवन्ति, आधुनिकानामिव सार्वदिकानामेव मनुष्याणा भ्रमप्रमादविप्रलिप्साकरणापाटवादीना सम्भवात् । न चेश्वरस्तेभ्य उपदिशति, तत्र प्रमाणाभावात् । निराकारस्य कण्ठतालवाद्यभावेनोपदेशासम्भवाच्च । न च प्रवचनस्यानुशास्त्रत्वम् अनुतन्त्रत्वं वा, निर्मूलत्वात् । न चोक्तचरकश्लोकस्तत्र प्रमाणम्, तत्र प्रतिसंस्कारस्य वर्णनात् । प्रवचनमध्यापनम्, प्रतिसस्कारस्तु चरक्श्लोकोक्तः प्रवचनाद् भिन्नः । चरक- सहितायाः सम्प्रदायभ्रशात् सप्तदशाध्यायाना कल्पस्थानस्य सिद्धिस्थानस्य च दृढबलाचार्यकर्तृक पूरण तत्रैवोतिम्- ' अस्मिन् सप्तदशाध्यायाः कल्पा सिद्धय एव च । तन्त्रे तु नोपलभ्यन्ते चरकप्रतिसंस्कृते ॥ "... दृढबलोऽकरोत् ॥ ' इति । प्रवचनं तु जैमिनिः स्पष्टयति ' आख्या प्रवचनात् ( जै ० सू ० १।१०३० ) इति । ग्रन्थे सङ्कोचविस्तरयो. स्वातन्त्र्ये सति कर्तृत्वमेव स्यात्, न प्रवक्तृत्वम् । स्वातन्त्र्येऽङ्गीकृते कर्तृत्वप्रवक्तृत्वयोर्भेदलोपप्रसङ्गः, शब्दनित्यताधिकरणे 'यत्नतः प्रतिषेध्या नः पुरुषाणा स्वतन्त्रता' ( श्लो० वा० २९ ० ) इति भट्टपादोक्ते: । नहि शाकल्य-मध्यन्दिन - कौथुम- शौनकादयः स्वस्वसंहिताना कर्तारः, किन्तु प्रवक्तार एवेति समाजिभिरप्यभ्युपगमात् । यत्तु ' मान्बधदान्शान्भ्योदीर्घश्चाभ्यासस्य' ( पा० सू० ३| १| ६ ) इति नियमेन मान्धातोर्जिज्ञासार्थे सन्प्रत्य- येन मीमासाशब्दनिष्पत्तेर्जिज्ञासार्थो मीमासाशब्दः । 'अथातो धर्मजिज्ञासा' ( जै० सू० १| १| १ ), अथातो ब्रह्मजिज्ञसा' ( ब्र० सू० १०१०१ ) इत्यत्र जिज्ञासाशब्दोऽपि मीमासापर्याय: ' इति, तदप्यशुद्धम्, मीमासाशब्दस्य पूजितविचारवचनत्वात् । परमपुरुषार्थहेतुभूतसूक्ष्मतमार्थंनिर्णयफलक विचारस्य पूजितता । ' मान्बधदान्शानुभ्यो दीर्घश्चाभ्यासस्य' ( पा ० सू० ३| १ | ६) प्रमाण नही हो सकता । इस नये इतिहास से वेद, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथ अर्वाचीन माने जाने लगेंगे । आधुनिक इतिहासज्ञ किसी प्रथम उपदेष्टा ब्रह्मा को स्वीकार नही करते और न स्वय दयानन्द या उनके अनुयायी मनुष्यो से भिन्न ब्रह्मा को अथवा अग्नि, वायु, सूर्य प्रभृति देवो को ही स्वीकार करते है । इस स्थिति मे ब्रह्मा प्रभृति मनुष्य कैसे थे? वे कब और कहा पैदा हुए थे? इन प्रश्नों का उत्तर दे पाना कठिन है । उपदेश के बिना ज्ञान नही हो सकता । मनुष्य कभी भी भ्रममुक्त नही हो सकता । आज की तरह ही प्राचीनकाल मे भी मनुष्य भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा ( ठरने की इच्छा ), करणापाटव ( चक्षु प्रभृति इन्द्रियो की मन्दता ) प्रभृति दोषों से ग्रस्त रहा ही होगा । ईश्वर ने मनुष्य को उपदेश दिया, इसमे भी आपके यहाँ कोई प्रमाण नही है । आपके मत से ईश्वर निराकार है । कण्ठ, तालु आदि के अभाव में वह उपदेश कैसे कर सकता है । प्रवचन को अनुशासन और अनुतन्त्र कहना भी निराधार है । चरक के श्लोक को यहा प्रमाण के रूप मे उपस्थित नही किया जा सकता, क्योकि उसमें प्रतिसस्कार का वर्णन है, प्रवचन का नही । प्रवचन का अर्थ अध्यापन होता है । चरक में वर्णित प्रतिसंस्कार प्रवचन से भिन्न है । चरक के प्राचीन सम्प्रदाय के नष्ट हो जाने पर कल्पस्थान के सत्रह अध्याय और सम्पूर्ण सिद्धिस्थान का प्रतिसंस्कार दृढबल ने किया था, इस बात का उल्लेख नही मिलता है । 'आख्या प्रवचनात्' सूत्र मे जैमिनि ने प्रवचन की परिभाषा की है । ग्रन्थ में संक्षेप और विस्तार की स्वतन्त्रता रहने पर वह उसका कर्ता माना जायगा, प्रवक्ता नही । इस प्रकार की स्वतन्त्रता मिल जाने पर कर्ता और प्रवक्ता में भेद ही क्या रह जायगा? भट्टपाद कुमारिल का कहना हैं कि वेद के प्रवचन में पुरुष की स्वतन्त्रता का हम दृढतापूर्वक निषेध करते हैं । शाकल्य, मध्यन्दिन, कौथुम, शौनक प्रभृति अपने नाम की संहिताओ के कर्ता न होकर प्रवक्ता थे, इस बात को आर्यसमाजी भी स्वीकार करते है | 'मानवध० ' प्रभृति पाणिनि नियम के अनुसार मान् धातु से जिज्ञासा अर्थ में सन् प्रत्यय होने पर मीमासा शब्द बनता है । 'अथातो धर्मजिज्ञासा ' और ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' प्रभृति सूत्रो मे जिज्ञासा शब्द मीमासा का पर्यायवाची है । ' मीमांसक जी का यह कथन भी अशुद्ध है, क्योकि वास्तव में मीमासा शब्द का अर्थ पूजित विचार 'होता है । परम पुरुषार्थ मोक्ष के कारणभूत सूक्ष्मतम २२९
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वेदार्थपारिजात १८२६ इति सूत्रे माड्माने इत्यस्य ङानुबन्धस्य धातोर्नान्तत्वं निपातितम् । अस्य च पूजितविचारार्थत्व प्रसिद्धिबलात् । स्वतो नान्तस्य , १७ ) इत्युत्तरसूत्रे इच्छार्थे सन्विधानादयमनिच्छार्थ | '. ' (मान्धातोस्तु तदर्थत्व स्मृतिसिद्धम् । धातो कर्मण पा० सू० ३३।१७ एवेति गम्यते । यद्यपि पूजितविचारवचनत्वं व्याकरणस्मृतिसिद्धम्, ' मान्पूजायाम्' इति धातोः पूजामात्रवाचित्वात् । 'मान् विचारे' इति चुरादिपठितस्य धातोर्विचारमात्रवाचित्वात् । तथापि तयोरन्यतरस्य ग्रहणे धात्वर्थतया विशेषणविशेष्यान्य- तरलाभोऽस्तीत्यभिप्रायेणेदमुक्तमिति कल्पतरुकारः । यत्तु पूर्वोत्तरमीमांसयोरेकशास्त्रत्वसमर्थने 'तदिद विंशत्यध्यायनिबद्धं तत्र षोडशाध्यायनिबद्ध पूर्वमीमासा-, -शास्त्रं पूर्वकाण्डस्य धर्मविचारपरायण जैमिनिकृतम् तदन्यदध्यायचतुष्कमुत्तरमीमासाशास्त्रमुत्तरकाण्डस्य ब्रह्मविचार परायण व्यासकृतम्' ( प्रपञ्चहृदये, पृ० ३८ / ३९ ) इति, तथैव च सहितमेतच्छारीरकं जैमिनीयेन षोडशलक्षणेनेति शास्त्र-कत्वसिद्धि:' ( ब्र ० सू० १ । १ । १; श्रीभाष्ये ), ' तस्य विशत्यध्याय निबद्धस्य मीमासाशास्त्रस्य कृतकोटिनामधेय भाष्यं बौधायनेन कृतम् । तद् ग्रन्थबाहुल्यभयादुपेक्ष्य किञ्चित् सक्षिप्तमुपवर्षेण कृतम्' (प्रपञ्च हृदये, पृ० ३ ९५ ), 'अथातो धर्मजिज्ञासा' ( पू० मी० १| १| १ ) इत्यारभ्य "अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात्' ( व्र ० सू० ४/४/२२ ) इत्येवमन्तमेकशास्त्रम् " ( सेश्वर मीमासा १।१।१ ) । इत्यादि पूर्वग्रन्थकृद्वचनमुद्धृतम्, तदपि यत्किञ्चित्, लेखकस्य तत्प्रामाण्यानभिमतत्वात् । पूर्वोकैर्ग्रन्थकारैर्मन्त्र-ब्राह्मणारण्यकोपनिषेदामपौरुषेयत्वेन वेदत्वेन स्वतः प्रामाण्यमभ्युपगतम् । लेखकस्तु शाकल्यादिपुस्तकचतुष्ट्यातिरिक्तसंहिता- मन्त्राणां ब्राह्मणारण्यकोपनिषदा पौरुषेयत्वं परतः प्रामाण्यं चोपेयते । पूर्वैर्जन्मना वर्णव्यवस्था - पशुयाग-साकारब्रह्मप्रतिपादनं च महता समारोहेण क्रियते । तत्सर्वं लेखको नाभ्युपैति । सिद्धान्ते तु विषयभेदात् फलभेदादधिकारिभेदात् कर्तृभेदाच्चोभयोर्मीमांस-योर्भेद एवाभ्युपेयते । यदि विषय-फला-धिकारिभेदेऽपि वेदमूलकत्वेनोभयोरेकशास्त्रत्वं * तदा तु षण्णामपि दर्शनानामास्तिक्य-मूलकत्वेनैकशास्त्रत्वमपि कुतो न स्यात्? केनचिदशेन साधर्म्य वैधर्म्ययोः सर्वत्र सौलभ्यात् । पूर्वमीमांसाया अधीतवेदस्त्र- वर्णिकोऽधिकारी । उत्तरमीमांसायाः साधनचतुष्टयसम्पन्नः प्रमाताधिकारी । पूर्वमीमांसाया भव्यो धर्मो विषयः । उत्तर- अर्थों का निर्णय करने के कारण इस प्रकार का विचार पूजनीय माना जाता है । मान धातु के पूजा और विचार दोनो अर्थ होते है । तो भी वेदान्त सूत्र को परम्परित टोका कल्पतरु के रचयिता ने मीमासा शब्द की व्याख्या करते हुए कहा है कि मीमासा शब्द की निष्पत्ति उक्त धातु के दोनों अर्थो का विशेष्य विशेषणभाव से एक साथ समावेश किया जाता है । तदनुसार इस शब्द का पूजा, विचार अर्थ करना ही युक्तिसंगत है । पूर्व और उत्तर मीमांसा को एक ही शास्त्र मानने के लिए प्रपंचहृदय को प्रमाण रूप में उद्धृत किया है कि ' यह बीस अध्याय में निबद्ध है । इनमें से सोलह अध्याय का पूर्व मीमासा शास्त्र है । यह पूर्व काण्ड के नाम से प्रसिद्ध है । इसके कर्ता जैमिनि है । इसमें धर्मविषयक विचार प्रस्तुत किये गये हैं । इससे आगे के चार अध्यायों में उत्तर मीमांसा शास्त्र निबद्ध हैं । इसको उत्तर काण्ड कहते है । इसमें ब्रह्म का विचार किया गया है और इसके रचयिता व्यास जी हैं । ब्रह्मसूत्र के श्रीभाष्य में भी सोलह अध्याय क जैमिनि रचित शास्त्र का उल्लेख हैं । प्रपञ्च हृदय में ही यह बताया गया है कि बीस अध्याय के इस मीमांसा- शास्त्र पर बौधायन -ने -कृतकोटि नामक भाष्य रचा था । अधिक विस्तृत जानकर उपवर्ष