वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 41–50

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 41–50

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( ४० ) दशम अध्याय ऊपर नवें अध्याय में वाजपेय और राजसूय संबन्धी विधियों को दिखाया गया है । अब दसवें अध्याय में ' राजसूय यज्ञ में अभिषेक के लिये जलादान आदि कर्मों का तथा सौत्रामणी याग संबन्धी कुछ पद्धतियों का विधान बताया जा रहा है । सबसे पहले यहाँ राजा के अभिषेक के लिये विविध जलों का उपादान वर्णित है । आतप वर्षा ( धूप के रहते पानी का बरसना ) कभी - कभी ही होती है । अतः ऐसे जल का संग्रह पहले से कर लेना चाहिये, जिससे कि भविष्य में होने वाले अभिषेक के अवसर पर उनका उपयोग हो सके । अन्य जलों को उसी समय जाकर लाया जाता है । उदुम्बर ( गूलर ) की लकड़ी से बने पात्रों में इनको रखा जाता है । सर्वप्रथम सरस्वती नदी के जल को लाया जाता है । शतपथ ब्राह्मण के पंचम काण्ड के तृतीय प्रपाठक के चतुर्थं ब्राह्मण में अभिषेक के लिये १७ प्रकार के जलों के संभरण का विधान वर्णित है । आतपवष्यं जल का ग्रहण यूप की उत्तर दिशा से किया जाता है । अन्य जलों का ग्रहण, जहाँ वे उपलब्ध हों, वहाँ से किया जाता है । १७ प्रकार के जलों को ग्रहण करसे के लिये सभी पात्र औदुम्बर काष्ठ के बने हुए ही होने चाहिये । इस अध्याय की प्रथम चार कण्डिकाओं में सत्रह मन्त्र हैं । ' वृष्ण ऊमरसि ' इत्यादि तीन कण्डिकाओं के प्रथम स्वाहान्त मन्त्र से चतुर्गृहीत घृत की आहृतियाँ दी जाती हैं तथा अन्तिम स्वाहारहित मन्त्रों से जलों का संभरण किया जाता है | मन्त्रगत ' अमुष्मै ' पद के स्थान पर यजमान के चतुर्थ्यन्त नाम का उच्चारण किया जाता है । प्रथम कण्डिका से १. सरस्वती नदी के जल का संभरण किया जाता है । कल्लोल जल के ग्रहण की विधि को हुए यहाँ कहा गया है कि अध्वर्यु स्वयं जल में प्रविष्ट होकर किसी पशु या पुरुष को अपने साथ ले जाय । जल में प्रविष्ट पशु या पुरुष के दोनों तरफ उठती हुई लहरों के जल को अलग - अलग लिया जाता है । इसको २ कल्लोल जल कहते हैं । नदी के बहते हुए जल को ३ स्यन्दमान कहा जाता है । काण्व संहिता के भाष्य में सायण का कहना है कि कुल्या ( नहरों ) आदि के रूप में बहता हुआ जल राष्ट्र को नाना प्रकार से समृद्ध बनाता है । नदी आदि का बहता हुआ जल कभी किनारे पर उलटा बहने लगता है । इसको ४ प्रतिलोम जल कहा जाता है । नदी का ही जल कभी - कभी मुख्य धारा को छोड़ कर अलग से बहने लगता है । इसको ५. अपसली जल कहा जाता है । समुद्र में ऊँची उठती हुई लहरों के जल को ६. सूध कहते हैं । नदी आदि के जल में कभी - कभी भँवर पड़ जाती है । इस जल को बहता हुआ नदी का जल किसी हृद में पड़ कर स्थिर हो जाता है । सूर्य की किरणों से यह ७. निवेष्य कहते हैं । गरम भी हो जाता है । इसे ८. प्रस्थातप जल कहते हैं । ९. आतपवष्यं जल का लक्षण ऊपर बताया जा चुका है । जल को ११. कूप्य कहा जाता है । १२. प्रुष्व जल ओस की १४. उल्ब्य ( गर्भवेष्टन ) जल का भी ग्रहण किया जाता में १७. मरीचियों का ग्रहण किया जाता है । इसी तरह से तालाब के जल को १०. सरस्थ और कूप के बूंदों से बनता है । यहाँ १३. मधु ( शहत ) और गाय के है तथा १५. दुग्ध और १६. घृत का भी । अन्तिम जल के रूप सूर्य की किरणों से गरम हुए इस मरीचि जल को पूर्वगृहीत सभी प्रकार के जलों में इनमें से प्रथम सारस्वत जल और अन्तिम मरीचि जल के निमित्त आहुति नहीं दी जाती । पात्रों में संगृहीत इन सभी जलों को किसी औदुम्बर पात्र में इकट्ठा कर लिया जाता है । मिला दिया जाता है । इस प्रकार अलग अलग शतपथ ब्राह्मण में इन सत्रह प्रकार के जलों के निमित्त दी गई आहुति की प्रजापति से उसका क्रम इस प्रकार है- इनमें से प्रथम सारस्वत जल के और अन्तिम मरीचितप्त जल के विधान नहीं है । ऊ जल के पूर्व और अपर दो विभाग किये जाते हैं । इन दोनों के निमित्त तुलना की गई है । निमित्त आहुति का अलग - अलग आहुति

