वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 951–960
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 951–960
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वेदार्थपारिजातः १८४९ ,, इत्युक्तम् तदपि तत्र मूलमिति तदपि तुच्छम् मीमासादिग्रन्थेष्वधिकरणरचनया काल्पनिकपूर्वपक्षोपस्थापनवत् तत्रापि काल्पनिकमतस्यैवोपन्यासात् । यत्तु - ' अन्ये आरण्यकानामुपनिषदा च वेदत्वमाहुः, अन्ये केषाञ्चित् कल्पसूत्राणामपि वेदत्व मन्यन्ते, अन्ये षडङ्गानामपि वेदत्वमाहु. ' इति, तत्सर्वमपि निर्मूलमेव, आरण्यकोपनिषदा ब्राह्मणान्तर्गतत्वेन ब्राह्मणग्रहणेनैव गृहीतत्वात् । कल्पसूत्राणा षडङ्गानां च वेदत्वं तु निर्मूलमेव । वेदवद्वेदविदा वचनमितिवदुपचाराद्वा तत्रवेदत्वमिति । यत्तु— ‘ यत्परः शब्दः स शब्दार्थं ' इति न्यायेन यदपरिभाषितं तत्स्वाभाविकम्, तन्मुख्यम्, यद्वचनविशेषद्वारा परिभाषितं तद्गौण- मिति सर्वसम्मतम् इति, तदपि निर्मूलम्, ' यत्परः शब्दः स शब्दार्थ ' इतिन्यायस्य प्रकृतेऽप्रवृत्तेः । शब्दस्य यत्र प्रातीतिकोऽर्थोऽन्य., तात्पर्यविषयीभूतश्चार्थोऽन्यस्तत्रायं न्याय: प्रवर्तते । यथा 'विष भुङ्क्ष्व' इत्यस्य प्रतीयमानोऽर्थो विषभोजनम्, विवक्षितस्तु शत्रुगृहभोजननिवृत्तिः, एतादृशे स्थले यत्परः शब्द स शब्दार्थं इति न्यायः प्रवर्तते । --- यत्तु -'ऋग्यजुः साममन्त्रानधीयानः श्रोता वा कथयति- ऋग्वेदोऽधीयते, यजुर्वेदोऽधीयते, सामवेदोऽधीयत इति, ऋग्यजुःसामसंहितानां वेदसंज्ञासाधनाय न केनाप्यद्ययावत्प्रयतितम् । ब्राह्मणानामुपनिषदा ञ्चाध्येता ऐतरेयस्याध्ययनं बृहदारण्यक स्याध्ययनं क्रियत इति वक्ति, न ऋग्वेद पठामि, यजुर्वेदं वा पठामीति वदति । ब्राह्मणग्रन्थानामेव वेदत्वज्ञापनाय मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयमिनि प्राचीनसूत्रकारैः सूत्राणि निर्मितानि ' इति तदपि बालभाषितम्, विपरीतस्यैव सुवचत्वात् । वैदिकसम्प्रदायेषु, ऋक्संहिता पठामि, यजुः संहिता पठामि, सामसहितां पठामि' इत्येव व्यवहार । कामृक्संहिता, का यजु: - संहितां, कां वा सामसंहितामिति प्रश्ने तु शाकली संहिता, वाजसनेयिसंहिता माध्यन्दिनी संहिता कौथुमीसंहिता वा पठामि, तथा तैत्तिरीयसहिता, काण्वसंहितां पैप्पलादसंहिता, वा पठामीत्येव व्यवहारः । तथैव ब्राह्मणं पठामि, किं ब्राह्मणमिति है । उक्त आचार्यों ने आपके द्वारा निर्दिष्ट स्थल पर इसी तरह के पूर्वपक्ष का उल्लेख किया है । आगे आप लिखते है - अन्य आचार्य आरण्यक और उपनिषदो को भी वेद मानते है । कुछ आचार्य कल्पसूत्रो को भी वेद ही मानते है तथा अन्य आचार्य षडङ्गो को भी वेद के ही अन्तर्गत मानते है । किन्तु इस तरह की सारी बातें निराधार है । आरण्यक और उपनिषद् ब्राह्मण का ही भाग है, अतः ब्राह्मण पद से उक्त सूत्र के अनुसार इन सबका प्रहण हो ही जायगा । कल्पसूत्र और षडगो के लिये वेद के प्रयोग की बात निराधार है, अथवा वेदविद् का वचन वेद के समान है, इस आधार पर इनके लिये ही गौण रूप से वेद शब्द का प्रयोग किया ही जाता है । आपने 'यत्पर. शब्द इस न्याय का अर्थ किया है कि 'जो अपरिभाषित है, स्वाभाविक है, उसी को मुख्य माना जाता है और विशेष वचन से जिसकी परि- भाषा की जाती है, वह गौण अर्थ होता है, यह सर्वसमत सिद्धान्त है, आपका यह कथन भी अप्रासंगिक है, प्रस्तुत न्याय की यहाँ प्रवृत्ति हो नही होती । शब्द का स्पष्ट प्रतीत हो रहा अर्थ भिन्न हो और उसका तात्पर्य किसी दूसरे ही अर्थ को प्रकट करता हो, ऐसे ही स्थलो पर ' तत्पर' न्याय की प्रवृत्ति मानी जाती है । जैसे कि 'विष भुङ्क्ष्व' इसका प्रतीयमान अर्थ ' विषभोजन ' है, और विवक्षित अर्थ ' शत्रु के घर में भोजन का निषेध' है । ऐसे ही स्थलो पर प्रतीयमान अर्थ को स्वीकार न कर विवक्षित अर्थ को स्वीकार किया जाता है । वेद शब्द का अर्थ करते समय ऐसी कोई दुविधा उपस्थित नही है । 'ऋक्, यजु, और साम मन्त्रो का अध्ययन करनेवाला अथवा श्रोता कहता है कि ऋग्वेद पढा जा रहा है, यजुर्वेद पढा* आ रहा है, सामवेद पढा जा रहा है । ऋक्, यजु, अथवा साम संहिता को वेद बताने के लिये किसी ने भी आज तक कोई प्रयत्न नही किया । इसी प्रकार ब्राह्मण अथवा उपनिषदो का अध्येता ऐतरेय ब्राह्मण का अध्ययन हो रहा है, वृहदारण्यक का अध्ययन हो रहा है, ऐसा कहता है । वह यह नही कहता कि मैं ऋग्वेद पढ रहा हूँ अथवा यजुर्वेद पढ रहा हूँ । इसके उपरान्त भी केवल ब्राह्मण ग्रन्थो को ही वेद बताने के लिये प्राचीन सूत्रकारो ने ' मन्त्र ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' जैसे सूत्र बनाये है', यह कथन भी बालभाषित है, इसके विपरीत भी कहा जा सकता है । वैदिक सम्प्रदाय में ऋक्संहिता को पढता हूँ, यजु संहिता को पढ़ता हूँ, सामसंहिता को पढता हूँ, ऐसा ही व्यवहार प्रचलित है । किस ऋक्, यजु अथवा सामसंहिता को पढते हैं, ऐसा पूछने पर शाकली, वाजसनेयी, माध्यन्दिनी अथवा कौथुमी संहिता को पढता हूँ तथा तैत्तिरीयसहिता, कण्वसंहिता अथवा पैप्पलाद संहिता को पढता है, ऐसा उत्तर देता है । उसी तरह से ब्राह्मण पढता हूँ और विशेष रूप से पूछने पर शतपथ, ऐतरेय, तैत्तिरीय अथवा गोपथ ब्राह्मण पढ़ता हूँ, ऐसा उत्तर देता है । २३२
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वेदार्थपारिजातः १८५० विशेषप्रश्ने शतपथब्राह्मणमेतरेय ब्राह्मण तैत्तिरीय ब्राह्मणं गोपथब्राह्मणं वा पठामीत्येव व्यवहार. | यदि कश्चिद् ऋक्संहिता पठन् ऋग्वेद पठामीति वदति तदा कश्चित् शतपथं पठन्नपि यजुर्वेदं पठामीत्येव वदति । केवल मन्त्राणा वेदत्वं तु केनापि प्रमाणेन न सिद्धयति । परिभाषां लक्षणं वा विना मन्त्राणां ब्राह्मणाना वा वेदत्वमसिद्धमेव । तेन यदि परिभाषया वेदसज्ञात्वेन ब्राह्मणानां गौणमेव वेदत्व तर्हि मन्त्राणामप्यनयैव वेदसंज्ञासिद्धेस्तेषामपि वेदत्वं गौणमेव स्यात्, समानन्यायात् । अत एव ब्राह्मणाना मन्त्राणां च स्वाभाविकमेव वेदत्व लक्षणेन प्रत्याम्यते, न विधीयते, एकशफत्वमश्वस्य लक्षण सास्नादिमत्वं वा गोर्लक्षणमितिवत् । किञ्च, यदि स्वाभाविकस्य लक्षणं परिभाषा वा न भवति, तदा ऋगादीनामपि लक्षण न कर्त्तव्य स्यात् । कृतं तु लक्षण जैमिनिना मन्त्राणाम् ' यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था सा ऋक्, गीतिषु सामाख्या, शेषे यजुः शब्द:' ( जै ० सू० २/ ९/ ३५-३८ ) । यदि परिभाषितविशेषवचनेन कथितमस्वाभाविकं कृत्रिम भवति, तदा ऋक्सामयजुषामेव कृत्रिमत्व पारिभाषिकत्वं गौणत्वं च स्यात् । मन्त्राणामपि लक्षण कृतमेव जैमिनिना-' तच्चोदकेषु मन्त्राख्या ' (जै ० सू० २।