वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 301–310

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 301–310

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[ २८८ } दुपविशति वेदिमध्येवा । तत आग्नीघ्रः स्पयं सव्यहस्ते गृहीत्वोपासर्जनीरुद्वास्याध्वर्योर्दाक्षिणेनानीय पिष्टानामुपरि धृतस्य सपवित्रस्याध्वर्योर्हस्तस्योपरिनिनयति । ततोध्वर्यु रग्नीधा निनीयमाना उपसर्जनीर्द क्षिणहस्तधृताम्यां पवित्राभ्यां प्रतिगृह्णाति समाप ओषधीभिरिति । अग्नीधा च तथा निनयनं कार्यं यथाध्वर्योर्मन्त्रान्ते ग्रहणं सम्पद्येत । जनयत्यैवेति १।२१ मन्त्रेणोदकं पिष्टानि संयौति । समं विभज्य द्वौपिण्डौ कृत्वा पात्र्यामुदक्संस्थौ निधाय क्रमेणालभते इदमग्नेरिति १।२२ प्रथमं इदमग्नीषोमीयमिति द्वितीयम् । ततोऽग्नीद्वेदं सव्यहस्ते गृहीत्वा इषेत्वेति १।२२ दक्षिणत आज्यमधि श्रयति । अध्वर्युः सहैवाष्टासु कपालेषु प्रथमंपुरोडाशमधिश्रयति धर्मोऽसीति । स्पयोपग्रहेण तत एकादशसु द्वितीय पुरोडाशमधिश्रयति धर्मोसीति सतउरुप्रथा - इति यावत्कपालं पुरोडाशं प्रथयति: अतिपृथु न कुर्यात् एवमेव द्वितीयम् । ततोऽग्निष्टे त्वमिति मन्त्रेण पुरोडाशमद्भिरभिमृशति सकृद्वात्रिर्वा मन्त्रः सकृदेव । एवं द्वितीयमपि श्लक्ष्णयति प्रथमे क्रियमाणे यत्र क्वचनविदीर्णं तत्सन्दधाति । ततः पान्यामंगुलीनां प्रक्षालनम् । ततोगार्हपत्यादङ्गारमानीयान्तरितं रक्ष इति पर्यग्निकरणम् । आज्यस्थाली पुरोडाशान् परितः प्रदक्षिणमङ्गारं परिद्यति । ततोऽङ्गारं गार्हपत्ये प्रक्षिप्य हस्तस्याप्रादक्षिण्येनानयनम् । उदकस्पर्शः । ततोदेवास्त्वेति मन्त्रेण ज्वलद्भिर्दभंतृणैः प्रथमं पुरोडाशं श्रपयति । एवमेव-द्वितीयम् । ततः शृताशृतज्ञानाय माभेर्मा संविक्था इति १ २३ क्रमेण द्वौ पुरोडाशावालम्भते । अशृतीचेत् पुनः श्रपण प्रक्षेपः । शृतौचेत् अतमेरुरिति मन्त्रेण वेदेनोपवेषेण वा तप्ततरेणाङ्गारमिश्रेण भस्मनाच्छादयति । ततः पात्र्यं गुलि प्रक्षालनजलं पात्रस्यमेव गार्हपत्यादीप्तं स्तृणैर्ज्वलद्भिस्तापयित्वा विहारस्योत्तरतः स्फेयन तिस्रोलेखाः प्राक्संस्था: कृत्वा परस्परं संसर्गमप्राप्नुवत् त्रितायाश्यायत्वेति प्रतिमन्त्रं निनयति इदं द्वितीयाध्याय त्वा इदमेकतायाद्यायेति-त्रयभ्यागा । तरफ उसकी ग्रीवा करके ) ' अदित्या इति ' मन्त्र से उसे विछाता है और सब्य ( बाँये ) हाथ से उसे स्पर्शकर ( उसे पकड़े हुए ) दक्षिण ( दाहिने ) हाथ से हृषद ( सिल ) के प्रागग्र करके ' धिषणाऽसि ' मन्त्र बोलकर कृष्णाजिन पर उसे रखे । इस प्रकार कृष्णाजिन पर शिला रखने के बाद ' दिव स्कम्भनीरसि ' मन्त्र बोलकर उस दृषद् ( शिला ) के पश्चात् भाग में ( दृषद् के अधोभाग में ) द्वादशाङ्ग लवाली उदगग्र शम्या को अध्वर्यु रखे । इस प्रकार शम्या को दृषद् के नीचे लगाने से वह शिला पश्चात् भाग से ऊँची और अगले भाग से निम्न ( नीची ) हो जाती है । तदनन्तर पेषण करने के लिये ' धिषणाऽसि ' मन्त्र से दृषद् ( शिला के ऊपर उपला ( शिलापुत्रक ) को उदगग्रस्थापित करे । उसके बाद ' धान्यमसि धिनुहि देवान् ' मन्त्र बोलकर शिलापर तण्डुलों को उड़ेलकर ' प्राणायत्वा ' इत्यादि प्रत्येक मन्त्र से पेषण करना चाहिये । उक्त पेषण मन्त्रों में ' पिनष्भि ' का अध्याहार किया जाता है । अर्थात् ' प्राणाय त्वा पिनष्मि, उदानाय त्वा पिनष्मि, व्यानाय त्वा पिनष्मि ' कहना होगा । उसी तरह ' धान्यमसि धिनुहि देवान् ' में भी ' देवम्, ' ' देवौ ' इस प्रकार जहां जैसी आवश्यकता हो उस प्रकार विकृति में ऊह करते हैं । पितृयज्ञ में ' पितृन् ' ऐसा ऊह किया जाता है । तण्डुलों के पीसे जाने पर और ' भृगूणामिति ' मन्त्र से कपालों के तपाये जाने पर ब्रह्मा ' महीनां पयोऽसि ' मन्त्र कहकर पात्रान्तर से आज्यस्थाली में आज्य उड़ेलता है । तदनन्तर ' वेदोऽसि ' मन्त्र कहकर ' वेद ' बनाता है । यदि यजमान पशु काम हो तो प्रदक्षिणवृत्त वत्सजानु के आकार का प्रादेश परिणाम वाला वेद वनावे | यदि ब्रह्म-वर्चसकाम हो तो त्रिवृत मूताकार वनावे । तृण - पत्र आदि से निर्मित धान्यावपन स्थान की ' मूत ' कहते हैं । यजमान यदि निष्काम हो तव भी वेद को उन्हीं आकारों में बनाना चाहिये । क्योंकि निष्काम के लिये किसी अन्य आकार का विधान नहीं किया गया है । उसके अनन्तर अध्वर्यु ' ' दीर्घामनु प्रसितिम् ० ' मन्त्र कहकर दृषद् पर विद्यमान पिष्ट को कृष्णाजिन पर गिरा दे । कृष्णाजिन पर गिराये गये पिष्ट को ' चक्षुषं त्वा ईक्षे ' मन्त्र कहकर देखे । यहां हर ' चक्षुषे त्वा ' मन्त्र ' ई ' का अध्याहार किया जाता है । चविष्टि में तण्डुलों का भी ईक्षण किया जाता है । तदनन्तर अध्वर्यु ' प्रोक्षणी-पात्र से दोनों पवित्रों को लेकर इडा पात्री में उन्हें उदगग्र रखकर उस सपवित्रक इडापात्री में कृष्णाजिनपर स्थित पिष्टको ' देवस्य त्वा ' मन्त्र कहकर कृष्णाजिन से ही डालता है । इडापत्री में पिष्ट का जो आवपन ( डालना )

