वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 11–20
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 11–20
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[ ११ ] को तैयार कर इस अमूल्य ग्रन्थ - रत्न को सब के सम्मुख प्रस्तुत करने वाले परम दयालु के रूप में जिन जिन महानुभावोंने अपनी अहैतुकी कृपा से इस कार्यको सम्पन्न किया है, वे सभी हमारे परम सम्माननीय पूज्य आचार्य विद्वन्मूर्धन्य आत्मीय हैं । इन सभी के चरणों में धन्यवाद और अभिनन्दन के स्वरूप नतमस्तक होकर सदा ही कृपा की आशा रखते हैं । जिनके चरणों में धन्यवाद प्रस्तुत हैं, वे हैं ---१. अनन्त श्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शङ्कराचार्य गोवर्धन पीठाधीश्वर श्री स्वामी निरञ्जनदेव जी तीर्थ महाराज ( पुरी ) २. मीमांसा साहित्य वेदान्ताचार्य डॉ ० पं ० श्री गजानन जी मुसलगांवकर ( वाराणसी ) ३. परम पूज्य श्री मार्कण्डेय जी ब्रह्मचारी ( वाराणसी ) ४. अनन्त श्री विभूषित स्वामी श्री निश्चलानन्द जी सरस्वती ( वृन्दावन ) ५. विरक्त शिरोमणि परम सन्त श्री स्वामी वामदेवजी महाराज ( वृन्दावन ) ६. आचार्य श्री वैद्यनाथ जी झा प्रधानाचार्य निम्बार्क संस्कृत महाविद्यालय ( वृन्दावन ) ७. श्री राजवंशी द्विवेदी प्रधानाचार्य धर्मसङ्घ संस्कृत विद्यालय ( वृन्दावन ) शेष में हम हरिनाम प्रेस और इसके सुयो य विद्वान् प्रबन्धक एवं सहृदय कर्मचारियों के भी स्नेहपूर्ण सौजन्य भरे मुद्रणादि कार्य के सहयोग तथा सम्पादन को स्मरण कर उन्हें बहुत बहुत धन्यवाद देते हैं । हनुमान प्रसाद धानुका - अध्यक्ष श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान
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॥ श्री हरिः ॥ श्रीमद् वाजसनेयि माध्यन्दिन शुक्ल यजुर्वेद संहिता वेदार्थ पारिजातान्य भाष्य - विभूषिता प्रथमोऽध्यायः दर्शपूर्णमासेष्टिविषया मन्त्राः * विषय सूची या द्वितीयाध्यायाष्टाविंशतिकण्डिकाश्चेति दर्शपूर्णामासमन्त्राः । पृष्ठम् १-६० ६१-६४ ६४-६६ ६६-६६ ६६-७१ ७२-७५ ७६-७६ ७६-८२ ८२-६७ ८७-१०३ १०३-१११ १११–११४ ११५-१२६ १३०-१३७ १३७–१४६ १४७-१६० १६०-१६६ १६६-१७६ १७६-१८२ १८२-१६० १६- १६५ १६५ - २०५ २०५-२१३ २१४ - २१६ २१६-२१७ २२७-२३४ २३४-२४५ २४५-२५७ २५७-२६२ २६२-२७२ २७२ - शेष
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• अनन्त श्री विभूषित श्री स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा लिखित वेदार्थ पारिजात ग्रन्थ को सन् १ ९ ८१ के सर्व-श्रेष्ठ ग्रन्थ के रूप में उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी लखनऊ द्वारा एक लाख रुपये का विश्व - संस्कृत - भारती पुरस्कार -संस्कृत अकादमी प्रदेश-, लखनऊ -• उत्तर प्रदेश-सुमा बैं सुखम विश्व - संस्कृतभारती - पुरस्कारः वै ० २०३८ ( १८८१ ) वर्षीयः अनन्तश्री विभूषितहरिहरानन्दसरस्वती - ( स्वामिकरपात्र ) ननि ब्रह्मलीनाय विदुषे संस्कृतभाषा- वाङ्मययोः महनीयसेवाया व्यक्तित्वकृतित्वयोश्च सम्माने एकलक्षरूप्यकाणां संस्कृतभारती पुरस्कारः सादरं समर्प्यते । निदेशकः धर्म नारायणः अध्यक्षः उणापतिनिपाठी • उत्तरप्रदेश के महामहिम राज्यपाल महोदय श्री मोहम्मद उस्मान आरिफ पुरस्कार प्रदान करते हुए । पास में मुख्यमन्त्री श्री नारायणदत्त तिवारी और शिक्षा मन्त्री तथा उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी के अध्यक्ष श्री करुणा-पति त्रिपाठी जी एवं एकलाख रुपये का पुरस्कार और ताम्रप्रमाणपत्र ग्रहण करते हुए पूज्य श्री स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा स्थापित श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान के अध्यक्ष श्री हनुमान प्रसाद धानुका । संस्कृत अकादमी स्कार वितर खन के बरबार
