वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 31–40

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 31–40

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( ३०; कुछ स्थलों पर दयानन्दीय मत की विशेष समीक्षा की गई है । जैसे कि पृ ० २ पर बताया गया है कि ऐसी व्याख्या किसी भी प्राचीन आचार्य ने नहीं की है । सायण आदि के व्याख्यान स्वयं अपने में स्वतन्त्र न होकर श्रुति सूत्र मूलक हैं । इसीलिये वे उपादेय और विश्वसनीय हैं । पृ ० ७ पर दयानन्दीय व्याख्या को मनोराज्यमात्र, अर्थात् मन-गढन्त माना है, क्योंकि यह पूरी तरह से केवल स्वामी दयानन्द की स्वच्छन्द कल्पनाशक्ति पर आधृत है, उसको कहीं से भी किसी शास्त्र का समर्थन नहीं मिलता । पृ ० ११ पर सायण प्रोक्त पदव्युत्पत्ति का ये खण्डन करते हैं । भाष्यकार ने यहाँ संक्षेप में इसका समाधान दिया है । ७ वें मन्त्र की व्याख्या में स्वामी दयानन्द ने त्वष्टा शब्द का ' दुःख का नाश करने वाला सभापति ' अर्थ किया है । यहाँ ( पृ ० १७ - १८ ) शतपथ का विस्तृत उद्धरण देकर इस Hi frie रण किया गया है । भारतीय वाङ्मय में स्वष्टा एक देवताविशेष के रूप में प्रसिद्ध हैं । पृ ० ४१ पर कहा गया है कि सायण आदि के व्याख्यान श्रुतियों और सूत्र ग्रन्थों से प्रमाणित हैं । ऐसा किसी शास्त्र का समर्थन दयानन्दीय व्याख्यान को नहीं मिलता । पृ ० ६० पर भी दयानन्दीय व्याख्यान के लिये पुनः कहा गया है कि इस तरह के व्याख्यान को यास्क, जैमिनि, व्यास, कात्यायन आदि आचार्यों का समर्थन नहीं मिला है । पृ ० २ पर यूप के प्रथम शकल स्वरु और चषाल नामक तीन नेताओं का उल्लेख कर इसका अलग - अलग विनियोग दिखाया गया है । पृ ० १२ पर सूचित किया गया है कि देवता मनुष्यों के मित्र हैं, इस बात को भूमिका भाग में ही सिद्ध कर दिया गया है । पृ ० १४ पर अग्नीषोमीय यूप के प्रसंग में शतपथ ब्राह्मण के प्रमाण से यूपैकादशिनी पक्ष का निरूपण किया गया है । पृ ० २२ पर जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य की रचना दक्षिणामूर्तिस्तोत्र के प्रथम

श्लोक का स्मरण किया गया है । पृ ० २४ पर एकादश प्राणों का और पाँच स्मात भूसंस्कारों का उल्लेख है ।

पृ ० ४६ पर काण्वसंहिता के भाष्य में सायण द्वारा प्रदर्शित विधि से गुदकाण्ड की एकादश आहुतियों का और उनके मन्त्रों का निरूपण कर कहा गया है कि ये आहुतियाँ प्रतिप्रस्थाता द्वारा दी जाती हैं । पृ ० ५१-५५, ६४-६५ और ६८ पर वसतीवरी, पृ ० ६४, ६८ पर एकधन, पृ ० ६४ पर पान्नेजन और पृ ० ६५, ६ ९, ७६ पर निग्राम्या नामक जलों का उल्लेख कर इनकी व्युत्पत्तियाँ दो गई हैं और इनका स्वरूप एवं प्रयोजन भी निर्दिष्ट है । पृ ० ६१ पर आख्यायिका के रूप में गन्धर्वो की विशेष प्रकृति का प्रदर्शन किया गया है । यहाँ पहले उल्लेख किया जा चुका है कि कुछ मन्त्र निदानवान् होते हैं, अर्थात् उनमें निदान का, किसी आख्यायिका का प्रतीक रूप में उल्लेख मिलता है । ऐसे निदानवान् मन्त्रों की व्याख्या, बिना उस प्रासंगिक आख्यायिका को उद्धृत किये संभव नहीं हो पाती । इन निदान कथाओं का उल्लेख हमें शतपथ ब्राह्मण आदि में मिलता है । ऐसा ही एक प्रसंग यहाँ ३३ वें मन्त्र में आया है और भाष्यकार ने शतपथ में वर्णित आख्यायिका का स्वरूप बताने के उपरान्त ही इस मन्त्र की व्याख्या की है । भाष्यकार ने अनेक स्थलों पर ( पृ ० ३, १२, १६, २०, ४०, ४ ९, ५६ ) सायण के और उन्त्रट - महीधर ( पृ ० ३१, ३५ ) के भाष्यों को उद्धृत कर अपने व्याख्यान को पुष्ट किया है, उनके व्याख्यान के अनुसार अर्थान्तर को दिखाया है अथवा उनकी सहायता से दयानन्दीय अर्थ का खण्डन किया है । पृ ० ३१ पर शतपथीय सायणभाष्य, काण्वसंहिता सायणभाष्य और उब्वट - महीधर के भाष्यों की समीक्षा कर बताया गया है कि शतपथ व्याख्यान में शोधक के प्रमाद से त्रुटि आ गई है । कुछ इसी तरह का प्रसंग पृ ० ४० पर भी मिलता है । यहाँ सूत्रभाष्यकार आदि के द्वारा की गई विभिन्न व्याख्याओं का उल्लेख किया गया है । आध्यात्मिक अर्थ का निरूपण करते समय ८ वें मन्त्र की व्याख्या में बताया गया है कि जैसे शेषनाग भगवान् के लिये स्वयं अपने को शय्या, सिंहासन, छत्र, पादुका आदि के रूप में प्रस्तुत कर देते हैं, उसी तरह से भक्तगण भी

