वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 961–970
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 961–970
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वेदार्थपारिजातः १८५ ९ मित्यारभ्य अध्यायसमाप्तिपर्यन्त ब्राह्मणम् ॥ स्वल्पत्वाद् दुर्ज्ञेयत्वाभावाच्च शुक्लत्वमेव न कृष्णत्वम् ॥ निरुक्तकारैर्यास्का- चार्यैरपि मन्द्रभागसार्थक्यप्रकरणे ( नि० १।१५ ) इत्यत्र 'अग्नये समिद्धयमानायानुब्रूहि' इति मैत्रायणीसहितास्थितस्य ब्राह्मणस्यैव मन्त्रत्वमुक्तम् । काण्ववाजसनेयिगताया ईशोपनिषदश्व मन्त्रत्वमेवाभिप्रेतम् । सामवेदीयकौथुमसंहिताना आरण्यकस्यापि मन्त्रान्तर्गतत्वान्मन्त्रत्वमेव मन्यते । न च पारम्पर्यशून्याना समाजिना व्यवहारो मन्त्रत्वकारणम् । तद्रीत्या तत्तच्छाखिना वैदिकाना यत्र यत्र मन्त्रत्वेन व्यवहारस्तेषा मन्त्रत्वं स्फुटमेव, तेन शाकल्यादीनामेव वेदत्वं न काण्वादीना- मित्युक्ति प्रमादविलसितैव । यद्यपि ' यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था सा ऋक्, गीतिषु सामाख्या, शेषे यजुः शब्द, इति मन्त्राणा लक्षणानि, तथापि यजुः सहितायामृचो यजुर्धर्मेणैवाधीयन्ते । किञ्चायं युधिष्ठिरो यः पूर्वं पूर्वमीमांसकाना याज्ञिकानाञ्च भेदमुक्तवान् स एवेदानी मोमासाभाष्यकारं शबरस्वामिनं याज्ञिकशिरोमणि लिखति ( ७५ पृष्ठे ) तर्हि केन कि श्लिष्यते? ( ७६ पृष्ठे ) पुनलिखति -' मीमासकरीत्या ' वसन्ताय कपिञ्जलानालभते ' इति वाक्य मन्त्रसंज्ञकमिति शबरस्वामिवचनेन स्पष्टम् । याज्ञिकानामुक्तलक्षणरीत्या वाक्येऽत्र मन्त्रत्व न प्राप्तम्, कुतः? यज्ञे क्रियमाणस्य कस्यचिदपि कमणोऽस्मारकत्वात्, अतोऽव्याप्तिः' इति । तदप्यज्ञानविजृम्भितम्, विकल्पासहत्वात् । तथाहि कुतो नात्रानुष्ठीयमानकर्माननुस्मारकत्वम्? मन्त्रे सामर्थ्याभावात् विनियोगाभावाद्वा? नाद्यः, द्रव्यं देवता च कर्मणः स्वरूपम्, तयोरुभयोरप्यत्र विद्यमानत्वात् सामर्थ्याभावासिद्धेः । नान्त्यः, मन्त्रत्वादेव तत्सिद्धे । न च श्रोतविनियोगादर्शनात्तदसिद्धि:, लिङ्गबलावपि तत्सिद्धे । अयं मन्त्रो विनियुक्तो मन्त्रत्वाद् इषे त्वादिमन्त्रवद् इत्यनुमानस्य जागरूकत्वात् । किञ्च, कृष्णयजुर्वेदिभिः स्वशास्त्रार्थं सा परिभाषा निर्मितेत्यत्रापि वक्तव्य, यत् सा परिभाषा प्रामाणिकी अप्रामाणिकी वा? आद्ये सिद्धमेव वेदत्वम् । अन्त्ये च ऋषीणामपि मिथ्यावादित्वापत्तेः । न च तच्छाखिनामेव कृते प्रामा- उस शाखा के वैदिक विद्वान् जहाँ जहाँ मन्त्र पद का व्यवहार करते है, वे सब मन्त्र ही माने जाते हैं । अत शाकल्य प्रभृति शाखाएँ ही वेद है, काण्व प्रभृति नही, यह समाजियो का कथन प्रमाद प्रयुक्त है । यद्यपि मीमासा में ऋक्, साम और यजु का लक्षण दिया गया है, तो भी यजुःसंहिता में विद्यमान ऋचाओ का पाठ यजुर्मन्त्रो की तरह ही किया जाता है । ' युधिष्ठिर मोमासक ने पहले पूर्वमीमासको और मीमासको मे भेद बताया है, वही अब यहाँ पर मीमासा भाष्यकार शबर स्वामी को याज्ञिक शिरोमणि बताते हैं । इससे क्या अभिप्राय निकाला जाय । आगे वे पुनः लिखते है - मोमासको के अनुसार 'वसन्ताय कपिञ्जलानालभते ' यह वाक्य मन्त्रसज्ञक है, यह शबर स्वामी के उपर्युक्त प्रमाण से स्पष्ट है । याज्ञिको के उक्त लक्षण के अनुसार इस वाक्य में मन्त्रत्व प्राप्त नही होता, क्योकि यह वाक्य यज्ञ मे क्रियमाण किसी कर्म का स्मारक नहीं है । अतः इस अश मे अव्यामि दोष हैं' ( पृ० ७६ ), किन्तु यह कथन भी उनके अज्ञान का ही बोधक है, क्योंकि आपके पास हमारे इस विकल्प का कोई उत्तर नही है कि यहाँ पर अनुष्ठीयमान कर्म की अनुस्मारकता क्यो नही है? मन्त्र में इसकी सामर्थ्य नही है अथवा उसका ऐसा विनियोग नही मिलता? इसमें पहला पक्ष इसलिये नही बनेगा कि द्रव्य और देवता ही मिलकर कर्म का स्वरूप बनाते है । ये दोनों ही यहाँ विद्यमान है, अतः इस सामर्थ्य का अभाव यहाँ नही कहा जा सकता । अन्तिम पक्ष भी इसलिये नही बनेगा कि मन्त्र के साथ विनियोग लगा ही हुआ है । श्रोत विनियोग का अभाव होने पर भी लिंग के बल से उसकी सिद्धि हो जायगी । ' यह मन्त्र विनियुक्त है, मन्त्र होने से, इषेत्वा प्रभूति मन्त्रो की तरह' यह अनुमान भी इसमें सहायक होगा । आप कहते है कि कृष्ण यजुर्वेदियो ने अपने लिये यह परिभाषा बनाई है । इस पर भी हम पूछते हैं कि यह परिभाषा प्रामाणिक है या नहीं? यदि प्रामाणिक है, तो मन्त्र ब्राह्मणात्मक भाग को वेद माना ही जायगा और यदि अप्रामाणिक है, तो ऋषियो को भी मिथ्यावादी मानना पडेगा । उसी शाखा वालो के लिये यह वचन प्रमाण होगा, अन्य शाखा वालो के लिये नहीं, यदि ऐसा माना जाय, तो आश्वलायन, कात्ययन प्रभृति सूत्रों का भी प्रामाण्य केवल अपनी अपनी शाखा के लिये ही होगा । तब अन्य शाखा वालों के लिये ये अप्रमाण माने जायेंगे । किन्तु ऐसा व्यवहार में है नही, ये सूत्र ऋग्वेद और यजुर्वेद की सभी शाखाओं में समान रूप से आवृत हैं । वेद होने के कारण इनको यदि आप प्रमाण मानते हैं, तो हमारे मत से ये भी 1
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१८६० वेदार्थपारिजातः णिकी; नान्यशाखिनः प्रतीति चेत्तथात्वे आश्वलायनकात्यायनोक्तसूत्राणामपि शाकलिना वाजसनेयिना कृते प्रामाण्येऽप्यन्य- शाखीयान् प्रत्यप्रामाण्यापत्तेः न च तेषा वेदत्वान्न तथात्वमिति वाच्यम्, तथैव तत्रापि वेदत्वावैशेष्यात् शाखात्वा वैशेष्याच्च । किञ्च येषा वचनानां प्रामाणिकाः पुरुषा मन्त्रत्वं कथयेयुस्ते मन्त्रा इत्यपि लक्षणमेव । यद्बोधनाय वचन विशेषस्यापेक्षा तस्य कृत्रिमत्त्वं न स्वाभाविकत्वमिति त्वद्रीत्येव तेषा वाक्याना मन्त्रत्वं कृत्रिममेव न मुख्यमिति वैपरीत्यापत्तेः । प्रामाणिक- पुरुषनिर्णयोऽपि दुष्कर एव । यद्यापस्तम्बादीनामप्यप्रामाणिकत्वं तदा दयानन्दीयाना कुत प्रामाणिकत्वम्? यदुक्तम् — ' यद्यापस्तम्बादिश्रौतसूत्ररचना काले ब्राह्मणग्रन्थाना लोकप्रसिद्धिः स्यात्, तदा आपस्तम्बादिश्रोतसूत्र- रचयितृभिऋग्वेद -शुक्लयजुर्वेद सामवेदाना