वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 941–950
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 941–950
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वेदार्थपारिजातः १८३ ९ काराभावेऽपि विहितस्थले मन्त्रोच्चारणस्यापवादत्वात् । 'तस्या यावदुक्तमाशीर्बह्मचर्यंमतुल्यत्वात्' ( जै ० सू० ६।१।२४ ) इति सूत्रे ' अतुल्या हि स्त्री पुसा, अतुल्यता च द्वेधा स्त्रीत्वादविद्यात्वाच्च' इति शबरस्वाम्युक्ते । स्त्रीणा विवाह- संस्कारत्वाद् द्विजत्व हि जायते । तेनैव पत्या सह यज्ञाधिकारोऽपि । तत एव स्वाधिकृतमाज्यावेक्षणादिमन्त्रमपि ताः पठन्ति । उपनयनाभावाच्च न मुख्यो वेदाध्ययनाधिकारः । 'कृतोपनयनस्यास्य ब्रतादेशनमिष्यते । ब्रह्मणो ( वेदस्य ) || ' ( ), ग्रहणं चैव क्रमेण विधिपूर्वकम् म० २।१७३ इति मनुवचनात् उपनयनात् पूर्वं ब्राह्मणस्यापि मन्त्रोच्चारणे नाधिकार | ' नाभिव्याहारयेद् ब्रह्म स्वधानिनयनादृते । शूद्रेण हि समस्तावद्यावद्वेदेन जायते । ' ( म० २।१७२ ) इति स्मृतेश्च । आश्चर्यं यत् स्वयमुपर्युक्तान्यन्यानि च आर्षाणि वचनानि तिरस्कुर्वन्नपलपन्नपि कालिदासादीनामार्षग्रन्थ निन्दकत्व वदन्नय युधिष्ठिरो मनागपि न जिह्रेति । विवाहादिमन्त्रा अपि आचार्यादिभिरुच्चार्यन्ते । उच्चारणासामर्थ्ये तु पुरोहितादिभिरेवोच्चार्यन्ते । न चैतत् - केवलं सनातनधर्मिषु विन्तु सामाजिकेष्वपि । तथाहि दयानन्दीय सस्कारविधि रीत्यापि सद्योजातस्य बालस्य पठ-: ' ' ( नीया मन्त्रा उक्ता ॥ त्र्यायुषं जमदग्ने कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नो अस्तु त्र्यायुषम् वा० स० ३।६२ ) नो ( मम ) इति लिङ्गात् । नहि सद्योजातो बालोऽमु मन्त्र पठितु शक्नोति, असामर्थ्यात् । अतस्तत्प्रतिनिधिभूत्वा पित्रादिर्मन्त्रं पठति । अन्नप्राशन षष्ठे मासे भवति । तदापि 'ऊर्जा ' नो धेहि' ( वा ० सं ० १ ९ ८३ ) । इति मन्त्रो बालेन पठनीयः, नो ( मम ) इति लिङ्गात् । न च बाल. समर्थ तस्मादन्य एव प्रतिनिधिः पठति । 'अस्मे वीरान' ' मयि मेधां ' मयि प्रजाम् इत्यादयो मन्त्रा यथा प्रतिनिधिना पठनीयास्तथैव स्त्रीणां प्रातिनिध्येन पुरोहितैर्मन्त्राः पट्यन्ते ॥ ' ', समाजिनां रीत्या तु इतोमुक्षीय मामुत इति मन्त्रमपि परमात्मैव पठति ऋषिर्वशिष्ठोऽपि पठति । किमेती ?,, श्वशुरालयं गन्तुं प्रार्थयेते यदि पतिगृहं गच्छन्त्ये स्त्रियै परमात्मनाय मन्त्रो निर्मितः ऋषिणा चोच्चारितः तथैव तस्याः पतिः पुरोहितो वाप्युच्चारयितुं शक्नुत एव । वेदे तु शवोऽपि सम्बोध्यते - इयं नारी पतिलोकं वृणाना निपद्यत उत त्वा मर्त्य प्रेतम् । ( अथर्व १८ ३ १ ), अधिकार प्राप्त होता है । इसीलिये आज्यावेक्षण प्रभृति अपने कृत्यों का सम्पादन करने के अवसर पर यह उन कृत्यों से सम्बद्ध 1 मन्त्रो का पाठ भी करती है, किन्तु उपनयन के अभाव में वे मुख्य रूप से वेदाध्ययन में अधिकृत नही है । मनु का स्पष्ट वचन है कि उपनयन संस्कार के बाद ही वेदाध्ययन का अधिकार प्राप्त होता है । अत उपनयन से पहले ब्राह्मण को भी मन्त्रोच्चारण का अधिकार प्राप्त नही होता । अन्य स्मृति वचन में इसका स्पष्ट विधान भी है कि 'उपनयन संस्कार जब तक नही हो जाता वेद का उच्चारण नही करना चाहिये, क्योकि इससे पहले उसकी स्थिति शूद्र के समान ही होती " । आश्चर्य है कि मीमासक जी इन सब आर्ष वचनो का स्वयं तिरस्कार करते हैं और कालिदास प्रभृति पर आर्ष वचनों की निन्दा करने का दोष मढते हैं । विवाह प्रभृति के मन्त्रो का भी उच्चारण आजकल आचार्य या पुरोहित ही कर देते है । केवल सनातनधर्मियों में ही ऐसा नही होता, आर्यसमाजियों की भी यही स्थिति है । स्वामी दयानन्द ने सद्योजात बालक के लिये मन्त्रोच्चारण का विधान किया है । वह बालक ' त्र्यायुषम् प्रभृति मन्त्र को पढ नही सकता । अत उस बालक का पिता प्रतिनिधि के रूप में उस मन्त्र को पढ़ता है । छठे महीने मे बालक का अन्नप्राशन संस्कार किया जाता है । तब 'ऊर्जनो धेहि' इस मन्त्र का पाठ बालक को करना चाहिये । बालक मन्त्र पढ़ नही सकता, अत उसके प्रतिनिधि के रूप में दूसरे को ही मन्त्र पढना पडेगा । जैसे इन मन्त्रों का पाठ प्रतिनिधि करता है, उसी तरह से विवाह के अवसर पर स्त्री का प्रतिनिधि बन कर पुरोहित या आचार्य मन्त्र -पाठ करता है? समाजियों के अनुसार तो 'इतो मुक्षीय ' इस मन्त्र का पाठ परमात्मा करते है और ऋषि वसिष्ठ भी इसी का पाठ करते है । क्या ये दोनों अपनी ससुराल जाना चाहते हैं? यदि पतिगृह जाती हुई स्त्री के लिये परमात्मा ने यह मन्त्र बनाया है और ऋषि ने इसका उच्चारण किया है, तो उसका पति या पुरोहित प्रतिनिधि के रूप में उसके लिये इसका उच्चारण कर ही सकता है । वेद में तो शव को भी संबोधित किया जाता है । मृत व्यक्ति सुन नहीं पाता, किन्तु किसी से भी मन्त्र का उच्चारण
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वेदार्थपारिजातः १८४० रामायणरीत्या,तथापि न मृत शृणोति किन्तु केनचिन्मन्त्रोच्चारणं कारयित्वा कर्मपूर्ति क्रियते । श्रीमहाल्मीकीय ( ) —सीतायाः स्वर्णप्रतिमयैव यज्ञपत्नीकार्यं कार्यंते स्म । स्वामिदयानन्देनाऽपि सस्कारविधौ पृ० २ ९ ५ लिखितम् यदि यजमान पढा हो तो इतने मन्त्र अवश्य पढ लेवे । यदि कोई कार्यकर्ता जड़ मन्दमति काला अक्षर भैंस बराबर जानता । तदेव... 'हो तो वह शूद्र है तो पुरोहित और ऋत्विग् मन्त्रोच्चारण करे और कर्म उसी के हाथ से करावे । इति प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । मनुना च स्त्रीणां कृते हवनादिक निषिद्धमेव ॥ 'स्त्रिया क्लीबेन च हुते भुञ्जीत ब्राह्मणः क्वचित् । प्रतीपमेतद्देवाना तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ ' ( म ० ४। २०६ ) 'न वै कन्या न युवति. ( अविवाहिता विवाहिता वा ) नाल्प-विद्यो न बालिश. । होता स्यादग्निहोत्रस्य नार्तोनासंस्कृतस्तथा ॥ ' ( म० ११।३६ ) तस्मान्न स्त्रीशूद्रादीना यज्ञोपवीते होमे वाऽधिकारः, गृह्यसूत्रेषु च तथाऽप्रतिपादनात् । यदुक्तम – '( जै० सू० १।