११३२ ) इति ॥ ब्राह्मणस्यापि तथैव लक्षण कृतम्, ' शेषे ब्राह्मणशब्दः ' (जै० सू० २| १ | ३३ ) इति । यदि तावता ब्राह्मणाना गौणमेव वेदत्वं तदा मन्त्राणामपि गौणमेव वेदत्व स्यात् । मन्त्रत्वमृक्त्वादिकमपिगौणमेव स्यात् । तथा च वृद्धिमिच्छतो मूलधनस्यापि हानिरिति न्यायापत्तिः । यत्तु - ' यत्र परिभाषाया विशेषसज्ञाया वा प्रवृत्तिर्न भवति, वत्र वेदशब्देन मन्त्राणामेव ग्रहणेन ब्राह्मणानाम- ग्रहणेन च वेदशब्दस्य स्वाभाविकोऽर्थो मन्त्र एव न ब्राह्मणम् इति, तदप्यसङ्गतम्, तादृशस्थलस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । यच्च - ' मन्त्राणा ब्राह्मणानां च वेदसंज्ञा कल्पसूत्रकारैरुक्ता । कल्पसूत्रकारा वेदसंज्ञा ब्राह्मणेषु न प्रवर्तयितुं शक्नुवन्ति, यदि कोई ऋक्संहिता को पढते हुए कहता है कि ऋग्वेद पढ रहा हु, तो कोई शतपथ ब्राह्मण को पढता हुआ भी कहता है कि यजुर्वेद पढ रहा हूँ । इस बागाडम्बर से केवल मन्त्रो की वेदना किसी तरह से सिद्ध नही हो पाती । परिभाषा अथवा लक्षण के बिना मन्त्रों अथवा ब्राह्मणो की वेदता सिद्ध ही नही हो सकती । अतः परिभाषा के आधार पर वेद संज्ञा का निर्णय करने पर ब्राह्मणों के लिये गौण रूप से इस शब्द का प्रयोग माना जायगा, तो उसी आधार पर मन्त्रों की भी पारिभाषिक वेदता सिद्ध होने से उनके लिए भी गौण रूप से हो वेद शब्द का व्यवहार मानना पड जायगा । किसी भी न्याय की प्रवृत्ति समान रूप से ही सर्वत्र होती है । स्पष्ट है कि आपका कथन उचित नही है और मन्त्र तथा ब्राह्मण भाग के लिये उक्त परिभाषा के आधार पर स्वाभाविक रूप से वेद शब्द की प्रवृत्ति मानी जायगी, इसके लिए किसी विधि की आवश्यकता नही है । एक शफ अश्व का लक्षण है और सास्नादिमत्त्व गाय का लक्षण है । यदि स्वाभाविक रूप से मन्त्रब्राह्मणात्मकत्व वेद का लक्षण है । यदि स्वाभाविक रूप स जिसकी प्रतीति होती हो, उसका लक्षण या परिभाषा नही की जाती, तो फिर ऋक् प्रभृति का भी लक्षण नही किया जाना चाहिये, किन्तु जैमिनि ने तो तीन सूत्रों में तीन वेदों के लक्षण किये हैं और इस पर आपको कोई आपत्ति भी नही है । यदि विशेष परिभाषा कर देने से अस्वाभाविकता अथवा कृत्रिमता आ जाती है, तो ऋक→ साम और यजु' की परिभाषा हो जाने के कारण इनमें भी कृत्रिमता और अस्वाभाविकता आ जायगी । 'तच्चोदकेषु मन्त्राख्या' इत्यादि सूत्रो में जैमिनि ने मन्त्र और ब्राह्मण का भी लक्षण किया है । यदि परिभाषा के आधार पर आप ब्राह्मणो में गौण रूप से वेद शब्द का प्रयोग मानते है, तो उसी आधार पर मन्त्रो मे भी गौण वेद व्यवहार मानना पडेगा । इसी तरह से उनमें मन्त्र और ऋक् शब्द का प्रयोग भी गौण माना जायगा । इस तरह से तो ब्याज के लोभ में आपका सूलधन भी नष्ट हो जायगा । आप कहते है कि 'जहाँ पर परिभाषा अथवा विशेष संज्ञा की प्रवृत्ति नही होती, वहीं पर वेद शब्द से केवल भन्त्रों का ही ग्रहण होता है, ब्राह्मणो का नही, अतः वेद शब्द का स्वाभाविक अर्थ मन्त्र ही होता है, ब्राह्मण नही', किन्तु आपका यह कथन ' भी असंगत है, क्योंकि ऐसा कोई स्थल आप दिखा नही सकते । 'मन्त्रो और ब्राह्मणों के लिये वेद संज्ञा का विधान कल्पसूत्रकारों ने 4 किया है । कल्पसूत्रकार ऐसा नही कर सकते, क्योंकि मन्त्रसंहिता और ब्राह्मणों का काल भिन्न भिन्न है' आपका यह कथन भी
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वेदार्थपारिजात १८५१ उभयोः ( मन्त्रब्राह्मणयोः ) भिन्नकात्वाद् भिन्नस्थितिकत्वात् इति, तदपि निर्मूलम् मन्त्रत्राह्मणयोरुभयोरप्यनादित्वेन भिन्नकालत्वासिद्धे • । यत्तु ( ७१ पृष्ठे ) टिप्पण्याम्- पाश्चात्त्यमतानुसारेण ब्राह्मणग्रन्थाना कल्पसूत्राणा च प्रवचनकालो भिन्न । ब्राह्मणग्रन्थाना प्रवचनानि पौर्वकालिकानि, कल्पसूत्राणामपरकालिकानीति । तत्र ब्राह्मणाना न वेदान्तर्गतत्व सम्भवति, ब्राह्मणग्रन्थेषु यदि तस्य वेदशब्दस्य मन्त्राणामेव बोधकत्वम् इति, तदपि पाश्चात्त्यपदचिह्नानुमरणमेव । न च पाश्चात्त्यमतानुसरणं तवापि हितावहम्, तद्रीत्या वेदानामपि पौरुषेयत्वाभ्युपगमात् । ऋग्वेदेऽपि तैर्दशम मण्डलस्य आधुनिक- त्वाभ्युपगमात् । यजुर्वेदस्य तदपेक्षयार्वाचीनत्वमथर्ववेदस्य तु ततोऽप्यर्वाचीनत्व तैरभ्युपेयते । यत्तु - "तानि ज्योतीष्यभ्यातपन् तेभ्यस्तप्तेभ्यस्त्रयो वेदा अजायन्त । ऋग्वेद एवाग्नेरजायत यजुर्वेदो वायोः सामवेद आदित्यात् । स ऋचैव हौत्रमकरोत् यजुषाध्वर्यवम्, साम्नोद्गीथम्' ( ऐ० प्रा० ५१२२ ) अत्रोपक्रमे वेदशब्द- प्रयोगः, उपसहारे च ऋग्यजुःसामशब्दाना प्रयोगः । ऋग्यजुः सामशब्दाश्च मन्त्रवाचका एवेति सर्वसम्मतमेव 1। उपक्रमोप- संहारयोरेकवाक्यतया भाव्यम् । अत एवोपक्रमस्थवेदरूपस्य विशिष्टशब्दस्य मन्त्रवाचकत्वमेव युक्तम् । न च तत्र ब्राह्मणा- नामन्तर्भावः सम्भवति । यतो हि यज्ञेषु मन्त्राणामेव प्रयोगो न ब्राह्मणानाम्, 'स ऋचैव हौत्रमकरोदित्याद्युक्त:' इति, तदपि निमज्जतः कुशकाशावलम्बनम् ऋक्सामयजुषां मन्त्रवाचकत्वेऽपि ऋग्वेदादिशब्दानां मन्त्रब्राह्मणोभयवाचकत्वे बाधाभावात् । ननु वेदशब्देन मन्त्रब्राह्मणयोर्बोधसम्भवे ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद इति ऋगादिशब्दवैयर्थ्यं स्यादिति , चेन्न वेदस्य त्रैविध्यादिबोधनाय तत्प्रयोगस्यानिवार्यत्वात् । न चैव मन्त्राणा त्रैविध्ये सिद्धेऽपि ब्राह्मणाना कथं ।