वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 21–30
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 21–30
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( २० ) इस प्रसंग में याग और होम की कात्यायन संमत परिभाषा दी गई है, यास्कीय निरुक्त के भाष्यकार दुर्ग, स्कन्द आदि के मत प्रदर्शित हैं और सर्वानुक्रमणीकार द्वारा प्रदर्शित देवतावाद के समर्थन के प्रसंग में बताया गया है कि निरुक्त, बृहद्देवता एवं सर्वानुक्रमणी के आधार पर ही वैदिक देवतावाद प्रतिष्ठित है । पं ० ब्रह्मदत्त जिज्ञासु ने " स्वामी दयानन्द के भाष्य का विद्वत्तापूर्ण टिप्पणियों के साथ सम्पादन किया है । उक्त संस्करण की पृ ० २३ तक की टिप्पणियों में अनेक विषयों की चर्चा उन्होंने की है । यहाँ निरुक्त, निरुक्त के भाष्यकार दुर्ग और स्कन्द, सर्वानुक्रमणी, तैत्तिरीय संहिता, बृहद्देवता, गोपथ ब्राह्मण, छान्दोग्य मन्त्रभाष्य, महाभारत, वायुपुराण भट्ट भास्कर भाष्य आदि ग्रन्थों को उद्धृत करते हुए स्वामी दयानन्द के विचारों का समर्थन किया गया है और व्याकरण-प्रक्रिया के अन्तर्गत प्राचीन भाष्यकारों की व्युत्पत्ति को गलत बताने की चेष्टा की गई है । वाक्यार्थबोध का प्रकार, सभी मन्त्रों के विविध अर्थ, स्वामी दयानन्द द्वारा प्रदर्शित आध्यात्मिक, अधियज्ञ और अधिदैव अर्थ भी प्रस्तुत किये गये हैं । इन सब विचारों का यहाँ ( पृ ० ३५-५४ ) सप्रमाण खण्डन कर दिया गया है । इनकी व्याकरण प्रक्रिया का खण्डन आगे भी ( पृ ० १०८ १० ९ ) मिलता है । प्रसंगवश यहाँ ( पृ ० ४१ ) बताया गया है कि निरुक्तकार ने भी आध्यात्मिक, याज्ञिक और ऐतिहासिक पक्ष को लेकर कुछ मन्त्रों को व्याख्या की है, किन्तु पूर्व और उत्तर मीमांसा को दृष्टि से पूरे वेद में धर्म और ब्रह्म का ही प्रतिपादन है । धर्म मनुष्य के अभ्युदय का साधन है । निष्काम भावना से किया गया धर्म बुद्धि को शुद्ध करता है और इसका भी पर्यवसान अन्ततः ब्रह्मसाक्षात्कार में होता है । यहाँ मन्त्रार्थ की प्रक्रिया पर भी विचार किया गया है और बताया गया है कि स्वामी दयानन्द की व्याख्या इन सिद्धान्तों का अनुसरण नहीं करती, अतः वह अप्रमाण है । उनके द्वारा प्रदर्शित स्वरप्रक्रिया की भी यहाँ ( पृ ० ४४-४८ ) समीक्षा दी गई है । अन्त में ( पृ ० ५५-६० ) दिया गया प्रथम मन्त्र के भाष्य का हिन्दी सारांश उनके लिये बहुत उपयोगी है, जिनका संस्कृत भाषा पर पूरा अधिकार नहीं है । पृ ० ६१ पर पवित्र पद का अर्थ बताया गया है और पू ० ७१ पर कर्तव्य के निर्धारण में सहायक स्वामी दयानन्द द्वारा निर्दिष्ट - १. वेदविद्या, २. प्रत्यक्ष आदि प्रमाण ३. सृष्टिक्रम, ४. विद्वानों की संगति, ५. सुविचार और ६. आत्मशुद्धि नामक छः साधनों की समीक्षा की गई है । नवें मन्त्र को व्याख्या करते समय ( पृ ० ८ ९ ) पुनः स्मरण कराया गया है कि सायण का अर्थ श्रुति सूत्रसंमत होने से वह हमारे लिये प्रामाणिक है । इसके विपरीत दयानन्दीय अर्थं श्रुति सूत्रावरोधी होने से अप्रामाणिक है । यहाँ यह भी स्पष्ट किया गया है कि मन्त्रों के श्रुति - सूत्र अविरोधी * अनेक अर्थ किये जा सकते हैं । उदाहरण स्वरूप यहाँ कुछ मन्त्रों के इस प्रकार के अर्थ भाष्यकार द्वारा किये भी गये हैं । नवं मन्त्र की व्याख्या में स्वामी दयानन्द ने अपने अर्थ के समर्थन में शतपथ ब्राह्मण को उद्धृत किया है, किन्तु यहाँ ( पृ ० ९ ४ ) और अन्यत्र ( पृ ० १६५, १७४, १७६, १७ ९, २०७ २०८, २२२, २२६, २३२, २३७, २६५ ) भी आगे अनेक स्थलों पर शतपथ ब्राह्मण को उद्धृत कर यह स्पष्ट कर दिया है कि इन शतपथ वचनों में स्वामी दयानन्द ४. " तिष्ठद्धोमा वषट्कारप्रदाना याज्यापुरोनुवाक्यावन्तो यजतयः, उपविष्टहोमा: स्वाहाकारप्रदाना जुहोतयः " ( पृ ० ३० ) । सात्वतसंहिता के भाष्यकार ने याग और होम का अन्तर इस प्रकार बताया है - " यागो बिम्बादिषु भगवदचंनम्, होमो. वह्निसन्तर्पणम् ” ( पृ ० १ ९ -२० ) । इस प्रकार निगम और आगम की परिभाषा स्पष्ट भिन्न है । ५. रामलाल कपूर ट्रस्ट प्रकाशन, प्रथम भाग, संवत् २०४१ वि ० । यहाँ पृ ० १ २० तक पहले संस्कृत में तथा बाद में २४ से ३५ पृष्ठ तक हिन्दी में इन सब विषयों पर विचार किया गया है । ६. " द्वौ कुशी कुशत्रयं वा पवित्रमुच्यते " ( पृ ० ६१ ) ।
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( २१ ) द्वारा दिये गये अर्थ की गन्ध भी नहीं मिलती । स्वामी दयानन्द प्रभुसंमित ब्राह्मण भाग को न तो वेद मानते हैं और न उसकी अपौरुषेयता को ही स्वीकार करते हैं । ब्राह्मण भाग को वे मात्र मन्त्र भाग का व्याख्यान मानते हैं । वे यह नहीं मानते कि ब्राह्मण भाग में मन्त्रों का विनियोग भी प्रदर्शित है । इसीलिये उनके द्वारा किये गये अर्थ में नाना प्रकार की विसंगतियों ने घर कर किया है । दसवें मन्त्र की व्याख्या के प्रसंग में अन्तर्याग की मानस पूजा की विधि को बताते हुए भूशुद्धि, भूतशुद्धि आदि का स्वरूप निदर्शित है और कहा गया है कि इस मानस पूजा से साधक ब्राह्मी तनू को प्राप्त करता है, जिसका कि उल्लेख मनुस्मृति ( २२८ ) आदि में किया गया है | आगम - तन्त्रशास्त्र में " देवो भूत्वा यजेद् देवान् " इस वाक्य से इसकी प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है और " इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि " ( ११५ ) प्रस्तुत संहिता के इस मन्त्र में भी यही सिद्धान्त प्रतिपादित है । के १८ वें मन्त्र की व्याख्या में स्वामी दयानन्द ने वायुविद्या, शिल्पविद्या आदि का उल्लेख कर वेद में विमानविद्या होने का उल्लेख किया है । यह सब शब्दों की कल्पनामात्र, शब्दजालमात्र है । योगसूत्रकार भगवान् पतंजलि ने इसको विकल्प की संज्ञा दी है - " शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः " ( १1 ९ ) । पूरे वेदभाष्य में इस तरह के आधुनिक को विज्ञान द्वारा आविर्भूत विद्युत् आदि की खोज इस विकल्प का अच्छा उदाहरण है । पाश्चात्त्य वर्णन जगत् को के देख आविष्कारों कर वेदों में तथा अपने यहाँ पुराण, इतिहास, समरांगणसूत्रधार आदि में वर्णित नाना प्रकार के यानों के इसको खोज लेने की ललक कोरा एक नाटक है, हास्यास्पद प्रयत्न है । पात्रीनिणंजन, निनयन आदि विशिष्ट वैदिक पारिभाषिक शब्द हैं । इनका स्वरूप यहाँ पृ ० २० ९ -२१० पर प्रदर्शित है । प्रसंगवश इसी तरह से यहाँ पूरे भाष्य में अन्य भी अनेक विशिष्ट पदों का स्वरूप प्रदर्शित है, जिनका कि उल्लेख भाष्यनिष्कर्ष की टिप्पणियों में भी कर दिया गया है । स्वामी दयानन्द के मत का खण्डन करते समय यहाँ ( पृ ० २३७ ) एक विशेष बात यह बताई गई है यहाँ कि उन्होंने भूमिका में मन्त्रों के पाठ के विषय में कहा है कि ये केवल अभ्यास के लिये हैं, किन्तु उसके विपरीत वे कहते हैं कि मन्त्रों के पाठ के बिना फल की प्राप्ति नहीं होती । लोक व्यवहार में तो इसके विपरीत ही देखने को मिलता है कि बिना ही वेदपाठ के अनेक लोग सुखसमृद्धि से सम्पन्न देखे गये हैं । वायु, जल आदि की शुद्धि भी वे मन्त्रपाठ और हवन आदि के बिना ही कर लेते हैं । बताया गया है कि कुछ मन्त्र निदान वाले होते हैं । अर्थात् उनके साथ कोई कथा २८ वें मन्त्र के भाष्य में व्याख्या करने से पहले उससे संबद्ध कथापक को उपस्थापित करना आवश्यक जुड़ी हुई रहती है । ऐसे मन्त्रों की तथा अन्य रहता है और इसका ज्ञान ब्राह्मण ग्रन्थों से ही संभव हो सकता है । इस तरह की निदान कथाओं का उल्लेख यहाँ स्थलों पर भी पूरे भाष्य में शतपथ ब्राह्मण आदि की सहायता से यथास्थान किया गया है । यहीं ( पृ ० २४८ में ) स्वामी दयानन्द के इस अनोखेपन का उल्लेख किया गया है कि वे शतपथ ब्राह्मण का उल्लेख तो प्रायः प्रत्येक मन्त्र करते हैं, किन्तु मन्त्र की व्याख्या उसके विपरीत ही रहती है । यह एक आश्चर्य की ही बात है । स्वामी दयानन्द के मत के खण्डन के प्रसंग में भाष्यकार ने कुमारिल भट्ट के श्लोकवार्तिक- " प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुद्धयते! एनं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता ॥ " ( पृ ० २५६ ) इस श्लोक को अनेक स्थलों पर स्मरण किया है । इसका अभिप्राय यह है कि प्रत्यक्ष अथवा अनुमान प्रमाण से भी जिसका ज्ञान नहीं होता, ऐसे अत्यन्त परोक्ष पदार्थ का भी ७. " देवो भूत्वा यजेद् देवान् " शीर्षक निबन्ध में हमने बृहदारण्यक उपनिषद् और शतपथ ब्राह्मण को मात्र उद्धृत किया है, किन्तु यहाँ हम देखते हैं कि यह सिद्धान्त संहिता में ही प्रतिपादित हो चुका था । भू०-४
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( २२ ) ज्ञान वेद की सहायता से किया जाता है । यही वेद की वेदता है । अर्थात् प्रत्यक्ष और अनुमान अज्ञात धर्म - ब्रह्म, स्वर्ग - नरक आदि का ज्ञान वेद से ही हो सकता है । स्वामी दयानन्द ने तो वेद मन्त्रों के ऐसे ही अर्थ किये हैं, जिनका कि ज्ञान प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण के द्वारा भी हो सकता है । द्वितीय तृतीय अध्याय जैसा कि पहले अध्याय के प्रारम्भ में बताया गया है, इस दूसरे अध्याय के प्रारम्भ के २८ मन्त्रों में भी दर्शपूर्ण मास का प्रतिपादन है । २८ वे मन्त्र में यजमान " य एवास्मि सोऽस्मि " कहता है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसा मैं पहले था, वैसा ही पुनः बन जाता हूँ, अर्थात् अनुष्ठान करते समय मैंने अमृत से सत्य भाव को प्राप्त किया था, मनुष्य भाव को छोड़कर देव भाव को स्वीकार किया था, अब अनुष्ठान की समाप्ति पर मैं पुनः पुराने मनुष्य भाव को ही प्राप्त कर रहा हूँ | " देवो भूत्वा यजेद् देवान् " इस आगमिक सिद्धान्त का प्रस्तुत वैदिक प्रकरण ही प्रेरणा - स्रोत है । भाष्यकार ने प्रसंगवश यहाँ अनेक उत्तम मनोहारी श्लोकों को उद्धृत किया है । उनका रसास्वादन भाष्यसार की सहायता से किया जा सकता है, क्योंकि इस खण्ड के भाष्यसार में ऐसे सभी श्लोकों का स्पष्ट भाषान्तर कर दिया गया है ( पृ ० १२ आदि पर देखिये ) । पृ ० ३ पर ' कवि ' पद से ब्रह्मदत्त जिज्ञासु अभिप्रेत हैं । ' केचिन्मन्यन्ते ' ( पृ ० १० ) यह मत शतपथ ब्राह्मण के भाष्य में देखा जा सकता है । वेदभाष्यकार और शतपथ ब्राह्मण के भी व्याख्याता आचार्य सायण का मत उनके नाम का उल्लेख करते हुए दिया गया है ( पृ ० १४, १६ आदि देखिये ) | सायण के काण्व संहिता के भाष्य का भी यत्र तत्र उल्लेख मिलता है । द्वितीय अध्याय के अनेक मन्त्रों का व्याख्यान स्वामी दयानन्द की व्याख्या से प्रारम्भ होता है । ऐसा उन मन्त्रों के प्रसंग में किया गया है, जिनकी व्याख्या स्वामी दयानन्द शतपथ ब्राह्मण के प्रमाण से करने का उल्लेख करते हैं । ऐसे स्थलों पर शतपथ ब्राह्मण के उस प्रसंग को विस्तार से उद्धृत कर यह दिखाने का प्रयत्न किया गया है कि शतपथ ब्राह्मण के इन वचनों में स्वामी दयानन्द के व्याख्यान की गन्ध भी नहीं है । अनेक मन्त्रों की व्याख्या में स्वामी दयानन्द शतपथ के स्थलों का मात्र उल्लेख करते हैं, किन्तु उन स्थलों पर निर्दिष्ट मन्त्र का व्याख्यान मिलता ही नहीं । इस तरह के मन्त्रों के भाष्य में दयानन्दीय मत और शतपथ ब्राह्मण को उद्धृत कर इनके मत का खण्डन करने के उपरान्त ही श्रुतिसूत्रसंमत सिद्धान्त पक्ष का प्रदर्शन करते हुए मन्त्रार्थं दिया गया है और अन्त में आध्यात्मिक अर्थ बताया गया है । ऐसा पृ ० १८, २२, २७, ३०, ३४, ३८, ४५, ५४, ६०, ६६, ७०, ७५, ७८, ८२, ८६, १०२, १०५ पर देखा जा सकता है । ऐसे स्थलों पर विस्तार से सप्रमाण यह बता दिया गया है कि दयानन्दीय अर्थ शतपथ ब्राह्मण संमत है ही नहीं । यहाँ स्पष्ट कर दिया गया है कि कात्यायन श्रौतसूत्र और उब्वट, सायण, महीघर आदि के भाष्य शतपथ ब्राह्मण का ही अनुसरण करते हैं और प्रस्तुत भाव्य का सिद्धान्तपक्षीय व्याख्यान भी इन सबके साथ विभिन्न आचार्यों के द्वारा निर्मित याज्ञिक पद्धतियों का भी अनुवर्तन करता है ( पृ ० ७६, ८८, ९ ३ ) । स्वामी दयानन्द ने २७ वें मन्त्र का दो तरह का व्याख्यान किया है । ये दोनों ही व्याख्यान शतपथ श्रुति और कात्यायन श्रौतसूत्र के विपरीत हैं, अत एव उपेक्षणीय हैं ( पृ ० ९ ४ ) । चित्तु ( पृ ० २५-२६ ), अपरस्तु ( पृ ० ३३ ), आधुनिकस्तु ( पृ ० ४२, ४८, ५१, ५४, ५८ ), अन्ये तु ( पृ ० ८५ ) इत्यादि शब्दों से संभवत यहाँ स्वामी गंगेशानन्द जी के द्वारा विरचित विज्ञानभाष्य गृहीत है । यहाँ के कुछ अंशों के साथ अपनी संमति जताने पर भी भाष्यकार ने अनपेक्षित स्थलों का खण्डन किया है । पृ ० ७२ पर नामसंकीर्तन का महत्त्व बताने वाले तीन श्लोक उद्धृत हैं । नामजप करने वाले भक्तों के लिये ये अतीव उपयोगी हैं । इसी तरह से पृ ० ९ २ पर " ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती " इत्यादि श्लोक में भगवान्
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( २३ ) सूर्यनारायण का ध्यान अतीव मनोहारी है । है । इसी तरह के नारायण स्तुति के अन्य मिलते हैं । स्वामी जी ने ही इसे अन्यत्र स्कन्दपुराण का श्लोक बता कर उद्धृत किया
श्लोक पांचरात्र वैष्णवागम की सात्वत संहिता ( २५।११ ९ -१२२ ) में
यहाँ २८ वे मन्त्र का आध्यात्मिक अर्थ नहीं दिया गया है । ऐसा अन्यत्र भी पूरे भाष्य के है । ऐसे स्थलों पर कहीं - कहीं तो मन्त्रार्थ मात्र से ही आध्यात्मिक अर्थ भी स्पष्ट हो जाता है, कुछ मन्त्र कर्मकाण्डपरक न होकर आध्यात्मिक अर्थ का ही व्याख्यान करते हैं । अन्य स्थलों पर इसके कारण की खोज हमें करनी होगी । कुछ स्थलों पर हुआ अर्थात् इस तरह के ऐसा कैसे हो गया, आगे के छः मन्त्रों में पितृयज्ञ की विधि वर्णित है । पितृयज्ञ मे पितरों के निमित्त दी गई हवि का वाहक अग्नि कव्यवाहन कहलाता है । यहाँ ( पृ ० १०८ ) स्पष्ट कर दिया गया है कि पिण्डदान आदि मृत पितरों के निमित्त ही किये जाते हैं, जीवित माता - पिता आदि के लिये नहीं | आगे ३५ वें अध्याय में पितृमेध का विधान है । उसका विवरण ३१ ३ ९ अध्यायों के भाष्यनिष्कर्ष ( ( पृ ० ७-८ ) में दिया जा चुका है । यह अनुष्ठान क्रव्याद ' नामक अग्नि में किया जाता है । पिण्डपितृयज्ञ, कव्यवाहन, मेक्षण आदि शब्दों का प्रयोग यहाँ हुआ है । कव्यवाहन शब्द का अर्थं भाष्य में ही दिया गया है कि कवि, अर्थात् क्रान्तदर्शी पितरों के निमित्त दी जाने वाली हवि कव्य कहलाती है । इस कव्य नामक हवि को पितरों के पास पहुँचाने वाला पावक ( अग्नि ) कव्यवाहन कहलाता है । पिण्डपितृयज्ञ का परिचय डॉ ० मनोहर लाल द्विवेदी के ग्रन्थ से ( पृ ० १२६-१३० ) प्राप्त किया जा सकता है । यहाँ ( पु ० १०४ ) भी शतपथ ब्राह्मण के प्रमाण से इसको स्पष्ट किया गया है । मेक्षण पद का अर्थ भी वहीं देखा जा सकता है । तृतीय अध्याय में अग्न्याधान, अग्निहोत्र होम एवं उपस्थान और लघुपस्थान संबन्धी मन्त्र उपदिष्ट हैं । वैश्व-देवाय चातुर्मास्य कर्म के वैश्वदेव, वरुणप्रघास, साकमेध और शुनासीरीय नामक चार पर्वो का विधान भी यहाँ मिलता है । साकमेध पर्व के अन्तर्गत पितृयज्ञ से संबद्ध मन्त्र ( ३।