वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 291–300

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 291–300

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[ २७८ ] २५ – ‘ तस्येयमेव जुहूः । इयमुपभृदात्मैव ध्रुवा । तद्वा आत्मन एवेमानि सर्वाण्यङ्गानि प्रभवन्ति । तस्माद् ध्रुवाय एव सर्वो यज्ञः प्रभवति । ( ० १ ३ २ २ ) तादृगवयवक्लृप्तिमभिनयेन दर्शयति - या जुहूः सा इयम् । अयं दक्षिणो बाहुः छान्दसस्त्रीत्वं तथा या उपभृत् सा इयं वाम बाहुः ध्रुवा आत्मा मध्यदेहः जुहूर्दक्षिणो हस्तः उपभृत् सव्यः आत्माध्र ुवः ' ( तै ० ब्रा ० ३।३।१ ) इति श्रुतेः । ध्रु वाया आत्मत्वमुपपादयति आत्मनो मध्ये देहादेवेमानि हस्तपादादी-न्यङ्गानि सर्वाणि प्रभवन्ति । ध्रु वायाश्च कृत्स्नो यज्ञः प्रभवति ध्रुवास्थस्याज्यस्य सर्वयागसाधारण्यात् । तत्र प्रमाणञ्च ध्रु वाया एव सर्वो यज्ञः प्रभवतीति श्रुतिरेव । २६-- प्राण एव स्रवः । सोऽयं प्राणः सर्वाण्यङ्गान्यनुसञ्चरति तस्मादुस्रवः सर्वा अनुस्रुचः सञ्चरति । ' ( ० १ | ३ | २ | ३ ) जुह्वादि सर्वासु स्रक्षु स्रुवस्य सञ्चरणमुपपादयितुं तस्य प्राणरूपतामाह सोऽयमिति । देहमध्येऽवस्थितः प्राणो यस्मात् सर्वाण्यङ्गानि नाडीभिः क्रमेण व्याप्नोति तथैव स्रवोऽपि तदात्मकः । जुह्वाद्याः सर्वाः स्रुचः अनुलक्ष्य-क्रमेण सञ्चरति । २७– तस्यासावेव द्यौजुहूः । अथेदमन्तरिक्षमुपभृदियमेव ध्रुवा । अस्या एवेमे सर्वे लोकाः प्रभवन्ति । तस्माद् ध्रुवाय एव सर्वो यज्ञः प्रभवति । ' ( श ० १ । ३ । २ । ४ ) २८-- पुरुषावयवादिकल्पनया जुह्वादिसमुदायं प्रशस्य लोकतादात्म्यप्रतिपादनेनापि तत्प्रशंसति-तस्य यज्ञस्यासौ द्यौर्जुहूः इदमन्तरिक्षमुपभृत् इयमेव भूमि वा जुह्वादयो लोकत्रयात्मका यथा अस्य भूमेः सकाशात् सर्वे लोकाः प्रभवन्ति पृथिवीस्थ मनुष्यकर्मसाध्यत्वात् ध्रु वायास्तदात्मिकायाः सर्वो यज्ञः प्रभवति । सेपुरुषावयब की कल्पना करके यज्ञिय पात्र समूह की स्तुति के लिये तत्साध्य यज्ञ में पुरुष का तादात्म्य बताया है । पुरुष प्रयत्न से सम्पन्न होने के कारण यज्ञ को भी पुरुष कहा गया है । अतएव विस्तीर्ण किये जाने वाले यज्ञ का परि-माण पुरुष के अवयव परिमाण के जैसा ही करने का विधान किया गया है । २५-- ' तस्येयमेव जुहूः । इयमुपभृदात्मैव ध्रुवा............ यज्ञः प्रभवति । - ( श ० १ ३ २ २ ) निर्णीत की हुई पुरुषावयव की कल्पना को अभिनय के द्वारा प्रदर्शित कर रहे हैं जो ' जुहू ' है, वह यह दक्षिण बाहु है, मूल ब्राह्मण वाक्य में ' इयम् ' यह स्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त किया है, उसे छान्दस समझना चाहिये । तथा जो ' उपभृत् ' है, वह यह वाम वाहु है, ' ध्रुवा ' यह आत्मा अर्थात् मध्य देह है । इसी बात को तैत्तिरीय श्रुति ने स्पष्ट बताया है -- ' जुहू दक्षिणो हस्तः, उभृत् सव्यः, आत्मा ध्रुवेति ' - ( तै ० ब्रा ० ३३ ३ ) । ' ध्रुवा ' को आत्मा कहने का उपपादन इस प्रकार है - मध्य देह रूप आत्मा से ही ये चारों ओर विद्यमान हस्त पादादि समस्त अङ्ग उत्पन्न होते हैं । लोक सृष्टि के समान ही यज्ञ सृष्टि में भी ध्रुवा को आत्मा यानी मध्य देह बताकर उसी से सम्पूर्ण यज्ञ की उत्पत्ति बताई गई है । इस कथन से यह निष्पन्न हुआ कि ध्रुव पात्र में स्थित आज्य, सर्वसाधारण होता है । २६ – ' प्राण एव स्र ुवः । सोऽयं प्राण: " “ सञ्चरति । ' - ( श ० १ | ३ | २ | ३ ) | जुहू आदि समस्त स्र ुचाओं में स्रुव के सञ्चरणका उपपादन करने के लिये उसकी प्राण रूपता बता रहे हैं - शरीर में अवस्थित प्राण जबकि सभी अङ्गों को नाडियों के माध्यम से क्रमशः व्याप्त करता है, तथैव स्र ुव भी तदात्मक यानी प्राण रूप है । अत: वह भी जुहू आदि सभी चाओं में क्रम से सचार करता है । २७ – ' तस्यासावेवे द्यौजु हूः । अथेदमन्तरिक्ष... ' " प्रभवति ' -- ( श ० १ ३ २ ४ ) २८—– इस प्रकार पुरुषावयवादि की कल्पना करके ( आध्यात्मिक दृष्टि से छा ० उ ० ११२ ) जुह्वादि समूह की प्रशंसा करके, अब लोकतादात्म्य बताकर भी उसकी प्रशंसा कर रहे हैं । दूर देश में अवस्थित द्यौ ही यज्ञ की जुहू है । यह अन्तरिक्ष ही उपभृत् है, यह भूमि ही ध्रुवा है । तात्पर्य यह है कि जुहू आदि यज्ञिय पात्र लोक त्रय रूप है । जिस

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[ २७६ ] २८ – ' अयमेव स्र ुवो योऽयं पवते । सोऽयमिमांल्लोकाननु पवते तस्मात् स्रुवः सर्वा अनुस्र ुचः सञ्चरति ( श ० १।३।२।५ ) अनेनापि वायुवत्स्र वस्य तदात्मकस्य लोकत्रयात्मिकासु स्रुक्षु युक्तमित्यर्थः । ३० — स एष यज्ञस्तायमानो देवेभ्यस्तायते ऋतुभ्यश्छन्दोभ्यो यद्धविस्तद्देवानां यत् सोमोराजा यत्पुरोडाश-स्तदादिश्य गृह्णात्यमुष्यै त्वा जुष्टं गृह्णामीत्येवमुहैतेषाम् । ' ( श ० १।३।२।६ ) ३१ – तासु स्र ुक्षु आज्यग्रहणं विधित्सुस्तस्य पुरोडाशादिहविरन्तरवत्प्रसक्तं देवतादेशन पूर्वकत्वं निवारयि-तुमाह - स एष इति स एष यज्ञस्तायमानः प्रथममग्न्यादिभ्यः प्रधानदेवेभ्यः, तादर्थ्ये चतुर्थी । ( पा ० सू ० १ ४ ४४ ) इति स्थलीयेन वार्तिकेन प्रयाजदेवताभ्यः देवतार्थं तायते ऋतुभ्यो वसन्तादिभ्यः छन्दोभ्यो गायत्र्यादिभ्योऽनुयाजदेवता-भ्यश्च तायते । पुरोडाशादिलक्षणं यद्धविस्तद्देवानां स्वभूतम्, अतस्तद्देवानामादेशनपुरःसरं ग्रहीतव्यम् । कुत एतदि-त्याह - एवमेव हि तेषामग्न्यादिदेवतानां दर्शपूर्णमासादिषु सोमयागादिषु च नामादेशविशिष्टा मन्त्राः समाम्नाताः-‘ अग्नये त्वा जुष्टं गृह्णामि ' ( वा ० सं ० १।