, त्रैविध्यमिति वाच्यम् तद्विधानसंस्कारादिसम्बन्धेन ब्राह्मणानामपि त्रैविध्योपपत्तेः । ऋच पठनीयाः संस्कर्त्तव्या विधातव्या वा यस्मिन् वेदे स ऋग्वेदः, ऋचां बाहुल्यं वा यस्मिन् वेदे स ऋग्वेद इत्यादिव्युत्पत्त्या मन्त्रब्राह्मणसमुदायस्यैव निराधार है, क्योकि मन्त्र और ब्राह्मणग्रन्थ अनादिकाल से प्रवृत्त है । इनका भिन्न काल सिद्ध ही नही हो सकता । पृ० ७१ की टिप्पणि में आप लिखते है-' पाश्चात्य मत के अनुसार ब्राह्मण ग्रन्थो और कल्पसूत्रो का प्रवचन काल भिन्न है । ब्राह्मण ग्रन्थो का प्रवचन पहले और कल्पसूत्रो का बाद में हुआ । ब्राह्मण ग्रन्थ वेद के अन्तर्गत इसलिये भी नही आ सकते कि स्वयं ब्राह्मण ग्रन्थो में भी वेद शब्द से केवल मन्त्रो का ही बोध कराया गया है । किन्तु आपका यह कथन पाश्चात्य पद्धति का अन्धानुकरण मात्र है । यह आपके लिए हितावह नही है, क्योकि उनके मार्ग पर चलने से तो आपको अभीष्ट मन्त्रसहिताओ को भी पौरुषेय ही मानना पड जायगा । पाश्चात्य विद्वान् ऋग्वेद के दशम भण्डल को आधुनिक मानते हैं । यजुर्वेद भी उनके मत से नवीन है और अथर्ववेद तो उससे भी नया है । क्या आप भी उनके इस मत को स्वीकार करेंगे? 'तानि ज्योतीष' इस ऐतरेय ब्राह्मण के वचन में उपक्रम मे वेद शब्द प्रयुक्त है और उपसहार में ऋक्, यजुः और साम शब्दो का प्रयोग किया है । ये शब्द सर्वसंमति से मन्त्रो के वाचक हैं | उपक्रम और उपसंहार मे एकवाक्यता रहनी ही चाहिये । इसी आधार पर उपक्रम स्थित वेदरूप विशिष्ट शब्द मन्त्र भाग का ही वाचक होगा । इसमे ब्राह्मण भाग का अन्तर्भाव नही किया जा सकता । यज्ञो में मन्त्रो का ही प्रयोग होता है, ब्राह्मणों का नही । इसके लिए 'ॠचैव होत्रमकरोत्' इस तरह की स्पष्ट उक्तियाँ भी मिलती है' आपका यह सब कहना भी ' डूबते को तिनके का सहारा' वाली कहावत को चरितार्थ करता है । ऋक, साम और यजु. शब्द भले हो मन्त्रो के वाचक हो, किन्तु ऋग्वेद प्रभृति शब्दो से तो मन्त्र और ब्राह्मण दोनो भागों का बोध होगा । यहाँ पर शंका नही उठाई जा सकती कि वेद से ही यदि मन्त्र और ब्राह्मण भाग का बोध होता है, तो फिर उसके साथ ऋक् आदि शब्दो को जोडना व्यर्थ है, क्योंकि वेदत्रयी का अवबोध कराने के लिये इनका जोड़ा जाना जरूरी है । इससे तो मन्त्रो की त्रिविधता सिद्ध होगी, ब्राह्मणों की त्रिविधता कैसे सिद्ध हो जायगी? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि विधान और संस्कार के सम्बन्ध से ऐसा हो जायगा । ऋजाओ का पाठ, संस्कार अथवा विधान जिस वेद में होता है, उसे ऋग्वेद कहते हैं, अथवा ऋचाओं का जिसमें बाहुल्य है, उसे ऋग्वेद कहते हैं, इस व्युत्पत्ति के आधार पर मन्त्र-ब्राह्मणात्मक समुदाय से ऋग्वेद का प्रयोग सही ही माना जायगा । ऋक, साम और
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वेदार्थपारिजातः १८५२ ऋचः सामानि जज्ञिरे । 'ऋग्वेदत्वोपपत्तेः ऋक्सामयजुर्मंन्त्रा एव वेदा इत्यस्याद्याप्यनिर्णयात् । 'तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत यस्मिन् ब्राह्मणे वेदशब्दस्य पाठोविद्यते तस्य( )., वा० सं ० ३१७ इति मन्त्रस्यापि यथा ऋक्सामयजु ष्वन्तर्भावस्तथैव तस्योत्पत्तिविघायकत्वेनवेदान्तर्गतत्वे का नामानुपपत्ति? न च ऋग्वेदादिशब्देरेव ऋगादीनामृग्वेदादित्वं विधीयतेउद्देश्यविधेयत्वादिकं सम्भवति, ऋगादीना वेदत्वविधायकत्वे मानाभावाच्च । न च समस्तपदे पदभेदः समस्तपदयोर्वा वेदशब्दप्रयोग । अवयविशब्द-समानविभक्तिकत्वानिर्णयात् । मन्त्रब्राह्मणसमुदायस्यैव वेदत्वाद् भवत्येव ऋगादिष्वपि । अत्र,स्यावयवेष्वपि प्रयोगदर्शनात् । न च होत्रमाध्वर्यवं च मन्त्रमात्रनिष्पाद्यम् विधानस्य ब्राह्मणसम्पाद्यत्वात् स्तोत्रशस्त्रयजत्यादिषु मन्त्राणामेव प्रयोगेऽपि यज्ञादिविधाने ब्राह्मणानामुपयोगस्यानिवार्यत्वात् । आदित्या- यत्तु पूर्वोक्तार्थस्य दृढीकरणाय - 'तेभ्यस्ते पानेभ्यस्त्रयो वेदा अजायन्त अग्ने ऋग्वेदो वायोर्यजुर्वेद त्सामवेदः ।... उच्चैर्ऋचा क्रियते, उपाशु यजुषा, उच्चै साम्ना' ( ३३३| ८ ) इति शाबरभाष्यमुद्धृतम्, तदप्यज्ञान- ----, —- विजृम्भितम् तत्रत्यसूत्रभाष्यादेस्त्वद्विपरीतार्थप्रतिपादकत्वात् तथाहि तत्रोपक्रमानुरोधेन ऋक्सामयजुरादिशब्दाना ऋगादिशब्दानाम् ऋग्वे,? मन्त्रवाचकानामपि न ऋगादिमन्त्र वाचकत्वम् किन्तु ऋग्वेदादिपरत्वमिति साधितम् । यदि नहि वस्त्रशब्दस्य दादिशब्दानां च पर्यायवाचकत्वमेव स्यात्तदा किमर्थमुपक्रमन्यायाश्रयणेन ऋग्वेदादिपरत्वसाधनायासः पटार्थबोधनाय न्यायाश्रयणाद्यायासो भवति । , यद्यपि - ऋक्सामयजुषां यदुच्चैस्त्वोपांशुत्वादिधर्मा उक्तास्ते मन्त्राणामेव सम्भवन्ति' इति, तदपि निरर्थकम् भवतीति त्वत्पक्ष- तथात्वे ऋकुशब्दस्य ऋग्वेदार्थतासाधनस्य नैरर्थक्यापत्तेः' । वचनविशेषेण यत्साध्यते तत् कृत्रिममेव वाक्यं त्वात्, मन्त्राणामुच्चैरुच्चारणमेवेष्टं चेत्तदा 'क्रियते ' इति पदं निरर्थकमेव स्यात् । तदातु ' उच्चैर्ऋगुच्चारणीया' इत्येवं का भी जैसे वेदत्रयी में अन्तर्भाव यजुर्मन्त्र ही वेद है, आपका यह मत अभी भी सिद्ध नही हो पाया है । ' तस्माद्यज्ञात्' प्रभृति मन्त्र हो सकती है? ऋग्वेद प्रभृति है, उसी तरह से जिस ब्राह्मण में वेद शब्द का पाठ है, उसको भी वेदान्तर्गत मानने मे क्या आपत्तितो उनकी उत्पत्ति को बताता है, वह शब्द ही ऋगादि के वेदत्व को सिद्ध कर देते है, ऐसा आप नहीं कह सकते, क्योकि उक्त वाक्य , अत. ऋगादि के लिए भी उनमें वेद संज्ञा का विधायक नही हो सकता । मन्त्र ब्राह्मणात्मक समुदाय में ही वेद शब्द प्रयुक्तहोत्रहोताऔरहैआध्वर्यव कर्म केवल मन्त्रों के,, इसका प्रयोग हो ही सकता है । अवयवी का बोधक शब्द अवयवों का भी बोधक होता ही है । हैं । स्त्रोत्र शस्त्र यजति, सहारे सम्पन्न नही हो सकते क्योकि ये सब विधान ब्राह्मण ग्रन्थो की सहायता से ही सम्पन्न होते किया प्रभृति में यद्यपि मन्त्रों का ही उपयोग होता है, किन्तु यज्ञादि के विधान मे ब्राह्मण का अनिवार्य रूप से उपयोग जाता है । अपने पक्ष की दृढता के लिये 'तेभ्यस्तेपानेम्यः' इत्यादि श्रुति वचनो को उद्धृत करने वाले शावर भाष्य को आपने प्रमाण आदि का के रूप में उपस्थापित किया है, वह भी आपने अपने अज्ञान का ही तमाशा दिखाया है । आपके द्वारा उद्धृत स्थल के सूत्र, भाष्य के होते अभिप्राय आपके कथन से विपरीत ही है । वहाँ पर उपक्रम के अनुरोध से ऋक्, साम, यजु प्रभृति शब्दों की मन्त्रवाचकता ऋग्वेद प्रभृति शब्दो भी ऋगादि मन्त्रवाचकत्व नहीं है, किन्तु उनका