५१-५४ ) भी यहाँ उपदिष्ट हैं । यहाँ अन्तिम मन्त्र का स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा रचित भाष्य उपलब्ध न हो सका, अतः उसके स्थान पर पण्डित पट्टाभिराम शास्त्री जी के परामर्श के अनुसार उब्वट - महीधर का भाष्य हमें देना पड़ा है । हमने अभी बताया है कि द्वितीय अध्याय में कवित्त, अपरस्तु, आधुनिकस्तु, अन्ये तु कह कर संभवतः स्वामी गंगेशानन्द जी के विज्ञानभाष्य का स्मरण किया गया है । इस अध्याय में प्रायः प्रत्येक मन्त्र में स्वामी दयानन्द जी के मत के साथ इनके मत का भी खण्डन किया गया है । इसके लिये उक्त शब्दों के अतिरिक्त केचित्तु यत्तु यदपि यदपि च, अन्यस्तु, विज्ञान भाष्याभिमानिनस्तु ( पृ ० १४० ), ऊपर आह, यत्तु कश्चित् यत्तु केनचित् यत्तु केनचिदुच्यते, यच्च, यस्वत्र कश्चित् — इत्यादि पदों का भी प्रयोग किया गया है । तृतीय अध्याय के भाष्य की यह एक विशेषता मानी जा सकती है | स्वामी गंगेशानन्द जी का विज्ञानभाष्य छप चुका है, बहुत प्रयत्न करने पर भी वह हमें उपलब्ध न हो सका, अतः उस भाष्य का परिचय देने में अभी हम असमर्थ हैं । तृतीय अध्याय के भाष्य को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ अन्य आचार्यों के व्याख्यानों का भी उल्लेख कर खण्डन किया गया है । विज्ञानभाष्य को देखे बिना इस सम्बन्ध में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता । की ८. विधानपारिजात के प्रमाण से दिये गये २७ प्रकार की अग्नि के नामों और उनके स्थानों की तथा नवग्रहों नौ प्रकार की अग्नियों की जानकारी इसी खण्ड के पृ ० १३३ - १३४ से प्राप्त की जा सकती है ।
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( २४ ) प्रथम मन्त्र ( पृ ० ११०-११४ ) में ही इस भाष्य के सिद्धान्त पक्ष को उद्धृत कर उसकी विस्तृत समीक्षा की गई है कि कुछ विद्वान् आत्मयाजी की दृष्टि से इस मन्त्र में ब्रह्म का उपदेश मानते हैं, किन्तु स्वामी करपात्री जी महाराज और का कहना है कि आत्मयाजी ब्रह्मात्मदर्शी विद्वान् मन्त्र और ब्राह्मणों की अन्यथा व्याख्या नहीं करते । जिन मन्त्रों ब्राह्मणों का कर्मकाण्डपरक विनियोग स्पष्ट है, उनमें हम निर्गुण, निविशेष, अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादन नहीं मान सकते के । ब्राह्मण ग्रन्थों के द्वारा, मीमांसा शास्त्र में उपदिष्ट लिंग आदि षड्विध प्रमाणों के द्वारा और कात्यायन आदि के श्रौतसूत्रों अर्थ किया द्वारा जिन मन्त्रों का विनियोग जहाँ किया गया है, वही मुख्यार्थं माना जाता है । इसके विपरीत यदि कोई जाता है, तो उसे गोणार्थं ही माना जायगा । स्वामी गंगेशानन्द पूरे अध्याय के मन्त्रों की कृष्णपरक व्याख्या करते हैं । प्रथम मन्त्र की व्याख्या में ही वे के कहते हैं कि इस मन्त्र में कृष्ण और अर्जुन का संवाद है । किन्तु हमें यह ध्यान रखना है कि बिना किसी प्रसंग गौणार्थं करने में अनेक क्लिष्ट कल्पनाएँ करनी पड़ती है और बिना प्रमाण के विभक्ति इत्यादि का विपर्यास भी करना पड़ता है, जो कि यथाश्रुत अर्थ की उपपत्ति हो जाने पर कभी मान्य नहीं हो सकता । मन्त्रार्थं के उपबृंहण के लिये रामायण, महाभारत, पुराण आदि की रचना हुई है । इसके विपरीत श्रीमद्भागवत के उपबृंहण के लिये मन्त्रों की व्याख्या करना कथमपि उचित नहीं माना जा सकता । पाँचवें मन्त्र की इन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अपने विद्यागुरु सन्दीपनि को गुरुदक्षिणा में उनके मृत पुत्र को इस पर प्रस्तुत भाष्यकार का कहना है कि यद्यपि यह अर्थ दयानन्द की भरा हुआ है, तो भी भक्तिभाव से परिपूर्ण सगुणोपासना का प्रतिपादक हमारे लिये सह्य हो सकता है । इस तरह की जबर्दस्ती से मन्त्रों के अनेक अर्थों को यहाँ अविचारित रमणीय तथा वागाडम्बर मात्र ( पृ ० १२० ) ले आने की कथा के रूप में व्याख्या की है । व्याख्या की तरह से ही नानाविध कल्पनाओं से है | यहाँ भगवत्कथा का उल्लेख होने से यह अर्थं किये भी जा सकते हैं, किन्तु इस प्रकार के और कल्पनामात्र ( पृ ० २०१ ) बताया गया है । स्वामी गंगेशानन्द जी के अर्थ का यत्किचित् समर्थन पृ ० १३१ पर भी मिलता है । पृ ० १४७ पर बताया गया है कि यह व्याख्यान स्वामी दयानन्द जी की व्याख्या की अपेक्षा अतीव सुन्दर है, किन्तु सिद्धान्त की दृष्टि से विचार करने पर यह गौणार्थं ही माना धायगा | आगे ( पृ ० १६८ ) इस तरह के अर्थ को उपपत्ति बन जाने पर भी उसे विष्टकल्पनाबहुल, अर्थात् क्लिष्ट कल्पनाओं से भरा हुआ बताया गया है । ३४ वें मन्त्र की व्याख्या ( पृ ० १८ के ९ लिये ) में कहा गया है कि कृष्ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठा लेने पर उनकी सामर्थ्य को जान कर क्षमा प्रार्थना आये इन्द्र को वे उपदेश कर रहे है । इस प्रसंग में ( पृ ० १ ९ ० ) भाष्यकार का कहना है कि प्राचीन आचार्य श्रुति, सूत्र आदि का अनुसरण करते हुए ही कहीं - कहीं विभक्ति - व्यत्यय आदि का सहारा लेते हैं । उन्हीं की पद्धति को यथेच्छ स्वीकार कर स्वामी दयानन्द मन्त्रों का मनमाना अर्थ करने लगे । कुछ आचार्यों ने अपने - अपने मत के अनुसार मन्त्रों की व्याख्या की है । यह उच्छृङ्खलता यहाँ तक पहुँच गई कि ' अहमन्नादः ' इत्यादि श्रुतिवचनों से अहमद के नाद की, अर्थात् कुरान की आयतों की भी प्रामाणिकता सिद्ध की जाने लगी । ५० वें मन्त्र की व्याख्या ( पृ ० २२० ) में पुन: बताया गया है कि यहाँ किया गया अर्थ यद्यपि सुन्दर है, तथापि यज्ञ आदि कर्मों में विनियुक्त मन्त्रों की अन्यशेषता के कारण वे प्रमाणान्तर से असिद्ध अर्थ को सिद्ध करने में समर्थ नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसे स्थलों पर उनका अपना अर्थ प्रधान नहीं रह जाता । यही अर्थ होगा, इसका निर्धारण हम नहीं कर सकते, क्योंकि किसी नियामक के अभाव में उसका दूसरा अर्थ भी दिया जा सकता है । यहाँ भाष्यकार ने अपने आध्यात्मिक अर्थ के ऊपर भी आक्षेप किया है और फिर उसका समाधान भी दिया है कि ' सर्वे वेदाः ' इत्यादि
