वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 931–940
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 931–940
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वेदार्थपारिजात' १८२९ उत्पन्ना आसन्, यैर्मन्त्राणां यज्ञेषुच्चारणमात्रेणादृष्टोत्पत्ति मत्वा मन्त्राणामानर्थक्य वक्तुमुपक्रान्तम्, तदेतन्मतद्वयं वेदविरुद्ध- ',,, मेव इति तदपि तुच्छम् स्वकीय पूर्वोक्तिविरोधात् । यो पनिषत्स्वपि विरुद्धाश मन्यते तद्रीत्या शाखाब्राह्मणारण्यको-पनिषदा कथं वैदिकमयत्वं कथ च तं प्रति धर्मब्रह्मणोविश्वसनीयत्व स्यादिति विभावयन्तु सुधिय । तद्रोत्या यज्ञेषु मन्त्रो-,च्चारणमपि चिन्त्यप्रयोजनमेव मन्त्राणामर्थवत्त्वेऽप्यदृष्टाजनकत्वेन यज्ञे स्तोत्रशस्त्रादिपाठस्य नैरर्थक्यापाताच्च । सिद्धान्ते तु शतपथादिब्राह्मणानामप्यपोरुषेयत्वेन वेदत्वादेव प्रामाण्यम्, अन्यथोपर्युक्तवचनानामपि पौरुषेयत्वापत्या भ्रमप्रमादादि- मूलकत्वशङ्कया तदाश्रितमतस्यापि सन्दिग्धत्वापातात् । यत्तु पूर्वोत्तरमीमासयोः सम्बन्ध सूचकवचनानामुपन्यास, सोऽपि निरर्थक एव तत्र विप्रतिपत्तेरेवाभावात् । यदपि - ' वेदेषु ययोः कर्मज्ञानयोरुपदेश आसीनस्य हृदयङ्गमत्वापादनायोत्तरकाले ऋषिमुनिभिर्वेदशाखाना ब्राह्मणानामारण्यकोपनिषदा प्रवचनं कृतम्' इति, तदप्यशुद्धम्, शाखाव्यतिरिक्तानां वेदाना वपुष्पायितत्वस्योक्तत्वात् । - -शाकली माध्यन्दिनी कौथुमी शौनक्यादीना त्वदीयमूलवेदानामपि शाखात्वाविशेषात् । प्रवचनमध्यापनमेव । तच्च प्रतिदिनं भवति स्म, ग्रामे ग्रामे काठकं कालापक च प्रोच्यते' इति महाभाष्यवचनात् । यदपि – १ ९ ३१ शाखाना कृष्ण- ', द्वपायनस्य शिष्यप्रशिष्यैर्याज्ञवल्क्यस्य शिष्यप्रशिष्यैश्व प्रोक्तम् इति तदपि त्वत्प्रतिकूलमेव त्वदभिमतमूलवेदानामपि , तत्रैवान्तर्भावात् । ऐतरेयशाखाया ब्राह्मणमारण्यकञ्च शौनकेन प्रतिसस्कृतमित्यप्यशुद्धम् निर्मूलत्वात् । त्वदीयशौनकादि-सहित्या अपि तथात्वे प्रतिसंस्कृतत्वापत्तेः । वस्तुतस्त्वय मीमांसकम्मन्यो मीमांसकनाम्ना भ्रान्तिमेवोत्पादयति, न मनागपि मीमासकमतमनुसरति । बात आकाश कुसुम के समान है । शाकली, माध्यन्दिनी, कौथुमी और शौनकी --- जिनको आप मूल वेद मानते हैं, ये भी वेद की शाखाएं ही है । अध्यापन को ही प्रवचन कहते है । यह प्रवचन प्रतिदिन होता है । महाभाष्य मे इसका स्पष्ट उल्लेख है । १ ९ ३१ शाखाओ का प्रवचन कृष्ण द्वैपायन के शिष्यों ने और याज्ञवल्क्य के शिष्यों ने किया, यह कथन भी आपके विपरीत पडेगा, क्योकि इन्ही शाखाओ के अन्तर्गत आपके मूल वेद भी हैं । ऐतरेय शाखा के ब्राह्मण और आरण्यक का प्रतिसंस्कार शौनक ने किया था, वह कथन भी ठीक नही है । ऐसा मान लेने पर आपकी शौनक सहिता भी इनके द्वारा प्रतिसंस्कृत की गई थी, यह आपत्ति उठ खड़ी होगी । अपने को मीमांसक कहने वाले ये मीमासक जी मीमासा का कही भी अनुसरण नही करते, किन्तु उस नाम के सहारे कोरा भ्रम फैलाते है । आगे लिखा गया है—'काल क्रम से कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड में अनेक वाद उठ खड़े हुए और परस्पर विरुद्ध व्यवहार चल पडे । इसी परिस्थिति मे ब्राह्मण और उपनिषद वचनो का तात्पर्य निश्चित करने और विरोध का परिहार करने के लिये यथासमय मीमासा शास्त्र रचा गया । कृष्ण द्वैपायन के शिष्यो के प्रवचनकाल में इसमे बहुत वृद्धि हुई । उस भयंकर समय में कर्मकाड और ज्ञानकाण्ड के मूल तत्त्वो की रक्षा के लिये, वेद विरोधी मतवादो के निराकरण और कर्म और ज्ञानकाण्ड के स्वगतविरोध का परिहार करने के लिये महान् वेदज्ञाता कृष्ण द्वैपायन और जैमिनि ने, जो कि परस्पर गुरु-शिष्य थे, मिलकर दो भागों में मीमासा शास्त्र का प्रवचन किया, किन्तु ये सब बाते मीमासा शास्त्र के विरुद्ध है । पूर्व और उत्तर मोमासा पुरुष के द्वारा निर्मित है, व्यास और जैमिनि इनके रचयिता है, अत • इनके लिये प्रवचन शब्द का प्रयोग नही किया जा सकता । अन्य अनेक मुनियो ने मीमांसा शास्त्र का प्रवचन किया, इसका अर्थ 'उपदेश किया' यही होगा | पार्थसारथि मिश्र ने तो इस शास्त्र की भी परम्परा बतलाई है । तदनुसार मोमासा शास्त्र जैमिनि को परम्परा से प्राप्त हुआ है, यह उनकी कृति नही है । आजकल तो व्याख्यान ( भाषा ) भी प्रवचन कहे जाने लगे है कि आज अमुक स्थान पर अमुक महात्मा का रामायण पर प्रवचन होगा, अथवा धार्मिक प्रवचन होगा । अख-बारों में यह सब छपता ही रहता है । 'आख्या प्रवचनात्' इस जैमिनि सूत्र में प्रवचन की यह प्रचलित व्याख्या नहीं है, किन्तु परम्परा प्राप्त वेद वर्णों की आनुपूर्वी के अनुरूप शिष्य को उसे पढाना ही प्रवचन कहा गया है । इस प्रवचन में स्वर अथवा वर्ण में आनुपूर्वी के विपरीत कोई परिवर्तन नही हो सकता । इसमें प्रवक्ता को किसी प्रकार की स्वतन्त्रता नही है ।
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वेदार्थपारिजात १८३० यदपि - ' सुदीर्घकालात् कर्मकाण्डाध्यात्मकाण्डयोरनेके वादा समुत्पन्नाः परस्परविरुद्धव्यवहाराश्च प्रच लिता । तत एव शाखाब्राह्मणोपनिषद्वचनाना तात्पर्यनिरूपणविरोधपरिहाराभ्या यथासमय मीमासाशास्त्रप्रवचनं चक्रुः । कृष्णद्वैपायनस्य शिष्याणा प्रवचनकालेऽय नितरां वृद्धिं गतः । तादृशे भयङ्करे काले कर्मकाण्डोपासनाकाण्डाना मूलतत्त्वरक्ष- णार्थं वेदविरुद्ध मतवादाना निराकारणार्थं कर्मज्ञानादीना स्वगतविरोधपरिहारार्थं महावेदज्ञौ गुरुशिष्यो कृष्णद्वैपायनोव्यासो जैमिनिश्च मिलित्वा भागद्वयेन मीमासाशास्त्रप्रवचन कृतवन्तो' इति, तत्सर्वमपि मीमासाशास्त्रविरुद्धमेव, पूर्वोत्तरमीमासयोः पौरुषेयत्वेन व्यासजेमिनिकृतत्वेन प्रोक्तत्वाऽसिद्धेः । अनेकमीमासाशास्त्रस्यान्येऽपि मुनयः काले काले प्रवचनं कृतवन्त इत्यस्यो- पदेशं कृतवन्त इत्येवार्थः पार्थसारथ्यादिभिस्तु पारम्पर्यमेव वर्णितम्, न तु तन्निर्मित मीमांसाशास्त्रमिति वर्णितम् । अद्यत्वे तु व्याख्यानान्यपि प्रवचनशब्देनाख्यायन्ते, अमुकस्य महात्मनोऽमुत्र रामायणप्रवचन भविष्यति धार्मिकं वा प्रवचनं भविष्य- तीति वृत्तपत्रेषु प्रकाशनदर्शनात् । ' आख्या प्रवचनात्' ( जै० सू० १ | १ | ३० ) इत्यत्र तु न तथा