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( ४१ ) विहित है । इस तरह से आहुतियों की संख्या १६ हो जाती है । दो बिना आहुति के जल, सोलह आहुतियाँ और सोलह जल जल मिल कर ३४ होते हैं । इस प्रकार ३४ देवतात्मक प्रजापति से इनकी तुलना संभव हो जाती है । सारस्वत और मरीचि जल के निमित्त आहुतियाँ क्यों नहीं दी जाती, इसका स्पष्टीकरण भी यहाँ ( पृ ० ३०६-३०७ ) शतपथ के इसकी प्रक्रिया प्रमाण से दिया गया है । यहाँ संभृत १७ प्रकार के जलों से यजमान का अभिषेक किया जाता है । आगे बताई गई है । 3 १-४ मन्त्रों में १७ प्रकार के जलों का तथा तन्निमित्तक आहुतियों का विधान कर अब पाँचवें मन्त्र ३४ में पालाश बताया, जा रहा है कि मरुत्वतीय ग्रहों के ग्रहण के बाद और माहेन्द्र ग्रह के ग्रहण के पूर्व मैत्रावरुण विष्ण्य के आगे आगे व्याघ्रचर्म औदुम्बर, नैयग्रोध ( वाट ) और आश्वस्थ पात्रों को तूष्णीं ( चुपचाप ) रखा जाता है । इनके दी बिछाया जाता है और इसी कण्डिका के आगे के छः मन्त्रों से सकृद्गृहीत आज्य की पार्थसंज्ञक छः आहुतियाँ करने से जाती हैं । यहाँ शतपथ ब्राह्मण में इन आहुतियों के लिये कहा गया है कि पहले के अग्निवाचक नामों से हवन राजा की भूलोक में प्रतिष्ठा बढ़ती है तथा आगे के आदित्यवाचक नामों से उसके लिये स्वर्ग की प्राप्ति भी सुनिश्चित हो जातीहै । राजा पृथु ये आहुतियाँ संबद्ध हैं, इस बात का भी उल्लेख शतपथ में ही है । छठे मन्त्र से दो कुशपवित्रों का निर्माण कर उनमें हिरण्य ( सुवणं ) बांधा जाता है । सातवें मन्त्र से कुशापवित्र द्वारा अभिषेकार्थ लाये गये जलों को पवित्र कर पूर्व में रखे गये चतुविध पात्रों में भर दिया जाता है । , वल्कल इतना कर लेने के बाद यजमान को ताप्यं वस्त्र पहनाया जाता है । तायं पद का अर्थ आचार्यों ने क्षौम, स्रुवा अथवा घृताक्त वस्त्र किया है । भाष्य में कहा गया है कि इस ताप्यं वस्त्र पर सुई से यज्ञीय ओढाया पात्र स्रुक् जाता है । आदि को काढा जाता है । तार्प्य वस्त्र के ऊपर पाण्ड्व, अर्थात् रक्तश्वेत कम्बल यजमान को इन सारी विधियों का गले में महाकंचुक पहिना कर उष्णीष धारण कराया जाता है । शतपथ ब्राह्मण में बड़े विस्तार से मानना वर्णन किया गया है और कात्यायन श्रौतसूत्र में भी उसी के अनुसार सारी पद्धति निर्दिष्ट है । अतः शतपथ को तो प्रमाण है । और कात्यायन श्रौतसूत्र की उपेक्षा करना कथमपि न्यायसंगत नहीं माना जा सकता, जैसा कि स्वामी दयानन्द ने किया वे मन्त्र के वस्त्र आदि धारण कराने के बाद यजमान के हाथ में तीन बाण दिये जाते हैं । यह विधि ८ है । इस वाचन के साथ सम्पन्न होती है । तब नवीं कण्डिका के सात भविद् मन्त्रों का यजमान से पाठ कराया जाता किया गया मन्त्र में पृथिवी को ही देवमाता अदिति बताया गया है । उन्चट की व्याख्या का यहाँ अलग से उल्लेख है । १० वें मन्त्र से केशव ( नपुंसक ) के मुँह में लोहायस का निधान किया जाता है । यहाँ सायण की व्याख्या का से केशव, लोहायस और दन्दशूक की तुलना की गई है । आगे की उल्लेख किया गया है और शतपथ के प्रमाण १०-१४ कण्डिकाओं में रथन्तर, बृहत्, वैरूप, वैराज और शाक्वर - रैवत सामों का एवं त्रिवृत्, पंचदश, सप्तदश, एकविंश और त्रयस्त्रि स्तोमों का स्वरूप काण्वसंहिता के सायण भाष्य में उद्धृत साम ब्राह्मण के प्रमाण से बताया गया है । १५ वीं कण्डिका से यजमान व्याघ्रचर्म पर आरोहण तथा यजमान के पैरों के नीचे और सिर पर सौवर्ण परिमण्डल प्राणों के निधान किया जाता है | सायण का मत भी यहीं प्रदर्शित है । शतपथ के वचन की व्याख्या करते हुए यहाँ उनी , अतः ३४. पृ ० ३१२ और ३१४ पर पालाश, औदुम्बर, नैयग्रोध ( वाट ) और अश्वत्थ पात्रों की चर्चा । है पृ ० ३०८ पर भी चार ही पात्रों का उल्लेख माना जायगा । नैयग्रोध और वाट पर्यायवाची शब्द हैं ३५. पृ ० ३१६ पर ' पाण्ड्व ' पद के स्थान पर ' पाण्डव ' पद छप गया है । ३६. “ श्रोत्र - त्वक् - चक्षू - रसन - प्राणा मनोबुद्धी प्राणापानी चेतीमे नव प्राणाः " ( पृ ० ३२८ ) ।

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( ४२ ) नाम गिनाये गये हैं और ओज का अर्थ मनोबल दिया गया है । १६ वें मन्त्र का उच्चारण करते हुए यजमान अपनी भुजाओं को ऊपर उठाता है । पक्षान्तर में अध्वर्यु उसकी भुजाओं को अपने हाथ से उठाता है । इस कण्डिका के यहाँ द्विविध अर्थ किये गये हैं । १७-१८ मन्त्रों से यजमान के सामने खड़ा पुरोहित अथवा अध्वर्यु पूर्वाभिमुखः ऊ बाहु सरुत्रम व्याघ्रचर्म पर खड़े यजमान का पुर्वस्थापित चतुविध पात्रों में से पालाश पात्र के जल से अभिषेक करता है । १ ९ वें मन्त्र का उच्चारण करते हुए यजमान कृष्णमृग के विषाण ( सींग ) को कण्डूयनी से शरीर पर डाले गये अभिषेक के जल को अपने सारे शरीर पर फैलाता है । इस मन्त्र के भी द्विविध अर्थ प्रदर्शित हैं । सायण और उम्ट की व्याख्याएँ भी प्रदर्शित हैं । अग्नि के लिये यहाँ बताया गया है कि वह पौर्णमास्य, आमावास्य चातुर्मास्य आदि पर्वों के कारण वह पवान् कहलाता है । २० वें मन्त्र में बताया गया है कि यजमान राजा के पिता - पुत्र के संबन्धों का अन्वाख्यान करते समय अध्वर्यु शालादार्य अग्नि में सकृद्गृहीत आज्य की आहुति देता है । शतपथ ब्राह्मण में इसका यह विधान बताया है कि अदशिष्ट पात्रों का जल पालाश पात्र में भर दिया जाता है और उस पालाश पात्र को राजा अपने प्रियतम पुत्र ' को दे देता है । उसी समय इस मन्त्र का उच्चारण किया जाता है । इसके बाद वाजपेय याग के सारे विधानों का अनुष्ठान यहाँ भी किया जाता है । जैसे कि रथवाहण स्थान से ' इन्द्रस्य वज्रोऽसि ' मन्त्र से शाला के दक्षिण भाग में शकट के ऊपर स्थापित रथ को भूमि पर उतार कर दक्षिण वैदि के मध्य भाग में लाकर ' मित्रावरुणयोः ' मन्त्र से रथ में चार घोड़ों को जोता जाता है । ' अन्यथा त्वा ' मन्त्र से यजमान चात्वाल देश में स्थित रथ पर चढ़ता है । वह उस रथ की स्तुति करता है । अब सारथि उस रथ को आहवनीय के उत्तर में स्थापित गायों के बीच ले जाकर खड़ा कर देता है । वहाँ यजमान एक गाय का धनुष्कोटि से स्पर्श करता है । यह सारा विधान २१ वें मन्त्र की सहायता से किया जाता है । शतपथ ब्राह्मण में इसकी विस्तार से व्याख्या की गई है । यहाँ बताया गया है कि ' अर्जुन ' इन्द्र का गुह्य नाम है । यहाँ इस पद से यजमान का ग्रहण किया जाता है । इस मन्त्र में उपदिष्ट विधि का अनुष्ठान करने से यजमान इन्द्र के समान पराक्रम और ऐश्वर्य से सम्पन्न हो जाता है । इसके बाद रथारूढ यजमान वहाँ खड़ी सैकड़ों - हजारों गायों को अपनी जाति के बन्धु - बान्धवों, भाइयों और गोस्वामी को समर्पित कर यूप को पूर्व दिशा से प्रदक्षिणा कर अन्तःपात्य स्थान में रथ को खड़ा कर देता है । ऐसा करते समय वह २२ वें मन्त्र से इन्द्र की स्तुति करता है । तब २३ वीं कण्डिका के चार मन्त्रों से अध्वर्यु सकृद्गृहीत आय को रथविमोचयया नाम की चार आहुतियाँ देता है और इसी कण्डिका के उत्तराधं से रथारूढ यजमान पृथिवी का दर्शन कर उससे पादप्रक्षेत्र के लिये क्षमाप्रार्थना करता है । तब सोपानत्क यजमान २४ वें मन्त्र का पाठ करता हुआ रथ से उतरता है | यह ' हंसः शुचिषद् ' मन्त्र वैदिक वाङ्मय में अति प्रसिद्ध है । ऋग्वेद में ही नहीं, उपनिषदों में भी यह मन्त्र मिलता है । यहाँ परमात्मा की सर्वात्मकता प्रतिपादित है । २५ वें मन्त्र से रथवाहण स्थान पर दाहिने पहिये के रास्ते पर शतमान सौवणं वर्तुल मणि बाँधी जाती है । शतमान मणि सौ रत्ती की बनती है । इसके बाद उदुम्बर ( गूलर ) वृक्ष की टहनी गाड़ी जाती है । अध्वर्यु व्याघ्रचर्म पर पूर्व स्थापित मैत्रावरुणी पयस्या के पास आकर यजमान के ऊर्ध्वं बाहुओं को यथास्थान कर देता है और २६ वें मन्त्र से वाजपेय याग की पद्धति से व्याघ्र-चर्म के पास खादिर आसन्दी रखी जाती है । आसन्दी के निर्माण की विधि वाजपेय प्रकरण में बता दी गई है । अब आसन्दी पर बहुमूल्य वस्त्र बिछा कर उस पर यजमान को बैठाया जाता है । २७ वें मन्त्र का पाठ करते हुए यजमान के हृदय का स्पर्श करता है । २८ वें मन्त्र का वाचन और अध्वर्यु आदि ऋत्विकगण करते हुए यजमान के हाथ में द्यूत के साधन सौवर्ण पाँच पासों को दिया जाता है यज्ञीय वृक्ष की छड़ी से यजमान की पीठ पर धीरे - धीरे आघात करते हैं । यह द्यूत

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( ४३ ) कृत, त्रेता, द्वापर और कलि नाम का होता है । विशौजा शब्द में छान्दस समास होने से इसे एक ही पद माना गया है । इसी लिये पदकार यहाँ अवग्रह नहीं करते, इसको एक ही पद जानते हैं । कात्यायन श्रीसूत्र में इसका दूसरा विनियोग भी बताया गया है । तदनुसार आसन्दो पर बैठा हुआ यजमान उसके कल्याण के लिये भूमि पर बैठे हुए अध्वर्यु आदि चार ऋत्विजों को ' ब्रह्मन् ' पद से संबोधित करते हुए आह्वान करता है । आह्वान का क्रम भाष्य में बताया गया है । इसके बाद वे सब मिल कर राजा के हाथ में स्पय प्रदान करते हैं । शतपथ की व्याख्या करते हुए यहाँ बताया गया है कि सुवर्ण निर्मित कपर्दक ( कोड़ी ) अथवा विभीतक ( बहेड़ा ) को अक्ष कहा जाता है । इनमें से चार अक्ष ( पासे ) कृत संज्ञा वाले और पाँचवाँ कलि कहलाता है । इतना सब कर लेने के बाद २ ९ वें मन्त्र से द्यूत खेलने की जगह पर सुवर्णं खण्ड को रख कर उसके ऊपर चतुर्गृहीत आज्य ( घृत की आहुति दी जाती है और तब राजा द्यूतभूमि पर अपने हाथ में दिये पासों को फेंकता है । शतपथ वाक्य की व्याख्या करते हुए आपस्तम्ब के प्रमाण से इस द्यूत कर्म को इष्टि - पशु - सोमयागात्मक राजसूय याग का अंग माना गया है । राजसूय प्रकरण के अन्तिम ३० वें मन्त्र का विनियोग बताते समय कात्यायन श्रौतसूत्र को उद्धृत कर कहा गया है कि पितामह शब्द का प्रयोग पिता आदि अपने दस पूर्वपुरुषों के लिये किया गया है । यजमान के सोमपा पितरों की दस पोढियों को