वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 321–330

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 321–330

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म ० २४ ] वेदार्थपारिजात भाष्यसहिता २६७ वाज॑स्ये॒मां प्र॑स॒वः शिश्रिये दिव॑ममा च विश्वा भुव॑नानि स॒म्राट् । अदित्सन्तं दापयति प्रजानन् स नो॑ र॒यिं सर्व॑वीरं नियच्छतु स्वाहा ॥ २४ ॥

? वाजस्थान्नस्य प्रसव ईश्वर इमां पृथिवीं दिवं द्युलोकं च इमा इमानि विश्वानि अखिलानि भुवनानि भुवनानि शिश्रिये आश्रितवान् । स च सम्राट् सर्वेषां भुवनानां राजा भूत्वा अदित्सन्तं हविर्भोग्यं वा दातुमनिच्छन्तं मां प्रजानन् अवगच्छत् मदीयबुद्धिप्रेरणेन हविर्दापयति । नोऽस्मभ्यं सर्ववीरं सर्वैः पुत्रभृत्यादिभि-युक्तं रयिं धनं नियच्छतु नियमेन ददातु, ' दाणु दाने ' इत्यस्य यच्छादेशे रूपम् । अध्यात्मपक्षे — वाजस्यान्नस्य प्रसव उत्पादकः परमेश्वरः । नु विस्मये । इमां भूमि दिवं द्युलोकं विश्वानि सर्वाणि भुवनानि भूतानि जनान् लोकान् वा शिश्रिये पालनेन सेवते । स सम्राड् भुवनानां राजा भूत्वा प्रजाभ्योऽवश्यदातव्यमदित्सन्तं दापयति । दातृबुद्धिप्रेरणया परलोकभयोत्पादव शास्त्रेण दापयति । स नोऽस्मभ्यं सर्वैरभीप्रैर्युक्तं रयि ज्ञानविज्ञानलक्षणं धनं नियमेन ददातु । तस्मै स्वाहा सुहुतस्तु । दयानन्दस्तु – ' हे मनुष्याः, यथा वाजस्य राज्यस्य मध्ये प्रसव उत्पन्नः सम्राट् सम्यग् राजधर्मे वर्तमानोऽहम्, इमां भूमिं दिवं प्रकाशितां राजनीतिम्, तथा इमानि विश्वानि भुवनानि गृहाणि शिश्रिये आश्रये, तथैव यूयमपि तानि चाश्रयत । यः स्वाहा धर्म्यया वाचा प्रजानन् प्रज्ञावान् सन् अदित्सन्तं राजकरं दातु-मनिच्छन्तं दापयति, स नो सर्ववीरं सर्वे वीरा यस्मात् तद् रयिं धनं नियच्छतु नितरां गृह्णातु ' इति, तदपि यत्किञ्चिन्, शब्दार्थयोरसम्बन्धात् । तथाहि - वाजस्येति पदस्य राज्यस्य मध्य इति कथमर्थः? दिवमित्यस्य प्रकाशितां राजनीतिमित्यर्थोऽपि कामवाद एव । कथञ्चित् प्रकाशार्थत्वे उचितेऽपि नीत्यर्थता तु दुर्लभैव, मन्त्रार्थ- पृथ्वी पर नाना प्रकार के अन्न को उत्पन्न करने वाले परमात्मा ने द्युलोक के साथ इन समस्त भुवनों की सृष्टि की है । सबका अधिपति वह परमात्मा हवि न देने की इच्छा वाले में भी हवि देने के लिये पवित्र बुद्धि को कर आहुति देने के लिये प्रेरित करता है । वह पुत्र, भृत्य आदि से सम्पन्न कर हमें धन भी प्रदान करता है । हमारी यह आहुति प्रजापति परमात्मा के द्वारा भली प्रकार गृहीत हो ॥ २४ ॥

भाष्यसार - ' वाजस्येमाम् ' इस मन्त्र का याज्ञिक विनियोग भी पूर्व मन्त्र के विनियोग के अनुसार हवन में किया गया है । अध्यात्मपक्ष में अर्थ इस प्रकार है- - अन्न का उत्पादनकर्ता परमेश्वर इस भूमि को, द्युलोक को, समस्त लोकों को तथा प्राणियों को पालन के द्वारा सेवन करता है । ' नु ' पद विस्मयबोधक है । वह परमेश्वर लोकों का स्वामी होकर प्रजाओं के लिये अवश्य प्रदेय पदार्थ देने की इच्छा न रखने वाले से भी दिलवाता है । दाता की बुद्धि में प्रेरणा से, परलोक का भय उत्पन्न करने वाले शास्त्र के द्वारा भी प्रदान कराता है । वह हमारे लिये सभी अभीप्सितों से युक्त ज्ञान-विज्ञानात्मक धन निरन्तर प्रदान करे, उसके लिये समर्पण हो । स्वामी दयानन्द की व्याख्या शब्द तथा अर्थ में सम्बन्धराहित्य होने के कारण असंगत है । ' वाजस्य ' इस पद का ' राज्य के मध्य में ' यह अर्थ कैसे होगा? ' दिवम् ' इस शब्द का ' प्रकाशित राजनीति को यह अर्थ करना भी स्वेच्छाचार ही है | यदि किसी प्रकार प्रकाशार्थक होना उचित भी हो, तो भी इस पद की नीत्यर्थंकता असंभव ही है, क्योंकि भूमि शब्द के साथ पठित ' दिव: ' पद की द्युलोकचाचकता स्पष्ट है । इसी प्रकार ' जो नहीं देने वाले को कर दिलवाता है, वह मन्त्री हो;

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शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० ९ २६८ योऽदित्सन्तं करं दापयति स मन्त्री भवतु, भूमिसमभिव्याहृतस्य दिवो द्युलोकवाचित्वदर्शनात् । एवमेव बालभाषितम्, हिन्दीभाष्यविरुद्धत्वात् । न च करदानं यः शत्रुन्निगृह्णाति स सेनापतिः स्यादित्यादिवमपि भुवनानि आश्रयति, स सम्राडित्यपि निर्मूलम् ॥ २४ ॥

दापयित्रधनम्, तस्य शक्तिसाध्यत्वात् । यश्च सर्वाणि स॒र्वत॑ः । सने॑सि॒ राजा॒ परि॑याति वाज॑स्य॒ नु प्र॑स॒व आब॑भूव॒मा च॒ विश्वा॒ भुव॑नानि वि॒द्वान् प्र॒जां पुष्टि॑ व॒र्धय॑मानो अ॒स्मे स्वाहा॑ ॥ २५ ॥

