वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 331–340

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 331–340

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म ० ३२ ] 9 वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता २७७ पूषा पञ्चक्षरेण॒ पञ्च॒ दिश॒ उद॑जय॒त् ता उज्जैष सवि॒ता षड॑क्षरेण॒ षड॒तद॑जय॒त् तानुज्जैषं म॒रुत्त॑ः स॒प्तच॑रेण स॒प्त ग्राम्यात् प॒शूनव॑जयँस्तानुज्र्ज्ञेषु॑ बृह॒स्पति॑र॒ष्टाक्ष॑रेण गाय॒त्री-मुद॑जय॒त् तामुज्जेषम् ॥ ३२ ॥

-पूषा देवः पञ्चाक्षरेण छन्दसा पञ्च संख्या: पूर्वाद्याश्चतस्रोऽवान्तरदिशचेति पञ्च दिश उदजयत्, अहमपि तेन ता जयेयम् । सविता सर्वस्य प्रेरको देवः पडक्षरेण छन्दसा पट्संख्यान् ऋतूनुदजयत्, तानृतूनहमुज्जेषम् । मरुतो देवाः सप्ताक्षरेण छन्दसा सप्तसंख्याकान् ग्राम्यान् पशून् गवादीनुदजयन्, अहं तानुज्जेषम् । बृहस्पतिरष्टा-क्षरेण गायत्री छन्दोऽभिमानिनीं देवतामुदजयत्, तां तादृशीं गायत्री जयेयम् । अध्यात्मपक्षे - - हे भगवन्, पपा देवः पश्चाक्षरेण छन्दसा यथा पञ्च दिश उदजयत्, तथैवाहं तां भवदनु-कम्पया जयेयम् । सविता यथा पडक्षरेण छन्दसा पड़ऋनुदजयत्, तथैवाहं तानुज्जयेयम् । मरुतः सप्ताक्षरेण छन्दसा सप्त ग्राम्यान् गवादीन् यथोदजयन्, तथाहं भवतः प्रसादात् तानुज्जयेयम् । बृहस्पतिर्यथाऽष्टाक्षरेण गायत्री गायत्रीच्छन्दोऽभिमामिनीं देवतामुदजयत्, तथा तामहमुज्जेषम् । ता दयानन्दस्तु - ' हे राजन्, पूषा भवान् यथा पञ्चाक्षरेण याः पञ्च दिश उदजयत् तथाहमपि उज्जेषम् । सविता भवान् यथा पडक्षरेण ऋतूनुदजयत्, तथा तानहमप्युज्जेषम् ' इत्यादिकं तु पूर्ववदेवासङ्गतम् । न । च कोऽपि मनुष्यो राजा वाऽमात्यो वा छन्दोभिः सर्वा दिश उत्तमयति । ' उत्तम कीर्त्या बिर्भात ' इति तु निर्मूलमेव । छन्दसां तथैव ऋतूनां शोधनमपि निर्मूलम् मन्त्रे तादृशपदाभावात् । शोधनमपि प्रकृत्यैव भवति, न मनुष्येण मन्त्रार्थ -- पूषा देवता ने पंचाक्षर छन्द के प्रभाव से पाँच दिशाओं को जीत लिया है, उसी के प्रभाव से मैं भी उन दिशाओं को जीत सकूँ । सविता देवता ने षडक्षर छन्द के प्रभाव से छः ऋतुओं को पूरी तरह से जीत लिया है, उसी के प्रभाव से मैं भी छः ऋतुओं को जीत सकूँ । मरुद् देवताओं ने सप्ताक्षर मन्त्र के प्रभाव से सात प्रकार के ग्रामीण गो आदि पशुओं को जीत लिया है, मैं भी उनको जीत सकूँ । बृहस्पति ने अष्टाक्षर मन्त्र के प्रभाव से गायत्री छन्द के अभिमानी देवताओं को अपने वश में कर लिया है, मैं भी अष्टाक्षर मन्त्र के प्रभाव से उनको अपने वश में कर सकूँ ॥ ३२ ॥

भाष्यसार --- ' पूषा पञ्चाक्षरेण ' इस कण्डिका के मन्त्र भी उज्जिति संज्ञक हैं, इनका याज्ञिक विनियोग भी पूर्ववत् आहुति या वाचन में किया गया है । अध्यात्मपक्ष में अर्थ योजना इस प्रकार है पूपा देव ने पंचाक्षर छन्द के द्वारा पाँचों दिशाओं पर विजय प्राप्त की । सविता देव ने षडक्षर छन्द से छः ऋतुओं को जीता । मरुद्गणों ने सप्ताक्षर छन्द से सात ग्राम्य पशुओं को वशीभूत किया तथा बृहस्पति देव ने अष्टाक्षर छन्द के द्वारा गायत्री छन्द की अधिष्ठात्री देवी को प्राप्त किया । उसी प्रकार मैं भी आपकी कृपा से उनको अधिगत करूँ, सबका अतिक्रमण करके ब्रह्मभाव से प्रतिष्ठित होऊँ । स्वामी दयानन्द द्वारा निरूपित अर्थ पूर्व की भांति संगतिरहित है । कोई भी मनुष्य राजा अथवा मन्त्री छन्दों से सभी दिशाओं को उत्तम नहीं करता । इसी प्रकार ऋतुओं का शोधन करना भी अप्रामाणिक है, क्योंकि मन्त्र में एतदर्थ कोई पद नहीं है । शोधन भी प्रकृति से ही होता है, मनुष्य के द्वारा नहीं होता । छन्दों का उनमें उपयोग तो असिद्ध ही है । गो आदि ग्राम्य पशुओं का वर्धन ही उज्जिति है, यह भी निर्मूल है । गायत्री पद का गान करने वाले की

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२७८ शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० ९ तु तत्रोपयोगोऽसिद्ध एव । गवादीनां ग्राम्याणां पशूनां वर्धनमुज्जितिरित्यपि निर्मूलम् । गायत्रीपदस्य गानकर्तुः पालयित्री नीतिरित्यपि निर्मूलमेव । नहि नीतिर्गातुरेव पालयित्री भवति । उदजयदित्यस्य न प्रतिष्ठार्थः, बीजाभावात् ॥ ३२ ॥

मि॒त्रो नवक्षरेण त्रिवृत स्तोम॒मुव॑जय॒त् तमुज्जेष॒ वरु॑णो॒ दर्शाक्षरेण वि॒राजमुद॑जय॒त् तामुज्जैष॒मिन्द्र॒ एकदशाक्षरेण त्रि॒ष्टुभ॒सुव॑जय॒त् लामुज्जैषु॒ विश्वे॑दे॒वा द्वाद॑शाक्षरेण॒ जग॑ती॒मुदं -जयंस्तामुज्जैष॒म् ॥ ३३ ॥

