वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1–10

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1–10

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वाजसनेयि- माध्यन्दिन शुक्लयजुर्वेद - संहिता करपात्र भाष्य- समन्विता प्रणेतार: अनन्त श्री विभूषिताः स्वाभिकरपात्र महाराजाः प्रथमोऽध्यायः भाषानुवादकः डा ० पं ० गजानन शास्त्री मुसलगाँवकरः मीमांसा वेदान्त साहित्याचार्यः एम. ए. पी - एच. डी. प्रकाशक: श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थानम् कलकत्ता वृन्दावनम् श्रीवृन्दावनम् प्रथम संस्करणम् विजया दशमी २०

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प्रकाशक-श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थानम् कमकता • वृन्दावनम् मूल्य: पैंसठ रुपये ( Rs65 / - ) अस्य ग्रन्थस्य सर्वेऽधिकाराः राजकीय नियमानुसारेण सुरक्षिता: पुस्तक प्राप्तिस्थानम् १। राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पैट्रो कैमिकल्स लिमिटेड ११३, पार्कस्ट्रीट, साततल्ला, कलकत्ता - 700016 २ | राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान ब्रह्मकुटीर, डी ० २५ / १८ नारद घाट वाराणसी ( उ ० प्र ० ) ३ । राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान धर्मसंघ विद्यालय रमणरेती, वृन्दावन मथुरा ( उ ० प्र ० ) ४ । राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान Clo मैसूर पैट्रो केमिकल लिमिटेड ४०१ / ४०४ राहेजा सेण्टर २१४, नारीमन पोइन्ट, बम्बई ४०००२१ मुद्रक-श्रीहरिनाम प्रेस हरिनाम पथ, वृन्दावन -- २८११२१ दूरभाष: ४१५

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Vajasaneyi - Madhyandin Shukla - Yajurveda - Samhita ( With the Karpatra Bhashya ) BY Anant Shri Vibhushit Swami Karpatra ji Maharaj Hindi Translation by Memansacharya Dr. Pt. Gajanan Shastri Memansa - Vedanta - Sahityacharya M. A., Ph. D. PUBLISHER Shri Radhakrishna Dhanuka Prakashan Sansthana CALCUTTA VRINDABAN All Rights reserved by the publisher FIRST EDITION Shri Vrindavana Vijaya Dashmi - 2043

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भूमिका श्री विभूषित जगद्गुरु शङ्कराचार्य - पूर्वाम्नाय गोवर्द्धनमठपुरीपीठाधीश्वर स्वामी श्रीनिञ्जनदेवजी तीर्थ महाराज

वेदं वेदनिधि विद्यां ब्रह्मविद्यां गणाधिपम् ।

सरस्वतीं गुरून् सर्वान् प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ १ ॥

भूमिका स्वामिपादानां भाष्यस्येयं निगद्यते ।

सारभूतकविंशत्या विदुषां प्रीतिहेतवे ॥ । २ ॥

स्वस्वरूपस्थितिर्मोक्षो वेदस्यैकं भगवद्भक्तियोगश्च द्वितीयं प्रयोजनम् । तत्प्रयोजनम् || ३ ||