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( २५ ) श्रुतियाँ सभी वैदिक मन्त्रों का अध्यात्म के प्रतिपादन में विनियोग निश्चित करती हैं । इस स्थिति में विनियोग के अविरुद्ध आध्यात्मिक अर्थं किया हो जा सकता है । स्वामी करपात्री जी महाराज ने द्वितीय और तृतीय अध्याय के भाष्य में स्वामी दयानन्द तथा उनके अनुयायियों के द्वारा उद्भावित व्याकरणविषयक आपत्तियों पर अनेक स्थलों पर विचार किया है । पृ ० ३ पर ' कृष्ण ' पद पर, पृ ० ११० पर ' अतिथि ' और ' इन्द्रिय ' शब्द पर, पृ ० १३१ पर ' व्यख्यन् ' शब्द पर, पृ ० १५२ पर ' आहुवध्यै ' शब्द पर, पृ ० १५८ पर ' अह्रयः ' पद पर पृ ० १६ ९- १७० पर ' दिवे दिवे ' आदि पदों पर, पृ ० १७६ पर ' अन्तम ' शब्द पर, पृ ० १८१ पर ' सोमानम् ' शब्द पर, पृ ० १८३ - १८४ पर ' अररुष: ' शब्द पर, पृ ० १८६ पर ' अघशंसः ' पद पर, पृ ० १ ९ २ पर ' दूडभ, रथ ' आदि शब्दों पर, पृ ० २०३ - २०४ पर ' शंयु ' शब्द पर और पृ ० २०७ - २०८ पर ' करम्भ ' आदि शब्दों पर निघण्टु, निरुक्त, प्रातिशाख्य इत्यादि आर्ष ग्रन्थों के, पदमंजरी, न्यास, ऋक्संहिता - सायणभाष्य आदि के तथा निरुक्त के व्याख्याकार दुर्गाचार्य, वेदभाष्यकार भट्ट भास्कर, उन्चट, सायण - माधव, महीधर आदि के प्रमाण से विस्तार से विद्वन्मनोरंजक पद्धति से अच्छा विचार किया है । यहाँ अनेक स्थलों पर अनेक अन्य वैदिक पदों की स्वतन्त्र व्युत्पत्तियाँ भी दी गई ॥ इससे भाष्यकार के व्याकरण और स्वरप्रक्रिया विषयक गम्भीर ज्ञान का परिचय प्राप्त होता है । तृतीय अध्याय के भाष्य में अन्य भी अनेक विषयों पर शास्त्रीय विचार प्रस्तुत किये गये हैं । छठे मन्त्र के भाष्य ( पृ ० १२४-१२९ ) में पृथ्वीभ्रमण विषयक दयानन्दीय सिद्धान्त की समीक्षा की गई है । इस विषय में भूमिका, भाग दो में भी पर्याप्त विचार किया गया है ( पृ ० १२८७-१३०० ) । पृ०१३३-१३४ पर ' आगमों एवं पुराणों में वर्णित विविध अग्नियों के नामों और स्थानों का विधानपारिजात नामक ग्रन्थ के आधार पर परिचय दिया गया है । वैदिक वाङ्मय में तीन अथवा पाँच अग्नियाँ विशेष रूप से वर्णित हैं, किन्तु यहाँ २७ प्रकार की अग्नियों के नाम और घाम ( कार्य ) दिखाये गये हैं । नवें मन्त्र के भाष्य ( पृ ० १३७-१४४ ) में अग्निहोत्र के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए बताया गया है कि इस विषय पर शतपथ ब्राह्मण ( २ | ३ | १ | १-३३ ) में विस्तार से विचार किया गया है । इसी प्रसंग में पृ ० १४२ पर याज्ञवल्क्य संमत पाकयज्ञ की प्रक्रिया भी व्याख्यात है । १३ वें मन्त्र की व्याख्या में काव शाखा के शतपथ ब्राह्मण का पक्ष प्रस्तुत किया गया है । मन्त्रों की व्याख्या करते हुए यहाँ अनेक स्थलों पर ( पृ ० १३७, १५५, १६ ९, १८३ ) सायण का और उब्वट-महीधर ( पृ ० १५७ ) का पक्ष भी प्रस्तुत किया गया है । पृ ० १६१ पर चित्रावसु शब्द का व्याख्यान ' अन्यस्तु ' कह कर दिया गया है । पृ ० १७५ पर मीमांसा शास्त्र के पदविषयक सिद्धान्त की समीक्षा की गई है । २८ वें मन्त्र में विचार किया गया है और पृ ० २३० ( पृ ० १८० ) प्रसंगवश निरुक्त ( ६।१० ) में की गई इस मन्त्र की व्याख्या पर पर भी निरुक्त में दी गई रुद्र पद की निरुक्ति को उद्धृत किया गया है । ३५ वें मन्त्र में गायत्री मन्त्र के काण्व और माध्यन्दिन संहिताओं के पाठ की समीक्षा की गई है और यहीं ( पृ ० १ ९ १ ) भण्डासुर को भूंज डालने वाली भगवती त्रिपुरा की वन्दना की गई है । ४३ वें मन्त्र के भाष्य ( पृ ० २०४ - २०५ ) में चातुर्मास्य कर्म के वैश्वदेव, वरुणप्रघास, साकमेध और शुनासीरीय नामक चार पर्वों का तथा दक्षिणा और उत्तरा नामक वेदियों का परिचय दिया गया है । पृ ० २०७ २०८ पर प्रघास, करम्भ, मद आदि शब्दों की अशुद्ध व्युत्पत्तियों का उल्लेख कर इन पदों के सही अर्थों का बोध कराया गया है । पृ ० २२७ पर ' अम्बिका ' पद के और पृ ० २३८ - २३ ९ पर ' जमदग्नि ' पद के अर्थ पर विचार किया गया है । ९. ईशान शिवगुरुदेव पद्धति, त्रिवेन्द्रम् संस्करण ( १।१४।६- १४ ) देखिये ।