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[ २८६ ] तदुक्तम्- ' आदी द्रव्यपरित्यागः पश्चाद्धोमो विधीयते । प्रयोगमिदमिन्द्राय नममेति यथार्थतः । अवत्तं तु त्य-जेन्न मनसा वचसापि च । ततश्च प्रक्षिपेदग्नाविति धर्मः सनातनः । ' प्रणवपूर्वक: त्यागः कार्यः । चतुर्णामृत्विजां तृप्तिपर्यन्तभोजनसमर्थं दक्षिणाग्नावधिश्रयति । श्रपणार्थं मत्रावसरे ग्रहणम् ततो वेदिमानम् प्रथमं पश्चात्तिर्यग्व्या-ममात्री मिमीते चतुभिर रत्निभिर्व्यामो भवति । ततो मध्ये त्र्यरत्ति प्राचीं मिमीते । ततः पुरस्तात् त्र्यरनिमिमीते वरुणप्रघासेषु त्रयः पुरस्तादिति ५।३।१३ पुरस्तात् माने श्यरत्निदर्शनाच्च । ततः श्रोण्योरारभ्य दक्षिण उत्तरतश्च वेदि मध्यसङ्ग हीतां कुर्यात् । ततोऽग्निमभितो सौत्रं कुर्यात् ततोऽग्नीद्वेदे: परिसमूहनं कृत्वा गार्हपत्याहवनीययोरन्त-रास्योत्तरपूर्वं तृतीये उत्करं तृणधूल्यादिराशि करोति । ततोध्वयुर्देवस्य त्वा आददेध्वरकृतमिति ॥ २४ मन्त्रेणासा-दिततृणसहित स्पयमादाय सव्ये हस्ते कृत्वा सतृणं स्पयं निधाय दक्षिणेन हस्तेन लभ्येन्द्रस्य बाहुरिति स्वरेण जपति । अत्र हस्तमार्जनेन स्फ़्यस्य तीक्ष्णीकरणम् । स ' ं श्यत्वेवैनमेनदिति ( १/२/४ ७ ) श्रुतेः । तेन वज्र ेण स्तम्बयजुर्ह -रक् पृथिव्यात्मनो: स्पर्शो न कार्यः । अभिचरतोद्विषत इति स्थाने अमुष्य शत्रोर्नाम गृह्णीयात् । उदकोपस्पर्शः । तदभावे तदभावः । ततः “ पृथिव्यै वर्मासी ” तिमन्त्रेण तं तृणं वेद्यामुदगग्रं निदधाति । पृथिवि देवयजनी १/२५ तिमन्त्रेण तृणस्याधस्तात् भुवि स्पयेन प्रहरति । ततो व्रजं गच्छेति प्रहरणेनोत्खातं पुरीषं पांसुहस्तेन गृह्णाति । ततो वर्षतुत इति प्रहरणदेशे प्रेक्षते । ततो वधान देवेतितद्गृहीतं पुरीषमुत्करे प्रक्षिपति । अत्राप्यभिचारतो नामौगित्यत्र तमिति किया जा रहा है, वह संयवन के लिये किया जा रहा है । अत: चविष्टि में संयवन के न होने से तण्डुलों को इडापात्री में नहीं डाला जाता, तथापि पवित्रों को प्रोक्षणी से निकाल कर इडापात्री में अदृष्टार्थ रखा जाता है । वहाँ से उठकर गार्हपत्य के पश्चात् भाग में अथवा वेदी में बैठता है । तदनन्तर आग्नीध्र अपने वाम हस्त में ' स्फ्य ' को लेकर और तपी हुई उपसर्जनी ( जल ) को गार्हपत्य से उठाकर उसे अध्वर्यु के दक्षिण भाग से लाकर पिष्ट के ऊपर रखे हुए अध्वर्यु के सपवित्र हाथ पर डालता है | आग्नीध्र के द्वारा समानीत उपसर्जनी को दक्षिण हाथ से धारण किए हुए दो पवित्रों से ' समापऽओषधीभि: ' मन्त्र कहने के बाद अध्वर्यु लेता है । उपसर्जनी का आनयन चरु में भी होता है, क्योंकि वहाँ भी उदक की आवश्यकता रहती है । गृहमेधीयादि इष्टि में ' समाप ' के स्थान पर ' सम्पय ' - ऐसा विपरिणाम किया जाता है । उसी प्रकार जहाँ दधि और घृत हो वहाँ पर भी विपरिणाम समझ लेना चाहिये । आग्नीध्र को उसी प्रकार निनयन करना चाहिये, जिससे मन्त्र समाप्त होने पर अध्वर्यु उस जल ( उपसर्जनी ) को ले सके । ' जनयत्यै त्वा ० ' मन्त्र बोलकर उदक और पिष्ट दोनों को मिश्रित करे । तब जल से मिश्रित किये पिष्ट के दो समान विभाग करके उन से दो पिण्ड तयार करे । और उन्हें इडापात्री में उदक् संस्थ रखकर क्रम से दो मन्त्र बोलकर दो पिण्डों का स्पर्श करे । अर्थात् ' इदमग्नेः ' मन्त्र कहकर प्रथम पिण्ड को और ' इदमग्नीषोमीयम् ० ' मन्त्र कहकर द्वितीय पिण्ड को स्पर्श करे । यह आलंभ ( स्पर्श ) देवता निर्देशरूप दृष्टप्रयोजन के लिये है । अतः जहां देवता अधिक हों, वहीं पर तत्तद्ददेवताओं का निर्देश करने के लिये विभाग और आलम्भन की आवश्यकता है, इस कारण जहाँ एक ही देवता हो वहाँ न विभाग किया जाता है और न देवतानिर्देश ही किया जाता है । देवतानिर्देश करने के बाद ब्रह्मा ( आग्नीध्र वाम हस्त में वेद को लेकर ) ' इषे त्वाऽधिश्रयामि ' मन्त्र कहकर गार्हपत्य के दक्षिण भाग में आज्य का अधिश्रयण करे । यहां पर ' इषे त्वा ० ' ये मन्त्र पद साकांक्ष रहने से ' अधिश्रयामि ' का अध्याहार किया जाता है | श्रौतसूत्र कार ने आज्याधिश्रयण का कर्ता ' अन्य ' शब्द से बताया है । अतः ऋत्विजों में से वह अन्य ' ब्रह्मा ' ही होगा, क्योंकि अध्वर्यु पुरोडाशाधिश्रयण में व्यापृत है । जब अध्वर्यु किसी बिहित कार्य में व्यापृत न हो तत्र ( विकृतीष्टि में ) वह स्वयं ही आज्याधिश्रयण करे । अध्वर्यु और आग्नीध्र दोनों एकसाथ ही ' धर्मोऽसीति ' मन्त्र बोलकर आग्नेय अग्नीषोमीय पुरोडाशों का अधिश्रयण करते है । उनमें अध्वर्यु आग्नेय पुरोडाश का ओर अग्नीत्, अग्नीषोमीय पुरोडाश का अधिश्रयण करता है । वह हविष्कवाली इष्टि में अन्य ऋत्विज् भी अधिश्रयण कर सकते हैं | और अग्नीत् अपने - अपने आग्नेय और अग्नीषोमीय पुरोडाशों का प्रथन करते हैं । अर्थात् ' उरु - प्रथा उरु प्रथस्वोरु ते यज्ञपतिः प्रथताम् ' मन्त्र बोलकर कपालका जितना परिमाण हो उतना ही प्रथन अधिश्रित पुरोडाशका करे,