३।१-७ ) स्मृतिप्रामाण्याधिकरणे श्रुतिप्राबल्याधिकरणे च दृष्टमूलकस्मृत्यप्रामाण्य-पदार्थप्राबल्यप्रकरणेष्वने कस्मृतीना •सदाचाराभासाना च धर्मत्वनिराकरणम्, अत्रैव ११-२२ क्ल्पसूत्राणा स्वतोऽप्रामाण्य ,, ' ' ( प्रकरणं च महत्त्वपूर्णम् इति तदपि तुच्छम् भावानवबोधात् । विरोधे त्वनपेक्ष स्यादसति ह्यनुमानम् जै ० सू० १।३।३ ) इत्यादिसूत्रेषु भट्टपादेन त्वादृशाना मुखमुद्रणस्य कृतत्वात् । श्रुतीनामपौरुषेयत्वेन ते. स्वतः प्रामाण्यमुक्तम् । दयानन्देन तदीयैश्च युष्माभि श्रुतित्वमेव नाङ्गीकृतम् ॥ शबरस्वामी च 'औदुम्बरी स्पृष्ट्वोद्गायति' इति श्रुति मनुते ॥ तद्विरोधाच्च 'औदुम्बरी सर्वा वेष्टयितव्या ' इति कल्पसूत्रवचनं सापेक्षं मत्वा श्रुतिविरुद्धायाः कल्पस्मृतेरप्रामाण्य वक्ति | त्वया तु तद्ववचनस्य श्रुतित्वमेव न मन्यते, इति कथं त्वद्रीत्या सूत्रसङ्गतिः । तथात्वेऽपि भट्टपादाः श्रुत्यानुगुण्येन तल्लापनं वदन्ति, नात्यन्तमप्रामाण्यम् । तथा च भट्टपादः-'न च कल्पसूत्राणामप्रामाण्यमुक्तम्, विनियोगादिविधानस्य तदायत्तत्वात् । न चैकस्य कस्यचिद्वचनस्यायथार्थत्वे सर्वस्यैव कल्पसूत्रस्याप्रामाण्यम्, तस्य वेदाङ्गत्वेनादरणीयत्वात्, अन्यथा एकस्य कराकर कर्म को पूरा किया जाता है । वाल्मीकि रामायण में सीता की स्वर्ण प्रतिमा बनाकर यज्ञ कर्म को पूरा किया जाता है स्वामी दयानन्द ने संस्कारविधि में लिखा है ' यदि यजमान पढा हो, इतने मन्त्र अवश्य पढे । यदि कोई कार्यकर्ता जड मन्दमति काला अक्षर भैंस बराबर जानता हो तो वह शूद्र है...तो पुरोहित और ऋत्विग् मन्त्रोच्चारण करे और कर्म उसी के हाथ से करावे ( पृ० २९ ५ ) । यही विधि आपको यहाँ भी अपनानी चाहिये । मनु ने स्त्री के लिये हवन करने का निषेध किया है । स्त्री ( विवाहित अथवा अविवाहित ), नपुंसक, अल्पविद्य, मूर्ख, रोगी ये सब हवन के अधिकारी नही हैं । अतः स्पष्ट है कि स्त्री और शूद्र का यज्ञो- पवीत अथवा होम में अधिकार नही है । गृह्यसूत्रों में भी इसी प्रकार के वचन मिलते है । 'स्मृति प्रामाण्याधिकरण और श्रुतिप्राबल्याधिकरण में दृष्टमूलक स्मृति को प्रमाण नही माना है और अनेक स्मृतियो का सदाचार के नाम पर चल पडे रीति-रिवाजो का प्रामाण्य अस्वीकृत कर दिया गया है । कल्पसूत्रों के स्वत प्रामाण्य का निषेधक प्रकरणः इनमे महत्त्वपूर्ण है, आपका यह कथन भी इसलिये गलत है कि आपने पूरे प्रकरण का भाव ही नही समझा है । ऐसी शंकाओं का भट्टपाद कुमारिल ने 'विरोधे स्वन ० ' प्रभृति सूत्र की व्याख्या मे समाधान कर मुँह बन्द कर दिया है । अपौरुषेयता के आधार पर श्रुतियों का प्रामाण्य मानते है । आप लोग इस अधिकरण में उद्धृत अनेक ब्राह्मण वचनो को श्रुति नही मानते, किन्तु शबरस्वाभी उनको श्रुति के रूप में ही उद्धृत करते हैं । इस अधिकरण में यही बताया गया है कि प्रत्यक्ष श्रुति के विपरीत अभिप्रायवाला कल्पसूत्र का वचन प्रमाण नहीं माना जायगा । इसके उपरान्त भी 'भोदुम्बरी शाखा' से संबद्ध श्रुति और कल्पसूत्र के विचित्र अभि प्रायवाले वचनो की संगति भट्टपाद कुमारिल ने बता दी है । 'उनका स्पष्ट कथन है कि 'कल्पसूत्रो को अप्रमाण नही माना जा सकता, क्योंकि मन्त्रों के विनियोग प्रभृति का ज्ञान उन्ही की सहायता से होता है । किसी एक वचन के अयथार्थ होने से सारा कल्पसूत्र अप्रमाणिक नहीं हो जायगा । वेदांग होने से उसका आदर होगा ही । किसी एक अंश के अप्रामाणिक होने पर पूरे ग्रन्थ को यदि
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वेदार्थपारिजातः १८४१ वचनस्य लोभमूलकत्वेनाप्रामाण्ये तत्सामान्यात् सर्वेषामेव पौरुषेयाणामप्रामाण्यापत्तेः तथात्वे पाणिन्यादिस्मृतीनामप्य- प्रामाण्यं स्यात् । अनेकेषा सूत्राणा महाभाष्यकारैः प्रत्याख्पातत्वाच्च' इति ॥ वस्तुतस्तु स्वकीयस्प दयानन्दीयमतस्य वेदबाह्यस्य रक्षणायैव भर्तृमित्रसमर्थनाय यतितम् | यदुक्तम्— ' भर्तृ- मित्रेण वैदिकधर्मेषु सन्निविष्टानां कासाञ्चिद् वैदिकीना रूढीना निराकरणायैव खण्डन कृतम्, यथा दयानन्देन वैदिकवाड- मयेषु परमास्थावताप्यवैदिकीनां रूढीना निराकरणं कृत तद्वत्' इति, तदपि तुच्छम् वेदविरुद्धत्वात् । वस्तुतस्तु दयानन्द- स्ततोऽप्यधिकभयङ्कर आसीत्, तेन तदीयैश्च वेदानामवेदत्वसाधनायैव प्रयतितत्वात् । सिद्धान्ते तु भट्टपादेन समर्थितमेव स्मृतीना प्रामाण्यम् । गृह्यमाणनिमित्तत्वेन प्राप्तस्याप्रामाण्यस्यापि प्रतिक्षेप एव कृत । गृह्यमाणनिमित्तत्वाद्यद्युच्येताप्रमाणता । उत्क्षेपणीयहेतुत्वात् सा सर्वत्र प्रसज्यते ॥ रागद्वेषमदोन्मादप्रमादालस्यलुब्धताः । क्व वा नोत्प्रेक्षितु शक्याः स्मृत्यप्रामाण्यहेतवः ॥
अदुष्टेन हि चित्तेन सुलभा साधुमूलता । दुष्टमूलत्वलाभस्तु भवत्याशयदोषतः ॥
का वा धर्मक्रिया यस्यां दृष्टो हेतुर्न युज्यते । कथञ्चिद्वा विरुद्धत्वं प्रत्यक्षश्रुतिभिः सह || लोकायतिकमूर्खाणा नैवान्यत् कर्म विद्यते । यावत्किञ्चिददृष्टार्थं तद् दृष्टार्थं हि कुर्वते || वैदिकान्यपि कर्माणि दृष्टार्थान्येव ते विदुः । अल्पेनापि निमित्तेन विरोध योजयन्ति च ॥ तेभ्यश्चेत्प्रसरो नाम दत्तो मीमांसकैः क्वचित् । न च कञ्चन मुञ्चेयुर्धर्ममागं हि ते सदा || प्रसरं न लभन्ते हि यावत्क्वचन मर्कटाः । नाभिद्रवन्ति ते तावत् पिशाचा वा स्वगोचरे ॥ क्वचित्वाशे हि स्वोत्प्रेक्षालब्धधामभिः । जीवितु लभते क्वासौ सन्मार्गपतितः स्वयम् ॥ अप्रमाण मान लिया जाय तो सारे पौरुषेय शास्त्र अप्रमाणिक हो जायंगे । पाणिनि के अनेक सूत्रों का भाष्यकार ने प्रत्याख्यान किया है, तो क्या इससे पूरा पाणिनीय व्याकरण अप्रमाणिक हो जायगा? वास्तव में देखा जाय तो अपना और स्वामी दयानन्द का मत कही वेदबाह्य न मान लिया जाय, इसी बात को सिद्ध करने के लिये ये मीमासक भर्तृमित्र का समर्थन करते है । आपका कहना है -'भर्तृमित्र ने वैदि धर्म में प्रविष्ट कुछ रूढियो का निरा- करण करने के उद्देश्य से हो विरोध किया था । जैसा कि माज स्वामी दयानन्द ने वैदिक वाड्मय के प्रति परम आस्था रखते हुए भी अवैदिक रूढियों का निराकरण किया है । " किन्तु आपकी यह बात वेद विरुद्ध होने से स्वीकार्य नही हो सकती । दयानन्द और उसके अनुयायी भर्तृमित्र से भी बढकर लोकायत हैं, स्वयं वे और उनके अनुयायी वेद को ही वेदबाह्य घोषित करने के प्रयत्न मे लगे हैं । सिद्धान्ततः भट्ट कुमारिल ने स्मृतियो का प्रामाण्य स्वीकार किया है और आपातत. प्रतीत हो रही अप्रामाण्य की आशंका का भी निरा- " करण कर दिया है । उनका यह कहना है-- 'दोष की उत्प्रेक्षा करके, मनमाने दोषो को गढकर यदि कोई स्मृतियो को अप्रमाण सिद्ध करना चाहता है, तो इस तरह से तो सभी जगह दोषो की कल्पना की जा सकती है । राग, द्वेष, मद, उन्माद, प्रमाद, आलस्य, लोभ प्रभृति की कल्पना कहाँ नही की जा सकती, जिनको कि आप स्मृतियो के अप्रामाण्य में प्रमुख कारण मानते हैं ॥ निर्मल चित्त में ही सज्जनता का निवास है । दुष्टतामूलक लाभ की इच्छा मन की कलुषता के कारण पैदा होती है । ऐसी कौन सी धार्मिक क्रिया है, जिसका कि इष्ट प्रयोजन न खोजा जा सके अथवा उनका प्रत्यक्ष श्रुति से विशेष न दिखाया जा सके । मूर्ख लोकायतिको का इसके अतिरिक्त और कोई कार्य नही है, कि जो कुछ मी अदृष्टार्थ है, उन सबका दृष्ट प्रयोजन सिद्ध कर दें । वे वैदिक कर्मो का भी दृष्ट ही प्रयोजन मानते है । जिस किसी तरह से जिस किसी बात का बिना प्रयोजन विरोध करने में ही उनका तात्पर्य रहता है । ऐसे व्यक्तियों को यदि थोड़ी सी भी छूट दी जाय तो ये धर्म का भी विरोध करने से न चूकेंगे । जबतक वानरो अथवा पिशाचों को अवसर नही दिया जाता, तभी तक कुशल रहती है । यदि इस प्रकार के पुरुषों को अवसर दे दिया जाय तो ये अपने भांति भांति के कुतर्कों के आगे भले आदमी का जीना भी दूभर कर देंगे । धर्म के नाश मे लगे हुए ऐसे लोकायतिकों के मनोरथ को पूरा करने में मीमांसको को सहायता नही करनी चाहिये । २३१
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वेदार्थपारिजातः २८४२
तस्माल्लोकायतस्थाना धर्मनाशनशालिनाम् । एवं मीमांसकैः कार्यं न मनोरथपूरणम् ॥
यच्चादो श्रद्धया सिद्धं पुनर्न्यायेन साधितम् । आज्ञासिद्धप्रमाणत्वं पुराणादिचतुष्टयम् ॥ तत्तथैवानुमातव्यं कर्त्तव्यं नान्तरा इल्थम् । सर्वं श्लथयतः सीदेद् दुर्नद्धशकटादिवत् ॥ यदा तु हन्ति पुण्यानि कर्म दृष्टं सहस्रशः । दृष्टार्थं विहितं वेदे तदा किं हेतुदर्शनैः ॥ ऋत्विग्भ्यो दक्षिणादानं तानूनप्त्रादिकर्म च । यदृत्विग्यजमानाना दृष्टार्थं सर्वमिष्यते ॥ या तु वेदविरुद्धेह स्मृतिः काचन दृश्यते । सा तु स्याद् भ्रान्तिमूलेव न स्पष्टश्रुतिमूलिका ॥ स्वातन्त्र्येण प्रमाणत्व स्मृतेस्तावन्न सम्भवेत् । वेदमूलानुमानं च प्रत्यक्षेण विरुद्ध्यते ॥ इति ( तं० वा ० १।३।२) - यदुक्तम् — 'गृह्यधर्मसूत्रेषु प्रतिवेदं द्वादशवर्षं ब्रह्मचर्यंविधानमुपलभ्यते -' तस्मा एतत् प्रोवाच अष्टचत्वारिंशद्वषं सर्ववेदब्रह्मचर्यम्' ( गोपथब्राह्मणे १/२/५ ) इति । गोपथब्राह्मणं तु शबरस्वामिदृष्टया पौरुषेयवेद एव, तथापि तेन अष्ट- । ' ' चत्वारिंशद्वर्षाणि वेदब्रह्मचर्यचरणम् जातपुत्रः कृष्णकेशोऽनीनादधीत इत्यनेन विरुद्धमित्युक्तम् । स्मृतेः कथं ' प्रचलनमित्यस्य तु समाधानं कुर्वतोक्तम्- अपुंस्त्व प्रच्छादयन्तश्चाष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि वेदब्रह्मचयं चरितवन्तः । तत एषा स्मृतिः' ( शाबरभाष्ये १ | ३| ४ ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, स्मृतेर्युगान्तरविषयत्वात् । गोपथब्राह्मणे तु न विधानम्, तत्र लिङादि- विधिप्रत्ययाभावात् । प्रकृष्टप्रज्ञः स्वल्पकालेनापि चतुर्वेदग्रहणसम्भवात् । त्वदीयस्य पुस्तकचतुष्टयात्मकस्य वेदस्य स्वल्प- कालेन ग्रहणसम्भवाच्च कालविधाने; न तात्पर्यम्, तस्य वेदाध्ययनविधान एव तात्पर्यात् । 'तदधिकं पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा ' ( म० ३ १ ) इति मनुवचनेनापि तत्समर्थनात् । अत्र कुल्लूकभट्ट: - ' यावता कालेन उक्तावधेरूर्ध्वमधो वा वेदान् ', गृह्णाति तावता कालेन व्रताचरणमिति । गोपथब्राह्मणोक्तमष्टाचत्वारिंशद्वर्षव्रत विधानमपि वेदग्रहणकालोपलक्षणार्थमेव 'यावद्ग्रहण वा' ( पारस्करगृह्यसूत्र २/५/१५ ), 'यावद्ग्रहणं वा' ( वाराहगृह्यसूत्र षष्ठखण्ड ), 'ग्रहणान्तं वा जीवितस्यास्थि- शास्त्र के ऊपर श्रद्धा पहली आवश्यकता है । उसकी न्याय से परीक्षा भी की जा सकती है । पुराण प्रभूति का प्रामाण्य शास्त्र वचनो से सिद्ध है । अनुकूल तर्कों से उसको पुष्ट करना चाहिये । इसमें ढिलाई नही दिखानी चाहिये । अन्यथा कमजोर गाड़ी जैसे दुलंध्य स्थल को नहीं पार कर सकती, वही स्थिति शास्त्रज्ञो की भी हो जायगी । ऋत्विजों को दी गई दक्षिणा आदि का यदि दृष्ट प्रयोजन ही माना जायगा और अन्य यज्ञ-यागादि कर्मों का भी दृष्ट फल ही माना जायगा, तो उस स्थिति में तर्क की क्या आवश्यकता रह जायगी । जो कोई स्मृतिवचन वेदविरोधी प्रतीत हो रहा हो, उसको भ्रान्तिमूलक ही मानना चाहिये । स्मृति का स्वतन्त्र प्रामाण्य स्वीकार नही किया जा सकता और यदि प्रत्यक्ष श्रुति उपलब्ध है, तो उसके विपरीत अभिप्राय की अनुमानित श्रुति का बाध उस प्रत्यक्ष श्रुति से हो जायगा । आपका कहना है कि गृह्यसूत्रो मे प्रत्येक वेद के लिये बारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का विधान है । गोपथ- ब्राह्मण मे ४८ वर्ष तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का उल्लेख है । शबर स्वामी गोपथ ब्राह्मण को श्रुति मानते हैं, तब भी उनका कहना है कि यह श्रुति 'जातपुत्र कृष्णकेशो' इस श्रुति से बषित हो जाती है । इस तरह से आप स्मृतियों के प्रचलन पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि शावर भाष्य का ही कहना है कि 'अपनी पुस्त्वहीनता को छिपाने के लिये ४८ वर्ष के ब्रह्मचर्य के पालन की कल्पना कर ली गई और तदनुसार ही इस तरह के स्मृतिवचन चल पडे' ( शाबरभाष्य, ११३१४ ), किन्तु यह सारा कथन भी इसलिये गलत है कि ४८ वर्ष के ब्रह्मचर्य का विधान करते वाली स्मृति किसी दूसरे युग में प्रचलित रही है । गोपथ ब्राह्मण मे ब्रह्मचर्य का 1 विधान नहीं है, क्योकि वहाँ पर विधिबोधक लिङादि प्रत्ययों का अभाव है । तीक्ष्ण बुद्धि पुरुष अल्प समय में भी चारो वेदों को ग्रहण कर सकता है । आपके द्वारा स्वीकृत वेद की चार पुस्तको को तो कोई भी व्यक्ति थोड़े ही समय में पढ़ सकता है । अतः यहाँ पर काल के विधान में तात्पर्य न होकर श्रुति का तात्पर्य वेदाध्ययन में ही है । मनु का स्पष्ट कथन है कि 'उक्त काल का आषा, चौथाई या जब तक वह वेदाध्ययन करे, तब तक ब्रह्मचर्य का पालन करे । कुल्लूक भट्ट की यहां पर स्पष्ट व्याख्या है कि 'यावता कालेन' का