ने इसको संक्षेप में प्रस्तुत किया । सेश्वर मीमांसा में ' अथातो धर्मजिज्ञासा इस पूर्व मीमासा के प्रथम सूत्र से लेकर 'अनावृत्ति. शब्दात्' इस उत्तर मोमासा के अन्तिम सूत्र तक E के ग्रन्थ को एक ही शास्त्र माना है । किन्तु उनका यह कथन भी इसलिये सही नही है कि वे इन ग्रंथो को प्रामाणिक नही मानते । इन सभी ग्रन्थकारो ने मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदो को अपौरुषेय वेद शास्त्र के अन्तर्गत माना है । इसके विपरीत इन ग्रंथों को प्रमाण के रूप मे उद्धृत करने वाले आप केवल शाकल प्रभृति चार संहिताओ के अतिरिक्त अन्य सभी मन्त्र सहिताओं और ब्राह्मण आदि ग्रन्थों को वेद नही मानते, उनको पौरुषेय मानते हैं, किन्तु ये लेखक जन्म से वर्णव्यवस्था, पशुयाग, साकार ब्रह्म आदि विषयों का प्रतिपादन करते हैं, इन सबको भी आप नही मानते । तब उक्त बातो को आप प्रमाण के रूप में उद्धृत करें, इसमें क्या तुक
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वेदार्थपारिजातः १८२७ मीमांसाया नित्यनिर्वृत्त ब्रह्म । पूर्वत्र स्वर्गादिफलम् । उत्तरत्र निष्प्रपञ्चब्रह्मात्मताविर्भाव फलम् । पूर्वत्र जैमिनिरुत्तरत्र बादरायण इति कर्तृभेदोऽपि । तदुक्तम्- ' अभ्युदयफल धर्मज्ञानं तच्चानुष्ठानापेक्षम्, नि श्रेयसफलं तु ब्रह्मज्ञानम्, न चानुष्ठा- नान्तरापेक्षम् । भव्यश्च धर्मो जिज्ञास्यो नानुष्ठानकालेऽस्ति, पुरुषव्यापारसाध्यत्वात् । इह तु नित्यनिर्वृत्त ब्रह्म जिज्ञास्यं नित्यत्वान्न पुरुषव्यापारतन्त्रम् । चोदनावृत्तिभेदोऽपि - या हि चोदना धर्मस्य लक्षण स्वस्वविषये नियुञ्जानैव पुरुषमव- बोधत । ब्रह्मचोदना तु पुरुषमवबोधयत्येव केवलम्, अवबोधस्य चोदनाऽजन्यत्वान्न पुरुषोऽवबोधे नियुज्यते, यथाऽक्षार्थ- सन्निकर्षेणार्थावबोधे, तद्वत् । यदुक्तम्- ' पूर्वोत्तरयोरेकतन्त्रत्वेऽन्यदपि प्रधानभूतं हेतुद्वयम् । तत्रैकं वेदतत्सम्बद्धशाखात्राह्मणारण्यकोप-वेदतत्सम्बद्धशाखात्राह्मणारण्यकोप- निषदामैकात्म्यरूपे समस्त वैदिकवाड्मये प्राधान्येनोद्दिष्टं यज्ञादिकर्म ब्रह्म च द्विभागात्मकमीमासाशास्त्रेण मीमांस्यम् । अपर च यज्ञरूपकर्मकाण्डज्ञानकाण्डयो. परस्पर घनिष्ठः सम्बन्ध | 'विद्या चाऽविद्या च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तो विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ( वा० स० ४० १४ ) इति मन्त्रवर्णात्' । इति तदपि सर्वथाऽसङ्गनम् त्वया वेदशाखाब्राह्मणारण्यको- पनिषदां वेदत्वावेदत्वस्वत.प्रामाण्यपरतःप्रामाण्याभ्युपगमेनैकात्म्यस्यखपुष्पायितत्वात् । विषयस्य च द्वित्वं त्वयैवाभ्युपेयते । तथात्वे च प्रमाणभेदेन विषयभेदेन च तयोर्भेद एव किं न स्यात् । न च घनिष्ठसम्बन्धेनापि सम्बन्धिनोरैक्यं सम्भवति, सम्बन्धस्य द्विष्ठत्वात् । तथात्वे भेद एव कि न स्यात् । न च तयोः सम्बन्धोऽपि सिद्धयति, कुतस्तरां घनिष्ठसम्बन्धत्वम् ॥ विद्याऽविद्याशब्दाभ्यामेवान्धकारप्रकाशयोरिव तयोर्विरोधोऽवगम्यते । ' दूरमेते विपरीते विषूची विद्या याच अविद्या या च' ( ) ' इति श्रुतिरपि तयोर्विरोधमेव बोधयति । प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तं ह्यवरं येषु कर्म । एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवाभियन्ति ॥ ' ( मु० उ० १ २ ७ ) इति श्रुतिरप्यमुमेवार्थं समर्थयते । अत एव 'विद्यां है? हमारे मत के अनुसार तो विषय, फल और अधिकारी के भेद के कारण और कर्ता के भी भेद के कारण दोनो मीमासाए भिन्न भिन्न है । यदि विषय, फल, अधिकारी और कर्ता के भेद के रहते हुए भी इनको एक ही शास्त्र माना जायगा तो छह दर्शनों को भी एक ही शास्त्र क्यो न मान लिया जाय? किसी न किसी अंश मे साधम्यं वैधर्म्य सर्वत्र मिल जायगा । पूर्व मीमासा का अधिकारी वेदाध्ययन- सम्पन्न वणिक है और उत्तर मीमासा का साधन- चतुष्टय सम्पन्न प्रमाता अधिकारी है । पूर्व मीमांसा का विषय भव्य धर्म है और उत्तर मीमासा का नित्य निर्वृत्त ब्रह्म है । पहले का फल स्वर्गप्राप्ति और दूसरे का फल निष्प्रपंच स्वरूप का आविर्भाव है । पहले का कर्ता जैमिनि और दूसरे का कर्ता वादरायण है । ' अभ्युदयफलं धर्मज्ञानं' इत्यादि से इस बात को कहा गया है । आगे वे लिखते है - पूर्व और उत्तर मीमासा एक ही शास्त्र होने के ओर भी दो कारण है । उनमें से एक यह कि वेद और उससे संबद्ध ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदों में समान रूप से प्रधानत यज्ञ प्रभृति कर्मों का और ब्रह्म का इस दो विभाग वाले मीमासा शास्त्र में विचार हुआ है । दूसरा यह कि यज्ञरूप कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड का परस्पर बडा घनिष्ठ सम्बन्ध है । 'विद्या (ज्ञान) और अविद्या ( कर्म ) इन दोनो को जो साथ साथ जानता है, वह अविद्या से मृत्यु को जीतकर विद्या की सहायता से अमृत पद को प्राप्त करता है । इस ईशावास्य मन्त्र में इनका एक साथ उल्लेख हुआ है' । किन्तु उनका यह कथन असंगत है, क्योकि उनके मत के ,,, अनुसार चार संहिता मे इनसे अतिरिक्त अन्य समस्त वेदशाखाओं ब्राह्मण आरण्यक और उपनिषदों में वेदत्व-अवेदत्व स्वतः प्रमाणत्व- परत. प्रमाणत्व के आधार पर भेद विद्यमान है, अतः आपके मत के अनुसार इनमे एकता खोजना आकाश कुसुम को खोजने के समान 1 है । विषय की भिन्नता आप भी मानते है । तब प्रमाण और विषय के भेद के आधार पर इनमें भिन्नता ही क्यो न मानी जाय । धनिष्ठ सम्बन्ध होने से सम्बन्धियो की अभिन्नता नही होती, क्योकि सम्बन्ध तो दो में ही रहने वाला धर्म है । इनका परस्पर सम्बन्ध I ही नही सिद्ध किया जा सकता, घनिष्ठता की तो बात ही दूर है । अविद्या और विद्या शब्दो से ही इनमें प्रकाश और अन्धकार का विरोध बोषित होता है । 