कालक्रम से गणना कर उनके निमित्त ऋत्विकगण तथा अन्य ब्राह्मण मिल कर वाजपेय याग के सोत्य दिवस में ' विभुरसि ' इत्यादि मन्त्रों से प्रसर्पण, अर्थात् धिष्ण्योपस्थान करते हैं अथवा ' सवित्रा प्रसवित्रा ' अनुवाक का पाठ करते हुए सौ ब्राह्मण प्रसर्पण करते हैं । इस पक्ष में पितरों की गणना नहीं की जाती, क्योंकि भक्षण काल में दस सोमयाजियों के रूप में इन पूर्वपुरुषों के नामों की स्मृति के अभाव में उनकी उपस्थिति असंभव है । इस द्वितीय पक्ष को ही यहाँ वरीयता दी गई है और शतपथ ब्राह्मण में भी इसी पक्ष को श्रेष्ठ माना गया है । त्वष्टा देव को यहाँ रूप का अधिष्ठाता बताया गया है और प्रसंगवश काण्व शाखा के मन्त्र का प्रमाण दिया गया है । इस मन्त्र में दस देवताओं के निमित्त दस आहुतियाँ दी जाती हैं । इन आहुतियों का नाम संसृप है । भाष्य ( पृ ० ३६२ ) में इन आहुतियों के क्रम को स्पष्ट रूप से समझाया गया है । इन आहुतियों को देने के बाद यजमान को दस वास्तविक कमलों की अथवा सौवर्ण पुण्डरीकों को माला बना कर पहनाई जाती है । इस मालाधारण को ही यहाँ दीक्षा कहा गया है । इसके लिये अन्य किसी विधिविधान की अपेक्षा नहीं है । शतपथ ब्राह्मण के भाष्य में सायण ने भी यही कहा है । इसके साथ ही राजसूय याग का यह प्रकरण पूरा हो जाता है । चरक सौत्रामणी १० वें अध्याय की ३१ - ३८ कण्डिकाओं में राजसूय याग से संबद्ध चरक सौत्रामणी के मन्त्र उपदिष्ट हैं । राजसूय के अन्त में की जाने वाली सोत्रामणी चरक सौत्रामणी कहलाती है । क्षोम वस्त्र में भिगोये व्रीहियों को बाँध कर रख देने पर कुछ में अंकुर निकल आते हैं और कुछ में अभी अंकुर नहीं निकले रहते । जिनमें अंकुर न निकले हों, ऐसे व्रीहियों की चार मुट्ठी लेकर उनका भात पकाया जाता है मीर उसमें अंकुरित व्रीहियों को पीस कर मिला दिया जाता है । इस कार्य को करते समय ही ' अश्विभ्यां पच्यस्व ' मन्त्र का पाठ किया जाता है । साथ ही मन्त्र के उत्तरार्धं से पामार्जनान्त कर्म कर लेने के बाद दर्भ की सहायता से किसी पात्र में सुरा को छाना जाता है । इसी को परिस्रुत् कहा जाता है । यहाँ बहुत संक्षेप में इस विषय का निरूपण हुआ है । इसका विस्तार आगे किया गया है । अगले मन्त्र से उस परिस्रुत् सुरा में बदरी फल के चूर्ण को मिला कर उसे प्रत्येक देवता के लिये वैकंकत पात्र में भरा जाता है । आगे के दो मन्त्र ( ३३-३४ ) सुराग्रहों के ग्रहण के याज्या और अनुवाक्या में विनियुक्त हैं । इनमें प्रथम अनुयाज्या और द्वितीय याज्या मन्त्र है ।

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( ४४ ) पृ ० ३० ९ पर शतपथ के प्रमाण से पार्थं हवियों का विश्लेषण करते समय मनुष्यों के प्रथम अभिषिक्त राजा वैन्यपुत्र पृथु की कथा वर्णित है । पृ ० ३२६ पर नमुचि का आख्यान दिया गया है । इन्द्र ने सीसे की सहायता से नमुचि पर प्रहार किया था । इसी प्रहार के कारण सीसा नरम पड़ गया और सार भाग के निकल जाने के कारण उसकी कीमत घट गई । यहाँ भाष्यकार ने दूरवीक्षण आदि में प्रयुक्त होने पर यह बहुमूल्य कैसे हो जाता है? इस शंका का समाधान करते हुए कहा है कि यह उसके परिष्कार को पद्धति का माहात्म्य है । पृ ० २३ ९ -३४० में राजसूय यज्ञ में अभिषिच्यमान वरुण का बल कैसे नष्ट हो गया और इन्द्र की सहायता से वह उसे किस प्रकार पुनः प्राप्त कर सका, इसका आख्यान वर्णित है । यहाँ शतपथ में बताया गया है कि ' अर्जुन ' इन्द्र का अतिप्रिय नाम है । यह प्रसंग हमें महाभारत की कथा की याद दिलाता है । पृ ० ३४६ पर बताया गया है कि अभिषिक्त राजा को देख कर पृथिवी डरने लगती है । उसे भयमुक्त करने के लिये राजा को प्रस्तुत मन्त्र की सहायता से पृथिवी की माता के रूप में स्तुति करनी चाहिये । पृ ० ३६२ पर वरुण की कथा का पुनः उल्लेख है और पृ ० ३६ ९ पर नमुचि का उपाख्यान वर्णित है कि उसने कैसे इंन्द्र के बल का अपहरण कर लिया और अश्विनीकुमारों ने उसकी किस प्रकार रक्षा की । स्वामी दयानन्द १० वें अध्याय के पहले मन्त्र में स्थित मित्रावरुण शब्द का अर्थ प्राण और अपान करते हैं । स्पष्ट है कि वे यहाँ मित्रावरुण को देवता न मानने के उद्देश्य से ऐसा कर रहे हैं, किन्तु भाष्यकार ने उनके अर्थ की असंगति पर यहाँ हृद्य प्रकाश डाला है । वेद का लोकायतीकरण, श्रुतिसूत्रविरोध जैसे दयानन्द भाष्य पर किये जाने वाले आक्षेपों का यहाँ ( पृ ० ३१८-३१९ ) पुनः स्मरण कराया गया है और वेद की अनधिगतार्थ - बोधकता का भी उल्लेख किया गया है । कात्यायन श्रौतसूत्र की रचना शतपथ ब्राह्मण के आधार पर ही हुई है । तब भी स्वामी दयानन्द शतपथ के समर्थन और कात्यायन श्रौतसूत्र के खण्डन में लगे रहते हैं । १० वें मन्त्र के उनके भाष्य को केबल प्रलापमात्र ही नहीं, केवल मूर्खजनप्रतारक ही नहीं, किन्तु अपने आपको भी धोखे में रखने जैसा बताया है । पृ ० ३२६-३२७ पर बताया गया है कि रथन्तर, बृहत् आदि सामों का और त्रिवृत्, पंचदश आदि स्तोमों का लक्षण ताण्ड्य महाब्राह्मण में निर्दिष्ट है । इनका स्वामी दयानन्द को ज्ञान ही नहीं है । चार्वाक जैसा दृष्टिकोण होने से इनके यहाँ ऊर्ध्वलोक की भी कोई स्थिति नहीं है । ' दशहस्ता हरीतकी ' न्याय इन पर पूरी तरह से लागू होता है । १ ९ वें मन्त्र में ये विमान, नौका आदि के निर्माण की विधि बताते हैं, किन्तु मन्त्र में अथवा उनके भाष्य में भी कहे शब्दों के आधार पर कोई भी इनके निर्माण में समर्थ नहीं हो सकता । २३ वें मन्त्र में आये स्वाहा पदों का ये अलग - अलग अर्थ करते हैं, किन्तु ऐसा करते समय वे कोई प्रमाण नहीं देते । २६ वें मन्त्र में भी शतपथ के अनुसार आसन्दी को संबोधित किया गया है । ये आसन्दी का अर्थ रानी करते हैं, किन्तु इसमें कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते । ३२ वें मन्त्र की व्याख्या में इन पर कल्पना बाहुल्य का आक्षेप किया गया है । ३३ वें मन्त्र में इन पर वेद के लोकायतीकरण का आक्षेप पुनः दोहराया गया है और कहा गया है कि प्रत्यक्ष और अनुमान से असिद्ध अर्थ को बताने में ही वेद की सार्थकता है । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र की व्याख्या में इन पर पूर्वापरविरोध का आक्षेप किया गया है और कहा गया है कि बिना प्रयोजन के मुख्यार्थ के त्याग में कोई प्रमाण नहीं है । फिर स्वामी दयानन्द वेद से जिस अर्थ का प्रतिपादन करना चाहते हैं, वह तो लौकिक नीतिशास्त्र आदि से ही ज्ञात हो जाता है, तब इन विषयों के प्रतिपादन में वेद की प्रवृत्ति कैसे मानी जा सकती है । आध्यात्मिक अर्थ करते समय सर्वत्र उपनिषद्, भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र, मनुस्मृति, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, पातंजल योगसूत्र, विष्णुपुराण, श्रीमद्भागवत, शिवपुराण, दुर्गासप्तशती आदि ग्रन्थों के अतिरिक्त धर्मशास्त्र के अनेक ग्रन्थों को और कोश ग्रन्थों को भी उद्धृत किया गया है । निघण्टु - निरुक्त और व्याकरण प्रक्रिया का भी इसमें सहारा

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( ४५ ) लिया गया है । इस विषय को चर्चा ११-१५ अध्यायों के भाष्यनिष्कर्ष में भी की जा चुकी है । यहाँ बार - बार ( पृ ० २६०, २ ९ ६, ३१५ ) भक्त के लिये " अमृतस्य पुत्राः " ( १० | १३ | १ ) इस ॠग्वेदीय मन्त्र को उद्धृत किया गया है, आचार्य की महिमा गाई गई है ( पृ ० ३२८ ) और सारे शिवभक्तों को बान्धव और तीनों भुवनों को स्वदेश बताया गया है ( पृ ० ३६१ ) । जीव और परमेश्वर का साजात्य, सख्य, सादेश्य, सायुज्य संबन्ध भी दर्शाया गयाहै ( ० ३१६ ) । be विकंकत वृक्ष की व्युत्पत्ति बताते समय अमरकोश की रामाश्रमी टीका में ' कठेर इति भाषायाम् ' दिया गया है । मध्यप्रदेश के एक विद्वान् ने बताया है कि वहाँ कठेर नाम का वृक्ष आज भी उपलब्ध है । ' शब्दकल्पद्रुम ' में मिलता है कि यह बदरीसदृश सूक्ष्म फल वाला वृक्ष है । भाषा में यह ' बंधच ' के नाम से जाना जाता है । बंगला विश्वकोश के हिन्दी संस्करण में इसका परिचय इस प्रकार दिया गया है - बदरीसदृश सूक्ष्म फल वाला वृक्ष, एक प्रकार का जंगली पेड़ । इसे कंटाई, किंकिणी और कंज भी कहते हैं । इस वृक्ष के पत्ते छोटे - छोटे और डालियों में कांटे होते हैं । इसके फल पकने पर मीठे और अधपके खट - मीठे होते हैं । यज्ञ के लिये खुवा इसकी लकड़ी से ही बनाया जाता है । अमरकोश में इसके पर्यायवाची शब्दों में ' सुवावृक्ष: ' भी दिया गया है । ७.३ के भाष्य में " वाग्देवी जुषाणा सोमस्य तृप्यतु " मन्त्रउद्धृत है । इसका स्थाननिर्देश यहाँ सही नहीं है । वस्तुतः यह वचन आठवें अध्याय के ३७ वें मन्त्र का अंश है । इस प्रकार प्रस्तुत भाष्यनिष्कर्ष में हमने प्रथम अध्याय से लेकर ३ ९ वें अध्याय तक के भाष्य में निर्दिष्ट अनेक विशेष विषयों पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है । कुछ छूटे हुए विषयों को हम यहाँ एक साथ प्रस्तुत करना चाहते हैं । चतुर्थ अध्याय के पयोव्रत ग्रहण के प्रकरण में ( ११-१६ ) हमें आत्मयजन की छवि देखने को मिलती है । प्रथम और द्वितीय अध्याय के वचनों को उद्धृत कर ऊपर हमने बताया है कि यजमान अनुष्ठान के प्रारम्भ में कैसे मनुष्यभाव से देवभाव को तथा अनुष्ठान की समाप्ति पर पुनः मनुष्य भाव को प्राप्त कर लेता है । ठीक उसी तरह की प्रक्रिया पयोव्रत ग्रहण की भी प्रतीत होती है । बृहदारण्यक उपनिषद् में भी बताया गया है कि देवगण उससे दूर हो जाते हैं, जो देवताओं को अपने से भिन्न मानता है । इसका अभिप्राय यही है कि आत्मयाजी को सर्वप्रथम अपने संकल्प को दृढ़ करना चाहिये कि मैं स्वयं देवभाव से सम्पन्न हूँ । ऋग्वेद ( १०।