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( ३१ ) अर्थ एक साथ दिया अपने को सर्वतोभावेन भगवान् के प्रति समर्पित करते हैं । नवें और दसवें मन्त्र का आध्यात्मिक आध्यात्मिक अर्थ एक साथ दे गया है । अन्य कई जगहों पर भी ऐसा हुआ है कि दो या दो से अधिक मन्त्रों का अनुसरण किया गया है । दिया गया हो । दयानन्दीय मत को उपस्थापित करते हुए भी कहीं कही इसी पद्धति से २० का वें मन्त्र में भी आध्यात्मिक जैसा कि यहीं दयानन्दीय अर्थ भी दो मन्त्रों का एक साथ दिया गया है । इसी तरह मन्त्रों का ( ४।१ ९ -२२ ) और दयानन्वीय अर्थं दो मन्त्रों का एक साथ दिया गया है । चतुर्थ अध्याय में तो चार देवयान दयानन्दीय अर्थं एक साथ दिया हुआ है । २० मन्त्र में पुराणों और उपनिषदों का उल्लेख कर साधक के विज्ञानाधिष्ठात्री दस महाविद्याओं की और द्वादश ऊपर यह बताया ही जा चुका है कि आध्यात्मिक सकता है । अतः यहाँ कुछ विशेष विषयों की ही मार्ग से दिव्य लोकों में जाने की बात कही गई है । २६ वें मन्त्र में ज्योतिर्लिंगों की भक्तों के द्वारा की जाने वाली आराधना का वर्णन है । अर्थ और दयानन्दीय अर्थ को भाष्यसार की सहायता से जाना जा चर्चा की गई है । छठे अध्याय में अनेक पारिभाषिक अथवा वैदिक शब्दों के संकलन कर रहे हैं और इनका भाष्य प्रदर्शित अर्थं टिप्पणी में रज्जु, व्याम, स्वरु, उपशय, पान्नेजन, चरित्र, वर्षाा, स्तोक, ऊष्म, शब्दों के अर्थों की भी यथास्थान चर्चा आ चुकी है । से अर्थ दिये गये हैं । यहाँ हम उनका पृष्ठानुक्रम संगृहीत किया जा रहा है । वे शब्द ये हैं —१२ मधु, उपवसथ, पुरोरुच, उपांशुसवन और पवि । अन्य सप्तम से दशम अध्याय मन्त्रार्थ, मन्त्रार्थ के समर्थन में शतपथ सात से दस अध्याय तक के इस चौथे भाग में प्रायः सर्वत्र सर्वप्रथम समीक्षा की गई और अन्त में स्वामी दयानन्द के अर्थ की ब्राह्मण का उद्धरण और व्याख्यान तब आध्यात्मिक अर्थ व्यत्यास हुआ है, उसका यथास्थान उल्लेख है । इस पूरे भाष्य का प्रधान क्रम भी यही है । जहाँ कहीं इस क्रम में के ३५ वे मन्त्र से अध्याय की समाप्ति तक कर दिया गया है । सातवें अध्याय के ३४ वें मन्त्र तक प्रातः सवन माध्यन्दिनवन के और आठवें अध्याय में सायंसवन के मन्त्र हैं । चतुर्थ अध्याय के प्रारम्भ में हो यह बताया जा चुका है । इसी प्रसंग में छठे अध्याय में यूप है कि अष्टम अध्याय की ३२ वीं कण्डिका तक अग्निष्टोम याग का विधान मधु ' ( ० १४/५/५1१ ) १२. “ सर्व वा इदं मधु यदिदं किञ्चेति सर्वस्य मधुरूपत्वमुच्यते । ' इयं वै पृथिवी सर्वेषां व्यामत्रयप्रमाणा कौशी इति मधुब्राह्मणेन सर्वं सर्वस्योपकारकत्वेन मोदकत्वान्मधूयते ' ( पृ ० ४ ), ' ) त्रिगुणिता , ' यूपनिर्माणोपक्रमे कुठाराघातेन रशना रज्जु ' ( पृ ० ११ ) ' प्रसारितभुजयोरन्तरालं व्यामः ' ( पृ ० १ ' ( पृ ० १२ ), ' पादी प्रथमच्छिन्नकाष्ठशकलं स्वरुपदवाच्यं भवति ' ( पृ ० १२ ), ' वितष्टो यूप उपशय इत्युच्यते चरण - ( गमन ) साधन-निज्येते अनेनेति पान्नेजनो मुखाद्यवयवशोधनार्थो जलकलश: ' ( पृ ० २७ ), ' चरित्रान् ३४ ), ' वपाया उपरि आज्याभि-भूतान् पादान् ' ( पृ ० ३० ), ' उदरदेशेऽवस्थितो वपाख्यो मांसविशेष: ' ( पृ ० पृ ० ४० ), ' उपवसन्त्यासु घारणकाले पतिता बिन्दवः स्तोकाः ' ( पृ ० ३५ ), ऊष्मशब्दोऽप्यन्तरिक्षपर: ' ( पुरस्ताद् वसतीवरीषु देवा अस्मिन् काले इत्युपवसथः, उपवासकाल इत्यर्थः ' ( पृ ० ५२ ), ' पुरो याज्यानुवाक्याभ्यां उपांशुसवनसंज्ञको रुचिमिच्छां जनयन्ति देवताया इति पुरोरुचः ' ( पृ ० ६५ ), ' यो ग्रावाऽध्वर्युणा गृहीतः स विवस्वत्संज्ञक आदित्य भवति ' ( पृ ० ६८ ), ' उपांशुग्रहार्थं सोमोऽभिषूयते येन स उपांशुसवनः पाषाणो निदानेन सोमः ' ( पृ ० ६ ९ ), एव ' ( पृ ० ७२ ), ' पविशब्दस्य वज्रेऽर्थे प्रसिद्धत्वात् अथवा पविवद् बलवत्त्वात् पविः इति ' स सोमस्तायमानः संजायते यत्परम्परया आहुतिभावं गच्छन् जायते पुनः पुनः संभवति, अतो यन् जायत यञ्जः । अतो वस्तुतो यञ्ज इति तस्य नाम, तद् यज्ञ इति परोक्षेण व्यवहरन्ति ' ( पृ ० ८१ ) ।