अर्थ ऋग्वेद आदि ही सिद्ध करता है । यदि ऋचा औरही होगा । वस्त्र शब्द का हुए को पर्यायता ही हो, तब उपक्रमन्याय का सहारा लेकर उसकी ऋग्वेदादि परता सिद्ध करने का प्रयत्न व्यर्थ अर्थ पट करने के लिये किसी न्याय की सहारा लेने की आवश्यकता नही पडती । है । यह 'ऋक्, साम और यजुर्मन्त्रो के लिये जो उच्चैस्तव और उपाशुत्य धर्म बताये गये है, वेविशेषमन्त्रोसे जोके हीसिद्धहो कियासकते जाता है, कथन भी निरर्थक है, ऐसा हो तो ऋक् शब्द का अर्थ ऋग्वेद करने का प्रयत्न व्यर्थ जायगाअभीष्ट। वचनहोता, तो उस स्थिति मे 'क्रियते' इस,, वह कृत्रिम होता है यह आपका मानना है । मन्त्रों का उच्च स्वर से उच्चारण ही यदि करना चाहिये यही ' ' ( क्रिया का प्रयोग निरर्थक हो जायगा । उस स्थिति में उच्चैर्ऋगुच्चारणीया ऋषा का उच्च स्वर से उच्चारण का अनुष्ठान वाक्य का स्वरूपं होता । क्रियते पद का प्रयोग होने से उक्त वाक्य का अर्थ यह होता है कि ऋग्वेदोक्त और सामवेदोक्त कर्मों
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वेदार्थपारिजात १८५३ भवेत् । तस्मादत्र ऋग्वेदोक्तकर्मणा सामवेदोक्तकर्मणां चोच्चैरनुष्ठानम्, यजुर्वेदोक्तकर्मणामुपाश्वनुष्ठानमुक्तम् । कर्मानुष्ठाना- दितरत्र तु यजुषामप्युच्चैरुच्चारण भवति । तस्मान्न ब्राह्मणेषु श्रूयमाण-ऋगादिशब्दो मन्त्राणामेव वाचकः । यदपि ब्राह्मणाना वेदसंज्ञाविधायकं किञ्चिदपि वचनं ब्राह्मणग्रन्थेषु नोपलभ्यते, तेन ज्ञायते यद् वेदशब्दस्य मुख्योऽर्थो मन्त्र एव इति, तदप्ययुक्तम्, हेत्वाभासत्वात् । ब्राह्मणाना वेदसंज्ञाविधायकं वचनं ब्राह्मणेषु नोपलभ्यते, तेन ज्ञायते वेदशब्दस्य ब्राह्मणमेवार्थं इति विपरीतस्यापि सुवचत्वात् । वस्तुतस्तु अथर्वमन्त्रेषु ब्राह्मणशब्देनैव सर्वस्यैव वेदस्य ग्रहणाद् ब्राह्मणस्य वेदत्वं सुस्फुटम् ॥ तथाहि- यद्यन्तरिक्षे यदि वात आस यदि वृक्षेषु यदि वोलपेषु । यदश्रवन् पशव उद्यमानं तद् ब्राह्मण पुनरस्मानुपैतु ॥ ( अथर्व० ७ ६८। १ ), पुनर्मैत्विन्द्रिय पुनरात्मा द्रविणं ब्राह्मण च । पुनरग्नयो धिष्ण्या यथा स्थाम कल्पयन्तामिहैव ॥ १ ॥ ( अथर्व ७७६९ १ ) इति ।
यदप्युक्तम् — कल्पसूत्रकारैः स्वस्वकार्यनिर्वाहार्थं यथा अन्या विशिष्टा: पारिभाषिक्यः सज्ञा निर्मितास्तथैव तेषां वेदसज्ञापि पारिभाषिकी । न च पारिभाषिकोऽर्थो मुख्यो भवति । स्वाभाविकत्वे परिभाषावैयर्थ्यात् । तस्मान्मन्त्रा- णामेव मुख्या वेदसज्ञा' इति, तदपि तुच्छम् उक्तपरिभाषालक्षणाद्यनङ्गीकारे मन्त्राणामपि वेदसंज्ञानुपपत्तेरुक्तत्वात् । तथात्वे मन्त्राणा वेदसज्ञाया ऋक्सामयजुषा मृगादिसज्ञाया मन्त्रसंज्ञायाश्च कृत्रिमत्वान्मुख्यत्वानापत्तेः । यत्तु स्वमतपोषणाय एवं वारे अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासपुराणम्' ( बृ० उ० २|४| १० ) इति बृहदारण्यकभाष्ये ' यदृर्वेदोयजुर्वेदोऽथर्वाङ्गिरसश्चतुर्विधं मन्त्रजातम्' इति शङ्कराचार्यभाष्योद्धरणम्, तदपि मोह- मूलकम्, शङ्कराचार्यवचनस्य प्रामाण्याभ्युपगमे समाजिसिद्धान्तस्यैव दत्तजलाञ्जलितापातात् । शङ्कराचार्यैस्तुमन्त्रब्राह्मण- समुदायवाचको वेदशब्दः समुदायिनि मन्त्रे प्रयुक्तः, मन्त्रेतरभागस्य ब्राह्मणस्येतिहासपुराणादिशब्देरुपदिश्यमानत्वात् । उच्च स्वर से तथा यजुर्वेदोक्त कर्म का अनुष्ठान धीमे स्वर से करना चाहिये । कर्मानुष्ठान से अतिरिक्त समय याजुष मन्त्रों का उच्चारण भी उच्च स्वर से ही किया जाता है । इससे स्पष्ट है कि ब्राह्मणो मे श्रूयमाण ऋगादि शब्द केवल मन्त्रो का ही वाचक नही है । 'ब्राह्मण ग्रन्थो की वेद संज्ञा का विधायक कोई वचन ब्राह्मण ग्रन्थो मे उपलब्ध नही होता, इससे ज्ञात होता है कि वेद शब्द का अर्थ मन्त्र ही है' यह कथन भी अयुक्त है, हेत्वाभास से ग्रस्त है, क्योकि आपके कथन के ठीक विपरीत - ब्राह्मणो की वेद संज्ञा का मुख्य विधायक वचन ब्राह्मणो में उपलब्ध नही होता, इससे ज्ञात होता है कि वेद शब्द का अर्थ ब्राह्मण ग्रन्थ ही होगा, ऐसा भी यदि कह दिया जाय, तो उसका आपके पास कोई उत्तर नही है । वस्तुत देखा जाय तो अथर्ववेद के मन्त्रो मे ब्राह्मण शब्द से ही सारे वेद का,.... ', ' ग्रहण किया गया है अतः यद्यन्तरिक्षे तद् ब्राह्मणं पुनरस्मा ० और पुनर्मैत्विन्द्रिय द्रविण ब्राह्मणं च इन अथर्वमन्त्रों के प्रमाण पर ब्राह्मण भाग भी वेद के अन्तर्गत है, यह स्पष्ट हो जाता है । 'कल्पसूत्रकारों ने अपना अपना काम चलाने के लिये अन्य अनेक विशिष्ट परिभाषाएँ बना ली, उसी तरह से उनकी वेद सज्ञा भी परिभाषिक है । यह पारिभाषिक अर्थ मुख्य नही होता, क्योंकि स्वाभाविक होने पर परिभाषा की आवश्यकता नही रहती । 1 इसलिये मन्त्रो की ही मुख्य वेदसंज्ञा मानी जायगी' आपका यह कथन भी गलत है, क्योकि उक्त परिभाषा के अनुसार लक्षण को न स्वीकार करने पर मन्त्रों की भी वेदसंज्ञा सिद्ध न हो सकेगी । आपकी ही बात मान ली जाय तो मीमासाशास्त्र में की गई मन्त्रों की ' वेद संज्ञा; ऋक्, साम और यजुः की ऋगादि संज्ञा और मन्त्र संज्ञा के कृत्रिम हो जाने से इनमें भी पुरुष रूप से देदादि शब्दो का प्रयोग न होकर गौण प्रयोग माना जायगा । अपने मत की पुष्टि के लिये आप 'एव वा अरे' इस वृदहारण्यक उपनिषद् के शाकरभाष्य में उद्धृत 'यदृग्वेदो...... चतुविधं मन्त्रजातम्' इस वचन को उद्धृत किया है, वह भी आपके मत के विपरीत हो जायगा । शंकराचार्य के वचन को यदि आप प्रमाण मानते हैं, तो आपको आर्यसमाज के लिये तिलाजलि दे देना पडेगा । शकराचार्य ते मन्त्रब्राह्मणसमुदाय के वाचक वेद संज्ञा 1 3