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वेदार्थपारिजातः १८४३ ' ( ) ' ' रत्वात् बौधायनधर्मंसूत्र ११२१४ इत्यादि सूत्रेभ्य । तथा जातपुत्र कृष्णकेशोऽनीनादधीत इति श्रुत्यनुसारेण अग्निहोत्रादिकर्मकलापसिद्धयर्थमष्टाचत्वारिंशद्वर्षेभ्य प्रागपि समावर्तनं कर्त्तव्यमित्यस्यार्थस्य प्रशंसार्थमेव 'पुंसाम् अपुंस्त्वं प्रच्छादयन्त' ( १।३।४ ) इत्यादिशबरस्वामिवचनम्, तद्बोधकस्मृतेस्तन्मूलभूताया श्रुतेश्च तत्रैव तात्पर्यात् । यतो हि ,, कृष्णकेशश्रुतिस्तत्परा गोपथश्रुतिस्त्वतत्परा तत्प्रधानान्यतत्प्रधानेभ्यो बलीयासीति न्यायेनातत्पराश्रुतिर्बाधार्हति । यथा - ' अपाम सोमममृता अभूम ' ऋ( ० सं० ८०४८३), ' अक्षय्य ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति' (श० ब्रा० २।५ / ४१ ) इत्यादिवचनाना सोमपान-चातुर्मास्य यज्ञप्रशंसायामेव तात्पर्यम्, न अक्षय्यत्वप्रतिपादने, कृतकत्वेनाऽनित्यत्वस्य धीव्यात् । यत्कृतक तदनित्यमिति युक्त्यनुगृहीतायाः 'तद्यथेह कर्मचितो लोकःक्षीयते एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते' इति श्रुते- विरोधाच्च । शाबरभाष्यस्य प्रामाण्य तव मान्येन दयानन्देनाभ्युपेतम् | त्वया तु तदप्रामाण्यं वर्णयता स्वाचार्योऽप्यनाप्त एव साधितः । यदपि - 'आद्यशङ्कराचार्य स्थापितस्य शारदामठस्य काचीकामकोटिपीठस्य वंशावलीषु तत्तदाचार्याणा नामानि तदवस्थितिकालाच वर्णिता । तयोरियानेव भेदो यत् शारदापीठवंशावल्यां युधिष्टिरमंवत्सरस्य प्रयोगः काञ्चीकामकोटि- पीठवंशावल्यां कलिसवत्सरोल्लेखः । उभयो ३८ वर्षस्यान्तरम् । शारदापीठवंशावलीरीत्या आद्यशंकराचार्यस्य जन्म २६३ ९ युधिष्ठिरसंवत्काले विक्रम संवदनुसृत्य ततः ४५२ वर्षपूर्वं काञ्चीकामकोटिवंशावलीरीत्या कलिसंवत् २५ ९ ३ विक्रमात् । 'श्रीमतोऽवन्तिनाथस्य विक्रमार्कस्य भूपते । धर्माध्यक्षो हरिस्वामी व्याख्यच्छातपथी श्रुतिम् ॥ यदाब्दाना कलेजंग्मुः सप्तत्रिंशच्छतानि च । चत्वारिंशत्समाश्चान्यास्तदा भाष्यमिद कृतम् ॥ ' ( श० ब्रा० प्रथमकाण्डे हरिस्वामिभाष्ये ) इति प्रमाणेन हरिस्वामी संवत्सरप्रवर्तकविक्रमस्य समकालिक एव । १५ वर्षपूर्वं लब्धेन शिलालेखेनापि तत्पुष्टिर्जाता । ( साप्ताहिक हिन्दुस्तान, २८ अक्टूबर, १ ९ ६४ ) । हरिस्वामिभाष्ये कुमारिलभट्टशिष्यस्य प्रभाकरस्य मतानुयायिनामुल्लेखो अभिप्राय यह है कि उक्त अवधि के बाद या पहले जब भी वह सब वेदों को ग्रहण कर लेता है' । गोपथ ब्राह्मण की उक्त अवधि भी वेदग्रहण के बाद की ही द्योतक है । पारस्करगृह्यसूत्र बौधायन धर्मसूत्र प्रभृति में वेदग्रहण के काल को ही प्रधानता दी गई है । 'जातपुत्र:' प्रभूति श्रुति अग्निहोत्र प्रभृति कर्मों की सिद्धि के लिए ४८ वर्ष के पहले भी समावर्तन का विधान करती है और इसी विधान की प्रशंसा में अर्थवाद के रूप में ' अपुंस्त्वं प्रच्छादयन्त' इत्यादि शबर स्वामी उद्धृत स्मृति का विनियोग मानना चाहिये । इस अर्थ को बतानेवाली स्मृति और उसकी मूलभूत श्रुति का तात्पर्य इसी में स्वीकार किया जायगा । क्योकि कृष्णकेश श्रुति तत्परा और गोपथ श्रुति अतत्परा है । तत्प्रधान न्याय से अतत्परा श्रुति ही बाधित होती है । जैसे 'अपाम सोम० ', 'अक्षय्यं ह' प्रभृति श्रुतिवचनों का तात्पर्य सोमपान और चातुर्यास्य यज्ञ की प्रशंसा में है, अक्षयता के प्रतिपादन मे नही, क्योकि ये सब कृतक हैं और कृतक निश्चित रूप से अनित्य होता है । 'जो कृतक होता है, वह अनित्य होता है' इस युक्ति से समर्थित 'तद्यथेह' श्रुति से उक्त बात का विरोध भी पड़ेगा । शाबरभाष्य की प्रामाणिकता आपके मान्य स्वामी दयानन्द ने भी स्वीकार की है । आप शाबरभाष्य की जो अप्रामाणिकता सिद्ध कर रहे{ हैं, उसके साथ हो अपने आचार्य को भी आप अनाप्त बता रहे है । मीमासक जी आगे लिखते हैं - आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित शारदा मठ और कांची कामकोटिमठ की वंशावलियो में उन उन आचार्यों के नाम और उनके अवस्थिति काल का वर्णन मिलता है । इनमें इतना ही अन्तर है कि शारदापीठ की वंशावली में युधिष्ठिर संवत् का और काची कामकोटिपीठ की वंशावली में कलिसंवत् का उल्लेख है । दोनो में ३८ वर्ष का अन्तर है । शारदापीठ की बंशावली के अनुसार आद्य शंकराचार्य का जन्म २६३१ युधिष्ठिर संवत् में हुआ था । विक्रम संवत् के अनुसार यह विक्रम से ४५२ वर्ष पूर्व होगा । काची कामकोटिपीठ की वंशावली के अनुसार कलिसंवत् २५ ९ ३ अर्थात् विक्रम पूर्व हरिस्वामी संवत्सर प्रवर्तक विक्रमादित्य के समकालीन थे । १५ वर्ष पहले उपलब्ध शिलालेख से भी इस विषय की पुष्टि होती है ( साप्ताहिक हिन्दुस्तान, २८ अक्टूबर, १ ९ ६४ ) | हरिस्वामी के भाष्य में कुमारिल भट्ट के शिष्य प्रभाकर के अनुयामियो की चर्चा है । जैसे कि 'यथाविध्युपदेश 441