श्रौतसूत्रकारैरिव मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसज्ञाविधायक सूत्र कथं न निर्मीयेत? मन्त्राणा- मिव ब्राह्मणानामपि वेदत्वस्य प्रसिद्धी सत्यामपि कृष्णयजुर्वेदीयश्रौतसूत्रकारैर्लोकप्रसिद्धिपुष्ट्यर्थं यथा सूत्र रचित तथैव ऋग्वेदादिश्रौतसूत्रकारैरपि तथा सूत्रं किमिति न निर्दिष्टम्? न च दृश्यते तेषा तादृक्ष सूत्रम्, तेन मन्त्राणामेव वेदत्वं प्राचीनाचार्याणामभिप्रेतम्, न ब्राह्मणाना तच्छेषाणामारण्यकाना तदन्तर्गतोपनिषदा च' इति, तदपि शतशः खण्डितमेव, हेत्वसिद्धेः । त्वद्रीत्यापि मन्त्राणा मन्त्रत्वमपि न स्वतः सिद्धम्, वेदत्व तु दूरतो निरस्तम् । प्रामाणिक पुरुषैर्मन्त्रत्वेनाभ्यु- पगतत्वमेव मन्त्रत्वमिति त्वयापि लक्षणाङ्गीकारो विहितः । नापि ऋग्वेद- शुक्लयजुर्वेद सामवेदत्वादिकं वेदविशेषणं सिद्धम्, परान् प्रति तदसिद्धेः । कात्यायनादिभिरपि 'मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' इति सूत्रस्य निर्मितत्वाद व्यतिरेकासिद्धेश्व | यथा ' स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इति स्वाध्यायाध्यनविधिस्तैत्तिरीयशाखीयेरिव सर्वशाखीयैरङ्गीक्रियत इति न शुक्लयजुरादि- शाखासु पृथगुल्लेख आवश्यक । प्राचीनतमैः कृष्णयजुर्वेदीयैः श्रौतसूत्रकारैः कृतं लक्षणमेव नवीनैः शुक्लयजुर्वेदिभिरप्यङ्गी- - कृतमिति विपरीतस्यैव सम्भवात् । तथात्वे च मनु- व्यास-जैमिनि यास्क पाणिनि-कात्यायन पतञ्जलि गोतम कणाद- वेद ही है । आश्वलायन, कात्यायन के समान कृष्ण यजुर्वेद की सहिता भी वेद की शाखा मानी ही जाती है । ' जिन वचनो को प्रामाणिक पुरुष मन्त्र कहे वे मन्त्र है 'यह भी मन्त्र का लक्षण ही है ।' जिसको जानने के लिये वचन विशेष की आवश्यकता होती है, वह कृत्रिम - होता है, स्वाभाविक नही आपके ही इस कथन के अनुसार मन्त्र को जानने के लिये जो आपने विशेष शब्दो का प्रयोग किया है, उनमें भी मन्त्रत्व कृत्रिम ही रहेगा, मुख्य नही । इस तरह से आपकी ही उक्ति आपके विपरीत पडेगी । प्रामाणिक पुरुष का निर्णय होना भी कठिन है | यदि आपस्तम्ब प्रभृति ऋषि अप्रामाणिक हैं तो दयानन्द की प्रामाणिकता कैसे सिद्ध हो सकेगी? आगे आप लिखते है -' यदि आपस्तम्ब आदि श्रौतसूत्रो के रचना काल में ब्राह्मण-ग्रन्थो का भी वेदत्व लोकप्रसिद्ध होता, तो कृष्णयजु के आपस्तम्ब आदि श्रौतसूत्र रचयिता भी ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद तथा सामवेद के श्रौतसूत्रकारो के समान उक्त वचन न पढ़ते । अथवा मन्त्रों के समान ब्राह्मण का वेदत्व प्रसिद्ध होने पर भी जैसे कृष्ण यजुर्वेद के श्रौत सूत्रकारो ने लोक प्रसिद्धि की पुष्टि के लिये उक्त सूत्र रचा, तद्वत् ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद तथा सामवेद के श्रौतसूत्रकार भी उक्त सूत्र का निर्देश करते । परन्तु ऐसा नहीं किया, अर्थात् मन्त्र ब्राह्मण संमिश्रित कृष्णयजु के श्रीतसूत्रकारो ने ही उक्त सूत्र पढा है, केवल मन्त्रात्मक ऋग्वेद, शुक्लयजुर्वेद और सामवेद के श्रौतसूत्रकारो ने इस प्रकार का कोई वचन नही बनाया । इससे भी स्पष्ट है कि मन्त्रो का ही वेदत्व प्राचीन आचार्यों को भी अभिप्रेत है । ब्राह्मणो, उनके शेषभूत आरण्यको तथा तदन्तर्गत उपनिषदों का मुख्य वेदत्व उन्हें इष्ट नही है' ( पृ० ७७ ) । इस तरह की बातो का अनेक बार खण्डन किया जा चुका है । आपके मत के अनुसार भी मन्त्रत्व स्वतः सिद्ध नहीं है, तब वेदत्व कैसे स्वतः सिद्ध1 हो जायगा? प्रामाणिक पुरुषो के द्वारा मन्त्र के रूप में स्वीकृत वचन ही मन्त्र कहे जाते हैं, यह मन्त्र का लक्षण अभी आपने किया है । ऋक्, यजुः और सामवेद के विशेषण के रूप में स्वीकृत नहीं है । कात्यायन प्रभृति ने 'मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' यह सूत्र बनाया है । जैसे तैत्तिरीय शाखा में पठित 'स्वाध्यायोऽध्येतव्य * । इस अध्ययन विधि को सभी शाखा वाले मानते हैं, अतः शुक्ल यजुर्वेद में इसका अलग उल्लेख आवश्यक नही है । इसी तरह से प्राचीनतम कृष्ण यजुर्वेदीय श्रौतसूत्र के लक्षण को नवीन शुक्ल यजुर्वेद में भी मान्यता प्राप्त है । इस तरह से यह वचन आपके विपरीत ही जायगा । मनु, व्यास, जैमिनि" यास्क, पाणिनि, कात्यायन,
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वेदार्थपारिजात १८६१ वात्स्यायन- शबर-कुमारिल शङ्कर- मण्डन-वाचस्पति-सायण रामानुज- निम्बार्क- मध्वादिभिरेक त्रिशदुत्तरैकादशशतशाखात्मकस्य मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदत्वाङ्गीकारात् पुस्तकचतुष्टयमात्रस्य वेदत्वानङ्गीकारात् तत्पक्षस्य वेदबाह्यत्वमेव । अन्यत्सर्वं तु कुचोद्यमेवेत्युपेक्ष्यते । एतस्मिन् सिद्धान्ते निश्चिते ' श्रौतसूत्रादियाज्ञिकग्रन्थेषु वेदशब्देन ब्राह्मणग्रन्थाना निर्देश, याज्ञिक मतस्वी- कारात्, व्याख्येयवेदग्रन्थाना व्याख्यानभूतत्वाच्च । व्याख्येयव्याख्यानग्रन्थानामभेदोपचारस्य लोके दर्शनाद् ब्राह्मणे वेदत्वो- पचाराद् वेदशब्दप्रयोगः' इति, तदपि निरस्त वेदितव्यम्, तादृशसिद्धान्तस्याद्याप्यनिश्चयात् । व्यास-जैमिनि पाणिनि-पत- ञ्जलि-यास्क -गोतम कणाद वात्स्यायनादिभिराप्तैरप्रामाणिकपक्षस्य स्वीकारासम्भवात् । न च लोके व्याख्यानव्याख्येययोरभेद- व्यवहारः । न च जैमिनिसूत्रशाबरभाष्ययोः पाणिनिसूत्रपातञ्जलमहाभाष्ययोर्वा गोतमसूत्रवात्स्यायनभाष्ययोर्वा अभेदं मन्यते कश्चित् । व्याख्यानव्याख्येययोरभेदव्यवहारे काण्वसंहितासायणभाष्ययोरप्यभेदव्यवहारः स्यात् । तस्मात् सर्वमपि मीमास- सकम्मन्यस्य विध्वस्तमेव मोहमूलकं मायामयं भवनम् । यदपि ७७ पृष्ठे लिखितम्- 'अमृतसरसि सर्ववेदशाखासम्मेलने सनातनिना पक्ष आसीद् वेदे विज्ञानं नास्ति, तथा ब्राह्मणग्रन्थाना वेदत्वमिति विषयमधिकृत्य शास्त्रचर्चाया तद्विरोधोऽस्माकं पक्ष आसीत् । मदीयाक्षेपाणामुत्तरं दातुम- समर्थैर्वेदसज्ञाविषयकं नवीन लक्षण प्रस्तुतम्' इत्यादिकम्, तत्तु दम्भाहङ्कारमूलकमेव, तदानीमेव काशीस्थै. पण्डितैस्तत्पक्षस्य तिलशः