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( २६ ) अम्बिका के विशेषण के रूप में प्रयुक्त स्वसृ पद का अर्थ पत्नी है, भगिनी नहीं, पृ ० २४०-२४२ पर कालविभाग की विस्तार से चर्चा है और बताया गया है विषयमें 1. आनन्दकन्द आदि आयुर्वेद और तन्त्रशास्त्र के ग्रन्थों में विचार मन्त्र में उनकी चर्चा कथमपि नहीं मानी जा सकती । इसको भी यहाँ स्पष्ट किया गया है । कि ब्रह्मा, विष्णु आदि की आयु के अवश्य किया गया है, किन्तु प्रस्तुत इस अध्याय के प्रथम मन्त्र में तथा अन्यत्र ( पृ ० १३१, १५२, १५८, १७६, १८१, १८३-१८४, १ ९ ८, २०३, २३० ) भी दयानन्दीय मत की समक्षा में उनके व्याकरण विषयक निष्कर्षों की ओर उनके समर्थन में दी गई पं ० ब्रह्मदत्त जिज्ञासु को टिप्पणियों की समीक्षा को गई है । स्वामी दयानन्द का भाष्य शतपथ ब्राह्मण के विपरीत ही अर्थ प्रस्तुत करता है, इसकी भी अनेक स्थलों पर चर्चा है । आठवें मन्त्र में त्रिशद्धाम पद के अर्थ की समीक्षा है । नवें मन्त्र में दयानन्दीय अर्थ की समीक्षा कर शतपथ के प्रमाण से वस्तुस्थिति को स्पष्ट किया गया है । १५ वें मन्त्र में अध्वर और यज्ञ शब्द के इनके द्वारा किये गये अर्थ की समीक्षा की गई है । ४७ वें मन्त्र की व्याख्या में बताया गया है कि स्वामी दयानन्द इस मन्त्र में उत्क्षेपण आदि कर्मों का वर्णन बताते हैं, किन्तु उनका यह कथन सही नहीं है, क्योंकि यह तो वरुणप्रघास नामक अनुष्ठान का मन्त्र है । इसी तरह से ६२ वें मन्त्र में स्वामी दयानन्द के द्वारा ' जमदग्नि ' पद की व्याख्या के प्रसंग में उपस्थापित प्रमाणों की विस्तार से सप्रमाण समीक्षा की गई है । चतुर्थं व पंचम अध्याय चतुर्थ अध्याय से प्रारम्भ कर ११ अष्टम अध्याय की ३२ वीं कण्डिका तक अग्निष्टोम याग के मन्त्र हैं । इनमें से चतुर्थं अध्याय में यजमान के संस्कार के साथ सोम के क्रय करने तक के मन्त्र हैं । भाष्यकार ने प्रथम मन्त्र के प्रारम्भ में सोमयाग की प्रक्रिया को दिखाया है । इस याग को सम्पन्न करने की दो पद्धतियाँ हैं । एक तो यह कि जो सोम याग करना चाहता है, वह वसन्त ऋतु में अग्न्याधान के बाद पहले सोम याग करे और तब दर्शपूर्णमास का अनुष्ठान करे | दूसरा पक्ष यह है कि अग्न्याधान के बाद पहले दर्शपूर्णमास का अनुष्ठान करे, तदुपरान्त सोम याग सम्पन्न करे । आजकल सोमलता उपलब्ध नहीं होती, अतः उसके स्थान पर पूतीका लता में ही सोमलता के सारे संस्कार किये जाते हैं । यद्यपि यह यज्ञ एक दिन में ही पूरा हो जाता है, तो भो अपने अंगभूत अनुष्ठानों के साथ इसके पूरा होने में पाँच दिन लगते हैं । सोलह ऋत्विजों के द्वारा यह अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता है । अध्वर्यु, प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा और उन्नेता नामक चार ऋत्विक् अध्वर्युगण के अन्तर्गत आते हैं । ब्रह्मा, ब्राह्मणाच्छंसी, आनी और पोता का ब्रह्मगण में; होता, मैत्रावरुण, अच्छावाक और ग्रावस्तुत् का होतृगण में और उद्गाता, प्रस्तोता, प्रतिहर्ता एवं सुब्रह्मण्य का उद्गातृगण में समावेश माना जाता है । गाय के रूप में जितनी दक्षिणा दी जाती हैं, उनका समान रूप से चार भाग कर दिया जाता है और एक - एक गण को एक - एक भाग दिया जाता है । इस एक भाग को पुनः विभक्त कर दिया जाता है । इनमें से अध्वर्यु का आधा भाग प्रतिप्रस्थाता, का तीसरा भाग नेष्टा का और चतुर्थं भाग १०. आयुर्वेद और तन्त्रशास्त्र से संबद्ध ' आनन्दकन्द ' नामक ग्रन्थ तंजोर सरस्वती महल सिरीज संख्या १५ में सन् १ ९ ५२ में प्रकाशित हुआ । इसी नाम का एक चम्पू ग्रन्थ भी सरस्वती भवन ग्रन्थमाला, वाराणसी संख्या ३६ में सन् १ ९ ३१ में प्रकाशित है । ११. यहाँ मन्त्रार्थं में गलती से " चौथे अध्याय में ३२ वीं कण्डिका तक " लिख दिया गया है ।
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( २७ ) तृतीयिनः उन्नेता का होता है । अन्य तीनों गणों में भी यही क्रम लागू होता है । इसीलिये इनको क्रमश: अधिनः गया है । और पादिनः कहते हैं । कात्यायनयज्ञपद्धति विमर्श ( पृ ० १२-१३ ) में इस विषय को उदाहरण के साथ समझाया से किया जाता इस यज्ञ के अनुष्ठान में तीनों वेदों का सहयोग रहता है । अग्निहोत्र का अनुष्ठान केवल केवल यजुर्वेद यजुर्वेद से करते हैं । है । दर्शपूर्णमास आदि इष्टियों का अनुष्ठान कुछ लोग ऋग्वेद और यजुर्वेद से तथा अन्य के अनुष्ठान वेदत्रय-पशुयाग का अनुष्ठान सभी कोई ऋग्वेद और यजुर्वेद से करते हैं । सोम याग तथा अन्य इसी तरह हौत्र के अनुष्ठान में होतृगण, साम के अनुष्ठान में उद्गातृगण साध्य हैं । याजुष कर्म के अनुष्ठान के लिये अध्वर्युगण, जाता है । और तीनों गणों के द्वारा अनुष्ठीयमान कर्मों का पर्यवेक्षण करने के लिये ब्रह्मगण का नियोजन किया इतना सब बता देने के बाद अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, अतिरात्र और ज्योतिष्टोम का स्वरूप बता कर प्रस्तुत से अभिहित होते भाष्य में कहा गया है कि त्रिवृत्, पंचदश सप्तदश और एकविंश नामक चार स्तोम ' ज्योति ' पद करते हुए यहाँ है । आगे बताया गया है कि सोम याग अन्य सभी यागों की प्रकृति है । इसकी प्रक्रिया का निरूपण निरूपण कर ( पृ ० २ ) महावीर संभरण, व्रतभक्षण, प्रवर्ग्यानुष्ठान, सुत्यादिवसीय अनुष्ठान, महाभिषव आदि का विस्तार से बताया गया है कि यज्ञशाला निर्माण आदि की प्रक्रिया शतपथ ब्राह्मण के तृतीय काण्ड के प्रथम अध्याय में कही गई है । से शतपथ ब्राह्मण में निर्दिष्ट विनियोग ही कात्यायन श्रौतसूत्र में निर्दिष्ट हैं | माध्यन्दिन संहिता के चतुर्थ अध्याय षष्ठ अध्याय तक के मन्त्रों का विनियोग शतपथ ब्राह्मण