'प्लवा होते' इत्यादि श्रुति भी कर्मकाण्ड को कमजोर नाव बताकर ज्ञानकाण्ड को उससे भिन्न ही मानती है । इसीलिये अविद्या और विद्या के क्रमशः अनुष्ठान का वाचक 'च' शब्द माना जाता है । इनका एक साथ अनुष्ठान विहित नही है । इसका तात्पर्य यह है कि वैदिक कर्मकाण्ड रूप अविद्या से पाशविक कामरूप मृत्यु को जीतकर बाद में तत्त्वज्ञान के अभ्यास के द्वारा
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तेदार्थपारिजातः १८२८ मृत्युं पाशविक कामकर्मरूपं चाविद्या चेत्यत्र क्रमसमुच्चयो न सहानुष्ठानलक्षण समुच्चयः । अविद्यया वैदिककामकर्मरूपयानदीस्तीर्त्वा अश्वादिना गृह गन्तव्य मृत्युमतिक्रम्य विद्यया तत्त्वज्ञानेन अमृतं ब्रह्मात्मनावस्थानरूपमश्नुते । यथा नोकया भवति, कर्तृत्वभोक्तृत्वनानात्वबाधपूर्वक भवति, न चोभयोरूपयोगो युगपत् सम्भवति । कर्तृत्वभोक्तृत्वनानात्वबुद्धिमूलकं कर्म ज्ञानं भवतीति कुतस्तयोर्युगपत्समुच्चयानुष्ठान सम्भवति? श्रेयान् देवयाजी इत्यात्म- यत्तु —' कर्मकाण्डात्मज्ञानसम्बन्धो महायाज्ञिकेन याज्ञवल्क्येन दर्शित: ---आत्मयाजी , स यथाहिस्त्वचो निर्मुच्येतै-याजी ह ब्रूयात् सह वा आत्मयाजी वेदेद मेऽनेनाङ्गेनाङ्ग संस्क्रियते, इद मेऽनेनाङ्गमुपधीयते "", वमस्मान्मर्त्यत् शरीरात् पाप्मनो निर्मुच्यते इति तदपि यत्किञ्चित् यतो हि त्वद्रीत्यादेवयजनम्यथा कथञ्चिद्त्वयाअग्नौमनुष्याद्घृत-,मध्वादिहोमलक्षणो यज्ञोऽपि जलवाय्वादिशुद्धिफलक एव । तत्कुतस्तेनात्मयजनं कुतो वा वर्णितम् न च मनुष्य-भिन्नाना देवानामेवानङ्गीकारात् । प्रकृते तु कर्मणामात्मसस्कार उपयोगो वर्णितः । नात्रात्मज्ञानं रूपाणां देवानामपेक्षित हविरग्नोहूयते । एवोपनि- यत्तु —'शतपथकारस्य काले कर्मकाण्डस्यात्मज्ञानस्य च मार्गों पृथक् पृथक् प्रतिष्ठित जातो । तत ) रीत्या कौत्ससदृशा महायाज्ञिका षत्सु कतिचित्तादृशानि वचनान्युपलभ्यन्ते, यैः कर्मनिन्दा सूच्यते । निरुक्त ( १११५ बाद घोडे आदि पर चढकर आदमी घर चला जाता, ब्रह्मात्मतत्त्व का साक्षात्कार करता है । जैसे नाव से नदी को पार करने के भोक्ता और नानात्व बुद्धि से भरा रहता,, ' ' है दोनो का एक साथ उपयोग नही होता वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिये । कर्म कर्ता ज्ञान का एक साथ अनुष्ठान कैसे है और 'ज्ञान ' इन भेदो को मिटा कर स्वस्वरूप मे प्रतिष्ठित करता है । इन परस्पर विरोधी कर्म और संभव हो सकता है? है कि आत्मयाजी और आपका कहना है कि 'कर्मकाण्ड और आत्मज्ञान का संबन्ध महायाज्ञिक याज्ञवल्क्य ने स्वयं