खण्डितत्वात् । वेदमन्त्रेषु वायुयानधूभयान- जलयान कम्प्यूटरादिनिर्माणानुगुणं विज्ञान वेदमन्त्राणा नार्थं । तादृशार्थ- करण तु दयानन्दस्य बालचापलमेवेति तस्यानेकधा खण्डितत्वात् । ब्राह्मणाना शाखानामेव बेदत्वं न शाखाव्यतिरिक्ता वेदा पतजलि, गोतम, कणाद, वात्स्यायन, शबर, कुमारिल, शकर, मण्डन, वाचस्पति, सायण, रामानुज, निम्बार्क, मध्व प्रभृति आचार्यों ने ११३१ शाखा वाले मन्त्रब्राह्मणात्मक ग्रन्थराशि को वेद के रूप में स्वीकार किया है । इन सब ने केवल चार पुस्तको को ही वेद नही माना, अतः आपका पक्ष वेदबाह्य ही माना जायगा । इसके अतिरिक्त तो आपका सारा कथन कुचोद्य मात्र है । उसकी हम उपेक्षा कर देते हैं । इस सिद्धान्त के स्वीकार कर लेने पर 'श्रौतसूत्र प्रभृति ग्रन्थों में वेद शब्द से ब्राह्मण ग्रन्थो का ही निर्देश मिलता है, वह याज्ञिक मत को स्वीकार कर लेने के कारण होगा । अथवा मन्त्र व्याख्या भूत ब्राह्मण- ग्रन्थो में व्याख्योपग्रन्थ ( वेद ) का औपचारिक ( गौण ) रूप से प्रयोग किया होगा । व्याख्यान-ग्रन्थो मे व्याख्येय ग्रन्थ का उपचार प्रायः लोक में देखा जाता है' ( पृ० ७७ ) इस मत का भी खण्डन हो जाता है । क्योकि ऐसा सिद्धान्त अभी भी स्थिर नही हुआ है । व्यास, जैमिनि, पाणिनि, पतजलि, यास्क, गोतम, कणाद, वात्स्यायन प्रभृति आप्त पुरुष पप्रामाणिक पक्ष को कभी स्वीकार नही कर सकते । लोक में भी व्याख्यान ग्रन्थों और व्याख्येव ग्रन्थो मे अभेद व्यवहार नही देखा गया है । जैमिनि सूत्र और शाबर भाष्य को 2 पाणिनि सूत्र और पातजल भाष्य को, गोतम सूत्र और वात्स्यायन भाष्य को कोई भी व्यक्ति एक नही मानता । व्याख्यान और व्याख्येय में अभेद मानने पर कण्व संहिता और उसके सायणभाष्य में भी अभेद मानना पड जायगा । इस तरह मीमांसक जी की माया से बना यह अज्ञानमूलक भवन पूरी तरह से ढह गया है । पृ० ७८ पर आप लिखते है -' अमृतसर मे सर्ववेद शाखा सम्मेलन में सनातनियों का पक्ष कि वेद में विज्ञान नही है तथा ब्राह्मण ग्रन्थ वेद के ही अन्तर्गत है । इन दोनों विषयो पर हमारा उनका शास्त्रार्थ हुआ । मेरे द्वारा किये गये आक्षेपो का सनातनी कोई उत्तर न दे सके और उन्होंने वेद का एक नया ही लक्षण प्रस्तुत कर दिया, किन्तु यह सम्पूर्ण कथन उनके दम्भ को व्यक्त करने वाला है, क्योंकि काशी के पंडितो ने तत्काल ही उनके पक्ष की धज्जी उड़ा दी थी । वेद मन्त्रों में वायुयान, घूमयान, जलयान, कम्प्यूटर आदि के निर्माण को बताने की बात किसी भी मन्त्र में नही है । इस तरह का अर्थ करना स्वामी दयानन्द का बचकानापन है | इस बात को पहले ही अनेक युक्तियों के सहारे सिद्ध किया जा चुका है । ब्राह्मणों और शाखाबों से भिन्न वेद की कोई पृथक् सत्ता नहीं है, !
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वेदार्थपारिजात १८६२ इति सारस्वतपण्डित दीनानाथादिभिरन्यैश्च बहुधा प्रतिपादितमेव । यत्तु 'सम्प्रदायाविच्छिन्नत्वे सत्यस्मर्यमाण कर्तृत्व वेदत्वम् ' मिनि लक्षण तद्व्याख्यान च कृतम्, तदप्यशुद्धमेव । सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वं अपौरुषेयत्वम्, अपौरुषेय- वाक्यसमूहो वेदः । तच्च न नवीनम् चित्सुखाचार्यादिभि स्वीकृतत्वात् । यदुक्तम्- ' माध्यन्दिनसहिताया. पदपाठेऽतिव्याप्ति., तस्यापौरुषेयत्वस्यानिष्टत्वात्' इति, तदपि तुच्छम्, सर्वेषामपि पदपठाना नित्यत्वाभ्युपगमेन आक्षेपानवकाशात् । एतच्च कर्णेहत्य वेदस्वरूपविमर्शे पर्यालोचनीयम् । यत्तु -"वा इति य इति चकार शाकल्य, उदात्त त्वेवमाख्यातमभविष्यद् असुसमाप्तश्चार्थ:' ( नि० ६ २८ ) इति यास्केन ' वनेन वायो न्यधायि... ' ( ऋ ० स० १० २९| १ ) इति मन्त्रं पठित ' वाय ' इति एक पदं मत्वा व्याख्याय लिखितम् । शाकल्येन वा, य., इति पदविभाग. कृतः स चायुक्तः, 'य' इति प्रयोगे अधायि इत्याख्यातस्योदात्तत्वं स्यात् । ' यद्वृत्तान्नित्यम्' ( पा० सू० ८| १ | ६६ ) इति यत्पदस्य योगे परस्याख्यातस्यानुदात्तत्व न भवति । अधायीत्याख्यात तु अनुदात्तमेव । तस्माद्यास्क- रीत्या पदपाठः शाकल्यकृतत्वात् पौरुषेय एव ' इति, तदपि यत्किञ्चित्, तथात्वे शाकलीसहिताया अपि शाकल्यकृतत्वेन पौरुषेयत्वापत्ते. 1। यदि तु शाकल्यस्य प्रकाशकत्वेनैव कर्तृत्वोपचार इति न संहिताया. पौरुषेयत्वम्, तहि पदपाठेऽपि तथैव वक्तु शक्यत्वात् । वस्तुतस्तु - यथा स्वाभिमतशाखाया महत्त्वबोधनाय ' तदुहैकेऽन्वाहु होता यो विश्ववेदस इति नेदरमिति आत्मानं ब्रवाणीति तदु तथा न ब्रूयाद् मानुषं हते यशे कुर्वन्ति । तस्माद्यथैव ऋचा अनूक्तमेवानुब्रूयाद होतारं विश्ववेद- समिति' ( श ० १ | ४ | ११३५ ) इति, यथा ब्राह्मणे होतारं विश्ववेदसमिति पाठस्य प्रशंसार्थं होता यो विश्ववेदस इति पाठान्तरस्य • मानुषत्वकथनेन निन्दा कृता, तथैव यास्केन 'वाय:' इति पाठयुक्ताया: संहिताया. प्रशंसार्थं 'वा' 'यः' इति भिन्नपाठवत्याः ' ' ' ' शाकल्यसहिताया निन्दार्थमेव तत्र दूषणमुक्तम् । शाकल्यः स्वसंहितायां वा यः इति चकार । उदात्तं त्वेवमा- इस बात को पण्डित दीनानाथ शास्त्री सारस्वस्त ने बडे विस्तार से सिद्ध किया है । 'सम्प्रदायाविच्छिन्नत्वे सत्यस्मर्यमाणकर्तृत्वम्' इस लक्षण को और उसकी व्याख्या को भी मीमासक जी ने अशुद्ध रूप से प्रदर्शित किया है । वस्तुतः यह अपौरुषेयता का लक्षण है । अपौरुषेय वाक्य समूह को ही वेद कहते है । यह लक्षण भी नवीन नही है । चित्सुखाचार्य के प्रसिद्ध ग्रन्थ चित्सुखी में इस की बहुत पहले चर्चा मा चुकी है । वे फिर कहते है कि 'इस लक्षण की माध्यन्दिन संहिता के पदपाठ में अति व्याप्ति हो जायगी, क्योंकि उस पदपाठ को अपौरुषेय नही माना जाता', किन्तु आपका यह कथन व्यर्थ है, क्योंकि हमारे मत से सभी पदपाठ नित्य माने जाते है, अतः आपका आक्षेप उन पर लग ही नही सकता । इस विषय पर हम 'वेदस्वरूपविमर्श ' नामक ग्रंथ मे विस्तार से विचार कर चुके है । 