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वेदर्थपारिजातः१८४४ शंकराचार्य दृश्यते । तद्यथा - ' अथवा सूत्राणि यथाविध्युद्देश इति प्राभाकराः । अपः प्रणयतीति' आस्माकीने हस्तलेखे । एतेनापिसत्यार्थप्रकाशे कालपुष्टिः; शङ्कराचार्यकुमारिलयोः समकालिकत्वात्' इति, तदप्यविचारितरमणीयम्, स्वामिदयानन्देन स्वकालात् २२०० वर्षपूर्वः शङ्कराचार्यस्य काल इत्युक्तम् । हरिस्वामिभाष्ये क्व प्राभाकराणामुल्लेख इति न सङ्केतितम्, तदीयहस्तलेखमात्रस्याप्रमाणत्वात् । यत्तु - 'पातञ्जलभाष्यस्येव न शाबरभाष्यस्य प्राञ्जलता स्पष्टार्थता च, अनेकत्र तत्र रचनाया अव्यवस्थित-त्वस्य अस्पष्टार्थत्वस्य च दर्शनात्' इति, तदपि यत्किञ्चित्, 'नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति ' इत्याभाणकस्यैव तत्र चारितार्थ्यात् । श्रीशङ्कराचार्येण -'तथा चाहुः शास्त्रतात्पर्यविद. ' इति रीत्या शबरस्वामिनः शास्त्रतात्पर्यवित्त्वस्योकत्वात् । तन्त्रवार्तिके - ' सता हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः ' इत्यभिज्ञानशाकुन्तलीय पद्यमुद्धृतम् । उदयवीरशास्त्रिणा 'वेदान्तदर्शन का इतिहास' लेखकेन पद्यमिद तत्र प्रक्षिप्तमित्युच्यते । मभ विचारे तु पद्यांशोऽयं सूक्ति-रूपेणातिप्राचीनः कालिदासेनास्य स्वप्रकरणे उपयोगः कृत इति युधिष्ठिरोवति । समाजिनामिदमेवोत्तरं प्रायेण सर्वत्र ' 'पश्यामः । प्रभाकरमिश्रविरचिते बृहतीसह २४२ पद्ये ३३४ पद्ये च अविवेक परमापदां पदम् इति पद्यांशो दृश्यते । किरातार्जुनीये च पद्यस्यैकं चरणम् २।३० स्थाने । अवश्य प्रभाकर एव प्राचीनः । तथैव भट्टपादोऽपि कालिदामात् प्राचीनः स्यान्नेदमसम्भवि । भट्टपादादयो मीमांसका निरीश्वरवादिन इति त्वपरिशीलितमीमासावृत्तान्तस्यैव शोभते । अनुमानं स्वातन्त्र्येण नेश्वरे प्रमाण तस्य धर्मस्येव शास्त्रप्रमाणकत्वादित्यत्रैव यथा शङ्कररामानुजादीनामुत्तरमीमांसकाना मतं तथैव मीमासकानामपि 1। उत्तरमीमासकैरीश्वरसाधकानुमानानि ' शास्त्रयोनित्वात्' ( ब्र० सू० १1१1३ ) इत्यत्र खण्डितानि । न्यायकणिकाया वाचस्पतिमिश्रश्व महता समारोहेणेश्वरखण्डनं कृतम् । तत्रापि तेषामिदमेवाकूत यदनुमानेनेश्वरसामान्य- इति प्राभाकराः' ( हमारा हस्तलेख ) । इससे भी शंकराचार्य के उक्त समय की पुष्टि हो जाती है, क्योकि शव र और कुमारिल सम-सामयिक थे । उनका यह सारा कथन भी अविचारित रमणीय है । स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में अपने समय से २२०० वर्ष पहले शंकराचार्य की स्थिति मानी है । हरिस्वामी के भाष्य में प्राभाकरों का उल्लेख कहाँ किया गया है, इसका स्पष्ट स्थल निर्देश नही किया गया है । हमारा हस्तलेख लिखने मात्र से वह प्रमाण नही मान लिया जायगा । ' आगे लिखा गया है- पातंजल महाभाष्य के समान शाबरभाष्य प्रांजल और स्पष्ट अर्थप्रतीति कराने वाला नही है । अनेक स्थलों पर इसकी रचना अव्यवस्थित और अस्पष्ट है, इसका क्या उत्तर दिया जाय, ' नैष स्थाणोरपराध:' यह निरुक्त का वचन हमें यहाँ स्मरण हो आता है । श्रीशंकराचार्य जिनको शास्त्रतात्पर्यवेत्ता कह कर आदर के साथ सम्बोधित करते हैं, उनके प्रति आपके ऐसे विचार है । 'तन्त्रवातिक' में ' सतां हि सन्देहपदेषु' इत्यादि अभिज्ञान शाकुन्तल का पद्य उद्धृत है । 'वेदान्त दर्शन का इतिहास' लेखक उदयवीर शास्त्री इसको वहां प्रक्षिप्त मानते है । मेरे विचार से तो यह पद्यांश सूक्ति के रूप में अति प्राचीन काल से प्रचलित कालिदास ने अपने ग्रन्थ में उसका उपयोग कर लिया है' यह युधिष्ठिर महाशय का कहना है । समाजी प्राय. इसी तरह का उत्तर सम जगह देते रहते है । प्रभाकर मिश्र स्वविरचित बृहती ग्रन्थ में २४२ और ३३४ वें पद्य में 'अविवेकः परमापदां पदम्' इस पद्यांश को ( २१३० ) में भी मिलता है । प्रभाकर निश्चित ही भारवि से प्राचीन है । इसी तरह से भट्ट-उद्धृतकरते हैं । यह अंश किरातार्जुनीय पाद कुमारिल भी कालिदास से प्राचीन है, यह भी असम्भव नही है । किन्तु भट्टपाद प्रभृति मोमासक निरीश्वरवादी है, यह कथन मीमासा न जानने वाले को ही शोभा दे सकता है । अनुमान स्वतन्त्र रूप से ईश्वर की सत्ता में प्रमाण नही है, क्योंकि धर्म की तरह ईश्वर की भी सिद्धि शास्त्र से ही होती है, यह मत शंकर, रामानुज प्रभृति सभी उत्तर मीमासक मानते हैं और यही मत पूर्वमीमांसकों का भी है । उत्तर मीमांसको ने ईश्वर साधक अनुमानों का खण्डन 'शास्त्रयोनित्वात्' इस सूत्र की व्याख्या के प्रसंग में किया है । वाचस्पति मिश्र ने न्यायकणिका में इस विषय की विस्तृत समालोचना की है । उनका यही अभिप्राय है कि अनुमान से ईश्वर सामान्य की सिद्धि हो सकती है, ईश्वर विशेष की नही । ऐसी स्थिति में यदि नैयायिक अनुमान सिद्ध ईश्वर को वेद का कर्ता मानेंगे, तो अन्य 1
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वेदार्थपारिजातः १८४५ मेव सिद्धति नेश्वरविशेष । तथात्वे यदि नैयायिकादयोऽनुमानसिद्धस्येश्वरस्य वेदकारत्वं साधयिष्यन्ति, तर्हि तथैवान्ये कुरानकारत्वं बायबिलकारत्व कथं न साधयेयुः? विनिगमनाविरहाद् ईश्वरस्याप्तत्वेन तत्कृतस्य वेदस्य प्रामाण्ये वेदोक्त- त्वेनेश्वरस्याप्तत्वसाधने त्वन्योन्याश्रयत्वमेव स्यात् । शङ्कराचार्येण ब्रह्मभिन्नजीवजगदादिखण्डनं कृतम् । तदनुयायिभिस्तु परमार्थतया जीव-प्रकृत्योः खण्डन कृतम्, व्यावहारिकदृष्ट्या तु जीव जगतोः सत्त्वमेवाङ्गीक्रियते । –' यदुक्तम् ईश्वरनिराकरणेन मीमासाशास्त्रस्य नास्तिकपक्षप्रक्षेपभयादीश्वरसत्त्वं कथञ्चिदभ्युपगम्यते :, मीमांसके तथैव शाङ्करमतानुयायिभिरपि जीवजगतोरनङ्गीकारेण व्यवहारपक्षानुपपत्तिभयात्तयोर्व्यावहारिक- सत्ताभ्युपगम्यते' इति, तदेतदुभयसिद्धान्ताऽनभिज्ञाननिमित्तकमेव, सिद्धान्तस्य समक्षं भयस्याकिञ्चित्करत्वात् । ' असन्नेव स भवति असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद सन्तमेनं ततो विदुः ॥ ' ( तै ० उ० २२६ ) 'नास्तिको वेदनिन्दकः' ( म० २।११ ) इति रीत्या ' अस्ति नास्ति दिष्टं मति ' ( पा० सू० ४ ४ ६० ) इत्यादिरीत्या दिष्टप्रतिपादकवेदशास्त्रतदर्था-नभ्युपगमस्यैव नास्तिक्यप्रयोजकत्वात् । न च नास्तिकपक्षप्रक्षेपभयाद् बोद्धैरार्हतैर्वा वेदप्रामाण्यमीश्वरसत्त्वं वाङ्गीक्रियते । न च नास्तिक्यपक्षप्रक्षेपभयात् समाजिभिरवतारवादो मूर्तिपूजा श्राद्ध वाङ्गीक्रियते । वेदाऽपौरुषेयत्वे विपक्षकुक्षिनिक्षिप्तत्वादेव त्वनुमानसिद्धस्येश्वरस्य उत्तरमीमासकैरपि निराकरण क्रियते, 'व्यवहारे भाट्टतयः' इत्यङ्गीकारात् । शून्यवादिनोऽपि व्यवहारमुपपादयन्त्येव, ' द्वे सत्त्वं समुपाश्रित्य बुद्धाना धर्मदेशना' इत्युक्ते । तथैवाद्वैत ब्रह्मात्मप्रतिपत्तेः प्राक् प्रसिद्धप्रमा- त्रादिव्यवहारस्य शङ्कराचार्यैरभ्युपगमात् । ' पश्वादिभिश्चाविशेषात्' इति तदुक्तेः । 