प्रवचनम्, किन्तु परम्परा- प्राप्तवेदवर्णानुपूर्वीस व्यपेक्षतया शिष्येभ्यो यथावदध्यापनमेव । नात्र किञ्चिदपि स्वरवर्णाना भेदोभवति । अत्र न प्रवक्तुः स्वातन्त्र्यम् । वस्तुतस्तु मन्त्रब्राह्मणारण्यकोपनिषदा मेक त्रिशदुत्तरेकादशशतशाखाभेदभिन्नानामपौरुषेयत्वाद् वेदत्वमेव, ततोऽ- न्यस्य वेदस्यानुपलम्भात् । तेषु वेदेषु तात्पर्यनिर्धारणाय परस्परविरोधपरिहाराय प्रमाणान्तरविरोधपरिहाय च मीमासा- वस्तुत. ११३१ वेद शाखाओ के मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्- सभी अपौरुषेय है, इनसे भिन्न वेद की कोई स्थिति नही है । इन सभी के तात्पर्य का निर्धारण करने, परस्पर प्रतिभासित हो रहे विरोध का और अन्य प्रमाणो से प्राप्त विरोध का परिहार करने के लिए दोनो मीमासा शास्त्रो की प्रवृत्ति हुई है । पूर्व काण्ड के तात्पर्य का निर्धारण करने के लिए जैमिनिने पूर्व मीमासा शास्त्र की रचना की और उत्तर काण्ड के तात्पर्य का निर्धारण करने के लिये व्यास ने उत्तर मीमासा की रचना की । इन दोनो मीमासा सूत्रो मे श्रुति, वेद, आम्नाय प्रभृति के नाम से ब्राह्मण प्रभृति के वचन भी उद्धत है, क्योकि धर्म और ब्रह्म दोनो का उप-देश वेद ही करते हैं । यह कहना सत्य नही है कि 'इन दोनो मीमासाओ का लक्ष्य पूरा नही हुआ और इनके विषय विवादास्पद ही बने हुए है, क्योंकि धर्म और ब्रह्म विषयक निर्णय आज भी इन्ही के सहारे किये जाते हैं । यज्ञ के अनुष्ठान आज भी जैमिनि, कात्या-यन, शवर, भट्टपाद आदि की बनाई गई विधि से ही होता है । आर्यसमाजी केवल जल-वायु की शुद्धि में ही यज्ञ का विनियोग मानते हैं । वेद के एक मन्त्र का भी वे शुद्ध उच्चारण नही कर सकते । यज्ञों का अनुष्ठान भला वे क्या करेंगे । इसी प्रकार उत्तर मोमासा की पद्धति से आज भी हजारो अधिकारी श्रवण, मनन, और निदिध्यासन में लगे हुए है । द्वैव, द्वैताद्वैत, अद्वैत दृष्टि में भेद होते हुए भो यज्ञानुष्टान में जैमिनि, शवर स्वामी, भट्टपाद के मत को सब स्वीकार करते हैं । जैसे लौकिक संविधान की व्याख्या में मतभेद होते हुए भी वह निरर्थक नहीं माना जाता और सी के अनुसार अन्तिम निर्णय किया जाता है, उसी तरह से द्वैत आदि दृष्टियों के रूप में शास्त्र का अनन्त विस्तार होने पर भी मीमासा शास्त्र, निरर्थक नही हो जाता, अपितु उसी को आधार मानकर निर्णय किया जाता है औरलदनुरूप श्रवण, मनन, निदिध्यासन में प्रवृत्ति होती है । योगशास्त्र की भी भिन्न-भिन्न शाखाएँ मिलती है, किन्तु उसको निरर्थक नही मानो जाता । मीमासा के अधिकरणो की यही पद्धति है | यहाँ पहले विषय को उपस्थित कर उसके प्रति सन्देह प्रकट किया जाता है । बाद में पूर्वपक्ष को बडे आडम्बर के साथ उठा कर उसका समाधान किया जाता है और अन्त में सिद्धान्त पक्ष की स्थापना की जाती है । इस तरह से प्रत्येक विषय की यहाँ विशद व्याख्या प्रस्तुत हो जाती है । 'ब्रह्मा ने प्रजापति को, प्रजापति ने इन्द्र को, इन्द्र ने आदित्य को, आदित्य ने वसिष्ठ को, वसिष्ट ने पराशर को, पराशर ने कृष्ण द्वैयापन व्यास को और उन्होंने जैमिनि को मीमासा शास्त्र पढाया, ' महेश्वर अथवा ब्रह्मा ने प्रजापति को मीमासा खिखाई, ये सब कथन मीमासा की गुरु परम्परा को बताते है । जैसा कि भागवत में वर्णित है कि 'कपिल मुनि ने आसुरि को तत्त्वों के निर्णायक शास्त्र साख्यदर्शन का उपदेश किया ' | भागवत मे भागवत की परम्परा भी वर्णित है । आत्रेय, आश्मरथ्य प्रभृति वेदज्ञ महर्षियों का स्मरण अपने पक्ष को समर्थन देने के लिये किया जाता है । वेद में भी नूतन और पुरातन ऋषियों का वर्णन मिलता है । महाभाष्य प्रभृति में उल्लेख होने से काशकृत्स्नी मीमासा की विद्यमानता स्वीकृत है ।
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वेदार्थपारिजात ' १८३१ द्वयस्यारम्भ. । तत्र पूर्वकाण्डतात्पर्यनिर्धारणार्थं पूर्वमीमांसा जैमिनिना निर्मिता । उत्तरकाण्डतात्पर्यनिर्धारणार्थं मीमासा व्यासेन निर्मिता । अत एव मोमासासूत्रेषु तत्र तत्र श्रुतिवेदाम्नायादिनाम्ना वाह्मणादिवचनानि समुद्धृतानि दृश्यन्ते । धर्मंब्रह्मणोश्चोभयोरपि वेदमूलकत्वोक्तेः । यत्तु -'मीमासाद्वयस्य लक्ष्यं न पूर्ण मुभयोर्विवादग्रस्तत्वेनैवावस्थितत्वात्' इति, तदप्यसत्यम्, तदाधारेणैवाद्यापि धर्मब्रह्मनिर्णयदर्शनात् । जैमिनिकात्यायनशबरभट्टपादरीत्येवाद्यापि यज्ञानुष्ठानदर्शनात् । समाजिनस्तु केवलं जलवायुशुद्धिमेव कुर्वाणा दृश्यन्ते । वेदस्यैकमन्त्रमप्युच्चारयितुं न शक्नुवन्ति, तदर्थानुष्ठानं तु दूरापास्तम् । उत्तरमीमासारोत्यैव चाद्यापि सहस्रशोऽधिकारिण श्रवणमनननिदिध्यासन -परायणा दृश्यन्ते । द्वैताद्वैतादी मतभेदेऽपि यज्ञा- नुष्ठानेषु जैमिनिशबरभट्टपादादिमत प्रायेण सर्वेऽपि मन्यन्ते । यथा लौकिकसविधानस्यार्थनिरूपणावसरे न्यायवादिनां मत- भेदेऽपि न सविधान निरर्थकम्, तदनुसारेणैव न्यायनिर्णस्यदर्शनात्, तथैव द्वैताद्वैताद्यनुरोधेन शास्त्रार्थबाहुल्येऽपि न मीमासा- नैरर्थक्यम्, तदनुरोधेनाद्यापि मनननिदिध्यासनादिदर्शनात् । योगशास्त्रेऽपि व्याख्याबाहुल्यमस्त्येव, तथापि न तन्नैरर्थक्यम् । मीमासाधिकरणपद्ध तिरेवैषा यद् विषयविशयपूर्वपक्षोत्तरपक्षाक्षेपनिराकरणैरेव विषयवैशद्योपपादनं भवति । 