१० ) ' अग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्टं गृह्णामि ' ( वा ० सं ० ७८ ) पुरोडाशनिर्वापे सोमरसग्रहणेष्वैन्द्रवायवादि उपयामगृहीतोऽसि वायवइन्द्रवायुभ्यां त्वा ' ( वा ० सं ० ७८ ) गृह्णाति । ३२ – ' अथ यान्याज्यानि गृह्यन्ते ऋतुभ्यश्चैव तानि छन्दोभ्यश्च गृह्यन्ते तत्तदनादिश्याज्यस्यैव रूपेण तुह्वां गृह्णात्यष्टीकृत्व उपभृति । ( श ० १।३।२।७ ) प्रकार भूमि से हो सम्पूर्ण लोक उत्पन्न होते हैं, क्योंकि वे सब लोक पृथिवी स्थित मनुष्य कृत कर्मों से साध्य होते हैं । उसी प्रकार भूमि स्वरूप ध्रुवा से ही सभी यज्ञ उत्पन्न होते हैं । इस कथन से भी ध्रुवा स्थित आज्य की सर्वयाग साधारणता सिद्ध होती है । २६-- ' अयमेव स्रवो योऽयं पवते कहा गया है कि स्रुव भी वायु रूप होने से वायु ३० – ' स एष यज्ञस्तायमानो ' " स्रुचः सञ्चरति । ' - ( श ० प ० १ ३ २ ५ ) इस ब्राह्मण से भी यहीं की तरह लोकत्रय रूप स्रुचाओं से सम्बद्ध है । " हैतेषाम् | ' - ( श ० १।३।२।६ ) । ३१ - उन स्र ुचाओं में आज्य ग्रहण का विधान करने की इच्छा से उसमें पुरोडाशादि अन्य हवि के समान प्रसक्त देवतादेशन पूर्वकत्व का निवारण उक्तब्राह्मण से किया गया है । विस्तार किया जाने वाला वह यज्ञ, प्रथमतः प्रधानभूत अग्नि आदि देवताओं के लिये विस्तीर्ण किया जाता है । ' देवेभ्यः ' का अर्थ ' देवतार्थ ' है, क्योंकि ( पा ० सू ० १।४ ४४ ) सूत्रस्थ वार्तिक से तादर्थ्य में चतुर्थी की गई है । लथा ' तायते ' में भी ' तनु विस्तारे ' ( त ० उ ० १ ) धातु से कर्मणि यक् ' ( पा ० सू ० ३ | १ | ६७ ), पश्चात् ' तनोतेयंक ' ( पा ० सू ० ६ । ४ । ४४ ) सूत्र से ' आत्व ' होकर ' तायते ' रूप बनता है । तदनन्तर प्रयाज देवता रूप वसन्तादि ऋतुओं के लिये उसे विस्तीर्ण किया जाता है, तदनन्तर गायत्री आदि अनुयाज देवताओं के लिये उसे विस्तीर्ण किया जाता है । पुरोडाशादि लक्षण जा हवि है वह उन देवताओं का ' स्वभूत ' है अर्थात् स्वीकय धन है । अतः तत्तद् देवताओं के नाम ग्रहण पूर्वक उस हवि का ग्रहण करना चाहिये । इसमें कारण यह बताया गया है कि दर्शपूर्णमासादि इष्टियों में और सोमयाग आदि में अग्नि आदि देवताओं का नाम ग्रहण करते हुए मन्त्र पढ़े गये हैं । जैसे- अग्नये त्वा जुष्ट ं गृह्णामि ' ( वा ० सं ० १ १० ), ' अग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्ट गृह्णामि ' - ( वा ० सं ० ७८ ) ये मन्त्र पुरोडाश निर्वाण के लिये पढ़ गये हैं । सोमरस का ग्रहण जिनमें किया जाता है, उन ऐन्द्रवायवादि पात्रों के ग्रहण करते समय उपयामगृहीतोऽसि वायव इन्द्रवायुभ्यां त्वा ' - ( वा ० सं ० ७८१२ ) मन्त्र पढ़े गये हैं । ३२ - ' अथ यान्याज्यानि गृह्यन्ते ऋतुभ्यश्चैव " " कृत्व उपभृति । ' ( श ० १/३/२/७ )

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[ २८० ] ३३ – अथ तस्मिन् यज्ञे यदाज्यग्रहणं तत्प्रयाजानुयाजदेवतार्थं चशब्दात् स्विष्टकृद्यागार्थं च । तत् तथासति तत् आज्यदेवतानामनादिश्य आज्यसम्बन्धिनैव रूपेण गृह्णाति । आज्यसम्बन्धिरूपश्च देवताया अनादेशनम्, नवा एतत् कस्य चन देवतायै हविगृ न्नतिदिशति यदाज्यमित्यनादेशनस्थतद्धर्मतया प्रागाम्नातत्वात् । ( श ० १।२।१।२२ ) अथ जुहूपभृतोराज्यग्रहणं विधत्ते सवा इति । जुह्वां चतुर्वारं त्रवेणाज्यं गृह्णीयात् उपभृत्यष्टवारम् । जुहूस्थमाज्यं किमर्थ-मित्याशङक्य तत्प्रयोजनमुक्तम् ऋतुभ्यस्तद्गृह्णाति के पुनस्तद्ऋव इत्याह- प्रयाजदेवताहि ऋतवोवसन्ताद्याः । तेषाञ्च नामादेशन रहितमेवाज्यं ग्रहीतव्यम्, तदनूद्य तस्य प्रयोजनमुक्तम् - तदनादिश्य ग्रहणमजामितायै जामितादोषराहित्याय सम्पद्यते । हविर्ग्रहणाज्यग्रहणयोर्देवतादेशने सत्येक रूपेणाजामिता स्यात्, तमिम दोष विपक्षे दर्शयति - जामि वा एतत्कुर्यात् यद्वसन्तायत्वा ग्रोंष्मायत्वेति गृह्णीयात् तस्मादनादिश्यैव आज्यस्यैव रूपेण गृह्णीयात् । ३४ – ‘ अथ यदष्टौकृत्व उपभृति गृह्णाति । छन्दोम्यस्तद्गृह्णाति । अनुयाजेभ्यस्तद्गृह्णाति । ' ( श ० १ | ३ | २ | ) ३५ – ' यच्चतु वायां गृह्णाति सर्वस्मै तद्यज्ञाय गृह्णाति तदनादिश्याज्यस्येव रूपेण । ' ( श ० १ | ३ | २ | १० ) ३६ – ' यज्जुह्वां गृह्णाति प्रयाजेभ्यस्तत् यदुपभृति प्रयाजानुयाजेभ्यः । सर्वस्मै वा तद् यज्ञाय गृह्यते यद्धु-बायामाज्यम् ' ( तै ० ब्रा ० ३ | ३ | ५ | ५ ) इति श्रुतेः । ३३ – उस यज्ञ में प्रयाज- अनुयाज की देवता के लिये आज्य ग्रहण बताया गया है और ' च ' शब्द से ही स्विष्टकृत् यागार्थ भी वह है । इस उल्लेख से यह अवगत होता है कि ' वह आज्य देवताओं के लिये हैं, ऐसा न कहकर आज्यस्वरूप सम्बन्धी के रूप में ही उसका ग्रहण किया गया है । देवता का कथन न करना ( अनादेशन ) ही आज्यका स्वरूप है । ' ओर न ही यह किसी देवता के लिये हविर्ग्रहण करते हुए अतिदेश करता है । क्योंकि ब्राह्मण ने ' यत् आज्यम् ' इस प्रकार का अनादेशन किया है, जो इसका धर्मं बताया गया है ( श ० प ० १ २ ।१ । २२ ) । तदन्तर ' स वै ० ' ब्राह्मण से जुहू और उपमृत् में आज्यग्रहण का विधान किया गया है । जुहू में स्रव से चार बार आज्यग्रहण करे और उपभृत् में आठबार आज्यग्रहण करें । जुहूपात्र में स्थित आज्य का प्रयोजन बताया है कि ऋतुओं के लिये वह आज्य-ग्रहण किया गया है । वे कौनसी ऋतुएँ हैं, जिनके लिये जुहूस्थित आज्य का भाग है । वे ऋतुएँ - प्रयाजदेवता वसन्त ऋतु आदि हैं । उनके लिये नामादेशन के विना ही आज्यग्रहण करना बताया गया है । वह जामितादोष की अनुत्पत्ति के लिये किया जाता है । हविर्ग्रहण और आज्यग्रहण दोनों में उनकी देवताओं के नाम बोलें तो, निरन्तर वोलते रहने से जामिता ( आलस्य ) दोष होने की सम्भावना हो सकती है । अतः तत्तद् देवताओं के नाम न बोलकर केवल स्वरूपतः ही आज्य का ग्रहण किया जाता है । ३४ – ' अथ यदष्टौ कृत्व