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[ २६० ] स्थाने s मिति शत्रुनाम गृह्णीयात् । उदकोपस्पर्शः । तदभावेऽभावः ततोऽपारुरुमिति १ २६ मन्त्रेण पूर्वप्रहृतादुत्तरत-तृणस्याधस्तात्स्पयेन द्वितीयं प्रहरति । उदकस्पर्शः । मन्त्रस्यासुरत्वात् पूर्ववत्पुरीषादान वेदिप्रेक्षण पुरीषक्षेपणा नि ततोऽग्नीत् स्वयं गृहीत्वा द्वाभ्यां पाणिभ्यामुत्करमभिन्यस्यति पाणिभ्यामुत्पीडयतीत्यर्थः । उदकोपस्पर्शः । “ ततो द्रप्सत " ( ११२६ ) इति मन्त्रेण द्वितीय प्रहृतादुत्तरतस्तृणस्याधस्तात् तृतीयं प्रहरति । अत्रापि पुरीषादानादीनि । ततस्तृतीयप्रहृतादुत्तरतष्तृणस्याधस्तात् तूष्णीं चतुर्थं प्रहरति । तूष्णीमेव सतृणं पुरीषा-दानम् । तूष्णीमेवोत्खात प्रदेशप्रक्षेपणं सतृणस्य पुरीषस्योत्करे प्रक्षेपस्तूष्णीमेव । ततो ब्रह्मन् पूर्वपरिग्रहं परिग्रहीष्या-मीति ब्रह्माणं पृच्छति । ततो ब्रह्मा वृहस्पते परिगृह्णीतेमं मन्त्र हीत्यन्तमुपांशु पठित्वा ओम् परिगृहाणेत्युच्चैरध्वर्यु -मनुजानीते । ततोऽनुज्ञातोऽध्वर्युः स्फ्येन श्रोणेरारभ्य दक्षिणतो गायत्रेण त्वेति । २७ वेदि परिगृह्णाति । आहवनीय-खरपर्यन्तां रेखां करोति त्रैष्टुभेनेति दक्षिणश्रोणेरारभ्योत्तरश्रोणि यावत् परिगृह्णाति । तताजागतेनेत्युत्तरश्रोणेरार-भ्योत्तरपार्श्वे परिगृह्णाति आहवनीयखरंयावत् । ततोवेद्यां प्रागायता उदक्संस्थास्तिस्रो लेखास्तूष्णीं स्पयेन लिखित्वा हर त्रिरित्यग्नीधं प्रतिब्रूयात् । ततोऽग्नीत्ताभ्यो लेखाभ्यः पांसुमुद्ध त्योत्करे प्रक्षिप्य ता लेखाः संमृशेत् मार्जनेनस्फोट-येत् । ततोऽभ्रिमादाय प्रदक्षिणं सर्वतो वेदि खनति त्र्यङ्ग लमू ओषधिमूलोच्छेदपर्यन्तं वा । अस्मिन् पक्षे ओषधीनां मूलत्वे इति प्रेषमध्वर्युरग्नीध प्रति ब्रूयात् । स च प्रेषितो मूलोच्छेदपर्यन्तं खननं करोति । ततो ब्रह्मन् उत्तरं परिग्रहं परिग्रहीष्यामीति ब्रह्माणं पृच्छति । ब्रह्मा च पूर्ववत् वृहस्पते परिगृहाणेति पठित्वा ओम् परिगृहाणेति प्रस्तौति । ततः पूर्ववत् स्पयेन दक्षिणपश्चिमोत्तरपार्श्वेषु वेदि परिगृह्णाति सुक्ष्माचासीति दक्षिणतः । स्योनाचासीति पश्चात् ऊर्जस्वतीत्युत्तरतः । ततः स्फ्पेन दक्षिणां दिशं प्रति वेदिपुरीषमुदुह्य पुरा क्रूरस्येति १।२८ मन्त्रेणानुमष्टि प्राक्संस्थ ' पुरस्तादारभ्य प्रतीचीं दिशं प्रति पुरा रस्येति मन्त्रेणानुमष्टि । प्रत्यक् संस्थ मनुमार्जनमुक्तमस्तीति तथैवानुष्ठेयम् । स्वशाखायां विशेषानुपदेशात् । अनुमार्जनञ्चात्र खननेन समीकरणम् । पशुकामस्य यजमानस्य प्रागनुमार्जनादि-उससे अधिक नहीं । श्रौतसूत्रकार ने ' यावत् कपालमनतिपृथुम् ' कहा है । किन्तु यावत्कपालं कहने से ही अनतिपृथुत्व सिद्ध हो ही जाता है, तब भी ' अनतिपृथु ' कहने का तात्पर्य यह है कि कपालों का परिमाण, श्रुत्युक्त ही होना चाहिये । जिस पुरोडाश का जिसने अधिश्रयण किया हो, वही उसका प्रथनादि अभिमर्शनान्त कार्य करे । ' अग्निष्टे त्वच माहि सीत् ' मन्त्र कहकर जलार्द्रा हाथ से पुरोडाश का सब ओर से या तीनवार स्पर्श करे, किन्तु मन्त्र एक ही बार कहना होगा । उसी प्रकार दूसरे को भी जलार्द्र हाथ से लक्ष्णित करे । ऐसा करने से जहाँ कहीं प्रथन करते विस्तीर्ण-फैलाते समय यदि विदीर्ण हो गया हो तो उसका सन्धान हो जाता है । इस अभिमर्शन के अनन्तर पात्री प्रक्षालन और अंगुलि प्रक्षालन करने के लिये यद्यपि नहीं कहा है, तथापि पिष्टलिप्त पात्री प्रक्षालन और पिष्टलिप्त का अंगुलि- विधान प्रक्षालन यहाँ पर अवश्य करना होगा, क्योंकि आगे चलकर सूत्रकार ने इस प्रक्षालन जल की प्रतिपत्ति किया है । यदि उत्पत्ति ही न हो तो प्रतिपत्ति का होना सम्भव ही नहीं होगा । अतः यहाँ पर अनुक्त रहने पर भी पाती तथा अंगुली का प्रक्षालन तदनन्तर गार्हपत्य से अंगार लाकर ' अन्तरित • रक्षोऽन्तरिता अरातय: ' इस मन्त्र को बोलकर पर्यग्निकरण करे । अर्थात् आज्यस्थालो और पुरोडाशों के चारों ओर प्रदक्षिण करते हुए अंगार को धुमावे | पश्चात् अंगार को गार्हपत्य में डालकर हाथ को अप्रदक्षिण करते हुए लावे । तब उदकस्पर्श करे । तदनन्तर ' देवस्त्वा सविता ' मन्त्र कहकर जलते हुए दर्भतृणों पर प्रथम पुरोडाश का श्रवण करे । उसी प्रकार दूसरे पुरोडाश का श्रयण करे । तदनन्तर उनकी पक्वता अपक्वता को जानने के लिये ' मा भेर्मासंविक्था: ' ( वा ० सं ० १।२३ ) मन्त्र बोलकर क्रम से दोनों पुरोडाशों का स्पर्श करे दोनों का स्पर्श करने के लिये दो बार मन्त्र बोलना होगा । यह अभि-मर्शन ( स्पर्श ) श्रुतामृत परिज्ञनार्थ होने से चरु में भी होगा । धाना में नहीं होगा, क्योंकि उनको देखने से ही उनके पाक का ज्ञान हो जाता है । यदि शृत ( पक्व ) न हुए हों तो उन्हें पुन: श्रपणार्थ डाल दें यदि शृत ( पक्व ) हो गये हों तो ' अतमेरुर्यज्ञोऽत मेरुर्य जमानस्य प्रजाभूयात् ' - ( वा ० सं ० १।२३ ) मन्त्र बोलकर वेद से अथवा उपवेष से तप्ततर अंगार मिश्रित भस्म लेकर उस से उन पुरोडाशों को आच्छादित कर दे । चरु पर भस्म से अभिवासन