मित्रो देवो नवाक्षरेण छन्दसा त्रिवृतं स्तोममुदजयत् तं तादृशं स्तोममहमुज्जेषम् । वरुणो देवो दशाक्षरेण छन्दसा विराजम् ' दशाक्षरा विराट् ' इति श्रुतिप्रसिद्धां तदभिमानिनीं देवतामुदजयत्, तामहमुज्जेषम् । इन्द्रो देव एकादशाक्षरेण छन्दसा त्रिष्टुप्छन्दोऽभिमानिनीं देवतामुदजयत् तामहमुज्जेषम् । विश्वे देवा द्वादशाक्षरेण जगतीमुदजयन्त, तामहमुज्जेषम् । अध्यात्मपक्षे - हे भगवन्नित्यादि पूर्ववद् योजना कर्तव्या । सर्वानतिक्रम्य ब्रह्मभावेन प्रतिष्ठास्यामीति सर्वेषामेषां मन्त्राणामभिप्रायः । दयानन्दस्तु – ' हे राजन्, मित्रो भवान् यथा नवाक्षरेण यं त्रिवृतं सोपासनज्ञानयुक्तं स्तोमं स्तुतियोग्य-मुदजयद् उत्तमत्वेन जानाति ' इति, तदप्यसङ्गतमेव, शाब्दमर्यादातिक्रमणात् उज्जितेर्ज्ञानार्थत्वे बीजाभावात् । त्रिवृतमित्यस्य सोपासनयुक्तमिति कथमर्थः? तत्रास्य शक्तेरभावात् । नापि लक्षणया तादृशार्थबोध:? लक्षणायां बीजाभावात् । स्तोममित्यस्य स्तुतियोग्यमित्यपि नार्थः, तत्र शक्तेरभावात् । किञ्च कोऽयं तादृश:? किञ्च पालयित्री नीति ' यह अर्थ करना भी अप्रामाणिक है । नीति केवल गान करने वाले का ही पालन नहीं करती । ' उदजयत् ' पद का प्रतिष्ठा अर्थ करना भी प्रमाण रहित है ॥ ३२ ॥

मन्त्रार्थ - मित्र देवता ने नवाक्षर छन्ब से त्रिवृत् स्तोम को जीता है, उसी प्रकार मैं भी उसको जीत सकूँ । वरुण देवता ने दशाक्षर छन्द से दशाक्षरा विराट् के अभिमानी देवताओं को जीता है, मैं भी उसी प्रकार उनको जीत सकूँ । इन्द्र ने एकादश अक्षर से त्रिष्टुप् छन्द के अभिमानी देवताओं को जीता है, मैं भी उनको जीत सकूँ । विश्वेदेव देवताओं ने बारह अक्षरों से जगती छन्द के अभिमानी देवताओं को जीता है, मैं भी उनको जीत सकूँ ॥ ३३ ॥

भाष्यसार -- ' मित्रो नवाक्षरेण ' यह कण्डिका भी पूर्व के मन्त्रों की भाँति हवन अथवा वाचन में विनियुक्त है । याज्ञिक प्रक्रिया के अनुसार इस कण्डिका के मन्त्र भी उज्जितिसंज्ञक हैं इस कण्डिका का अर्थ इस प्रकार है - हे भगवन्, मित्र देव ने नवाक्षर छन्द से त्रिवृत् स्तोम को अधिकृत किया, मैं भी उसी प्रकार अधिकृत करूँ । वरुण देव ने दशाक्षर छन्द से विराडधिष्ठात्री देवता को प्राप्त किया, मैं भी प्राप्त करूँ । इन्द्रदेव से एकादशाक्षर छन्द से त्रिष्टुप् छन्द की अधिष्ठात्री देवता को प्राप्त किया, मैं भी उसे प्राप्त करूँ । विश्वेदेव देवगणों ने द्वादशाक्षर छन्द के द्वारा जगती को प्राप्त किया, मैं भी उसे प्राप्त करूँ । अध्यात्मपक्ष में भी अर्धयोजना इसी प्रकार होगी । स्वामी दयानन्द का अर्थ शब्दों की सीमा का उल्लंघन करने के कारण असंगत है । उज्जिति का ज्ञान अर्थ निर्मूल है । ' त्रिवृत् ' शब्द का ' सोपासन ( ज्ञान ) युक्त ' यह अर्थ कैसे होगा? क्योंकि यह शब्द इस अर्थ को प्रकाशित करने

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मे ० ३३-३४ ] वेदार्थपारिजात भाष्यसहिता २७ ९ तज्ज्ञाने फलम्? ' हे वरुण, त्वं यथा दशाक्षरेण छन्दसा यं विराट्छन्दः प्रतिपादितं प्राप्तवानसि तमहमपि । प्राप्नुयाम् ' इत्यपि निरर्थकमेव । कोऽयं विराट्छन्दः प्रतिपाद्योऽर्थः? किन तत्प्राप्त्या पुरुषार्थ इत्यादेर्वक्तव्यत्वात् ' इत्यादिकमपि एवं त्रिष्टुप छन्दोवाच्यमित्यपि तादृगेव । ' जगतीमेतच्छन्दोऽभिहितां नीतिमुदजयन् प्रचारयन्ति ३३ ॥ सर्वतन्त्रस्वातन्त्र्यमेव, सर्वमर्यादाभञ्जनात् । तथा स्वातन्त्र्ये जगतीशब्देन लुलाय्या अपि बोधसम्भवात् ॥ वस॑व॒स्त्रयो॑दशाक्षरेण त्रयोद॒श स्तोम॒मुद॑जय॒स्तमुज्जैषधं रुद्राश्चतुर्दशाक्षरेण चतुर्दश स्तोम॑मु॒द॑जय॑स्तमुज्जैषमादि॒त्यः पञ्चदशाक्षरेण पञ्चदश स्तोम॒मुर्दजयँस्तमुज्जेष॒मद॑तः षोडशाक्षरेण षोड॒श स्तोम॒मुद॑जय॒त् तमुज्जैषं प्र॒जाप॑तिः स॒प्तद॑शाक्षरेण सप्तदश स्तोम॒मुद॑जय॒त् तमुज्जॆषम् ॥ ३४ ॥

वसवस्त्रयोदशाक्षरेण छन्दसा त्रयोदशं स्तोममुदजयन् तं स्तोममहं जयेयम् । रुद्रा देवाश्चतुर्दशाक्षरेण छन्दसा चतुर्दशं स्तोममुदजयन्, तमहमुज्जेषम् । आदित्याः पञ्चदशाक्षरेण छन्दसा पञ्चदशं स्तोममुदजयन्, तमहमुज्जेषम् । अदितिः षोडशाक्षरेण छन्दसा षोडशं स्तोममुदजयत्, तमहमुज्जेषम् । प्रजापतिः सप्तदशाक्षरेण छन्दसा सप्तदशं स्तोममुदजयत्, तमप्यहं तेनैव सप्तदशाक्षरेण छन्दसा जयेयम् । एतान् मन्त्रान् जपेदेतैर्जुहुयाद्वा । अध्यात्मपक्षे - हे भगवन्, यथा वसवस्त्रयोदशाक्षरेण छन्दसा त्रयोदशं स्तोममुदजयन्, तं स्तोममहं भवतः कृपया जयेयम् । आदित्या देवा यथा चतुर्दशाक्षरेण छन्दसा चतुर्दशं स्तोममुदजयन्, तथाहमपि तमुज्जेषम् । यथा अदितिर्देवमाता षोडशाक्षरेण छन्दसा षोडशाख्यं स्तोममुदजयत्, तथाहमपि जयेयम् । प्रजापतिर्यथा सप्तदशा-क्षरेण छन्दसा सप्तदशाख्यं स्तोममुदजयत्, तथाहमपि तं भवदनुग्रहाज्जयेयमिति । की शक्ति नहीं रखता । लक्षणा के द्वारा भी ऐसा अर्थबोध नहीं हो सकता, क्योंकि लक्षणा के लिये भी कोई मूल प्रमाण नहीं है । ' स्तोम ' का अर्थ ' स्तुति के योग्य ' भी नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ भी शक्ति का अभाव है । फिर इस प्रकार का कौन है? उसके ज्ञान का क्या फल है? ये भी प्रश्न हैं । इस प्रकार शब्द के अर्थ को मर्यादा को तोड़ने के कारण पूरा अर्थ उच्छृंखल है । इस प्रकार स्वातन्त्र्य होने पर तो जगतो शब्द से लुकायी ( भैंस ) का भी बोधन संभव होगा ॥ ३३ ॥