उपभृति गृह्णाति । ( श ० प ० १ ३ २ ६ ) । - ' यच्चतु .. तद्गृह्णाति । " ३५- ' वायां " " रूपेण । - ( श ० प ० १ ३ । २ । १० ) उपभृत् में स्थित आज्य का विनियोग ( उपयोग ) बताया गया है । वह आज्य छन्दस् ( छन्द ) के लिये है । ये गायत्री आदि छन्द ही अनुयाज देवता हैं । अत: अनुयाज के लिये ही उपभृत् में आज्य ग्रहण किया गया है । यहाँ पर भी देवता नाम का अनादेशन पहले के समान ही जाता ( आलस्य ) दोष की अनुत्पत्ति के लिये ही है । ध्रुवा में जो आज्यग्रहण किया जाता है, वह भी देवता -नादेशनरूप आज्यधर्म से ही करना है । यह बताकर यहाँ पर देवतादेशन की प्रसक्ति ही नहीं है, क्योंकि ध्रुवास्थित जो आज्य है, वह यज्ञ में जितनी देवताएं हैं, उतनी सभी देवताओं के लिये विभक्त करके लिया जाता है । अतः सर्व देवताओं के लिये वह साधारण होने से किसी देवताविशेष का उद्देशन करना सम्भव नहीं है । ३६ - अतएव तैत्तिरीय श्रुति कहती है- ' यज् जुह्वां गृह्णाति प्रयाजेभ्यस्तद् यदुपभृति प्रयाजानृयाजेभ्यस्तत् सर्वस्मै वा एतद् यज्ञाय गृह्यते ध्रु वायामाज्यम् ' ( तै ० ब्रा ० ३।३।५।५ ) ।

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[ २८१ ] ३७ – यजमान एव जुहूमनु योऽस्मै अरातीयति स उपभृतमन्वत्तैव जुहूमन्वाद्य उपभृतमन्वत्तैव जुहराद्य उपभृत्स चतु जुह्वां गृह्णात्यष्टीकृत्व उपभृति ( श ० प ० १ । ३ । २ । ११ ) । ३८ - स यच्चतु जुह्वांगृह्णाति अत्तारमेवैतत् परिमिततरं करोति कतीयां ७ संकरोति यदष्टौ कृत्व उपभृति गृह्णात्याद्यमेवैतदपरिमिततरं भूया 10 सं करोति तद्धिसमृद्ध यत्रात्राकतीयानाद्योभूयान् || ' ( श ० १।३।२।१२ ) ३६ - भोक्तृणामल्पीयस्त्वं भोग्यजातस्य भूयस्त्वम् । तत्खलु समृद्धम् । तत्रापि जुहूपभृतोर्धर्म विशेषो विहितः । बहुतरमधिकमाज्यं जुह्वां यथाभवति तथासम्यक् पूर्वेण स्रुवेण कर्त्तव्यम् । अल्पतरमुपभृति गृह्यमाण यथा-पूर्ण कार्यमति ग्रहणसंख्या ह्रासेन भोक्तारं भोग्यजातादल्पीयांसं करोति । भूयोग्रहणेन च भोक्तरि अधिकं स्थापयति । अल्पीयस आज्यस्य ग्रहणेनाद्यमवीर्यं बलरहितं करोति तस्मादेवाद्यवर्गोबल र हितोभवति । तस्मादेव सार्वभौमोराजा अपारां निरवधिकां विशं प्राप्यापि जिनाति स्वाधीनं करोति । तदेतद्राज्ञः सामर्थ्यम् एतेनैव बी-र्येण जनितम् यद्वीर्यं जुह्वां भूयोग्रहणेन भोक्त निष्पन्नम् । तत्रापि जुहूपभृत्धृतयोराज्ययोजु ' ' व होमः कर्त्तव्य इति विधत्ते । ' स यत् जुह्वां गृह्णाति जुह्वं वतज्जुहोति यदुपभृति गृह्णाति जुवतज्जुहोति । ( ० १।३।२।१४ ) ३७ – ' यजमान एव जुहूमनु । योऽस्मा .... कृत्व उपति । -- ( श ० प ० १1३19199 ) । इस ब्राह्मण के द्वारा जुहू और उपभृत् में किये गये आज्यग्रहण की चतुष्ट्वादि संख्याविशेष का उपपादन किया गया है । जो ' जुहू ' है, वह यजमान का ही भाग है । जुहूमनु ' यहां पर ' भाग ' अर्थ मे ' अनु ' है । ' लक्षणेत्थंभू-ताख्यान भागवीप्सासु ' - ( पा ० सू ० १/४/६० ) सूत्र से ' अनु को कर्म प्रबचनीय संज्ञा होने पर, ' कर्मप्रवचनीययुवते. ' ( पा ० सू ० २३८ ) सूत्र से ' जुहू ' में द्वितीया विभक्ति की गई है । तथा जो यजमान से शत्रु की तरह आचरण करता है ( जो यजमान का शत्रु है ) उसका ( शत्रुका भाग उपभृत् है । इसी बात को तैत्तिरीयश्रुति ने भी कहा है – ' यजमान-देवत्या वै जुहूः - तृव्यदेवत्योपभृत् ' - ( तै ० ब्रा ० २२५१४ ) तथा भोक्ता और भोग्य के क्रमशः जुहू और उपभृत भाग हैं । उनका भाग होने से उनके साथ उन पात्रों का तादात्म्य बताया गया है । ३८ - स यच्चतुजु ह्वां गृह्णाति । अत्तारमेवैतत् परिमिततरं " " भूयान् ' ( श ० प ० १।६।२ १२ ) । ३६ - इस ब्राह्मण के द्वारा जुहू में चतुर्ग्रहण का अनुवाद करके संख्या के अल्पीयस्त्व की प्रशंसा की गई है । ' जुहू ' अत्तृ ( अत्ता ) स्वरूप होने से अष्ट संख्या की अपेक्षा चतुः संख्या का अल्पीयस्त्व होने से अत्ता को ही परिमित-तर है, अत: उसमें स्वल्प आज्य किया गया है । और उपभृत् में आज्यग्रहण की संख्या का अनुवाद करके उसके भूयस्त्व की प्रशंसा की गई है । उपभृतु आद्य ( भक्ष्य ) रूपा है । जुहू भोक्तृरूपा है । संख्या बाहुल्य के कारण ' आज्य ' अर्थात् भोग्यवस्तुसमूह ही अधिकतर ( अपरिमिततर ) होता है । अतएव उसे अतिशय अधिक करते हैं । भोक्ताओं का जो अल्पीयस्त्व है और भोग्यवस्तु समुदाय का जो भूयस्त्व है, उसी को समृद्ध कहते हैं । ' स वै चतुर्जु'ह्वां गृह्णन् । भूय अज्यं गृह्णात्यष्टो..........। ' ( श ० प ० १।३।२।१३ ) इस ब्राह्मण के द्वारा आज्यग्रहण करने में जूहू और उपभृत् के धर्मविशेष का विधान कर रहे हैं । जुहू में अधिकतर आज्य जैसे हो सके उस तरह पूर्ण स्रुव से करे, और उपभृत् में अल्पतर आज्य जैसे हो सके वैसे अर्धपूर्णस्र व से करे | ' स यच्चतुर्जु ' ह्वां गृह्णन् । भूय आज्यं गृह्णत्यत्तारमेवैतत् " जुह्व ' व तज्जुहोति । - ( श ० प ० १ | ३ | २ | १४ ) । जुहू स्थित विहित आज्य के भूयस्त्व का अनुवादकर उसकी प्रशंसा की गई है । ग्रहणसंख्या के ह्रास को दिखाकर भोग्यपदार्थ समूह से अल्पतर हुए भोक्ता में भूयोग्रहण के द्वारा अधिक सामर्थ्य और उसके हेतु भूत बल की स्थापना की गई है । उसी तरह उपभृत् में स्थित विहित आज्य के अल्पीयस्त्व का अनुवाद कर उसकी प्रशंसा की

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| २८२ | जुहूवदुपभृतोऽपि होमसाधनत्वे सत्युपभृतोऽपि स्वातन्त्र्यादन्नस्थानीया इमाः सर्वाः प्रजाः राज्ञः सकाशात् स्वतन्त्रा एव भवेयुः । तथा च राजा नैवशास्तास्यात् राज्यमपि नर्व भोग्यं स्यात् अत औपभृतमाज्यं जुह्वामानीय तथैव होमे तु नोक्तदोषः । यस्मादेव होमाय जुहूमपेक्षमाणायामुपभृत्याज्यं गृह्यते तस्मादेव कारणात् क्षत्रियस्य वशे रक्षार्थं क्षत्रियाधीनत्वे सत्येव वैश्यं पशवोगवाद्या उपतिष्ठन्ते । उपभृतिग्रहणाद्वैश्यस्य धनसमृद्धिर्भवति । अद्यत्वे यद्यपि प्रजातन्त्र शासनं तथापि कार्यपालिकायां शासनपरिषदि तत्रापि प्रधानमन्त्रिणि राष्ट्रपती वा शासनशक्तिः पर्यवस्यति । यस्मादी-भृतमाज्यं जुह्व जुहोति तस्मादेव यदोत क्षत्रियः कामयतेथाहवैश्य यत्तेपरो निहितं तदाहरोति तजिनाति । ' तानिवा एतानिछन्दोम्य आज्यानि गृह्यन्ते । सयच्चतुर्जुह्वां गृह्णाति गायत्र्यै तद्गृह्वात्यथ यदष्टौ कृत्व उपभृति गृह्णाति त्रिष्टुव्रजगतीभ्यां तद्गृह्नात्यथ यच्चतु वायां गृह्णात्यनुष्टुभेन तद्गृह्णाति अनुष्टुब्बाचोवाइद ७ सर्वप्रभवति तस्माद् ध्रुवायां सर्वोयज्ञः प्रभवति । ' ( श ० १ ३ २ १६ ) श्रीव्यस्याज्यस्य प्रागुक्तं सर्वयज्ञसाधारण्यं द्रढ़यितुं जुह्वादि-वाज्यग्रहण प्रकारान्तरेण प्रशंसति तानि वा इति । तानिवाछन्दोभ्य आज्यानि गृह्यन्ते । सामान्योक्तं विवृणोति । स यच्चतुर्जुह्वां गृह्णातीति । गायत्र्यं तद्गृह्णाति । ननुत्रिपदा गायत्रीति चतुः संख्यायोगो नोपपद्यते इतिचेन्न, अष्टाक्षरै: पादैः त्रिपदा षडक्षरैः पादैश्चतुष्पदा तस्मात् प्राथम्यात् संख्या चतुष्ट्वयोगात् जुह्वाग्रहणं गायत्र्यर्थम् अत एवाम्नायते ' सैषा चतुष्पदा षड्विधागायत्री ' ( साम ० छा ० ब्रा ० ५।१२।५ ) त्रिष्टुब्जगत्यो मिलितयोः पादानामष्टसंख्या तथा जा रही है । संख्या की अधिकता बताकर भोग्य पदार्थ को अपरिमित करते हुए अल्पतर आज्य का ग्रहण कर उस आद्य ( भोग्य ) को वीर्य रहित और बलरहित करता है । इस रीति से जब कि आद्य ( भोग्य ) वर्ग बलरहित है, उसी कारण सार्वभौम होता हुआ भी राजा अर्थात् निरवधिक राज्य प्राप्त करके भी उसे एक गृह के रूप में ही अपने स्वाधीन करता है । एक: एक वस्तु ( प्रत्येक वस्तु ) को जैसे वह चाहता है, वैसे - वैसे ही वह पाता है । यहां पर ' त्वत् ' शब्द ' एक ' के अर्थ में है । ऐसा ' उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचम् ' ( ऋ ० सं ० मं ० १०/७१ ४ ) ऋचा में देखा गया है । अथवा ' त्वत् ' यह निपात'च ' के अर्थ में है ( निरु ० १।३।५ ) | राओ का यह सामर्थ्य, इसी वोर्यं से उत्पन्न हुआ है, जो वीर्य जुहू में भूयोग्रहण से भोक्ता में निष्पन्न होता है । जुहू और उपमृत् में रखे आज्यों का जुहू से ही होम करना चाहिये । ' तदाहुः । कस्मा उ तह्युपभृति तद्वीर्येण । ( श ० प ० १।३।२।१५ ) । यदि ' उपभृत् ' होमसाधन नहीं है तो उस में आज्यग्रहण क्यों किया गया है, यह आक्षेप ' तदाहु: ' से किया गया है । उपभृत् में आज्यग्रहण करना तो उचित है, किन्तु उस उपभृत् को होम का साधन माना जाय तो जुहू को समान उपभृत् की भी स्वतन्त्रता कही जायगी, तब अन्नस्थानीय समस्त प्रजा, राजा से स्वतन्त्र ही होंगी । उस कारण राजा ' अत्ता ' ( भोक्ता ) अर्थात् शास्ता ही नहीं रहेगा और राज्य भी ' भोग्य ' नहीं रहेगा । परन्तु उपभृतस्थित आज्य को जुहू में लेकर, उस जुहू से होम करने पर उक्त दोष नहीं होगा । क्योंकि होम करने के लिये जुहू की अपेक्षा रखने वाली उपभृत् में आज्य का लिया जाता है, उसी कारण संरक्षणार्थ क्षत्रिय की अधीनता रहने पर ही गवादि पशु उपस्थित रहते हैं । तात्पर्य यह है कि उपभृत् में आज्यग्रहण करने से ही वैश्य की धनसमृद्धि होती है । आज के युग में यद्यपि प्रजातन्त्र शासन है, तथापि शासन शक्ति ( सामर्थ्य ) कार्य पालिका के शासन परिषद् की उसपर भी प्रधानमन्त्री की अथवा राष्ट्रपति की ही रहती है । जिसकारण से औपभृत आज्य का होम जुहू से ही किया जाता है, उस कारण क्षत्रिय धर्मपरतन्त्र अपनी इच्छानुसार व श्य से जो चाहता है, उस मांगकर लेता है । इस रीति से यदि प्रजावर्ग को वह अपने स्वाधीन रखता है । ' तानि वा एतानि " “ प्रभवति । - ( श ० प ० १ | ३ | २ | १६ ) | पहले बताई हुई धौवाज्य की सर्वयज्ञसाधारणता को दृढ़ करने के लिये जुहू आदि में किये गये आज्यग्रहण की प्रकारान्तर से प्रशंसा कर रहे हैं । सामान्यतया उक्त का ही ' स यत् ' के द्वारा स्पष्ट विवरण किया गया है । प्राथम्य की समानता और चतुः संख्या

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[ २८३ ] चाष्टकृत्व उपभृति ग्रहणं ताभ्यामर्थे सम्पद्यते । एवमेव पादस ख्यासाम्यात् ध्रुवायां चतुर्ग्रहणमनुष्टुबर्थं भवति । अनेन ध्रुवाय अनुष्टुबर्थत्वोपजीवनेन तत्स्थस्याज्यस्य सर्वयज्ञसाधारण्यमभिप्रेत्याह - वाग्वा अनुष्टुप् वाचोवा इदं सर्वं प्रभवति अनुष्टुप् च सप्तदशश्च समभवता ' सानुष्टुप् चतुरुत्तराणि छन्दा ९ स्यसृजत षडुत्तरान् स्तोमान् सप्त-दश: ' इति सामताण्डयब्राह्मणे । सर्वेषां छन्दसामनुष्टुप् सकाशात् सृष्टेराम्नातत्वात् सावागात्मिका । वाचः शब्दस्य सकाशात् सर्वमिदमर्थजातं प्रभवति ' अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतोयतः । ' ( वा ० प ० १1१ ) ' न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमाते । अनुविद्ध ' मव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥ ' ( वा ० प ० १ ) ' शब्द इतिचेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ' ( ब्र ० सू ० १1१ ) इत्याद्याप्तवचनेभ्योवाचः सर्वजगदुत्पत्तिहेतुत्वात् तत्सम्बन्धिन्याघ्र वाया अपि सर्वयज्ञहेतुत्वं युक्तमेव । इयंवा अनुष्टुप् इति एवं विहितमाज्यग्रहणमनूद्य मन्त्रं विधत्ते स गृह्णाति धामनामासिप्रियं देवनामित्येतद्वै देवानां प्रियतमं धाम यदाज्यम् तस्मादाह धामनामासि प्रियं देवानामित्यना -धृष्टं देवयजनमसीति । ' ( श ० १।३।२।