'ब्रह्मा प्रजा- पतये मीमांसां प्रोवाच सोऽपोन्द्राय सोऽप्यादित्याय स च वशिष्ठाय सोऽपि पराशराय पराशरः कृष्णद्वैपायनाय सोऽपि जैमिनये', 'ब्रह्मा महेश्वरोवा मीमासां प्रजापतये प्रोवाच' इत्यादिभिस्तु मीमासागुरुपारम्पर्यस्यैव वर्णनम्, 'प्रोवाचासुरये साख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम्' ( भा ० पु ० १| ३ | १० ) इत्यादिवत् श्रीमद्भागवते श्रीमद्भागवतस्यापि पारम्पर्यं वर्णितम् । आत्रेयाश्मरथ्याद- यस्तु वेदविदो महर्षयः स्वपक्षदाययैव स्मर्यन्ते । वेदेऽपि नूतनपुरातनर्षीणां वर्णनं दृश्यत एव । काशकृत्स्नी मीमांसा तु महा- भाष्यादिसमर्थितत्वादङ्गीक्रियत एव ब्रह्म- महेश्वर-प्रजापतीन्द्रादित्य- वशिष्ठ-पराशरादिकालविभागनिर्धारणं तु प्रमाणाभास- मूलकमेव । भगवद्दत्तोदयवीरयुधिष्ठिरादय. समाजिनो विद्वासो दयानन्दमताभिनिविष्टाः । पक्षपातपूर्णत्वात् ते स्वमतविरुद्धं वेदप्रमाणमप्यन्यथयन्ति प्रक्षिप्तं वा वदन्ति । स्वमतविरुद्धमपि पुराणं ते स्वमतपोषकतया प्रमाणयन्ति उदाहरन्ति च । देवयुगर्षियुगमुनियुगाचार्यंयुगपण्डितयुगवर्णनमपि निर्मूलमेव । शतपथवर्णित मनोर्जलप्लावनवर्णनं यद्यैतिहासिकं तर्हि उर्वशी- पुरुरवसोः, यमयम्योश्च कुतो नैतिहासिकत्वम्? मन्त्रब्राह्मणयोरुभयोरपि वेदत्वस्य साधितत्वात् । शङ्कराचार्यादिभिस्तु याज्ञव- ल्क्यमैत्रेय्यादिसंवादस्यापि सुखावबोधार्थमाख्यायिकारूपत्वमेवोक्तम् । इतिहासपुराणानुसारेण तु मनोर्जलप्लवस्य मत्स्यावतार- कालिकत्वम् । मत्स्यावतारस्तु वामननृसिंहावतारेभ्योऽप्यतिप्राचीनचाक्षुषे मन्वन्तरे संवृत्तः, चाक्षुषोदधिसम्प्लवे' (भा० पु० ) इति श्रीमद्भागवतवचनात् । पुराणानुसारेण प्रचलितपञ्चाङ्गानुसारेण मनुस्मृत्यनुसारेण कलियुगीय एव कालः ४३२००० मानववर्षाणि भवति । न च पुराणानामप्रामाण्यमिति वाच्यम् 1। वायुपुराणाद्यनुसारेण भगवदत्तादिभिरपि तत्तत्कालनिर्धार- णात् । न चार्धजरतीयं युक्तम् । रामायणमीमांसायामेतद् विस्तरशः प्रपश्चितम् । ब्रह्मा, महेश्वर, प्रजापति, इन्द्र, आदित्य, वसिष्ठ, पराशर प्रभृति का कालनिर्णय गलत प्रमाणो के आधार पर ही किया जा सकता है । भगवद्दत्त, उदयवीर शास्त्री, युधिष्ठिर मीमासक प्रभृति विद्वान् दयानन्द मत के प्रति आग्रहशील है । पक्षपातपूर्ण विचार रखने के कारण ये अपने मत के विपरीत वेद के वचन को भी प्रक्षिप्त मान लेते है और अपने मत के पोषक पुराण के वचन को भी प्रमाण के रूप में उदाहृत करते हैं । देवयुग, ऋषियुग, मुनियुग, आचार्ययुग और पण्डितयुग की कल्पना भी उनकी निराधार है । शतपथ वर्णित मनु के जलप्लावन की कथा यदि ऐतिहासिक है, तो उर्वशी-पुरुरवा और यम यमी की कथा भी ऐतिहासिक क्यों नही होगी? शङ्कराचार्य प्रभृति ने तो याज्ञवल्क्य -मैत्रेयी प्रभृति के संवादो को भी विषय को समझाने के लिये प्रस्तुत की गई कहानी माना है । इतिहास-पुराण प्रभुति के अनुसार मनु के जलप्लावन की घटना मत्स्यावतार के समय घटी थी । यह अवतार वामन, नृसिंह प्रभृति अवतारो से भी प्राचीन है । चाक्षुष मन्वन्तर मे यह घटित हुआ था, ऐसा भागवत पुराण में बताया गया है ॥ पुराण, प्रचलित पञ्चाङ्ग और मनुस्मृति के अनुसार कलियुग का काल ही ४३२००० मानव वर्ष का होता है । पुराणो को अप्रामाणिक नही कहा जा सकता! वायुपुराण प्रभृति के आधार पर भगवद्दत्त प्रभृति विद्वानो ने अनेक विषयों का निर्णय किया है । अर्धजरतीय न्याय उचित नही है कि कुछ अंश को प्रमाण माना जाय और कुछ को अप्रमाण । इस विषय का हमने विस्तार से वर्णन रामायण मीमासा में किया है ।
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वेदार्थपारिजातः १८३२ यत्तु -' विक्रमादित्य कालमारभ्य पण्डितयुगवर्णनप्रसङ्गे पण्डितैरपि ज्ञान समूलं नाशयितुमुपक्रान्तम्, तत्र पण्डितानामहङ्कारस्यैव प्राधान्यमासीत् । विद्यामदेन एतैरार्षज्ञान निन्दितम् । तदानीन्तने. प्राचीनर्षिकल्पप्रामाणिकग्रथाना निन्दनेन स्वपाण्डित्यप्राधान्यं स्थापितम् इति, तदेतत्सर्वमुन्मत्तप्रलपितमेव, निर्मूलत्वात् । कि बहुना, त्वदभिमतं वेदेऽपि कर्मोपासनयोर्निन्दा दृश्यते, यथा -' अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रता. ॥ ' ( वा० सं ० ४० १२ ) इति । किमत्र वेदनिन्दैवास्ति । 'अनुदिते जुहोति प्रात. प्रातरनृतं ते वदन्ति, ये पुरोदयाज्जुह्वत्यग्नि- होत्रम्', ' उदिते जुहोति तद्यथा प्रद्रुतायातिथय आहार्यमाहरन्ति, तादृगेव', 'समयाध्युषिते जुहोति इत्यादिवेदवचनाना कि , ' ' वेदनिन्दायामेव तात्पर्यम् । न चेत्ते पण्डिता अपि न तथा निन्दाकर्तार नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितु प्रवर्तते इति न्यायात् । यत्तु —' यदि चरकमधीते तद् ध्रुवं सुश्रुतादिप्रणिगदितगदानां नाममात्रेऽपि बाह्य • । अथ चरकविहीन प्रक्रिया- यामखिन्नः किमिव खलु करोतु व्याधितानां वराकः ॥ अभिनिवेशवशादभियुज्यते सुभणितेऽपि न यो दृढमूलकः । पठतु यत्नपरः पुरुषायुषं स खलु वैद्यकमाद्यमनिर्विदः ॥ ऋषिप्रणीते प्रीतिश्चेद् मुक्त्वा चरकसुश्रुतौ । मेलाद्याः किं न पठ्यन्ते तस्माद् ग्राह्यं सुभाषितम् ॥ एभिर्वचनैरार्षग्रन्थस्य निन्दैव कृता इति, एवच्च महामोहविलसितं मौर्यमेव 1 तत्र वस्तुस्थिति- ' - - ' वर्णनतात्पर्यस्यैव प्राधान्यात् । यद्यद्यत्वे कश्चिद् वायुयान कम्प्यूटर हाइड्रोजनबम्ब आदिकलाविज्ञानप्रोत्साहनाद् भुशुण्डीनिर्माणविज्ञानादधिकमप्यध्येतव्यमिति वदेत्, तदापि न तन्निदाया तात्पर्यम्, किन्तु विशेषविज्ञानप्रोत्साहन एव तात्पर्यम् । तथैव ज्योतिर्विद्वराहमिहिरोऽपि परमास्तिक आर्षज्ञानसमर्थक एव 'मुनिरचितमिति यच्चिरन्तनं साधु न मनुजग्रथितम् । तुल्येऽर्थेऽक्षरभेदाद् अमन्त्रका विशेषोक्ति:' ( बृहत्संहिता, अ० १३ ) अत्रापि न तेन मुनयोऽवमानिताः अन्यथा मन्त्रमपि किमिति मनुजोक्त्या तुलयेत्? 'पुराणमित्येव न साधु सर्व न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् । सन्तः 'विक्रमादित्य के समय से पण्डितयुग प्रारम्भ हुआ । इस समय के पण्डितो ने भी प्राचीन ज्ञान का नाश कर दिया । इन पण्डितों मे अहंकार ही प्रधान था । विद्या के मद में आकर इन्होंने आर्षज्ञान की निन्दा की उस समय के विद्वानों ने प्राचीन ऋषिकल्प प्रामाणिक ग्रन्थों की निन्दा करने में ही अपनी पंडिताई लगा दी' इस तरह की बातें पागल का प्रलाप ही मानी जायगी । वेद मे भी कर्म और उपासना की निन्दा मिलती है कि 'अविद्या की उपासना करने वाले गहन अन्धकार में गिरते हैं और कर्मकाण्ड की उपासना करने वाले तो और भी गहरे अन्धकार में डूब जाते है ' । 