के तृतीय काण्ड में तथा कात्यायन श्रौतसूत्र के ७ - ९ अध्यायों में वर्णित है । चतुर्थ अध्याय के भाष्य में मन्त्रार्थ, आध्यात्मिक अर्थ, दयानन्दमतखण्डन और अन्त में शतपथ ब्राह्मण को प्रायः उद्धृत किया गया है । पंचम अध्याय में मन्त्रार्थं के साथ शतपथ अथवा शतपथ के बाद मन्त्रार्थ को देकर आध्यात्मिक अर्थ के बाद ही दयानन्दीय मत की समीक्षा की गई है । शतपथ को प्रारम्भ में प्रायः वहीं उद्धृत किया गया है, जहाँ कि कात्यायनीय विनियोग नहीं मिलता । छठे अध्याय का भी प्रायः यही क्रम है । दयानन्दीय मत का उल्लेख प्रायः यहाँ अन्त में ही किया गया है । कहीं कहीं शतपथ श्रुति की व्याख्या अन्त में दी गई है ( पृ ० १० १ ९ ) । अध्यायों की पष्ठसंख्या इस प्रसंग में हमें यह ध्यान रखना है कि ४-६ अध्यायों वाले इस भाग में ४-५ वं मन्त्र के * ( १-२१५ ) और छठे अध्याय की पृष्ठसंख्या ( १-८२ ) अलग - अलग है । इसी प्रकार चौथे अध्याय जाना के १६ चाहिये । भाष्य का क्रम विपर्यस्त हो गया है । यहाँ ४५ वें पृष्ठ का दूसरा अनुच्छेद पहले अनुच्छेद के रूप में पढा सोमक्रय की प्रक्रिया पर यहाँ ( पृ ० ४८-४९, ७८-८० ) विशेष प्रकाश डाला गया है । अनेक मन्त्रों की को उद्धृत व्याख्या के प्रसंग में ( पृ ० १६-१७, ६४, ७२, ९ ३, १५२, १७१ ) सायण और उन्बट - महीधर गया के है भाष्य ( पृ ० ६५ ) । किया गया है और ' अवैयाकरणेन महीधरेण ' कह कर उस पर किये गये आक्षेपों का परिहार किया में दिये गये यहीं ( पृ ० ६७ ) माध्यन्दिन संहिता ( ४ | २४ ) के ' छन्दोनामानाम् ' पाठ के स्थान पर काण्वसंहिता ० ) ' छन्दोमानानाम् ' पाठ की भी व्याख्या की गई है । यहाँ अनेक स्थलों पर ( पृ ० ११, ३ दिया ९, ४२ गया , ४७ है,, ८८ दयानन्दीय , ९ दिखाया गया है कि शतपथ ब्राह्मण में भी हमारे सिद्धान्त - संमत अर्थ को ही समर्थन अर्थ को नहीं । ) प्रारम्भ से स्वामी दयानन्द के मत की यहाँ विशेष समीक्षा की गई है । पृ ० ५८ के ( पूर्वोक्तानां के चतुर्णां अन्त में पृ ० ६३ ६० वें पृष्ठ के ( शतपथादिविरुद्धश्चायमर्थः ) अन्त तक की यह पूरी सामग्री २२ वें मन्त्र की व्याख्या पर होनी चाहिये थी, क्योंकि तभी ' चतुर्णां मन्त्राणां ' ( ४।१ ९ - २२ ) पदों की सार्थकता होगी । यहाँ एक साथ चार मन्त्रों के दयानन्दीय अर्थ की आलोचना की गई है । पृ ० १०५ पर कहा गया है कि पद और पदार्थ का जिसको बोध
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( २८ ) नहीं है, वही इस तरह का अर्थ कर सकता है । अर्थ करते समय स्थान - स्थान पर लड़खड़ाते हुए भी ये महानुभाव उन्ट, सायण, महीधर जैसे प्राचीन आचार्यों की गलत समीक्षा करने में लज्जा का अनुभव नहीं करते । पृ ० १२१-१२२ पर भी इसी तरह महीधर पर किये गये इनके गलत आक्षेप का समाधान किया गया है । वहाँ स्पष्ट किया गया है कि वैदिक छन्दों के निर्णय में प्रातिशाख्य अथवा पिंगल के छन्दः शास्त्र को कोई भी सहृदय विद्वान् अप्रमाण नहीं मान सकता । पृ ० १२५ पर महीधर को पुनः अवैयाकरण कह कर किये गये आक्षेप का समाधान दिया गया है । पृ ० १२७ पर बताया गया है कि स्वामी दयानन्द श्रौत प्रक्रिया से पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं । पृ ० १२७-१२८ पर स्वामी दयानन्द और पं ० ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के अलंकार संबन्धी आक्षेपों का समाधान करते हुए कहाँ गया है कि अलंकार शब्द का नाम सुनकर पामर जन ही आकृष्ट हो सकते हैं, विद्वज्जन नहीं । स्वामी दयानन्द और पं ० ब्रह्मदत्त जिज्ञासु का यह सारा आडम्बर केवल सामान्य लोगों को बहकाने के लिये है । पृ ० १३१ पर स्वामी दयानन्द ने पदकार के प्रमाण से महीधर के मत का खण्डन किया है । इस आक्षेप का यहाँ समाधान किया गया है और बताया गया है कि शतपथ ब्राह्मण के विपरीत होने से दयानन्दीय अर्थ ही अशुद्ध है । पृ ० १४३ पर दिखाया गया है कि स्वामी दयानन्द की व्याख्या चार्वाक मत के बहुत पास है और स्वर्ग आदि लोकों के प्रसग में दिव्य भोगों की प्राप्ति के विज्ञान की बात करना व्यर्थं का घटाटोप मात्र है । ' न विधौ परः शब्दार्थः ' शाबर-भाष्य के इस वचन का भी यहाँ पदे पदे विरोध दिखाई पड़ता है । पृ ० १४ ९ पर इनके मत की समीक्षा करते हुये ' पठकाः पाठकाश्चैव ' यह नीति श्लोक उद्धृत किया गया है और बताया गया है कि दयानन्दीय व्याख्यान में इस नीति वाक्य का ही नहीं, शतपथ वचन का भी विरोध स्पष्ट है | श्लोक का अभिप्राय यह है कि पढ़ने वाले, पढ़ाने वाले और शास्त्र - चिन्ता में लगे हुए सभी व्यक्ति मूर्ख हैं, केवल क्रियावान्, अर्थात् अभ्यास में लगा हुआ व्यक्ति ही पण्डित है, वह किसी भी बात के रहस्य को जान सकता है । इसका आशय यह है कि स्वामी दयानन्द को व्याख्या ऐसे स्थलों पर केवल वाग्जाल को फैलाने वाली है । वे उसके वास्तविक स्वरूप से अनभिज्ञ हैं । पृ ० १५५ पर महीधर के लिये ' प्रबुक्कति ' क्रिया का प्रयोग किया गया है । इसके उत्तर में उनके इस आक्षेप को घट आदि कार्य के पूर्ववर्ती पंचम अन्यथासिद्ध का रेंगना मात्र कहा गया है । पृ ० १६५ पर दयानन्दीय अर्थ के विषय में कहा गया है कि