अत्रावतारवादोऽपि बहुधा सम्प्रकीर्तितः ।

मन्त्रोऽयं स्पष्टमेवाह ' इदं विष्णुविचक्रम ' ॥४ ॥

शक्या एतादृशा मन्त्राः समुद्धतु सहस्रशः ।

सगुणत्वं भगवतः साकारत्वञ्च साधितुम् ॥ ५ ॥

कर्मकाण्डप्रवृत्तिश्च वेदोद्देश्यतृतीयकम् ।

कर्मणामननुष्ठानात् चित्तशुद्धिः कथं भवेत् ॥ ६ ॥

कर्मोपासनबोधाख्यं त्रयं वेदेन बोध्यते ।

कर्मभिश्चित्तशुद्धिः स्यात् भक्त्या चैकाग्रता भवेत्॥७ ॥

ततो ज्ञानेन मुक्तिः स्यादेष वेदस्य डिण्डिमः ।

सायणाचार्यपादेन महीधर बुधेन च ॥ ८ ॥

विदुषा चोव्वटेनापि तथा व्याख्यानमीरितम् ।

परं प्रयोजनं मोक्षो वेदस्यास्तीति निश्चितम् ॥ ६ ॥

अवान्तरं तथाप्यस्ति कर्मज्ञानं प्रयोजनम् ।

यज्ञादीनि च कर्माणि प्रशस्तानि बुधैः सदा ॥१० ॥

अन्तःकरणशुद्ध्यर्थं श्रुति स्मृति मतानि हि ।

' तमेतं ब्राह्मणा ' नूनं यज्ञ नेत्यादि वेदवाक् ॥११ ॥

ज्ञानेच्छायां नियोगं तु यज्ञादीनां ब्रवीति हि ।

अतएव महाभागैस्सायणाद्यैः प्रकीर्तिताः ॥ १२ ॥

वेदार्थास्ते समीचीना नान्यैरुक्ताः कथञ्चन ।

इतिहासपुराणैश्च सूत्रवाक्यैस्तथैव च ॥१३ ॥

निरुक्तैः प्रातिशाख्यैश्च शिक्षाव्याकृतिभिस्तथा ।

मन्वादिस्मृतिकारैश्च याज्ञिकार्थाः सुसम्मताः ॥१४ ॥

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[ ६ ]

इदानीन्तनविद्वदुभिदयानन्दादिभिस्तु यैः ।

पाश्चात्यैरपि यैः कैश्चिद्भारतीयैस्तदाश्रितैः ॥ १५ ॥

वेदार्था ये कृतास्ते वै न सत्या इति दर्शितम् ।

करपात्रमहाभागैस्ततो भाष्यं प्रकीर्तितम् ॥ १६ ॥

अत्र सर्वोऽपि वेदार्थः समीचीन उदीरितः ।

शिक्षाव्याकृतिकल्पादिसम्मतोऽथ निरुक्तगः ॥१७ ॥

सर्वथानुमतः सत्य इतिहासपुराणगः ।

पूर्वैराचार्यवर्यैश्च मन्वादिस्मृतिभिस्तथा ॥१८ ॥

अनुमोदित एवार्थः स्वामिपादैः प्रकीर्तितः ।

एतेषां सर्वशास्त्राणां ज्ञानं येषां न विद्यते ॥१६ ॥

अज्ञात्वा भाष्यमेतत्ते खण्डनं कर्तुमुद्यताः ।

एतेनैव परास्तास्ते नोत्तरन्तेषु विद्यते ॥ २० ॥

व्यर्थन्ते खण्डनं कस्मात्कुर्वन्त्यविधिनोदिताः ।

इन्ते किन्न जानन्ति स्यात्तु मोदकखण्डिका ॥११ ॥

- श्री निरञ्जनदेवतीर्थ वेद, वेदनिधि परमात्मा, वेद का ज्ञान करानेवाली अपरा विद्या, परब्रह्म का ज्ञान कराने वाली पराविद्या ब्रह्मविद्या, विघ्नविनायक गणेश, सम्पूर्ण विद्याओं की अधिष्ठात्री भगवती सरस्वती और सर्वविधज्ञानों के स्रोत अपने सभी गुरुजनों को बार - बार प्रणाम करता हूं ॥ १ ॥

विद्वानों की प्रसन्नता के लिये अनन्त श्रीधर्मसम्राट् ब्रह्मलीन स्वामी श्रीकरपात्री जी महाराज द्वारा विरचित वेदभाष्य की सारभूता ' भूमिका ' इक्कीस श्लोकों में लिख रहा हूं || २ || ' स्वरूप स्थिति मोक्ष का स्वरूप है ' - जहाँ से कभी लौटकर नहीं आना पड़ता वही ' मोक्ष ', वेदों का परम प्रयोजन अर्थात् प्रधान प्रयोजन है । ' मोक्षोपयोगी भगवद्भक्ति का लाभ ' भी वेदों का अवान्तर प्रयोजन है ॥ ३ ॥

इसी प्रसङ्ग में वेदों के मन्त्र और ब्राह्मण भाग में के सगुण - साकार विग्रह और अवतार वाद का भी निरूपण है समढ़मस्य पासुरे स्वाहा ' ( शुक्ल यजुर्वेद संहिता ५. १५ ) अवतार का स्पष्ट प्रतिपादन उपलब्ध है ॥ ४ ॥