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वाजसनेयि - माध्यन्दिन शुक्ल यजुर्वेद संहिता --करपात्र - भाष्य- समन्विता ॥ हरिः ॐ ॥ इ॒षेोर्जे व वा॒यव॑ स्थ दे॒वो व॑ सवि॒ता प्रार्पयतु श्रेष्ठ॑तमाय॒ कर्म॑ण॒ श्राप्या॑य-ध्वमध्न्या॒ इन्द्राय॑ भा॒गं प्र॒जा॑व॒तीरनमीवा ऽ यक्ष्मा मा व॑स्तेन ईशत माघश॑ ू सो ध्रुवा यस्मिन् गोप॑तौ स्यात ब॒ह्वी ज॑मानस्य प॒शून् पा॑हि ॥१ ॥
अर्थ: र्य हे शाखे! धान्य की उत्पत्ति के लिये मैं तुम्हें काटता हूँ, और वृष्टिरूपी रस के लिये ( ऊँचा - नीचापन छोल - छालकर ठीक करता हूँ ), हे वत्सों! तुम अपनी माताओं से दूर हो जाओ तुम्हें एक सी बनाता हूँ-और प्रकाशमान परमेश्वर तुम्हें यज्ञकर्मोपयोगी बनने के लिये विपुलतृणयुक्त वन में जाने । हे गौओं! प्रेरक गौओं! इन्द्र के उद्दमसे तुम अपने दूध को वृद्धिगत करो की प्रेरणा दे । हे अवध्य । चोर तथा हिंसक व्याघ्रादि पशु तुम्हें मारने समर्थ न श्य हों । तुम विपुल सन्तति से युक्त बनो, एवं सामान्य व्याधिरहित और प्रबलरोग से भी रहित रहो घर दीर्घकाल तक बनी रहो । हे शाखे! तू यजमान के पशुओं की रक्षा कर ॥ इस यजमान के
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[ २ ] करपात्र भाष्यम् प्रत्यगानन्द-ॐ स्वस्ति श्रीगणेशाय नमः । ॐ सरस्वत्यै नमः । ॐ वेदपुरुषाय नमः । सच्चिदानन्दरामाय प्रत्यक् चैतन्यरूपाय रूपिणे । नमो वेदान्ततात्पर्यगोचराय परात्मने || १ || नमः शिवाय शान्ताय त्रिपुरालिङ्गिताय च विध्वंसनपटीयसीम् । || महते परमात्मने ॥ २॥ माध्यन्दिनीयमन्त्राणां व्याख्यां कुर्मः सनातनीम् । व्याख्याता
कुमतिध्वान्तविभ्रान्ति एव तथापि नास्तिकैरर्धनास्तिकै यद्यप्युब्बटसायणमहीधराद्याचार्ये ब्रह्मणग्रन्थः सूत्र: पारम्पर्येण च मन्त्रा इति तदपाकरणपूर्वकं वेदार्थवैशद्याय विशेषतः भारतीयैः पाश्चात्त्यैश्च विविधदुस्तर्कानुत्थाप्य व्याकुली कृतो वेदार्थ प्रत्यते । सन् सुप्तप्रतिबुद्धन्यायेन विशिष्ट -२ - तत्रानाद्यविच्छिन्नपारम्पर्यप्राप्तो मन्त्रबाह्मणात्मको वेदो नित्योऽपि दृश्यते च । ' तत एतं परमेष्ठी । कर्मोपासनादि संस्कृतमतिभिर्हरण्यगर्भपरमेष्ठ्यादिभिः पूर्वकल्पीया ) इत्यादि वेदानुपूर्वी रीत्या स्मर्यते दर्श पूर्णमासद्रव्यदेवतामन्त्रादि परमे-प्राजापत्यो यज्ञमपश्यत् यद्दर्श पूर्णमासी, ( श ० ११।१६ १६ ( श ० १४/१1१1१८ ) इत्यारभ्य ' तदुहाश्विनो-ष्ठिनादृष्टम् । तथा दध्यङ व अथर्वण एतं शुक्रमेतं यज्ञ विदां दध्यड् चकार ङाथर्वण ऋषिरिति गम्यते । श्रुतमास ' ( ० १४ । १।१।२० ) इत्यादिरीत्या प्रवर्ग्यमन्त्राणां ' ( ६।२।-' प्रजापतिः प्रथमां चितिमपश्यत् ' ( श ० ६ | २ | ३ | १० ) इत्युपक्रम्य ११।५।६ ' स यो | ३ हैतदेवं ) इत्यनेन चितीनामार्षेयवेद प्रतिमन्त्रम् ऋषिच्छन्दो-३।१० ) इत्यादिना फलं चोक्तम् । अत एव ' स्वाध्यायोऽध्येतव्य ' ( श ० देवता विनियोगार्थज्ञानपूर्वकं स्वशाखाध्ययनं विहितम् ।
यस्यास्य मञ्चमुपलभ्य वचोऽधिदेवी सप्तस्वरानवसरेऽखिलकर्ण पेयान् ।
शश्वन्निनादयति तं यमिनामधीशं वागीशमेव ' करपात्रगुरु ' नमामि ॥
गुरुभिः ' स्वामिचरण ' मंन्त्रव्याख्या यथा कृता । मनसा ध्यात्वाऽनूद्यते याचते तामेव गुणसम्पत्तिसिद्धयर्थंहि विश्वस्तः राष्ट्रभाषया ॥
गुर्वनुग्रहम् ।
' श्रीगजाननः ॥
प्राप्त अध्ययन यद्यपि उव्वट, सायण, महीधर आदि आचार्यों ने ब्राह्मणग्रन्थ तथा सूत्रग्रन्थ की एवं आवश्यकता शिष्टपरम्परा नहीं है । तथापि के द्वारा मन्त्रों की व्याख्या पहिले ही कर दी है, अब पुनः नवीन व्याख्या उपस्थित करने कर वेदार्थ को अव्यवस्थित कर भारतीय तथा पाश्चात्य नास्तिकों और अर्धनास्तिकों ने विविध कुतर्कों को को विशदता के साथ प्रकट करने का विशेष दिया है । अत: उसका निराकरण करते हुए वेदार्थ के व्यवस्थित स्वरूप प्रयत्न किया जा रहा है । २- अनादि अविच्छिन्न परम्परा से प्राप्त मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदों के नित्य होते, हुए उपासना भी सुप्त आदि - प्रतिबुद्धन्याय के अनुष्ठान से ( निद्रा के बाद जगनेपर पूर्व से स्थित पदार्थों का स्मरण करने के समान ) स्मरण विशिष्ट तथा कर्म दर्शन किया जाता है । शत से निर्मल बुद्धिवाले हिरण्यगर्भादि के द्वारा पूर्वकल्प के वेदों की आनुपूर्वी ने देखा का । ' - अर्थात् दर्शपूर्णमास के द्रव्य, देवता, पथ ब्राह्मण बता रहा है कि ' दर्शपूर्णमासेष्टि ( यज्ञ ) को परमेष्ठी - तक शतपथ ब्राह्मण के द्वारा प्रदर्शित ' प्रवर्ग्य-मन्त्रादि को परमेष्ठी ने देखा । तथा ' दध्यङ हवा ' से ' तदुहाश्विनो: ' मन्त्रों ' के द्रष्टा ' दध्यङ ' आथर्वण ऋषि हैं - यह ज्ञात होता है । बताया गया ' प्रजापतिः प्रथमां ', से प्रारम्भ करके ' स यो हैतदेवं ' इत्यादि शतपथ ब्राह्मण के द्वारा फल भी चाहिये - इस विधि के द्वारा है | अतएव ' स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' - स्वाध्याय ( अपनी वेदशाखा ) का अध्ययन के करना अध्ययन ( अपनी वेदशाखा के अध्ययन ) प्रत्येक मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग तथा अर्थज्ञान सहित स्वाध्याय का विधान किया गया है ।
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ह Jak [ ३ ] ३- • योश्वा अविदितार्षेयन्दोदैवत ब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स्थाणुवति गर्तवा पद्यति ( आर्षे ० बा ० १1१1६ ) इत्यार्षेयब्राह्मणम् । एतान्यविदित्वा योऽधीतेऽनुब्र ते जपति जुहोति यजते याजयते तस्य ब्रह्म-निर्वीर्यं यातयामं भवत्यथान्तराश्वगतं वा पद्यते स्थाणु वति प्रवामीयते पापीयान् भवति ' ( अनुक्रम ० १1१ ) इति कात्यायनोक्तः । ऋष्यादिज्ञाने फलश्रवणाच्च ' अथ विज्ञायैतानि योऽधीते तस्य वीर्यवदथ योऽर्थ वित्तस्य वीर्यवत्तरं भवति जपित्वा स्वेष्ट्वा तत्फलेन युज्यते ' ( अनुक्रम ० ११ ) । युग ' ह्रासाच्छक्तिह्रासानुरोधेनाल्पायुषाल्पप्रज्ञजनानुजिघृक्षीय ब्रह्मपरम्परया प्राप्तं वेदं वेदव्यासश्चतुर्धा-विभज्य स्वशिष्येभ्यः पैलवैशम्पायन जैमिनिसुमन्तुभ्यः क्रमादृग्यजुः सामाथर्वाख्यांश्चतुरो वेदानुपदिष्टवान् । ते च स्व-शिष्येभ्य उपदिष्टवन्तः । एवं परम्परया सहस्र शाखो वेदोजातः । स च प्रतिकल्पं प्रवर्तते । तत्र यजुर्वेदः कृष्णं शुक्ल मिति द्वेधा विभक्तः । तदुक्तम् ---४ - सायणेन - कृष्णं शुक्लमिति द्वेोधा तत्कृष्णं तैत्तिरीयकम् । वैशम्पायन शिष्येण याज्ञवल्क्येन यद्यजुः ॥ अधीत्य वान्तमाचार्थकोपभीतेन योगिना || गुरुः शिष्यमुचेत्थं क्र ुद्धः केनापि हेतुना ॥ प्रत्यर्पय मदीयां त्वं विद्यामित्या- -यत् स च । योगसामर्थ्यतो विद्यां मूर्ती कृत्वाऽवमत्तदा ॥ गृहीत तद्यजुर्वान्तमित्यन्यान् गुरुरब्रवीत् । अन्ये तित्तिरयो-भूत्वा किश्वित्तानप्यभक्षयन् ॥ प्रवर्तितः खण्डशस्तैर्नसम्यग्गम्यते नृभिः । आध्वर्यवं क्वचिद् धोत्रंक्वचिदित्यव्यवस्थया ॥ ३ - " जो व्यक्ति ऋषि, छन्द, देवता, ब्राह्मण को न जानकर केवल मन्त्र से यजन कराता है अथवा अध्यापन करता है, वह स्थाणुत्व को प्राप्त होता है, अथवा गर्त में गिरता है ” – यह ' आर्षेय ब्राह्मण ' का वचन है । महर्षि कात्यायन ने भी अनुक्रमणिका में कहा है कि " इनको जाने बिना जो अध्ययन करता है, या अध्यापन करता है, जप करता है, होम करता है, यज्ञ करता है, अथवा यज्ञ करता है, उसका वेद ( ब्रह्म ) निर्वीर्य, यातयाम ( पर्युषित ) हो जाता है । जीवन के अनन्तर वह अधम श्वयोनि ( श्वगर्त ) में जाता है, अथवा स्थाणु हो जाता है, मृत्यु को प्राप्त होता है, वह पापों से युक्त ( पापी ) हो जाता है । " ऋषि आदि के ज्ञान में यह फल श्रुत है कि “ इनका ज्ञान प्राप्त करके जो अध्ययन करता है, उसका ज्ञान, वीर्यवत् ( सवीर्य ) होता है, जो अर्थज्ञान रखता है, उसका ज्ञान वीर्यवत्तर होता है । वह जप, यज्ञ, हवन करके उनके वेदोपदिष्ट फलों