'वा इति च' इत्यादि निरुक्त वचन को उद्धृत कर आपने लिखा है कि ' निरुक्तकार यास्क ने 'वनेन वायो न्यधायि' इस मंत्र में पठित 'वाय:' को एक पद मान कर व्याख्या करके लिखा है कि शाकल्य ने ' बाय ' मे 'वा यः' ऐसा दो पद रूप विभाग किया है । वह अयुक्त है । 'य.' पद का प्रयोग होने पर 'अधायि ' क्रिया को उदात्त होना चाहिये, क्योकि यत् शब्द के योग में पद से परे भी क्रिया • ' ' ( ), पद अनुदात्त नही होता । यद्वृत्तान्नित्यम् ८1११६६ यहाँ यास्क ने स्पष्ट रूप से ऋग्वेद के पदपाठ को शाकल्य कृत अर्थात् पौरुषेय कहा है और उसमें दोष दर्शाया है ( पृ० ७८ ), किन्तु इस कथन मे भी कोई सार नही है । इस तरह से तो शाकली सहिता को भी शाकल्य कृत होने से ही औपचारिक रूप से इसके कर्ता मान लिये गये है, अत इसमें पौरुषेयता नही आवेगी । यदि आप ऐसा मानते हैं, तो उसी पद्धति से पदपाठ के विषय में भी यही उत्तरदिया जा सकता है । वास्तव में देखा जाय तो ' तदुद्वैके ' प्रभृति शतपथ वाक्य में जैसे स्वामिभत शाखा के और उसमें स्वीकृत पाठ के महत्व को बताने { के लिये उसकी प्रशंसा की गई है और अनयमित पाठ की निन्दा की गई है, उसी पद्धति से यास्क ने 'वाय ' पाठ वाली संहिता की प्रशंसा और 'वा यः' पाठ वाली शाकल्य संहिता की निन्दा के लिये उक्त दूषण बताया है कि शाकल्प ने उस सही
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वेदार्थपारिजातः १८६३ , ' ' ख्यातमभविष्यत् । असुसमाप्तश्चार्थ इति एतेनेदमायात यद् यास्कस्ता संहितां मूलवेदं मन्यते यस्यां वाय इति एकपदमासीत् । अद्यत्वे प्रचलितायामृग्वेदशाकल्यसंहिताया ( या समाजिनो मूलवे दमपोरुषेय मन्यन्ते, या अजमेरवैदिकयन्त्रालये इति भिन्ने द्वे पदे स्त. । तथा च शाकल्यकृताया मुद्रिता, तस्या ) प्राचीनसंस्करणे ५६० पृष्ठे १०।२९।१ मन्त्रे 'वा' 'य' ' समाजिसम्मताया ऋग्वेदसहिताया मानुषत्वेन पौरुषेयत्वमेव स्यात् । यदस्य पूर्वमपर तदस्य अहेरिव सर्पण शाकल्यस्य न विजानन्ति' ( ऐ० ब्रा० ३।५ ) इत्यस्य व्याख्याने युधिष्ठिरमीमासकेनैव संस्कृत व्याकरणशास्त्र का इतिहास इति ग्रन्थस्य १२४ पृष्ठे शाफलशाखाया आद्यन्तयो समानत्वेन अहिगतिरुक्ता । अर्थात् शाकलशाखाया. प्रथममण्डले १ ९ १ सूक्तानि सन्ति, तथैवान्तिमे दशमे मण्डलेऽपि १ ९ १ सूक्तानि सन्ति । एतेन वर्तमाना ऋग्वेदसंहिता शाकलसहितैव सिद्धयति, अष्टकवत्या संहितायां तु नेदं घटते । तत्र प्रथमाष्टके २६५ वर्गा अष्टमाष्टके च २४६ वर्गा सन्ति । अस्याः शाकलसंहि तायाः सूच्याम् आर्यसमाजिना विश्वेश्वरानन्देन नित्यानन्देन च ' वाय:' इति एकपदपाठः कापि न स्वीकृत । अस्यैव मन्त्रस्य ' वा' इति पद सूच्यां ३७१ पृष्ठेऽस्ति । अस्यैव मन्त्रस्य ' य' इति पदं ३२१ पृष्ठेऽस्ति । वैदिकयन्त्रालयमुद्रितायामथर्ववेद- सहितायामपि ' वा' 'य.' ( अथवं ० २७६ १ ) इति द्वे पदे पृथक् पृथक् स्तः । निर्णयसागरप्रकाशितायां पदसूच्यामपि ' वाय.' इति पाठो नास्ति | मुद्रणप्रमादोऽपि न वक्तुं शक्यते सर्वत्रैकरूप्यात् । एतेन यास्करीत्या शाकलसंहिताया अथर्ववेद- संहितायाश्च पौरुषेयत्वमेव सिद्धयति न वेदत्वम् । व्याख्यानं तु सर्वैरपि भाष्यकारैः 'वाय' इति एकपदानुसारेणैव कृतम्, { वेः पक्षिणोऽय वाय, पक्षिशावक इत्यर्थः । एतेन सा ऋग्वेदसंहिता काचिदन्यैब यस्यां ' वनेन वायो न्यधायि चाकन् ' ( ऋ० म० १०। २९। १ ) इति मन्त्रे ' वाय. ' इत्येकपदपाठ आसीत् । यत्तु — “शाकल्यस्य पदपाठकर्तृत्वेन ॠग्वेदसंहिताया. शाकलसंहितेति नामकरणम् । यथा -' उखः शाखामिमां पाठ को अपनी सहिता 'वाय ' कर दिया है और इसी कारण से उस पाठ में उक्त दोष आते है । इससे यही सिद्ध होता है कि यास्क उस संहिता को मूलवेद मानते है, जिसमें कि 'वाय:' इसको एक पद माना गया है । आजकल प्रचलित ॠग्वेद की शाकल्यसंहिता के, जिसको कि समाजी मूल अपौरुषेय वेद मानते है और जो अजमेर के वैदिक यन्त्रालय से छपी है प्राचीन संस्करण मे ५६० पृष्ठ पर छपी ( २०१२९/ १ ) संख्या के मन्त्र में 'वा य.' इस तरह भिन्न पद बाला पाठ ही छपा है । इस तरह से आपके द्वारा उद्धृत निरुक्त वचन से आपकी बात सिद्ध न होकर उलटे आपके द्वारा अपौरुषेय वेद के रूप में स्वीकृत शाकल्य सहिता हो पौरुषेय सिद्ध हो जाती है । 'यदस्य पूर्व०' प्रभृति ऐतरेय ब्राह्मण के वचन की व्याख्या करते हुए युधिष्ठिर मीमासक ही 'संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास' नामक ग्रन्थ के पृ० १२४ पर शाकल शाखा के आदि और अन्त भाग के समान होने के कारण उसकी गति सर्प सरीखी मानी है । अर्थात् शाखा के प्रथम मण्डल मे १ ९ १ सूक्त हैं और अन्तिम दशम मण्डल में भी इतने ही है सूक्त है । इससे सिद्ध होता है कि वर्तमान ॠग्वेद सहिता ही शाकल सहिता है । अष्टक विभाग वाली संहिता में यह लक्षण घटित नही होता, क्योंकि प्रथमाष्टक मे २६५ वर्ग है भौर अष्टमाष्टक में २४६ वर्ग हैं । इस शाकल संहिता की सूची में आर्यसमाजी विश्वेश्वरामन्द और नित्यानन्द ने 'वाय ' इसको एक पद के रूप मे कही भी स्वीकार नही किया है । ये दोनो पद वहाँ अलग अलग पृष्ठो पर उल्लि- खित है । वैदिक यन्त्रालय से मुद्रित अथर्ववेद सहिता में भी 'वाय ' ये दोनो पद अलग अलग है । निर्णय सागर प्रेस से छपी 1 पदसूची मे भी ' वा य.' यह पाठ नही मिलता । इसको मुद्रण का दोष भी नही कहा जा सकता, क्योंकि सर्वत्र एकरूपता है । इस तरह से आपकी व्याख्या के अनुसार तो यास्क के प्रमाण से शाकल संहिता और अथर्ववेद संहिता दोनों पौरुषेय सिद्ध हो जाती है, और इस तरह से इनको वेद से बाहर कर देना पडेगा । इसकी व्याख्या तो सभी भाष्यकारो ने एक पद मानकर ही की है । इस पद का अर्थ होता है पक्षी का बच्चा । इससे यही सिद्ध होता है कि वह ऋग्वेद संहिता कोई दूसरी ही थी, जिसमें कि ' वनेन वायो० ' इस मन्त्र में 'वाय' यह एक पद वाला पाठ था । यह कहा जाता है कि 'ऋग्वेदसहिता का पदपाठ शाकल्य ने बनाया था, इसलिये इसको शाकल संहिता कहते है ।