आबभूव व्याप्नोत् सम्भावितवान् वाजस्य प्रसवो नु खलु इमानि विश्वा सर्वाणि भुवनानि सर्वतः सर्वत स्वेच्छया सञ्चरति । विद्वाननुष्ठीयमानं उत्पादितवान् वा । ससनेमि चिरन्तनो राजा दीप्तः सन् परियाति सम्बन्धः । स्वाहा सुहुतमस्तु । कर्म जानन् अस्मे अस्मदर्थं प्रजां पुष्टि च वर्धयमानो वर्धयन् परियातीति विश्वा सर्वाणि भुवनानि भूतानि अध्यात्मपक्षे- वाजस्यान्नस्योत्पादकः परमेश्वरः प्रजापतिः, । इमानि स सनेमि चिरन्तनो राजमानः परियाति सर्वतोऽवस्थितानि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि 1 आबभूव सम्भावितवान् अस्मासु प्रजां पुत्रशिष्यादिसन्तति पुष्टि भौतिका-व्याप्नोति । प्रजानन् स्वकर्तव्यमस्मदादिदैन्यं च जानन् अस्मे । ध्यात्मिकधनपोषं च वर्धयमानो वर्धयन् परियातीति सम्बन्धः । तस्मै सुहुतमस्तु नीत्या प्रसवो यः प्रसूयते स विद्वान् दयानन्दस्तु - ' यो वाजस्य वेदादिशास्त्रबोधस्य स्वाहा च विश्वानि सत्यया सर्वाणि भुवनानि माण्डलिक राजनिवास-सकलविद्यावित, आबभूव आसमन्ताद् भवेत्, इमा इमानि प्रजां पालनीयां पुष्टि पोषणं नु शीघ्रं वर्धयमानः स्थानानि सनेमि सनातनेन नेमिना धर्मेण सदा वर्तमानं राजमण्डलं इति, तदपि यत्किञ्चित् निर्मूलत्वात् । वाजपदस्य सर्वतः परियाति प्राप्नोति स अस्मे अस्माकं राजा भवतु ' से विपरीत होने के कारण अविचारित-जो शत्रुओं को निगृहीत करता है, वह सेनापति हो ' इत्यादि अर्थ भी हिन्दी भाष्य लोकों का आश्रय वह तो शक्ति द्वारा साध्य । जो समस्त रमणीय ही है । कर देना दिलाने वाले के अधीन नहीं है, लेता है, वह सम्राट् है, यह कथन भी अप्रामाणिक है ॥ २४ ॥

मन्त्रार्थ- ---- यह विस्मय की बात है कि नानाविध अन्न की सृष्टि करने वाले प्रजापति ने ही इन सम्पूर्ण कैसे से भर दिया है । यह पुरातन पुरुष सब भुवनों को, ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त पदार्थों को उत्पन्न कर उनको चारों तरफ और पुष्टि की वृद्धि करता है । उस कुछ जानने वाला है और सब जगह प्रकाशमान है । यह हमारे लिये सन्तति, धन परमात्मा के लिये हम यह आहुति देते हैं ॥ २५ ॥

' वाजस्य तु ' इस मन्त्र का विनियोग भी पूर्वं मन्त्रों की भाँति हवन में किया गया है । परमेश्वर प्रजापति ने समस्त लोकों अध्यात्मपक्ष में मन्त्र की अर्थ योजना इस प्रकार है- अन्न के उत्पादनकर्ता राजा सर्वत्र व्याप्त है । वह परमेश्वर अपने को, तृणपर्यन्त सर्वत्र स्थित भूत पदार्थों को संस्थापित किया है । वह चिरन्तन - आध्यात्मिक पुष्टि में वृद्धि करते कर्तव्य तथा हमारे दैन्य को जानते हुए हमारे लिये पुत्र- शिष्यादि सन्ततियों तथा भौतिक हुए संचरण करता है । उसके लिये समर्पण हो । नहीं है । वाज पद के ' वेदादि शास्त्रों से स्वामी दयानन्द द्वारा उल्लिखित अर्थ प्रमाणरहित होने के कारण ग्राह्य नहीं होता । यथार्थं बोध नियमतः उत्पन्न बोध ' इस अर्थ में कोई प्रमाण नहीं है । इस प्रकार का बोध नीति से उत्पन्न प्रति करना अयुक्त है, क्योंकि वह मात्र प्रमाण से उत्पन्न होता है । फिर यह प्रार्थना किसके प्रति की गई है? राजा के

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म ० २५–२६ } वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता २६ ९ , सुबोधस्य प्रमाणजन्यत्वनियमात् । वेदादिशास्त्रोत्पन्नबोधार्थत्वे मानाभावात् । न च तादृशो प्रार्थनामात्रसाध्यत्वाभावात् बोधो नीत्योत्पद्यते । सनेमि सनातनेन धर्मेण किन, कं प्रतीदं प्रार्थनम्? न च राजानं प्रति, तस्य सनेमिपदस्य पुरावाचकत्वेऽपि नेमिपदस्य सह वर्तमानं राज्यमण्डलमिति व्याख्यानं त्वपव्याख्यानमेव धर्मार्थत्वानुपपत्तेः ॥ २५ ॥

19 च बृह॒स्पति॒ सोम॒ राजा॑न॒मव॑से॒ ऽग्निम॒न्वार॑भामहे । आ॒दि॒त्यान् विष्णु सूर्य ब्रह्माणं स्वाहा ॥ २६ ॥

। वयम् अवसे रक्षणाय तिस्रोऽनुष्टुभस्तापसदृष्टाः । तत्र प्रथमा सोमाग्न्यादित्यविष्णु सूर्यबृहस्पतिदेवत्या च अन्वारभामहे आह्वानं कुर्महे । ते तर्पणाय वा सोमं राजानं वैश्वानरमादित्यान् विष्णुं सूर्यं ब्रह्माणं बृहस्पति सर्वे तत्त्वज्ञानाय, अनुगृह्णन्त्विति शेषः । वर्तमानं परमेश्वरमन्वारभामहे अध्यात्मपक्षे - वयम् अवसे रक्षणाय तर्पणाय वा सोमादिरूपेण प्रसिद्धमेव । अनेकविशेषणविशिष्टं सोमं आह्वयामः । सोमादीनां श्रीमद्भगवद्गीतादिरीत्यापि, भगवद्विभूतित्वं अनन्तगुणै राजमानम्, अग्नि जीवानां मोक्षसुखायाग्रे साम्बसदाशिवं वा आकारयामः । कीदृशं तम्? राजानम् वर्तमानान् स्वप्रकाशं ब्रह्माणं नेतारम्, आदित्यान् गमनागमनादिभिर्जनानामायूंष्याददानान् द्वादशादित्यात्मना । चतुर्मुखरूपेण वर्तमानं बृहतां पालकम् । तस्मै देवाय स्वाहा सर्वस्वमर्पयामः रक्षणाद्याय सह वर्तमानं विष्णुं व्यापकं दयानन्दस्तु - ' हे मनुष्याः, यथा वयं स्वाहा सत्यया वाण्या अवसे बृहस्पति बृहतामाप्तानां पालकम्, अग्निम् परमेश्वरं सूर्यं सूरिषु विद्वत्सु भवं ब्रह्माणम् अधीतसाङ्गोपाङ्गचतुर्वेदम्, व्याख्या करना भी सदोष है, क्योंकि ' सनेमि ' प्रार्थना से साध्य नहीं है । ' सनेमि ' अर्थात् ' सनातन धर्म के साथ ' इस प्रकार पद के प्राचीनता वाचक होने पर भी ' नेमि ' पद का धर्म अर्थ अयुक्त है ॥ २५ ॥