से लाभान्वित होता है । अल्प आयुवाले तथा अल्प प्रज्ञावाले जनसमूह युग के ह्रास से शक्ति का ह्रास देखकर पैल, पर अनुग्रह ( कृपा ) करने की इच्छा से ब्रह्म परम्परा प्राप्त वेदों का वेदव्यास ने चार विभाग करके अपने शिष्य वैशम्पायन, जैमिनि, और सुमन्त को क्रम से ऋक्, यजु, साम और अथर्व संज्ञक वेदों का उपदेश किया । उन्होंने अपने शिष्यों को उपदेश किया । इस परम्परा से वह वेद सहस्र शाखाओं से सम्पन्न हो गया । यही क्रम प्रत्येक कल्प में प्रवृत्त होता है । उनमें से ' यजुर्वेद शुक्ल और कृष्ण रूप से दो भागों में बँट ( विभक्त हो ) गया । इसी अभिप्राय से-४ - सायण ने कहा कि - " यजुर्वेद कृष्ण और शुक्ल दो प्रकार का है, ' कृष्ण ' तैत्तिरीयक हैं, जिसे वैशम्पायन के शिष्य योगीश्वर याज्ञवल्क्य ने अध्ययन के अनन्तर आचार्य के कोप के भय से वमन कर दिया । एक समय किसी कारण गुरु ने शिष्य से कहा कि ' मेरी दी हुई विद्या तू मुझे वापस कर । ' उस पर शिष्य ने ग्रहण की हुई गुरु की विद्या को अपनी योगशक्ति से मूर्त रूप देकर उसका वमन कर दिया । तब गुरु ने अपने अन्य शिष्यों से कहा कि - ' इस वान्त यजुर्वेद का तुम लोग ग्रहण करो । ' गुरु की आज्ञा पाकर उन शिष्यों ने तीतर पक्षियों का रूप धारण करके अङ्गारों किया के । रूप में स्थित उस वान्त यजुर्वेद का कुछ अंश भक्षण किया । तदनन्तर उन्होंने उस यजुर्वेद का खण्डशः प्रवर्तन किन्तु मनुष्यों के द्वारा उसका सम्यक् अवगमन नहीं हो पाता है, क्योंकि उस में कहीं ' आध्वर्यव ' ( अध्वर्यु के मलि- द्वारा प्रयोक्तव्य ) तो कहीं ' होत्र ' ( होता के द्वारा प्रयोक्तव्य ) है । इस प्रकार की अव्यवस्था के कारण तथा बुद्धि की नता के कारण उस ' यजुर्वेद ' को ' कृष्ण ' कहा जाता है । तदनन्तर योगीश्वर याज्ञवल्क्य ने भगवान् सूर्यनारायण की
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[ ४ ] बुद्धिमालिन्यहेतुत्वात् यजुः कृष्णमितीयते । याज्ञवल्क्यस्ततः सूर्यमाराध्यास्मादधीतवान् ॥ व्यवस्थितप्रकरणं यजुः शुक्लं तदीर्यं ते । पौराणिक कथामेतां वेदव्याख्यान आदरात् ॥ आदिशन् मह्यमाचार्याः श्रुतावपि मयाश्रुतम् । काण्ववेदगते विद्या वंश ब्राह्मण ईर्यते ॥ ५ - यजूंषि शुक्लान्यादित्यात् मुनिः प्रापेत्यपि स्फुटम् । ' इति काण्वसंहिताभाष्य उपोद्घाते । ५।१– “ अथव — शः पौतिमाष पुत्रः कात्यायनीपुत्राद् ' इत्यारम्य ' परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्मस्वयम्भु ब्रह्मणे नमः ” इत्यन्तं काण्ववेदस्यान्तिमं ब्राह्मणम् । पौतिमाषी पुत्रः कश्चिद् वेद सम्प्रदाय प्रवर्तकोमुनिद्विजातीनां मनुष्याणामुपदेष्टा । स च कात्यायनी पुत्राद्वेदमधीतवान् । परमेष्ठिशब्देन सत्यलोकवर्ती चतुर्मुखोऽभिप्रेयते । ब्रह्मशब्देन प्रज्ञानंब्रह्म सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, त्येवमादि लक्षण लक्षित मनन्तशक्ति ब्रह्मोच्यते । स एव स्वयम्भु प्रोच्यते-- ' न तस्य कार्यं करणं । च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्यशक्ति विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबल क्रिया च ॥ ' ( श्वेता ० उ ० ६'८ ) " कश्चिन्न तस्याः पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव तस्याश्च लिङ्गम् । " ( गुहाकाली उप ०६८ ) इत्यादि । श्रुतिभ्यः । ५।२ - तस्मै ब्रह्मणे नमः प्रह्वीभावोऽस्तु । ब्रह्म प्रभावलक्षणाया व्यक्त ेः परम पुरुषार्थ हेतुत्वम् । ' यस्थ देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ॥ ' ( श्वेता ० उ ० ६ २३ ) इतिश्रुतेः । तत्र काण्वशाखागते वंश ब्राह्मणे ' आदित्यानीमानि शुक्लानियजूंषि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येनाख्यायन्ते ' ( बृ ० उ ० ५।