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वेदार्थपारिजात.१८६४ प्राह आत्रेयाय यशस्विने । तेन शाखा प्रणीतेयमात्रेयी चैव सोच्यते ॥ यस्या. पदकृदात्रेय:.. ' ( तैत्तिरीयकाण्डानुक्रम -पृ० ९।२६-२७ ) तदर्थस्तु — उरवेनेय शाखा आत्रेयाय पाठिता । आत्रेयोऽस्य पदकृत् तेनेयमात्रेयी संहितोच्यते । तथैव , ',, शाकल्येन ऋग्वेदसंहितायाः पदपाठ कृतः तत एवेय शाकलसंहितोच्यते इति तदप्यसङ्गतम् विकल्पासहत्वात् । किमात्रेयायोखेनेयं शाखा प्रोक्ता, आत्रेयेन च तस्याः पदयोजना कृता, तस्मादस्या आत्रेयीति नामकरणम्, आत्रेयस्य पद-पाठकारत्वाद्वाऽस्या आत्रेयीति नामकरणम्? यदि पदपाठकारत्वेनास्यास्तथा नामकरणं स्यात्तदा तथैव वक्तव्यमासीत् । अत्र तु 'तेन शाखा प्रणीतेयम्' इत्युक्तम् । अर्थात् तेन प्रणयनात् सा आत्रेयी उच्यते । प्रणयन लिपिबद्धकरणम् । एवमात्रेयीति नामकरणस्य हेतुमुक्त्वा ' यस्याः पदकृदात्रेयः' इत्युक्तम् । यदि पदपाठकारत्वेन तस्या आत्रेयीति नामकरण स्यात्, तदा कुण्डिनेन तस्या वृत्तिकरणात् कोण्डिनीति नाम किन्न स्यात्? तथैव यदि शाकल्येन पदपाठनिर्माणाद् ऋग्वेदसंहितायाः शाकल्यसहितेति नामकरणं स्यात्तदा यजुर्वेदसंहिताया वाजसनेयी माध्यन्दिनीति वा नामकरणमपि वाजसनिना मध्यन्दिनेन वा पदपाठनिर्माणादेव स्यात् । तथा कुथुमेन पदपाठनिर्माणात् सामसंहिताया कौथुमीति नामकरणं स्यात् । अथवं संहितायाश्च शौनकेन पदपाठकरणादेव शौनकीतिनामकरण स्यात् । भगवद्दत्तादिसमाजिभिस्तथैवाङ्गीक्रियतेऽपि । तथात्वें माध्यन्दिनी-सहितायाः पदपाठकर्ता निश्चित एवेति कुतस्तत्रातिव्याप्तिः? यदि वाजसनेयी - माध्यन्दिनी- कौथुमी-शौनक्यादि नाम-सम्बन्धादेव वाजसन्यादीनां पदपाठकर्तृत्ववेन तन्नामकरणं परिकल्प्येत तदा काठकादिसंहितादीनामपि नामकरणमपि कठादीनां पदपाठकर्तृत्वेनैव स्यात् । तथात्वे च काठकादीनामबेदत्वोक्तिः समाजिना निर्मूलैव स्यात् । वस्तुतस्तु शाकल्येन पदपाठकरणात् शाकल्यसहितेति नामकरणमपि नोपपद्यते; पदपाठोऽन्यः सहिताऽन्या । संहिता सन्धिरुच्यते, पदच्छेदस्तु पदपाठः । शाकल्यस्य पदपाठकर्तृत्वेन शाकलपदपाठ इति स्यान्न शाकलसंहितेति । जैसा कि 'उख. शाखा ० ' इस तैत्तिरीय काण्डानुक्रम के श्लोक में बताया गया है कि ' उख ने इस शाखा को आत्रेय को पढाया । आत्रेय ने इसका पद पाठ बनाया । इसलिये यह मात्रेयी सहिता कहलाती है' । इसी तरह से शाकल्य ने ऋग्वेद सहिता का पाठ बनाया, इसलिये इसको शाकल सहिता कहते है । यह पूरा कथन भी असंगत है, क्योकि आगे उठाये गये विकल्प का आपके पास कोई उत्तर नही है । जैसे क्या आत्रेय को उख ने इस शाखा का प्रवचन किया और आत्रेय ने इसकी पदयोजना की, इसलिये इसका नाम आत्रेयी है? अथवा आत्रेय इसके पद पाठकार है, इसलिये इसको यह नाम दिया गया है? यदि पदपाठकार के नाम से उसका नाम किया गया है, इस बात को इसी रूप में वहीं बताना था । यहाँ पर ऐसा न करके ' उसने शाखा बनाई' ऐसा कहा गया है, अर्थात् उस शाखा का प्रणेता आत्रेय था, अतः उसे आत्रेयी कहा गया है । प्रणयन का अर्थ है लिपिबद्ध करना । इस तरह से 'आत्रेयी' नामकरण का कारण बताने के बाद कहा गया है कि 'इसके पदकार आत्रेय है' । यदि पदपाठकार के नाम से इसको आत्रेयी कहा गया, तो कुण्डिन ने इसकी वृत्ति की, अतः इसका नाम कौण्डिनी क्यों नही रखा गया । इसी तरह से शाकल्य के पद पाठ निर्माता होने के कारण ऋग्वेद संहिता का नाम शाकल्य संहिता रखा गया तो यजुर्वेद संहिता का नाम वाजसनेयी या माध्यन्दिनी नाम इसलिये माना जायगा कि वाजसनी अथवा माध्यन्दिनी ने इनके पद पाठ का निर्माण किया । इसी तरह से सामसंहिता का नाम कौथुमी इसलिये माना जायगा कि कुथुम ने इसका पद पाठ बनाया और अथर्वसहिता का पदपाठकर्ता शौनक था, इसलिये इसका नाम शौनकी रखा गया । भगवद्दत्त प्रभृति समाजी विद्वान् तो इस बात को स्वीकार भी कर लेते है । ऐसी स्थिति में माध्यन्दिनी सहिता का पदपाठकर्ता जब आपके इस मत के अनुसार सिद्ध हो जाता है, तो वहीं अतिव्याप्ति दोष कैसे आवेगा? यदि वाजसनेयी माध्यन्दिनी, कौथुमी, शौनकी नाम से सबद्ध होने के कारण ही वाजसनी प्रभृति को पदपाठकर्ता मानकर उनका नाम उन संहिताओं से जोड़ा गया है, ऐसा आप मानते हैं, तो उसी तरह से काठक-संहिता प्रभृति का नामकरण भी कठ आदि के पद पाठकर्ता होने के कारण ही मान लिया जायगा । ऐसी स्थिति में काण्वसंहिता प्रभृति को अवैदिक सिद्ध करने का समाजियो का प्रयास निराधार हो जायगा । वास्तव में पदपाठकार के नाम से सहिता का नाम रखा जाता हो, ऐसी बात नहीं है । पदपाठ भिन्न होता है और सहिता भिन्न होती है । सन्धि के कारण संहिता का रूप बनता है और पदच्छेद के कारण पद पाठ का । शाकल्य के पदपाठकर्ता होने पर शाकल पदपाठ तो कहा जा सकता है, किन्तु इतने मात्र से संहिता का नाम भी शाल संहिता नहीं हो सकता ।
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वदाथपारिजात १८६५ तथैव यास्केन निरुक्ते ( ८/२१ ) 'वनस्पते रशनया नियूय पिष्टतमया वयुनानि विद्वान् । वहा देवत्रा दिधिषो हवींषि प्र च दातारममृतेषु वोचः ।' इति ऋगुद्धृता । शाकल्यसंहिताया तु ' वनस्पते रशनया नियूया देवानां पाथ उपवक्षि विद्वान् । स्वदातिदेव कृणवद्धवीषि अवता द्यावापृथिवी हवं मे || ' ( ऋ० स० १०/७०| १० ) एव रूपेण सा लभ्यते । यदि यास्कोद्धृता ऋक् मैत्रायणीसंहिताया ( मै० सं० ४ १३/६५ ) ऋक् स्यात्, तदा निरुक्तकारस्य यास्कस्याप्तत्वं मन्यमानैः समाजि- भिर्मैत्रायणी संहिताया अपि वेदत्वं मन्तव्यमेव । यद्यपि निरुक्तोद्धृते मन्त्रे 'दिधिषो ' इति पाठ, मैत्रायणीसहिताया तु दधिषोः इति पाठो दृश्यते । तथैव ' देवेभ्यो वनस्पते हवीषि' ( नि० ८/ १९ ) इति समुद्धृता ऋगपि शाकल्यसहिताया नोपलभ्यते । मैत्रायणीसंहिताया ( ४| १३| ६३ ) लभ्यते । 