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[ २६१ ] पुरीषं निष्काश्योत्करे प्रक्षिप्यान्यपुरीषमानीय वेदेः पूरणम् ततोऽनुमार्जने समीकरणम् । ततोऽग्नीत्प्रोक्षणीगृहीत्वा वेदेरुपरिष्टात् समीप एव धारयति । ततो धार्यमाणासु प्रोक्षणीष्वध्वर्युः स्फ्यमुद्यम्य सर्व प्रेषजातमाह प्रोक्षणी रासादय । इध्मं बहिरूपसादय । स्र ुचः सम्मृद्धि | पत्नीं सन्ना ज्येनोदेहीति । अनेकपत्नीकेऽपि पत्नीशब्दस्य नोहः । यदि प्रेषणेच्छाभवेत्तदा प्रेषणं कुर्यात् । यदि नेच्छेत् तदा अप्रेषितोऽप्याग्नीध्र एव कुक्कुटाहनादिवत् प्रोक्षण्यासनादिपदार्थान् कुर्यादिति हरिस्वामिनः । अप्रैष-पक्षेऽप्यध्वर्युः करोतीत्यपरे । ततो द्विषतो वध इति मन्त्रेण स्फ्यमुत्करे प्रक्षिपति । अभिचरतोऽमुष्मै वा वज्र प्रहरामीति विशेषः । अमुष्मै इत्यत्र शत्रोश्चतुर्थ्येकवचनान्तं नामग्रहणम् । ततोपामुपस्पर्शः । तदभावेऽभावः । ततोऽध्वर्यु: स्पयं गृहीत्वत्करे पाणी प्रक्षाल्य प्रणीतानां पश्चात् प्रागग्रमुदगग्रं वा स्पयं निदधाति । ततोऽग्नी दिमध्ये उदगग्रामग्नि होत्रवणीमासाद्य प्रणीतानां पश्चात् स्पयस्योत्तरतः प्रागग्रमिध्ममासाद्येध्मादुत्तरतो बहिः प्रागग्रमासादयति । अथवा ( आच्छादन ) नहीं किया जाता । तदनन्तर पिष्टलिप्त पात्री प्रक्षालन जल और पिष्टलिप्त अंगुली प्रक्षालन जल को पात्री में ही गार्हपत्य से लाये हुए उल्मुक ( जलते हुए तृणों ) से तपाकर पूर्व से आरम्भ कर पश्चिम तक उत्कर के समीप विहार के उत्तर में भूमि पर स्पय से प्राक्संस्थ तीन रेखाओं को कर परस्पर संसर्ग जिस तरह न हो पाये उस तरह ' त्रितामाप्त्यायत्वा ' मन्त्र बोलकर त्रितादि तीन देवताओं के लिये अध्वर्यु उसका निनयन करे । अर्थात् त्रित-• आपत्य आदि देवतारूप होने से उन्हें उद्देश्य कर त्याग करे । यहां तीनों मन्त्रों में ' निनयामि ' का अध्याहार करना चाहिये, यानी ' त्रिताय त्वा निनयामि, द्वितायत्वा निनयामि, एकताय त्वा निनयामि ' इस प्रकार मन्त्र व हे । कहीं पर कहा भी है- पहले द्रव्य का त्याग करे तदनन्तर होम करे । ' इदमिन्द्राय न मम ' यही अपने अर्थ के अनुरूप त्याग पदार्थ है । मन और वाणी से भी अवत्त ( गृहीत ) अन्न का त्याग करे, तदनन्तर अग्नि में उसका प्रक्षेप करे । यही सनातन धर्म है । त्याग हमेशा प्रणव पूर्वक करना चाहिये । तदनन्तर अन्वाहार्य ओदन का दक्षिणानि पर अधिश्रयण करे । दर्शपूर्णमासेष्टि में दक्षिणार्थ जो ओदन ( भात ) है, उसे ' अन्वाहार्य ' कहते हैं । चार ऋत्विजों की तृप्ति करने में पर्याप्त उस अन्वहार्य संज्ञक दक्षिणार्थ ओदन का अधिश्रयण अध्वर्यु दक्षिणाग्नि पर करे । इस ओदन का पाक प्रणीता के जल से अथवा लौकिक जल से किया जाता है । किन्तु प्राशित्र प्रहरणपात्र का प्रक्षालन और अध्वर्यु के हाथ का प्रक्षालन प्रणीता के जल से ही करना चाहिये, क्योंकि वह सर्वार्थ होता है । तदनन्तर वेदिखनन किया जाता है । उसके खनन करने का प्रकार यह है - पूर्व दिशा में अरत्निमात्र, चतुरस्र, द्वादशाङ्गुल उच्च और चतुरङ गुल विस्तीर्ण मेखला वाले आहवनीयखर का निर्माण कर उसके पश्चिम में तीन अंगुल के खातवाली, और पूर्व तथा अपर भार में तीन अरत्नि प्रमाण की विस्तीर्ण, उसी तरह पश्चिम में चार अरत्नि परिमाण की दक्षिण तथा उत्तरभार में आयत ( विस्तीर्ण ), विषम चतुरस्र वाली वेदी का निर्माण अध्वर्यु करे । अथवा उक्त प्रमाण के बजाय यजमान कल्पित प्रमाण से पूर्वभाग या उत्तरभाग में किञ्चित् निम्ना और मध्य में अखात संग्रहवती वेदी को अध्वर्यु बनावे | यजतिस्थान और जुहोतिस्थान की ' संग्रह ' शब्द से कहा जाता है । तात्पर्य यह है कि प्रथमतः पश्चिम भागे तिर्यक् व्याममात्र परिमाण और मध्यभाग में पूर्व को श्यरत्नि परिमाण रखना चाहिये । चार अरत्नियों का व्याम होता है । तदनन्तर सामने तीन अरत्नि परिमाण रखे । वरुण प्रधासेष्टि में ' त्रयः पुरस्तात् ' ( का ० श्री ० सू ० ५।३।१२ ) पुरस्तात् भाग में में तीन अरत्नि परिमाण दृष्टिगोचर होता है । तदनन्तर दोनों श्रोणियों से आरम्भ कर दक्षिण और उत्तर वेदी को मध्य संगृहीत करे । तदनन्तर सूत्रोक्त प्रकार से afe के चारों ओर अनुष्ठान करे । अग्नीत् नाम का ऋत्विज, कुशाओं से वेदि का परिसमूहन करके गार्हपत्य और आहवनीय के बीच में आहवनीय के उत्तर और वेदि के पूर्वभाग के वितृतीय देश ( स्थान ) में अर्थात् संग्रह स्थान में तीन अंगुल का वृत्ताकार और छह अंगुल का विस्तार जिसका हो ऐसे एक अंगुल के गर्त अर्थात् पांसु आदि के प्रक्षेप