राजा सोम को, वैश्वानर मन्त्रार्थ -- सर्वविध अन्न के उत्पादक प्रजापति ने हम सब प्रजाओं के पालन के लिये उन सबका आह्वान करते हैं । उनके अग्नि को, बारह आदित्यों को, ब्रह्मा और बृहस्पति को नियुक्त किया है । हम उद्देश्य से दी गई यह आहुति भली प्रकार गृहीत हो ॥ २६ ॥

भी पूर्व को भाँति हवन भाष्यसार - याज्ञिक प्रक्रिया के अन्तर्गत ' सोमं राजानम् ' इस मन्त्र का विनियोग में किया गया है । तर्पण के लिये सोम आदि के रूपों में विद्यमान अध्यात्मपक्ष में मन्त्र की व्याख्या इस प्रकार है -हम लोग रक्षा अथवा आदि के प्रतिपादन से भी परमेश्वर का आह्वान करते हैं । सोम आदि का भगवद्विभूतिमान् होना श्रीमद्भगवद्गीता विशेषणों युक्त से साम्ब सदाशिव प्रसिद्ध ही है | अथवा अनेक विशेषणों से युक्त साम्ब सदाशिव का आह्वान करते वाले हैं, । किन द्वादश आदित्यों के रूप में वर्तमान, का? अनन्त गुणों से प्रकाशित, जीवों को मोक्षसुख के लिये आगे ले जाने सर्वस्व अर्पित करते हैं । स्वप्रकाशात्मक चतुर्मुख ब्रह्मा के रूप में विद्यमान, वाणियों के रक्षक उस देव के लिये हम स्वामी दयानन्द द्वारा प्रतिपादित अर्थ मुख्यार्थ को ही है । प्राचीन आचार्यों ने अपने ग्रन्थों में इस प्रकार के छोड़ कर गौण अर्थ का आश्रय लेने के कारण विडम्बनामात्र अर्थ का आश्रय नहीं लिया है । फिर इसमें उपदेशकर्ता कौन

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२७० शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० ९ अग्निमिव शत्रुदाहकम्, सोमं सोमगुणसम्पन्नम् राजानं धर्माचरणेन प्रकाशमानम्, आदित्यांश्च विद्यार्जनाय कृताष्टचत्वारिंशद्वर्षब्रह्मचर्यान् विदुषः संसेव्य गृहाश्रममन्वारभामहे, तथा यूयमप्यारभध्वम् ' इति, तदपि विडम्बनामात्रम्, मुख्यार्थं परित्यागगौणार्थाश्रयणस्यानौचित्यात् । कैश्विदाप्तैः केषुचिद् ग्रन्थेषु तादृशार्थस्याना-श्रयणात् । किञ्च कोऽयमुपदेष्टा? न तावत् कश्चिदाचार्य:, तथात्वे वेदस्येतिहासत्वापत्तेः । न चेश्वरः, तस्य विष्ण्वादिसेवकत्वानुपपत्तेः, गृहाश्रमानारम्भकत्वाच्च ॥ २६ ॥

अ॒र्य॒मण॑ बृह॒स्पति॒मिन्द्रं दानाय चोदय । वाच॒ विष्णु सर॑स्वती सवि॒तारै च वाजिन स्वाहो || २७ ॥ अर्यमबृहस्पतीन्द्रवाग्विष्णुसरस्वतीसवितृदेवत्या । हे वाजस्य प्रसव ईश्वर, त्वमर्यमादीन् देवान् दानाय चोदय प्रेरय । धनदानार्थमिन्द्रं देवेशं वाचं वागधिष्ठात्रीं सरस्वती ज्ञानाधिष्ठात्री विष्णं व्यापनशीलं यज्ञा-धिष्ठातारम्, सवितारं सर्वस्य प्रसवितारम्, वाजिनमन्नवन्तमिति सर्वेषां विशेषणम् । देवाश्वं वा ज्ञानप्राप्ती साहाय्यार्थं स्वाहा, अनुगृह्णन्त्विति शेषः । अध्यात्मपक्षे – हे परमेश्वर, त्वत्प्राप्तये प्रस्थिताय प्रयतमानाय मह्यं स्वांशभूतान् देवान् स्वांशभूतान् दानाय साहाय्यदानाय चोदय प्रेरय । यथाऽयमौजोदानेन, बृहस्पतिर्बुद्धिदानेन, इन्द्र ऐश्वर्यदानेन, वाक् स्वार्था-वभासनेन, विष्णुर्ज्ञानवैराग्यपालनेन, सरस्वती वेदतात्पर्य प्रकाशनेन, सविता ज्ञानोत्पादनेन, वाजी देवाश्वः साधना-नुष्ठाने वेगदानेन चानुगृह्णातु । है? कोई आचार्य उपदेष्टा नहीं हो सकता, क्योंकि तब वेद के इतिहास होने का दोष प्राप्त होगा । ईश्वर भी उपदेष्टा नहीं हो सकता, क्योंकि उसका विष्ण्वादिसेवकत्व युक्त नहीं हो सकता, गृहस्थाश्रम का आरम्भ भी उसके द्वारा करणीय नहीं है ॥ २६ ॥

मन्त्रार्थ -- हे परमात्मन्! अर्यमा देवता को, बृहस्पति और इन्द्र को, वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती को और सबके प्रसवकर्ता सूर्य को आपने उत्पन्न किया है । ये हमको अन्न और धन से परिपूर्ण कर दें, इसके लिये आप इन्हें प्रेरित कीजिये । आपकी प्रीति के लिये दी गई यह आहुति भली प्रकार गृहीत हो ॥ २१ ॥

भाष्यसार — ‘ अयंमणं बृहस्पतिम् ' इस मन्त्र का याज्ञिक विनियोग भी पूर्व मन्त्रों की भाँति हवन के लिये उपदिष्ट है । अध्यात्मपक्ष में अर्थ योजना इस प्रकार है- हे परमेश्वर, आपकी प्राप्तिहेतु अग्रसर तथा प्रयत्नशील मेरे लिये अपने अंशभूत देवताओं को सहायता प्रदान करने हेतु आप प्रेरित करें । जैसे अर्यमा बलप्रदान के द्वारा, बृहस्पति बुद्धिदान के द्वारा इन्द्र ऐश्वयं - प्रदान के द्वारा, वाग्देवी अपने अर्थ को प्रकट करने के द्वारा, विष्णु ज्ञान - वैराग्य की पुष्टि तथा रक्षा के द्वारा, सरस्वती वेद के तात्पर्य के प्रकाशन के द्वारा, सूर्य ज्ञान के उत्पादन द्वारा अनुग्रह करते हैं, वैसे ही देवताओं के अश्व भी साधनानुष्ठान में वेग प्रदान करने के द्वारा अनुग्रह करें ।