'भद्र वद दक्षिणत.' ( नि० ९१५ ) इति निरुक्तोद्धृता ऋगपि शाकल्यसंहिताया नोपलभ्यते, ऋक्परिशिष्टे तुपलभ्यते, तस्माद् यास्काभिमता ऋक्सहिता शाकलसहिताया अन्यैव । तस्या प्रशंसार्थमेव यास्क: शाकल्यसंहिताया 'वा' 'य' इति पाठभेदस्य शाकल्यकृतत्वेन मानुषीत्वेन ता निन्दति । तस्मात् शाकल्येन पदपाठकरणान्नास्याः शाकल्यसहितेति नामकरणं सम्भवति, किन्तु शाकल्येन प्रोक्तत्वात् प्रकाशितत्वाद्वाऽस्याः शाकलसहितेति नामकरणम्, ऐतरेयादिवचनेन पदपाठस्याप्यपोरुषेयत्वात् । पदपाठोऽपि प्रोक्तत्वात् तत्तन्नाम्ना प्रसिद्धः । माध्यन्दिनसंहितायाः पदपाठस्य न प्रसिद्धिस्ते नतरा तस्य पौरुषेयत्वम् । ' अथ ऋग्वेदाम्नाये शाकलके ( ११ ) इति सर्वानुक्रमणिकावचनात् शाकल्यप्रवचनादेव शाकलकं तद्विशेषणं, न पदपाठात् । षड्गुरुशिष्येण तु वेदार्थदीपिकायां शाकल्यो- चारणं शाकलकमित्युक्तम् । शौनकाचार्यस्य अनुवाकानुक्रमण्या च शाकल्यदृष्टे वेदे इत्युक्तम् । एवं यथा शाकल्यसंहिताया वेदत्वमुक्तं तथैव सर्वासामपि सहितानां वेदत्वं मन्तव्यम् । अत एव पाणिनिना ' देवसुम्नयोर्यजुषि काठके ' ( पा० सू० ७४| ३८ ) इत्यत्र काठकसंहिताया अपि यजुर्वेदत्वमुक्तम् । यत्तु -'न लक्षणेन पदकारा अनुवर्त्याः, पदकारैर्नाम लक्षणमनुवर्त्यम्' ( म० भाष्य ३| १| १० ९, ६।१।१०७, इसी तरह से यास्क ने निरुक्त ( ८/२१ ) मे 'वनस्पते रश० ' इति ऋचा को उद्धृत किया है । शाकल्य संहिता ( १०/७०1१० ) में भिन्न रूप में इसका पाठ मिलता है । यदि धास्क द्वारा उद्धत मन्त्र मैत्रायणी संहिता ( ४| १३| ६५ ) का माना जाय तो निरुक्तकार यास्क को प्रमाण मानने वाले आर्यसमाजियों के लिये मैत्रायणी सहिता का भी वेदत्व मानना आवश्यक हो जायगा । यद्यपि निरुक्त -उद्धृत मन्त्र में 'दिधिषो:' पाठ है और मैत्रायणी सहिता में 'दषिषोः ' यह पाठ मिलता है । इसी तरह से ' देवेभ्यो वनस्पते ' प्रभृति निरुक्त ८।१ ९ ) में उद्धृत मन्त्र शाकल्य सहिता में नही मिलता और मैत्रायणी सहिता ( ४| १३ | ६३ ) में उपलब्ध है । 'भद्र वद दक्षिणतः' यह ऋचा भी निरुक्त ( ९१५ ) मे उद्धृत है, किन्तु यह शाकल्यसहिता में न मिलकर ऋक् परिशिष्ट में उपलब्ध होती है । इन सब प्रमाणों से यही सिद्ध होता है कि यास्क द्वारा स्वीकृत ऋक् संहिता शाकल सहिता से भिन्न कोई दूसरी ही थी । उसी की प्रशंसा करने के लिये यास्क ने बताया है कि शाकल्यकृत पद पाठ का अनुसरण करने वाला पाठ स्वीकार करने के कारण शाकल्य सहिता मनुष्यकृत है । इससे यह सिद्ध नही होता कि पद पाठ के आधार पर इस सहिता का यह नाम रखा गया, किन्तु शाकल्य -प्रोक्त होने के कारण ही अथवा प्रकाशित किये जाने के कारण ही इसका यह नाम है । फिर ऐतरेय ब्राह्मण प्रभूति के वचन के अनुसार पद-पाठ भी अपौरुषेय ही माना जाता है । पद-पाठ भी प्रोक्त होने से ही उनके नाम से प्रसिद्ध है । आपके मत के अनुसार माध्यन्दिन संहिता का पद पाठ प्रसिद्ध नही है, तब उसके पौरुषेय होने का कोई प्रश्न ही नही उठता । 'अथ ऋग्वेदाम्नाये शाकलके' इस सर्वानुक्रमणी के वचन से भी शाकल्य के प्रवचन के आधार पर ही शाकलक उसका विशेषण बनता है, पद पाठ के आधार पर नही । सर्वानुक्रमणी के भाष्यकार षड्गुरुशिष्य तो वेदार्थ- दीपिका नामक भाष्य में शाकल्य के उच्चारण के आधार पर शाकलक शब्द सिद्ध किया है । शौनकाचार्य की अनुक्रमणो में 'शाकल्य दृष्ट वेद' यह उसका अर्थ किया है । इस परिस्थिति में भी आप शाकल्य सहिता को वेद मानते हैं, तो उसी तरह अन्य संहिताओं को 2 भी आपको वेद मानना चाहिये । 'देवसुम्नयोर्यजुषि काटके ' (प्रा० सू० ७२४१३८ ) इस सूत्र में पाणिनि ने काठकसंहिताको वेद माना ही है । पृ० ७८-७९ पर आप लिखते हैं कि 'न लक्षणेन पदकारा अनुवर्त्याः' महाभाष्य के इस प्रमाण के आधार पर पदपाठ २३४
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वेदार्थपारिजातः १८६६ ८२/१६ ) इति महाभाष्यरीत्या पदपाठस्य पौरुषेयत्वं स्पष्टम्, 'न लक्षणे नेति संहिताया एव नित्यत्वं पदच्छेदस्य तु पौरुषे- यत्वम् इति ३ | १ | १० ९ सूत्रभाष्यव्याख्याने कैयटः । तेन पदपाठस्य पौरुषेयत्वमिति तदपि ' तेन प्रोक्तम्' ( पा० स० ४| ३| १०१) इति सूत्रप्रत्याख्यानावसरे महाभाष्यकारैः 'या त्वसौ वर्णानुपूर्वी सा अनित्या' इति । अत्र नागेश: - 'वेदानुपूर्वी अनित्या' इत्यर्थः । एतेन संहितानामप्यनित्यत्वस्वीकारेण पौरुषेयत्वाभ्युपगमात् । सर्वमेतत् काठकादिसंहितानामेव कृते न शाकला- दीनामित्यादिकं तु सर्वमिहैव विस्तरेण निराकृतम्, काठकादिपुरुषविशेषकृतत्वेन वर्णानुपूर्व्या अनित्यत्वेऽप्येकरूपत्वात् प्रलयपर्यन्तस्थायित्वेन नित्यत्वोपचार इति केचित् । यद्यपि क्ठादीनां प्रवक्तृत्वेनैव काठकादिसमाख्या, न तु तत्कर्तृकत्वेनेति निरूपितमेव, तथापि नित्याना विभूनां वर्णानामानुपूर्व्यसम्भवात् कण्ठताल्वादिजनितध्वनिविशिष्टवर्णव्यक्तीनामनित्यत्वेन पौर्वापर्यसम्भवेऽपि शिष्याचार्यव्यक्तीनां भिन्नत्वेन आनुपूर्वीणां भिन्नत्वेऽप्यनन्तानन्तसृष्टिप्रलयादिष्वपि समानरूपत्वेनैक- रूप्यात् प्रवाहरूपेण नित्यत्वमिति पूर्वानुपूर्वीसमानानुपूर्वीकत्वेन प्रथमोच्चरितत्वाभावेन स्वतन्त्रोच्चरितत्वाभावेन चापौरु- षेयत्वमेव । लक्षणेकचक्षुष्कैः सर्वेक्षणानामनुवर्तनीयत्वेऽपि न लक्ष्येकचक्षुष्कानां तदनुवर्तनम् । अत एव वैदिकेष्वार्षेषु च वाक्येषु लक्षणानुसारित्वं प्रायिकमेव क्वचिदन्यथापि प्रयोगदर्शनात् । पाणिन्यादिसूत्रेष्वपि कचिल्लक्षणानुसरणं दृश्यते 'युष्मदस्मदोः षष्ठी चतुर्थीद्वितीयास्थयोर्वा नावो' ( पा० सू० ८ ११२० ) इत्यादी । तत्कस्यचिज्ज्ञापकमित्यन्यत् । शाकल्या- दीनामृषित्वेन तत्कृतावार्षप्रयोगस्यापि सम्भवात् । पदकारैर्लक्षणमनुवत्यमिति तु प्रायिकमेव | यदपि --' ऐतरेयादिब्राह्मणग्रन्थेषु स्वरचिह्नानुपलम्भात् प्राचीनकाले च ब्राह्मणग्रन्थानामपि सस्वरत्वात् सम्प्रदायविच्छेदेनाव्याप्तेश्च ' इति, तन्न, एकदेशविकृत मनन्यवदिति स्वरराहित्येऽपि पठनपाठनसम्प्रदायाविच्छेदस्य सत्त्वात् यथा समाजिपठिता वेदमन्त्रा. स्वरसम्प्रदायशून्या अपि तैर्मन्त्रा अभ्युपेयन्ते, तद्वत् । किञ्च, अत्यल्पमिदमुच्यते । शाकला- पौरुषेय है । कैयट ने यहा स्पष्ट किया है कि सहिता ही नित्य होती है, पदच्छेद तो पौरुषेय माना जाता है । अतः पद-पाठ पौरुषेय ही माना जायगा, नित्य नहीं, किन्तु इसका उत्तर 'लेन प्रोक्तम्' इस सूत्र का प्रत्याख्यान करते हुए स्वयं भाष्यकार ने दे दिया है कि वर्णानुपूर्वी अनित्य मानी जाती है । इस वचन