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( ३२ ) संस्कार से लेकर सोमाभिषव पर्यन्त कार्यकलाप के सम्पादक मन्त्रों का विधान किया गया है । अब सातवें अध्याय में ग्रहों के ग्रहण में विनियुक्त मन्त्रों का वर्णन है । सोम याग में दो प्रकार के ग्रह होते हैं -- धाराग्रह और अधाराग्रह । इनका लक्षण भाष्य ( पृ ० १ ) में दिया गया है । ग्रह का अर्थ यहाँ दारुमय पात्र है, जिसमें 13 सोमरस का ग्रहण किया जाता है । शतपथ ब्राह्मण को उद्धृत कर यहाँ ( पृ ० ३ ) बताया गया है कि प्रातःसवन में ही माध्यन्दिनसवन और सायंसवन का भी समावेश हो सकता है, अर्थात् जैसा त्रिकाल सन्ध्या का अनुष्ठान वैकल्पिक रूप से प्रातः सन्ध्या के साथ किया जा सकता है, उसी तरह से इन तीनों सवनों का अनुष्ठान भी प्रातःसवन के साथ ही सम्पन्न हो सकता है । यह गौण पक्ष है । मुख्य पक्ष में तो काल को ही प्रधानता दी जाती है । यह सवनत्रयात्मक कर्म ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के, अर्थात् तीनों वेदों के मन्त्रों से सम्पन्न होता है । सोम याग सोमलता के रस से सम्पन्न होता है और सोमलता के उपलब्ध न होने से उसके स्थान पर किया जाता है । यह बात चतुथं अध्याय में ही बताई जा चुकी है । सुश्रुत आदि यहाँ बताया गया है कि शुक्ल प्रतिपत् से लेकर पूर्णिमा पर्यन्त चन्द्रकला की वृद्धि के कृष्ण प्रतिपद् से लेकर अमावस्या पर्यन्त सोमकला के ह्रास के आजकल पूतीका लता का ग्रहण आयुर्वेद के ग्रन्थों के आधार पर साथ इस लता के भी पत्रों की वृद्धि होती है और साथ इसके पत्ते भी एक - एक कर झड़ जाते हैं । यहाँ स्थान - स्थान पर मन्त्रार्थ के प्रसंग में उब्वट, महीघर, सायण, भट्ट भास्कर आदि आचार्यों का, यास्क के निरुक्त का तथा अनुष्ठान की पद्धति के प्रसंग में कर्क, देवयाज्ञिक, अनन्त आदि कात्यायन श्रौतसूत्र के व्याख्याकारों का, तथा वृत्तिकार का भी मत दिया गया है । तैत्तिरीय संहिता और आपस्तम्ब श्रोतसूत्र का भी यथास्थान उल्लेख मिलता है । शतपथ ब्राह्मण की व्याख्या करते समय प्राचीन भाष्यकार हरिस्वामी का और सायण के द्वारा निदर्शित अन्य मतों का भी उल्लेख करने से भाष्यकार कहीं चूके नहीं हैं । ऋजीष शब्द का यहाँ अनेक स्थलों पर प्रयोग हुआ है । सोमलता से रस निकाल लेने के बाद जो सिट्टी बची रहती है, उसे ही ' ऋजीष ' कहते हैं ( पृ ० १६८ ) । महार्थ-मंजरी की परिमल व्याख्या ( पृ ० १२३ ) में एक श्लोक मिलता है-पुण्ड्र क्षोरिव मन्त्रस्य माधुर्ये हृदयस्पृशि । ऋजीषमानने तिष्ठत्यक्षरोच्चारलक्षणम् ॥ यहाँ गन्ने के रस को घूस लेने के बाद मुँह में बची उसकी सिट्टी के लिये यह शब्द प्रयुक्त हुआ है । हम कह सकते हैं । कि किसी भी रसदार वस्तु के रस को निकाल लेने के बाद बची हुई सिट्टी के लिये इस शब्द का प्रयोग किया जा सकता है । ऋजीष शब्द का अर्थं भस्म करना हमारी समझ में उचित नहीं है । यह लिपिकार का प्रमाद लगता है ( पृ ० १६५ ) । छठे मन्त्र के भाष्य में उद्धृत शतपथ वचन में चरकशाखीय मत की निन्दा की गई है । इस प्रसंग में भाष्यकार ने बताया है कि मीमांसा के एक न्याय के अनुसार ऐसे वाक्यों का किसी पक्ष की निन्दा करने में तात्पर्य न होकर अपने पक्ष की प्रशंसा में उनका विनियोग किया जाता है । यहाँ के कुछ मन्त्रों का अर्थ शतपथ ब्राह्मण के विस्तृत उद्धरणों के आधार पर किया गया है । इस बात को भी यहाँ स्पष्ट कर दिया गया है कि इस प्रकरण में ग्रह शब्द से सर्वत्र सोमरस से भरे हुए पात्र गृहीत होते हैं । यहीं प्रसंगवश वाणी की परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी नामक चार अवस्थाओं की भी चर्चा है । १३. “ गृह्यतेऽनेनेति व्युत्पत्त्या ग्रहो दारुमयं पात्रमंशुनामकम् " ( पृ ० २ ) ।

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( ३३ ) नवें मन्त्र के भाष्य में तैत्तिरीय संहिता को उद्धृत करते हुए आध्यात्मिक और आधिभौतिक के भेद से मैत्रावरुण देवता की द्विविध सत्ता की व्याख्या की गई है । १० वें मन्त्र में १४ पण शब्द का अर्थ बताया गया है । ११ वें मन्त्र में शतपथ के प्रमाण से आश्विन पात्र को यज्ञ का श्रोत्र कहा गया है । अगले मन्त्र में महीधर के पक्ष को उद्धृत कर कहा गया है कि यहाँ उन्होंने उब्वट और सायण के अर्थ को भी प्रस्तुत किया है । इस अध्याय के १४ वें मन्त्र में संस्कृति शब्द प्रयुक्त है । आजकल यह फैशन चल पड़ा है कि प्राचीन भारतीय साहित्य में संस्कृति शब्द कहीं प्रयुक्त ही नहीं हुआ है । ऐसे महानुभावों को प्रस्तुत मन्त्र का अध्ययन करना चाहिये । १५ वें मन्त्र में शतपथीय सायण भाष्य और उब्वट भाष्य के अनुसार " होत्रा शब्द का अर्थ बताया गया है । - वें मन्त्र में शतपथ ब्राह्मण, तैत्तिरीय संहिता और सूर्यसिद्धान्त के प्रमाण से ग्रहों की गति पर संक्षिप्त विचार किया गया है । १ ९ -२० मन्त्रों की व्याख्या एक साथ की गई है । यहाँ सोमरस की दो धाराएँ दी जाती हैं । इसकी पद्धति यहाँ कात्यायन श्रौतसूत्र के कर्क भाष्य की पद्धति से बताई गई है । इन्हीं मन्त्रों के भाष्य में ' अन्ये ' पद से किसी आचार्य के मत का उल्लेख कर उसकी समीक्षा की गई है और प्रमाणस्वरूप सायणाचार्य का मत भी प्रस्तुत किया गया है । २१ वें मन्त्र में भी शतपथ के आधार पर अन्य शाखाकारों के मत का उल्लेख है । यहीं १६ ब्रह्मवर्चस् पद का अर्थ भी दिया गया है । ऋक्, प्रगीत आदि पदों का मत उद्धृत है । पृ ० ७० पर बताया गया है कि शतपथ में अनुसार ३७ से ४० संख्या तक के अर्थ दिया गया है और ४६ वें २२ वें मन्त्र में शतपथ ब्राह्मण, ताण्ड्य महाब्राह्मण और जैमिनि सूत्र के प्रमाण से विश्लेषण किया गया है । २३ वें मन्त्र में शतपथ के प्रमाण से चरकाध्वर्यु शाखा का विश्वानर पद की व्युत्पत्ति वैयाकरणों के लिये अवलोकनाहं है । ३५ वें मन्त्र के भाष्य में बड़े समारोह के साथ इस मन्त्र का विस्तृत व्याख्यान किया गया है । कात्यायन के चार मन्त्रों की संज्ञा वाचस्तोम है | ४१ वें मन्त्र में १७ दक्षिणाहोम पद का मन्त्र में शतपथ की व्याख्या के प्रसंग में हिरण्य को आयु तथा जल को १ वज्र बताया गया है । शतपथ ब्राह्मण के प्रमाण से इस अध्याय में पांच आख्यायिकाओं का उल्लेख है । पहली आख्यायिका ( पृ ० सवनों ३-४ के ) उपग्रह की सवनत्रयात्मकता के प्रसंग में असुरों और राक्षसों की कथा बताई गई है कि उन्होंने तीनों के स्थान पर केवल प्रातः सवन को ही क्यों मान्यता दी । दूसरी आख्यायिका मित्र देवता से संबद्ध है ( पृ ० २ ९ ) । वृत्रासुर वध के प्रसंग में मित्र देवता सबका मित्र होते हुए भी यज्ञ में अपना भाग पाने के लिये इस अमित्र कार्य में देवताओं का साथ देते हैं । तीसरी आख्यायिका ( पृ ० ३१ ३२ ) अश्विनीकुमारों से संबद्ध है । कुरुक्षेत्र में यज्ञ करते समय देवगण मनुष्य लोक से संबद्ध होने और वैद्य होने के कारण भी अश्विनीकुमारों को हैवि का अधिकारी नहीं मानते । अश्विनी-कुमारों ने देवताओं के यज्ञ को शिरोविहीन कर दिया और बाद में देवताओं के आग्रह पर यज्ञ के शिर का पुनः सन्धान किया | यहाँ बताया गया है कि प्रवर्ग्य ब्राह्मण में इस कथा को विस्तार से बताया गया है । इस कथा की चर्चा नवाध्यायी ( ३१-३९ ) भाष्य निष्कर्ष ( पृ ० १३-१४ ) में विस्तार से की जा चुकी है । इसी प्रसंग में यहाँ १४. “ श्रपणं च द्रव्यान्तरसंसर्ग: " ( पृ ० २८ ) । १५. " उब्वटादिरीत्या होत्राशब्देन होत्रिकयाज्या च्छन्दोऽभिमानिन्यो देवता विवक्षिताः । शतपथीयसायणभाष्यरीत्या मैत्रावरुणो ब्राह्मणाच्छंसी पोता नेष्टा आग्नीध्रव होत्रा पदव्यपदेश्याः " ( पृ ० ४५ ) । १६. " वृत्तस्याध्ययनस्य समृद्धिर्ब्रह्मवर्चसं भवति ” ( पृ ० ६० ) । १७. ' दक्षिणाप्रयोजको होमो दक्षिणाहोम " ( पृ ० १०५ ) । १८. " आयुहि हिरण्यमिति प्रसिद्धम् । वज्रो वा आप: " ( पृ ० ११५ ) ।