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वेदार्थपारिजाता १८५४ अन्यथा पुनरुक्तिप्रसङ्गात् । तथाहि तत्रत्य शाङ्करभाष्यम् -' इतिहास इत्युर्वशीपुरूरवसोः सवादादिरूपः उर्वशीहाप्सरा इत्यादि ब्राह्मणमेव । पुराणम्- असद्वा इदमग्र आसीदित्यादि, विद्या -देवजनविद्या ( सौऽयं वेदाद्वहिर्भवतीत्यर्थं इत्यानन्द- गिरिः ) उपनिषद -प्रियमित्येतदुपासीतेत्याद्याः, श्लोकाः -ब्राह्मणप्रभावामन्त्रास्तदेते श्लोका इत्यादय, सूत्राणि -वस्तुसडग्रह- 1 -, वाक्यानि वेदे यथायमात्मेत्येवोपासीतेत्यादि । अनुव्याख्यानानि मन्त्रविवराणानि व्याख्यानमर्थवादा अथवा वस्तु सङग्राहक — वाक्यविवरणानि, अनुव्याख्यानानि - यथा चतुर्थाध्यायः आत्मेत्येवोपासीतेत्यस्य, यथा वा अन्योऽसावन्योऽहम-, - ' स्मीति न स वेद यथा पशुरेवमित्यस्याध्यायशेषः मन्त्रविवरणानि व्याख्यानानि एवमष्टविध ब्राह्मणम् इति शाङ्कर- भाष्यानुसारेणैव ब्राह्मणं महतो भूतस्य निःश्वसित मेवेति सिद्धम् । न तु मन्त्रविशेषा एवेतिहासादयः, सूत्रानुव्याख्यानादीना मन्त्रेष्वनुपलम्भात् । कथञ्चित्तथा कल्पने तु पुनरुक्तिरेव स्थात् । यथा नित्या एव शब्दार्थसम्बन्धा व्याकरण-कोष- व्यवहारादिभिर्ज्ञाप्यन्ते, नासन्तः क्रियन्ते, यथा वा ऋक्त्वादिक मन्त्रत्वादिकं च सत्यमेव लक्षणैर्बोध्यते, यज्ञादिस्वरूप च सत्यमेव परिभाष्यते, तथैव सदेव मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदत्व लक्षण -परिभाषादिभिबोध्यते, न क्रियते । अन्यथा सम्बन्धादीना- मपि कृत्रिमत्वापत्तेः । यथा शब्दार्थसम्बन्धा नोपदेशमन्तरा ज्ञायन्ते तथैव मन्त्रत्वमृक्त्वादिक वेदत्वं च नोपदेश- मन्तरा ज्ञायन्ते, अन्यथा सर्वेषामपि तज्ज्ञत्वापत्ते । यदप्युक्तम् —'कृष्णयाजुषश्रौतसूत्रेष्वेव मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयमिति सूत्रं लभ्यते । कृष्णयजुःशाखिना- मापस्तम्बसत्याषाढबौधायनादि श्रोतसूत्रेष्वपि तादृश सूत्रं नोपलभ्यते । ऋग्वेदसम्बन्धिषु शाङ्खायनाश्वलायन कात्यायन- श्रौतसूत्रेषु सामवेदीय ब्राह्यायणलट्यायनादिश्रौतसूत्रेषु तादृश सूत्रं नोपलभ्यते । एतद्वैषम्यस्येदमेव कारणं यद् ऋक्-शुक्लयजुः-, सामसंहितास मन्त्रा एव केवलाः सन्ति न ब्राह्मणानि । तद्वैपरीत्येन कृष्णयजुषः समस्तशाखासु मन्त्रैः सहैव ब्राह्मणानि पठितानि । तस्माद्यासु संहितासु मन्त्रा एव पठितास्तासा वेदत्वं लोकप्रसिद्धमेवासीत् । तदीयश्रौतसूत्रकारैः का प्रयोग समुच्चित मन्त्र के लिये किया है, क्योकि इससे पहले मन्त्रभिन्न ब्राह्मणभाग का उल्लेख इतिहास, पुराण प्रभृति शब्दो से किया जा चुका है । ऐसा न करने पर पुनरुक्ति दोष होगा । वहाँ का पूरा भाष्य इस प्रकार है-'उर्वशी हाप्सरा' इत्यादि ब्राह्मण वाक्यो में उर्वशी और पुरूरवा का संवाद वर्णित है । यह इतिहास कहलाता है । ' असद्वा इदमग्र आसीत्' इस तरह के वाक्य पुराण के अन्तर्गत आते हैं' । इसी तरह से यहाँ पर विद्या, उपनिषद्, सूत्र, अनुख्याख्यान और व्याख्यान शब्दो की व्याख्या कर शाकरभाष्य मे बताया गया है कि इस तरह ब्राह्मण आठ प्रकार के होते हैं, और यह पूरा वाड्मय उस महान् भूत ब्रह्म का निश्वास स्वरूप है । इतिहास प्रभृति इन आठो अंगो का मन्त्रो मे समावेश नही हो सकता, क्योकि सूत्र, अनुयाख्यान प्रभृति की मन्त्रो मे उपलब्धि हो ही नही सकती । जैसे नित्य वर्तमान शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध व्याकरण, कोष, व्यवहार आदि से जाने जाते है, अविद्यमान की कल्पना नही की जाती, अथवा जैसे पहले से बिद्यमान ऋक्त्व और मन्त्रत्व का ही ज्ञान लक्षणो से कराया जाता है और पहले से विद्यमान ही यज्ञ आदि के स्वरूप को परिभाषा के द्वारा भी समझाया जाता है, उसी तरह से पहले से विद्यमान मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद को परिभाषा के द्वारा पुनः समझाया जाता है । ऐसा न मानने पर सम्बन्ध प्रभृति की भी कृत्रिमता हो जायगी । जैसे शब्द और अर्थ के सम्बन्ध उपदेश के बिना ज्ञात नही होते, उसी तरह से मन्त्रत्व, ऋक्त्व और वेदत्व का ज्ञान भी उपदेश के बिना नही होगा । यदि ऐसा नही हैं, तो सभी को उनका ज्ञान क्यो नही हो जाता? आप कहते है कि 'कृष्ण यजुर्वेद के श्रौतसूत्रों में हो मन्त्र और ब्राह्मण दोनो को वेद बताने वाले सूत्र मिलते हैं । कृष्ण यजुर्वेद की भी आपस्तम्ब, सत्याषाढ, बौधायन प्रभृति के श्रौतसूत्रों में यह सूत्र नही मिलता । ऋग्वेद आदि के शाखायन, आश्वलायन, कात्यायन श्रौत्रसूत्रो में और सामवेद के ब्राह्मायण, लाट्यायन आदि श्रौतसूत्रों में भी इस आशय का सूत्र नही मिलता । इस विषमता का यही कारण है कि ऋक्, शुक्लयजु और सामवेद की सहिताओं में केवल मन्त्र पठित है, ब्राह्मण नही । इसके विपरीत कृष्णयजुर्वेद की समस्त शाखाओं में मन्त्रों के साथ ब्राह्मण भी पठित है । जिन संहिताबो में केवल मन्त्र ही पढ़े गये हैं, उनको तो लोक में सभी वेद मानते रहे हैं, अतः }उन वेदों के श्रौतसूत्रकारों ने अपने ग्रन्थ में उनकी वेद संज्ञा के विधायक सूत्र को स्थान नहीं दिया । किन्तु जिन I हू
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वेदार्थपारिजात १८५५ स्वग्रन्थेषु तादृश वेदसज्ञाविधायकं सूत्र न लिखितम् । यासु मंहितासु मन्त्रे सह ब्राह्मणानामपि पाठ आसीत्, तासां वेदत्वं लोकप्रसिद्धं नासीदिति स्वशाखाना वेदत्वप्रतिपादनार्थं स्वशाखीयकार्यसिद्धये तच्छाखीयैः श्रौतसूत्रकारैस्तादृश सूत्र निर्मितम् । तस्मान्मन्त्राणामेव वेदसज्ञा; न ब्राह्मणानाम्' इति, तदपि नि सारम्, लोके मन्त्राणां ब्राह्मणाना च वेदत्वप्रसिद्ध्य- प्रसिद्धयोस्तुल्यत्वस्योक्तत्वात् । यथा मन्त्रत्वमृक्त्वादिकं च जैमिन्यादिपरिभाषितमेव, तथैव वेदत्वमपि परिभाषितमेव । न च प्रसिद्धि, प्रत्यक्षादिभ्यो भिन्नं प्रमाणान्तरम्, प्रत्यक्षादिप्रमाणसिद्धस्यैव प्रसिद्धिपदार्थत्वात् । किञ्च, पूर्वं पण्डितयुगप्रति- पादनावसरे ' पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् । मन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेय- बुद्धिः ||' इत्याद्युक्तिषु पुराणनिन्दा मत्वा पण्डितेष्वाक्रोशः प्रकटितः । इदानी तु स्वयुक्त्याभासेनापस्तम्बसत्याषाढकात्यायन- बौधायनादीनामृषीणामसदर्थबोधकत्वं प्रतिपादयन् कथं न जिह्वेति युधिष्ठरः । किञ्चात्मपरमात्मप्रकृत्याकाशादयो नित्यसिद्धा अपि यथा लक्षणैर्ज्ञाप्यन्ते तथैव वेदत्वादिक सिद्धमपि लक्षणैर्ज्ञाप्यत एव । केषाञ्चित्तादृशसूत्राप्रणयनस्येदमेव कारणं यत् कृष्णयजुषामनादिकालाल्लोके वेदत्वं प्रसिद्धमेवासीत्, तत एव तच्छाखीयैः श्रौतसूत्रकारैः सदृशं लक्षणमुक्तम् । शुक्लयजूषि तु पश्चाद् याज्ञवल्क्येनादित्यात् प्राप्तानीति तानि लोके तथा प्रसिद्धानि तच्छाखीयैस्तु प्राचीनान्येव