मन्त्रार्थ - वसु नामक देवताओं ने तेरह अक्षर वाले छन्द से त्रयोदश स्तोम को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है, मैं भी ऐसा कर सकूँ । रुद्रों ने चौवह अक्षर वाले छन्द से चर्तुदश स्तोम को अपने वश में कर लिया है प्रकार , मैं भी से ऐसा ही कर सकूं । आदित्यों ने पन्द्रह अक्षर के छन्द से पंचदश स्तोम को जीत लिया है, मैं भी उसको सम्यक् जीत सकूँ । अदिति ने सोलह अक्षर के छह से षोडश स्तोम को जीता है, मैं भी उसे जीत सकूं । प्रजापति ने सत्रह अक्षर वाले छन्द से सप्तदश स्तोम को जीत लिया है, मैं भी उसको जीत सकूँ ॥ ३४ ॥

भाष्यसार - ' वसवस्त्रयोदशाक्षरेण ' यह कण्डिका भी पूर्वोक्त कण्डिकाओं की भाँति ' उज्जिति ' मन्त्रों से युक्त तथा याज्ञिक प्रक्रिया में हवन अथवा वाचन में विनियुक्त है । द्वारा त्रयो-अध्यात्मपक्ष में मन्त्रार्थं इस प्रकार है - हे भगवन्, जिस प्रकार वसुगणों ने त्रयोदशाक्षर छन्द के दश स्तोम को अधिगत किया, उस स्तोम को मैं आपकी कृपा से अधिगत करूँ । आदित्य देवों ने जिस प्रकार चतुर्दशाक्षर जैसे देवमाता अदिति ने षोडशाक्षर छन्द छन्द से चतुर्दश स्तोम को अधिगत किया, उसी प्रकार मैं भी उसे अधिगत करूँ । से सप्तदश से षोडश स्तोम को प्राप्त किया, उसी प्रकार मैं भी उसे प्राप्त करूँ । जिस प्रकार प्रजापति ने सप्तदशाक्षर छन्द स्तोम को प्राप्त किया, उसी प्रकार मैं भी आपके अनुग्रह से उसे प्राप्त करूँ ।

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२८० शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अं ० ९ दयानन्दस्तु - हे राजादिसभ्यजना वसवश्चतुर्विंशतिवर्षब्रह्मचर्येण गृहीतविद्या भवन्तो यथा त्रयोदशा-क्षरेणासुर्यानुष्टुभा त्रयोदशं दशप्राणजीवमत्तत्त्वानां संख्यापूरकमव्यक्तं कारणं स्तोमं स्तुतियोग्यम् उदजयन् श्रेष्ठत्वेन ज्ञातवन्तः, हे बलवीर्यवन्तः पुरुषार्थिनश्च रुद्राश्चतुश्चत्वारिंशद्वर्षब्रह्मचर्येणाधीतविद्याः! चतुर्दशाक्षरेण , तथापि साम्न्युष्णा चतुर्दशं दशेन्द्रियमनोबुद्धिचित्तानां पूरकमहङ्कारं स्तोमं स्तवनीयमुदजयन् प्रशंसन्ति आसुर्या तमुज्जेषं प्रशंसेयम् । हे समाचरिताष्टचत्वारिंशद्वर्षपरिमितब्रह्मचर्येण गृहीतविद्याः! पञ्चदशाक्षरेण क्रिया-गायत्र्या पञ्चदशं चत्वारो वेदाश्चत्वार उपवेदाः षडङ्गानि च मिलित्वा चतुर्दशविद्यास्तासां संख्यापूरकं कौशलं स्तोमं स्तोतुमर्हमुदजयन् सम्यग् जानन्ति तथैवाहमपि तमुज्जेषम् । हे सभाध्यक्षस्य पत्नि अदिति! अविद्यमाना दितिर्नाशो यस्याः सा अखण्डितैश्वर्या भवती, यथा षोडशाक्षरेण साम्न्यानुष्टुभा षोडशं प्रमाणादिसमूहं स्तोमं स्तुत्यं षोडशाक्षरेण षोडशं स्तोममुदजयत् श्रेष्ठतया जानाति तथाहमप्युज्जेपम् । हे वर्णाश्चत्वार प्रजापते सर्वाभिरक्षक आश्रमाः सज्जन नरेश! भवान् प्रजापतिर्यथा सप्तदशाक्षरेण निचदाय गायत्र्या सप्तदशं चत्वारो श्रवणमनननिदिध्यासनानि कर्माणि, अलब्धस्य लिप्सा, लब्धस्य प्रयत्नेन रक्षणम्, रक्षितस्य वृद्धिः, वृद्धस्य सर्वोपकारके सत्कर्मणि व्ययकरणमेवं चतुर्विधः पुरुषार्थ:, मोक्षानुष्ठानं चेति सप्तदशं स्तोममतिप्रशंसनीयमुदजयद् तादृशार्थ उत्कर्षात्, तथाहमुत्कर्षेयम् ' इति, तदपि बालजनप्रतारणमेव, निर्मूलत्वात् वस्वादिपदानां दशेन्द्रियमनोबुद्धिचित्तैरपि त्रयोदशसंख्योपपत्त्या मानाभावात् । त्रयोदश स्तोमपदयोरपि न त्वदुक्तोऽर्थः सम्भवेन तदयोगात् । त्वदीयार्थे विनिगमनाविरहात् । तथैव पञ्चदश षोडश - सप्तदश संख्येयानामपि अन्यथा । पञ्चदशेत्यनेन ' उदजयत् ' इति क्रियापदस्यापि क्वचित्प्रशंसनं क्वचिज्ज्ञानमित्यादयोऽर्थभेदा निर्मूला एव सूक्ष्मदेहगत-दशेन्द्रियाणि पञ्च प्राणाः कुतो न गृह्येरन्? पोडशेति पोडशविकाराः कुतो न गृह्येरन्? सप्तदशेति सप्तदशतत्त्वानि कुतो न गृह्येरन्नित्यादिपर्यनुयोगस्य सम्भवात् ॥ ३४ ॥

एष ते निर्ऋते भा॒गस्तं ज॑वस्य॒ स्वाहा॒ऽग्निन॑त्रेभ्यो॑ दे॒वेभ्यः॑: पु॒रः सद्भयः॒ स्वाहा॑ य॒मत्रेभ्यो दे॒वेभ्यो॑ दक्षिणा॒सद्भयः॒ स्वाहा॑ वि॒श्वदे॑वनेत्रेभ्यो दे॒वेभ्यः॑ः पश्च॒त्सद्भयः॒ स्वाहा॑ मि॒त्रावरु॑ण-नेत्रेभ्यो वा म॒रुन्नेत्रेभ्यो वा दे॒वेभ्य॑ उ॒त्तरा॒सद्भयः॒ स्वाहा॑हा॒ सोम॑नेत्रेभ्यो दे॒वेभ्य॑ उपरि॒सद्भयो दुव॑स्वद्भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ ३५ ॥

के स्वामी दयानन्द द्वारा प्रतिपादित व्याख्यान मूलरहित होने के कारण बालविनोद की भाँति है । वसु अर्थ आदि युक्त शब्दों नहीं है, द्वारा उन - उन अर्थों का बोध करने में कोई प्रमाण नहीं है । त्रयोदश स्तोम आदि पदों का भी प्रतिपादित पर उस अर्थ में निश्चित क्योंकि दस इन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा चित्त इस प्रकार भी तेरह संख्या की युक्ति सिद्ध उपपत्ति हो जाने भी दूसरे प्रकार से की जा युक्तिप्रामाण्य नहीं है । इसी प्रकार पञ्चदश, षोडश, सप्तदश आदि शब्दों की है । ' पञ्चदश ' सकती है । ' उदजयत् ' इस क्रियापद के भी अर्थ कहीं प्रशंसा, कहीं ज्ञान इत्यादि करना अप्रामाणिक क्यों न माने जाँय? शब्द से दस इन्द्रियाँ तथा पाँच प्राण क्यों नहीं ग्रहण किये जायँ? षोडश शब्द से सोलह विकार सप्तदश शब्द से सूक्ष्म देश के सत्रह तत्त्व क्यों न समझे जाँय? इत्यादि जिज्ञासाएँ सम्भव ॥ ३४ ॥