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म ० २७-२८ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता २७१ न्याय-दयानन्दस्तु - ' हे राजन् त्वं स्वाहा सत्यया नीत्या विद्यादिदानाय अर्यमणं पक्षपात राहित्येन, सरस्वतीं कर्तारम्, बृहस्पति सकलविद्याध्यापकम् इन्द्रं परमैश्वर्ययुक्तम्, वाचं वेदवाणीम्, विष्णुं सर्वाधिष्ठातारम् वेदविद्येश्वर्योत्पादकम्, बहुविधं सरो वेदादिशास्त्रविज्ञानं विद्यते यस्यां तां विज्ञानयुक्तामध्यापिकां स्त्रियं सवितारं वाजिनं प्रशस्त बलवेगादियुक्तं शूरवीरं सदा चोदय ' इति, तदपि निरर्थकम् प्रमाणशून्यत्वात् । अर्यमशब्दस्य पक्षपातराहित्येन न्यायकर्तार्थः इत्यत्र प्रमाणाभावात् । किञ्च वेदविद्यैश्वर्यस्य नहि मनुष्यः सम्भवत्यु- राज्ञः त्पादयिता, ईश्वरकर्तृकत्वाभ्युपगमविरोधात् । लोके संविधानेन नियुक्ता एव जनाः कर्तव्येषु प्रवर्तन्ते, प्रत्येकं प्रति चोदकत्वायोगात् । न च वेदवाणीं राजा प्रेरयितुं शक्नोति, तस्या एव राज्ञो नियामकत्वात् -, जडत्वे निष्क्रियत्वेन णिचोऽविषयत्वात्, ' सक्रियस्य च यः प्रेषः स प्रेषो विषयो णिचः ' इति शब्दशास्त्र नियमात् ॥ २७ ॥

अग्ने॒ अच्छ वद॒ह नः॒ प्रति॑ नः सुमना भव । प्र नौ यच्छ सहस्रजित् त्वं हि ध॑न॒दा असि॒ स्वाहा॑ ॥ २८ ॥

अग्निदेवत्या । हे अग्ने, इहास्मिन् कर्मणि नोऽस्माकं अच्छ आभिमुख्येन वह हितं कथय । नोऽस्मान् प्रति सुमनाः करुणार्द्रचेता भव । हे सहस्रजित् सहस्रसंख्याकस्य धनस्य जेतः, हि यतस्त्वं स्वभावतो धनदा असि अतोऽस्मभ्यं प्रकृष्टं धनं प्रयच्छ । सहस्राणां योद्धृणां वा जेतः! स्वाहा तुभ्यं सुहुतमस्तु । अध्यात्मपक्षे - हे अग्ने परमेश्वर, इहास्मिन् साधनमार्गे नोऽस्माकमच्छ वद आभिमुख्येन हितं ब्रूहि । संहितायां ' निपातस्य च ' ( पा ० सू ० ६ ३ १३६ ) इत्यच्छशब्दस्य दीर्घः । हे परमेश्वर, नोऽस्मान् प्रति सुमनाः करुणार्द्रचेता भव । हे सहस्रजित् अनन्तजित् सहस्रशब्दस्य अनन्तवाचित्वात्, अथवा अज्ञानादिजित् । स्वामी दयानन्द की व्याख्या प्रमाण से रहित होने के कारण अर्थहीन है । अर्यमा शब्द का अर्थ ' पक्षपातरहित होकर न्याय करने वाला ' करने में कोई प्रमाण नहीं है । वेदविद्यारूपी ऐश्वयं का उत्पादन करने वाला मनुष्य नहीं हो सकता, क्योंकि इससे ईश्वरकर्तृकत्व पक्ष का विरोध होता है । जगत् में संविधान के द्वारा नियुक्त व्यक्ति ही कर्तव्यों का पालन करते हैं, क्योंकि राजा प्रत्येक के प्रति प्रवर्तक नहीं हो सकता । राजा वेदवाणी को प्रेरणा प्रदान नहीं कर सकता, अपि तु वेदवाणी ही राजा की नियामिका हे ॥ २७ ॥

मन्त्रार्थ - हे अग्नि के अधिष्ठाता देव! आप इस यज्ञ में उपस्थित होकर हमारे कल्याण के लिये करुणा से ओतप्रोत हो जाँय । हे सबको जीतने वाले! आप स्वभाव से ही सबको धन - धान्य से परिपूर्ण करने वाले हैं । आप हमें भी धन दीजिये । एक मात्र आप ही हमारी प्रार्थना पूरी करने में समर्थ हैं । इस आहुति को स्वीकार कर आप हमारी प्रार्थना को सफल बनाइये । यह आहुति आपके द्वारा भली प्रकार गृहीत हो ॥ २८ ॥

भाष्यसार - याज्ञिक प्रक्रिया के अनुसार ' अग्ने अच्छा ' इस मन्त्र का विनियोग भी आहुतिप्रदान में किया गया है । अध्यात्मपक्ष में मन्त्र की असंगति इस प्रकार है - हे परमेश्वर, इस साधना के मार्ग में हमारे संमुख रहकर हित का उपदेश करें । हे परमेश्वर, हमारे प्रति करुणा से स्निग्ध हृदय वाले आप हों । हे अनन्तों पर विजय प्राप्त करने वाले, अथवा अज्ञानादि पर विजय प्राप्त करने वाले! इस सम्पूर्ण जगत् के नियामक होने के कारण परमेश्वर का अनन्तजेता

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२७२ [ अ ० ९ सर्वस्यैव तन्नियम्यत्वात् सुतरां परमेश्वरस्यानन्तजेतृत्वम् । हि यस्मात् त्वं स्वभावतो धनदा सर्वविधस्यैश्वर्यस्य दातासि, तस्मान्नोऽस्मभ्यं त्वत्कृपाकाङ्क्षिभ्योऽभीष्टत्वत्प्राप्तिरूपैश्वयं प्रयच्छ भौतिकाभौतिक-वयं सर्वस्वमर्पयामः ॥ स्वाहा तुभ्यं दयानन्दस्तु - ' हे अग्ने विद्वन् त्वमिहास्मिन् समये स्वाहा सत्यया वाण्या नोऽस्मान् प्रति अच्छ वद सत्यमुपदिश । नोऽस्मान् प्रति सुमनाः सुहृद्भावो भव । त्वं हि यतः सहस्रजिद् असहायः सन् सहस्रं सम्यग् जेतुं शीलः, धनदा ऐश्वर्यदातासि, तस्मान्नः सुखं प्रयच्छ ' इति, तदपि तुच्छम् असम्भवात् । तथाहि-- योद्धृन् मनुष्यो विद्वानपि नैवं सर्वैः प्रार्थयितुं शक्यः, तस्यानित्यत्वेना सार्वदिक्त्वात् । न चासौ सहस्रजित् कश्चिदपि वा सर्वेभ्य ऐश्वर्यदाता सम्भवति । राजापि संविधानबद्धो नैवं कर्तुं शक्नोति ॥ २८ ॥ सम्भवति, न