वेदसज्ञाबोधकानि सूत्राण्यभ्युपेतानि । शुक्लयजूंषि नवीनानीति शतपथब्राह्मणेषु च प्रसिद्धमेव । यत्तु कश्चित्तैत्तिरीयशाखां माध्यन्दिन- शाखाया व्याख्या वक्ति, तदसत्, विपरीतस्यैव वक्तुं शक्यत्वात्, प्राचीनस्यैव व्याख्येयत्वमर्वाचीनस्य तु व्याख्यानत्वमेव सम्भवति । समाजिनामदीर्घदशिता दयानन्देन ऋग्वेदभाष्यभूमिकायां ब्राह्मणानामवेदत्वे कात्यायनभिन्नैर्ऋषिभिर्वेद- संज्ञाया अस्वीकृतत्वादित्युक्त्या स्पष्टीकृता । अयं तस्याभिप्रायो यत् कात्यायनेनैव मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञाऽङ्गीकृता, किन्त्वन्यैर संहिताओ में मन्त्रो के साथ ब्राह्मण भी विद्यमान हैं, उनको भी लोक मे वेद के रूप मे सिद्ध करने के लिये उस शाखा के श्रौतसूत्रकारो ने ऐसा सूत्र बनाया । इसको प्रमाण नही माना जा सकता । अतः मन्त्रो की ही वेद सज्ञा मानी जायगी, ब्राह्मणो की नहीं' । किन्तु आपका यह सारा कथन निसार है, क्योकि लोक में मन्त्र और ब्राह्मण की वेद के रूप में प्रसिद्धि होना या न होना कोई अर्थ नही रखता । जैसे मन्त्रत्व, ऋक्त्व आदि की परिभाषा जैमिनि प्रभृति करते हैं, उसी तरह से बेदत्व भी परिभाषा से ही ज्ञात होता है । प्रसिद्धि प्रत्यक्ष प्रभृति प्रमाण से भिन्न कोई नया प्रमाण नही है, क्योकि प्रत्यक्ष प्रभृति प्रमाण से सिद्ध पदार्थ को ही प्रसिद्धि कहा जाता है । पहले पण्डित युग का प्रतिपादन करते हुए आपने 'पुराणमित्येव' इत्यादि कालिदास के श्लोक में पुरातन का विरोध करने वाले पण्डितो पर आक्रोश व्यक्त किया था । अब आप यहाँ पर स्वयं अपनी गलत युक्तियों के सहारे आपस्तम्ब, सत्याषाढ, कात्यायन, बौधायन प्रभृति ऋषियो को असत्य अर्थ का प्रतिपादक कह कर लज्जित नही होते! आत्मा, परमात्मा, प्रकृति, आकाश प्रभृति पदार्थ नित्यसिद्ध है, तो भी इनको लक्षणो के द्वारा समझाया जाता है; उसी तरह से वेदत्व प्रभृति स्वतः सिद्ध पदार्थों को भी लक्षणो के द्वारा समझाया जाय, इसमे आपत्ति की क्या बात है? कुछ शाखाओ ने इस तरह का लक्षण नही किया, इसका कारण यह है कि कृष्ण यजुर्वेद को प्रवृत्ति अनादि काल से थी और उसमें वेद का लक्षण बना दिया गया था । शुक्ल यजुर्वेद की उपलब्धि याज्ञवल्क्य को बाद मे आदित्य से हुई । इसी रूप में ये लोक में प्रसिद्ध हैं । इस शाखा वालो ने उन प्राचीन वेद संज्ञा बोधक सूत्रो को उसी रूप में स्वीकार कर लिया । शतपथ ब्राह्मण और पुराणों से शुक्ल यजुर्वेद की नवीनता ज्ञात होती है । कुछ लोग तैत्तिरीय शाखा को माध्यन्दिन शाखा की व्याख्या मानते हैं, किन्तु यह कथन गलत है । प्राचीन ग्रन्थ व्याख्येय और अर्वाचीन ग्रन्थ व्याख्यान माना जाता है । अत: इस पद्धति से नवीन माध्यन्दिन शाखा को ही तैत्तिरीय शाखा का व्याख्या माना जायगा, किन्तु ऐसा कुछ है नही । यहाँ बताया प्राचीन अर्वाचीन विभाग सापेक्ष है । तैत्तिरीय शाखा ब्रह्मसम्प्रदाय द्वारा प्राप्त है और माध्यन्दिन प्रभृति शुक्ल यजुर्वेद संहिताएं आदित्य सम्प्रदाय से प्राप्त है । उपदेशगत प्राचीनता और नवीनता का ही आरोप उक्त संहिताओं पर कर दिया गया है । समाजियो की अदीर्घदर्शिता का उदाहरण स्वामी दयानन्द ने यह कह कर दे दिया है कि कात्यायन से भिन्न अन्य किसी ऋषि ने ब्राह्मणों की वेद संज्ञा नही मानी है । उनके कथन का स्पष्ट अभिप्राय यह है --कात्यायन ने ही मन्त्र और ब्राह्मण को वेद माना
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वेदार्थपारिजातः १८५६ , एकस्यापि ऋषिवचनस्यानति-,नङ्गीकृतत्वान्न मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञा युक्ता । यद्यप्ययमपि हेतुनं हेत्वाभासत्वमतिक्राम्यति तदाक्रमणीयत्वात्, तथापि सन्तुष्यतु दुर्जनन्यायेन यदा सनातनिभिर्बहूनामापस्तम्बादीनामृषीणां वचनान्युपस्थापितानि सत्यपक्षपातित्वेन मन्त्र-कात्यायनेनान्यैश्च मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञायाः स्वीकृतत्वादिदमेवोचितमासीद् यद् दुराग्रहं परित्यज्य शाखिभि-ब्राह्मणयोर्वेदसज्ञा स्वीकर्त्तव्येति, परन्तु तद्वैपरीत्येनायं युधिष्ठिरो महाशयः स्वस्वामिविपरीतमेव वक्ति यत्कृष्णयजुः, कस्याश्चिदपि रेव वेदसंज्ञाऽङ्गीकृता न कात्यायनेन । तत्र यथा मीमांसका विभिन्नशाखावचनाना समन्वयेनैवार्थं निर्णयन्ति शाखायां स्थित वचनं नोपेक्षन्ते, तद्रीत्येव च मिताक्षराव्यवहारमयूखचतुर्वर्गचिन्तामणिवीरमित्रोदयपराशरमाधवादिनिबन्ध- दृष्टैवैषा गतिः । ग्रन्थेषु समन्वय क्रियते । अन्यत्रानुक्तमपि कचिदुक्तमेवान्यत्राप्युक्तं मन्यन्ते ॥ पञ्चाग्निविद्यादिविचारेषु तथैव प्राचीनतमशाखिनां सूत्रेणैवान्येऽपि तत्सिद्धान्तमनुसरन्ति । किन्तु प्रकृते तु कृष्णयजुःशाखिव्यतिरिक्तैरपि ऋषिभि न पुस्तक- मंन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञास्वीकृतैव । पारस्कर व्यास- जैमिन्यादयोऽपि ऋषय एव । पाणिनि-कात्यायन-पतञ्जल्यादयोऽपि ॥ चतुष्टयस्यैव वेदत्वं मन्यन्ते, किन्तु सहस्राधिकमन्त्रसंहिताना ब्राह्मणारण्यकोपनिषदामपि स्पष्टमेव वेदत्व मन्यन्ते यदुक्तम् —' चिरकालं यावदाचार्यैर्ब्राह्मणाना वेदसंज्ञा नाङ्गीकृता, तत एव हरदत्तादिभिः कैश्चिन्मन्त्राणा- मेव वेदत्वमाख्यातम्' इति, तदपि तुच्छम् पूर्वत्र समाहितत्वात् । मीमांसाग्रन्थेष्वधिकरणरचनायां निराकरणीयपूर्वपक्षकल्प-नावद हरदत्तादिवचनस्यापि निराकरणीयपूर्वपक्षकल्पनोपपत्तेः । यथा कैश्चिदीश्वरस्तत्प्रमाणभूता वेदादयोऽपि नाभ्युपेयन्ते, समाजिभिः सगुण- साकारब्रह्मवादोऽपि नाभ्युपेयते भवन्तु वा केचिद् ब्राह्मणाना वेदत्वानभ्युपगन्तारः, किन्तु न त आचार्या इति । अत एव हरदत्तादिभिः कैश्चिदित्येवोक्त न कैश्चिदाचार्यैरिति । है, किन्तु अन्य किसी ऋषि ने ऐसा नही कहा है, अत • ब्राह्मण और मन्त्र दोनो को वेद नही माना जा सकता । यद्यपि उनका यह कथन हेत्वाभास कोटि में आता है, क्योकि हम एक भी ऋषि के वचन का अतिक्रमण नही कर सकते, तो भी ' तुष्यतु दुर्जन ' न्याय का सहारा लेकर जब सनातनी विद्वान् इसी अभिप्राय के आपस्तम्ब प्रभृति अनेक ऋषियो के वचनो को उपस्थापित कर देते है, तब कात्यायन और अन्य ऋषियो ने भी जब मन्त्र और ब्राह्मण दोनो को ही