मन्त्रार्थ --- हे पृथिवि! यह तुम्हारा भाग है, इसको प्रीतिपूर्वक स्वीकार कीजिये । यह आहुति भली प्रकार गृहीत हो । जिन देवताओं का अग्नि नेता है, पूर्व दिशा में बसने वाले उन देवताओं में की बसने प्रीति वाले के देवताओं निमित्त की यह प्रीति आहुति के बी जा रही है, यह भली प्रकार गृहीत हो । जिनका यम नेता है, उन दक्षिण दिशा

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म ० ३५ ] वैदार्थ पारिजातभाष्यसहिता अथ राजसूयप्रकरणम् २८१ ' राजा स्वाराज्यकामो राजसूयेन यजेत ' ( आप ० १८ / ८ / १-४ ) इति तं प्रकृत्यामनन्त्यवेष्टिम्-' आग्नेयोऽष्टाकपालो हिरण्यं दक्षिणा ' इत्येवमादि । तां प्रकृत्याधीयते - ' यदि ब्राह्मणो यजेत बार्हस्पत्यं मध्ये निधायाहुति हुत्वाऽभिघारयेत्, यदि वैश्यो वैश्वदेवम्, यदि राजन्य ऐन्द्रम् ' इति, तत्र सन्दिह्यते - किं ब्राह्मणादीनां प्राप्तानां निमित्तार्थेन श्रवणमुत ब्राह्मणादीनामयं भागो विधीयत इति? अत्र यदि प्रजापालनकण्टकोद्धरणादिकर्म राज्यम्, तस्य कर्ता राजेति राजशब्दस्यार्थस्ततो राजा राजसूयेन यजेतेति राज्यस्य कर्तृ राजसूयेऽधिकारः, तदा सम्भवन्त्यविशेषेण ब्राह्मण क्षत्रिय - वैश्या राज्यस्य कर्तार इति सिद्धं सर्व एवैते राजसूये प्राप्ता इति । ' यदि ब्राह्मणो यजेत ' इत्येवमादयो निमित्तार्थाः श्रुतयः । अथ राज्ञः कर्म राज्यमिति राजकर्तृयोगात् तत्कर्म राज्यम्, ततः को राजेत्यपेक्षायामार्येषु तत्प्रसिद्धेरभावात् पिक नेम तामरसादिशब्दार्थावधारणाय म्लेच्छप्रसिद्धिरिवान्त्राणां क्षत्रियजातो राजशब्दप्रसिद्धिस्तदवधारणे कारणमिति क्षत्रिय एव राजेति न ब्राह्मणवैश्ययोः प्राप्तिरस्तीति राजसूयप्रकरणं भित्त्वा ब्राह्मणादिकर्तृकाणि पृथगेव कर्माणि प्राप्यन्त इति न नैमित्तिकानीति । तत्र राज्यस्य कर्ता राजेत्यार्याणामान्घ्राणां चाविवादः । तथाहि-- ब्राह्मणादिषु प्रजापालनकर्तृषु कनकदण्डातपत्रश्वेतचामरादि-लाञ्छनेषु राजपदमान्ध्राश्चार्याश्वाविवादं प्रयुञ्जाना दृश्यन्ते, तेनाविप्रतिपत्तिः । विप्रतिपत्तावप्यार्यान्ध्रप्रयोगयो-र्यववराहवद् आर्यप्रसिद्धेरान्ध्रप्रसिद्धितो बलीयस्त्वादार्यबलप्रदार्यप्रसिद्धिविरोधे त्वतन्मूलायाः पाणिनीयप्रसिद्धेः ' विरोधे त्वनपेक्षं स्यात् ' ( मी ० सू ० १ | १ | ३ ) इति न्यायेन बाधनात् तदनुगुणतया कथन्निख नकुलादिवदन्वा-ख्यानमात्रपरतया नीयमानत्वाद् राज्यस्य कर्ता राजेति सिद्धे निमित्तार्थाः श्रुतय इति । तथा च यदिशब्दोऽ-प्यासः स्यादिति पूर्वपक्षय्य वाचस्पतिमिश्रेणोक्तम्- ' रूपतो न विशेषोऽस्ति ह्यार्यम्लेच्छप्रयोगयोः । वैदिका -द्वाक्यशेषात्तु विशेषस्तत्र दर्शितः ॥ ' इति । तदिह राजशब्दस्य कर्मयोगाद्वा कर्तरि प्रयोगः कर्तृप्रयोगाद्वा कर्मणीति संशये वैदिकवाक्यशेषवदभियुक्त-तरस्यात्रभवतः पाणिनेः स्मृतेनिर्णीयते - प्रसिद्धिरान्ध्राणामनादिरादिमती चार्याणां प्रसिद्धिः, गोगाव्यादिशब्दवत् । न च सम्भावितादिमद्भावा प्रसिद्धिः पाणिनिस्मृतिमपोद्यानादिप्रसिद्धिमादिमती कर्तुमुत्सहते, गाव्यादिप्रसिद्धे-रनादित्वेन गवादिप्रसिद्धेरप्यनादिमत्त्वोपपत्तेः । तस्मात् पाणिनीयस्मृत्यनुमतान्त्रप्रसिद्धेर्बलीयस्त्वेन क्षत्रियत्वजातौ राजशब्दे मुख्ये राज्यकर्तर्यजातौ राजशब्दो गौण इति क्षत्रियस्यैवाधिकाराद् राजसूये तत्प्रकरणमपोह्या-वेष्टेरुत्कर्ष इत्यन्वयानुरोधी यदिशब्दो न त्वपूर्वविधौ तदन्यथयितुमर्हतीति ( ३ | ३ | ५२ ) भामत्याम् । तदेतत् स्पष्टयन्ति कल्पतरुकाराः - पिकः कोकिलः, नेमोऽर्धः, तामरसं पद्ममिति म्लेच्छप्रसिद्धया यथा पिकादिशब्दार्थावधारणम्, तथैवान्भ्राणां प्रसिद्धया राजशब्दस्य क्षत्रियजातिरर्थो निर्धार्यते । यद्यपि तत्र राज्यकर्तृमात्रे राजशब्द आयेंम्लेंच्छेश्च प्रयुज्यते, राज्यमकुर्वति क्षत्रियजातिमात्रे राजशब्दमार्या न प्रयुञ्जते, निमित्त यह आहुति दी जा रही है, यह भली प्रकार गृहीत हो । विश्वेदेव देवता जिनके नेता हैं, उन पश्चिम दिशा में निवास करने वाले देवताओं को प्रीति के निमित्त यह आहुति दी जा रही है, यह भली प्रकार गृहीत हो । जिनके नेता मित्रावरुण हैं, या जिनके नेता मरुद्देवता हैं, उत्तर दिशा में निवास करने वाले उन देवताओं की प्रीति के निमित्त दी गई यह आहुति भली प्रकार गृहीत हो । जिनका नेता सोम है, ऐसे परिचर्या वाले ऊर्ध्वं विशा अन्तरिक्ष में निवास करने वाले देवताओं की प्रीति के निमित्त दी गई यह आहुति भली प्रकार गृहीत हो ॥ ३५ ॥