१७ ) स एतेन यजुषा सकृज्जुह्वां गृह्णाति त्रिस्तूष्णीमेतेनैव यजुषा सकृदुपभृति गृह्णाति सप्तकृत्वस्तूष्णीमेतेनैव यजुषा सकृद्ध वायां गृह्णाति त्रिस्तूष्णीम् । तदाहुस्त्रिस्त्रिरेव यजुषा गृह्णीयात् त्रिवृद्धि यज्ञः इति तदनु सकृत् सकृ-देवाचो त्रिर्गृहीत २७ सम्पद्यते । ' ( श ० १ ३ २ १८ ) मन्त्रगतस्य धामशब्दस्य विवक्षितमर्थयाह - एतद्वा इति । धामशब्दस्तेजोवाची । ( नि ० ६ । ३ ) तद्धेतुत्वादाज्यमपिधामोच्यते । अतएव ' तेजोवै घृतम् ' इति श्रुतिः । मन्त्रशेष-मनूद्य तत्रानाधृष्टपदस्य तात्पर्यं गम्यमर्थमाह- अनाधृष्टमिति हि यस्मादाज्यं वज्रः घृतंखलु वै देवा वज्र ं कृत्वा सोममघ्नन् ' इति श्रुतेः । वज्रश्च धर्षितुमशक्यत्वात् अनाधृष्टेः, तदात्मकत्वादाज्यमप्यनाधृष्टम् । ( चार संख्या ) की समानता को देखकर पादचतुष्टय से युक्त जो आज्यग्रहण जुहू में किया गया है, वह गायत्री के के लिये है । शंका - गायत्री तो त्रिपदा ( तीन पादवाली ) है, तब उसके साथ चतुःसंख्या का सम्बन्ध कैसे किया जा रहा है? समां - जो शंका की गई है, वह ठीक है । आठ अक्षरों को दृष्टि से त्रिपदा गायत्री और छह अक्षरों की दृष्टि से चतुष्पदा भी गायत्री होती है । अतएव अन्यत्र यह कहा गया है -- ' सैषा चतुष्पदा षड्विधागायत्री ' - इति ( सा ० छां ० ब्रा ० ५।१२।५ ) त्रिष्टुब् - जगती को मिला देने पर पादों की संख्या आठ हो जाती है । तथा च उपभृत् में जो आठ बार आज्यग्रहण किया गया है, वह त्रिष्टुब - जगती छन्द के लिये है । उसी तरह पादसंख्या के साम्य से ध्रुव में जो चतुर्ग्रहण आज्य का किया जाता है, वह अनुष्टुब छन्द के लिये है । इस विवेचनसे यह निष्पन्न हुआ कि ' ध्रुवा ' अनुष्टुब् के लिये होने से उस में स्थित आज्य सर्वयज्ञसाधारण है । इसी अभिप्राय को ' वाग्वाअनुष्टुब् ' से बताया गया है । इसी प्रकार सामब्राह्मण में ( तां ० म ० ब्रा ० १० प्र ० २ खण्ड ) ' अनुष्टुप् चं सप्तदशपच समभवता, सानुष्टुप् चतुरुत्तराणि छन्दा ँ, स्यसृजत षडुत्तरान्त्स्तो मान्त्सप्तदशः ' इति से कहा गया है । समस्त छन्दों में से जो अनुष्टुब् छन्द है, उसी से सृष्टि का होना बताया गया है, वहीं ' वाक् ' सृष्टि है । ' वाच: ' शब्द से यह सम्पूर्ण अर्थजात ( पदार्थ समूह ) उत्पन्न होता है | अतएव ' जगत् ' ( सृष्टि ) को शब्द का विवर्त कहते हैं - ' अनादिनधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थ भावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥ ' - ( वा ० प ० १1१ ), उसी तरह सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिन ज्ञानं सर्वं शब्देन गम्यते ॥ ' इति ॥ ( वा ० प ० १ ) शब्दानुवेध ( शब्द से सम्बद्ध ) होने के कारण सम्पूर्ण अर्थ प्रपच्च ( सृष्टि ) उस शब्द का ही कार्य है । ' शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ' - ( ब्र ० सू ० १1१ 1 ) इत्यादि आप्तवचनों से वाक् ( वाणी - शब्द ) को ही सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का हेतु ( कारण ) कहा गया है । उससे ( वाणी से ) सम्बन्धित ध्रुवा को भी समस्त यज्ञ का हेतु कहना उचित ही है । इसी अभिप्राय को ' इयं वा अनुष्टुप् इत्यादि से कहा गया है । इस प्रकार विहित आज्यग्रहण का अनुवाद कर ' स गृह्णाति ' से मन्त्र का विधान किया गया है । ' स यजुषा ० ' - ( श ० प ० १।३।२।१६ ) ' एतद्वै देवानम् ' से मन्त्रगत ' धाम ' शब्द के विवक्षित अर्थ को बताया गया है । ' अनाधृष्ट ' देवयजनमासि ० ' से अनाधृष्टपद के तात्पर्यगम्य अर्थ को बता रहे हैं । क्योंकि ' आज्य ' जो है, वह वस्त्र है ।

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[ २८४ ] अनेन मन्त्रेण ग्रहगे विशेषमाह तच्च स्पष्टमेव । तस्माच्छु तिसूत्रसम्मतोऽयं मन्त्रः - - हे आज्य त्व ' तेजोऽसि अविनाशशरीरकान्तिहेतुत्वात्तेजोऽसि । त्वं शुक्रमसि दीप्तिमसि स्निग्धरूपत्वाद्दीप्तिमत्त्वम् । अमृतमसिविनाश रहितमसि बहुदिनावस्थाने प्योदनादिवत् पर्युषितत्वादिदोषाभावादविनाशित्वमौपचारिकम् । यद्वा पारम्पर्येणामृतयाग फलहेतुत्वादविनाशित्वम् । हे आज्य त्व ं धाम स्थानमसि धीयते स्थाप्यतेऽत्रेति धामशब्दव्युत्पत्तेः । यद्वायाग फलोपभोगस्थानप्राप्तिहेतु-त्वात् धामास नमयति सर्वाणि भूतान्यात्मानं प्रति प्रणतानि करोतीत्याज्यस्य नामत्वम् । तथैतदाज्य देवानां प्रियम् । तात्प्रियत्वञ्च तित्तिरिराह - ' प्रजापतिर्देवेभ्यो यज्ञान्यादिशत् । स आत्मन्याज्यमधत्त । तं देवा अब्रुवन् एषवाव यज्ञो-यदाज्यमप्येव को चास्त्वितीति श्रुतेः । यदा प्रजापतिर्यज्ञहवींषि देवेभ्यो विभज्यददौ तदानीमाज्यं स्वकीयत्वेन स्वीच-कार । तद्दृष्ट्वा देवा यज्ञे सारंहवि राज्यमेवेति वदन्तोऽस्माकमाज्ये भागोऽस्त्वित्यपेक्षितवन्त इत्यर्थः । तच्चेदमना-धृष्टम् गतसारत्वादिदोषेणकदाचिदप्य तिरस्कृतम् । एतदपितित्तिरिणा प्रश्नोत्तराम्यां स्पष्टमुक्तम् ब्रह्मवादिनो वदत्य कस्मात् सृत्या यातयामान्यन्यानि हवींष्ययातयाममाज्यमिति । प्रजापत्यमिति ब्रूयादयातयामो हि देवानां प्रजापति रितीति चरुपुरोडाशादीन्यचिरावस्थानेन यातयामानि गतसाराणि आज्यं तु न तथा तत्र हेतुः प्रजापतिदेवताकत्व-मित्यर्थः । देवयजनं देवानुद्दिश्ययागसाधनम् ईदृशस्त्वमतस्त्वां गृह्णामीति शेषः । श्रुति कह रही है कि ' घृतं खलु वैदेवा वज्र ' कृत्वा सोममघ्नन् ' । वज्ज्र का घर्षण करना शक्य न होने से ' आज्य ' भी अनाधृष्ट है । उक्त मन्त्र से ग्रहण में जो विशेष कहा गया है, वह स्पष्ट ही है । तस्मात् श्रुति और सूत्र से सम्मत यह मन्त्र है । हे आज्य! तुम तेजोरूप हो, कभी नष्ट होने वाली शरीरकान्ति के हेतु रहने से तुम ' तेज ' हो । तुम ' शुक्र ' अर्थात् दीप्तिमान् हो, अर्थात् स्निग्धरूप होने से तुम में दीप्तिमत्व है । तुम ' अमृत ' अर्थात् विनाशरहित