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( ३४ ) ( पृ ० ३२ ) यह भी बताया गया है कि अथर्ववेदीय दध्यङ् ऋषि ने इनको मधुविद्या का उपदेश किया था । पृ ० ३४-३५ पर शण्डामक की आख्यायिका दी गई है । ये दोनों असुरगुरु शुक्राचार्य के शिष्य और पुत्र थे । ये असुरों और राक्षसों की सहायता किया करते थे । देवताओं ने इनको कैसे फंसाया, यही यहाँ वर्णित है । प्रसंगवश यहाँ ( पृ ० ३६ ) मन्त्र-शास्त्र की चर्चा आई है । शण्ड नामक असुरपुरोहित के प्रति प्रयुक्त आभिचारिक यजुमंन्त्र का उल्लेख पृ ० ३४ पर भी मिलता है । आगे पृ ० ९ ४ पर सुकन्या के पिता शर्याति की आख्यायिका दी गई है । दयानन्दीय अर्थ की प्रायः सभी बातें भाष्यसार में आ गई हैं । शतपथ ब्राह्मण का संकेत करते हुए भी ये उसके विपरीत ही अर्थ करते हैं ( पृ ० ११ ), यह बात भी अनेकों स्थलों पर कही जा चुकी है । श्रुति स्मृति - पद्धति का विरोध भी इनके लिये कोई विशेष बात नहीं है । यहाँ कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं कि १६ वें मन्त्र की व्याख्या में ये निरुक्त के दो उद्धरणों को अपने अथ के समर्थन में प्रस्तुत करते हैं, किन्तु भाष्यकार ने यहाँ स्पष्ट कर दिया है कि ये वचन उनके अर्थ का समर्थन किसी प्रकार भी नहीं करते । २५ वें मन्त्र में यम और नियम को अभिन्न मान लिया गया है । योगशास्त्र और संक्षेपशारीरक को उद्धृत करते हुए यहाँ उनके अर्थं की असत्यता सिद्ध कर दी गई । है । ४३ वें मन्त्र ' सुपथा ' पद का अर्थ ' योग मार्ग ' किया गया है, जो कि उचित नहीं है । शास्त्रों में दक्षिणायन और उत्तरायण, इन दो मार्गों का ही उल्लेख मिलता है । योगशास्त्र का अनुयायी भी इन्हीं मार्गों का अनुसरण करता है | अतः योगशास्त्र का योगमार्ग के रूप में अलग से उल्लेख शास्त्रसंमत नहीं माना जा सकता । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र की व्याख्या में स्वामी दयानन्द मनुस्मृति का सहारा लेते हैं । इस पर भाष्यकार का कहना है कि यह बाढ में बहते हुए आदमी के लिये कुशा अथवा काश का सहारा लेने के समान है, अर्थात् यह वचन भी उनके मत को सिद्ध नहीं कर सकता । उव्वट, सायण, महीधर आदि के व्याख्यान तो श्रुति, सूत्र, पद्धति और परम्परा के भी अनुकूल हैं । हम यह पहले ही बता चुके हैं कि २-३ अध्यायों के भाष्यसार में तो उद्धृत सुभाषित वचनों का भी भाषानुवाद कर दिया गया था, किन्तु आगे ऐसा नहीं किया गया । प्रस्तुत भाग को भी यही स्थिति है । अष्टम अध्याय सातवें अध्याय में उपांशु ग्रह आदि से संबद्ध प्रातःसवन और माध्यन्दिनसवन के दक्षिणादान पर्यन्त मन्त्र उपदिष्ट हुए हैं । अब आठवें अध्याय में आदित्य आदि देवताओं के ग्रहों का निरूपण किया जा रहा है । ये ग्रह तृतीय सवन से संबद्ध हैं | द्वितीय मन्त्र के भाष्य में बृहती छन्द का लक्षण दिया गया है । यहाँ शतपथ ब्राह्मण और काण्व संहिता के सायण कृत भाष्यों की व्याख्यान पद्धति प्रदर्शित है और शतपथ के प्रमाण से बताया गया है कि प्रातःसवन के वसुगण, माध्यन्दिनवन के रुद्रगण और सायंसवन के देवता आदित्यगण हैं । यहीं प्रातःसवन. और माध्यन्दिनसवन को अमिश्र तथा सायंसवन को मिश्र बता कर उसका कारण दिया गया है । तृतीय मन्त्र की व्याख्या में भगवान् सूर्य के लिये कहा गया है कि ये उदय, ताप, पाक और प्रकाश के द्वारा प्राणियों पर सदा अनुग्रह करते रहते हैं । काण्व संहिता के सायण भाष्य में तुरीय पद का तृतीय अर्थ किया गया है । तदनुसार ' मन्त्र की व्याख्या की गई है । चतुर्थं मन्त्र की शतपथीय सायण भाष्य के अनुसार व्याख्या की गई है और बताया गया है कि शतपथ ब्राह्मण में ' केचित् ' पद से तैत्तिरीय शाखा का ग्रहण किया गया है । यह बता कर प्रसंगवश यहाँ मीमांसा शास्त्र के ' नहि निन्दा ' न्याय को स्मरण किया गया है । पाँचवें मन्त्र में १ ९ दशापवित्र शब्द का अर्थ दिया गया है । १ ९. “ दशाभिः स्वाञ्चलैः पवित्रेण पावनार्थेन वस्त्रेण " ( पृ ० १३१ ) | अर्थात् सोमरस को छानने का वस्त्र ।