भाष्यसार - ' एष ते ' इस कण्डिका से राजसूय यज्ञ का विषय प्रारम्भ होता है । राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान राजा के द्वारा किया जाता है, अतः राजपद पर अभिषिक्त ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि किसी भी वर्ण के यजमान द्वारा यह यज्ञ ३६

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२२८ शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अं ० ९ म्लेच्छास्तु प्रयुञ्जत इति विप्रतिपत्तिः । अविप्रतिपत्तिस्थले विरोधाभावाद् राज्यस्य कर्ता राजेति त्रैर्वाणकानां राजत्वेऽवेष्टौ प्राप्तिः, प्राप्तौ च सत्यां निमित्तार्थत्वं ' यदि ब्राह्मणः ' इत्यादेः स्यात् । या तु क्षत्रियमात्रे राजशब्दप्रयोगे म्लेच्छानामायैः सह विप्रतिपत्तिः, तत्र शास्त्रसहितार्थप्रसिद्धया तद्विहीनम्लेच्छप्रसिद्धिबाधान्न जातिमात्रं राजशब्दार्थः, किन्तु राज्यकर्तेव तदर्थं इति । क्व शास्त्रसहितार्यप्रसिद्धया म्लेच्छप्रसिद्धिबाधः? इत्यपि कल्पतरौ स्पष्टम् । तथा हि-- ' यवमय-श्चरुर्भवति ', ' वाराही उपानहौ ' इत्यत्र यववराहशब्दयो म्लेच्छः पियङ्गवायुसयोः प्रयोगात्, तदुक्तं आर्यैश्च प्रमाणलक्षणे दीर्घशुक-सूकरयोः प्रयोगादुभयोश्च प्रयोगयोरनादित्वेन तुल्यबलत्वाद्विकल्पेनाभिधानं प्राप्तमिति । जैमिनिना - ' समा विप्रतिपत्तिः स्यात् ' ( मी ० सू ० ११३८ ) । तत्र सिद्धान्तसूत्रम् - ' शास्त्रस्था वा मोदमानास्तिष्ठन्ति तन्निमित्तत्वात् ' ' ( मी ० सू ० १ | ३ | ९ ) । यवमय इत्यस्य वाक्यशेषः - ' यदान्या ओषधयो म्लायन्तेऽथैते इति, ' यवाश्चान्यौषधि म्लानो मोदन्ते न प्रियङ्गवः । फाल्गुने ह्यौषधीनां हि जायते पत्रशातनम् || मोदमानाश्च तिष्ठन्ति यवाः कणिशशालिनः ॥ प्रियङ्गवः शरत्पक्वास्तावद्गच्छन्ति हि क्षयम् । यदा वर्षासु मोदन्ते सम्यग्जाताः प्रियङ्गवः । तदा नान्यौषधिग्लानिः सर्वासामेव मोदनात् ॥ ' ( त ० वा ० १ ३ ९ ) इति सूकरं ' वाराही च उपानहौ ' इत्यस्य च वाक्यशेषे - ' वराहं गावोऽनुधावन्ति ' ( मै ० सं ० ११६ | ३ ) इति श्रूयते । गावोऽनुधावन्ति न काकम् । तस्माद्यववराहशब्दयोर्दीर्घशुकसूकरावर्थाविति । इत्थं म्लेच्छार्ययोरनादिप्रसिद्धि- । साम्येऽपि शास्त्रसहित प्रसिद्धेर्बलीयस्त्वेन शास्त्रहीन प्रसिद्धिबाधः, नानादिम्लेच्छप्रसिद्धिबाधे किश्चिन्मूलम् ननु म्लेच्छप्रसिद्धिमात्रेण क्षत्रियजाती राजशब्दार्थ इति न ब्रूमः, किन्तु - ' गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्म॑णि ष्यञ् ' ( पा ० सू ० ५।१।१२४ ) इति पाणिनिना गुणवचनेभ्यः शुक्लादिशब्देभ्यो ततः क्षत्रियस्यैव ब्राह्मणादिभ्यश्च राज्यपरिपालनं ष्यञ्-प्रत्ययस्मरणाद् राज्ञः कर्म राज्यमिति सिद्धयति । ततश्च क्षत्रियो राजा, राजशब्द-कण्टकाद्युद्धरणं धर्मः, तथाप्युल्लङ्घितमर्यादौ ब्राह्मणवैश्यावपि राज्यं कुर्वाणौ दृश्येते इति तावपि वाच्यौ, शब्दवाच्यतायां प्रवृत्तिनिमित्तसद्भावमात्रस्यापेक्षितत्वात् ' इति परिमलकाराः । ननु प्रयोगमूला हि पाणिनिस्मृतिः । आर्यप्रयोगविरोधेऽतन्मूला म्लेच्छप्रयोगमूला स्यात् । तेन मूलबाधेन, बाध्या पाणिनिस्मृतिः । यथा खं न भवतीति नखः कुलं न भवतीति नकुलमिति रूढावेव शब्दौ व्युत्पाद्येते एवं राजशब्दोऽपि । पाणिनिर्हि - ' नभ्राण्नपान्नवेदानासत्यानमुचिनकुलनखनपुंसकनक्षत्रनक्रनाकेषु प्रकृत्या । ' ( पा ० सू ० ६।३।७५ ) इति नखादिशब्दानां नञ्समासमङ्गीकृत्य नलोपाभावसिद्धयर्थं प्रकृतिभावं सस्मार प्रसिद्धया यदुक्तम् – ' यववराहादिशब्देष्विव राजशब्देऽपि क्षत्रियमात्रविषयत्वगोचरा स्वरूपतो म्लेच्छप्रसिद्धिरार्य विशेषाभावात् । बाध्या ' इति, तदसङ्गतम्, अनादिवृद्धव्यवहाररूढत्वादार्य म्लेच्छप्रयोगयोरुभयोरपि वेदानुग्रह इति द्वयोः यवादिशब्देषु तु वैदिकवाक्य शेषानुगृहीतार्य प्रसिद्धेर्बलवत्त्वम् । राजशब्दे त्वार्यप्रसिद्धौ नास्ति प्रसिद्धयोरविशेष एव । म्लेच्छप्रसिद्धौ राजशब्दविषये वैदिकवाक्यशेषवदभियुक्ततरस्य तत्रभवतः पाणिनेः स्मृते-रस्त्येवानुग्रहः । प्रयोगो हि नानादेशेषु नानापुरुषैविरच्यत इति सम्भवेद्विप्लवः, स्मृतिस्तु शिष्टपरिगृहीता निर्णयः । व्यवस्थिता । ततश्च तदनुगृहीत म्लेच्छप्रयोग आर्यप्रयोगाद् बलीयानेव - ' आचारयोर्विरोधेन सन्देहे सति निबन्धना स्मृत्या बलीयस्त्वादवाप्यते ॥ ' इति । नन्वनादिवृद्धव्यवहाररूढत्वादार्यम्लेच्छप्रयोगयोः स्वरूपतस्तावन्न विशेष:, इति चेन्न तथात्वे स्वर-वर्णादिभ्रंशे प्रत्यवायमनुसन्दधानानामार्याणां प्रसिद्धे राप्तिमूलत्वाद् बलवत्त्वेन तदपेक्षया म्लेच्छानां तु गवादि-किया जा सकता है, अथवा केवल क्षत्रिय ही इसका अभिकारी है? यह जिज्ञासा उदित होती है । इसके सम्बन्ध में प्रथमतः