नौ यच्छत्वर्य॒मा पुषा प्र बृहस्पतिः । प्र वाग्दे॒वो द॑दातु॒ न॒ः स्वाहा॑ ॥ २ ९ ॥

गायत्री, अर्थम- पूष- बृहस्पति वाग्देवत्या | अर्थमादयो देवा नोडस्मभ्यं धनं प्रयच्छन्तु, पूषादिदेवतान्तर-वाचकपदेऽपि क्रियापदस्यानुषङ्गं द्योतयितुं प्रोपसर्गप्रयोगः प्रददतु । अर्यमा सूर्यविशेषः, नोऽस्मभ्यं प्रयच्छत्व-भीष्टं ददातु । पूषा प्रयच्छतु । उपसर्गावृत्त्या क्रियापदावृत्तिः । बृहस्पतिः प्रयच्छतु । देवी दीप्यमाना वाग् नो s स्मभ्यं ददातु स्वाहा । अध्यात्मपक्षे हे परमेश्वर, त्वया प्रेरितः, अर्यमा सूर्यविशेषः, नोऽस्मभ्यमभीष्टं तेजः प्रयच्छतु । देवो ज्ञानादिपोषणं प्रयच्छतु । बृहस्पतिर्बुद्ध्यधिष्ठाता देवः सद्बुद्धिं प्रयच्छतु । देवी देदीप्यमाना वेदलक्षणा वाग् नोऽस्मभ्यं वेदतात्पर्यज्ञानं प्रददातु । हे ईश्वर, तुभ्यं स्वाहा सुहुतमस्तु । होना स्पष्ट है, यतः आप स्वभावतः भौतिक, अलौकिक सभी प्रकार के ऐश्वयं को देने वाले हैं, अतः आपके कृपाकांक्षी हम लोगों को भी आपकी प्राप्ति हो, ऐसा अभीष्ट ऐश्वर्य प्रदान करें । आपके लिये हम सर्वस्व अर्पित करते हैं । स्वामी दयानन्द द्वारा निरूपित अर्थ में सबके द्वारा इस प्रकार प्रार्थित नहीं हो सकता, सहस्रजित् नहीं हो सकता । उसका सबके लिये राजा भी ऐसा नहीं कर सकता ॥ २८ ॥

असम्भव दोष होने के कारण वह अग्राह्य है । कोई भी मनुष्य, विद्वान् भी क्योंकि उसके अनित्य होने के कारण सर्वत्र स्थिति सम्भव नहीं है । वह ऐश्वर्य प्रदान करने वाला होना भी सम्भव नहीं है । संविधान से प्रतिबद्ध मन्त्रार्थ - हे परमात्मन्! आपके प्रसाद से अर्यमा देवता हमें अभीष्ट प्रदान करें । पूषा देवता और बृहस्पति देवगुरु हमारी मनोकामना पूरी करें । वाणी की अधिष्ठात्री देवी हमारी सारी अभिलाषाओं को पूर्ण करें ॥ २ ९ ॥ भाष्यसार - याज्ञिक प्रक्रिया के अनुसार ' प्र नो यच्छतु ' यह मन्त्र भी आहुति प्रदान में विनियुक्त किया गया है । अध्यात्मपक्ष में अर्थ योजना इस प्रकार है— हे परमेश्वर, आपके द्वारा प्रेरित सूर्य अर्थमा हमको अभीष्ट करें । पूषा देव ज्ञानादि पोषण प्रदान करें । बुद्धि के अधिष्ठाता बृहस्पति देव सद्बुद्धि प्रदान करें । तेज प्रदान वाणी हमारे लिये वेद का तात्पर्यज्ञान दे । हे ईश्वर, आपके लिये समर्पण हो । विद्योत्तमाना वेदरूपी

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मं ० २ ९ -३० ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता २७३ दयानन्दस्तु ' यथार्यमा न्यायाधीशो नोऽस्मभ्यं सुशिक्षां प्रयच्छतु यथा पूषा पोषकः पुष्टिं प्रददातु देदीप्य-, यथा वृहस्पतिर्विद्वान् स्वाहा सत्यविद्यायुक्तां वाणीं प्रार्पयतु वाग् विद्या सुशिक्षितवाणीयुक्ता, देवी, मानाध्यापिका माता अस्मभ्यं विद्यां प्रददातु ' इति, तदपि यत्किश्चित् यथापदस्य नित्यं तथापदसापेक्षत्वात् ), ' पूषा तस्य चात्रानुक्तत्वात् । पूषा क:? इत्यस्य चानुक्तत्वात् । यत्तु ' पूषा विशां विट्पतिः ' ( तै ० २।५।७१४ , विट्पत्यादि -वै पथोनामधिपतिः ' ( श ० १३ | ४ | ३ | १४ ) इति श्रुतिभ्यां तदुक्तमिति, तदपि पूतिकूष्माण्डायितम् शरीरात्मनां पोषकत्वानुपपत्तेः । न च विट्पतयोऽध्यापकत्वेन नियुज्यन्ते । न च वाक्पदमाञ्जस्येन विद्यासुशिक्षित-वाणीयुक्तायां मानुष्यां वर्तते, निष्प्रमाणत्वात् ॥ २ ९ ॥ दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम् । सर॑स्वत्यै वाचो य॒न्तुर्य॒न्त्रिये॑ दधामि॒ बृह॒स्पते॑ष्ट्वा साम्राज्येना॒भि षि॑ञ्चाम्यसौ ॥ ३० ॥

' शेषेणाभिषिञ्चति यजमानं देवस्य त्वेति ' ( का ० श्रौ ० १४ | ४ | ४० ) । होमानन्तरमोदुम्बर पात्रस्थेन हुतशेषेण, सप्तदशान्नपत्रोमिश्रोदकशेषेण यजमानमभिषिचेत् शिरसि । यजमानदेवत्यम् । सवितुः सूते इति सविता तस्य देवस्य द्योतमानस्य प्रसवे प्रेरणे वर्तमानोऽहमश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां त्वां वाचो वाण्या यन्तुरन्तर्यामिणो नियमने ऐश्वर्ये वा यन्तु नियन्त्र्याः पुस्त्वं छान्दसम्म, सरस्वत्यै षष्ठयर्थे चतुर्थी, सरस्वत्या वाग्देवताया अनेनाभिषेकेण यन्त्रिये यजमाने दधामि स्थापयामि । बृहस्पतेः साम्राज्येन सम्राड्भावेन त्वा त्वामभिषिनामि । वाग्देवताया ऐश्वर्ये बृहस्पतेः साम्राज्ये स्थापयामीत्यर्थः । मन्त्रान्ते असावित्यस्य स्थाने यजमानस्य सम्बुद्ध्यन्तं नाम गृह्णीयात् । यथा हे देवदत्तेति । अत्र ब्राह्मणम् – ' अथैनं परिशिष्टेनाभिषिञ्चति । अन्नाद्येनैवैनमेतदभिषिञ्चत्यन्नाद्यमेवास्मिन्नेतद्दधाति तस्मादेनं परिशिष्टेनाभिषिञ्चति ' ( ० ५ | २ | २०१२ ) । हुतशेषस्थान्नस्य विनियोगं दर्शयति -- अर्थनमिति भवति ॥ अथ एनं सुन्वन्तं यजमानं परिशिष्टेनान्नेनाभिषिचेत् । हुतशेषाभिषेकेण यजमानेऽन्नमेव निहितवान् ' सोऽभिषिञ्चति । देवस्य त्वा दधामीति वाग् वै सरस्वती तदेनं वाच एव यन्तुर्यन्त्रिये दधाति ' ( श ० ५।२।२।१३ ) । अभिषेकमनूद्य मन्त्रं विधत्ते -- सोऽभिषिचति देवस्य त्वेति । ' तदु हैक आहुः । विश्वेषां त्वा देवानां यन्तुर्यत्रिये दधामीति सर्वं वै विश्वे देवास्तदेन सर्वस्यैव यन्तुर्यन्त्रिये दधाति तदु तथा न ब्रूयात् सरस्वत्यै त्वा वाचो यन्तुर्यत्रिये दधामीत्येव ब्रूयाद्वाग्वै सरस्वती तदेनं वाच एव यन्तुर्यन्त्रिये दधाति बृहस्पतेष्ट्वा साम्राज्येनाभि-रखता है और स्वामी दयानन्द द्वारा निरूपित अर्थ असंगत है, क्योंकि ' यथा ' शब्द सर्वदा ' तथा ' शब्द को अपेक्षा इस अर्थ में ' तथा ' पद कहीं निरूपित नहीं हैं । पूषा कौन है? यह भी नहीं कहा गया है और वाक् शब्द सामान्य रूप से || २ ९ ॥ विद्या से सुशिक्षित वाणी से युक्त मानव महिला में प्रयुक्त नहीं हो सकता, क्योंकि एतदर्थ कोई प्रमाण नहीं है मन्त्रार्थ सविता देवता के द्वारा प्रेरित होकर दो अश्विनीकुमारों की भुजाओं से पूषा देवता के हाथों से, बृहस्पति के साम्राज्य भाव में तुम्हारा अभिषेक करता हूँ । है यजमान! मैं तुम्हें सरस्वती के ऐश्वयं से परिपूर्ण करता करता हूँ हैं । तुम्हारी वाणी में वागधिष्ठात्री देवी सरस्वती विराजमान हो । मैं अमुक नाम के यजमान का अभिषेक ( यहाँ यजमान का नाम लिया जाता है ) ॥ ३० ॥