हो, क्या अधिक दिनों तक तुहें रखने पर भी ' ओदन ' आदि की तरह तुम में पर्युषितत्वादि दोष नहीं पैदा होता, इसलिये तुम में औपचारिक अविनाशित्व कहा गया है । अथवा परम्परया अमृत ( अविनाशी ) यागफल के हेतु रहने से तुम्हें अविनाशी कहा जाता है । हे आज्य! तुम ' धाम ' अर्थात् स्थानरूप हो । क्योंकि ' धीयते स्थाप्यते अत्र इति धाम ' – स्थापन किया जाता है जहां पर उसे ' धाम ' कहते हैं, यह ' धाम ' शब्द की व्युत्पत्ति है । अथवा यागफलोपभोगस्थान की प्राप्ति कराने में हेतुभूत होने से तुम्हें ' धाम कहा गया है । ' आज्य ' को ' नाम ' भी कहते हैं, क्योंकि वह सभी भूतों ( प्राणियों ) ओर माता है, अर्थात् झुकाता ( प्रणत करना ) है, इसलिये ' आज्य ' को ' न'म ' कहा गया है, यह आज्य देवताओं को प्रिय है । उसकी प्रियता को तित्तिरि ने बताया है - ' प्रजापति देवेभ्यो यज्ञान्यादिशत् ० ' इत्यादि । जब प्रजापति ने यज्ञहवियों को विभक्त करके देवताओं के लिये दिया, तब उन्होंने उस आज्य हवि को स्वकीय मानकर उसका स्वीकार किया । अर्थात् उस आज्य को देखकर देवगण कहने लगे कि यज्ञ में सारभूत हवि तो आज्य ही है, हमारा भाग ( हिस्सा ) अज्य में ही रहे, यह चाहने लगे । यह जो ' आज्य ' है, वह अनाधृष्ट है, क्योंकि गतसारत्व ( सारहीनता ) आदि दोष से कभी भी वह तिरस्कृत नहीं किया जाता । इस अभिप्राय को भी तित्तरि ने प्रश्नोत्तर के माध्यम से स्पष्ट तिया है - ' ब्रह्मवादिनो वदन्ति कस्मात् सृत्या ० ' चरु पुरोडाश आदि को चिरकालतक रखनेपर यायाम ( सारहीन ) हो जाते हैं, किन्तु आज्य वैसा ( सारहीन ) नहीं होता । क्योंकि वह प्रजापति देवता का है । देवगणों में ' प्रजापति ' अयातयाम रहता है । तुम देवयजन हो, अर्थात् देवताओं को उद्देश्यकर याग करने के साधन-स्वरूप हो, इन विशेषताओं से पूर्ण रहने वाले तुम्हारा मैं ग्रहण करता हूँ । अनुष्ठान का प्रकार यह है - प्रणीता और आह्वनीय के बीच में प्रोक्षणीपात्र के रख देने पर ' शर्माऽसि ' मन्त्र से अध्वर्यु कृष्णाजिन को अपने हाथ से उठाता है । तदन्तर स्थापित यज्ञपात्रों से दूर जाकर अर्थात् उत्कर देश पर जाकर ' अवधूत 25 रक्षः ' मन्त्र से कृष्णाजिन को झार देता है यानी फटकारता है अर्थात् उसमें लगी धूल आदि

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[ २८५ ] अनुष्ठानप्रकारस्तु ततोऽध्वर्युः शर्मासीति मन्त्रेण कृष्णाजिन हस्तेन गृह्णाति । तत आसादितपात्रेभ्यः परतो गत्वा कृष्णाजिनमवधूनोति " अवधूत 5 रक्ष " इतिमन्त्रेण, उदकोपस्पर्शनम् तत उत्तरेण गार्हपत्यमुत्करदेशे प्रत्यग्ग्रीवं कृष्णाजिनमास्तृणाति " अदित्यास्त्वगसी ” तिमन्त्रेण द्वाभ्यां हस्ताभ्यां विस्तारयति सव्येन हस्तेनाविमुक्तेन कृष्णाजिने दक्षिणेन हस्तेनोलूखलमाहृत्य कृष्णाजिनस्योपरिनिदधाति आहरासि वानस्पत्य इति मन्त्रेण ' ग्रावासि पृथुबुघ्न ' इतिमन्त्रेण-वा प्रतित्वादित्यास्त्वग्वेत्त्विति - उभयोर्मन्त्रयोः शेषः कार्यः । ततः शूर्पे पृथक् स्थापित हविर्द्वयं मिश्रीकृत्य सव्येनावि-मुक्तेनोलूखलमध्ये अग्नेस्तनूरिति मन्त्रेण शूर्पेणैव हविरावपति । ततोऽध्वर्यु यजमान योर्वाग्विसर्गः । ततोऽध्वर्यु बेहद्ग्रा-वेतिमन्त्रेण मुसलं हस्तेन गृह्णाति । ततः स्वयमेवकण्डने प्रवृत्तः कण्डनं कुर्वन्नेव हविष्कृदेहीति त्रिवि: कण्डनकर्त्री पत्नीमाग्री ' वाह्वयति । अत्रवातयोर्वाग्विसर्गः । यदाध्वर्युर्ह विष्कृदाह्वानं करोति तदानीमेवाग्नीध्रः कुक्कुटोऽसीति मन्त्रेण शम्ययाद्विदृषदं कुट्टयति मन्त्रावृत्त्या, उपलां तेनैवैकवारम् । तदनन्तरं पत्नी आग्नीध्रोवाकण्डनं करोति । वितुथेषुव्रीहिषु " वर्षवृद्धमि " ति मन्त्रेणाध्वयुर्हस्तेनशूप गृह्णाति । ततः प्रतित्वावर्षवृद्धमिति मन्त्रेण कण्डितं हविरुलू-खलान्निष्काश्य तूष्णीं शूर्पे निदधाति । ततः परापूतमितिमन्त्रेण शूर्पणनिष्पुनाति । तुषान् पृथक्करोति । ततोऽप उपस्पृश्य " वायुर्व ” इति मन्त्रेण तण्डुलानकण्डितान् ब्रीहींश्च विविनक्ति ततः कण्डितान्निधाय अकाण्डितान् पुनरुलूखले निक्षिप्य कण्डनं कृत्वा पुनर्निष्काश्य शूर्पे कृत्वा तुषान् पृथक्कुर्यात् । ततः सर्वान् " अपहत ७ रक्ष " इतिमन्त्रेणोत्करदेशे निरस्येत् । उदकस्पर्शः । ततः शूर्पस्थांस्तण्डुलान् पात्र्यां प्रक्षिप्य देवोवः सवितेत्यभिमन्त्रयते । तण्डुलाननामिकाग्रेण स्पृशन् विलोकयन् मन्त्र ं पठतीत्यर्थः । को कृष्णाजिन को कम्पित करके उत्कर में गिराता है । तदन्तर उदकोपस्पर्श यानी आचमन करके गार्हपत्य के उत्तर की ओर उत्कर देश में प्रतीची ( पश्चिम ) दिशा की ओर जिसकी ग्रीवा है, अर्थात् प्रत्यग ग्रीव किये हुए कृष्णाजिन को ' आदित्यास्त्वगसि ० ' मन्त्र से वह अध्वर्यु बिछाता है । दोनों हाथों से उसे फैलाता है, वाम ( बाँये ) हाथ से कृष्णा-जिनस्पर्श किये हुए ही दक्षिण ( सीधे ) हाथ से उलूखल को लेकर ( उठाकर ) ' अद्रिरसि ० ' अथवा ' ग्रावाऽसि ' मन्त्र से स्थापित करता है । उक्त दोनों मन्त्रों में ' प्रतित्वाऽदित्यास्त्वग्वेत्तु ' को जोड़ देना चाहिये । तदनन्तर शूर्प में अलग-अलग रखे हुए दोनों हवियों को एक - दूसरे से मिलाकर । ( मिश्रणकर ) बायें हाथ से थामे हुए शूर्प से ही हविः प्रक्षेप उलूखल में ' अग्नेस्त नू: ' मन्त्र से करे । उलूखल में हविः प्रक्षेप करने के बाद अथवा हविष्कृदाह्वा न के समय अध्वर्यु और यजमान दोनों अपना वाग् विसर्ग यानी मौन खोल दें । तदन्तर अध्वर्यु ' ' वृहद्ग्रावासि ' मन्त्र से मुसल को ' हाथ ' से उठा ले, और स्वयं ही कण्डन करने के लिये प्रवृत्त होकर अर्थात् कण्डन करते हुए ही - ' हविष्कृदेहि ' इस मन्त्र से तीन बार ( त्रिवार ). हविः कण्डन करने वाली पत्नी को अथवा हविष्कर्ता