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 337 का मूल पृष्ठ
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म ० ३५ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता २८३ विषये गाव्यादिशब्दमपभ्रंशं प्रयुञ्जानानां प्रसिद्धेरनाप्तिमूलत्वेन दुर्बलत्वात् । राजशब्दे तु आर्यप्रसिद्धेर्नास्ति वेदानुग्रह इत्यप्यसङ्गतम्, ' विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना राजा ' ( वा ० सं ० ९ ४० ), ' सोम ओषधीना राजा ', ' इन्द्रो राजा ' ( ), ' जगतश्चर्षणीनाम् ' ( ) इत्यादिवेदानुग्रहसद्भावात् तदभावेऽपि स्वत एवार्य प्रसिद्धेर्बलवत्त्वविशेषसद्भावाच्च । स्मृत्यनुग्रहोऽप्युभयत्र समान एव । तेन स्मृत्यनुगृहीतो म्लेच्छप्रयोग आर्षप्रयोगाद् बलीयानित्यप्ययुक्तम्, राज्यशब्दे गुणवचनादिसूत्रेण विधीयमानष्यञ्प्रत्यय प्रकृतिभूतस्य ब्राह्मणादिगणपठितस्य राजशब्दस्य क्षत्रियार्थताया इव पालकार्थताया अपि उपपन्नतया स्मृतेरुभयसाधारण्यात् । नहि विधीयमानप्रत्ययार्थादन्यदेव प्रकृत्यर्थप्रवृत्तिनिमित्तं ग्राह्यमिति नियमो s स्ति, काठकशब्दे कठोक्तशाखाध्यायिनामाम्नाय इत्यर्थके गोत्रचरणादिसूत्रविधीयमानप्रत्ययार्थस्य कठप्रोक्ताम्नायस्य कठप्रोक्तशाखाध्यायिवाचक कठशब्दरूप प्रकृत्यर्थं प्रवृत्तिनिमित्तान्तर्भावात्, घटस्य शौक्ल्य-मित्यत्र वर्णदृढादिसूत्रविधीयमानस्य ष्यञ्प्रत्ययार्थस्य शुक्लगुणस्यैव शुक्लगुणविशिष्टद्रव्यविषयक शुक्ल शब्दरूप -प्रकृत्यर्थ प्रवृत्तिनिमित्तत्वस्य दर्शनात् । किञ्च ब्राह्मणादिगणपठितस्य राजशब्दस्य पालकार्थत्वमेव ग्राहम, अन्यथा ' यौवराज्येन संयोक्तु-मैच्छत् प्रीत्या महीपतिः ' ( वा ० रा ० १।१।२१ ) इत्यादिप्रयोगेषु ष्यञ्प्रत्ययो न स्यात्, तत्र राजशब्दस्य क्षत्रियार्थत्वे युवत्वराजत्वयोः प्रागेव सिद्धतया संयोक्तुमिष्यमाणस्यालाभात् । न च तत्र मा भूत् ष्यञ्प्रत्ययः, ' पत्यन्त पुरोहितादिभ्यो यक् ' ( पा ० सू ० ५।१ । १२८ ) इति भावकर्मणोरेव विहितो यक्प्रत्ययो s स्तु, पुरोहिता-दिगणेऽपि राजशब्दस्य पाठादिति वाच्यम्, तत्र ' राजा ' इत्येतदसमासगतस्य राजशब्दस्य पाठेन ततो युवराज-शब्दाद्यप्राप्त्या प्यञ एवान्वेपणीयत्वात् ब्राह्मणादिगणपठितस्यैतस्यापि पालकार्थत्वोपपत्तेश्व, जनपदविशेपवाचिनो विदेहपञ्चालादिशब्दात् तस्य राजेत्यर्थेऽपत्यार्थकप्रत्ययातिदेशे ' तस्य राजन्यपत्यवत् ' ( पा ० सू ० ) इति वर्ति राजशब्दस्य पालकार्थतायाः सम्प्रतिपन्नत्वाच्च । विदेहानां राजा वैदेहः, पञ्चालानां राजा पाञ्चाल इत्यादि हि तदुदाहरणम् । राजपदस्य पालकत्वाध्यवसाये सति ' यत्व मधारय ' इति, ' ब्राह्मणकुमारयोः ’ ( पा ० सू ० ६।२।५७-५८ ) इति चानुवृत्तौ राजेति पूर्वपदं ब्राह्मण कुमारयोरन्यतरस्यां प्रकृतिस्वरो भवति । पूर्वपद-प्रकृतिस्वर विधायकस्य ' राजा च ' ( पा ० सू ० ६ २२५ ९ ) इति सूत्रस्योदाहरणं राजब्राह्मण इति, तदपि राजत्वब्राह्मणत्वयोर्युगपत् सामानाधिकरण्यादाञ्जस्यं लभते । ननु माभूद् राज्यशब्दव्युत्पादकस्मृत्या म्लेच्छ प्रसिद्धेरनुग्रहः, ' राजश्वसुराद्यत् ' ( पा ० सू ० ४ | १ | १३७ ) इति स्मृत्या राजशब्दादपत्यार्थे यत्प्रत्ययविधानार्थतया तु स्यात्, क्षत्रियापत्य इव जनपदपालक ब्राह्मणाद्यपत्ये राजन्यशब्दप्रयोगाभावेन तत्र प्रकृतिभूतस्य राजशब्दस्य क्षत्रियार्थकताया एव ग्राह्यत्वादिति चेत्, तथाभ्युपगमेऽ-प्यार्यंप्रसिद्धेरपि पाणिन्यनुग्रहस्य तुल्यत्वेन राजसूयवाक्ये क्षत्रियग्र हे विनिगमनाविरहात् । यत्तु - ' स्मृतिशब्देन आपं धर्मशास्त्रादिकमनुग्राहकत्वेन विवक्षितम्, गौतमीये हि धर्मशास्त्रे द्विजातीना-मध्ययनमिज्या दानमिति त्रैवर्णिकानां साधारणधर्मोक्त्यनन्तरम् - ' ब्राह्मणास्याधिकाः प्रवचनयाजनप्रतिग्रहाः ' इत्यादिना ब्राह्मणवैशेषिका धर्मा उक्ताः । क्षत्रियवैश्यवैशेषिकधर्मोक्तिप्रस्तावे राज्ञोऽधिकं रक्षणं सर्वभूतानामिति राजशब्दः प्रयुक्तः । न च तस्य पालनार्थग्रहणं युक्तम्, प्रकरणानुरोधात् पालकमेवोद्दिश्य पालनविधानायोगात् । नहि यः पालकस्तेन पालनं कर्तव्यमित्यन्वयो युक्तः । स्मृतिग्रहणं श्रुतेरप्युपलक्षणम् । अस्ति म्लेच्छप्रसिद्धेरनु-ग्राहिका राजानमभिषेचयेति श्रवणेन वेति श्रुतिः । अत्र हि राज्ञः सतोऽभिषेको विधीयते । न च क्षत्रियत्वमिव श्रुतिवाक्य, जैमिनिसूत्र, ब्रह्मसूत्र, पाणिनिसूत्र, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, भामती टीका, परिमल - कल्पतरु