वेद माना है, तो यही उचित था कि दुराग्रह को छोड़कर सत्य पक्ष के पक्षपाती आर्यसमाजी इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लेते । परन्तु यहाँ तो उलटा ही हो रहा है । ये युधिष्ठिर महाशय अपने स्वामी जी के कथन के विपरीत ही अपना राग अलापते हैं कि कृष्ण यजुर्वेद शाखा वालो ने ही ऐसा कहा है, कात्यायन ने नहीं । मीमासको ने विभिन्न शाखाओं के वचनों में समन्वय स्थापित करने का ही प्रयत्न किया है, किसी भी शाखा के वचन की उपेक्षा वे कभी भी नही करते । उसी पद्धति का सहारा लेकर मिताक्षरा, व्यवहारमयूख, चतुर्वर्गचिन्तामणि, वीरभित्रोदय, पराशर माधव प्रभृति निबन्ध ग्रन्थों में श्रौत और स्मार्त वचनों में समन्वय स्थापित किया गया है । एक जगह यदि किसी बात का प्रतिपादन कर दिया गया है, तो अन्यत्र उसके न होने पर भी सर्वत्र उसको मान्यता प्राप्त हो जाती है । पञ्चाग्नि विद्या के प्रकरण में इसी पद्धति को स्वीकार किया गया है । इसी प्रकार से प्राचीनतम शाखाओं को सूत्रो से ही अन्य शाखा वाले भी अपना अनुष्ठान पूरा करते हैं । प्रकृत में तो न केवल कृष्ण यजुर्वेद शाखा वाले, किन्तु इनसे भिन्न शाखाओ के ऋषियो ने भी मन्त्र और ब्राह्मण को वेद माना है । पारस्कर, व्यास, जैमिनि प्रभुति भी ऋषि ही हैं । पाणिनि, कात्यायन, पतजलि प्रभृति भी केवल चार पुस्तकों को ही वेद नहीं मानते, किन्तु सहस्त्राधिक मन्त्र- सहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् -इन सबको स्पष्ट रूप से वेद मानते है । आपका कहना है कि 'चिरकाल तक आचार्यों ने ब्राह्मणो को वेद नही माना था । इसीलिये हरदत्त प्रभृति ने केवल मन्त्रभाग को ही वेद माना है । किन्तु यह कथन भी तुच्छ हैं, पहले ही इसका समाधान कर दिया गया है कि मीमासा ग्रन्थो में अधिकरण की रचना के लिये आवश्यक निराकरणीय पूर्वपक्ष की स्थिति रहती है । हरदत्त प्रभृति के द्वारा उद्धृत वचन उसी निराकरणीय पूर्वपक्ष के रूप में माने जाने चाहिये । जैसे कुछ लोग ईश्वर को और ईश्वर में प्रमाणभूत वेद को भी नही मानते । आर्यसमाजी भी सगुण साकार ब्रह्मवाद को नही स्वीकार करते । ब्राह्मणों को वेद न मानने वाले भी हो सकते है, किन्तु वे आचार्य नही है । इसीजिये हरदत्त प्रभुति ने उक्त स्थल पर किसी आचार्य का नाम लेकर ' कैश्चित्' ( कुछ लोगो के द्वारा) ऐसा कहा है, 'कैश्चिदाचार्यैः " इस तरह उसके साथ आचार्य शब्द भी नही जोड़ा है । इसीलिये इस पक्ष के प्रति हरदत्त प्रभृति की अरुचि स्पष्ट हो जाती है ।
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वेदार्थपारिजातः १८५७ यत्तु —'यथा लोकेऽसिद्धत्वात् शास्त्रान्तरेष्वन्यार्थे प्रसिद्धत्वाच्च पाणिनेः सर्वनामसंज्ञा नैयायिकवैशेषिकाणा गुणसंज्ञा च अलौकिकी भवति । पारिभाषिकसज्ञाश्च स्वस्वशास्त्रेष्वेव स्वीकारार्हा भवन्ति । पाणिनेर्गुणवृद्धयादिसज्ञाश्च तत्रेवाद्रियन्ते तथैव मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयमिति सूत्रमपि यत्र यत्र पठितं तत्रैवादरणीयम्, अतो मन्त्राणां वेदसंज्ञा सर्वसम्मता न ब्राह्मणानाम् इति, तथा -'त्रयाणा वेदाना वेदसज्ञाया अविद्यमानत्वकारणं तु तत्र ब्राह्मणानां सत्त्वाभावेन सन्देहाभाव एव । अतस्तैस्तादृशं सूत्र न निर्मितम्' इति, तत्सर्वमपि कुशकाशावलम्बनमेव । यतो हि कात्यायनो न कृष्ण- यजु शाखीयः, सहि पञ्चदशसंख्याकाः शुक्लयजु शाखा अधिकृत्य कर्माणि सूत्रयति । कौशिकोऽप्यथर्वशाखीयः । पारस्करो महर्षिनॅकदेशीय । सर्वे चैते मन्त्रान् ब्राह्मणानि चोद्दिश्य वेदशब्द प्रयुञ्जते । व्यासो जैमिनिश्च नैकदेशीयौ | तावपि तत्र तत्रा- धिकरणेषु सूत्रेषु च वेदश्रुत्याम्नायशब्देः सर्वशाखागतानि मन्त्रवचनानि ब्राह्मणवचनानि चोद्धृत्य विचारयत । मन्वादयोऽपि नैकदेशीयाः । गोतमकणादौ सांख्ययोगाचार्याश्च मन्त्रान् ब्राह्मणानि च वेदत्वेन स्मरन्ति । पाणिनिकात्यायनपतञ्जलयश्च तथैव शाखाब्राह्मणानि वेदं मन्यन्ते, तत्त्वेनोदाहरन्ति । सर्वे चैते मन्त्रान् ब्राह्मणानि चोद्दिश्य वेदत्वं बोधयन्ति । न कृष्ण-, यजुःशाखीयानामेव मन्त्राणां ब्राह्मणानां च वेदत्वम् । आपस्तम्बादयोऽपि मन्त्राणां ब्राह्मणाना च वेदत्व बोधयन्ति न स्वशाखीयानामेव । किं परिभाषा वा लक्षणानि विधानानि वा पौरुषेयाण्यपि स्वतः प्रमाणान्येव? पौरुषेयत्वेन पुरुषाश्रित- भ्रमप्रमादादिसम्भावनया प्राप्तस्याप्रामाण्यस्याप्तत्वबलेनापनोदने प्रामाण्यस्वतस्त्वमनपोदितं सुस्थिरं भवति । नहि पाणिनी- यानि लक्षणानि संज्ञा वा अप्रमाणानि भवन्ति । सर्वनाम-गुण वृद्धयादिसज्ञाः काममन्यत्र नोपयुज्येरन्, किन्तु तदाश्रितानि शब्दसाधुत्वानि तु सर्वैरप्यङ्गीक्रियन्ते यथा, तथैवापस्तम्बादय ऋषय आप्ताश्चेत्तदा तत्परिभाषितं लक्षितं वा वेदत्वं सर्वत्र- वाङ्गीक्रियेत । किञ्च, समाजिनस्तु कृष्णयजुर्मन्त्राणामपि वेदत्वं नाङ्गीकुर्वन्ति । एकैकशाखासंहिता मुक्त्वा चतुर्ष्वपि ' जैसे लोक में अप्रचलित और अन्य शास्त्रो मे किसी दूसरे ही अर्थ मे प्रचलित पाणिनि की सर्वनाम संज्ञा और न्याय- वैशेषिक की गुण सज्ञा प्रभृति का अनोखापन होता है और ये पारिभाषिक सज्ञाएं अपने अपने भाष्यों में ही ग्राह्य होती हैं, उसी तरह से ' मन्त्र ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' यह वेद की परिभाषा भी वही ग्राह्य होगी, जहाँ कि यह पढी गई है । इसलिये मन्त्रो की ही वेद संज्ञा सर्वसंमत है, ब्राह्मणो की नहीं' इतना लिखने के बाद आप पुनः लिखते है-'तीन वेदो के श्रौत सूत्रों मे ' वेद' संज्ञा के अभिमान का कारण यह है कि ऋग्वेद, शुक्लयजुः तथा सामवेद की संहिताओ मे मन्त्रो का पाठ होने तथा उनके ब्राह्मण ग्रंथो की सत्ता संहिता से पृथक होने के कारण वहाँ सन्देह ही नही होता कि कौन सा मन्त्र है और कौन सा ब्राह्मण है । इसलिये इन वेदो के श्रौतसूत्रकारो को ' मन्त्र-ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' सदृश सूत्र बनाने की आवश्यकता भी नही पडी ( पृ० ७५ ), किन्तु यह सब ' डूबने को तिनके का सहारा जैसी बाते है, क्योकि कात्यायन ने कृष्णयजुर्वेद की १५ शाखाबो के लिये कर्म विधान किया हैं । कौशिक अथर्व शास्त्र के