१३।१ ) में मानव को अमृत का पुत्र बताया है । इस विषय की चर्चा अभी हमने ऊपर की है । सातवें अध्याय के ४५ वें मन्त्र के ' चन्द्रदक्षिणा ' पद की व्याख्या करते समय शतपथ ब्राह्मण के " आत्रेयाय हिरण्यं ददाति " वाक्य को उद्धृत कर अत्रि ऋषि की चर्चा की गई है । यहाँ बसाया गया है कि अत्रि गोत्र के ब्राह्मण को चन्द्र ( सुवर्ण ) की दक्षिणा दी जानी चाहिये । इस प्रसंग में हमें रघुवंश का यह श्लोक याद आता है -- " अथ नयनसमुत्थं ज्योतिरत्रेरिव द्यौः ' ( २ । ७५ ) | यहाँ चन्द्र को अत्रि ऋषि के नयनों की ज्योति से उत्पन्न बताया गया है । टीकाकार मल्लिनाथ ने इस प्रसंग में हरिवंश को उद्धृत किया है । निघण्टु में हिरण्य के पर्यायों में चन्द्र का भी उल्लेख है । नायन ( नेत्रगत ) रश्मियों की और हिरण्य की तैजसता प्रसिद्ध ही है । हमें ऐसा लगता है कि चन्द्र, आत्रेय इत्यादि पद यहाँ इस पौराणिक कथा का संकेत दे रहे हैं । दसवें अध्याय के पचीसवें मन्त्र के भाष्य ( पृ ० ३४८ ) में शतपथ ब्राह्मण के प्रमाण से बताया गया है कि रथ से उतरते समय यजमान के साथ सारथि को नहीं उतरना चाहिये, क्योंकि अनुष्ठान का फल यजमान को ही मिलेगा, सारथि को नहीं । पंचचितिक चयन याग की प्रक्रिया ११-१८ अध्यायों में वर्णित है । यहाँ अनेक स्थानों पर ( ११।१, १३।४१ भू०-७

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( ४६ ) इत्यादि ) पाँच पशुओं का विधान है । इस विधान की प्रक्रिया बंगाल की काली उपासना में प्रचलित पंचमुण्डी प्रक्रिया से मिलती - जुलती है । इस प्रकरण की तुलनात्मक समीक्षा अपेक्षित है । आसन की ११ वें अध्याय के ही ६६ वें मन्त्र ( ' पृ ० ८ ९ ) के भाष्य में तथा अन्यत्र भी शब्दों का एक साथ प्रयोग मिलता है । ऐसा लगता है कि ऐसे स्थलों पर मन्त्र में मात्र सूचना रहती है और उसकी विस्तार से व्याख्या करना ही, उसकी प्रक्रिया को विषयवस्तु है । अनेक स्थानों पर मन्त्र और तन्त्र संक्षेप में कर्मकाण्डपरक पद्धति की स्पष्ट रूप से समझाना ही तन्त्र की १२ वें अध्याय के तीसरे मन्त्र के भाष्य ( पृ ० ११८ ) में षडुद्याम शिक्य की छः दिशाओं से तुलना की बौद्ध विद्वान् वसुबन्धु के - " षट्केन युगपद् योगात् परमाणोः षडंशता " ( विशिका १२ ) इस वाक्य में भी छ: दिशाओं गई है । रूप में इन्हीं का उल्लेख है । १३ वें अध्याय के नवें मन्त्र के भाष्य ( पृ ० २६० ) में प्रतिसर शब्द का अर्थ " राक्षसों का नाश करने वाले अग्निदेवताक मन्त्र " किया गया है । यह शब्द अतिव्यापक है और इसके अर्थ में भी परिवर्तन हो गया है । बौद्ध तन्त्रों में भी इसका विधान मिलता है । वहाँ प्रतिसरा ७ को रक्षा की देवी मान कर उसकी स्तुति की गई है । प्रतिसरा-स्तोत्र, प्रतिसराकल्पधारिणी, प्रतिसरास्तुति, महाप्रतिसरास्तोत्र, महाप्रतिसराधारिणी आदि स्तोत्र और धारणियाँ बौद्ध साहित्य में उपलब्ध हैं । इसी प्रसंग में यह भी अवधेय है कि वैदिक वसोर्धारा को भी वसुधारा देवी का रूप यहाँ दे दिया गया है | ईशानशिवगुरुदेव पद्धति ( भा ० २, पृ ० ११३ - ११ ९ ) में भी इसका विधान देखा जा सकता है । मन्त्र का अंश है - " सग्धि सपीतिमन्या " । यहाँ सग्धि और सपीति शब्द प्रयुक्त अर्थ दिया है, प्रायः उसी अर्थ में विज्ञानभैरव के एक श्लोक में जग्धि और पान । इतना अवश्य हुआ है कि इनके साथ वहाँ कौलिक प्रक्रिया भी २८ वें अध्याय के १६ वें हैं । भाष्यकारों ने इन शब्दों का जो शब्द प्रयुक्त हुए हैं ( श्लो ० ७१ ) इसी श्लोक में उल्लास और रस शब्द भी सिद्धियों का उल्लेख है । सहजसिद्धि के रूप में इन आठ सिद्धियों का लक्षण बताया है । दिखाई पड़ती है । जुड़ गई है । प्रयुक्त हैं और विष्णुपुराण ( १ | ६ | १६ ) में रसोल्लास आदि आठ इनका यहाँ वर्णन है और टिप्पणीकार ने स्कन्दपुराण के प्रमाण से परस्पर अनुस्यूत न होते हुए भी इनमें हमें एक अनोखी क्रमबद्धता ३७. प्रतिसर शब्द की चर्चा पहले ( पृ ० ३८ ) आ चुकी है । प्रतिसरा अथवा प्रतिसर शब्द का प्रयोग काव्य, नाटक आदि में भी मिलता है । भास के प्रतिज्ञायौगन्धरायण में यौगन्धरायण प्रतिहारी से कहता है - " त्वयंता लेखः प्रतिसरा च " ( पृ ० ८, मोतीलाल बनारसीदास, प्रथम संस्करण ) । भाषान्तरकार डॉ ० सुषमा पाण्डेय ने यहाँ टिप्पणी की है कि कुछ विशिष्ट पदार्थों को अभिमन्त्रित कर उनसे युक्त रक्षासूत्र को प्रतिसरा कहते हैं । युद्ध या यात्रा के समय सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा या उनका स्पर्श करा कर ब्राह्मणों द्वारा यह पहनाया जाता था । यह घोड़े, हाथी या पैदल सेना के लिये पृथक् - पृथक् होता था । इस संबन्ध में बृहत्संहिता का ४३ व अध्याय देखना चाहिये । घोड़ों की प्रतिसरा के लिये वहाँ कहा है-प्रतिसरया तुरगाणां भल्लातकशालिकुष्ठसिद्धार्थाः । कण्ठेषु निबध्नीयाः .... .... .... ॥ विवाह के अवसर पर बाँधे जाने वाले कौतुकसूत्र के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग भारवि के किरातार्जुनीय महाकाव्य में मिलता है - " विन्यस्तमङ्गलमहौषधिरीश्वरायाः स्रस्तोरगप्रतिसरेण करेण पाणि: " ( ५।३३ ) ।

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( ४७ ) इस प्रकार यथामति हमने इस महान् भाष्य के निष्कर्षो को अतिसंक्षेप में प्रस्तुत करने का यह लघु प्रयास किया है । यह प्रयास उसी प्रकार का है, जिसकी कि चर्चा रघुवंश के प्रारम्भ में महाकवि कालिदास ने की है, क्योंकि इस प्रस्तुति का प्रमुख आधार यह महनीय भाष्य ही रहा है । इस गरिमामय भाष्य की अतिविस्तृत भूमिका का भाषानुवाद करने तथा प्रथम और अन्तिम अध्यायों को छोड़ शेष पूरे भाष्य का सविधि सम्पादन करने में स्वामी करपात्री जी महाराज और इस कार्य के लिये प्रेरित करने वाले पुरीपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्री निरंजनदेव तीर्थ जी महाराज के प्रति श्रद्धा और श्रेष्ठिप्रवर श्री हनुमानप्रसाद जी धानुका की इस ग्रन्थ को शीघ्र प्रकाशित करा देने की आतुरता ने हमें प्रवृत्त किया था । इस कार्य को पूराहोते देख आज हमें परम सन्तोष की अनुभूति हो रही है । हमारी इस अनुभूति में श्रेष्ठिप्रवर श्री धानुका जी का भी समान भाग है । काल की विकरालता से ये चिन्तित अवश्य रहे हैं, किन्तु विपरीत परिस्थितियों में भी पूरे धैर्यं और दृढ निश्चय के साथ इस शुभ कार्य को शीघ्र पूरा करा देने का इनका अध्यवसाय सराहनीय रहा है । भाष्य का सम्पादन करते समय हमने प्रेस की सुविधा की दृष्टि से पूरी प्रेसकापी में यथास्थान अनुच्छेदों और पदच्छेदों का संयोजन तथा अन्य आवश्यक संशोधन किये हैं । श्रुति, स्मृति, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, शिवपुराण आदि के उद्धरणों का स्थलनिर्देश अनेक स्थानों पर नहीं हो पाया था । इस कार्य को पूरा करने का भरसक प्रयत्न किया गया है, तो भी कुछ वचनों का स्थलनिर्देश हम नहीं कर पाये हैं । इसके लिये हम क्षमाप्रार्थी हैं । कात्यायन श्रीसूत्र के वचनों का स्थलनिर्देश पद्मभूषण पं ० पट्टाभिराम शास्त्री जी के दिल्ली से प्रकाशित संस्करण के अनुसार हुआ है । शतपथ ब्राह्मण और सायण भाष्य, पाणिनि अष्टाध्यायी, भगवद्गीता, मनुस्मृति और उपनिषदों के सभी निर्दिष्ट स्थलों का एक बार पुनः परीक्षण कर उनमें भी यथास्थान संशोधन किया गया है । पूरे प्रयत्न के बाद भी संस्करण में कुछ त्रुटियाँ रह ही गई हैं । भाष्यनिष्कर्ष में इनमें से कुछ के परिमार्जन का प्रयत्न किया गया है । स्वाभाविक रूप से अभी अन्य त्रुटियाँ भी बची रह गई होंगी । विद्वानों से निवेदन है कि वे इस ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करायेंगे, जिससे कि भविष्य में उनका परिशोधन किया जा सके । स्वामी करपात्री जी महाराज ने अपने सहायक विद्वानों की सूचना स्वयं भाष्य के प्रारम्भ में दे दी है । अन्यविध सहायकों की नामावली प्रकाशकीय वक्तव्य में दी गई है । इस भाष्य के परिशुद्ध संस्करण के लिये हमारे ज्येष्ठभ्रातृकल्प पं ० श्री जनार्दन शास्त्री पाण्डेय जी ने पूरा सहयोग दिया है । इनके प्रति हम अपना आभार प्रकट करते हैं । हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रवाचक और वेदविद्या की सेवा के लिये काशी में ही नहीं, पूरे देश में प्रख्यात विद्वत्कुल के सदस्य डॉ ० श्रीकिशोर मिश्र जी ने हमारे विशेष आग्रह पर ४-१० अध्यायों का भाष्यसार लिखा । इसके लिये हम उनकी सर्वविध उन्नति की कामना करते हैं । भगवान् ज्ञानगुरु विश्वेश्वर से प्रार्थना है कि वे इसी प्रकार दत्तचित्त हो वेदविद्या की रक्षा और उन्नति के लिये निरन्तर क्रियाशील रहें । मुद्रण कार्य में सर्वविध सुविधा प्रदान कराने और इस बीच आये विघ्नों को दूर करने में श्री धानुका जी के सुयोग्य मुनीम श्री गिरिराजप्रसाद जी अग्रवाल का अपूर्व सहयोग रहा है । केशव मुद्रणालय के मालिक श्री मोहनलाल जी ने पूरे मनोयोग से इस कार्य को पूरा करने का संकल्प न लिया होता, तो अभी इस महनीय भाष्य के प्रकाशन में और भी विलम्ब होता । भाष्य के मुद्रण का कार्य तारा प्रेस, रत्ना प्रेस और आनन्द मुद्रणालय में भी थोड़ा - बहुत हुआ था । हम इन सबके प्रति अपनी शुभ कामना प्रकट करते हैं ॥ फाल्गुन पूर्णिमा, संवत् २०४ ९ वाराणसी । विद्वद्वशंवद व्रजवल्लभ द्विवेदी