की व्याख्या करते हुए नगेशभट्ट कहते है कि वेद की आनुपूर्वी अनित्य है । इस तरह से संहिता की भी अनित्यता और पोरुषेयता स्वीकृत हो जाती है । आप इस वाक्य को काठक प्रभृति संहिताओ के साथ जोड सकते हैं, किन्तु इसका सही उत्तर हमने पहले ही दे दिया है कि कुछ लोग इसका समाधान यह करते है कि काठक प्रभृति विशेष पुरुष की कृति होने से वर्णानुपूर्वी के अनित्य होने पर भी प्रलय पर्यन्त स्थायी होने से इनमें नित्यत्व का औपचारिक प्रयोग होता है । वस्तुतस्तु कठ प्रभृति के प्रवचन के आधार पर ही काठक प्रभृति सज्ञा संहिताओं की रखी गई है, कृति के आधार पर नही । नित्य और विभु वर्णों में आनुपूर्वी नही बन सकती, तो भी कण्ठ, तालु प्रभृति से उत्पन्न ध्वनिविशिष्ट वर्णों की अनित्यता के आधार पर उनमें यह मानुपूर्वी औपचारिक मानी जाती है । इस स्थिति मे शिष्य और आचार्य की भिन्नता के आधार पर यह मानुपूर्वी भी भिन्न भिन्न मानी जायगी, किन्तु यह आनुपूर्वी एक ही प्रकार की होगी और अनन्तानन्त सृष्टि- प्रलय परम्परा में भी यह जानुपूर्वी बदलेगी नहीं । अतः प्रवाह रूप से यह नित्य मानी जायगी । इसका अभिप्राय यह हुआ कि पूर्वानुपूर्वी के समान आनुपूर्वी का उच्चारण न होने के कारण ही यह अपी- रुषेय है । लक्षणो का अनुसरण करके चलने वालों को लक्षण का अनुवर्तन करना ही चाहिये, किन्तु लक्ष्य मात्र की दृष्टि वाले ऋषियो के लिये यह आवश्यक नहीं है । इसीलिये वैदिक आर्ष वाक्यों मे लक्षण का अनुसरण प्रायिक है, कभी- कभी इच्छानुसार वे लक्षण का अनुवर्तन भी करते हैं । पाणिनि प्रभृति के सूत्रों में भी कही कही प्राचीन लक्षण का अनुवर्तन देखा जाता है । ' युष्मदस्मदो:' इत्यादि सूत्रों में यह देखा जा सकता है । शाकल्य प्रभृति ऋषि है, इनकी कृति में आर्ष प्रयोग मिलते ही चाहिये । पदकार लक्षण का अनु- वर्तन करें ही, यह आवश्यक नहीं है । 'ऐतरेय प्रभूति ब्राह्मण ग्रन्थों में अब स्वरों के चिह्न उपलब्ध नही होते, किन्तु प्राचीन काल में इनका पाठ सस्वर उप- लब्ध था । इस तरह से ब्राह्मण ग्रन्थों में सम्प्रदाय का विच्छेद हो जाने से उक्त बंद लक्षण इनमें नहीं घटता, यह कहना भी इसलिये L 'ठीक नहीं है कि 'एक देश के विकृत होने पर भी वह भिन्न नही हो जाता' इस न्याय के अनुसार स्वर के अभाव में भी पठन-पाठन के 1 1
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वेदार्थपारिजात १८६७ दिकतिचिच्छाखाभ्योऽतिरिक्ताः सहस्राधिका: शाखा अपि लुप्ता एवेति तावतापि सूर्यलोके तासा सम्प्रदायाविच्छेदस्य सत्त्वेनापौरुषेयत्वानपायात् । अन्यथा समाजिसम्मता वेदा अपि सहस्राधिकनगरग्रामादिषु कोटिकोटिमनुष्येषु विच्छि- न्जसम्प्रदायत्वेन पौरुषेया एव स्युः । अन्यादृशस्यापौरुषेयत्वस्य समाजिभिरपि वक्तुमशक्यत्वात् । ईश्वरनिर्मितत्वरूपाऽ पौरुषेयत्वसिद्धिस्तु दुर्लभैव । कस्यचिदृषेर्वचनेन तथात्वाभ्युपगमे तु बुद्धजिनादिवचनस्य तथैव प्रामाण्यं किन्न स्याद् इत्युक्तो प्रत्युत्तरासम्भवात् । सूर्यलोके वेदास्तिष्ठन्तीत्यत्र तु वायुपुराणस्य वचनमेव प्रमाणम् । युधिष्ठिरमीमांसको लौकिक- वाग्व्याहारेष्वपि सस्वरत्वसाधनाय यतते । परं समाजिनस्तु वेदमन्त्राणामपि सस्वरोच्चारणं कर्तुं न पारयन्ति । यच्च -–' यथा स्वररहितकल्पसूत्राणामाम्नायवत् प्रामाण्य नास्ति, तथैव स्वररहित ब्राह्मणग्रन्थानामप्याम्नायवत् प्रामाण्यं नास्ति ' इति, तदपि यत्किञ्चित्, तथात्वे समाज्युच्चरितमन्त्राणामपि स्वर हीनत्वेनाप्रामाण्यापत्तेः । वस्तुतस्तु स्वर- राहित्यं स्वरसाहित्यं वा न प्रामाण्याप्रामाण्यप्रयोजकं यथा पौरुषेयत्वम् 1। तदेवं नाम्नायवत्प्रामाण्यप्रयोजकम्, अन्यथा सस्वरस्य कल्पसूत्रस्याम्नायवत्प्रामाण्यापत्तेः । न च तदसम्भव एव, स्वरप्रक्रियया प्रकृष्टपक्षैः साधयितु शक्यत्वात् । त्वदन- भिमतानां काठकादिसंहितानां सस्वरत्वेऽपि त्वया तासामाम्नायवत् प्रामाण्यानभ्युपगमात् । पण्डितरामावतारशमंभिरनेके नवीनाः सस्वरा मन्त्रा निर्मिताः । एका संहिता सस्वरा एवोपलभ्यते । न च प्रसिद्धाम्नायवत्तादृशमन्त्राणां प्रामाण्यं शक्य- समर्थनम्, सम्प्रदायाभावात्, ऐतरेयादिब्राह्मणानां स्वरराहित्येपि पठनपाठनतदर्थानुष्ठानपारम्पर्याविच्छेददर्शनात्, तत्रैकदेश- विकृतमनन्यवदिति रीत्याऽपौरुषेयत्वमेव मन्तव्यम् । सम्प्रदाय में अविच्छिन्नता बनी ही है । जैसे आर्यसमाजी बिना स्वर सम्प्रदाय के ही वेदो का पाठ करते हैं और उनको मन्त्र मानते हैं, उसी तरह से यहाँ भी समझना चाहिये । यह तो आपने कम ही कहा, शाकल प्रभृति कुछ शाखाओ को छोडकर वेद की सहस्राधिक शाखाएँ लुप्त हो गई है, तो भी सूर्यलोक में इनका सम्प्रदाय अविच्छिन्न रूप से विद्यमान है और इस तरह से इनकी अपौरुषेयता में कोई बाधा नही पड़ती । अन्यथा आर्यसमाजियो के द्वारा स्वीकृत वेद भी सहस्त्राधिक नगरो ओर ग्रामो में करोडो-करोड मनुष्यों में बंटे हुए हैं, इस तरह से विच्छिन्न रूप से विद्यमान होने से ये भी पौरुषेय माने जागंगे । हमने अपौरुषेयता का जो लक्षण कर दिया है, उससे भिन्न प्रकार का इसका लक्षण आप बना नही सकते । ईश्वर निर्मित होने से ये अपौरुषेय है, इसको सिद्ध कर पाना असंभव है । किसी ऋषि के कथन के आधार पर ऐसा मानने पर तो बुद्ध, जिन प्रभृति के वचनो को भी प्रमाण मानना पडेगा और इसका आपके पास कोई उत्तर नहीं मिलेगा । सूर्यलोक में वेद विद्यमान है, इसमे तो वायु-पुराण का वचन प्रमाण है । युधिष्ठिर मीमासक लौकिक बातचीत में भी स्वर की सत्ता सिद्ध करने का प्रयास करते है, परन्तु समाजी विद्वान् तो मन्त्रों का भी सस्वर उच्चारण नही कर सकते । 