से यजमान के सिर पर भाष्यसार - हवन के बाद गुलर के काष्ठ से निर्मित पात्र में रखे हुए हवनावशिष्ट पदार्थों ३५

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२७४ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० ९ ५ | २ | २ | १४ ) । अत्र पिनाम्यसाविति नाम गृह्णाति तद् वृहस्पतेरेवैनमेतत्सायुज्य सलोन तां प्रक्षिप्य गमयति प्रयोक्तव्यमिति ' ( श ० विधातुं पूर्वपक्षं तु सरस्वत्यै वाच इत्यस्य स्थाने सरस्वत्यै त्वा वाच इति युष्मच्छब्दं वाच इत्यस्य स्थाने विश्वेषां त्वा देवानामिति सोपपत्तिकमुद्भावयति तदु हैक इति । केचिच्छाखिनः सरस्वत्यै । परमतं निराकरोति - तदु तथा न प्रक्षिप्य ' यन्तुः ' इत्यादि पूर्ववत् प्रयोक्तव्यमिति स्वमतं दर्शयितुमुक्तम् तात्पर्याभावात् । ब्रूयादिति । तस्यापि स्वपक्षस्तुतावेव तात्पर्यं वेदितव्यम्, शाखान्तरनिन्दने निवेदयत्ययं महावीर्यो ' अथाह । सम्राड्यमसौ सम्राडयमसाविति निवेदितमेवैनमेतत्सन्तं देवेभ्यो यज्ञः ' ( श ० ५ २ २ १५ ) । योऽभ्यषेचीत्ययं युष्माकैकोऽभूत् तं गोपायतेत्येवैतदाह त्रिष्कृत्व । एतन्नामाऽयमभिषिक्तः आह त्रिवृद्धि सम्राड् महावीर्यो जातः । अत्राप्यसावित्यस्य स्थाने प्रथमान्तं यजमाननाम ग्रहीतव्यम् प्रथमं मनुष्येभ्यो निवेदितमेव सन्तम् एनं आवेदनवाक्यावृत्तेरभिप्रायमाह -- निवेदितमिति । एवं नामग्रहोक्त्या, अयं महावीर्यः सम्पन्नः । पर्यवसित-द्वितीयेन सम्राड्यमसावित्यनेन देवेभ्यो निवेदयति । यो यजमानोऽभ्यषेचि एकोऽभूत् । हे देवास्तं गोपायत । तदेतस्य मर्थमाह अयं युष्माकेति । अयमभिषिक्तो यजमानः, युष्माकं मध्ये त्रित्वं विधत्ते - त्रिष्कृत्व इति । यज्ञस्य सवनत्रयात्मकत्वात् त्रिवृत्त्वम् । न मनुष्यस्य अध्यात्मपक्षे --साधको भगवत्पूजार्थं प्रतिमां स्थापयति - हे भगवन्, त्वं बाहुभ्यां तु दिव्योऽप्राकृतो पूष्णो हिरण्यमयाभ्यां बाहुभ्यां हस्ताभ्यां स्प्रष्टुमपि शक्यः, अतो भावनाविशेषेण अश्विनोदिव्याभ्यां वाचो वेदलक्षणाया यन्त्रिये नियमने तद्वशंवदतया, हस्ताभ्यां त्वां पूजायै दधामि स्थापयामि । तथैव यन्तुर्यन्त्र्या तवैव सर्वपूज्यत्वात् । अथवा-बृहस्पतेर्वेदवाण्याः पत्युः पालकस्य सम्राट्त्वेन असावहं त्वामभिषिञ्चामि साधकं भगवद्भक्तमश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो सवितुर्जगदुत्पादकस्य परमेश्वरस्य प्रेरणे वर्तमानोऽहमाचार्यस्त्वां यन्तु नियन्त्र्या यन्त्रिये नियन्त्रणे त्वां दधामि हस्ताभ्यां सरस्वत्या ज्ञानविज्ञानाधिष्ठात्र्या वेदलक्षणाया वाचो । सम्यग् राजते दीप्यत इति सम्राट् स्थापयामि । बृहस्पतेः साम्राज्येन सम्राड्भावेन त्वामभिषिञ्चामि त्वां ब्रह्मपदेऽभिषिञ्चामि । स्वप्रकाश आत्मा । तद्रूपेण देहेन्द्रियभावापनोदनेन ब्रह्मात्मभावेन प्रकाशमानस्य दयानन्दस्तु -- ' हे अखिलशुभगुणकर्मस्वभावयुक्त विद्वन् असावहं , अश्विनोः सर्वजगदुत्पादयितुः सूर्याचन्द्रमसोर्ब लाकर्षणाभ्यां उत्पन्ने संसारे सरस्वत्यै विज्ञानसुशिक्षायुक्ताया वाचो मध्ये वेदवाण्याः विनियोग कात्यायन श्रौतसूत्र ( १४ । ४ । ४० ) ' देवस्य त्वा ' इत्यादि मन्त्र से अभिषेक किया जाता है । यह याज्ञिक प्रक्रिया का में प्रतिपादित है । शतपथ ब्राह्मण में याज्ञिक प्रक्रिया के अनुकूल अर्थं उपदिष्ट है । की स्थापना करता है । हे भगवन्, अध्यात्मपक्ष में अर्थ इस प्रकार है- साधक भगवान् की पूजा के लिये प्रतिमा विशेष नहीं स्पर्श किये जा सकते । इस कारण आप तो दिव्य हैं, अप्राकृत हैं, अतः मनुष्य की भुजाओं तथा हाथों से हाथों से आपको पूजा के लिये स्थापित करता भावना के द्वारा अश्विनीदेवों की दिव्य भुजाओं से पूषा देवता के स्वर्णमय आपका सम्राट् रूप से मैं अभिषेक कर रहा हूँ, हूँ । इसी प्रकार वेदात्मिका वाणी के अनुगत होकर वेदवाणी के पालक क्योंकि आप ही सबके पूज्य हैं । भगवद्भक्त तुमको अश्विनीदेवों की अथवा जगदुत्पादक परमेश्वर की प्रेरणा के अन्तर्गत अवस्थित में आचार्य साधक नियामिका के अनुशासन में तुमको भुजाओं से, पूषा देव के हाथों से, ज्ञान - विज्ञान की अधिष्ठात्री वेदरूपिणी से वाणी तुम्हारा अभिषिचन करता हूँ । तद्रूप के स्थापित करता हूँ । बृहस्पति के सम्राट् रूप से, अर्थात् स्वप्रकाश आत्मस्वरूप पर अभिषिक्त करता हूँ । द्वारा, अर्थात् देहेन्द्रियभाव का निराकरण करते हुए ब्रह्मात्वभाव के द्वारा तुमको ब्रह्मपद में हवन से अवशिष्ट अन्नादि के स्वामी दयानन्द द्वारा प्रतिपादित अथं श्रुतिवाक्यों से विरुद्ध है । शतपथ श्रुति