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विषय - सूची प्रतिपाद्य विषय प्रकाशकीय वक्तव्य सिंहावलोकन दशाध्यायी ( १ - १० ) भाष्य निष्कर्ष efuser संख्या सप्तम अध्याय १ - २. दो कण्डिकाओं में स्थित तीन मन्त्रों से उपांशुनामक ग्रह का ग्रहण ३. उपांशु ग्रह से स्वल्प आहुतिदान एवं परिधि परिमार्जन ४ -५. अन्तर्याम पात्र में सोमरस का ग्रहण ६. अन्तर्याम ग्रह से आहुतिदान एवं पात्रासादन ७. ऐन्द्रवायव ग्रह में इन्द्रवायुदेवताक सोमरस का ग्रहण ८. ऐन्द्रवायव ग्रह से सन्तत धारा का दान ९. मैत्रावरुण पात्र में सोमरस का ग्रहण १०. मैत्रावरुण ग्रह के ग्रहण के बाद उसमें दुग्ध का संमिश्रण ११. आश्विन पात्र में सोमरस का ग्रहण १२. शुक्रसंज्ञक पात्र में वैल्व या वैकंकत पात्र से सोम का ग्रहण १३. अध्वर्यु का यूप की ओर गमन, यूपखण्ड का प्रक्षेप १४. अध्वर्यु अथवा यजमान द्वारा प्रस्तुत मन्त्र का जप १५. आहुतिदान के अनन्तर मन्त्रजप, चमस भक्षण १६. मन्थी ग्रह का ग्रहण १७. मन्थी ग्रह स्थित सोम में सक्तुओं का मिश्रण १८. प्रतिप्रस्थाता का उत्तर यूपप्रदेश की ओर गमन व यूपखंड प्रक्षेप १ ९ - २०. आग्रयण स्थाली में सोमरस की दो धाराओं का ग्रहण २१. ग्रहों के संमार्जन के लिये गृहीत दशापवित्र से स्थाली के मुख का वेष्टन, हिशब्द का तथा प्रस्तुत कण्डिका के प्रथम मन्त्र का तीन बार जप तथा शेष मन्त्र का एक बार जप २२. उक्थ्य स्थाली से धारा के रूप में उक्थ्य ग्रह में सोमरस का ग्रहण २३. उक्थ्य स्थाली में स्थित सोम के अंश का उक्थ्य पात्र ग्रहण २४-२५. उद्गाताओं के पश्चिम से ध्रुवस्थाली का आहरण तथा ध्रुव ग्रह का ग्रहण २६. भूमि पर गिरे हुए सोमबिन्दुओं के दोष के निराकरणार्थं ' विप्रुट् ' संज्ञक घृताहुति तथा वेदतॄण का ग्रहण

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( ५० ) afuser संख्या २७-२८. ग्रहण क्रम से अवकाशसंज्ञक मन्त्रों से अध्वर्यु द्वारा यजमान को ग्रहपात्रों का अवलोकन कराना २ ९. द्रोणकलश का अवलोकन करते हुए यजमान का मन्त्रजप ३०. अध्वर्यु तथा प्रतिप्रस्थाता द्वारा द्रोणकलश से रस का ग्रहण ३१. आहुति देने के बाद अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता द्वारा एक दूसरे के पात्र से सोमरस का निनयन ३२. ऐन्द्राग्न ग्रह का विकल्प से ग्रहण ३३ - ३४. शुक्रपात्र से वैश्वदेव ग्रह का ग्रहण ३५. मरुत्वतीय संज्ञक ग्रह का धारापद्धति से ग्रहण ३६. रिक्त ऋतुपात्र से अध्वर्यु द्वारा सशस्त्र मरुत्वतीय ग्रह का ग्रहण ३७-३८. वाचस्तोम में मरुत्वतीय ग्रह का ग्रहण ३ ९ -४०. द्रोणकलश से माहेन्द्र ग्रह का ग्रहण ४१. शालाद्वायं अग्नि में दक्षिणाहोम नामक घृताहुति का प्रदान ४२. चतुगृहीत घृत से शालाद्वार्यं अग्नि में द्वितीय आहुति का दान ४३-४४. आग्नीध्रीय अग्नि में सकृद्गृहीत घृताहुति प्रदान ४५. शाला के पूर्व में स्थित यजमान द्वारा दक्षिण दिशा में स्थित गायों को अभिमन्त्रित करना ४६. यजमान का सदःस्थान से आग्नीध्र के पास जाना ४७. यजमान द्वारा प्रदत्त हिरण्य, गाय, वस्त्र, अश्व आदि का अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता द्वारा ग्रहण ४८. मन्थ, ओदन, तिल आदि पदार्थों का दान स्वीकार करना अष्टम अध्याय १. प्रतिप्रस्थाता द्वारा आदित्य ग्रह का ग्रहण, हुतशेष का आदित्य स्थाली में आसिंचन २. आदित्य स्थाली से संस्रवों का तथा आदित्य ग्रह का ग्रहण ३. सोमधारा से विच्छिन्न कर आदित्य ग्रह का आनयन ४. आदित्य ग्रह को कुशा से ढँक कर आदित्य ग्रह में दधिसंमिश्रण ५. उपांशुसवन नामक पाषाणखण्ड के द्वारा आदित्य ग्रहपात्र में स्थित सोमरस का दधि से मिश्रण तथा पत्नी द्वारा पूतभृत् का अवलोकन ६-७. उपांशु और अन्तर्याम पात्र के बीच में सावित्र ग्रह का ग्रहण ८. सावित्र ग्रह पात्र से पूतभृत् के पास स्थित महावैश्वदेव ग्रह का ग्रहण ९. प्रतिप्रस्थाता द्वारा पात्नीवत ग्रह का ग्रहण तथा अध्वर्यु द्वारा घृत से सोम का मिश्रण १०. पात्नीवत ग्रह का आहवनीय में हवन, पत्नी द्वारा उद्गाता का अवलोकन ११. हारियोजन नामक ग्रह का ग्रहण तथा उसमें धाना का मिश्रण १२. यजमान सहित सभी ऋत्विजों द्वारा घाना का अवघ्राणम