'अनुदिते जुहोति, उदिते जुहोति, समयाध्युषिते जुहोति' ये श्रुति-वचन परस्पर एक दूसरे की निन्दा करते हैं । क्या इन सबका वेद की निन्दा मे तात्पर्य है? यदि ऐसा नही है, तो उस युग के पण्डितो की उक्तियों का समाधान भी इसी पद्धति से करना होगा । ऐसी निन्दा; निन्दा के लिये न होकर विधेय की स्तुति के लिये की जाती है । आपने 'यदि चरकमधीते ' आदि श्लोको को उद्धृत कर लिखा है कि इस तरह उस समय के प्रणीत ग्रन्थों के वचनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि उस पण्डितयुग के ग्रन्थकार ऋषिप्रणीत ग्रन्थो की निन्दा करने लगे थे, किन्तु यह आपका निरा भ्रम है । ऐसे वचनो का वस्तुस्थिति के वर्णन में ही तात्पर्य है । यदि आज कोई वैज्ञानिक यह कहे कि वायुयान, कम्प्यूटर और हाइड्रोजन बम के इस युग में बन्दूक बना लेने से काम नही चलेगा, तो उसका किसी की निन्दा मे तात्पर्य न होकर विज्ञान की नवीनतम प्रगति से परिचित होने में तात्पर्य माना जायगा, उसी तरह से आपके उद्धृत वचनों का तात्पर्य भी किसी की निन्दा मे न होकर नवीनतम ज्ञान से परिचित होने में ही है । प्रसिद्ध ज्योतिर्विद् वराहमिहिर भी परम आस्तिक और आर्षज्ञान का समर्थक ही था । ' मुनिरचित' श्लोक मे उसने मुनियों की उपेक्षा नहीं की हैं । यदि ऐसा होता तो उसने मनुष्य की उक्ति की अपेक्षा मन्त्र को विशिष्ट स्थान न दिया होता । ' पुराणमित्येव ' इस कवि कालिदास की उक्ति में भी आर्ष ग्रन्थों की निन्दा का कोई प्रसंग नही है । इसके विपरीत स्वयं स्वामी दयानन्द
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वेदार्थपारिजात १८३३ परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥ ' ( मालविकाग्निमित्र १ ) इत्यस्मिन् वचनेत्वार्षग्रन्थनिन्दालेशोऽपि नास्ति । स्वय दयानन्दस्तदीयाश्च सर्वे समाजिनो यानि ११३१ छन्दासि मन्त्रब्राह्मणानि पाणिनि- कात्यायन पतञ्जलीयानि वदन्ति, तानि शाखाब्राह्मणानि छन्दांसि वदन्ति, ऋष्युक्तानि वाक्यान्यनार्षाणि वदन्ति । रामायणभारतपुराणानि च यथेच्छमना- र्षाणि वदन्ति । किमत पराण्यपि पातकानि भवन्ति? आर्षाणि कात्यायनश्रौतसूत्रादीनि यानि शबरशङ्करकुमारिलादयः प्रमाणानि मन्यन्ते, तान्युपेक्ष्य यथेच्छ व्याख्यान्ति समाजिन: । तेपा कृते तु —' नवीनमित्येव न साधु सर्वं पुरातनं नैव भवेद- वद्यम् । सन्त परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढ परप्रत्ययनेयबुद्धि || ' इद वचनमपेक्षितम् । ते तु सर्वान् अष्टादशपुराणान्युष- पुराणानि तन्त्राण्यागमाश्च उपेक्षन्ते । स्वार्थसिद्धयर्थं निर्लज्जतया तान्येवाश्रयन्ते । दयानन्दः शाबरभाष्यस्य प्रामाण्य- मूरीचकार, तथापि साम्प्रत तदप्युपेक्षन्ते । कुमारिलभट्ट- प्रभाकर शङ्कर- सायण रामानुजमवनिर्बादीन् प्राचीना-, चार्यानुपेक्षन्ते तथा तद्वेपरीत्येन चौर आरक्षिप्रवरानिव भत्संयति युधिष्ठिरो मीमासक । मानसिकपरतन्त्रताये खिद्यमानोऽपि स्वयमेव तामङ्गीकरोति । सर्वथापि पाश्चात्त्यानेवायमनुसरति । मन्त्राणा ब्राह्मणानामुपनिषदामवेदत्वसाधनाय प्रयतते । यदा ते तादृशीभिरेव युक्तिभिर्ऋग्वेदस्य दशममण्डलादिकमाधुनिकं प्रतिपादयन्ति. तदा यत्किचित् प्रलपति । 'भारतवर्ष का इतिहास ' ' वैदिक वाड्मय का इतिहास ', ( भगवद्दत्त ), 'वेदान्त दर्शन का इतिहास ' (उदयवोर शास्त्री ), 'साख्यदर्शन का इतिहास' (उदयवीरशास्त्री ), ' संस्कृत व्याकरण का इतिहास', (युधिष्ठिरमीमांसक ) 'आयुर्वेद का इतिहास' ( श्रीवेद्य सूरमचन्द कविराज ) सर्वे चैते लेखकाः समाजिनः समाजपक्षपातिनः सनातनधर्मविद्वेषिणश्च । नैतेषा ग्रन्थानां प्रामाण्यमिति समाजिमतखण्डनप्रसङ्गे मया तत्र तत्र प्रसङ्गानुसारमुल्लिखितम् । युधिष्ठिरस्य मते ब्रह्मा सर्वथा अप्रामाणिकः । नहि तद्रीत्या सृष्टिकर्ता ब्रह्मा नारायणस्य नाभिपद्मादाविर्भूतः, किन्तु कश्चित्तत्कल्पितो निर्मूलो मनुष्यः, अग्निवाय्वादित्यादि- और उनके सभी अनुयायी मन्त्र और ब्राह्मणभाग को पाणिनि, कात्यायन और पतंजलि जैसे ऋषियो की कृति मानते हैं । शाखाओ और ब्राह्मणो को छन्द मानते हैं और ऋषि प्रोक्त वाक्यो को अनार्ष बताते हैं । रामायण, महाभारत, पुराण प्रभृति को अप्रामाणिक कहते है | इससे बढकर क्या पाप होगा? कात्यायन श्रौतसूत्र प्रभृति आर्ष ग्रन्थो को, शङ्कर, कुमारिल प्रभृति आचार्य प्रामाणिक मानते हैं और आप लोग उनकी उपेक्षा कर वेदो की मनमानी व्याख्या करते हैं । ऐसे लोगो के लिये भी कालिदास के पद्य को परिवर्तित कर ' नवीनमित्येव न साधु सर्वम्' ऐसा पाठ स्वीकार करना चाहिये । ये लोग सभी पुराण, उपपुराण, तन्त्र और आगम ग्रन्थो की उपेक्षा करते है और आवश्यकता पडने पर अपना प्रयोजन सिद्ध करने के लिये उन्ही को प्रमाण के रूप में भी उद्धृत करते है । दयानन्द ने शाबर भाष्य को प्रामाणिक ग्रन्थ माना है | किन्तु आप जैसे अनुयायी उनकी बात को भी स्वीकार नही करते । कुमारिल भट्ट, प्रभाकर, शंकर, सायण, रामानुज, मध्व, निम्बार्क प्रभृति प्राचीन आचार्यों की उपेक्षा की जाती है । 'उल्टा चोर 1 कोतवाल को डाटे' वाली कहावत मीमासक जी ने चरितार्थ कर दी है । मानसिक परतन्त्रता पर वे खेद प्रकट करते हैं, किन्तु1 स्वयं अपने आप उससे आक्रान्त हो गये है । उनका इस प्रकार का कथन पाश्चात्य विद्वानो का अनुकरण मात्र है । जैसे ये * महाशय ब्राह्मण, उपनिषद् आदि ग्रन्थो को वेद नही मानते, उसी तरह इनकी जैसी ही युक्तियो से जब पाश्चात्य विद्वान् ऋग्वेद के दशम मण्डल को आधुनिक बताते है, तो ये मनमाना प्रलाप करने लगते है । भारतवर्ष का इतिहास ( भगवद्दत्त ), वैदिक वाड्मय का इतिहास ( भगवद्दत्त ), वेदान्तदर्शन का इतिहास ( उदयवीर शास्त्री ), सांख्यदर्शन का इतिहास ( उदयवीर शास्त्री ), संस्कृत व्याकरण का इतिहास ( युधिष्ठिर मीमासक ), आयुर्वेद का इतिहास ( श्रीवैद्य सूरमचन्द कविराज ) प्रभृति ग्रन्थो के लेखक आर्यसमाज के अनुयायी और सनातन धर्म के विद्वेषी हैं । उनके इन ग्रन्थो को प्रामाणिक नही माना जा सकता, इस बात का उल्लेख पहले भी यत्रतत्र हो चुका है । युधिष्ठिर मीमांसक के मत में ब्रह्मा एक कल्पित मानव है । इनके मत के अनुसार वह नारायण के नाभिकमल से उत्पन्न ब्रह्मा नही हैं । इसी तरह से अग्नि, वायु, आदित्य भी मनुष्य ही है । महेश्वर भी सर्वसंहारक महारुद्र न होकर एक कल्पित मनुष्य है । प्रजापति भी पुराणो में प्रतिपादित दस प्रजापतियो से भिन्न कोई २३०