पृष्ठ 36

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( ३५ ) II छठे मन्त्र में बताया गया है कि मनस् शब्द से इस मन्त्र में अध्यवसायात्मिका बुद्धि गृहीत है । नवें मन्त्र भाष्य में शतपथ ब्राह्मण ( ४१४१२१८ - ९ ) का व्याख्यान करते समय प्रसंगवश बताया गया है कि पित्र्य धन में स्त्रियों का तथा बहुविध स्त्रीधन में दायादों का अधिकार नहीं है । ११ वें मन्त्र में वृत्तिकार के मत से २ " हारियोजन पद का अर्थ दिया गया है । १२ वें मन्त्र में अवघ्राण ( सूंघना ) को ही भक्षण बताया गया है । अगले मन्त्र में शाकल शब्द का अर्थ आजकल प्रचलित अर्थ शाकला दिया गया है । १७ वें मन्त्र में तो निधियों का उल्लेख है । इनके नाम अमरकोश के क्षेपक में इस प्रकार मिलते हैं-महापद्मश्च पद्मश्च शङ्खो मकरकच्छपौ । मुकुन्दकुन्दनीलाश्च खर्वश्व निधयो नव ॥ ( १ । ११७१ ) २५ वें मन्त्र में शतपथ ब्राह्मण को उद्धृत करते हुए अवभृथ से पक्ष में छः तथा दूसरे ** में दस आहुतियां विहित हैं । २ अवभृथ शब्द का २७ वें मन्त्र में देखा जा सकता है! संबद्ध दो पक्षों का उल्लेख किया गया है । एक इस प्रकरण में निर्दिष्ट अर्थ सायण के प्रमाण से यह बताया जा चुका है कि आठवें अध्याय की ३२ वीं कण्डिका तक अग्निष्टोम याग का विधान हैं । इस तरह यहाँ अग्निष्टोम का प्रकरण समाप्त हो जाता है और आगे ३३ वें मन्त्र से षोडशी ग्रह का विधान चलता है । इसका ग्रहण १६ स्तोत्रों के पाठ के साथ किया जाता है, इसलिये इसे षोडशी कहते हैं । पृष्ट्य याग के चौथे दिन षोडशी ग्रह का ग्रहण किया जाता है । प्रातः सवन में आग्रयण ग्रह के ग्रहण के बाद आग्नेय अतिग्राह्य को लेकर खादिर काष्ठ के चतुष्कोण उलूखल में इस ग्रह का ग्रहण किया जाता है । ग्रहण करते समय यहाँ ३३ वीं और ३४ वीं कण्डिका के मन्त्रों का पाठ किया जाता है । अतिग्राह्य ग्रह तो एक ही है, तो भी श्रौतसूत्र में इसके लिये बहुवचन का प्रयोग इसलिये किया गया है कि विश्वजित् याग से यह संबद्ध है और विश्वजित् याग में तीन अतिग्राह्य ग्रहों का ग्रहण विहित है । ३४ वीं और ३५ वीं कण्डिका के मन्त्रों से षोडशी ग्रह का भी ग्रहण किया जाता है । ३६ वें मन्त्र में षोडशी ग्रह । परब्रह्म के रूप में स्तुति की जाती है । यह षोडशी षोडशकलात्मक लिंगशरीर से उपहित है । इन १६ कलाओं के नाम प्रश्नोपनिषद् ( ६१४ ) में इस प्रकार दिये गये हैं - १. प्राण, २. श्रद्धा, ३. आकाश, ४, वायु, ५. ज्योति, ६. आपः, ७. पृथिवी, ८ इन्द्रियम् ९ मनः १०. अन्नम् ११. वीर्यम्, १२. तपः ९ ३ मन्त्राः, १४. कर्म, १५. लोकाः, १६. नाम । ३७ वीं कण्डिका के मन्त्रों से षोडशी ग्रहगत सोम का भक्षण किया जाता है और इसके साथ ही षोडशी ग्रह का प्रकरण पूरा हो जाता है । ३८ वीं कण्डिका से द्वादशाह के मन्त्रविहित हैं । अतिरात्र के बाद छः दिन तर्फे पृष्ठ्य संज्ञक क्रतु चलता है । इनमें प्रथम क्रतु अग्निष्टोमसंस्थ और चतुर्थ षोडशीसंस्थ है । द्वितीय, तृतीय, पंचम और षष्ठ दिनों में सम्पन्न होने वाले अनुष्ठान उक्थसंस्थ कहलाते हैं । छः दिन तक चलने वाले पृष्ठ्य सत्र में प्रथम दिन बैकंकत पात्रों में अतिग्राह्य संशक ग्रहों का ग्रहण ३८-४० कण्डिकागत मन्त्रों के उच्चारण के साथ किया जाता है । अतिग्राह्य पद की व्युत्पत्ति भी २०. " प्रसङ्गात् स्त्रीणां पित्र्यस्य धनस्य वा षड्विधस्य स्त्रीधनस्य दायस्यानीश्वरत्वोपवर्णनम् " ( पृ ० १४० ) । २१. " द्रोणकलशे आग्रयणाद् यो रसो गृहीतः स एव हारियोजनसंज्ञको भवतीति वृत्तिकारः " ( पृ ० १४४ ) । " छन्दांसि वै हारियोजन: " ( पृ ० १४५ ) । २२. अवाचीनानि पात्राणि जलमध्ये भ्रियन्ते यस्मिन् यज्ञविशेषे सोऽवभृथ इति काण्वभाष्ये सायणाचार्य: " ( पृ ० १७१ ) | २३. " इतरग्रहानतिक्रम्य दुष्प्रापं फलं गृह्यत एभिरित्यतिग्राह्याः " ( पृ ० १८६ ) ।