आग्नीध्र को बुलावे । जब अध्वर्युं हविष्कृत् का आह्वान करता है, उसी समय आग्नीध्र ' कुक्कुक्कुऽसि ' मन्त्र को दो बार कहकर शम्या से दृषद् पर दो बार और उपला पर एक बार मन्त्र बोलकर आघात करे । तदन्तर पत्नी अथवा आग्नीध्र कण्डन करता है । ब्रीहियाँ के तुष-रहित होने पर ' वर्षवृद्धिम् ० ' मन्त्र कहकर हाथ में शूर्पा लेता है । तदनन्तर ' प्रति त्वा वर्षवृद्धम् ' मन्त्र को बोलकर fuse हुए हवि को उलूखल से निकालकर शूर्प में चुपचाप ( मन्त्ररहित ) रखता है । उसके बाद ' परापूतम् ० ' मन्त्र बोलकर सेकण्डत व्रीहियों को पखाड़ता है । तुषों को व्रीहियों से अलग करता है । पश्चात् जलस्पर्श ( आचमन ) करके ' वायुर्व ० ' मन्त्र कहकर अकण्डित तण्डुलों को और ब्रोहियों को अलग - अलग करता है । तब कण्डित चावलों को रखकर और अकण्डितों को पुनः उलूखल में डालकर और उन्हें कण्डितकर पुनः निकालकर सूप में रखकर तुषों को पृथक् करे । तदनन्तर सम्पूर्ण तुषों को ' अपहत 25 रक्षः ' मन्त्र बोलकर उत्कर देश में डाल दे । और जलस्पर्श ( आचमन ) करे । उसके पश्चात् शूर्पा स्थित तण्डुलों को पात्री में उलट कर ' देवो वः सविता ० ' मन्त्र से उन्हें अभि-मन्त्रित करे । अर्थात् तण्डुलों को अनामिका के अग्रभाग से स्पर्श करते हुए और उनकी ओर देखते हुए मन्त्र पढ़े । तदनन्तर तीन बार फलीकरण करना चाहिये, अर्थात् तीनबार कण्डन करके सूक्ष्म कणों को उनसे पृथक् कर उन्हें उज्ज्वल ( निर्मल ) करे । पहले उलूखल में हवि को डालकर, उसको कूटकर, फिर उसे निकालकर, रूप से

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[ २८६ ] ततस्त्रिः फलीकरोति त्रिः कण्डने सूक्ष्मकणिकाभ्यो वियोज्योज्ज्वलान् करोति पूर्वमुलूखले हविरूप्य कण्डयित्वा निष्काश्य सर्वाणि निष्पूय कृणान्निदधाति । एवमेववारत्रयं फलीकरणं कर्णानिधानञ्च कर्त्तव्यम् । ततः पेषणोपधाने सहभवतः । एकस्य युगपदुभयकर्तृत्वासम्भवेनाध्वर्यु: पेषणं करोति । अग्नीच्च कपालोपधान प्रथम कपालानि प्रक्षालयति गार्हपत्यस्य पश्चादुपविश्य ' धृष्टिरसी'ति मन्त्रेणोपवेषं हस्तेन गृह्णाति । ततोऽग्नेऽग्निमिति मन्त्रेणोपवेषेण श्रपणस्याङ्गा-रान् स्वस्थानात्प्राच्यां प्रेरयति खरमध्य एव यथाङ्गारस्थानेऽतितप्तभूमो कपालान्युपधीयन्ते । ततो यज्ञमित्युपवेषेणैव प्राक्प्रेरिताङ्गारमध्यात् एकं गार्हपत्यस्य पश्चाद्भागे दक्षिण पुरोडाशस्थानस्य मध्ये आनयति । ततोध्रुवमसीत्यनेन-मन्त्रेण तस्यानीतस्याङ्गारस्योपर्यु त्तानं मध्यमं कपालमुपदधाति तत्राभिचार कुर्वन् भ्रातृव्यस्य वधायेत्यत्र भ्रातृव्यस्येति पदस्य स्थाने अमुकस्य वधायेति शत्रोर्नाम गृह्णीयात् । तदोदकस्पर्शः । अभिचारबुद्धयभावे उदकस्पर्शाभावः । ततः सत्र्यहस्तस्यां गुल्याऽशून्ये स्पृष्टे मध्यमकपाले एकमङ्गारं दधाति अग्नेब्रह्मेति । ततारुणमसीति मन्त्रेण मध्यमकपालस्य पखाड़कर किसी पात्र में कणों को रखे । इसी प्रकार तीन बार फलीकरण और कणनिधान करे । अर्थात् तूष्णीं ( बिना मन्त्र पढ़े ) तीन वार कण्डन, सूर्पादान, हविरुद्वपन, निष्पवन, विवेकीकरण, और कणनिधान करे । फलीकरण से यह तात्पर्य है कि हविष्करण, कण्डन, उद्वाप, निष्पवन, विवेचन, कणनिष्काशन करे । तदनन्तर पेषण और उपधान का युगपत् अनुष्ठान किया जाता है । अर्थात् तण्डुल का पेषण और कपालों का उपधान एक ही समय में एक साथ ही करना चाहिये । उसमें भी अन्तरंग होने से पेषण अध्वर्यु करे, और बहिरंग होने कपालोपधान अग्नीत् करे । क्योंकि एक ही समय में और एक साथ दो कार्यों को एक व्यक्ति नहीं कर सकता । प्रथमतः कपालों का प्रक्षालन करता हैं, गार्हपत्य के पश्चात् भाग में बैठकर ' धृष्टिरसि ० ' मन्त्र से ' उपवेष ' को हाथ से उठाता है । अङ्गार को सर-काने में समर्थ, हाथ के आकार वाले काष्ठविशेष को उपवेष ' कहते हैं । हाथ में ' उपवेष ' को लिया हुआ अग्नीत् उस उपवेष से गार्हपत्यखर में स्थित अपर भागीय अङ्गारों को खर के पूर्वभाग में ' अपाग्ने अग्निम् ० ' मन्त्र कहकर प्रेरित करे अर्थात् खिसकावे । खर में ही अङ्गार स्थान की अत्यन्त तप्त भूमि पर कपालों को रखा जाता है । तदनन्तर ' आदेवयजव्वह ' मन्त्र से पूर्व दिशा में खिसकाये हुए अङ्गारों में से वे एक अङ्गार को गार्हपत्य के पश्चिम भाग में दक्षिण पुरोडाशपण करने की जगह उपवेष से लाकर स्थापित करे, और उस लायंहुवे अङ्गार के ऊपर ' ध्रुवमसि ० ' मन्त्र से मध्यम कपाल को रखे । उस समय यदि अभिचार करने की इच्छा होता ' ध्रुवमसि ० ' मन्त्र में वैरिवाचक ' भ्रातृव्य ' शब्द के स्थान में षष्ठयन्त शत्रु ( वैरी ) के नाम का उच्चारण करे । अर्थात् ' भातृव्यस्य वधाय ' में ' भ्रातृ-व्यस्य ' पद के स्थान में ' अमुकस्य वधाय ' इस प्रकार शत्रु के नाम को ले । तदनन्तर उदक ( जल ) स्पर्श ( आचमन ) करे । अभिचार की इच्छा न हो तो उदकस्पर्श करने की आवश्यकता नहीं है । वैरिमरणानुकूल व्यापार को ' अभिचार ' कहते हैं । सव्य ( बाये ) हाथ की अंगुली से स्पर्श किये हुए मध्यम कपालपर ' अग्ने ब्रह्म गृभ्णीष्व मन्त्र बोलकर एक अङ्गार को रखे । यह अङ्गारनिधान कपाल का संस्कार है, अतः प्रत्येक कपाल के लिये उसे पुन: करना चाहिये । तदनन्तर ' धरुणमस्यन्तरिक्षं दृव्ह ब्रह्म ० ' मन्त्र बोलकर मध्यम कपाल के पश्चात् भाग में द्वितीय कपाल को पहले रखे ' हुए कपाल से सटाकर रखे । तदनन्तर ' धर्वमसि दिवं हर्टव्ह ब्रह्मव ० ' मन्त्र से मध्यम कपाल के पूर्वभाग में तृतीय कपाल को उससे सटाकर रखे । उसके बाद ' विश्वाभ्यस्त्वाशाभ्य उपदधामि मन्त्र से प्रथम कपाल के दक्षिणभाग में उससे संश्लिष्टकर चतुर्थ कपाल को रखे । उसके बाद ' चितस्थोर्ध्वचितः ' मन्त्र बोलकर चतुर्थ कपाल के पूर्वभाग में पश्चम कपाल को ओर चतुर्थ कपाल के ऊपर ( पश्चिम ) भाग में षष्ठ कपाल को तथा चतुर्थ कपाल के उत्तरभाग में दो कपालों को प्राक् संस्थ रखे । तात्पर्य यह है कि आठ कपालों में से चार को तो पहले हो रखा गया था, तदनन्तर अवशिष्ट चार रहे, तब उनका सम विभाग करके ' चितस्थेति ' मन्त्र से दो दक्षिण भाग में और दो उत्तर भाग में प्रत्येक के साथ मन्त्र बोलकर प्रादक्षिण्येन उनका उपधान करे । अर्थात् एक को चतुर्थ से पूर्व और दूसरे को चतुर्थ से अपर में रखे । उसके बाद उत्तर की ओर पश्चात् भाग में एक और पूर्वभाग में द्वितीय ( दूसरे ) को रखे । अथवा चारों का उपधान करने के बाद अवशिष्ट जो चार बचे हैं, उन सभी कपालों का उपधान तूष्णीं ही करे, अर्थात्