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२८४ शुक्लयजुर्वेद संहिता पालकत्वं प्राक् सिद्धमस्ति, अभिषिक्तस्य स्मृतिषु पालनविधानात् । न च ' यूपं तक्षति ' ( [ अ ० ९ ) इत्यत्र तक्षणेन यूपं कुर्यादितिवद् अभिषेकेण राजानं कुर्यादिति क्लिष्टकल्पनं युक्तम्, यूपशब्दार्थस्येव राज-शब्दार्थस्य प्रासिद्धस्य सत्त्वाभावात् म्लेच्छप्रयोगप्रसिद्धस्य क्षत्रियस्य सत्त्वात् ' इति, तदपि न युक्तम्, विनिगमनाविरहस्य तादवस्थ्यात् आर्यप्रसिद्धेरपि श्रुत्यनुग्रहस्य दर्शितत्वात्, ' नगरस्थो वनस्थो वा त्वं नो राजा जनेश्वरः । विविक्ते देवराजानमिदं वचनमब्रवीत् ॥ इत्यादिस्मृत्यनुग्रहस्यापि सत्त्वात् । ' राज्यायैव तेऽभिषिच्यन्ते तेनैतान् राजेत्याचक्षते' ( ) इति श्रुतेः, ' रञ्जनात् खलु राजत्वं प्रजानां पालनादपि ' ( । ) इति भारतवचनात् पालकत्वं राजशब्दार्थं इति साक्षात्प्रतिपादनाच्च एतेनैव क्षत्रियवाचिनो राजशब्दस्य पालकत्वसादृश्याद् आर्याणां जनपदपरिपालके ब्राह्मणादौ प्रयोग इत्येत-दर्थंकाग्रिमग्रन्थस्याप्ययुक्तं व्याख्यानम्, पालकवाचिन एवं पालकत्वयोग्यक्षत्रिये गौणतेति वैपरीत्यस्यापि सुवचत्वात् । तस्मात् सर्वोऽयं भामतीकल्पतरुसिद्धान्तग्रन्थोऽयुक्त इति चेदत्रोच्यते, विनिगमनाविरहादर्थद्वय-सत्त्वेऽपि राजसूयवाक्ये राजशब्दस्य क्षत्रिय एवार्थो ग्राह्यः, सप्रतियोगिकोपाधिकधर्मरूपपालकत्वापेक्षया निष्प्रतियोगिकाखण्डरूपधर्मक्षत्रियत्वजातेर्लघुत्वेनासति बाधके लघुप्रवृत्तिनिमित्तार्थग्रहणौचित्यात् । न चावेष्टिवाक्यगतत्रैवर्णिक प्राप्तिद्योतकय दिशब्दस्वारस्याद् गुरोरप्यर्थकस्य ग्रहणं युक्तमिति वाच्यम्, द्योतक-निपातस्वारस्यानुरोधेन वाचकानां स्वारस्यायोगात् । वस्तुतस्तु श्रुतिस्मृतिप्रयोगवैयाकरणव्यवहाराणामुभयत्र साम्येऽपि क्षत्रियेष्वेव शक्तिः, तेषु क्षत्रियत्व-जातेरिव पालकेष्वनुगतानतिप्रसक्त शक्यतावच्छेदकरूपाभावात् । तथाहि - न च पालनमात्रं निमित्तम्, सर्व-साधारण्यप्रसङ्गात् । सर्वेषां पुत्रदारधनादिविषयमन्ततः स्वशरीरविषयं वा पालनम् । नापि जनपदपालनं निमित्तम् राज्ञा नियुक्ते तत्तत्पदाधिकारिणि सत्यपि तत्र राजपदप्रयोगायोगात् । नापि स्वतन्त्रपालनं निमित्तम्, साम्राजा नृपतिना देशविशेषे राजभावेनाभिषिक्ते तदभावात् । कि, विनापि पालकत्वं श्रेष्ठयमात्रेण राजपद-प्रयोगो भवति मृगराज- पक्षिराज वृक्षराजादिशब्देषु । तस्य ' राजदन्तादिषु परम् ' ( पा ० सू ० २ | २ | ३१ ) इत्युपसर्गपरनिपातविधायकपाणिनिस्मृत्यनुग्रहोऽप्यस्ति तस्मादनुगतानतिप्रसक्तजातिमित्तकः क्षत्रियार्थं एवं राजशब्दः, क्षत्रियेषु प्रायेण पालकत्वस्य तत्कृतस्य श्रेष्ठयस्य च सद्भावात् । क्वचित्पालके केनचिद् गुणेन श्रैष्ठ्ये च तस्य निरूढा लक्षणेत्येव युक्तम् । तत्तु स्मृत्याद्यनुगृहीत म्लेच्छप्रसिद्धिप्रसादलभ्यमिति । स्वरूपतस्तावन्न विशेषोऽस्तीत्यस्य तु राजशब्दगोचरयोरार्यम्लेच्छ प्रयोगयोगगावीशब्दप्रयोगयोरिव स्वरूपतो वर्णविकार-रूपश्रुतिस्मृत्यनुग्रहसदसद्भावकृतो वा विशेषो नास्तीत्येवार्थः । एवमिह म्लेच्छप्रसिद्धेरपभ्रंशत्वादिमूलक-दौर्बल्यशङ्कापि निरस्ता । तदनन्तरवाक्येन यववराहादिशब्देष्वार्य प्रसिद्धेरेव वाक्यशेषानुग्रहः, अतस्तत्र तदादर इति प्रकृताद्वैषम्यमुक्तम् । अत एव नास्ति वेदानुग्रह इत्यस्य वाक्यशेषानुग्रहो नास्तीत्येवार्थः । यदि राजसूयवाक्यशेषानुग्रहः स्यादार्य प्रसिद्धेस्तदा तद्वाक्यगत राजशब्दस्य वक्ष्यमाणरीत्या प्रवृत्तिनिमित्तगौरवं गौणवृत्त्यापत्ति चाविगणय्य पालक एवार्थी ग्राह्यः स्यात्, ' गोण्या लक्षणया वापि वाक्यशेषेण वा पुनः । वेदोक्तमाश्रयत्यर्थं को नु तं प्रतिकूलयेत् ॥ ' इति न्यायात् । अतो वाक्यशेषाभाव उक्तः । विशेषमाहेत्यस्य राजसूयवाक् राजशब्दस्य क्षत्रियार्थं ग्रहणे प्रवृत्तिनिमिक्तलाघवरूपं मुख्यवृत्तिलाभरूपं वा विशेष-माहेत्यर्थः । आदि के उद्धरणों की विशद विवेचना करते हुए अनेक प्रमाण, तर्क तथा युक्तियों के आधार पर शास्त्रीय निष्कर्ष के रूप में यह सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि राजसूय यज्ञ में क्षत्रिय ही अधिकारी है ।