आचार्य है । पारस्कर महर्षि भी किसी एक शाखा के हो आचार्य नहीं है । ये सभी आचार्य मन्त्र और ब्राह्मण को वेद मानते है । व्यास और जैमिनि भी किसी एक शाखा पर विचार नहीं करते । ये दोनों आचार्य भी अपने विभिन्न अधिकरणों मे मन्त्र और ब्राह्मण भाग के वचनों का विचार वेद, श्रुति और आम्नाय प्रभृति शब्दो का प्रयोग करते हुए कहते हैं । मनु प्रभुति भी किसी एक वैदिक शाखा का अनुवर्तन नही करते । गोतम, कणाद और साख्य- योग दर्शन के आचार्य भी मन्त्र और ब्राह्मण के वचनो को वेद के नाम से स्मरण करते हैं । पाणिनि, कात्यायन और पतंजलि भी सभी शाखाओ और ब्राह्मणों को वेद मानते हैं और उसी तरहसे उद्धृत भी करते है । आपस्तम्ब प्रभुति अपनी शाखा के मन्त्र और ब्राह्मण को ही वेद नही मानते, किन्तु सभी मन्त्रसंहिताओ और ब्राह्मणो को वेद मानते है । परिभाषा, लक्षण अथवा विधान पौरुषेय होने पर स्वत प्रमाण नही माने जायंगे, क्योंकि उनमे पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद आदि दोषों की सम्भावना से उनमे अप्रामाण्य की आशका बनी ही रहेगी । इस आशंका के निराकरण का एकमात्र उपाय यह है कि ये आप्त पुरुष द्वारा उक्त है या नहीं? पाणिनि की परिभाषा अप्रामाणिक नही है । सर्वनाम, गुण, वृद्धि प्रभृति परिभाषाणो का अन्यत्र भले ही उपयोग न हो, किन्तु उनके आधार पर पाणिनि व्याकरण की शब्दसाधुत्व की प्रक्रिया को सब कोई स्वीकार करते हैं । इसी तरह से आपस्तम्ब प्रभृति आचार्य भी आद्य हैं । अतः उनके द्वारा प्रदत्त परिभाषा, अथवा लक्षण २३३ [
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१८५८ वेदार्थपारिजातः वेदेषु सहस्राधिकसंहितानां वेदत्वमपलपन्ति । किमतोऽधिकं धाष्टयम्? किमतोऽधिकं वेदतिस्करणमार्षमततिरस्करणं च । तथापि समाजिन पण्डितानां सत्योक्ति निन्दन्तो न श्रपन्ते । यत्तु ( ७५ पृष्ठे ) मन्त्रब्राह्मणयोर्लक्षणस्य अव्याप्त्यतिव्याप्तिभ्या दूषणाय यतितं तत्तु जैमिनिशाबरभाष्यादि- विरुद्धमेव, जैमिनिनैव मन्त्रविशेषाणां मन्त्रसामान्यस्य ब्राह्मणस्य च लक्षणप्रणयनात् । विचित्रमस्य मीमांसकत्वम्, मन्त्र- लक्षणाधिकरणे ( जे ० सू० २।१।३२ अधि० ७ ) इत्यत्र लिखितमपि लक्षणमपलपति । वस्तुतस्तु नेदं कृष्णयजुर्वेदीयानां निराकरणम्, किन्तु जैमिनिकृतलक्षणस्य तात्पर्यनिरूपणम्, कथंलक्षणको मन्त्र इति । 'तच्चोदकेषु मन्त्राख्या' इति अभि- धानस्य चोदकेष्वेवं जातीयकेष्वभियुक्ता उपदिशन्ति मन्त्रानधीमहे, मन्त्रानध्यापयामः, मन्त्रा वर्तन्त इति, प्रायिकमिद लक्षणम् । अनभिधापका अपि केचिन्मन्त्रा इत्युच्यन्ते । ' वसन्ताय कपिञ्जलानालभते' ( वा० सं ० २४/२० ) इति । न च प्रायिकेष्वव्याप्त्यतिव्याप्त्यादि दूषण भवति । अत एव येषु वाक्येषु वैदिकाना मन्त्रत्वेन व्यवहारस्तेषामेव मन्त्रत्वमित्येवादुष्ट मन्त्रलक्षणम् । यद्यपि विधायकवाक्यानां ब्राह्मणत्वमेव, तथापि वैदिकाना मन्त्रत्वेन स्वीकारात्तेषा मन्त्रत्वं मन्त्रधर्मेण पाठश्च । अत्र पारम्पर्यमेव प्रमाणम् । अत एव साम्प्रदायिकैरभ्युपगतत्वाद् ब्राह्मणानामपि मन्त्रत्वमभ्युपेयते उव्वट- महीधररीत्या | कात्यायनसर्वानुक्रमणीरीत्या शुक्लयजुर्वेदेऽपि ' देवा यज्ञम्' ( वा० स ० १ ९| १२ ) इत्यारभ्य 'सोत्रामणीसुते ' ( वा० सं ० १ ९ / ३१ ) पर्यन्त विशतिः कण्डिका: ' ब्राह्मणानुवाको विंशतिरनुष्टुभ सोमसम्पत् २', ' अश्वस्तूपरो' ( वा० स० २४| १ ) इति ब्राह्मणाध्याय:, 'ब्रह्मणे ब्राह्मणम्' ( वा ० सं० ३०१५ ) इत्यारभ्य द्वे कण्डिके, तपसेऽनुवाकश्च, तपसे कौलाल- सर्वत्र स्वीकार किया जाता है । आर्यसमाजी तो कृष्ण यजुर्वेद के मन्त्रो को भी वेद नही मानते । चार वेदो की चार शाखाओं , को छोडकर वे बाकी सहस्राधिक सहिताओ की वेदता का अपलाप करते हैं । इससे अधिक घृष्टता वेद का और आर्ष मत का तिरस्कार क्या हो सकता है? इस पर भी ये लोग पण्डितो की सच बात की निन्दा करते थकते नही है । पृ० ७५ पर मन्त्र और ब्राह्मण के उक्त लक्षण में अव्याप्ति अतिव्याप्ति दोष दिखाकर इसको सदोष सिद्ध किया गया है । किन्तु यह कथन भी जैमिनि सूत्र और शावर भाष्य के विपरीत है । जैमिनि ने स्वयं मन्त्रविशेष, मंत्र सामान्य और ब्राह्मण का लक्षण बताया है । हमारे ये मीमासक जी बडे विचित्र हैं । ये मन्त्रलक्षणाधिकरण ( २।१।३२ ) में लिखित लक्षण को भी स्वीकार नही करते । भाष्य मे यहा पर कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा का निराकरण नही है, किन्तु जैमिनि कृत लक्षण का तात्पर्य समझाया गया है कि मन्त्र का क्या लक्षण है? जो वचन पक्ष में अनुष्ठीयमान कर्म को कहते है, उन्ही मे अभियुक्त मन्त्रो को पढते है, मन्त्र पढे जा रहे हैं, आदि व्यवहार करते है । वस्तुतः मन्त्र का यह लक्षण प्रायिक है, अर्थात् सर्वत्र नही घटता । कुछ ऐसे भी वचन है, जो यज्ञ में अनुष्ठीयमान कर्म को करने वाले नही, परन्तु मन्त्र कहे जाते है । जैसे कि-'वसन्ताय कपिञ्जलानालभते' इस वचन में । प्रायिक मन्त्रो मे अव्याप्ति, अतिव्याप्ति आदि दोष नही लागू हो सकते । इसीलिये जिन वाक्यों में वैदिकों का मन्त्रत्व व्यवहार है, वे ही सब मन्त्र होते हैं, अतः मन्त्र के लक्षण में कोई दोष नही है । यद्यपि विधायक वाक्य ब्राह्मण ग्रंथों में ही मिलते है, तो भी वैदिक विद्वान् इनको मन्त्र ही मानते है और उनका पाठ भी मंत्र की तरह ही तरह ही कियाकिया जाताजाता है । इसमें परम्परा ही प्रमाण है । साम्प्रदायिक विद्वानो ने इसको स्वीकार किया है, अतः इस प्रकार के ब्राह्मण वचन भी मंत्र माने जाते है । उव्वट, महीधर प्रभूति इसमें एक्मत है । इस शुक्ल यजुर्वेद में थोडे में सब बात कहो गई है और इसका समझना बड़ा सरल है, इसलिये इसको शुक्ल कहा जाता हैं, कृष्ण नहीं । निरुक्तकार यास्काचार्य ने मन्त्रभाग की सार्थकता वाले प्रकरण ( १।१५ ) में 'अग्नये समिद्धमानाय इस मैत्रायणी संहिता स्थित ब्राह्मण को ही मन्त्र बताया है । काष्व और वाजसनेयी संहिता स्थित ईशोपनिषद् मन्त्रभाग ही मानी जाती है । सामवेदीय कौयुम संहिता का आरण्यक भ मन्त्रभाग के ही अन्तर्गत है । परम्परा शून्य समाजियों का व्यवहार मन्त्रत्व का प्रयोजकनहीं है । उस