भगवद्भक्ति के अत्यन्त उपयोगी भगवान् । इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । इत्यादि अनेक मन्त्रों में भगवान् के वामन-ऐसे और भी हजारों मन्त्र उद्घृत किए जा सकते हैं, जिनसे भगवान् के सगुण - साकाररूप स्वतः स्पष्ट सिद्ध हो जाते हैं ॥ ५ ॥

कर्मकाण्ड के विना भगवान् की भक्ति हो ही नहीं सकती, अतः कर्मकाण्ड में प्रवृत्त कराना भी वेद का गौण उद्देश्य है । कर्मकाण्ड के विना चित्त - शुद्धि नहीं हो सकती, चित्त - शुद्धि के विना ज्ञान नहीं हो सकता । ' ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात् पापस्य कर्मणः । यथा ss दर्शतले प्रख्ये पश्यत्यात्मान मात्मनि ॥ ( महा ० शान्ति ० २०४८ ) ', ' नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ ' ( कठो ० १. २. २५ ) इत्यादि वचन - समूह से यह बात स्पष्ट सिद्ध हो जाती है ' कर्मकाण्ड का चित्त शुद्धि द्वारा ब्रह्मज्ञासा में विनियोग है, इसी बात में ' तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाधन ' ( बृहदारण्य को ० ४. ४. २२ ) इत्यादि श्रुति तथा ' स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्य नेज्ययासुतैः । महायज्ञेश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ ( मनु ० २. २८ ) इत्यादि स्मृति - वचन प्रमाण हैं । ' कर्मकाण्ड से चित्तशुद्धि और भगवान् की भक्ति से चित्त की एकाग्रता

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[ ७ ] होने पर ज्ञान से मोक्ष होता है । ' यही वेद का डिण्डिम घोष है । इसीलिये कर्म, उपासना और ज्ञान - इन तीनों का प्रतिपादन ' वेद ' करते हैं ॥६-११३ ) ॥ इसी अभिप्राय से चतुर्वेद - भाष्यकार सर्वदर्शन - पारावारपारीण सायणाचार्य, उव्वट - महीधर, वेंकटाधव आदि प्राचीन प्रामाणिक आचार्यों ने भक्ति और मोक्ष को वेद का परम प्रयोजन मानते हुए भी कर्मकाण्ड के ज्ञान को वेद का अवान्तर प्रयोजन मानकर अधिकांश मन्त्रों का कर्मकाण्ड परक भाष्य किया । भगवत्पाद आद्य शङ्कराचार्य, श्रीरामानुजाचार्य, श्रीवल्लभाचार्य, श्रीनिम्बार्काचार्य आदि सभी पावन साम्प्रदायिक आचार्यों का कर्मकाण्ड के सम्बन्ध में कहीं मतभेद नहीं, जबकि ज्ञानकाण्ड में अद्व ेत, विशिष्टाद्व ेत, शुद्धाद्धत, द्वताद्व ेत और द्व ेत आदि मतभेदों की भरमार है ॥१२ ॥