'अक्षमा भवतः केय साधकत्वप्रकल्पने । किं न पश्यसि संसारं तत्रैवाज्ञानकल्पितम् ॥ ' इति तत्त्वप्रदीपिकोक्तेश्च । यदुक्तम्—'यत्र द्विजिह्वत्वं न स्यात्तस्यैव सत्यपक्षत्वम्' इति, तदपि तुच्छम्, तथात्वे परमेश्वरस्य सगुणत्व-निर्गुणत्वभेदेन द्विजिह्वत्वाद्दयानन्दस्यापि असत्यपक्षनिक्षिप्तत्वापातात् । यदि निकृष्टगुण राहित्येन निर्गुणत्वेऽपि शोभनगुणत्वेन मत वाले उसको कुरान अथवा बाइबिल का कर्ता भी मान सकते है । विशेष हेतु के अभाव मे ईश्वर के आप्त होने के कारण तत्कृत वेद का प्रामाण्य मानना पडेगा । वेद में ईश्वर को आप्त बताया गया हैं, इस आधार पर ईश्वर में आप्तता सिद्ध करनी पडेगी । इस तरह ये दोनों अनुमान परस्पर आश्रित होने के कारण कुछ भी सिद्ध नही कर पायेंगे । शंकराचार्य ने ब्रह्म- भिन्न जीव और जगत् का खण्डन किया है और उनके अनुयायियो ने पारमार्थिक जीव और प्रकृति ( जगत् ) का खण्डन किया है, इनकी व्यावहारिक सत्ता को वे स्वीकार करते है । इनमे कोई परस्पर विरोध नही है । किन्तु मीमासक जी का कहना है कि 'ईश्वर का निराकरण कर देने से मीमासा को नास्तिक दर्शन माना जायगा, इस डर से मीमासक किसी तरह से ईश्वर की सत्ता मान लेते है । उसी तरह से शाकर मत के अनुयायी जीव और जगत् की सत्ता नही मानते, तो भी व्यवहार पक्ष की उपपत्ति न बन पावेगी, इस1 डर से इनको व्यावहारिक सत्ता मान लेते हैं । उनके इस कथन से ऐसा प्रतीत होता है कि उनको उक्त दोनो दर्शनों का कुछ भी ज्ञान नही है । सिद्धान्त के सामने भय क्या वस्तु है? 'जो ब्रह्म की सत्ता स्वीकार नही करता, वही नास्तिक है और उसकी सत्ता को स्वीकार करने वाला तो आस्तिक हो है', ' वेदनिन्दक ही नास्तिक कहलाता है' इत्यादि श्रुति स्मृति वचनो के प्रमाण पर और 'अस्ति नास्ति दिष्ट मति ' इस पाणिनि-सूत्र के आधार पर विष्ट प्रतिपादक वेदशास्त्र और उसके प्रतिपादित विषय को अस्वीकार करने वाले नास्तिक कहलाते है । नास्तिक कहे जाने से डर कर बौद्ध और जैन दर्शन वाले 1 1 वेद का प्रामाण्य और ईश्वर की सत्ता नही मानने लग जाते और न आप लोग ही नास्तिको में गिनती होने के डर से अवतारवाद, 1 मूर्तिपूजा, श्राद्ध आदि की सत्ता मानने को तैयार होते हैं । वेद की अपौरुषेयता न मानकर केवल अनुमान के आधार पर तैयायिक द्वारा प्रस्तुत ईश्वरसिद्धि का निराकरण उत्तरमीमासको ने भी किया है ' व्यवहार मे भाट्ट सिद्धान्त' ही वेदान्तदर्शन को मान्य हैं । शून्यवादी बौद्ध भी व्यवहार का उपपादन करते है । ' वेदान्त की भी ठीक यही प्रक्रिया है । पहले से प्रसिद्ध प्रमाता प्रभृति के व्यवहार को उन्होंने स्वीकार किया है और इसमें प्रमाण भी दिये गये है । 'जिसमें दोहरी मान्यता न हो वही सत्य पक्ष होता है' यह कथन भी गलत है । ईश्वर भी सगुण और निर्गुण के भेद से }
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वेदार्थपारिजातः १८४६ सगुणत्वमिति समाधानं तर्हि प्रकृतेऽपि माध्यस्थ्यमवलम्ब्य किमिति न दीयते दृष्टिः । वेदापौरुषेयत्वबाधकेश्वरसाधकानुमान- सिद्धेश्वरनिरासकत्वेऽपि वेदसिद्धपरमेश्वराभ्युपगमे विरोधाभावात् । ब्रह्मात्मप्रतिपत्ती ब्रह्मात्मनः सजातीयविजातीयस्वगतभेद- शून्यत्वेऽपि ब्रह्मात्मप्रतिपत्तेः प्राक्प्रतिपत्तिसाधनप्रभात्रादिसर्वव्यवहारस्य यथावदभ्युपगमे बाधाभावस्य प्रकृतेऽपि तुल्य- ' ' ( ) त्वात् । गुणवादस्तु जे ० सू० १।२1१ इति मन्त्रार्थवादेतिहासप्रामाण्यात् सृष्टिप्रलयाविष्येते प्रतिसृष्टि च तुल्यलिङ्ग- न्यायेन तुल्यनामप्रभावव्यापारवस्तुत्पत्तेर्नानित्यताप्रसङ्ग इति त्वदीयटिप्पणीसमुद्धृतवचनेनैव तत्सिद्धेः । न ' इति' शब्देनावश्यमन्यपक्षनिर्देश एव भवति, स्वपक्षसमाप्तावपि तद्दर्शनात् । अखण्डितत्वाच्च तत्रानुमतिरेव सूच्यते । ---- यदुक्तम् — ' न्यायमञ्जरीग्रन्थे १ ९० पृष्ठे २०३ पृष्ठे च कुमारिलस्यानीश्वरवादोद्धरण तत्खण्डनं च दृश्यते । स च नाऽप्रामाणिको ग्रन्थकारः, नारोप्यखण्डक ' इति, तदप्युपहासास्पदम्, प्रत्यक्ष चक्षुष्कन्यायात् । तथाहि- — । केनचित् कश्चिदुक्को भवान् मृत इति अमुकेनोक्तमिति । तेनोक्तं यदह प्रत्यक्ष एव त्वत्समक्ष उपस्थितोऽस्मीति; तदापि तेनोक्तं सत्यमेतत् परं स कदाचिदप्यनृतं न ब्रूते, इतिवत् । यदि त्वया छिद्रान्वेषणपरायणेनापि भट्टपादकृतमीश्वरखण्डन न दृष्टम्, सृष्टिप्रलयादिवर्णन च तन्त्रवार्त्तिके दृष्ट तत्खण्डन च दृष्टं तदापि परप्रत्ययनेयबुद्धितया भट्टपादस्य शबरस्वामिनश्चानीश्वरवादित्वमेवोच्यते, तदा तस्य किमौषधं स्यात्? किञ्च यदीश्वराऽप्रतिपादनेनेवानीश्वरवादित्व स्यात्, तदा जैमिनेरपि तथात्व किन्न स्यात् । न च त्वया तथाऽभ्युपगम्यते । यस्य माधवकृतशङ्करदिग्विजयस्याश्रयेण त्वयापि भट्टपादस्येतिवृत्तमिव लिखितमात्मबलिदानरूप- मालक्ष्य श्रद्धया तच्चरणयोर्भावत्कं शिरोऽवनत भवति, तत्रैव तस्य स्वामिकार्तिकस्यावतारत्वमप्युक्तमिति तस्यानीश्वर- वादित्व मनसापि न कल्पयितुं शक्यते । किञ्च श्लोकवार्तिके - 'विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे । श्रेय प्राप्तिनिमित्ताय दोहरी मान्यता वाला है । इस ईश्वर का प्रतिपादन करने वाले दयानन्द भी द्विजिह्न हो जायेगे और उनका पक्ष भो मसत्य माना जायगा । यदि निकृष्ट गुणो के अभाव में निर्गुण और उत्कृष्ट गुणो की सत्ता के कारण ईश्वर को सगुण भी माना जायगा, तो प्रस्तुत प्रसंग में इसी दृष्टि का अवलम्बन आप क्यों नही करते कि वेद की अपौरुषेयता को अस्वीकार कर केवल अनुमान सिद्ध ईश्वर को न - हुए हम वेद सिद्ध ईश्वर को स्वीकार करते है । इसमें विरोध करने की स्थिति ही कहाँ है । ब्रह्मात्मतत्त्व का साक्षात्कार होमानते भी जाने पर वह तत्व सजातीय, विजातीय और स्वगत भेद से शून्य अवश्य हो जाता है, किन्तु उससे पहले उसकी प्रतिपत्ति ( ज्ञान ) कराने वाले प्रमाता, प्रमाण प्रभृति सारे व्यवहार उसी रूप में गृहीत होते हैं, उस समय उनका बाघ नही होता । 