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वेदार्थपारिजात । १८३४ मनुष्यवत् । महेश्वरोऽपि न सर्वसहारको महारुद्रः, किन्तु तत्कल्पितो मनुष्य एव । प्रजापतिरपि न दशसु प्रजापतिषु पुराणादिप्रतिपादितेष्वन्यतमः । इन्द्रोऽपि न देवराज, किन्तु कश्चिदन्य एव । प्रजापतिबृहस्पति-अश्विनीकुमार मृत्यु- यम-कोशिकादीना पुराणादिप्रतिपादितानामुल्लेखं करोति निर्लज्जतया तत्प्रामाण्यं तु नाभ्युपगच्छति । तथैवादिवसिष्ठ-पराशरादिसम्बन्धी सर्वोऽपि विचारो भ्रान्तिग्रस्तो निराधारो ग्रामकश्च । आस्तिकाना दृष्ट्या तु ब्रह्मादयो देवा, वशिष्ठाद-यश्च ऋषयः, तत्सम्बन्धिन, कालाश्चातिप्राचीनाः । समाजिनो रामायणादिष्वार्षग्रन्थेषु ब्राह्मणग्रन्थेषु च निःशङ्क प्रक्षिप्त-त्वमप्रामाणिकत्व चारोपयन्ति । स्वार्थसिद्धयेऽयं युधिष्ठिरः -' सिहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत् प्राणान् प्रियान् पाणिनेर्मीमासा-कृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनि जैमिनिम् । छन्दोज्ञाननिधि जघान मकरोद् बेलातटे पिङ्गलम् अज्ञानावृतचेतसामतिरुषा कोऽर्थस्तिरश्चा गुणै. ॥ ' इति पञ्चतन्त्रीयश्लोकस्यापि प्रामाण्यमूरीकरोति । पूर्वमनेन प्रपञ्चहृदयकाररीत्या वेदान्तदेशिक-रीत्या च मीमासाशास्त्रस्य विशत्यध्यायात्मकत्व तत्र बोधायनकर्तृकभाष्यसत्त्वं चोक्तम्, किन्तु २४-२५ पृष्ठयो ' उपवर्षो .' ( ) ':हलभूति कृतकोटिरयाचित त्रिका० शे ० इति त्रिकाण्डशेषकाररीत्या हलभूतिस्तूपवर्ष कृतकोटि कविश्व स " ( वैजयन्ती भूमिकाण्ड १५१४ ) इति वैजयन्तीकाररीत्या प्रमाणैः सिद्धस्यापि बोधायनरचितस्य कृतकोटिसज्ञकभाष्यस्य सन्दिग्धत्वमुक्तम् । अन्ततो गत्वा वोधायनस्य भाष्यकारत्वमपि सन्दिग्धमित्युक्तम्, प्रपञ्चहृदय काररामानुजाभ्यामेव बोधायन-नाम्नः स्मृतत्वात् । वेदान्तदेशिकस्तु बोधायनमुपवर्षं चैकमेव मन्यते । अन्यत्र वृत्तिका रोपवर्षस्य नामनिर्देशपूर्वकं मत शाबर- भाष्ये शाङ्करभाष्ये चोद्धृतम् । वेदान्तदेशिकस्तु अस्या एव समस्यायाः समाधानाय वृत्तिकारस्य बोधायनस्यैव उपवर्ष इति स्यान्नामेति तयोरेकत्वाभ्युपगमायोत्सूचितवान् । पश्चादयं युधिष्ठिरो मीमांसक. स्वमतं वदन्नाह -' मम विचारे तु बोधायनस्य निर्देशको रामानुजः प्रपञ्चहृदयकारश्च वैष्णवग्रन्थकारी । प्रपञ्चहृदयकारेण शाङ्करभाष्यस्यासङ्केतितत्वात् तस्य स्वमताग्रहो द्योत्यते' इति । एकत्र २ ९ पृष्ठे वैष्णवत्वात् प्रपञ्चहृदयकार रामानुजाचार्ययोस्ताभ्यामुक्तस्य बौधायनभाष्यस्य सत्त्वमेवापल-पति । अन्यत्र तु सत्यार्थप्रकाशे दयानन्देनोल्लिखितत्वाद् व्यासमुनिकृतस्य मीमांसाभाष्यस्य सत्त्वं नाशङ्कितं तेन 1। कोऽत्र मनुष्य ही है । इन्द्र भी देवराज न होकर कोई मानव ही है । पुराणो में प्रतिपादित प्रजापति बृहस्पति, अश्विनीकुमार, मृत्यु, यम, कौशिक प्रभृति का ये उल्लेख तो करते है, किन्तु निर्लज्जतापूर्वक इनका प्रामाण्य अस्वीकार कर देते हैं । इसी तरह से इनका आदि-वसिष्ठ, पराशर सम्बन्धी सारा विचार भी भ्रामक और निराधार है । आस्तिको की दृष्टि से ब्रह्मा प्रभृति देव हैं और वसिष्ठ प्रभुति ऋषि हैं । इनका समय अतिप्राचीन है । समाजी रामायण प्रभृति में और ब्राह्मण ग्रन्थो में बिना हिचक मनमाना प्रक्षेप मानते है । अपना मतलब निकालने के लिये युधिष्ठिर मीमांसक ' सिंहो व्याकरणस्य' प्रभृति पंचतन्त्र के श्लोक को भी प्रमाण मानने लगते है । हमने इस प्रकरण के प्रारम्भ में बताया है कि इन्होने इसी तरह की प्रकृति का सहारा लेकर प्रपंचहृदय प्रभृति ग्रन्थो के आधार पर मीमासाशास्त्र के बीस अध्यायो की ओर बोधायनकृत भाष्य की सत्ता स्वीकार की है और आगे चलकर ( पृ० २४-२५ ) त्रिकाण्डशेष और वैजयन्तीकोश के आधार पर बोघायनकृत कृतकोटि भाष्य के विषय में सन्देह प्रकट करते है । अन्ततः इनका कहना है कि बोधायन कोई भाष्यकार थे । यह बात भी सदिग्ध है, क्योकि केवल प्रपञ्चहृदयकार और रामानुज ने ही इनको चर्चा को है । बेदान्तदेशिक बोधायन और उपवर्ष को एक ही व्यक्ति मानते हैं । शाबरभाष्य, शाकरभाष्य प्रभृति में वृत्तिकार उपवर्ष का स्पष्ट उल्लेख है, बोधायन का नही । वेदान्तदेशिक इस समस्या का समाधान वृत्तिकार बोधायन ही उपवर्ष है, ऐसा कह कर करते हैं । इस विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए सीमासक जी कहते हैं कि बोघायन का उल्लेख करने वाले रामानुज और प्रपञ्चहृदयकार ये दोनो वैष्णव लेखक है । प्रपञ्चहृदयकार ने शाकरभाष्य का उल्लेख नही किया, इससे उनका अपने मत के प्रति आग्रह स्पष्ट होता है । 1 एक ओर तो ये ( पृ० २ ९ ) वैष्णव होने के आधार पर प्रपञ्चहृदयकार और रामानुज के द्वारा स्मृत बोधायनभाष्य की सता को ही अस्वीकार करते हैं, दूसरी तरफ सत्यार्थप्रकाश में दयानन्द द्वारा उल्लिखित व्यास मुनिकृत मीमासाभाष्य की सत्ता को
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वेदार्थपारिजातः १८३५ हेतुरिति? सत्यमेव भट्टपादेनोत म्— ' प्रायेणैव हि मीमासा लोके लोकायतीकृता । नामास्तिकपथे कर्तुमय यत्न कृतो मया ॥ ' ( श्लो० वा० उपोद्घात १० ) । आधुनिकैरपि दयानन्देन तदीयैश्च मीमासा सर्वे वेदाश्च लोकायतीकृता । अर्थाद् व्याख्यया नास्तिकशास्त्रत्वमेव तेषामापादितम्, सर्वत्र लौकिकार्थं ( जलवायुशुद्धयर्थं होमादि ) प्रतिपादकत्वात् । पार्थसारथिमिश्राश्च तत्रैव व्याख्यान्ति यत्- 'भर्तृमित्रादिभिरलोकायितापि सती लोकायतीकृता । नित्यनिषिद्धयोरिष्टानिष्टफल नास्तीत्यादि --- ' I – ' बह्वपसिद्धान्तपरिग्रहेणेति उम्बेकाचार्याश्च वेदार्थग्रहण विस्मरणार्थमपि तत्तद्भर्तृमित्रविरचिनतत्त्वशुद्धयादि- लक्षणप्रकरणमस्त्येवेति गतार्थमिदं वाक्यमत आह- सैवमात्मिका अलोकायता एव सती बाहुल्येन लोकायतीकृता सत्स्मृतिसदाचाराणा विना कारणेन धर्मत्वनिराकरणात् विधिनिषेधयोरिष्टानिष्टफलानभ्युपगमात् । दयानन्दस्तदीयाश्च सर्वेऽपि भट्टपादीयश्लोकस्य लक्ष्यभूता एव तेषामपि भर्तृमित्रादिभ्योऽप्यधिक मीमामाया लोकायतीकरणे प्रयासदर्शनात् । अत्र युधिष्ठिरो मीमासकः कथयति यत्- उक्तमत मबुद्धो नायाति । कश्चिदपि वेदमतानुयायी नैतादृशो भवति य. सत्स्मृति सदाचार च धर्माद् बाह्य कुर्यात्, विधिनिषेधयोश्चेष्टानिष्टफलं न स्वीकुर्यात् । तेन भर्तृमित्रस्य कश्चिदन्य एव गूढाभिप्रायो भविष्यती' ति । वस्तुतस्तु त्वमपि मीमासको वेदमतानुयायी च । त्वमपि तथैवाभ्युपगच्छसि । यद् वक्ष्यते