वेद मन्त्रों के प्राचीन आचार्यों द्वारा किए गये यज्ञादि कर्मकाण्ड परक अर्थ भी वास्तविक अर्थ पाश्चात्य विद्वानों एवं उनकी लकीर के हैं । दयानन्द आदि आधुनिक विद्वानों तथा फकीर कुछ भारतीय विद्वानों द्वारा किए अर्थ ठीक नहीं हैं, क्योंकि सायण, उव्वट, महीधर, वेंकट-माधव आदि आचार्यों के अर्थ शिक्षा, कल्पसूत्र, व्याकरण ( प्रातिशाख्य ) - निरुक्त, छन्द, ज्योतिषशास्त्र, इन वेदाङ्गों से सम्मत हैं । इतिहास, पुराण, पूर्वोत्तर मीमांसा आदि सभी दर्शनशास्त्र और मन्वादि स्मृतिकार भी इन्हीं अर्थों का समर्थन करते हैं । इसी बात को स्पष्ट करने के लिए ब्रह्मलीन धर्मसम्राट् श्रीकरपात्र स्वामी महाराज ने ' वेदार्थ पारिजात ' नामक वेदभाष्य भूमिका और वेदभाष्यरूप ग्रन्थ लिखा । इसमें जो वेद के अर्थ किये गये हैं, वे शिक्षा - कल्प - सूत्र - व्याकरण - निरुक्त छन्द - ज्योतिष - प्राति-शाख्य ( वैदिक - व्याकरण ), इतिहास, पुराण, मन्वादि स्मृतियों से पूर्णरूपेण समर्थित हैं ॥ १३-१८३ ॥ इन सभी शास्त्रों का जिन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं है और स्वामि चरणों के वेदार्थ पारिजात भाष्य को * समझने में भी जो असमर्थ हैं, ऐसे कुछ लोग ग्रन्थ के खण्डन में प्रवृत्त हुए हैं, उनका खण्डन इसी से हो गया कि उन्हें किसी भी पूर्वाचार्य का समर्थन प्राप्त नहीं है, प्रत्युत सिद्धान्त सर्वाचार्य विरुद्ध है । फिर भी दुर्दैव की प्रेरणा से वे खण्डन करने का दुस्साहस कर रहे हैं, क्या वे यह नहीं जानते कि उनके खण्डन की ' मोदक खण्डिका ' हो जायगी । ' * भाष्य भूमिका को श्रीनिरञ्जन देवजी तीर्थ

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Abstract of Bhumika; Written by Jagadguru Shankaracharyapad Goverdhan Math Puri Peethadhishwar Swami Shri Niranjan Devji Tirth Maharaj PREFACE I repeatedly offer my salutations to the VEDAS, the knowledge of Vedic treasury, various Vidyas, Brahma Vidya, Lord Ganesh, Goddess Saraswati and all my preceptors. I am placing before you the background of the commentary of my teacher for the pleasure of the learned. The first objective, aim and last fruit of the VEDA is attainment of liberation, which is in the form of realising the individual in the self. The second objective is attainment of mingling in devotion with God. Here numerous incarnations of God are also accepted. The sacred formula clearly states that God Vishnu traversed the universe. Thousands of such sacred mantras can be picked up and cited to establish that God has attributes and forms. The third objective of the veda is to indicate the activities in rituals. Without practicing the rituals, how can there be the purity of thought, mind and heart The VEDA instruct three disciplines viz. Ritual activity, meditation and knowledge. Through prescribed rituals, cne obtains purity of mind and heart. By devotion, one acquires the concentration of mind and heart. Thereafter, by acquiring knowledge, one attains the liberation - such is the declaration of VEDAS. Such learned sages as Sayanacharya, Mahidhar and Uvvat have interpreted the VEDAS in this way. But the highest goal proclaimed by the VEDA is decidedly liberation. Acts like sacrifices ( YAGNAS ) have been praised by the learned but all such acts are only for the purity of mind and heart - that is the opinion of SRUTI AND SMRITI. A VEDIC passage declares that the seekers of truth realise Brahman only after performing the sacrifices. The injunction for performance of the YAGNA, DAAN, tapa etc.is for the purpose of creating a desire for the knowledge of Brahman. This is so stated by Jearned ACHARYAS like SAYAN and others, Other annotators of VEDAS have not interpreted them in such a way as to make common man to underst and the same in consonance with ITIHAS ( RAMAYANA AND MAHABHARAT ) PURANAS and various SUTRAS, as also NIRUKTA, PRATISAKHYAS, VEDANGAS like SHIKSHA, VYAKARAN, etc. The meaning of the various rituals and VEDA is approved of by SMRITIKARS like MANU and others. Modern scholars like DAYANAND and others

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[ 9 ] as well as some Western scholars and several Indian scholars imitating those Westerners have interpreted Vedas in their own way. But my teacher has pointed out that their interpretation is not ordinarily understandable. Shri Karpatriji has, therefore, written his own Bhasya, where the complete coherent meaning of the Veda is properly pointed out. That meaning is in consonance with the Vedangas like Shiksha, Vyakaran, Nirukta etc and also sanctioned by Itihas and Puranas and accepted as completely true by ancient Acharyas, and Smritikaras like Manu and others. Swami Karpatriji's interpretation has thus the approval of these authorities. Those people who have no knowledge of all these Shastras and also have not studied the BHASYA of Karpatriji have come forward to refute his interpretation, but they are defeated merely by what is stated above and these dissidents have no reply to give. Their interpretation is neither in order, nor useful in any way. Do they not know that their cake of interpretation will be chewed over and made into pieces