५-३३ ) इति बृहदारण्यके । आदित्येनाध्यापितत्वात् आदित्यानीत्युच्यन्ते । वाजमन्न ' ' अन्न ं वैवाज ' ( श ० ५ १/४/३ ) इतिश्रुतेः । वाजस्य सनिर्दानं यस्य महर्षेरस्ति सोऽयं वाजसनिस्तस्यापत्यं वाजसनेयः स एव याज्ञवल्क्यः । तेन याज्ञ-वल्क्येने तानि शुक्लयजूंषि पञ्चदश महर्षिभ्यः कण्व, मध्यन्दिन, शापेय, स्वापायनीय, कापाल, पौण्ड्रवत्स, आवटिक, परमावठिक, पाराशर्य, वैधेय, वैनेय, औधेय, गालव, वैजव, कात्यायनीय संज्ञेभ्यः पञ्चदशभ्यः शिष्येभ्यः प्रत्तानि । आराधना करके सुव्यवस्थित प्रकरणों से युक्त यजुर्वेद का उनसे अध्ययन किया । इस यजुर्वेद को ' शुक्ल यजु ' कहा जाता है । आचार्यों ने वेद का व्याख्यान करते समय बड़े आदर के साथ इस पुराण प्रसिद्ध कथा को मुझे सुनाया था । श्रुति में भी मैंने इस कथा को सुना है । यजुर्वेद काण्वशाखा के अन्तर्गत ' विद्यावंश ब्राह्मण ' है, -५ - जिस में बताया है कि " शक्ल यजु, आदित्य से प्राप्त हुए हैं । " यह उल्लेख काण्वसंहिता भाष्य के उपोद्घात में किया गया है । ५।१ – “ अथवशः ” से लेकर ' परमेष्ठी ब्रह्मणः " तक काण्वशाखा का अन्तिम ब्राह्मण है । इसमें उल्लिखित ' पौतिमाषी पुत्र ', जो वेद सम्प्रदाय का प्रवर्तक एक मुनि था । वही द्विजन्मा मानवों का उपदेशक था । उसने ' कात्या-यनीपुत्र ' से वेद का अध्ययन किया था । ' परमेष्ठी ' शब्द का अभिप्राय सत्यलोकस्थित ' चतुर्मुख ' से है । ‘ ब्रह्म ' शब्द से " प्रज्ञाम्ब " ' - प्रज्ञान को कल है - और " सत्यं ज्ञानमनन्तम्ब्रह्म " - सत्य, ज्ञान, अनन्त स्वरूप ब्रह्म है - इत्यादि महा-वाक्यों से निर्दिष्ट अनन्त शक्तिमय ' ब्रह्म ' कहा गया है । उसी को ' स्वयम्भू ' कहा गया है उसका कार्य तथा करण नहीं है । उसके समान और उससे अधिक भी कोई दिखाई नहीं देता । उसकी ' पराशक्ति ' नाना प्रकार की सुनी जाती है, और वह ज्ञानक्रिया तथा बलक्रिया स्वाभाविक है । - ( श्वे ० उ ० ६८ ) " लोक में उसका कोई पति नहीं है, और न कोई उसका ईशिता ( नियम न करने वाला ) है । उसका कोई लिङ्ग ( पहिचान ) नहीं है " इत्यादि । ५२ - श्रुतियों के द्वारा उस स्वयम्भू का वर्णन किया गया है । उस ब्रह्म के प्रति हमारा प्रणाम रहे । ब्रह्म के प्रति वह प्रणाम पुरुषार्थ का कारण होता है । भगवती श्रुति कह रही है - ' जो देवभक्त और गुरुभक्त हो, उसी महात्मा के ' में ये शास्त्र प्रतिपादित अर्थ ( रहस्य ) प्रकाशित होते हैं - ( श्वे ० उ ० ६ २३ ) । काण्वशाखान्तर्गत हृदय वंशब्राह्मण में कहा गया है कि “ भगवान् आदित्य ( सूर्य ) से आविर्भूत हुए थे ' शुक्ल यजु ', वाजसनेय योगीश्वर याज्ञवल्क्य के द्वारा कहे गये हैं- ( वृ ० उ ० ५।५।३३ ) | आदित्य के द्वारा इनका अध्यापन किया गया, इसलिये इनको ( यजु को ) आदित्य कहा गया है | " अन्न ं वै वाजः " इस श्रुति के अनुसार ' अन्न ' की संज्ञा ' वाज ' है । जिस महर्षि ने ' अन्न ' का
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[ ५ ] तत्र माध्यन्दिनेन महर्षिणा लब्धो यजुर्वेदशाखाविशेषो माध्यन्दिनः । यद्यप्यमुना मुनिना बहुभ्यः शिष्येभ्य उपदिष्ट स्तथा-पीश्वरानुग्रहेण तत्राभ्यासातिशयात् पाटवातिशयाच्च मध्यन्दिनसम्बन्धितया समाख्यायते । तं माध्यन्दिनं वेदमधीयते विदन्ति वा ये ते ऽपि शिष्यपरम्परया माध्यन्दिना उच्यन्ते । ६ - यद्यपि कृष्ण शुक्लयजुः सम्बद्धसर्वास्वपि शाखासु आध्वर्यव एव प्रयोग: प्रतिपाद्यते, तथापि मन्त्रविशेषैः प्रयोगविशेर्षुर्महान्भेदः । स चानुष्ठातृभेदेन व्यवस्थितविषयत्वान्न विक-ल्प्यते । अनुष्ठानविशेषायैव ' स्वाध्यायोतव्यः ' ( श ० ११ | ५ | ६ | ३ ) इति स्वशाखाध्ययनं विहितम् । अधीयत इत्यध्यायो वेदः, स्वश्चासावध्यायः स्वशाखीयो वेदस्तदुपलक्षितः समस्तवेदराशिर्वाध्येतव्य इत्यर्थः । द ननु तत्र भोजननिद्रादिषु दृष्टार्थेषु वैदिकविध्यदर्शनात् वेदेन विहितस्याध्ययनस्य सन्ध्यावन्दनादिवदृष्टार्थं त्वं युक्तम् । न च ' आयुष्टोमेनातिरात्रेण