तन्न भर्तृमित्रमतम्, किन्तु तवैव मतम् । स्वमतमेव तद्व्याजेन वर्णयसि- बद्यत्वेऽपि स्मृतिवचनानां भ्रमेण धर्माभिनेतारः ' अष्टवर्षा भवेद्गौरी' इत्यादीना प्रामाण्यमभ्युपगम्य कन्यानामल्पवयस्काना विवाहपक्षं पोषयन्ति तथा स्त्रीशूद्रो नाधीयाता- मित्यस्य प्रामाण्यमुपेत्य स्त्रीशूद्राणा वेदाध्ययनाधिकारं वारयन्ति, तथैव सदाचारनाम्ना प्रचलितानां रूढीनां परिपालनाया-ग्रहग्रहिला मवन्ति, यथा स्ववर्णमात्र एव परस्परं भोजने, पारिबर्ह ( दहेज ) दानादानादिके इत्यादिकर्मणाम् । विधिनिषेध- स्थितिरपि तादृश्येव । प्रत्येकयज्ञीर्यावधिनिषेधाश्रयेण पुण्यपापभावनाप्रोत्साहनमप्यनुचितम् यथा यज्ञेऽमुकं पात्रममुकस्थाने रक्षणीयम्, तथैवादृष्टमुत्पत्स्यते, अन्यस्थाने रक्षणेन पाप भविष्यति ' इत्यादिस्वीकरण व्यर्थमेवेति युधिष्ठिरेण स्वान्तर्गतो निःसंकोच स्वीकार करते हैं । इसमें क्या कारण हैं? भट्टपाद कुलारिल का यह कहना ठीक ही है कि मीमासाशास्त्र को अन्य विद्वान ने चार्वाक मत का पृष्ठपोषक बना दिया था । उसको आस्तिक मार्ग पर ले आने के लिये मेरा यह प्रयत्न है । आजकल भी स्वामी दयानन्द और उनके अनुयायिको का प्रयत्न वेद और मीमासा को चार्वाक मत की ओर घसीट ले जाने का है । ये सर्वत्र यज्ञ का फल लौकिक जल-वायु की शुद्धि हो मानते है । पार्थसारथी ने भट्टपाद के उक्त श्लोक की व्याख्या करते हुए लिखा है कि भर्तृमित्र प्रभृति ने नित्य और निषिद्ध कर्मों का इष्टकर और अनिष्टकर फल नही होता जैसी बातो का प्रतिपादन कर मीमासा को चार्वाक मत के पास लाकर खड़ा कर दिया । इसी श्लोक की व्याख्या में उम्बेक मिश्र का कहना है कि भर्तृमित्र प्रभृति ने तस्वशुद्धि प्रभृति ग्रन्थो की रचना करके अनेक स्मृतियों और सदाचार को धर्म के प्रति प्रमाण नही माना है और विधि-निषेध का इष्टानिष्ट फल भी नही माना है | इस तरह से इन्होने वेदानुवर्ती मीमासाशास्त्र को भी चार्वाक मत का अनुयायी बना दिया है । दयानन्द प्रभृति के प्रति भी भट्टपाद की यह उक्ति सटीक जमती है । भर्तृमित्र प्रभृति से भी ये लोग दो हाथ आगे बढ़ गये हैं ॥ युधिष्ठिर मीमासक का इस पर कहना है कि यह बात हमारी समझ में नही आती कि भला कोई वेदमतानुयायी स्मृति और सदाचार को धर्मवाह्य क्यो मानेगा और विधि-निषेध का इष्टानिष्ट फल क्यों नही मानेगा? भर्तृमित्र का इसमें अवश्य कोई गूढ़ अभिप्राय होना चाहिये । इस पर हमारा इतना ही कहना है कि आप भी मीमासक हैं और वैदिक मत के अनुयायी है । आप भी उन्ही का अनुसरण करना चाहते है । उनका नाम लेकर जो कुछ आप कहना चाहते हैं, वह उनका न होकर आप का ही मत है । आप कहते है कि आज भी ' अष्टवर्षा ' प्रभृति श्लोकों को स्मृति वचन मानकर कम वय की कन्याओ के विवाह की बात पुष्ट की जाती है तथा ' स्त्री शूद्रो' प्रभृति वचनो के आधार पर स्त्री और शूद्र का वेदाध्ययन का अधिकार नही माना जाता । इसी तरह से सदाचार के नाम पर प्रचलित रूढियों का कड़ाई से पालन करते हुए खान-पान, विवाह आदि अपनी- अपनी जातियों में ही किये जाते हैं । विधि-निषेध की स्थिति भी वैसी ही है । यज्ञ में अमुक पात्र अमुक स्थान पर ही रखना चाहिये, अन्यथा करने से फल नही मिलता । इस तरह के विधिनिषेध स्वीकार करने योग्य नही है । भर्तमित्र के नाम पर प्रकट किये ये सब विचार उनके न होकर आपके ही हैं ।
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वेदार्थपारिजातः १८३६ भावोऽभिव्यञ्जितो भर्तृमित्रादीनां नाम्ना । आधुनिकाना समाजिना पूर्वत एव तथा भूतं व्यापारमभिलक्ष्य भट्टपादेनोक्तम् - 'मीमांसा लोके लोकायतीकृता' । दयानन्दादिभिस्तु वेदोऽपि लोकायतीकृतः । येषा रीत्या ब्राह्मणगतानामपि विधिनिषेधाना- मीदृशी गतिस्तेषां कृते स्मार्तानां विधिनिषेधानां कीदृशी स्यात्? अत एवास्तिकानां कालिदासप्रभृतिपण्डितानामार्षग्रन्थ- निन्दकत्वं वदन्तय युधिष्ठिरो मीमासको नजिह्रेति, स्वय तु असख्याताना मन्त्राणा ब्राह्मणानामारण्यकानामुपनिषदां च वेदत्व-मपलपति । विधिनिषेधाभ्यामेव धर्माधर्मयोः पुण्यपापयोर्वा ज्ञान भवति, कथमन्यथा स्वदुहितृभगिन्यादिभिरपि विवाहो न स्यात्? यत्तु — ' मीमासाशास्त्र न्यायशास्त्रं च न्याय्यकर्मण एव पुष्टि करोति, नान्याम्यस्य' इति, तदपि तुच्छम्, अननुसन्धायार्थं न्यायशब्दप्रयोगात् । तथाहि न्यायशब्दस्य कोऽर्थ:? न युक्तिः, तस्याः प्रमाणोपकारकत्वेऽपि स्वयमप्रमाण-त्वात् प्रमाणेष्वपरिगणितत्वाच्च । नाप्यनुमानम्, अनुमानगम्यस्यैव न्याय्यत्वे आगमप्रमाणस्य नैरर्थक्यात् । स्वविषयशूराणि हि प्रमाणानि । नागमगम्ये प्रत्यक्षानुमानादीना सङ्क्रमणम्, अनधिगतगन्तृत्वेनैव प्रमाणाना प्रमाण्यात् । यथा शब्दे, रसे, स्पर्शे वा न चक्षुषः प्रवृत्तिः न चाष्टवर्षा भवेद्गौरोत्यस्याप्रामाण्यम् चक्षुरादीनामिव शब्दानामपि प्रामाण्यस्वतस्त्वाङ्गी-कारात् । न च पौरुषेयत्वे पुरुषाश्रितभ्रमप्रमादादिसम्भवेन सन्दिग्धमेव प्रामाण्यमिति चेत्तथात्वे त्वद्रीत्या संहिताचतुष्टयेतर- - - - संहितामन्त्राणा ब्राह्मणानामपि पौरुषेयत्वेन तथात्वापातात् । कठादिपुरुष सम्बन्धवत् शाकली कौथुमी माध्यन्दिनी-शौनकीषु सहितासु त्वदीयवेदत्वेनाभिमतास्वपि शाकल्यादि पुरुषसम्बन्धेन पौरुषेयत्वापत्त्या तासामप्यप्रामाण्यापत्तेः । किञ्चा प्रामाण्य कारण विषयबाधकारणदोषज्ञानेनैवाप्रामाण्य सम्भवति, न पौरुषेयत्वमात्रेण । तथात्वे सत्यार्थप्रकाशादीनामनायासे -नैवाप्रामाण्यसिद्ध्यापत्तेः । ' अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा तु रोहिणी ' इत्यत्र तु 'सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः । तृतीयोऽग्निस्ते पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः ॥ ' ( ऋ ० सं० १० ८५/४० ) इति ऋग्वेदसंहितामन्त्रो मूलम् । 