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प्रकाशकीय अनन्त श्रीविभूषित पूज्यपाद प्रातःस्मरणीय धर्मसम्राट् श्री स्वामी करपात्री जी महाराज ने वेद की भूमिका के रूप में ' वेदार्थ पारिजात ' नामक ग्रन्थ लिखकर आस्तिक सनातनी जगत् को उपकृत किया है जिसका प्रकाशन संथान द्वारा दो भागो में विक्रम सम्वत् २०३३ और २०३७ में हो चुका है । जिसे वर्ष ८५ के सर्वोत्कृष्ट ग्रन्थ के रूप में संस्कृत अकादमी उत्तर प्रदेश ने १००००० एक लक्ष मुद्रा प्रदान कर पुरस्कृत किया है और इसका सम्मान बढ़ाया है । इस भूमिका के अनन्तर चारों वेदों का भाष्य लिखने का सङ्कल्प पूज्य श्री स्वामी जी महाराज का था जिसके अनुसार शुक्ल यजुर्वेद के चालीस अध्यायों का भाष्य पूरा कर ऋग्वेद के प्रथम मण्डल का भाष्य भी महाराज जी ने लिख दिया किन्तु धार्मिक जगत् के दुर्भाग्य से असमय में ही अपने सभी कार्यकलापों का संवरण कर ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त कर लिया । किन्तु ब्रह्मस्वरूप महाराज श्री की कृपा सदा ही जीवों पर बनी हुई है । महाराज श्री के सान्निध्य में पहले ही यह निश्चय हो चुका था कि संस्थान द्वारा सर्व प्रथम पहले अध्याय के भाष्यका प्रकाशन हो । इसी के आधार पर महाराज श्री द्वारा लिखित मूल संस्कृत जी राष्ट्र भाषा हिन्दी में अनुवाद करने के लिए मीमांसा साहित्य वेदान्ताचार्य डॉ ० पं ० श्री गजानन मुसलगाँवकर जी को दे दिया गया था । किन्तु अपरिहार्य कई कारणों से वह अभी तक नहीं छप सका था । वेद भगवान् की ही असीम अनुकम्पा से सम्वत् २०४३ विक्रमीय में इस प्रथम अध्याय के में उपस्थित करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है । संस्थान के द्वारा विजय दशमी के पावन पर्व पर भाष्य को मुद्रित कराकर प्रकाशित कर आपकी सेवा इसके पश्चात् ईशोपनिषद नाम से प्रसिद्ध शुक्ल यजुर्वेद संहिता के ४० वें अध्याय का भाष्य भी शीघ्र ही हम प्रकाशित करने जा रहे हैं, जिसका हिन्दी अनुवाद विरक्त शिरोमणि अनेक शास्त्र पारङ्गत परम पूज्य स्वामी श्रीवामदेव जी महाराज की कृपा से सम्पन्न हुआ है । प्रकाशन सम्बन्धी अनेक कठिनाइयों के कारण ही इसके प्रकाशन में इतना विलम्ब हो रहा है । आशा और विश्वास है कि पूज्य श्री स्वामीजी महाराज की इन अनुपम कृतियों से अपने अपने विश्वास और अधिकार के अनुसार सभी जनों को ऐहिक और आमुष्मिक अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धि में अवश्य सफलता प्राप्त होगी । इस भाष्य की भूमिका लेखक के रूप में उपयोगी उचित परामर्श दाता के रूप में तथा प्रूफ वाले के रूप में और अनुच्छेद साधक ( पैराग्राफ ) के तथा हिन्दी अनुवादक रूप में और समय समय पर पुनरीक्षण कर्ता के रूप में, प्रेस कापी तैयार करने रूप में तथा प्रकाशन सम्बन्धी सभी साजसज्जाओं

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परब्रह्मस्वरूप धर्मसम्राट् पूज्यपाद स्वामी श्री करपात्री जी महाराज