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[ २८२ ] प्रणीत दक्षिणे प्रदक्षिणामाहृत्य प्रणीतानां पश्चादेव प्रथममासादयति । ततो बहिः । तत आग्नीध्रः । खादिरं स्रुव मादाय प्रत्युष्टं रक्षः, निष्ट प्रमितिवा मन्त्रेण गार्हपत्ये प्रतप्य उपस्पृश्याग्निसमीपात् प्राच्यां गत्वा वेदाग्नेरन्तरतः प्राञ्चौं संमाष्टि । मूलादारभ्य।ग्रपर्यन्तं अनिशितोऽसीति १ । ३० मन्त्रेण ततो वेदमूलैर्बहिः प्रदेशे स्रुवपुष्करस्य ब्रु ुध्नादारभ्य मूलपर्यन्तं प्रत्यच ं संमाष्टि अनेनैव मन्त्रेण । ततोऽग्निसमीपे गत्वा पूर्ववत्प्रतप्याप उपस्पृश्याध्वयं वे समर्पयति । ततो जुहूमादाय प्राङत्क्रम्यानिशितासीति स्रुवमन्तरतो वाह्यतश्च मन्त्रेण संमृज्य पूर्ववत्प्रतप्याप उपस्पृश्याध्वर्यवे प्रय-च्छति । एवमेवोपभृतं ध्रुवाच स मृज्यप्रतप्य प्रयच्छति । प्रततस्तूष्णीं प्राशित्रहरणे शृतावदानं पुरोडाशपात्रीं च प्रत्येकं प्राक्रम्य तूष्णीमन्तर्बहिश्च समृज्याग्निसमीपमागत्य तूष्णीं प्रताप्याध्वर्यवे प्रयच्छति । तत्र रक्षोदैवतमन्त्रोचारणा भावादुदकस्पर्शाभावः । ततः सम्मार्जनानि उत्करे प्रक्षिपत्याहवनीयेवा । उत्ताना धारयमाणः स्रुच: समष्टि । संमृष्टा-न्यस ं मृष्टैः स्पर्शयति । यथास्थानमुत्तांनाः स्रुचः सादयति । शाखान्तरीया अत्रविशेषाः । इडापात्रीषवत्तयोस्तु न संमार्गः क्वचिदपि सूत्रेऽदर्शनात् । पुरोडाशपात्री च द्वयोः पुरोडाशयोः साधारणी एकैव भवति पात्रीमित्येकवचनात् । ततः पत्नी संनहनम् । तत्राग्नीध्रोयोक्त्रमादाय गार्हपत्यान्नैर्ऋत्यां दिशीशानाभिमुखीमुपविष्टां पत्नी परिधानवस्त्रात् बहिर्योक्त्रेण प्रदक्षिणं वेष्टयति अदित्यै रास्नासीति ( १।३० ) मन्त्रेण । ततो दक्षिणं पाशमुत्तरे शङ्क स्थानीये प्रतिमुच्य सामर्थ्याद्धि वेष्टयित्वा योक्त्रस्यान्तमूर्ध्वमुदहति विष्णोवेष्पोसीति मन्त्रेण ग्रन्थि न करोति । ततो करने के लिये एक गड्ढा करे । इसी गर्त को ' उत्कर ' संज्ञा दी गई है । गार्हपत्य मध्य शंकु और आहवनीयमध्य शंकु से बँधी हुई रज्जु के मध्यवर्ती चिन्हों के पूर्वस्थान में रज्जु को लेकर उत्तर की ओर खीच ने में जहां चिन्ह होता है, उसे ‘ वितृतीय ' देश कहते हैं । यही उत्कर स्थान कह लाता है । उसके बाद अध्वर्यु ' ' देवस्यत्वा स ० म् । आददेऽध्वर-कृतं देवेभ्यः ' – ( वा ० सं ० १।२४ ) मन्त्र से आसादित तृण के सहित स्पय को उठाकर उसे वामहस्त में रखकर वामहस्तस्थित उस सतृण स्पय को दक्षिण हस्त से स्पर्श कर ' इन्द्रस्य बाहुर सि ० ' मन्त्र को सस्वर जपे । इसी समय उस पर हस्त मार्जन करते हुए उस स्फ्य को तीक्ष्ण करे । ' स 28 ' श्यत्येवैनमेनत् ' ऐसा श्रुति कह रही है । पितृयज्ञ में मन्त्रगत ‘ देवेभ्यः ’ के बजाय ' देवपितृभ्यः ' यह विपरिणाम करना चाहिये । यह स्पयादान और जप, स्तम्बय-जुर्हरणार्थ होने से उसके अभाव में नहीं किया जाता । प्रहरण लेकर पुरीषनिवपनान्त कर्म को ' स्तम्बयजुह ' रण ' शब्द से कहा जाता है । स्तम्बयजुर्हरण से पूर्व उस वस्त्र से पृथिवी और आत्मा का स्पर्श न करे । ' अभिचरतो द्विषतः ' के स्थान में ' अमुष्य ' अर्थात् शत्रु का नाम कहना चाहिये । तदनन्तर उदक स्पर्श करे । यदि अभिचार न करना हो तो उदकस्पर्श न करे तदनन्तर ' पृथिव्यै वर्मासि ' मन्त्र बोलकर भावी वेदी में अर्थात् जिस में वेदी का निर्माण किया जायेगा, उस देश में अध्वर्यु स्फ्य के साथ ग्रहण किये हुए तृण को उदगग्र रख दे तदनन्तर ' पृथिवि देवयजन्योषध्यास्ते मूलं मा हि ० सिषम् - ( वा ० सं ० १।२५ ) मन्त्र बोलकर तृण से अन्तर्हित भूमिपर वज्र से प्रहार करे । तृण पर ही प्रहरण करने का सम्प्रदाय है । वज्र के द्वारा प्रहार करने से उद्धृत मृत्तिका को यानी उसके पुरीष को ' वज्र ' गच्छ गोष्ठानम् ' मन्त्र बोलकर हाथ से ग्रहण करे । तदनन्तर ' वर्षतु ते द्यौः ' मन्त्र बोलकर वेदी की ओर अर्थात् जहां प्रहरण किया है, उस स्थान को देखे, और ग्रहण की हुई मृत्तिका ( पुरीष ) को ' बधान देव सवितः ० ' मन्त्र बोलकर उत्कर में डाल दे । यहाँ पर भी यदि अभिचार करना हो तो मन्त्रगत ' बधान देव ' मा मौक् ' में ' तम् ' के स्थान में अमुकम् अर्थात् शत्रु का नामग्रहण करे । तब उदकस्पर्श ( आचमन ) करे । यदि अभिचार न करना हो तो उदकस्पर्श नहीं करना होगा । शतपथ ब्राह्मण ने प्रहणादि निक्षेपान्त कार्य के लिये ' पृथिवि देवयजन्योषध्यास्ते ० ' मन्त्र का यद्यपि अविशेषेण उपदेश किया है, तथापि अन्यशाखा ( तै ० ब्रा ० ३।२६ ) में विशेष रूप से बताया गया है, अतः विशेष ( तत्तत् ) कार्य में ही तत्तत् मन्त्र को कहना उचित हैं, क्योंकि ' सामान्यविधिरस्पृष्टः स व्हियेत विशेषत: ' --( तं ० वा ० ३ | ४/४७ ) न्याय से अवयवशः ही उक्त मन्त्र का तत्तत् विशेष कार्य में विनियोग है । तात्पर्य यह है कि ' पृथिवि देवयजनि ० ' में चार मन्त्र हैं । उनमें प्रथम मन्त्र प्रहरण में, द्वितीय मन्त्र पुरीषादान में तृतीय मन्त्र वेदिप्रेक्षण में और चौथा मन्त्र उत्कर में पांसु प्रक्षेपण में विनियुक्त है । तदनन्तर ' अपाररु पृथिर्व्य देवयजनाद्वध्यासम्'-

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[ २६३ ] दोर्जे त्वेत्याज्यस्थालीमुत्तरत उद्वास्य पत्न्या अग्रे निधाय पत्न्याज्यमवेक्षस्वेति वक्ति सा पत्नी " अदब्धेने " ति– मन्त्रेणाज्यमवेक्षते । अनेकासु पत्नीषु सर्वासां योक्त्रबन्धनं पत्नीसंस्कारत्वात् । आज्यावेक्षण त्वेकयैव कार्यम् आज्य संस्कारत्वात् । ततोऽग्नीत् पत्न्या अग्रत आज्यं गृहीत्वा वेदिमध्ये प्रोक्षणीभ्योऽपरं सादयत्युपविश्य ततोऽध्वर्युवेदं गृहीत्वा प्रोक्षणीभ्यः पवित्रेगृहीत्वा आज्यलिप्ताभ्यामेवताभ्यां सवितुर्वः प्रसव इति मन्त्रेण प्रोक्षणीरुत्पुनाति । ततस्तेजोऽसीति १।३१ मन्त्रेणाज्यमवेक्षतेऽध्वर्युर्वा यजमानोवा वेदोपग्रहेण । ततोऽध्वयुः सव्येन जुहूं वेदं च गृहीत्वा दक्षिणेन स्रव-मादाय तेनाज्यस्थायाः सकाशात् तूष्णीमाज्यमादाय जुह्वां निनयति धामनामासीति । जुह्वां चतुरः स्रवान् गृह्णाति तत्रैकवारं मन्त्रेण त्रिस्तूष्णीम् । केचित्तु त्रिर्मन्त्राः सकृत्तूष्णीम् । तत उपभृत्यष्टौ कृत्वा घृत ं गृह्णाति । अत्रापि स्वकृद्धा मनामेति मन्त्रः सप्तकृत्वस्तूष्णीं केचित्तु त्रिर्मन्त्रः पञ्च कृत्वस्तूष्णीमित्याहुः । अष्टकृत्वो गृह्णन्नपि जौहवादाज्या-दल्पतरं यथा स्यात्तथा गृह्णीयात् । जुह्वां चतुरः स्रवान् पूर्णान् गृह्णीयात् । उपभृति तु अपूर्णान् स्रुवान् गृह्णाति । ( वा ० सं ० १।२६ ) मन्त्र बोलकर पूर्व प्रहृतस्थान से आगे तृण के नीचे भूमिपर स्पय से द्वितीय प्रहार करे । तदनन्तर उदकस्पर्श करे । मन्त्र की असुरता होने से पूर्ववत् पुरीषादान वेदिप्रेक्षण, पुरीषक्षेपण आदि कार्यों को करे । तदनन्तर अग्नीत् स्पय को लेकर दोनों हाथों से उत्कर को ' अररो दिवं मा पप्त: ' - ( १२६ ) मन्त्र कहकर पीटे, जिससे धूल दव जाये । तब उदकस्पर्श करें । तदनन्तर ' द्रप्सस्ते द्यां मा स्कन् ' - ( १३१६ ) मन्त्र कहकर द्वितीय बार प्रहृत किये गये स्थान से आगे तृण के नीचे की भूमिपर तृतीय प्रहार करे । और उत्करकरणान्त कार्य करे । अब तृतीय प्रहार के प्रहरण और उत्करकरणान्त कर्म करे । पुरीष को ' के साथ ही चतुर्थ-raft ( बिना मन्त्र कहे ) चतुथंवार तृण वार में तूष्णीं रहकर ही डाल दे । उसके बाद ' ब्रह्मन् पूर्वपरिग्रह ' परिग्रहीष्यामि ' इस प्रकार ब्रह्मा से पूछे ' तब ब्रह्मा, ' बृहस्पते परिगृह्णीत ' इस मन्त्र को ' घेहि ' तक उपांशु पढ़कर ' ॐ परिगृहाण ' इतना उच्चस्वर से बोलकर - अध्वर्यु को अनुज्ञा देता है । अनुज्ञापाया हुआ अध्वर्यु स्फ्य के द्वारा श्रोणी से आरम्भकर वेदी के दक्षिण, पश्चिम और उत्तर में ' गायत्रेण त्वा छन्दसा परिगृह्णामि ० ' त्रैष्टुभेन त्वा छन्दसा परि ० ', ' जागतेन त्वा छन्दसा परि ० ' मन्त्र कहकर उसका पूर्व परिग्रह करे । वेदी की इयत्ता का निश्चय करने के लिये दक्षिणादि तीनों दिशाओं में स्पय से जो रेखा-करण किया जाता है, उसे पूर्व परिग्रह कहते हैं । तात्पर्य यह है कि ' त्रोष्टुभेन ' मन्त्र कहकर आहवनीय खर तक मन्त्र रेखा करता है, अर्थात् दक्षिण श्रोणि से आरम्भ कर उत्तरश्रोणि तक रेखा करे । तदनन्तर ' जागतेन ० ' कहकर उत्तरश्रोणि से आरम्भकर उत्तर पार्श्व में आहवनीय खर तक परिग्रह करे । इसके बाद वेदि में प्राक् आयत एव उदक् संस्थ तीन रेखाओं को स्पय से तूष्णीं करके अग्नीध को अध्वर्यु ' ' हर त्रिः ' यह प्रैष दे । ' हर त्रि: ' इस प्रकार त्रि शब्द घटित ही मन्त्र विवक्षित है । इसी कारण वरुण प्रधास आदि में जहां दो वेदी हों वहां ' त्रि ' शब्द का विपरि णाम किये बिना ही ' हर त्रिस्त्रि: ' इस प्रकार मन्त्र पढना चाहिये । ' त्रि ' शब्द के स्थान में ' षट् कृत्वः ' ऐसा ऊह नहीं होगा । तदनन्तर अग्नीत्, उन रेखाओं से पांसुओं को तीन वार लेकर उत्कर में उसे डालकर रेखाओं का संमर्शन से समीकरण करे, अर्थात् जल सिंचनकर लेप दे । अथवा लेखाहरण और संमर्शन पितृयज्ञ और अग्निचयन में करे यहाँ नहीं । क्योंकि उन दोनों में ही विधान दिखाई देता है । ' लिखति, हरति यत् हायं भवति - ( श ० ब्रा ० २ | ६ | १ | १२ ) इति पितृयज्ञे, लिखित्वाऽऽह हर त्रिरिति, हरति त्रिराग्नीध्र ' - ( श ० ब्रा ० ७ २ २ १ ) इति चयने च । किन्तु कर्काचार्य का कहना है कि यहाँ पर यद्यपि लेखाहरण और संमर्शन का विधान श्रुति ने नहीं किया है, तथापि विकृतियाग में दोनों का अनुष्ठान होता है, अर्थात् दोनों का विधान है, अतः प्रकृतियाग में उन दोनों के उपदेश का अनुमान कर लिया जाता है । इसलिये प्रकृति में उन दोनों का अनुष्ठान करना ही चाहिये । तदनन्तर अनि ( कुदाल ) को लेकर वेदि को तीन अंगुल या ओषधि के मूलोच्छेद तक सब ओर से प्रदक्षिण खोदे । इस पक्ष में ' ओषधीनां मूलोच्छेत्तवे ' यह प्रैष अग्नीध को