'सोमोऽददद्गन्धर्वाय भर्तृमित्र ने केवल मीमासा को ही चार्वाक दर्शन की ओर खीचा था, किन्तु स्वामी दयानन्द ने तो वेद और शास्त्र दोनो को ही लोकायत का अनुचर बना दिया है । जिनकी दृष्टि में ब्राह्मण वचनों की यह गति है, वे स्मृति वचनो का भला क्या आदर करेंगे । इस पर भी तुक्का यह है कि ये महाशय कालिदास जैसे आस्तिक महाकवि को आर्ष ग्रन्थो का निन्दक मानते है और स्वयं असंख्य मन्त्री, ब्राह्मण और आरण्यक ग्रन्थों को वेद नही मानते । विधि-निषेध के सहारे ही धर्म और अधर्म का, पाप और पुण्य का ज्ञान होता है । इनको अस्वीकार कर देने पर अपनी पुत्री और बहिन के साथ भी विवाह कर लेने में क्या आपत्ति रह जायगी? ' मीमासाशास्त्र और न्यायशास्त्र न्याय्यकर्म की ही पुष्टि करते हैं, अन्याय्य कर्म की नही ' यह कथन भी न्याय शब्द का ठीक से अर्थ न समझ पाने के कारण है । न्याय शब्द का अर्थ 'युक्ति' इसलिये नहीं किया जा सकता कि वह प्रमाणो मे परिगृहीत नही है । वह सहायक मात्र बनती है उसको अनुमान भी नही कह सकते, क्योकि अनुमानगम्य ही यदि न्याय्य है, तो उस स्थिति में पूरा आगम प्रमाण व्यर्थ हो जायगा । प्रत्येक प्रमाण अपने अपने विषय का प्रतिपादन करने मे अन्य की अपेक्षा प्रबल होता है | आगम प्रमाण से परिगृहीत होने वाले विषयों में प्रत्यक्ष और अनुमान की प्रवृत्ति नही हो सकती । अनधिगत वस्तु का अधिगम कराना ही प्रमाणो का प्रयोजन है । जैसे शब्द, रस, स्पर्श अथवा गन्ध के ग्रहण में चक्षु इन्द्रिय की प्रवृत्ति नहीं होती, उसी तरह से 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी' प्रभृति शास्त्र विषय में भी प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाण की प्रवृत्ति नही हो सकती । स्मृति वचनो का पौरुषेयता के आधार पर अप्रामाण्य मानने पर तो आपके मत के अनुसार चार शाखाओं से भिन्न अन्य सभी शाखाओ का और ब्राह्मण प्रभृति ग्रन्थो को भी इसी आधार पर अप्रामाण माना जाने लगेगा । इतना ही नहीं, कठ प्रभूति का सम्बन्ध होने के कारण इन शाखाओ को जैसे आप वेद नहीं मानते, उसी आधार पर शाकली, कौथुमी, माध्यन्दिनी और धौतुकी संहिताओं के साथ भी व्यक्ति का नाम जुडा होने से ये आपके मूल वेद भी पौरुषेय अतएव अप्रमाण माने जाने लगेंगे । विषयबाध करणापाटव प्रभृति के कारण ही अप्रामाण्य का बोध होता है, केवल पौरुषेयत्व मात्र से नही । ऐसा मानने पर तो सत्यार्थप्रकाश प्रभृति ग्रन्थों की भी अनायास अप्रामाणिकता सिद्ध हो जायगी, क्योकि स्वामी दयानन्द भी तो पुरुष ही थे । ' अष्टवर्षा' प्रभूति स्मृति वचनों की पुष्टि 'सोमः प्रथमो विविदे ' प्रभृति वेद मन्त्रों से होती है ।
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वेदार्थपारिजात' १८३७ गन्धर्वो दददग्नये । रयिञ्च पुत्राश्चादाद् अग्निर्मह्यमथो इमाम् ॥ ' ( ऋ० सं ० १० ८५/४१ ), 'सोमो गौरी अधिश्रित " ( ऋ ० ० ९।१२।३ ) इति मन्त्रैरष्टवर्षाया कन्याया सोमाधिकारः सिद्धयति, नववर्षाया रोहिण्यां गन्धर्वाधिकारः, दशमवर्षमारभ्य तस्यामग्नेरधिकारः । अग्निरेव मनुष्याधिकारे कन्या ददाति, विवाहस्याग्निमाक्षिकत्वोक्ते । मन्त्रे दयानन्दादिकृतं कुचोद्यं तु भूमिकाया खण्डितमेव । किञ्च – ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणामौपनायनिकः स्मृत.' ( म० २२६७ ) इति मनुरीत्या विवाह एव स्त्रीणामुप- नयनस्थानापन्नः । उपनयन च ' गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत' ( म० २।३६ ) इति मनुरीत्या अष्टमाब्दे कार्य । तेनापि कुमारीणां स एव विवाहकाल. । सस्कारस्थानीयोऽय विवाह । तत एव ऋतुकालात् पूर्वमेव कन्योद्वाहः सर्वैरपि महर्षिभिर्विहितः । मनुरपि 3 तथैवाह - ' त्रिशद्वर्षो वहेत् कन्या हृद्या द्वादशवार्षिकीम् । त्र्यष्टवर्षोऽष्टवर्षा वा ' (म० ९१ ९४ ) इति । स्त्रीशूद्राणा वेदाध्ययन- निषेधोऽपि युक्त एव तेषामुपनयनविधानाऽभावात् । ' बसन्ते ब्राह्मणं ग्रीष्मे राजन्य शरदि वैश्यम्' इतिवत् शूद्रस्योपनयनविधान न दृश्यते । उपनयनविधानं चाङ्ग वेदाध्ययनस्य । न च स्त्रीणामुपनयनविधानम्, तथाऽदर्शनात् । नाप्यष्टवर्षंब्राह्मणमुपनयीतेति स्त्रीणा ग्रहणम्, तत्र पुंल्लिङ्ग पदानामेव ब्राह्मण क्षत्रिय-वैश्याना दर्शनात् । न च यथेमां वाच कल्याणी मावदानि जनेभ्य । ब्रह्मराजन्याभ्यां ' शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च' ( वा० स० २६ २ ) इत्यत्र शूद्रादीनां सर्वेषामेव वेदाध्ययन- T , ' ' ( ) ' मुक्तम् पञ्चजना ममहोत्रे ऋ ० सं ० १० ५३।४ अत्र च पञ्चजनाना यज्ञसेवनमुक्तम् । चत्वारो वर्णाः पञ्चमो निषादः' ( नि० ३८ ) इत्यत्र अन्त्यजान्ताना ब्राह्मणादीना पञ्चजनत्वोक्ते:, 'न कर्म लिप्यते नरे' ( वा सं० ४०/२ ) , इति नरमात्रस्य कर्मविधान दृश्यत इति वाच्यम् यथेमा वाचमिति मन्त्रार्थानवबोधात् । अत्रेश्वरस्य ऋषित्वाभावेन देवतात्वेन मन्त्रवाच्यत्वात् परमेश्वरस्य वक्तृत्वासिद्धेः । न चेश्वरस्यैव कुतो न वक्तृत्वमिति वाच्यम्, 'तदस्मासु द्रविणं ' ( ) धेहि चित्रम् वा ० सं ० २६/३ इति प्रार्थनाया ईश्वरेऽनुपपत्ते । यथेमामिति कण्डिकायामेवान्ते प्रियो देवाना दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयं मे काम • समृद्ध्यतामिति प्रार्थनायाश्च पूर्णकामे परमेश्वरेऽसत्त्वात् । तस्मादीश्वर उपदिशति-इमा वेदवाणी सर्वेभ्यो यथाह वदानि तथैव यूयमपि वदतेत्यादिमन्त्रार्थंकल्पन मूर्खजनप्रतारणमेव । इमां वाच- ' सोमोऽददद्गन्धर्वाय', ' सोमो गौरी अधिश्चित ' प्रभृति मन्त्रो से आठ वर्ष की कन्या पर सोम का अधिकार सिद्ध होता है, नौ वर्ष की कन्या रोहिणी पर गन्धर्व का, दस वर्ष की कन्या पर अग्नि का अधिकार हो जाता है । यह अग्नि ही कन्या को मनुष्य के अधिकार मे सौंपता है, क्योकि विवाह अग्नि की साक्षी में ही होता है । इस प्रसग में दयानन्द प्रभुति के उठाये कुतर्कों का खण्डन भूमिका के प्रथम भाग में ही किया जा चुका है । 