'गुणवादस्तु' इस जैमिनि सूत्र की व्याख्या के प्रसंग मे आपने जो वचन उद्धृत किया है, उसी से यह सिद्ध हो जाता है कि मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास आदि के प्रमाण पर सृष्टि और प्रलय की सत्ता स्वीकार की जाती है और प्रत्येक सृष्टि तुल्यलिंग न्याय से तुल्य नाम, प्रभाव, व्यापार वाली वस्तुओ की स्थिति के कारण इनमें अनित्यता न आकर प्रवाहनित्यता विद्यमान रहती है । इस उद्धरण का खण्डन आपने नही किया । इससे यह सिद्ध है कि आप इसमें वर्णित सिद्धान्त को सही मानते हैं । ' न्यायमंजरी ग्रन्थ में ( पृ ० १ ९०, २०३ ) कुमारिल को अनीश्वरवादी के रूप में उद्धृत कर उनके मत का खण्डन किया गया है । जयन्त अप्रामाणिक ग्रन्थकार नही है और न गलत आरोप लगाने वाला है । आपका यह कथन भी उपहासास्पद है । प्रत्यक्ष- चक्षुष्क न्याय की यहाँ प्रवृत्ति हुई है । इसका अभिप्राय यह हैं कि जैसे कोई किसी से कहता है कि आप मर गये हैं, ऐसा कोई कह रहा था । मैं तो जीता-जागता तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, ऐसा करने पर वह फिर बोलता है कि आपका कहना तो ठीक है, पर जिसने मुझे आपके मरने की खबर दी वह कभी असत्य भाषण नही करता । ठीक यही स्थिति इस समय आपकी है । छिद्रान्वेषण में लगे हुए आपने उनके किसी अन्य में ईश्वर का खण्डन नही देखा, तब भी मात्र दूसरे के कहने से आपने शबर स्वामी और कुमारिल को अनीश्वरवादी मान लिया, तो आपकी इस समझ का हमारे पास क्या इलाज हो सकता है? अपि च, ईश्वर का प्रतिपादन न करने मात्र से यदि आप उनको अनीश्वरवादी मानते है, तब जैमिनी को भी आप अनीश्वरवादी क्यों नही मानते? आप माघव कृत शंकर दिग्विजय के सहारे भट्टपाद का इतिहास अपने ग्रन्थ में लिखतें हैं और उनके बलिदान की कथा को सुनकर उनके सामने श्रद्धा से आपका सिर झुक जाता है, किन्तु उसी ग्रन्थ में भट्ट कुमारिल को स्वामी कार्तिकेय का अवतार बताया गया है । ऐसे भट्टपाद भला अनीश्वरवादी कैसे हो सकते
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वेदार्थपारिजातः १८४७ नमः सोमार्धधारिणे ॥ ' इति स्पष्ट सोमार्धधारिणो ज्ञानदेहस्य त्रिनयनस्य वन्दनं दृश्यते । किञ्च, संन्यासोपनिषदृष्ट्या वेदोऽपि परमेश्वरस्यावतारभूत एव । 'वेदो नारायणः साक्षात् स्वयम्भूरिति शुश्रुम' इति श्रीमद्भागवते । तेन वेदभक्तः परमेश्वरभक्त एव भवति । तत एव मनुना वेदनिन्दकस्यैव नास्तिकत्वमुक्तम् । दयानन्दस्तदीयास्तु पुस्तकचतुष्टयाति- रिकाना सहस्राधिकमन्त्रसहिताब्राह्मणारण्यकोपनिषद्पाणां वेदाना न केवलं निन्दकाः खण्डकाश्च प्रत्युत तद्वेदत्व चापल- पन्तीति मनुदृष्टयेव ते किंभूता इति ते स्वयं विभावयन्तु । अद्वैत न शङ्कराचार्यस्य स्वोपज्ञं, नापि भर्तृप्रभृतीना स्वोपज्ञम्, किन्तु ' एकमेवाद्वितीयम्' (छ० उ० ६।२।१ ) ' नेहनानास्तिकिञ्चन' ( बृ० उ ० ४|४ | १९ ) इत्यादिवेदप्रतिपादितम् । कुमति- निवारणेन गौडपादादिभिस्तदेव समर्थितमिति । यत्सु — ' बौद्धजैनदार्शनिकैर्वेदे परश्मेश्वरे सृष्टेरीश्वरकर्तृकत्वे च समुद्भावितानामाक्षेपाणां निराकरणेऽसमर्थाः शबर स्वामिभट्टपादादयः 'सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पण्डित.' इति न्यायेन परमेश्वराय तदीयजगत्कर्तृत्वाय च तिला- जलिं दत्त्वा वेदरक्षार्थं जगतोऽनादित्वमनीश्वरकर्तृत्वं साधयितुं प्रयतितवन्त' इति तदपि दोर्जन्यमूलकम्, निर्मूलत्वात् । श्रीशङ्कराचार्यतुल्या ब्रह्मवादिनो येषा मतमाद्रियन्ते, 'शास्त्रतात्पर्यविद' इति श्रद्धाभरेण यात् स्मरन्ति च तेषां बौद्धादि- मतनिराकरणासामर्थ्यवर्णनं दौर्जन्यमूलकमेव । यत्तु ( ६० पृष्ठे ) 'मीमांसकाना याज्ञिकाना च यज्ञीयकर्मकलापेषु मतभेदोऽस्ति । मीमांसका मीमांसान्याय- सिद्धस्य कर्मणः पक्षं गृह्णन्ति । याज्ञिकाः शाखाब्राह्मणश्रोतसूत्राणां यथाश्रुतशब्दार्थाश्रयेण कर्म कुर्वन्ति, न्यायसिद्धं मीमांसकपक्षमुपेक्षन्ते ' इति, तदेतदतीवाशुद्धम्, युधिष्ठिरातिरिक्तस्य तादृशस्य मीमांसकस्य सर्वथाऽसिद्धत्वात् । वस्तुतस्तु यो जैमिनिशाबरभाष्यकुमारिलादिमत न मनुते, न स मीमांसको भवति । स मीमासकम्मन्यः केवलं भ्रमोत्पादनायैव मीमांस- है? श्लोक वार्तिक के प्रारंभ में कुमारिल भट्ट सोमार्धधारी ज्ञानदेह तीन नेत्रो वाले भगवान् शिव की वन्दना करते है ( संन्यासोप- निषद् और श्रीमद्भागवत मे भी वेद को साक्षात् नारायण बताया गया है । अत. जो वेद का भक्त है, वह अवश्य ही परमेश्वर का भी भक्त है | मनु ने इसी आधार पर वेदनिन्दक को नास्तिक कहा है । दयानन्द और उनके अनुयायी वेद की चार शाखाओं के सिवाय अन्य समस्त शाखाओं और ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषदो को वेदवाह्य मानकर केवल उनकी निन्दा ही नही करते, किन्तु उनका खण्डन भी करते हैं । वे उनको वेद ही नही मानते । ऐसी स्थिति में मनु के वचन के अनुसार वे क्या है? इसका विचार वे स्वयं ही करें | अद्वैत की आद्य कल्पना शंकराचार्य अथवा भर्तृ प्रपंच आदि ने नहीं की है, किन्तु 'एकमेवाद्वितीयम्' 'नेह नानास्तिकिञ्चन' इत्यादि वेद वचनों द्वारा वह प्रतिपादित है । कुतर्कों का निरास कर गौडपाद प्रभृति ने पुनः उसकी प्रतिष्ठा की है । आगे आप लिखते है - ' बौद्ध और जैन दार्शनिकों ने वेद, परमेश्वर और ईश्वरकृत सृष्टि जैसे विषयो पर जो अपने तर्क दिये, उन आक्षेपो के समाधान में असमर्थ होकर शबर स्वामी, भट्ट कुमारिल आदि ने ' सर्वनाशे समुत्पन्ने' न्याय का सहारा लेकर परमेश्वर और तत्कृत सृष्टि के सिद्धांत को तिलाजलि देकर वेद की रक्षा के लिये जगत् को अनादि और अनीश्वरकर्तृक वे मानने लगे' । किन्तु आपका यह कथन भी दुर्जनता का