स्वर्गकामो यजेते ' ( ला ० म ० ब्रा ० २० | ७1१ ) त्यादिष्विवैतत्कामो तमेवमदृष्टफलविशेषो न श्रूयत इति वाच्यम्, ७- यहवोऽधीते पयसः कुल्या अस्य पितृन् स्वधा अभिवहन्ति यद्यजूंषि घृतकुल्याः, दान किया, उसे ' वाजसनि ' -- कहा गया, और उसका अपत्य ' वाजसनेय ' कहलाया । वही ' याज्ञवल्क्य ' है । उस याज्ञ-वल्क्य ने ' कण्व, माध्यन्दिन, शापेय, स्वापायनीय, कापाल, पौण्ड्रवत्स, आवटिक, परमावटिक पाराशर्य वैधेय, वंनेय, औधेय, JI मालव. वैजव, कात्यायनीय नाम के अपने पन्द्रह महर्षि शिष्यों को उस शुक्ल यजुर्वेद का प्रदान किया । उन में से माध्यन्दिन महर्षि के द्वारा प्राप्त किये यजुर्वेद शाखा विशेष को ' माध्यन्दिन ' कहा जाने लगा । यद्यपि याज्ञवल्क्य मुनि ने इस शाखा का उपदेश ( अध्यापन ) अनेक शिष्यों को किया था, तथापि परमेश्वरानुग्रह, विशेष अभ्यास और विशेष पटुता के कारण यह ' शाखा ' उस माध्यन्दिन महर्षि के नाम से ही प्रसिद्ध हो गई । तथा उस शाखा के अध्ययन करने-वाले भी शिष्य परम्परया, ' माध्यन्दिन ' कह जाने लगे । ६ - यद्यपि कृष्ण और शुक्ल यजु से सम्बद्ध सभी शाखाओं में अध्वर्यु ' के द्वारा ही प्रयुक्त प्रयोग प्रतिपादित होता है, तथापि विशेष मन्त्रों तथा विशेष प्रयोगों के कारण उनमें बहुत भिन्नता भी रहती है । वह भिन्नता भिन्न - भिन्न अनुष्ठान कर्ताओं के लिये नियत होने से व्यवस्थित है, अतएव वहाँ विकल्प नहीं किया जाता । ' स्वाध्या-योऽध्येतव्यः ' यह अध्ययन विधि उस अनुष्ठान विशेष के बोधनार्थ ही स्व- शाखा के अध्ययन का विधान करती है । ' अधीयते इति अध्याय: - जिसका अध्ययन किया जाता है, उसे ' अध्याय ' अर्थात् ' वेद ' कहते हैं । और ' स्वश्चासौ अध्यायः स्वाध्यायः -- यह कर्मधारय समास किया जाता है । यहाँ ' स्व ' शब्द का अर्थ ' आत्मीय ' है । तत्र ' आत्मीय जो अध्याय अर्थात् स्व- कुल परम्परागत जो वेदशाखा हो, उसे ' स्वाऽध्याय ' शब्द से कहा गया है । उस वेदशाखा से उपलक्षित वेदराशि का भी अध्ययन किया जा सकता है । तात्पर्य यह है कि सर्व प्रथम अपनी वेदशाखा का अध्ययन समाप्त करने के पश्चात् यदि सामर्थ्य हो तो सम्पूर्ण ' वेदराशि ' का भी अध्ययन किया जा सकता है । शंका- भोजन, निद्रा आदि प्रत्यक्ष फलवाले कर्मों के लिये वैदिक विधि तो नहीं दिखाई देती, किन्तु वेद-विहित अध्ययन की विधि उपलब्ध होती है, अतः वेदाध्ययन को सन्ध्यावन्दनादि कर्मों के समान अदृष्टार्थ ( पुण्य के लिये ) मानना ही उचित होगा । ग समा ० — यह शङ्का उचित नहीं है कि ' स्वर्ग कामनावान् पुरुष आयुष्टोम नामक अतिरात्रयाम करें ' इत्यादि विधियों के समान अमुककामनावाला अध्ययन करे - इस प्रकार अध्ययन कर्म का कोई अदृष्ट फल विशेष श्रुत नहीं है, ७ - क्योंकि शतपथ श्रुति में ' ब्रह्मयज्ञ ' का फल बताया गया है - " ऋग्वेदके अध्ययन करनेवालेके पितरोंको अर्पित की गई
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[ ६ ] यत्सामनि सोम एभ्यः पवते, यदथर्वाङ्गिरसोर्मधोः कुल्येति । इ ब्रह्मयज्ञफलस्याध्य-यनेऽप्यतिदेष्टु ं शक्यत्वात् । नचेदृशोऽति देशोऽदृष्टचर इतिवाच्यम्, ' हानौ तूपायनशब्दशेषत्वा ' ( ब्र ० सू ० ३।३।२६ ) दिति ब्रह्मसूत्रे तस्य दृष्टत्वात् । तथाहि शाट्यायनिनः कौषीतकिनश्च ब्रह्मविदा परित्यक्तयोः सुकृतदुष्कृतयोरितरैरनुकूलैः प्रतिकूलंश्व स्वीकारमिष्टमामनन्ति । तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति, सुहृदः साधुकृत्याम्, द्विषन्तः पापकृत्याम् ' इति शाट्याय-निनः । ' तत्सुकृतदुष्कृते विधूनुते, तस्य प्रिया ज्ञातयः सुकृतमुपयन्त्यप्रियाः दुष्कृतम् ' ( कौ ० १४ ) । एवं क्वचित्सुकृत-दुष्कृतयोर्हानमेव श्रूयते - यथा ' तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् । ' ( मुण्डकोप ० ३।