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( ३६ ) यहाँ दी गई है । कण्डिकाओं के उत्तर शेष भाग से उन ग्रहों का भक्षण किया जाता है । इसी के साथ द्वादशाह का विधान पूरा हो जाता है । * गवामयन, गर्गत्रिराज, महाव्रत आदि से संबद्ध आगे के मन्त्रों का विनियोग भाष्यसार में बता दिया गया है । ५० वें मन्त्र की व्याख्या में प्रातःसवन के अग्नि, माध्यन्दिनसवन के इन्द्र और सायंसवन के देवता विश्वेदेव बताये गये हैं । ५२ वें मन्त्र के भाष्य में २४ कूबरी और २५ सत्र पद का अर्थ दिया गया है । अगले मन्त्र का अर्थ निरुक्त की पद्धति के अतिरिक्त सायण और महीधर को पद्धति से भी किया गया है । आगे के ५४-५९ मन्त्रों में मिट्टी के बने धर्मपात्र के सोमाभिषव की विभिन्न अवस्थाओं में टूट जाने पर उसके प्रायश्चित्त के निमित्त सोम की विभिन्न स्थितियों को नामित किया गया है और उन्हीं नामों से प्रायश्चित्ताहुति देने का विधान निर्दिष्ट है । इस विषय की चर्चा आगे भी मिलती है । धर्मभेद की स्थिति में प्रायश्चित्त के निमित्त आहुतियों का विधान होने से शतपथ के इस प्रकरण को प्रायश्चित्त ब्राह्मण नाम दिया गया है । सोमयागीय कर्मों की त्रुटियों का इससे परिमार्जन किया जाता है । ६० वें मन्त्र में कात्यायन श्रौतसूत्र के व्याख्याकार देवयाज्ञिक का मत उद्धृत है । ६२ वें मन्त्र में बताया गया है कि यह प्रायश्चित्त ब्रह्मा के द्वारा किया जाता है । मन्त्रों का वाचन और आज्य का संस्कार भी वही करता है । यज्ञीय यूप पर काक के बैठ जाने पर भी प्रायश्चित्त प्रयुक्त आहुति देनी पड़ती है । इस अध्याय में अन्तिम ६३ वीं कण्डिका में इसके लिये मन्त्र पठित है । यहाँ विशेष बात यह बताई गई है कि सोमयाग में उद्गाता और पशुयाग में ब्रह्मा के द्वारा यह आहुति दी जानी चाहिये । इस अध्याय के मन्त्रभाष्य में तैत्तिरीय संहिता, आपस्तम्ब श्रौतसूत्र आदि ग्रन्थों के अतिरिक्त सत्याषाढ श्रौतसूत्र और कात्यायन श्रौतसूत्र के देवयाज्ञिक कृत भाष्य का विशेष रूप से उल्लेख हुआ है । शतपथ ब्राह्मण ( पृ ० १२३ ) में आदित्यों के द्वारा उपदिष्ट दो देवताओं बाले मन्त्रों का प्रयोजन क्या है, इससे संबद्ध आख्यायिका वर्णित है । पृ ० १३१ पर सवनत्रय से संबद्ध तथा पृ ० १३८ पर वायु और प्राण सम्बन्धी आख्यायिका मिलती है | पृ ० १४५ पर देवताओं के द्वारा सन्तर्पित छन्दों का इतिहास दिया गया है । पृ ० १७३-१७४ में अनुबन्ध्या गौ से सम्बन्ध रखने वाली तथा प्रजापति और सन्ध्या से सम्बन्ध रखने वाली आख्यायिका देखी जा सकती है । पृ ० १८० पर षोडशी ग्रह सम्बन्धी इतिहास वर्णित है । आध्यात्मिक अर्थ के प्रसंग में यहाँ ( पृ ० १३३ ) पुरंजनो-पाख्यान निर्दिष्ट है । यह कथा श्रीमद्भागवत ( ४।२५ - २ ९ अ ० ) में देखी जा सकती है । प्रसंगवश उद्धत सुभाषितों का भाष्यसार में अर्थ नहीं दिया गया । इस कमी की ओर हम पहले भी इंगित कर चुके हैं, जब कि २-३ अध्यायों के भाष्यसार में यह त्रुटि नहीं थी । दयानन्दीय अर्थ के प्रसंग में विशेष बात इतनी ही है कि उनके सम्प्रदाय के अनुयायी पं ० ब्रह्मदत्त जिज्ञासु ने भी इनकी त्रुटियों का यत्र तत्र उल्लेख किया है ( पृ ० १२ ९, २२० ) । पृ ० १४ ९ में बताया गया है कि मनुष्य की शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त के बिना अपने पापों को भी दूर करने की सामर्थ्य नहीं है, तो वह दूसरे के पापों को कैसे दूर करेगा । पृ ० १५३ पर स्वामी दयानन्द के साथ किसी अन्य विद्वान् के मत को भी उद्धृत कर उसका खण्डन किया गया है । पृ ० १७३ २४. " कूबरी ईषाधारिणी विष्कम्भिका " ( पृ ० २०७ ) । २५. " ब्राह्मणेषु सूत्रेषु च प्रसिद्धं सत्रमनेकयजमानकर्तृकम् " ( पृ ० २०८ ) । २६. आगे ३ ९ वें अध्याय के १-६ मन्त्रों में घर्मभेद प्रयुक्त प्रायश्चित्ताहुतियों का विधान है ।