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म ० ३०-३१ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता २७५ भुजाभ्याम्, पूष्णः पोषकस्य वायोर्धारणपोषणाभ्यां हस्ताभ्यां त्वां दधामि । यन्तुर्नियन्तु बृहस्पतेः परमविदुषः त्रये शिल्पविद्या सिद्धानां यन्त्राणामहे योग्ये निष्पादने साम्राज्येन सम्राजो भावेन त्वामभिषिञ्चामि । सुगन्धेन रसेनमामि । असौ अदोनाम ' इति, तदपि श्रुतिविरुद्धमेव, ' अथैनं परिशिष्टेनाभिषिञ्चति ' ( श ० ५।२।२।१२ ) इति पूर्वोद्धतश्रुतौ हुतशिष्टैरन्नैरभिषेक उक्तः । नत्र सम्बोधनीयो विद्वान् प्रमाणसिद्धः । नहि सूर्याचन्द्र-मसोर्बला कर्षणाभ्यां वायोर्धारिणपोषणाभ्यां परमविदुष एव धारणम्, तेषां सर्वान् प्रति समत्वात् । नहि बृहस्पतिपदस्य शिल्प परत्वम्, न वा यन्त्रिय इत्यस्य शिलापरत्वं प्रामाणिकम्, कल्पनामात्रत्वात् ॥ ३० ॥

अ॒ग्निरेका॑क्षरेण प्राणमुद॑जय॒त् तमुज्जैषम॒श्विनो॑ ह॒चक्षरेण॑ द्वि॒पवो॑ मनु॒ष्या॑नु॒द॑जयतां॒ तानुज्जैषं॒ विष्णुस्त्रयक्षरेण त्रल्लो॒कानुद॑जय॒त् तानुज्जैषि॒ सोम॒श्चत॑रक्षरेण॒ चतु॑ष्पदः प॒शूनुदंज-य॒त् तानुज्ज॑षम् ॥ ३१ ॥

' अग्निरे काक्षरेणेत्यनुवाकं द्वादशवत् कृत्वेति ' ( का ० श्र ० १४ | ४ | ४४ ) । चतुः कण्डिकात्मकमनुवाकं द्वादशवद् द्वादशस्रुबाहुतीर्जुहोत्यागये स्वाहेति प्रतिमन्त्रं वाचयति वेति । यत्पूर्वमुक्तं तद्वदित्यर्थः । तेन तैर्मन्त्रैर्जुहोति सप्तदश मन्त्रान् वाचयति वेत्यर्थः । एते मन्त्रा उज्जितिसंज्ञकाः । सप्तदश यजूंषि लिङ्गोक्तदेवत्यानि । तत्र अग्निरेकाक्षरेण ' ' ' ' प्रजापतिः सप्तदशाक्षरेणेत्याद्यन्तयोर्ग्रहणेन सप्तदश मन्त्राः सर्वेऽपि गृह्णन्ते । तेषां संग्रहेणायमर्थः - ओश्रावयेति चतुरक्षरम्, अस्तु श्रौषडिति चतुरक्षरम्, यजेति द्वयक्षरम्, ये यजामह इति पञ्चाक्षरम्, ' द्वयक्षरो वषट्कारः स एष सप्तदशः प्रजापतिः ' ( तै ० सं ० १।६।११।२-३ ) तथा ( श ० ५।२।२।१६ - १७ ) । तत्राग्न्यादि-सप्तदश देवा एकाक्षरप्रभृत्ये कै काक्षरवृद्धियुक्तः प्राणमनुष्यादीन् जितवन्तः । तानग्न्यादिभिर्जितान् प्राणनरादीनह-मिदानीमुज्जेषम् उज्जीयासम् । अश्विदेवतादिभिर्मन्त्राक्षरसंख्यानुसारेण द्विपान्मनुष्य त्रिलोकादेर्जयो विज्ञेयः । त्रिवृत्स्तोमगतानामृचां नवसंख्योपेतत्वान्नवाक्षरेण तज्जयः । त्रयोदशस्तोमादावपि तिसृणां स्तोत्रियाणा-मृचामावृत्तिविशेषेण तत्संख्या द्रष्टव्या । द्वारा अभिषेक विहित है । इनमें सम्बोधित किया जाने वाला विद्वान् प्रमाण से सिद्ध नहीं है । सूर्य तथा चन्द्रमा के बल और आकर्षण से एवं वायु के धारण तथा पोषण से परम विद्वान् का ही धारण होता है, यह उचित नहीं है, क्योंकि तो सबके लिये समान हैं । बृहस्पति शब्द का अथवा यन्त्रिय शब्द का शिल्प अर्थ करना प्रामाणिक नहीं है, यह तो केवल काल्पनिक है ॥ ३० ॥

मन्त्रार्थ - अग्नि देवता ने एक अक्षर वाले छन्द के प्रभाव से उत्कृष्टतम प्राण को जीत लिया है, मैं भी इस प्राण को एक अक्षर के प्रभाव से जीत लूँ । अश्विनीकुमारों ने दो अक्षरों वाले छन्द के प्रभाव से दो पैरों वाले मनुष्यों को जीत लिया है, मैं भी दो अक्षरों के प्रभाव से उनको जीत सकूँ । विष्णु देव ने तीन अक्षर के छन्द से तीनों लोकों को जीत लिया है, मैं भी उनके प्रभाव से तीनों लोकों को जीत सकूँ । सोम देवता ने चार अक्षर वाले मन्त्र के प्रभाव से चोपायों को जीत लिया है, मैं भी उस मन्त्र के प्रभाव से चार पैरों वाले सभी पशुओं को जीत सकूँ ॥ ३१ ॥