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - १ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 300 का मूल पृष्ठ
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[ २८७ ] पश्चात् द्वितीयं कपालमुपदधाति मध्यमकपालस्य पुरस्तात तृतीयं कपालमुपदधाति धमसीति मन्त्रेण । ततो ' विश्वाभ्य ' इति मन्त्रेण मध्यमकपालस्य दक्षिणतश्चतुर्थं कपालमुपदधाति । ततश्चितः स्थेति चतुर्थात् पूर्वं पञ्चमं चतुर्थादपरं षष्ठ उत्तरतोद्वे प्राक्संस्थे पञ्चमप्रभृतीनां सर्वेषां चितः स्थेत्युपधानमन्त्रः । तूष्णीं वा पञ्चमादीनामुपधानम् । एवमेकादश-कपालानि अग्नीषोमीयस्पोपदधाति तैरेवमन्त्रैः । तत्रैवं पूर्वं मध्यमं ततः पश्चात् द्वितीयं ततः पुरस्तात् तृतीयं मध्यमात् दक्षिणं चतुर्थं चतुर्थात्पूर्वमेकस्य कपालस्यान्तरालं परिशिष्य पञ्चमं चतुर्थपञ्चमयोरन्तराले षष्ठं चतुर्थस्य पश्चात् सप्तमम् तस्य पश्चादष्टमम् सर्वेभ्य उत्तरतो नवमदशमैकादशानि प्राक् संस्थानि । ततोभृगू गामित्यनेन ज्वलद्भिरङ्गारैः सर्वाणि कपालान्याच्छादनीयानि । ततस्तदैवोपसर्जनी रग्नीदेव गार्हपत्येऽधिश्रयति । पिष्टसयवनर्था आप उपसर्जन्य: । अथ पेषणम् - तत्राध्वर्यु: शर्मासीति कृष्णाजिनमादाय अवधूतमिति पूर्ववद्धनोति । ततोऽप उपस्पृश्य प्रत्यग्ग्रीव-मदित्या इत्यास्तीर्यं सर्वस्तेनाविमुक्ते कृष्णाजिने दक्षिणेन हस्तेन प्रागग्र दृषदं कृष्णाजिनस्योपरि निदधाति धिषणा-सीति । १।१२ ततोदिव: स्कम्भनीरिति १1११ दृषदः पश्चाद्भागे अधस्तादुदगग्रां शम्यां प्रेरयति । यथा दृषदः प्राचीन-प्रवणता ज्ञायते ततोधिषणासि पार्वतेयीत्युपला १।१० दृषद उदगग्रामुपदधाति । ततोधान्यमसीति १।२० दृषदि तण्डुला-नोप्य प्राणायत्वेति १।२० प्रतिमन्त्र पिनष्टि । पिष्यमाणेषु तण्डुलेषु कपालेषु भृगूणामिति ताप्यमानेषु यजमानो मही-नामिति १।२० पात्रान्तरादाज्यमाज्यस्थाल्यां प्रक्षिपति । ततो वेदोऽसीतिमन्त्रेण वेदं करोति तत्र पशुकामो यजमानः प्रदक्षिणवृत्तं वत्सजानुसदृशं प्रादेशमात्र वेदं करोति ब्रह्मवर्चसकामस्त्रिवृत मूताकार करोति । मूतस्तृणपत्रादिनिमित-. धान्यावपनस्थानम् । कामाभावेऽपि त एव वेदस्याकारा भवन्ति निष्कामस्याकारान्तरानुपदेशात् । ततोऽध्वर्युर्दीर्घानु-प्रसितिमिति १।२० दृषद उपरि वर्तमानानि पिष्टानि कृष्णाजिने प्रोहति । ततश्चक्षुषेत्वेति कृष्णाजिने पतितानि पिष्टानि विलोकयति । तत पवित्रे पात्र्यां कृत्वा कृष्णाजिनात् पिष्टान्यादाय सपवित्रायां पात्र्यामावपति । कृष्णाजिन-मुत्पाद्य तेनैवावदिति हरिस्वामिनः । देवस्य त्वेति संवपामीत्यन्तेन मन्त्रेण संवाप: । तत उत्थाय गार्हपत्यस्य पश्चा ' चितस्थेति ' मन्त्र को न कहे । अग्नीषोमीय पुरोडाश के एकादश कपालों का उपधान भी इसी प्रकार से करना है । अर्थात् अष्टाकपालोपधान के समान ही चारों का मन्त्र से और अवशिष्ट सातों का तुष्णीं उपधान करना है । उसका प्रकार यह है प्रथमतः मध्यम कपाल, उसके पश्चात् द्वितीय कपाल, और पुरस्तात् तृतीयकाल, तथा मध्यम के दक्षिण से चतुर्थकपाल, चतुर्थ से पूर्व एक कपाल के अन्तराल को छोड़कर पञ्चम को और चतुर्थ पञ्चम के अन्तराल में षष्ठ को तथा चतुर्थ के पश्चात् सप्तम्, उसके पश्चात् अष्टम और उसके उत्तरभाग में नवम, दशम और एकादश कपालों को प्राक्संस्थ रखना चाहिये । एकादश कपालोपधान में विशेषता यह है - अष्टाकपालोपधान की तरह चार कपालों का उपधान करने के बाद अवशिष्ट सात कपालों को सम विभक्त करने के समय जिस अधिक सप्तम कपाल का विभाग नहीं कर पाते हैं, उस सप्तम कपालका उपधान दक्षिण भाग में करदेना चाहिये । अर्थात् चार कपालोंका उपधान करने के बाद दक्षिण भाग में चार कपाल होते हैं, और तीन कपाल उत्तरभाग में रखे जाते हैं । इस रीतिसे एकादश कपालों का उपधान किया जाता है । इस प्रकार उपहित किये गये कपाल को ' भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ' मन्त्र बोल-कर अङ्गारों से तपाना चाहिये । अर्थात् अङ्गारों से कपालों को आच्छादित कर देना चाहिये ( ढक देना चाहिये ) । जहाँ एक कपाल हो वहाँ मन्त्र में ' तप्यस्व ' और जहाँ दो कपाल हों, वहाँ ' तप्येथाम् ' इस प्रकार से ऊह किया जाता है । तदनन्तर उसी समय अग्नीत संज्ञक ऋत्विज् उपसर्जनी को गार्हपत्य पर चढ़ाता ( अधिश्रित करता ) है । पिष्ट संयवनार्थ ( चावल का आटा माँड़ने के लिये ) जो जल होता है, उसे ' उपसर्जनी ' कहते हैं । उपसर्जनी का गार्हपत्य पर अधिश्रयण और पेषण दोनों का समान काल है । अतः पेषणकार्य में अध्वर्यु के व्यापृत होने से उपसर्जना का अधिश्रयण आग्नीध्र को करना पड़ता है । चविष्टि आदि में जहाँ पेषण नहीं है, वहाँ उपसर्जनी का अधिश्रयण अव ही करता है । अब पेषण का प्रकार बताते हैं - अध्वर्यु ' ' शर्मासीति ' मन्त्र बोलकर कृष्णाजिन को उठाता है और ' अवधूत-मिति मन्त्र से उसे झटकारता है । तदन्तर जलस्पर्श करता है । तदनन्तर उसे प्रत्यग् ग्रीव करके ( पश्चिम की