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( ३७ ) पर अवभृथ शब्द के अर्थ की आलोचना करते हुए बताया गया है कि यज्ञीय पदों का जो अथं श्रौतसूत्र और ब्राह्मणः ग्रन्थों में दिया गया है, वही हमारे लिये मान्य हो सकता है । पृ ० १८३ पर दिखाया गया है कि वेद में व्यक्ति विशेष की चर्चा नहीं मानी जा सकती । ऐसा मानने पर वेदों पर अनित्यता की आपत्ति आ जायगी । पृ ० १८५ पर दिखाया गया है कि श्रुति के अनुसार वाजपेय और राजसूय यज्ञों का अनुष्ठाता ही सम्राट् अथवा राजा माना जा सकता है । पृ ० १८७ पर स्वामी दयानन्द ने सर्वत्र देव शब्द का प्रयोग मनुष्य के लिये किया है, जो कि उचित नहीं है, इस बात का उल्लेख करते हुए यहाँ स्मरण दिलाया गया है कि देव एक अलग योनि है, इस बात को प्रबल प्रमाणों के आधार पर भूमिका भाग में ( पृ ० ६२६-६७५ ) स्थापित किया जा चुका है । पृ ० १ ९ ४ पर बड़े आश्चर्य के साथ इस बात का उल्लेख किया गया है कि स्वामी दयानन्द श्रुति और सूत्रों को ही नहीं, लोकप्रसिद्धि को भी लांघ कर मन्त्रार्थं करते हैं, जो कि सर्वथा अनुचित है । पृ ० २१५ और २२० पर इनके द्वारा महीधर पर आरोपित भ्रान्ति का निराकरण कर दिया गया है । पृ ० २१६ पर क्षोर श्री और सक्तुश्री शब्दों के अशुद्ध अर्थ को सूचित किया गया है । पृ ० २२२ है । पर ' धर्म ' शब्द के सम्बन्ध में और ३४ आहुतियों के सम्बन्ध में इनकी भ्रान्तियों को शतपथ के प्रमाण से दिखाया गया नवम अध्याय नवें अध्याय की ३४ वीं कण्डिका तक वाजपेय याग से संबद्ध मन्त्र उपदिष्ट हैं । इनका विनियोग भाष्यसार में दिया तो गया है, किन्तु अनेक स्थलों पर आवश्यक पदों का अर्थ छोड़ दिया गया है । इसके कारण विनियोजक वाक्य अधूरे रह जाते हैं । इस कमी की पूर्ति हमने विषयानुक्रमणी बनाते समय की है । अन्य कुछ विनियोगों का खुलासा यहाँ किया जा रहा है । द्वितीय कण्डिका के भाष्य में बताया गया है कि प्रातःसवन में आग्रयण ग्रह के ग्रहण के बाद तीन अतिग्राह्य ग्रहों को पूर्ववत् ग्रहण कर उसी पद्धति से षोडशी ग्रह का भी ग्रहण करे । इस कण्डिका के तीन मन्त्रों से और ३-४ कण्डिकाओं के दो मन्त्रों से पाँच वाजपेयिक ग्रहों का यहाँ ग्रहण किया जाता है । चौथे मन्त्र के उन्ट, सायण और महीधर कृत अर्थों का अलग - अलग उल्लेख किया गया है । पंचम मन्त्र की व्याख्या में बताया में गया है कि वज्र ही स्पय, रथ और यूप का स्वरूप धारण कर त्रिधा विभक्त हो जाता है । छठे मन्त्र २७ कलोल और ककुद्मान् शब्दों का तथा नवें मन्त्र में २८ प्रष्टि शब्द का अर्थ दर्शनीय है । इसी तरह पृ ० २४५ पर २ ९ स्कम्भन और पृ ० २४६ पर 3 क्षिपणि शब्द का अर्थ दिया गया है । १५ वें मन्त्र की व्याख्या में सायण और उब्वट की व्याख्या उद्धृत है । २० वीं कण्डिका के भाष्य में पृ ० २५५ ' यह पढा जाना चाहिये । २१ वें मन्त्र की की पहली पंक्ति में ' आयुर्यज्ञेन ' के स्थान पर ' आपये स्वाहा व्याख्या में 31 प्राण, अरत्नि, कोश और अर्धोरुक शब्दों का अर्थं अवलोकनीय है । अजा के विषय में भाष्य में अनेक स्थलों पर इस विषय का उल्लेख किया गया है कि वह वर्ष में दो - तीन बार दो या तीन बच्चे देती है । यहाँ २७. “ ककुदिति वृषभस्योन्नतः स्कन्ध प्रदेशः, तत्सामान्यादुद्दक संघातोऽप्युन्नततमः ककुच्छब्देनोच्यते । बहुभिरुदकनिचयैः संयुक्त महाप्राग्भार उदकसंघातवानूमिः कल्लोलः ककुद्मान् " ( पृ ० २३४ ) । २८. “ प्रष्टिर्नाम पादत्रयोपेतो भोजनपात्रादेराधारः " ( पृ ० २३८ ) । २ ९. “ स्कम्भनं नाम वेगेनाक्रमणं मार्गान् पृष्ठतः कृत्वा पुरो धावनम् " ( पृ ० २४५ ) । ३०. ' क्षिप्यते प्रेतेऽनयेति क्षिपणिः कशा " ( पृ ० २४६- २४७ ) । ३१. " प्राणो मुखनासिकाप्रभवो वायुः पञ्चवृत्तिकः " ( पृ ० २५७ ), " चतुर्विंशत्यङ्गुलोऽरत्नि: " ( पृ ० २५८ ), " कृमिकोशविकारभूतं वासः कौशम्, यद्वा कौशं कुशमयं चण्डातक मर्धोरुकं नृत्तोपयिकत्वेनाच्छादनीय मुरु-कञ्चुकमर्धोरुकं वासः " ( पृ ० २५ ९ ) । भू०-६

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( ३८ ) ( पृ ० २६३ ) भी यह बात उल्लिखित है । २३ वें मन्त्र के भाष्य में आपस्तम्ब श्रौतसूत्र वर्णित अन्नों का तथा महाभाष्य वर्णित सप्तदशविध अन्नों का उल्लेख किया गया है । भाष्यकार ने स्पष्ट रूप से १७ प्रकार के अन्नों के नाम भी दे दिये हैं ( पृ ० २६५ ) | चार ( ३१-३४ ) उज्जिति संज्ञक मन्त्रों के साथ यह वाजपेय प्रकरण समाप्त होता है । ३५ वीं कण्डिका से राजसूय यज्ञ का प्रकरण चलता है । यहाँ ( पृ ० २८१-२८४ ) भाष्यकार ने मन्त्रों की ' पदों पर अनेक ग्रन्थों की सहायता से व्याख्या करने से पहले आपस्तम्व श्रौतसूत्र के ' स्वाराज्यकाम ' और ' राजा विचार प्रस्तुत किया है । ग्रन्यों के नाम भाष्यसार में गिना दिये गये हैं । पूरा विचार कर लेने के उपरान्त भाष्य में स्पष्ट कर दिया गया है कि प्रस्तुत प्रकरण का राजपद केवल क्षत्रिय राजा के लिये ही प्रयुक्त होता है । मीमांसा शास्त्र में रुचि रखने वाले जिज्ञासुओं के लिये यह प्रसंग विशेष रूप से अधेय है । राजसूय यज्ञ की प्रक्रिया को बताते हुए यहाँ कहा गया है कि फाल्गुन की पहली दशमी के दिन अनुमति के लिये अष्टाकपाल पुरोडाश देनी चाहिये । अनुमति पौर्णमासी की अधिष्ठात्री देवता मानी जाती है । तण्डुल अथवा खादिर खुव में अन्य हविष्य द्रव्यों को पीसते समय शिला के नीचे कृष्णाजिन पर जो उसका अंश गिर गया है, उसे रख कर दक्षिणाग्नि से जलती लकड़ी लेकर दक्षिण दिशा में जाकर अपने आप फटी हुई जमीन पर अथवा ऊषर भूमि पर उल्मुक को रख कर उस अंश की आहुति देनी चाहिये । इस प्रसंग में दो प्रकार की भूमि वर्णित है - एक तो व्रीहि, गोधूम आदि सस्यों से सम्पन्न और दूसरी ऊपर । इसमें पहली भूमि अनुमति और दूसरी निर्ऋति कहलाती है । निर्ऋति अनिष्टकारिणी मानी जाती है । यह दरिद्रता का ही दूसरा नाम है । इस लिये इसकी शान्ति के लिये सबसे पहले आहुति दी जाती है । बाद में किसी दिन ३६ वीं कण्डिका में प्रदर्शित विधि से पंचवातीय होम किया जाता है । यहाँ शतपथ ब्राह्मण को उद्धृतकर बताया गया है कि राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान क्षत्रिय ही करता है । जिसने वाजपेय याग नहीं किया, ऐसा राजन्य ही इसका अधिकारी माना गया है । सामान्य राज्य की अपेक्षा साम्राज्य अधिक वरेण्य है, अतः साम्राज्य को देने वाले राजसूय यज्ञ का अनुष्ठाता वाजपेय याग का अनुष्ठान नहीं करता । इस राजसूय यज्ञ में इष्टि, पशु, सोम, दर्वीहोम जैसे शताधिक कर्म संयुक्त हैं । प्रस्तुत स्थल पर ( पृ ० २८५ ) इष्टियों और पशुओं के विधायक वाक्यों का उल्लेख कर सात सोम यागों का एवं पंचवातीय आदि दर्वीहोमों का उल्लेख किया गया है और 3 पूर्णाहुति शब्द का अर्थ निर्दिष्ट है । थे ३६ वी कण्डिका में बताया गया है कि इस कण्डिका के पाँच मन्त्रों से पंचधा विभक्त आहवनीय अग्नि को एकत्र कर उसमें पाँच आहुतियाँ दी जाती हैं । ३७ वीं कण्डिका बताती है कि इससे दक्षिणाग्नि से उल्मुक लेकर उसमें अपामार्ग के तण्डुल की आहुति दी जाती है । ३८ वीं कण्डिका में भी खुवा में स्थित अपामागं तण्डुलों की आहुति का मन्त्र है । यह आहुति भी उल्मुक में ही दी जाती है । इसके लिये उल्मुक को लेकर पहले पूर्व अथवा उत्तर दिशा में जाना पड़ता है | यहाँ शतपथ ब्राह्मण में बताया गया है कि केवल पंचवातीय होम का ही नहीं, इस अपामागं तण्डुल के होम का भी विनियोग दूसरों के द्वारा प्रयुक्त अभिचार कर्म से अपनी रक्षा के लिये किया जाता है । इस रक्षाकर्म के लिये यहाँ 33 प्रतिसर शब्द प्रयुक्त है । पूरे भारतीय वाङ्मय में, बौद्ध तन्त्र और काव्य ग्रन्थों में भी यह शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त मिलता है और आज भी विवाह आदि शुभ अवसरों पर बाँधा जाने वाला कंगन इसी का प्रतीक है । इस प्रतिसर " ३२. “ आज्यपूर्णया जुह्वा हूयत इति पूर्णाहुति: " ( पृ ० २८५ ) । ३३. आगे ३७ संख्या की टिप्पणी देखिये ।