२८ ) इति । यत्र हानमुपायनञ्च श्रूयते तत्र न किञ्चिद् वक्तव्यम् । ८- यत्राप्युपायनं श्रूयते न हानं तत्राप्यर्थादेव हानं सन्निपतति यत्र तु हानमेव श्रूयते नोपायनं तत्रोपायनं सन्निपतेद्वा नवेति विचिकित्सायामश्रवणादसन्निपात इति प्राप्ते सिद्धान्तितम् केवलायां हानावपि उपायनं सन्निपतति, तच्छेषत्वात् । कौषीतकिरहस्ये हानशब्दशेषोह्य पायन शब्दः समधिगतः । तस्मादन्यत्र केवलहान-शब्द श्रवणेऽपि उपायनानुवृत्तिर्युक्ता । यदुक्तम् - प्रकृतेऽश्रवणाच्छाखान्तरे श्रवणस्य विद्यान्तरगोचरत्वात् अनावश्यक-त्वाच्च न सन्निपात इति, तन्न असामञ्जस्यात् । तथाहि भवेदेषा व्यवस्थोक्ति यद्यनुष्ठेय ं किञ्चिदन्यत्र श्रुतमन्यत्र स्वधा, ' पय - कुल्या देती है, यजुर्वेद के अध्येता के पितरों को ' घृत- कुल्या ', और सामवेद के अध्येता के पितरों को ' सोम ' तथा आङ्गिरस अथर्ववेद के अध्येता के पितरों को ' मधुकुल्या ' उपलब्ध होती है । ' ब्रह्मयज्ञ के इस फल का ' अध्ययन-कर्म में अतिदेश किया जा सकता है । यदि यह कहें कि ऐसा अतिदेश ही तो कहीं देखा नहीं गया है, तो यह कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि " हानौ तूपायनशब्दत्वात् " - इस ब्रह्मसूत्र में ऐसा अतिदेश देखा जाता है । वहाँ का प्रसङ्ग इस प्रकार है - " शाट्यायनी शाखीय तथा कौषीतकी शाखीय ब्रह्मवेत्ता ऋषिगणों के द्वारा परित्यक्त पाप - पुण्यों का अनुकूल - प्रतिकूल रहनेवाले अन्य लोगों के द्वारा स्वीकार करना इष्ट मानते हैं । शाट्यायनयों का कहना है कि " उसके ( ब्रह्मवेत्ता के ) पुत्र दाय ' ग्रहण करते हैं, मित्रगण ' साधुकृत्यों ' का तथा शत्रुगण ' पापकृत्यों को ग्रहण करते हैं । ' “ उसके सुकृतों और दुष्कृतों में ' प्रिय - सम्बन्धी लोग सुकृतों को तथा उसके अप्रिय लोग ' दुष्कृतों ' को प्राप्त करते हैं । " मुण्डकोपनिषद् में ब्रह्मज्ञानी के सुकृतों और दुष्कृतों की हानि होती है, ऐसा सुना गया है - " विद्वान् ( ब्रह्मवेत्ता ) ' नाम और ' रूप ' से छूटकर दिव्य परात्पर पुरुष को प्राप्त होता है । " जहाँ हानि और उपायन दोनों ही सुने जाते हैं वहाँ तो कुछ कहना नहीं है, ८ - परन्तु जहाँ केवल ' उपायन ' सुना जाता है हान ' का श्रवण नहीं है, वहाँ भी ' हान ' की उपस्थिति अर्थात् हो ही जाती है । परन्तु जहाँ केवल ' हान ' तो सुना गया है, और ' उपायन ' नहीं, तब सन्देह हो जाने पर ' उपायन ' का श्रवण न होने से उसकी उपस्थिति नहीं होगी " - इस पूर्वपक्ष के उपस्थित होनेपर, सिद्धान्त पक्ष कहता है कि ' केवल ' हान ' के श्रवण में भी उसका शेष ( पूरक ) होने के कारण ' उपायन उपस्थित हो जाता है । कौषीतकी रहस्य में ' हान ' शब्द का शेष ' उपायन ' शब्द उपलब्ध होता है । अत: अन्य स्थलों में भी केवल ' हान ' शब्द के श्रुत होने पर भी ' उपायन ' की अनुवृति कर लेना उचित ही होगा । अनुवृत्ति के न माननेवाले ने जो यह कहा था कि ' जिसका प्रकृत सन्दर्भ में श्रवण नहीं हुआ है किन्तु अन्य शाखा में श्रुत होने के कारण जिसका सम्बन्ध अन्य विद्या से है । उस कारण तथा अनावश्यक होने से भी उस शब्द का सन्निपात ( अनुवृत्ति, उपस्थिति ) यहाँ पर नहीं होता है, किन्तु यह पक्ष समञ्जस नहीं है । यह व्यवस्था तो तब संगत होती, जब अन्यत्र विहित किसी अनुष्ठेय कार्य का अन्यत्र उपस्थापन किया जाता है । इनका कथन तो विद्या की प्रशन के लिये हुआ है । ' विद्या इतनी प्रभावशालिनी है कि जिसके सामर्थ्य से संसार के ( जन्म - मरणाऽविच्छेदके ) मूलकारणभूत सुकृत और दुष्कृत दूर हो जाते हैं । उस पुरुष के मित्र और शत्रुओं में प्रवेश कर जाते हैं ' – इस प्रकार