यहाँ का अर्थ हमारे सिद्धान्त के बहुत विपरीत नहीं है, किन्तु इसका वास्तविक अभिप्राय त्रिविक्रमा-तर निरूपण में ही है । पृ ० १७२ १७३ में स्वामी दयानन्द २३ वें मन्त्र की व्याख्या करते हुए यहाँ भू - गर्भं विद्या का उल्लेख मानते हैं, किन्तु मन्त्रगत एक वाक्य से ही जब उनका अभीष्ट सिद्ध हो सकता है, तब यहाँ चार वाक्य क्यों दिये गये, इस प्रश्न का उनके पास कोई समाधान नहीं है । सिद्धान्त पक्ष में तो यहाँ चार उपरव ( गर्त ) बनाये जाते हैं, अतः प्रत्येक गर्त के लिये एक - एक मन्त्र को सार्थकता सिद्ध होती है । चौथे अध्याय में सोम संबन्धी सारी प्रक्रिया को बताने के बाद पांचवें अध्याय में ज्योतिष्टोम का प्रकरण प्रारंभ होता है । इस अध्याय के भाष्य में पहले मन्त्रार्थं, तब शतपथ वचनों की व्याख्या एवं आध्यात्मिक अर्थ और अन्त में दयानन्दीय अर्थ दिया गया है । कहीं - कहीं शतपथ वचन को उद्धृत करने के बाद मन्त्रार्थ निर्दिष्ट है । यहाँ प्रारंभ में महीधर भाष्य के आधार पर बताया गया है कि सोम राजा के पाँच अनुचर माने जाते हैं -१. अग्नि, २. सोम, ३. अतिथि, ४. श्येन और ५. रायस्पोषद अग्नि । इनमें से प्रथम चार क्रमशः गायत्री, त्रिष्टुप् जगती और गायत्री छन्दों के अधिष्ठातृ देवता हैं । अन्तिम रायस्पोषद अग्नि सभी छन्दों के अधिष्ठाता माने जाते हैं । इस प्रकार प्रथम और अन्तिम अग्नि का भेद स्पष्ट है । इसी पृष्ठभूमि में यहाँ प्रस्तुत मन्त्र की और पूरे प्रकरण की व्याख्या गई है ।
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( २ ९ ) दूसरे मन्त्र की व्याख्या के प्रसंग ( पृ ० ११५ ) अग्नि- मन्थन संबन्धी छः कर्मों का निरूपण इस प्रकार किया गया है - १. शकल का वेदि पर निधान, २. उसके ऊपर दो कुशों का निधान, ३. उनके ऊपर अधरारणि का निधान, ४. उत्तरारणि में घृत का लेपन, ५. उसको अधरारणि के ऊपर रखना और तब ६. अग्नि- मन्थन । शतपथ ब्राह्मण के अनुसार इसकी पूरी प्रक्रिया कात्यायन श्रौतसूत्र में भी प्रदर्शित है । पृ ० १ ९ १ पर तुथ शब्द के पृ ० १४ ९ पर पोतदारु और गुग्गुलु शब्दों के, पृ ० १६६ पर लस्पूजनी शब्द के, पृ ० १६८ पर उपरव शब्द के, और पृ ० २१२ पर वनस्पति पद के अर्थ पर विशेष विचार किया गया है । पृ ० १६४ पर विष्णु पद का अर्थ हविर्घान नाम का शकट किया गया है । शतपथ ब्राह्मण के प्रमाण से यहाँ १४ वें मन्त्र की व्याख्या में सायणाचार्य के काण्वसंहिता भाष्य को उद्धृत कर बताया गया है कि प्राचीनवंश नाम की शाला में आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि नामक तीन अग्नियों के साथ ऐष्टिक वेदि स्थित रहती है । इस शाला के आगे ३६ पद की सौमिक वेदि का निर्माण किया जाता है । उस वेदि के अग्र भाग में उत्तर वेदि स्थित है । इसके मध्य भाग में हविर्धान नामक मण्डप का निर्माण किया जाता है । इसके बाद सद नाम वाली शाला निर्मित होती है । यहीं प्राचीन शाला के आगे दक्षिण और उत्तर भाग में हविर्धान नाम के दो शकट रखे जाते हैं । इन दोनों शकटों को पूर्वाभिमुख कर इनके छाजन के रूप में हविर्धान नाम का मण्डप बनाया जाता है । सावित्र होम के अनन्तर इन दोनों शकटों को गति दी जाती है । इसी पृष्ठभूमि में यहाँ काण्वशाखीय सायण भाष्य की पद्धति से और उब्वट की रीति से मन्त्र की अलग - अलग व्याख्या की गई है । आगे ( पृ ० १५ ९ ) बताया गया है कि कुछ आचार्यों के मत के अनुसार उत्तरवेदि के पीछे संचरण करते समय तीन डगों को छोड़कर जिस देश में शकटों को लाया जाता है, वही हविर्धानों की मात्रा, अर्थात् रखने की जगह मानी जाती है । सिद्धान्त पक्ष में यह नियम स्वीकार नहीं है, किन्तु अपनी इच्छा के अनुसार इन्हें कहीं भी रखा जा सकता है । यह बात अवश्य है कि उन्हें बहुत दूर नहीं ले जाना चाहिये । शतपथ ब्राह्मण ( ३ / ५ / ३ / १ ९ ) में और कात्यायन श्रौतसूत्र ( ८ । ४ । ५ ) में इसी मत को स्वीकार किया गया है । कात्यायन श्रौतसूत्र में प्रदर्शित सारे विनियोग शतपथ ब्राह्मण का ही अनुसरण करते हैं, यह बात अनेक स्थलों पर स्पष्ट कर दी गयी है । यहाँ पृ ० १८१ पर इसी विषय का स्मरण कराया गया है । • षष्ठ अध्याय षष्ठ अध्याय की पृष्ठसंख्या अलग है, यह ऊपर बताया जा चुका है । यहाँ प्रारम्भ में ही बताया गया है कि सौमिक वेदिप्रधान पंचम अध्याय में आतिथ्येष्टि से लेकर यूपनिर्माण तक के मन्त्र प्रदर्शित हैं । अग्नीषोमीय पशुप्रधान षष्ठ अध्याय में यूप के संस्कार से लेकर सोमाभिषव के लिये उद्योग करने तक के मन्त्र दिये जाते हैं । इस प्रकरण के मन्त्रों की व्याख्या पहले जैसी औदुम्बर पात्र के संस्कार के प्रसंग में की गई है, वैसी ही यहाँ यूपसंस्कार के प्रकरण की भी की जाती है । इस अध्याय में पहले कात्यायनीय विनियोग को देकर मन्त्रों की व्याख्या की गई है और दयानन्दीय मत की समीक्षा प्रायः अन्त में दी गई है । कुछ स्थलों पर कात्यायनीय विनियोग स्पष्ट उपलब्ध नहीं है । ऐसे स्थलों पर पहले शतपथ श्रुति को उद्धृत किया गया है ( पृ ० ३८, ६६, ६८, ७ ९, ८१ ) । शतपथी श्रुति कहीं कहीं ( पृ ० १०, १ ९ ) दयानन्द के मत के बाद भी उद्धृत है । भू०-५