'जैसे स्वर रहित कल्प सूत्रो का वेद के समान प्रामाण्य नही है, उसी तरह से स्वररहित ब्राह्मणों का भी प्रामाण्य नही माना जायगा ' यह कथन भी निःसार है, क्योकि समाजियो के द्वारा उच्चरित मन्त्र भी स्वरहीन होने से इसी पद्धति के अनुसार अप्रमा मान लिये जायेंगे । वास्तव में स्वरसाहित्य अथवा स्वरराहित्य प्रामाण्य अथवा अप्रामाण्य का प्रयोजक नही है । इसका निश्चायक तो पौरुषेयत्व और अपौरुषेयत्व धर्म ही है । यदि ऐसा नही माना जायगा तो अस्वर कल्पसूत्र को भी आपको वेद के समान प्रमाण मानना पडेगा । इसमें असंभावना की कोई बात नहीं है, क्योकि स्वर प्रक्रिया के उत्कृष्ट नियमो के आधार पर ऐसा ही किया जा सकत है । फिर आप तो स्वर की विद्यमानता होने पर भी काठक संहिता प्रभृति को वेद के समान प्रमाण नही मानते । पण्डित रामावता शर्मा ने अनेक सस्वर मन्त्रों का निर्माण कर दिया था । एक पूरी संहिता ही उन्होने सस्वर बना दी है, किन्तु सम्प्रदाय के अभाव वेद के समान उसका प्रामाण्य कभी भी स्वीकार नही किया जा सकता । इसके विपरीत ऐतरेय प्रभृति ब्राह्मणों में स्वर के अभाव मे भी पठन-पाठन और उसके अर्थ का अनुष्टान करने की परम्परा के अक्षुण्ण चलते रहने के कारण 'एकदेश विकृत' न्याय से अपौरुषेयता लक्षण घटित होने से उनका प्रामाण्य अव्याहत माना जायगा ।
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१८६८ वेदार्थपारिजातः यत्तु — 'यत्र ब्राह्मणग्रन्थेषु वेदशब्दव्यवहारस्तत्र वेदशब्देन न ब्राह्मणग्रहणम्' इति, तदसङ्गतम्, तथात्वे मन्त्रेषु यत्र मन्त्रव्यवहारस्तत्रापि मन्त्रपदेन मन्त्रग्रहणानापत्तेः । त्वद्रीत्या, मन्त्र -वेदा -म्नाय श्रुतिशब्दानां पर्यायत्वोपगमात् । यदपि - ( वस्तुतः शङ्कास्वरूपमित्यम् ) एवमिमे सर्वे वेदा निर्मिताः सकल्पाः सरहस्याः सब्राह्मणाः सोपनिषत्काः सेतिहासाः सपुराणा:' ( गोपथब्रा० १।२1१ ) इत्यत्र न वेदशब्देन ब्राह्मणानां ग्रहणं सम्भवति, पृथग् ब्राह्मणग्रहणवैयर्थ्यापातात् इति, तदपि न मनोज्ञम् ब्राह्मणपरिव्राजकन्यायेन वशिष्ठब्राह्मणन्यायेन वा तत्र समाधानसम्भवात् । तथा च सपरिव्राजका ब्राह्मणा सवशिष्ठा ब्राह्मणा आयाता इतिवत् सब्राह्मणा वेदा इति प्रयोगे बाधाभावात् । यथा ब्राह्मणविशेष एव परिव्राजको भवति, ब्राह्मणविशेष एव वशिष्ठः प्रसिद्धः । तत्र ब्राह्मणे परिव्राजकस्य वशिष्ठस्य वा वैशिष्ट्य द्योतनायैव तथा प्रयोगः सम्भवति, तथैव ब्राह्मणस्य वैशिष्ट्यद्योतनायैव पार्थक्येन ब्राह्मणग्रहणम् ॥ ब्राह्मणस्य नियोक्तृत्वेन राजस्थानीयत्वेन मन्त्राणां विनि- योज्यत्वेन प्रजास्थानीयत्वात् । यत्तु - ' यत्र वक्तृश्रोत्रोर्वशिष्ठस्य ब्राह्मणत्वं ज्ञातं भवति तत्रैव ब्राह्मणवशष्ठि-न्यायप्रवृत्तिः । तथैव यदि वशिष्ठस्य ब्राह्मणेतरत्वमेव निश्चितं स्यात्तदा नास्य न्यायस्य प्रवृत्तिः, तथैव यदि ब्राह्मणग्रन्थाना वेदत्वेन स्वीकृतिः स्यात्तदेव तन्न्यायप्रवृत्तिः । ब्राह्मणग्रथेषु च ब्राह्मणग्रथो वेदोऽस्तीति नोक्तम्, तस्मान्नात्र न्यायस्य प्रवृत्तिः इति, तदेतदरण्यरोदनमेव, ' नह्येष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति' इति न्यायविषयत्वात् । तादृशशब्दप्रयोगाच्च तथात्वविज्ञानात् । सर्वत्र वैदिकेषु मन्त्रेषु ब्राह्मणेषु च वेदत्वं पारम्पर्येणैव निश्चितम् । बुद्धिप्रयत्नानपेक्षत्वेन निःश्वासस्याकृत्रिमत्ववन्मन्त्रब्राह्मणादीनां परमेश्वरस्य निःश्वसितत्वेनाकृत्रिमत्वाञ्चापौरुषेयत्व वेदत्वं च सिद्धमेव । एवमिमे वेदाः सब्राह्मणा इति प्रयोगदर्शनेन सन्दिहानस्य ब्राह्मण- विशिष्ठन्यायेन समाधानम् । यदि कश्चिद् वेदरामायणमहाभारतादिसिद्धब्राह्मण्यत च्छ्रेष्ठत्वस्य । ब्राह्मणस्यापि वशिष्ठस्य ब्राह्मणे- 'ब्राह्मण ग्रन्थों में जहाँ वेद शब्द का व्यवहार मिलता है, वहीं वेद शब्द से ब्राह्मण ग्रन्थों का ग्रहण नही होता' ( पृ० ८०) यह कथन भी असंगत है, क्योकि इसी तरह से कोई कहने लगेगा कि मन्त्रसंहिताओं में जहाँ मन्त्र शब्द का व्यवहार है, वहीं मन्त्र शब्द से मन्त्र का ग्रहण नही होता । आपने मन्त्र, वेद, आम्नाय, श्रुति इन शब्दो को पर्यायवाची माना है । आपकी शंका का स्वरूप यह है- 'एवमिमे ०' इस गोपथ ब्राह्मण के वचन में वेद शब्द से ब्राह्मण का ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ पर वेद के अतिरिक्त ब्राह्मण शब्द भी जोड़ा गया है, यदि ग्राह्मण भी वेद ही है, तो उसी से ब्राह्मणभाग का भी ग्रहण हो जाता और उस स्थिति में यहाँ पठित ब्राह्मण पद व्यर्थ हो जाता', किन्तु यह कथन इसलिये रुचिकर नही है कि 'ब्राह्मणपरिव्राजक' न्याय अथवा ' वसिष्ठ बाह्मण न्याय' से इसका समाधान किया जा सकता है । सपरिव्राजक बाह्मण अथवा सवशिष्ठ ब्राह्मण के समान सबाह्मण वेद का प्रयोग किया जाय, तो इसमें क्या आपत्ति हो सकती है । जैसे परिव्राजक भी बाह्मण ही है और वसिष्ठ भी बाह्मण ही है, तो भी ब्राह्मण पद से उनकाग्रहण कर उनको आदर देने के लिये उनका नाम भी लिया जाता है, उसी तरह से ब्राह्मण वेद होने पर उसको विशेष आदर देने के लिये गोपथ / के उक्त वचन में ब्राह्मण का वेद से अलग पाठ किया गया है । ब्राह्मणभाग विनियोजक होने से राजा 1 का स्थान रखता है और मन्त्र कर्म में विनियुक्त होने से यहाँ पर प्रजा स्थानीय है । इस परिस्थिति में ब्राह्मण भाग का अलग से उल्लेख कर उसको विशेष आदर दिया जाय, यह उचित ही है । 'जहाँ वक्ता और श्रोता को वशिष्ठ ब्राह्मण है, यह ज्ञात रहता है, तभी उक्त न्याय की प्रवृत्ति होती है । वसिष्ट ब्राह्मणे-तर है, यह निश्चित हो जाने पर इसकी प्रवृत्ति नहीं होती । उसी तरह से ब्राह्मण ग्रन्थों को वेद मान लेने पर ही उस न्याय की प्रवृत्ति होगी । ब्राह्मण प्रन्थों में यह कही भी नहीं कहा गया है कि ब्राह्मण ग्रन्थ वेद है । अतः इस न्याय की प्रवृत्ति यहाँ नही होगी, यह कथन भी अरण्यरोदन मात्र है । 'यह स्थाणु ( सूखा पेड़ ) का अपराध नहीं है कि अन्धा उसको नही देख पाता' । वैदिक सम्प्रदाय में सर्वत्र ब्राह्मणों का वेद के रूप में परम्परा से स्वीकार किया गया है । बुद्धि प्रयत्न की अपेक्षा के बिना ही निःश्वास के समान अकृत्रिम रूप से मन्त्र-ब्राह्मणात्मक पूरा वाङ्मय परमेश्वर के निःश्वास से निकला है, अतः वह अकृत्रिम भोर अपौरुषेय है । इस तरह से इस पूरे वाङ्मय की वेद संज्ञा है । 'एवमिमे ० ' 'इस गोपथ वचन से जिसके मन में सन्देह पैदा हो गया है, उसका समाधानं ब्राह्मण