सूचक हैं, श्रीशंकराचार्य के तुल्य ब्रह्मवादी जिनके मत का आदर करते हुए 'शास्त्रतात्पर्यविदः । इस तरह से बहुवचन का प्रयोग कर जिनको श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं, वे बौद्ध प्रभृति के आक्षेपो का उत्तर देने में असमर्थ थे, यह कथन अन्य दिशा की ओर संकेत कर सकता है । पृ० ६० पर आप लिखते है-'मीमांसकों और याज्ञिकों में यज्ञीय कर्मकाण्ड के प्रति मतभेद था । मीमासक मीमांसा के न्याय से सिद्ध कर्म का पक्ष ग्रहण करते थे और याज्ञिक शाखा, ब्राह्मण, श्रौतसूत्र ग्रन्थो के सहारे कर्म का स्वरूप निर्धारित करते थे, तथा न्यायसिद्ध मीमासा पक्ष की उपेक्षा करते थे । यह कथन भी अप्रामाणिक है । वे मोमासक ही नही हैं, जो कि शाखा, ब्राह्मण, श्रौतसूत्र प्रभूति को प्रमाण नही मानते और न जैमिनि, शबरस्वामी, कुमारिल को ही प्रमाण मानते हैं । आस्तिको को मात्र धोखा देने के लिये आपने अपना मीमासक नाम रख लिया है । व्यास, जैमिनि, शबर, कुमारिल, शंकराचार्य, वाचस्पति, रामानुज, विद्यारण्य, वेदान्त- f
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वेदार्थपारिजातः १८४८ विद्यारण्य वेदान्तदेशिकादयो न कत्वेनात्मानं ख्यापयति । व्यासजैमिनिशबरकुमारिलशंकराचार्यवाचस्पतिरामानुजाचार्य । न हि सूत्रातिरिक्तो शाखाब्राह्मणादीनामवेदत्वं मन्यन्ते । सर्वत्र वेदनाम्ना ब्राह्मणादिवचनान्येवोद्धृत्य सूत्रैविचारयन्तिन कापि सम्भवति । 'न विधौ परः, न्यायोनास्तीत्यप्युक्तमेव । यथाश्रुतार्थपरित्यागस्तु बलवद्वाधकोपनिपातनमन्तरा च मन्त्राणा व्याख्यानं कुर्वन्ति शब्दार्थं' इति शाबरभाग्यवचनात् । सायणोव्वटमहीधरादयस्तु मन्त्रब्राह्मणश्रौतसूत्रानुसारेणैव केवलं दयानन्द एव सर्वोपेक्षया स्वातन्त्र्येण यत्किञ्चित् प्रलपति । - ' जातम् । यत्तु पाणिनीयव्याकरणपठनपाठनक्रम परिवर्तन वन्मीमासाशास्त्रस्यापि पठनपाठनक्रमपरिवर्तनं न समीचीनम्, मात्सर्यनिबन्धन- स्वाशास्त्रीयमतभेदप्राधान्येन खण्डनमण्डनाभ्या शास्त्रतात्पर्यंदुरूहता भवति' इति, तदपि त्वात् । ' अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दा प्रकुर्वते' इत्याभाणकविषयत्वात् । वेदसंज्ञामीमासानिबन्धे- 'वेदश्रुत्याम्नायसज्ञाविचार' इति शीर्षकेण अन्तोदात्तस्य वेदशब्दस्य कुशमुष्टि-१७१४ ), रूपोऽर्थो यज्ञीयपदार्थविशेष एव । तत्र वेदेन वेदे वा असुराणा वित्तं वेद्यमविन्दत तद्वेदस्य वेदत्वम्' ( तै० सं ० ' वेदोऽसि ' ( वा ० स ० २।२१ ), ( काण्वसं० १/७/७५ ) 'पत्नी वेद मुञ्चप्रमुञ्चति' इत्यादिषु आद्युदात्तो वृषादिगणस्थो यौगिक वेदशब्दो ज्ञानपर्यायः' इत्यसङ्गतम्, तथात्वे ज्ञानसामान्ये बौद्धादिज्ञानेष्वपि वेदशब्दप्रयोगापत्तेः । तस्मान्न' प्रत्यक्षेणानुमत्यासर्वत्र • एवार्थः, किन्तु पङ्कजादिशब्दवद् योगरूढ्या मन्त्रब्राह्मणसमुदाय एव वेदशब्दप्रयोग | तदुक्त भट्टपादे: - वा यस्तूपायो न बुद्धयते । एवं विदन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य वेदता ॥ ' इति । 1 - ' ',,, यत्तु मन्त्रसंहिता एव वेदवाच्या इति तदपि मन्दम् दयानन्दातिरिक्तस्य कस्य चिदन्यस्य तादृशमता- ऽसम्प्रतिपत्तेः । ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' इति सूत्रव्याख्याया हरदत्त धूर्तस्वामिभ्या 'कैश्चिन्मन्त्राणामेव वेदत्वमाश्रितम् वचनो को वेद ही मानकर, देशिक प्रभृति प्राचीन विद्वान् शाखा ब्राह्मण प्रभूति को भी वेद ही मानते है । सर्वत्र ब्राह्मण । प्रभृतिबिना किसीके बड़े बाघक के उपस्थित उनकी व्याख्या करते है । सूत्रो के प्रति न्याय नाम की कोई अनोखी चीज नही होती इसका स्पष्ट उल्लेख किया है । सायण, ' ' हुए यथाश्रुत अर्थ का परित्याग नही किया जाता । न विधी इत्यादि स्थलों पर शबर स्वामी ने की है । केवल स्वामी दयानन्द उव्वट, महीधर प्रभृति ने मन्त्र, ब्राह्मण श्रौतसूत्रो के आधार पर ही वेद की और कर्मकाण्ड की व्याख्या ही इन सबकी उपेक्षा कर स्वतन्त्र रूप से मनमानी व्याख्या करते है । शास्त्र के पठन -पाठन 'पाणिनीय व्याकरण के पठन-पाठन का क्रम जैसे आजकल बदल गया है, उसी तरह से मीमासा दुख्हता के क्रम में भी परिवर्तन आ गया है । इस नई पद्धति में परस्पर ही खण्डन मण्डन की प्रधानता हो गई और इसीलियेकरते शास्त्रहै । मे आ गई, यह कथन भी समीचीन नहीं है, 'अशक्तास्तत्पद गन्तुं ततो निन्दा प्रकुर्वते' वाली कहावत को ये चरितार्थ शब्द का अर्थ ' ' ',, वेदश्रुत्याम्नायसंज्ञाविचार शीर्षक से वेद संज्ञा की मीमासा करते हुए आपने लिखा है कि अन्तोदात्त माध्यन्दिनसंहितावेद कुशा की मुष्टि होता है । यह एक यज्ञ में उपयुक्त होने वाला कुश निर्मित पदार्थ है । ऊपर उद्धत तैत्तिरीयसंहिता कण्वसंहिता प्रभृति के वचनों में प्रयुक्त वृषादिगण में पठित आद्युदात्त वेद शब्द, ज्ञान का पर्यायवाची है ।' किन्तु यह कथन सही नही है,। क्योंकि ऐसा अर्थ करने पर बौद्ध प्रभृति के शास्त्रो के लिये भी सामान्य ज्ञानका वाचक होने से वेद शब्द का प्रयोग होने लगेगा सर्वत्र यौगिक अर्थ ही स्वीकार नही कर लिया जाता, किन्तु पंकज प्रभूति शब्दो के समान योगरूढ के आधार पर केवल मन्त्र- ब्राह्मणसमुदायात्मक शास्त्र के लिये ही वेद शब्द का प्रयोग मान्य है । जैसा कि भट्टपाद कुमारिल ने कहा है- 'प्रत्यक्ष और अनुमिति से भी जिसका ज्ञान नहीं होता, उसको वेद से जाना जाता है, यही वेद का प्रयोजन है । आप केवल मन्त्रसंहिता के लिये वेद शब्द का प्रयोग करते हैं, वह भी गलत है | दयानन्द के अतिरिक्त किसी ने भी 2 इस कथन को मान्यता नही दी है । आप पुनः कहते हैं कि ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' इस सूत्र की व्याख्या में हरदत्त और धूर्त स्वामी कुछ ही मन्त्रों को वेद के रूप में स्वीकार करते हैं, इससे भी यही सिद्ध होता है कि मन्त्रभाग ही वेद है, किन्तु यह आपका भ्रम है, मीमांसा के ग्रन्थों में विषय को स्पष्ट करने के लिये अधिकरण की रचना करते समय काल्पनिक पूर्वपक्ष भी कही कहीं उठा दिया जाता