'वैवाहिको विधि ' प्रभृति मनुवचन के अनुसार स्त्रियो के विवाह संस्कार में ही उपनयन संस्कार का भी समावेश है । मनुवचन के ही आधार पर उपनयन संस्कार आठवें वर्ष में किया जाता है । इससे कुमारी के विवाह का भी यही काल उचित है । यह विवाह संस्कार उपनयन संस्कार के स्थान पर किया जाता है । सभी ऋषियों ने ऋतुकाल से पहले ही कन्या के विवाह का विधान किया है । मनु ने भी ऐसा ही कहा है । स्त्री-शूद्रों के वेदाध्ययन का निषेघ भी उचित है । उनको उपनयन का अधिकार नहीं प्राप्त है । उपनयन के बाद ही वेदाध्ययन का अधिकार प्राप्त होता है । स्त्री और शूद्र का उपनयन संस्कार नही किया जाता, अतः उनको वेदाध्ययन का अधिकार भी नही प्राप्त होता । पुल्लिंग पदो का ही उल्लेख होने से स्त्री का उपनयन संस्कार विहित नही है । ' यथेमा वाचं' इस मन्त्र से शूद्र प्रभृति सभी वर्णों के वेदाध्ययन को, 'पञ्चजना' प्रभृति से सभी वर्षों के यज्ञ में अधिकार को और 'न कर्म लिप्यते नरे' प्रभृति से मनुष्य मात्र के कर्मविधि में अधिकार को सिद्ध करना मात्र अपने अज्ञान को उजागर करना है । प्रथम मन्त्र का परमात्मा ऋषि न होकर देवता है, अतः परमेश्वर इस मन्त्र के वक्ता नही हो सकते । 'तदस्मासु द्रविणं धेहि' इस प्रकार की प्रार्थना ईश्वर नही कर सकते । उक्त कण्डिका के ही अन्त मे अपनी कामना की समृद्धि का उल्लेख है । पूर्ण काम परमेश्वर इस तरह की प्रार्थना क्यो करेगा? इसलिये 'इस मन्त्र में ईश्वर उपदेश करता है कि इस वेदवाणी को जैसे मैं तुमको दे रहा हूँ, उसी तरह से तुम भी इसको अपने शिष्यो को देना' इस तरह का अर्थ करना केवल घोखा मात्र है । इस मन्त्र में ' वेद' पद आया हो नही है । वास्तव t } 1
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वेदार्थपारिजातः १८३८ मित्यत्र च वेदपदाभावात् । किन्तु यजमान एवात्र वक्ता । स सर्वाभ्य स्त्रीभ्य उपदिशति - यथाहं ब्राह्मणादिभ्य आगम्यता, भुज्यता, धनानि गृह्यन्ता, विश्रम्यतामिति प्रिया वाच वदामि, तथैव यूयमपि वदतेत्येवार्थ 1। यजमानस्यैव 'प्रियो देवाना भूयासम्', ' अय मे काम: समृद्ध्यताम् । 'तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्' इति प्रार्थना सम्भवति, न परमेश्वरस्य । ऋषिरेव वक्ता भवति । नचास्य मन्त्रस्येश्वर ऋषिः । न चेश्वर स्वात्मार्थमाशीर्वाद प्रार्थयते । 'आवदामि',' भूयासम्’, ' समृद्धयताम्', ' उपनमतु ' आदिका लोट्बोध्या आशीलिड्बोध्या च प्रार्थना नेश्वरे सम्भवति, पूर्णकामत्वात् । सत्यार्थ-प्रकाशे ( ७ समु० ईश्वर सगुण निर्गुण विषय, पृ० १२४ । इत्यत्र दयानन्देनापि पूर्ण सुखयुक्तस्याभिलाषानुपपत्तेरुक्तत्वात् । यज्ञे ब्राह्मणाः शूद्रा अरण ( शत्रु ) सर्वे मित्राणि भवन्ति । 'यज्ञेन द्विषन्तो मित्राणि भवन्ति' ( नारायणीयोपनिषदि ७९ ), यज्ञेषु भोजनप्रसादस्य भेदभावमन्तरा दानोपपत्ते । नास्य मन्त्रस्य वेदाधिकारप्रतिपादनपरत्व सायणादिभिः स्वीकृतम् । श्रौतसूत्रकारादिभिश्च तन्नाभ्युपगतम् 'पञ्चजना मम होत्रे जुषध्वम्' ( ऋ ० स० १० १५३।५ ) इति मन्त्रेऽपि होत्रशब्दस्याह्वानमर्थः, सायणाचार्येण तथैव व्याख्यातमपि । यज्ञप्रसादग्रहणाय सर्वेषामाह्वानम् । यज्ञ एवार्थ इति पक्षेऽपि यज्ञिया पञ्चजना एवात्रोच्यन्ते । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या एव यज्ञियाः ( यज्ञार्हाः ), 'ब्राह्मणो वैव राजन्यो वा वैश्यो वा ते हि यशिया:' ( श० ३| १ | ११९ ) इति श्रुतेः । शूद्रनिषादान्ताना तु लौकिकेऽग्नौ पञ्चमहायज्ञ इषत एव । पौराणिकेषु नमोऽन्तषु च मन्त्रेषु तेषामधिकारः । — ' - ' ( ) यदुक्तम् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् इतो मुक्षीय मामुतः वा० सं ० ३। ६० इत्येतदादिको मन्त्रः स्त्रीभिः पठनीयो भवति न पत्या, तस्य 'इतो मुक्षीय' इति प्रार्थनानुपपत्तेः । 'न कर्म लिप्यते नरे' ( वा० स० ४०।२ ) इत्यत्र नरशब्देनात्रान्त्यजान्ताः सर्वेऽपि नरा विवक्षिता ' इति, तदेतदपि यत्किञ्चित् औत्सर्गिकरूपेण वेदे स्त्रीणामधि- मे इस मन्त्र का वक्ता यजमान है । वह अपने स्वजनो से कहता है कि जैसे मै इस यज्ञ में ब्राह्मण प्रभृति का पधारिये,J भोजन पाइये प्रभृति प्रिय वाणी से स्वागत सत्कार करता हूँ । उसी तरह से तुम लोग भी करना । यजमान ही ' मै देवताओ का प्रिय बनू", 'मेरी यह कामना पूरी हो', हमे आप धन और भांति भांति की सम्पत्ति दीजिये इस तरह की प्रार्थना यजमान ही कर सकता है, परमात्मा नहीं । ऋषि ही मन्त्र का वक्ता माना जाता है । इस मन्त्र के ऋषि परमात्मा नही है और न ईश्वर अपने लिये आशीर्वादात्मक प्रार्थना ही करेगा | 'आवदानि, भूयासम्, समृद्ध याताम्, उपनमतु ' इन सभी पदो में लोट् लकार अथवा आशीर्वादात्मक लिङ् लकार से प्रकट होने वाली प्रार्थना ईश्वर नही करेगा, क्योकि वह तो पूर्णकाम है | सत्यार्थप्रकाश ( ७ समु ० ) मे स्वयं स्वामी दयानन्द ने माना है 1 कि पूर्ण सुखयुक्त ईश्वर को कोई अभिलाषा नही हो सकती । यज्ञ के अवसर पर शूद्र, शत्रु प्रभृति सभी मित्र माने जाते है । नारायणोप-निषद् में इसका स्पष्ट वर्णन है कि यज्ञ के अवसर पर शत्रु मित्र हो जाते है । यज्ञ का प्रसाद बिना भेदभाव के सबको दिया जाता है । सायण प्रभृति आचायों ने भी इस मन्त्र का विनियोग वेदाधिकार के प्रतिपादन मे नही माना है और न श्रौतसूत्रकार, सर्वानुक्रमणीकार प्रभृति ने ही इस मन्त्र का ऐसा विनियोग बताया है । 'पञ्चजना.' प्रभृति मन्त्र में होत्र शब्द आह्वान के अर्थ में प्रयुक्त है । सायणाचार्य ने यही व्याख्या की है । यज्ञ का प्रसाद लेने के लिये सबको बुलाया जाता है । यदि इस शब्द का अर्थ यज्ञ किया जाय, तब भी मन्त्र का अर्थ यह होगा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद ये पाँच यज्ञ के अधिकारी है । इनमे से ब्राह्मण, क्षत्रिय और शूद्र को तो श्रुति से अधिकार प्राप्त ही है । शूद्र और निषाद को भी लौकिक अग्नि मे पंचमहायज्ञ करने का अधिकार है । कुछ पौराणिक मन्त्रो की आराधना का भी उनको अधिकार है | यह कहना कि त्र्यम्बकं यजामहे ' इस मन्त्र का पाठ स्त्रियों ही करती है, पति नहीं । 'न कर्म लिप्यते नरे' इस मन्त्र मे भी नर शब्द से सभी मानव विवक्षित है, इसलिये यह सही नही है कि सामान्यतः वेदाध्ययन में स्त्री का अधिकार न रहने पर भी विहित स्थल में अपवाद के रूप में मन्त्रोच्चारण की मान्यता दे दी जाती है । 'तस्या यावदुक्त० ' प्रभृति मीमांसा सूत्र के भाष्य में शबर स्वामी ने कहा है कि स्त्री की पुरुष से समानता नहीं हो सकती । इसके दो कारण हैं, एक तो वह स्त्री है, दूसरे उसको वेदाध्ययन का अधिकार नहीं है । स्त्रियों के लिये विवाह संस्कार ही द्विजत्व का सम्पादक होता है । इसी से उसको अपने पति के साथ यज्ञ करने का भी