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[ ७ ] निनीष्येत, विद्यास्तुत्यर्थं त्वनयोः कीर्तनम् । इत्थं महाभागाविद्या यत्सामर्थ्यादस्य विदुषः सुकृतदुष्कृते संसारकारणभूते विधूयेते । ते चास्य सुहृदुदुहृत्सु निविशेते इति स्तुत्यर्थे चास्मिन् कीर्तने हानान्तरभावित्वेनोपायनस्य क्वचिच्छ्र ुतत्वात् अन्यत्रापि हानश्रुतावुपायनानुवृत्ति मन्यते स्तुतिप्रकर्षलाभात् तद्वदेव घृतकुल्यादिफलादेशोऽपि सम्भवत्येव । ६ - अथवा विश्वजिन्न्यायेन ग्रहणाध्ययनफलत्वेन कल्पनीयः स स्वर्गः सर्वान्प्रत्यविशेषत्वात् ' ( मी ० सू ० ४ | ३ | १५ ) इतिवदितिचेन्न, सम्भवति दृष्टफलकत्वेऽदृष्टफलकत्वस्यान्याय्यत्वात् । अन्यथा ' ब्रीही नवहन्ती ' । त्यत्रापि तण्डुलनिष्पत्ति-लक्षणं दृष्टफलं बहुप्रयाससाध्यत्वात् उपेक्ष्य सकृन्मुसलप्रहाररूपं प्रयासरहितमवघातमदृष्टार्थमनुतिष्ठेत् । तथा सति शास्त्रीय तण्डुलाभावेन पुरोडाशा सिद्धो यागविधयो बाध्येरन् । तस्माद्दृष्टफल सम्भवे तदेवादरणीयम् । अत्र चाक्षर-प्राप्तिरूपं दृष्टं फलं सम्भवत्येव । १० - नन्वक्षरप्राप्तिरूपं दृष्टं फलं गुरुपूर्वकाध्ययनव्यतिरेकेण लिखितपाठेनापि लभ्यते, आयुर्वेदादिमन्त्र-पाठेषु तथादर्शनात् । तथा सति किमनेन विधिनेति चेत् उच्यते, नियमादृष्टार्थस्य विधेरावश्यकत्वात् । यथा तण्डुल निष्पत्तिरूपस्य दृष्टफलस्य नखविदलनादिनापि सिद्धौ नियमादृष्टार्थोऽवघातविधिस्तद्वत् । तस्मादक्षरप्राप्तिफलको-ऽध्ययनविधिः । का यह कथन स्तुति के प्रयोजन से युक्त है । यहाँ पर प्रकरणान्तर में किसी अन्य ' हान ' ( त्याग ) के अनन्तर जो ' उपाय ' ( प्राप्ति को सुना गया है, उसी तरह अन्यत्र भी ' हान ' के श्रुत होने पर ' उपायन ' को अनुवृत्ति को स्तुति प्रकर्ष की प्राप्ति के लिये जैसे माना जाता है उसी तरह घृतकुल्यादि फल कथन के सम्बन्ध में भी सम्भव हो सकता है । ६ - अथवा ' विश्वजित् ' न्याय से अर्थात् ' विश्वजिता यजेत ' इस श्रुतिवाक्य में किसी प्रकार का फल श्रुत नहीं है, और फल के बिना कोई भी किसी कार्य में प्रवृत्त नहीं होता है । अतः ' विश्वजित् ' याग का फल, सर्वाभिलषित ' स्वर्ग ' ही माना गया है, उसी तरह वेदग्रहणाध्यन का भी फल ' स्वर्ग ' है यह मान लिया जाय । किन्तु पूर्व पक्षी का इस प्रकार कहना उचित नहीं है, क्योंकि ' दृष्ट ' ( प्रत्यक्ष ) फल के संभव रहते ' अदृष्ट ' ( अप्रत्यक्ष ) फल की कल्पना करना अनुचित है । अन्यथा ब्रोहीन् अवहन्ति ' - यहाँ पर भो अवह्नन - विधि का तण्डुल प्राप्तिरूप दृष्टफल नहीं मानना होगा, क्योंकि वह बहुत प्रयास से साध्य है । अतः उसकी उपेक्षा करके अदृष्ट फल की इच्छा से एक बार मुसल प्रहार-रूप परिश्रम से रहित अनुष्ठान करना चाहिये, किन्तु वैसा करने पर शास्त्रनिर्दिष्ट तण्डुलों के अभाव से पुरोडाश की अनुपलब्धि में याग की विधियों का बाध होगा । अतः दृष्ट फल की संभावना होने पर उसी का आदर करना ग्रहण उचित रूप होता है | यहाँ ( अध्ययन के ) अक्षर ग्रहण ( अक्षर प्राप्ति ) रूप है ही । अतः स्वाध्याय विधि का अक्षर दृष्ट फल ही मानना चाहिये । फल १० - इसपर कोई ऐसी शङ्का कर सकता है कि -- अध्ययन का अक्षरप्राप्तिरूप प्रत्यक्षफल गुरुमुख से अध्ययन किये बिना लिखित पाठ को स्वयं पढ़कर भी हो सकता है । आयुर्वेद के मन्त्रों के पाठ में ऐसा देखा भी जाता है । इस प्रकार स्वतः ही अध्ययन के सम्भव हो जाने पर उस विधि की क्या उपयोगिता शेष रह जाती है? इस शङ्का का समाधान इस प्रकार होगा कि नियम के अदृष्ट के लिये ' नियमविधि ' का होना आवश्यक है । जैसे तण्डुलों की निष्पत्ति रूप दृष्ट फल की उपलब्धि तो नखों के द्वारा व्रीहि के विदलित किये जाने पर भी हो जायगी परन्तु ' अवघात से ही तण्डुल निष्पत्ति करनी चाहिये नखविदलनादि से नहीं - इस नियम के पालन से जो अदृष्ट होता है, उसके लिये जिस प्रकार अवघातविधि ही आवश्यक है, उसी प्रकार अक्षरग्रहणरूप दृष्ट फल के स्वतः पठन से होने पर भी? नियम-जन्य अदृष्ट की उपलब्धि के लिये यथा - निर्दिष्ट गुरुमुख से अध्ययन करना आवश्यक है । अतः अध्ययन विधि का ' स्वर्गरूप अदृष्ट फल न होकर ' अक्षरप्राप्तिरूप दृष्ट फल ' ही है ।