बताया वैदिक कर्मकाण्ड प्रक्रिया का भी ज्ञाता देवयाजी में कौन श्रेष्ठ है? ऐसा पूछने पर बतावे कि आत्मयाजी श्रेष्ठ है । वह आत्मयाजी सारीहो जाता है, जैसे कि साँप अपनी केंचुल होता है । अतः वह इस कर्मकाण्ड के अनुष्टान द्वारा अनायास उसी तरह से सारे पापो से मुक्तअनुसार जिस किसी तरह अग्नि में मधु, घृत को छोड देता है । किन्तु आपका यह कहना उचित नही है । आर्यसमाजियों के मत के की शुद्धि तक सीमित है । तब आपके यहाँ आदि को आहूति दे देना ही यज्ञ है और इसका फल जल, वायु आदि दो ही पदार्थ यहाँ स्वीकृत नही है । वस्तुतः याज्ञवल्क्य के आत्मयजन अथवा देवयजन की बात हो कहाँ उठेगी, क्योकि मनुष्य से भिन्न देवता आपकेहै । न तो यहाँ आत्मज्ञान का वर्णन है और न उक्त वचन में कर्मकाण्ड का आत्म संस्कार के लिये क्या उपयोग है, यह बताया गया है । मनुष्य रूप देवताओ के लिये अपेक्षित हवि के ही अग्नि में प्रक्षेप का विधान हो गये । इसलिये उपनिषदों में कुछ 'शतपथ ब्राह्मण की रचना के समय कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड के मार्ग भिन्न भिन्न सरीखे महायाज्ञिकों का कहना था ऐसे वचन मिलते है, जिनमे कर्मकाण्ड की निन्दा की गई है । निरुक्त ( १।१५ ) के अनुसारअर्थज्ञानकौत्सकी उपेक्षा होने लगी । ये दोनो ही कि मन्त्रो का यज्ञो में उच्चारण करने मात्र से अदृष्ट उत्पन्न हो जाता है । इससे उनकेहै । जब आप उपनिषदों में परस्पर विरोधी अंश मत वेद विरुद्ध हैं, आपका यह कथन भी आपके पहले के वचन से विपरीत पडता कहाँ रहेगी? और तब उनके द्वारा प्रतिपादित,,, स्वीकार करते हैं तब शाखा ब्राह्मण आरण्यक और उपनिषदों में एकता और वैदिकता यज्ञ के अवसर पर भी मन्त्र के उच्चारण?, धर्म और ब्रह्मविषयक विचारो की प्रामाणिकता भी कहाँ रहेगी आपके मत के अनुसार तो उत्पन्न नही होता तो यज्ञ का प्रयोजन चिन्तनीय है । मन्त्रो का अर्थ भले ही होता हो, किन्तु उनके उच्चारण से जब कोई अदृष्टतो शतपथ ब्राह्मण प्रभृति ग्रन्थ के अवसर पर स्तोत्र, शस्त्र आदि का पाठ भी निरर्थक ही माना जायगा । हमारे मत के अनुसार और उत्तर मीमासा के सम्बन्ध भी अपौरुषेय वेद के अन्तर्गत ही है, अतः उनकी प्रामाणिकता में कोई सन्देह नही उठ सकता । पूर्व कोई विवाद हो नही है कि ये दोनों को बताने वाले अनेक वचनों को आपने उद्धृत किया है । वह सब भी निरर्थक ही है, क्योंकि इसमे परस्पर संबद्ध शास्त्र है । किया गया था, उनको समझने के यह कथन भी गलत ही है कि 'वेदों में जिन कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड का उपदेश , शाखाओं के अतिरिक्त वेद की लिये बाद में । ऋषि-मुनियों ने अन्य शाखाओं के ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदों का प्रवचन किया