भाष्यसार -- कात्यायन श्रौतसूत्र ( १४१४१४४ ) में प्रतिपादित याज्ञिक विनियोग के अनुसार ' अग्निरेकाक्षरेण ' इस कण्डिका के मन्त्रों से स्रुव के द्वारा आहुति दी जाती है, अथवा इनका वाचन किया जाता है । इन चार कण्डिकाओं

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२७६ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० ९ तदेवोक्तं ब्राह्मणेन -- ' तद्यदेवैताभिरेता देवता उदजयंस्तदेवैष एताभिरुज्जयति सप्तदश पञ्चवृत्तिकमुदजयद् भवन्ति सप्तदशो वै प्रजापतिस्तत्प्रजापतिमुज्जयति ' ( श ० ५२ १२ १७ ) | अग्निरेवारेण छन्दसा अश्विनौ प्राणं द्वयक्षरेण अक्षर-उत्कृष्टं जितवान् तथामपि तादृशं प्रागमुज्जेपमुत्कृष्टं जयेयं वशीकुर्याम् तथाहमपि । तेनैव द्वयक्षरेण छन्दसा द्वयात्मकेन छन्दसा द्विपदः पादद्वयोपेतान् मनुष्यानुदजयतां जितवन्तौ भूरादीन् लोकानुदजयत्, द्विपदो मनुष्यानुज्जेषमधिकं जयेयम् । विष्णुस्त्र्यक्षरेणाक्षरत्रयात्मकेन छन्दसा त्रीन् पशूनुदजयत्, अहमपि तल्लोकानुज्जेषम् । सोमोऽक्षरचतुष्टयात्मकेन छन्दसा चतुष्पदः पादचतुष्टयोपेतान् । वाचयति व ' ' ' ' ' ' ' श ० ५।२।२।१६ ) । अहमपि तेन पशूनुज्जेषम् । अत्र ब्राह्मनम् ' अयोज्जितीर्जुहोति वा । ' स वाचयति । अग्निरेकाक्षरेण ' उज्जयलिङ्गयुक्तमन्त्रकरणिका आहुतय उज्जितयः, ता जुहोति वाचयति सप्तदशो वै प्रजापतिस्तत्प्रजापति-तद्यदेवैताभिरेता देवता उदजयंस्तदेवैष एताभिरुज्जयति सप्तदश भवन्ति मुज्जयति ' ( ० ५१२२।१७ ) । अध्यात्मपक्षे - साधकः परमात्मानं प्रार्थयते, हे भगवन्! यथा अग्निर्देव एकाक्षरेण छन्दसा प्राणमुदजयत् तान्, तथाहमपि त्वत्प्रसादात् प्राणं जयेयम् । अश्विनौ यथा द्वयक्षरेण छन्दसा मनुष्यानुदजयताम् सोमश्चतुरक्षरेण , तथाहमपि छन्दसा जयेयम् । यथा विष्णुस्त्यक्षरेण त्रींल्लोकानुदजयत्, तथाहं तान् प्रतिष्ठास्यामीत्यभिप्रायः जयेयम् । यथा । पशूनुदजयत्, तथाहमपि त्वत्प्रसादात् सर्वानतिक्रम्य ब्रह्मभावेन प्रजाजन-दयानन्दस्तु - ' हे राजन्, अग्निर्भवान् यथा एकाक्षरेण प्रणवेन प्राणमिव शरीरस्थं भवन्तौ वायुमिव यथा द्वयक्षरेण मुदजयत्, तथाहमप्युज्जेषं जयेयम् उत्कर्षेयम् । हे अश्विनौ राजजनों, सूर्यचन्द्राविव । हे विष्णो सर्वप्रधानपुरुष, यान् द्वयक्षरेण दैव्युष्णिक छन्दसा द्विपदो मनुष्यानुदजयताम्, तथा तानहमप्युज्जेपम् तथाहमपि तानुज्जेषम् । विष्णुरिव भवान् यथा त्र्यक्षरेण त्रींल्लोकान् जन्मस्थाननामात्मकान् उत्कृष्टानकरोत् हे न्यायाधीश, सोम इव भवान् यथा चतुरक्षरेण दैव्या बृहत्या चतुष्पदः पशून हरिणादीन् आरण्यानुदजयद् उत्कृष्टानकरोत् तथाहमपि तानुदजेषम् ' इति, तदपि यत्वि चित्, एकाक्षरादिभिः कथं प्रजाजनादीनामुत्कृष्टत्वा- कथमुत्कृष्टत्वा-पादनमित्यस्यास्पष्टत्वात् । द्विपदां जन्मकर्मनामात्मकानां लोकानां हरिणादीनां तैस्तैश्छन्दोभिः पादनं मनुष्यैः क्रियते? इत्यस्यावर्णनात् सारशून्यत्वात् । सिद्धान्ते तु देवा दिव्यशक्तिमन्तोऽतश्छन्दोभिः समेषामुज्जयः सम्भवत्येव ॥ ३१ ॥

का एक अनुवाक है । इस अनुवाक के सत्रह मन्त्रों की संज्ञा ' उज्जिति है । शतपथ ब्राह्मण में याज्ञिक प्रक्रिया के अनुकूल अर्थं उपदिष्ट है । अध्यात्मपक्ष में अर्थ इस प्रकार --- साधक परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे भगवन, जिस प्रकार अग्नि देव ने अश्विनीदेवों ने एकाक्षर छन्द से प्राण को वश में कर लिया, मैं भी आपकी कृपा से प्राण को वश में करूं । जिस प्रकार द्वयक्षर छन्द के द्वारा मनुष्यों को वशीभूत किया, उसी प्रकार मैं भी मनुष्यों को वशीभूत करूँ । जिस प्रकार विष्णु ने त्र्यक्षर छन्द से तीनों लोकों को जीता, उसी प्रकार मैं भी उनको जीतूं | जैसे सोम ने चतुरक्षर छन्द से पशुओं को विजित किया, उसी प्रकार मैं भी आपके अनुग्रह से सबको अतिक्रान्त करके ब्रह्मभाव के द्वारा प्रतिष्ठित होऊँ । स्वामी दयानन्द द्वारा निरूपित अर्थ में एकाक्षर आदि के द्वारा प्रजाजन आदि की उत्कृष्टता प्राप्ति कैसे हुई? यह अस्पष्ट होने के कारण संगति नहीं है । दो पादों वाले, जन्म, कर्म, नाम से युक्त प्राणियों, हरिण आदि का उन उन छन्दों से कैसे उत्कर्ष साधन मनुष्यों के द्वारा किया गया, इसका निरूपण न होने के कारण व्याख्यान निस्तत्त्व है । हमारे अभिमत पक्ष में तो देवता दिव्य शक्तिमान् हैं, छन्दों से सबका उत्कर्ष सम्भव ही है ॥ ३१ ॥