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( ३ ९ ) में सूचना दी गई है । कर्म का प्रयोग अश्वों की रक्षा के लिये भी किया जाता है । अपामार्ग को मंजरियों के लिये शतपथ वाले व्यक्ति को उलट कि इसकी मंजरियों का मुख नीचे की ओर रहता है । इस लिये ये यजमान के प्रति अभिचार करने कर उसे शीघ्र नष्ट कर देती हैं । ' मन्त्र से ३ ९ वीं कण्डिका में बताया गया है कि सविता आदि देवसू हवियों में अन्तिम ' वरुणाय धर्मपतये पकड़ कर वरुण को चरु समर्पित कर खुवाको सव्य पाणि में रख कर दक्षिण हस्त से यजमान के दक्षिण बाहु का नाम को उच्चारित ' सविता त्वा ' इत्यादि मन्त्रों का उच्चारण करते हुए अध्वर्यु यथास्थान यजमान का और उसके माता - पिता करता है । इसकी विधि भी यहाँ बताई गई हैं । प्रस्तुत मन्त्र में ' वाक् ' शब्द प्रयुक्त है । भाष्यकार ने परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूप अथवा नाम, उपसर्ग, निपात और आख्यात रूप वाणी का उल्लेख कर बताया है कि यजमान को प्राप्त इस चतुविध वाणी का जो कि वेद आदि विविध वाङ्मय के रूप में सर्वत्र व्याप्त है, आधिपत्य उस देवताओं के निमित्त अर्पित किये जाने वाले विविध प्रसंगवश इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि अनुसरण करते हैं । ४० वें मन्त्र के भाष्य में कुरु- पंचालों के राजा हो जाय, इसके लिये यहाँ प्रार्थना की गई है । सविता आदि आठ चरुओं की सूचना शतपथ ब्राह्मण को उद्धृत कर यहाँ दी गई है । श्रौतसूत्र सर्वत्र शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रन्थों का खदिरवम के नाम का उल्लेख है । २२ वें मन्त्र में उद्धृत शतपथ में बृहस्पति को आख्यायिका दी गई है । वाजपेय याग में बृहस्पतिसदृश यजमान भी अभिषिक्त होने पर भूमि का अवदारण न वरने लगे, इस लिये दीक्षित यजमान को पृथ्वी स्थलों के साथ पर सायण मित्रतापूर्णं का व्यवहार करने को कहा गया है । शतपथ ब्राह्मण के वचनों की व्याख्या करते समय यहाँ अनेक उल्लेख किया गया है । दूसरे मन्त्र के आध्यात्मिक अर्थ के प्रसंग में आन्तर वरिवस्या का प्रतिपादक एक सुन्दर देवताओं

श्लोक उद्धृत

के साथ है । यहाँ सत्सौख्य को हो अनेक प्रकार के विषयोपभोगों के साथ चित्पात्र में रख कर अपने परिवार उपस्थित देवी को समर्पित किया गया है । २३ वें मन्त्र में ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' इस श्रुति को उद्धृत करते हुए माना गया है । कहा गया है कि यहाँ कठोर और तीक्ष्ण पदार्थों में अग्नि का और कोमल पदार्थों में सोम का निवास दयानन्दीय अर्थ में अनेक बार निर्दिष्ट सामान्य आक्षेपों के अतिरिक्त यहाँ के पांचवें सत्र में भट्टपाद कुमारिल के । उस प्रसिद्ध श्लोक को उद्धृत किया गया है, जो कि वेद के वेदत्व को उजागर करता है । नवें मन्त्र में बताया गया है कि वाजिन् शब्द का इनके द्वारा किया गया अथं श्रुति, स्मृति, पुराण आदि में कहीं भी नहीं मिलता दयानन्द । १ ९ का वें भावार्थ मन्त्र में भी वाजिन् पद के अर्थं पर ही आक्षेप किया गया है । २१ वें मन्त्र में बताया गया है कि स्वामी २३ वें मन्त्र में कहीं भी मन्त्रार्थ से संबद्ध नहीं है । इसी लिये हमने उसके खण्डन में कभी रुचि नहीं दिखाई है । उक्ति को व्याकरण प्रक्रिया संबन्धी पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के मत का खण्डन किया गया है । २ ९ वें मन्त्र में उनकी की ' पूति कूष्माण्डायित ' गया कहा है । ३४ वें मन्त्र की व्याख्या में स्वामी दयानन्द ने चार पुरुषार्थों की अनोखी व्याख्या संमत है । इसको यहाँ बालजनप्रतारण कहा गया है । ३६ वें मन्त्र में पुनः याद दिलाई गई है कि शब्दों के श्रुतिसूत्र अर्थ हो हमें ग्राह्य हो सकते हैं । आर्ष ग्रन्थों में अप्रयुक्त अर्थों में शब्द का प्रयोग कैसे मान्य हो सकता है? अन्तिम ४० मन्त्र में बताया गया है कि सविता, अग्नि, सोम, रुद्र, मित्र, वरुण आदि विभिन्न देवताओं के नाम इनकी मनुष्यपरक व्याख्या नास्तिकता का ही प्रचार कर सकती है ।