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[ २६४ ] ततो वायां चतुराज्यं गृह्णाति सकृन्मन्त्रेण त्रिस्तूष्णीम् । तत आज्यस्थलीं सुगुप्तेस्थले निदधाति । यदष्टौ कृत्वो -गृह्णाति उपभृति प्रयाजानुयाजेभ्यस्तगृहाति ' ( तै ० ब्रा ० ३ | ३ | ५ ) इति प्रयाजानुयाजोभयार्थत्वादधं प्रयाजेषु अर्धमनु-याजेषूपयुज्यते । यत्रानुयाजाभावो यत्र वा पृषदाज्यादिना अनुयाजा विहितास्तत्र चतुर्गृहीतमेवाज्यं ग्राह्यम् । चतुरन्यत्र प्रति विभागात् ' ( का ० श्री ० सू ० २ । ७ । ११ ) इति प्रमणात् । अध्यात्मपक्षे तु — भगवान् वेद आत्मानं सम्बोधयति - हे जीव सवितुः प्रपञ्चोत्पादयितुः परमेश्वरस्य देवस्य स्वप्रकाशस्य प्रसवे आज्ञायां वर्तमानोऽहं त्वा त्वामच्छिद्रेण निर्दोषेणापास्तसमस्तसंशयविपर्ययादिना पवित्रेण पावकेन अध्वर्यु दे । तब वह प्रैष पाया हुआ अग्नीध मूलोच्छेदतक खनन करे । तब ' ब्रह्मन् उत्तरं परिग्रह परिग्रहीष्यामि ' इस प्रकार ब्रह्मा से पूछे । और ब्रह्मा पूर्व की तरह ' वृहस्पते परिगृहाण ' ऐसा बोलकर ' ॐ परिगृहाण ' - हाँ, परिग्रह करो - कहता है । तब वह ( अध्वर्यु ) पहले की तरह स्पय से दक्षिण, पश्चिम और उत्तर के भागो में वेदि परिग्रह करता है । ' सूक्ष्माचासि मन्त्र से दक्षिण भाग का और ' स्योनाचा सि ० ' मन्त्र से पश्चिम भाग का तथा ' ऊर्जस्वती ' मन्त्र से उत्तर भाग का परिग्रह करे । वेदिकरण के अनन्तर स्फ्य से पूर्ववत् तीनों दिशाओं में रेखाकरण करने को ' उत्तर परिग्रह ' कहते हैं । तदनन्तर स्पय से दक्षिण दिशा में वेदिपुरीष को फेंक कर ' पुरा रस्य ' ( वा ० सं ० ११२८ ) मन्त्र से पूर्व से पश्चिम दिशा तक वेदी का प्राक् संस्थ समीकरण करे । स्वशाखा में कोई विशेष ( भिन्न ) बात नहीं कही गई है | यहां पर अनुमार्जन का अर्थ है खोद कर एक सा करना । यजमान यदि पशुकामनावान् हो तो वह अनुमार्जन करने के पूर्व वेदी के पुरीष को निकालकर उसे उत्कर में पटककर अन्य पुरीष से वेदी को भरकर तब अनुमार्जन से उसका समीकरण करे । तदनन्तर अग्नीत् ( अध्वर्यु ) वेदि के ऊपर अर्थात् वेदी के समीप में ही दोनो हाथो से प्रोक्षणी को धारण करे । तब अध्वर्यु ( अग्नीत् ) वज्र उठाकर अध्वर्यु के प्रति चार प्रेषों को लगातार ( सतत ) दे I वे चार प्रैष इस प्रकार हैं - ( १ ) प्रोक्षणीरासादय, ( २ ) इध्मं बर्हिरूपसादय, ( ३ ) स्र ुच: सम्मृद्धि, ( ४ ) पत्नी सन्नह्य आज्येनोदेहि । इध्म और बहिः शब्द जातिवाचक होने से वरुणप्रघास में उन में विपरिणाम नहीं किया जाता । गृहमेधीयेष्टि में स्रक् एक रहने से ' त्र ुचं सम्मृद्धि ' ऐसा विपरिणाम किया जाता है । वरुणप्रघास में ' प्रोक्षणी रासादयतम् ' ऐसा विपरिणाम किया जाता है । अनेक पत्नियों के रहने पर भी ' पत्नी ' शब्द में विपरिणाम ( ऊह ) नहीं किया जाता । मन्त्रगत ' आज्य ' शब्द, आज्य जाति का वाचक है, अतः जहाँ वरुण प्रघास आदि में आज्य अनेक रहते हैं वहाँ भी ' आज्येनोदेहि ' इसी प्रकार मन्त्र का प्रयोग किया जाता है । द्विवचन में उसका विपरिणाम् नहीं किया जाता कात्यश्रौतसूत्रकार ने ' यदीच्छेत् ' ( २।६।२६ ) कहा है, इस कारण प्रषकरण वैकल्पिक है । यदि प्रषदेने की इच्छा न हो तो बिना प्रौष प्राप्त किये ही आग्नीध्र, कुक्कुटाह्वान के समान प्रोक्षणी आसादनादि पदार्थो को करे - यह हरिस्वामी का कथन है । अप्रषपक्ष में भी अध्वर्यु इन पदार्थों को करे - ऐसा अन्य लोग कहते हैं । तदनन्तर ' द्विषतो वधः ' यह मन्त्र बोलकर स्पय को उदगग्र करके उत्कर में डाल दे । यदि अभिचार करना हो तो ' अस्मै वा वज्र ' प्रहरामि ' यह कहना होगा । ' अमुष्मै ' की जगह शत्रु का चतुर्थ्येकवचनान्त नाम कहना चाहिये | तदनन्तर जलस्पर्श करे । यदि अभिचार न हो तो जलस्पर्श नहीं है । तदनन्तर अध्वर्यु स्फ्य को लेकर उत्कर में दोनों हाथों को धोकर प्रणीता के पश्चात् भाग में प्रागग्र अथवा उदगग्र करके स्पय को उदगग्र करके रखे । तदनन्तर आग्नीध्र वेदी में उदगग्र रखी हुई अग्नि होत्र हवणी को स्थापन कर प्रणीता के पश्चात् भाग में और स्पय के उत्तरभाग में इम को प्रागग्र रखकर, इध्म के उत्तर भाग में बह को प्रागग्र रखे । पलाशादि वृक्षों की अरत्निमात्र परिमाण समिधाओं को ' इध्म ' कहते हैं । अथवा इध्म को प्रणीता के दक्षिण से प्रदक्षिण लेकर प्रणीता के पश्चात् भाग में ही प्रथमत: स्थापन करे, तदनन्तर बहि को स्थापन करे । तदन्तर अध्वर्यु ( अग्नीत्? ) गार्हपत्य के पश्चात् को गार्हपत्याग्नि पर तपावे । और भाग में बैठकर ' प्रत्युष्टम् ० ' अथवा ' निष्टप्तम् ० ' मन्त्र कहकर खादिर स्रवा

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[ २६५ ] ज्ञानेन उत्पुनामि उत्कर्षेण पुनामि सूर्यस्य स्वप्रकाशस्य ज्ञानसूर्यस्य रश्मिभिस्तदनुगुणविचारैश्च समस्तोपाधिनिरसनेन परिशोध्य ब्रह्मात्मतादात्म्ययोग्यता मापादयामि | सवितुर्देवस्य प्रसवे वो युष्मान् अच्छिद्रण संशयाद्यनास्कन्दितेन ज्ञानेन सूर्यस्य तस्यैव ज्ञानसूर्यस्य रश्मिभिश्च उच्चैः पुनामि पवित्रयामि शोधयामि । हे जीव तेजोऽसि परमात्मालम्बन तेजोऽसि । ‘ येन तेजसेद्धः सूर्यस्तपतीति श्रुतेः । शुक्र दीप्तिमदसि ज्योतिष्मदसि । अमृतमसि मत्यं यद्द हेन्द्रियादिक. बैठा हुआ ही कश्विन्मात्र पूर्व दिशा की ओर जाकर स्रुव को वामहस्त में लेकर छेदन करके वेद से पृथक् हुए वेदाग्रों से उस स्रुव को मूल से आरम्भकर मुख पर्यन्त ऊपर की ओर ' अनिशितोऽसि ० ' मन्त्र कहकर सम्मार्जन ( स्वच्छ ) करे पूर्व की ओर जाकर उसी खादिर स्रुव को बाहरीभाग में विपर्यास से । तदनन्तर वह ( अध्वर्यु ' ) किञ्चित् अर्थात् अग्र से आरम्भकर मूल पर्यन्त ' अनिशितोऽसि ० ' मन्त्र बोलकर वेद के मूल भागों से स्वच्छ करे । यह जो उत्क्रमण है, वह सम्मार्जनार्थ नहीं है । प्रतपनार्थ नहीं है तदनन्तर अध्वर्यु ' ' प्रत्युष्टम् ' मन्त्र कहकर पुनः स्त्रवका प्रतपन कर वेदो में रखने के लिये अग्नीत् ( अध्वर्यु? ) को दे, यह प्रतपन अध्वर्यु अपने स्थान पर वापस आकर करे । क्योंकि पूर्वोक्त प्राक् उत्क्रमण संमार्ग मात्रार्थ था । तदनन्तर जुहू, उपभृत्, ध्रुवा को भी प्राय उत्क्रमण मन्त्र बोलकर वेदाग्र और वेद मूल से भीतर - बाहर क्रम - व्युत्क्रम से स्वच्छ कर प्रतपन करके अग्नीत् को दे । तदनन्तर मन्त्र को बिना ही ( of ) प्राशित्रहरण शृतावदान, दो पुरोडाशपात्री और इडा पात्री का संमार्जन प्रतपन करना चाहिये । यहाँ प्राक् उत्क्रमण नहीं करना है । तूष्णीं प्रतपन करके वेदी में स्थापन करने के लिये अग्नीत् को दे देना है । इस समय रक्षोदैवत मन्त्रोच्चारण न होने से उदकस्पर्श भी नहीं करना है । तदनन्तर संमार्जन साधनभूत वेदानों को उत्कर में अथवा आहवनीय में डाल दे । स्रुचाओंको उत्तान कर उसका संमार्जन करना चाहिये । संमृष्टों ( त्र चाओं ) को असंमृष्टों से स्पर्श करावे | और यथास्थान स्रुचाओं को उत्तान स्थापित करे । शाखान्तर में इस प्रसंग पर कुछ विशेष कहा है । इडापात्री और षड् अवत्तों का संमार्ग किसी सूत्र में दृष्ट न होने से उसे नहीं करना चाहिये । सूत्र में ' पात्रीम् ' इस एक वचन के प्रयोग से दोनों पुरोडाशों की एक ही साधारण पुरोडाश पात्री होती है । तदनन्तर पत्नींसंनहन किया जाता है । अध्वर्यु गार्हपत्य के निर्ऋति कोण में पहले से बैठी हुई ईशान दिशा की ओर मुख की हुई यजमान पत्नी को उसके पहने हुए परिधान वस्त्र ( साड़ी ) के ऊपर से मुज्ज संज्ञक तृण-विशेष से निर्मित त्रिगुणित योक्त्र ( मेखला ) से नाभि के नीचे कटि प्रदेश में ' अदित्यै रास्नाऽसि मन्त्र कहकर प्रद-क्षिण लपेट देता है । यह पत्नी सन्नहन, पत्नी का संस्कार होने से अनेक पत्नीयों के रहने पर प्रत्येक पत्नी का वह संस्कार करना चाहिये । उस योक्त्र के दक्षिणाग्रस्थित पाश को उत्तराग्रस्थित पाश के मध्य में से ऊपर की ओर प्रवेश कराकर पुनः उसे नीचे खींचकर शंकुस्थान में उसे पोकर उस दक्षिण पाश को ऊपर की ओर उरस दे अर्थात् योक्त्र में ही उसे अटकादे । योक्त्र के मध्य में से ऊर्ध्वगृह न बताने से प्रतीत होता है कि दो बार योक्त्र से वेष्ट न करना चाहिये, क्योंकि एक वेष्टन में उद्गूहन करना शक्य नहीं है ऐसा देवयाज्ञिक कहते है । ' विष्णोर्वेष्पोसि ० ' मन्त्र से उस में ग्रन्थि न लगावे । ' उर्जेत्वा ० ' मन्त्र में ' उद्वास्यामि ' ऐसा अध्याहार करके अध्वर्यु आज्य का उद्वासन ( निकाल ) कर ' अदब्धेन ० ' मन्त्र कहकर यजमान पत्नी को दिखावे | ' अवेक्षयति ' इस णिजन्त प्रयोग के कारण ' पत्न्याज्यमवेक्षस्व ' यह अध्येषणा करनी चाहिये । अनेक पत्नियों के रहने पर भी आज्यावेक्षण एक ही पत्नी करे, क्योंकि वह द्रव्यसंस्कार है, पत्नीसंस्कार नहीं है । पत्नी के अभाव में अध्वर्यु ' ही अवेक्षण करे । तदनन्तर अव ( अग्नीत्? ) पत्नी के सामने से आज्य को लेकर उसे आहवनीय पर रखकर पुनः उस से निकालकर वेदि में प्रोक्षणी के पश्चिम भाग में रख दे तदनन्तर अध्वर्यु वेद का ग्रहण कर और प्रोक्षणी से पवित्रों को लेकर आज्य लिप्त हुए उन्हीं पवित्रों से ' सवितुस्त्वा ० ' और ' सवितुर्व: ' इन दो मन्त्रों से आज्य और प्रोक्षणीजल का उत्पवन करे । तदनन्तर ' तेजोऽसि ० ' मन्त्र बोलकर अध्वर्यु अथवा यजमान वेद का ग्रहण कर आज्य को देखे । तत्पश्चात् अध्वर्यु ' सव्य ( वाम ) हस्त में जुहू और वेद को लेकर और अपसव्य ( दक्षिण ) हात में स्र ुव लेकर उस से आज्यस्थाली में से तूष्णीं

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[ २६६ ] तद्भिन्नोऽसि । धामसि धीयते चित्तवृत्तिर्यस्मिंस्तत् धाम परब्रह्मलक्षणं सर्वाश्रयस्वरूपमसि ' यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं ममे ( श्रीभ ० गी ० १५/६ ) ति वचनात् । नामासि नमयति सर्वाणि भूतानि स्वात्मानं प्रतीति नाम सर्वाधिष्ठा-न तद्रूपमसि । देवानामिन्द्रियमनोबुद्धिरूपाणां ज्योतिषामिन्द्रादीनां च प्रियं परप्रेमास्पदं ब्रह्मासि । अनाधृष्टमप्रधृष्यं ' महद् भयं वज्रमुद्यतम् ' ' भोषास्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः ' इत्यादि श्रुतिभ्यः । देवयजनमसि देवैरपीज्यते यत् तत्

देवयजनम् असीति ।

॥ इति प्रथमोऽध्यायः ॥

॥ वेद पुरुषाय नमः ॥

॥ श्रीरस्तु ॥

( मन्त्र रहित ) आज्य लेकर ' धाम नामासि ' मन्त्र बोलकर जुहू में डाले । स्रव से जुहू में चार बार आज्य ग्रहण करे, चारों बार स्रुव को पूर्ण भरकर ले । उनमें से प्रथम आज्यु ग्रहण के समय ही मन्त्र बोलना चाहिये, और तीन बार तूष्णीं आज्य ग्रहण करना चाहिये । कुछ लोगों का कहना है कि तीन बार आज्य ग्रहण समन्त्रक करना चाहिये और एक बार तूष्णीं करना चाहिये । तदनन्तर उपभृत् में आठवार घृत ( आज्य ) का ग्रहण करना चाहिये । यहाँ पर भी ' धामनामासि ० ' मन्त्र कहकर सकृत् ( एक बार ) आज्यग्रहण करे, और सात बार अमन्त्रक ( तूष्णीं ) आज्य ग्रहण करे । कुछ लोगों का कहना है कि तोनबार संमन्त्रक ग्रहण करे और पाँच बार अमन्त्रक ग्रहण करे | आज्य द्रव्यक अनुयाजसहित कर्म में स्र ुव को अपूर्ण भरकर उपभृत् में आठ वार आज्य ग्रहण करे । औपभृत आज्य प्रयाज अनुयाज दोनों के लिये होता हैं । उपभृत् में अष्टगृहीत आज्य का अर्ध भाग प्रयाज में उपयुक्त किया जाता है और अवशिष्ट अर्धभाग अनुयाज में उपयुक्त होता है । तात्पर्य यह है कि ' जुहू में लिये हुए आज्य उपभृत् में अल्पतर आज्य ग्रहण करना चाहिये । जुहू में चार स्रुव पूर्णभरकर लिये जाते हैं, किन्तु उपभृत् में अपूर्ण भरे हुए स्र ुवों से आज्य ग्रहण किया जाता है । तत्पश्चात् ध्रुवा में एक बार समन्त्रक और तीन बार तूष्णीं आज्यग्रहण करे । तदनन्तर आज्यस्थाली को सुगुप्त स्थान में रखे । जहाँ अनुयाज नहीं होते अथवा पृषदाज्य आदि द्रव्यान्तर से ग्रहण करना कहा गया हो वहाँ ( विकृति में ) आज्य को चार बार ही ग्रहण करना चाहिये । क्योंकि श्रौतसूत्रकार ने अष्टगृहीत आज्य का प्रयाज- अनुयाज के लिये विभाग कर दिया है । अध्यात्म पक्ष में तो भगवान् वेद, आत्मा को सम्बोधित कर रहे हैं कि हे जीव! प्रपञ्च के उत्पादक-स्वप्रकाश परमेश्वर की आज्ञा में रहने वाला मैं, तुम्हें संशय - विपर्ययादि दोषों से रहित पवित्र ज्ञान से उत्कृष्टतया पावन कर रहा हूँ । अर्थात् स्वप्रकाश ज्ञान सूर्य की रश्मियों से यानी तदनुरूप विचारों के द्वारा समस्त उपाधियों का निरसन कर परिशोधन करते हुए तुझ में ब्रह्मतादात्म्य प्राप्त करने की योग्यता पैदा कर रहा हूँ । हे जीव! तुम, परमात्मा का आलम्वन करने वाले तेज के स्वरूप हो । तुम दीप्तिमान् ज्योतिष्मान् हो, तुम अमृत हो यानी देह, इन्द्रिय आदि जो मर्त्य ( नश्वर ) है, उससे भिन्न हो, तुम धाम हो यानी जिस में चित्त की वृत्ति को स्थापित किया जाता है, उस परब्रह्म स्वरूप अर्थात् सर्वाश्रय स्वरूप हो । “ यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ' – जहाँ पहुँचकर जीव वापस नहीं आता, वही मेरा परम धाम है - ( गी ० १५/६ ) ऐसा भगवद् वचन है । तुम नाम हो, अर्थात् समस्त प्राणियों को जो अपने प्रति नमा लेता हैं, उसे ' नाम ' कहते हैं, यानि सर्वाधिष्ठानरूप तुम हो । इन्द्रिय, मन बुद्धिरूप देवताओं और इन्द्रादि ज्योतियों के परम प्रेमास्पद ब्रह्म, तुम ही हो । ' महद्भयं वज्रमुद्यतम् ', ' भीषा-स्माद् वातः पवते भीषोदेति सूर्यः ' इत्यादि श्रुतियों ने तुम्हें अनाधृष्ट अर्थात् अप्रधृष्य बताया है । देवता भी जिसका

यजन करते हैं, वह देवयजन तुम ही हो ।

॥ इति प्रथमोऽध्यायः ॥

|| वेद पुरुषाय नमः ॥

॥ श्रीरस्तु ॥

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 310 का मूल पृष्ठ
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If क शुद्धि - पत्रम् अशुद्धम् शुद्धम पृष्ठम् पंक्ति अशुद्ध ४ २६ की बल प्रार्पयतु प्रार्पयतु २६ वह 1 ५ २ शयाञ्च कर्मण कर्मण ६ ऽध्तव्यः ८ इन्द्राय इन्द्राय २३ अध्याय ३१ याम प्रजावती प्रजावती ४ साधुकृत्याम् र्षजमानस्य यजमानस्य " १० पापकृत्याम् हीन I प्रशंशा पशून् पशून् ७ १ निष्येत उद्देश उद्देश्य सु च्छ्रततत्वात् दध्यङ णाआथर्वण दध्यङ ह वाथर्वण चितीनामार्षेन्यं चितीनामार्षेयं वागोश वागीश अनूपूर्वी आनुपूर्वी यो हवा ५ १२ छन्दो यच्छन्दो E २८ २५ " निष्प्रत्ति ( अध्ययन के ) रूप पश्प अभिप्रायः वर्छत वर्च्छ १० १ विधयपि निवीर्य निर्वीर्यं २ बुद्धया वर्छ ति वर्च्छत ६ दादाधन युगं युग १३ व्यापाद्य जिघृक्षायां १६ ' ब्रह्मज्ञान ' भी मुवांचेत्थं मुवाचेत्थं ११ २ शब्दविद्यया त्यर्पयत् त्यार्पयत् साक्षत्कार गहणीत गृहणीत M ' मांर्गे अथवा यज्ञ करता अथवा यज्ञ कराता दियितु 11 पौतिमार्षा पौतिमाषी १० ' निरोधार्थ ब्राह्मणो ब्रह्मणो १३ शासकैश्च । याज्ञवल्वये याज्ञवल्क्ये १४ सुदृढ़ा प्रज्ञानम्बल प्रज्ञानं ब्रह्म १६ पद्धत्ति