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म ० ३५ ] वेदार्थपारिजात भाष्यसहिता २८५ पश्चाद्धविष्यमन्नध् अथ राजसूयमन्त्राः । राजसूयमन्त्राणां वरुण ऋषिः । ' अष्टाकपालोऽनुमत्यै, ते शम्यायाः निर्ऋत इति ' ( का ० श्र ० १५ । स्रुवे कृत्वा दक्षिणाग्न्युल्मुकमादाय दक्षिणा गत्वा स्वयं प्रदीर्ण ईरिणे वाग्नौ जुहोत्येष देवता काचिदनुमतिः । ११ ९ -१० ) । फाल्गुनाद्यदशम्यामनुमत्यै अष्टाकपालः पुरोडाशः कार्यः । पौर्णमास्यभिमानिनी वा हविष्यं पेषणे क्रियमाणे ' चक्षुषे त्वेतीक्षते ' ( का ० श्र ० २२५१८ ) पेषगोत्तरं हविरीक्षणम्, तदन्ते तण्डुलरूपं पिष्टरूपं दृषदधस्तान्निहितशम्यायाः पश्चात् कृष्णाजिनस्योपरि यत् पतितं भवेत्, तत् खादिरे स्रुवे निधाय दक्षिणाग्नेरुल्मुक- । मादाय दक्षिणस्यां दिशि गत्वा स्वयं प्रदीर्णे स्फुटिते ईरिणे ऊषरे वा भूभागे उल्मुकं संस्थाप्य तद्धविर्जुहुयात् स्वाहा पृथिवीदेवत्यं यजुः । हे निर्ऋते पृथिवि पापदेवते वा, एष पिष्टरूपस्ते भागो भजनीयोंऽशस्तं जुषस्व , द्वितीयभूमिरूपा सेवस्व तुभ्यं सुहुतमस्तु । भूमिर्द्विविधा -- शालिगोधूमादिसस्याढ्या, तदयोग्या च । तत्राद्यभूमिरूपाऽनुमतिः व्युह्य निर्ऋतिः ( तै ० सं ० १ | ८ | १ | १ ) । सैवानिष्टकारिणी पापदेवता । पञ्चवातीयमाह - ' पञ्चवातीयमाहवनीयं प्रतिदिशं मध्येच स्रुवेगाग्निषु जुहोत्यग्निनेत्रेभ्य इति प्रतिमन्त्रम् ' ( का ० श्र ० १५ १२० ) । ततः कस्मिश्चिहिने पञ्चवाती-याख्यं होमं कुर्यात् । तत्राहवनीयखरमध्य एवाग्नेश्चतुर्दिक्षु प्रेरणं कृत्वा मध्ये चावशिष्य स्रुवेणाज्यं । अग्निर्नेता पञ्चस्वग्निषु येषां यथालिङ्गं जुहुयात् । इतः परमध्यायसमाप्तिपर्यन्तं देवानामार्षम् । दश यजूंषि देवदेवत्यानि तेऽग्निनेत्रास्तेभ्यः, पुरः पुरस्तात् पूर्वस्यां दिशि सीदन्तीति पुरः सदस्तेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा सुहुतमस्तु | अथ दक्षिणे जुहोति -- यमो नेता येषां तेभ्यो यमनेत्रेभ्यः, दक्षिणस्यां दिशि सीदन्तीति दक्षिणा सदस्तेभ्यः स्वाहा । अथ पश्चाज्जुहोति -- विश्वे देवा नेतारो येषां तेभ्यः, पश्चात् सीदन्ति ये तेभ्यः स्वाहा । अथोत्तरार्धे जुहोति - मित्रा-वरुणौ नेतारौ येषां तेभ्यो मित्रावरुणनेत्रेभ्यः, मरुतो नेतारो येषां तेभ्यो वा उत्तरस्यां सीदन्तीति तेभ्य उत्तरा-सद्भूयो देवेभ्यः स्वाहा । अत्र मित्रावरुणनेत्रेभ्य उत्तरासद्भयः, मरुन्नेत्रेभ्य उत्तरासन्द्र्य इति मन्त्रयोर्विकल्पः । मध्ये जुहोति -- सोमनेत्रेभ्यः सोमो नेता येषां तेभ्यः, उपरिसद्भय उपरि सीदन्ति ये तेभ्यः, दुवस्यद्भयः परिचर्यावद्भयः, अथवा दुवो हव्यं येषां तेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा । अत्र ब्राह्मणम् -- ' पूर्णाहुति जुहोति । सर्वं वै पूर्ण सर्वं परिगृह्य सूया इति तस्यां वरं ददाति सर्वं वै वरः सर्वं परिगृह्यसूया इति स यदि कामयेत जुहुयादेतां यद्यु कामयेतापि नाद्रियेत ' ( श ० ५।२।३।१ ) ।, ब्रह्मक्षत्रोभयकर्तृको यागो वाजपेय उक्तः । क्षत्रकर्तृको राजसूयः, अकृतवाजपेयस्य राजन्यस्यैव तत्राधिकारात् वाजपेयेनेष्टवतो राज्यफलादपि साम्राज्यफलस्यातिशयितत्वादुत्तम फलसाधनयागानन्तरमवर फलहेतु क्रतुकरणस्या-युक्तत्वात् । ' राज्ञो राजसूयोऽनिष्टिनो वाजपेयेन ' ( का ० श्र ० १५ १ १ २ ) । इष्टि - पशु - सोम - दर्वी होमशतप्रधानो राजसूयः । ' श्वोभूतेऽनुमत्यै अष्टाकपालम् ' ( ) इत्यादिना विहिता इष्टयः, ' अथ श्येनीं विचित्रगर्भामदित्याऽऽलभते ' इत्यादिना विहिताः पशवः । पवित्राभिषेचनीय दशपेय केशवपनीय व्युष्टिद्विरात्रक्षेत्र-धृतिसंज्ञकाः सप्त सोमयागाः । पचवातीयादयो दर्वीहोमाः । तत्र पवित्रनामके प्रथमसोमयागे प्रकृतिसमानत्वेन वक्तव्याभावात् तं परित्यज्य तदवसाने कर्तव्यं पूर्णाहुतिप्रभृति वैशेषिकमुत्तरतन्त्रमभिधीयते ( तै ० सं ० १ / ८ / १ ९ ) । ' पूर्णाहुतेः कालं कात्यायनः सूत्रयामास - ' पवित्रश्चतुर्दिक्षः, सहस्रदक्षिणः, दीक्षा, तदन्ते पूर्णाहुतिगृहेष्विच्छतः ( का ० श्र ० १५।१।४-७ ) । आज्यपूर्णया जुह्वा हूयत इति पूर्णाहुतिः । सा चानाम्नातमन्त्रत्वात् प्राजापत्या, ' यत् तूष्णीं तत्प्राजापत्यम् ' ( श ० ६ २ २ ( २० ) इति श्रुतेः । तां जुहुयात् । पूर्णपदेन सर्वं गृह्यते । सर्वं जगत् स्वाधीनी-कृत्य पश्चाद् राजसूयानुष्ठानेन सूयै अभिषिक्तो भूयासम् इत्यभिप्रायेण पूर्णाहुति कुर्यात् । तस्यां दक्षिणां विधत्ते— वरं ददाति सर्वं वै वरः । तस्यां हुतायां पूर्णाहुतिकरणेच्छायां तदनुष्ठानम्, विपर्यये विपर्ययः । कात्यायन श्रौतसूत्र ( १५।१।९ - १० ) में प्रतिपादित याज्ञिक प्रक्रिया के विनियोग के अनुसार ' एष ते ' कण्डिका के

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२८६ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० ९ ' अथ श्वोभूते । अनुमत्यै हविरष्टाकपालं पुरोडाशं निर्वपति स ये जघनेन शम्यां पिष्यमाणानामवशीयन्ते पिष्टानि वा तण्डुला वा तान् स्रुवे सार्धं ७, संवपत्यन्वाहार्य पचनादुल्मुकमाददते तेन दक्षिणा यन्ति स यत्र स्वकृतं वेरिणं विन्दति श्वभ्रप्रदरं वा ' ( श ० ५२३२ ) । ब्राह्मणानुसारेणैव सूत्रं तद्वयाख्यानं चोक्तमेव । ' तदग्नि, समाधाय जुहोति । एष ते निर्ऋते जुषस्व स्वाहेतीयं वै निर्ऋतिः साऽयं पाप्मना गृह्णाति तं निर्ऋत्या गृह्णाति तद्यदेवास्या अत्र नैर्ऋत रूपं तदेवैतच्छमयति तथो हैन सूयमानं निर्ऋतिनं गृह्णात्यथ यत् स्वकृते वेरि जुहोति श्वभ्रप्रदरे वैतदु हास्यै निर्ऋतिगृहीतम् ' ( श ० ५ | २ | ३ | ३ ) | उल्मुकाग्निमाधाय स्रुवपूरितेन जुहुयात् । तत्र मन्त्रं विधत्ते - तदग्नि समाधाय जुहोत्येष त इति । मन्त्रार्थस्तुक्त एव । निर्ऋतिः पापदेवता, तथा भूमिः पापिष्ठं is गृह्णाति । तत् तथा सति अस्या भूमेरत्र राजसूयानुष्ठानप्रदेशे नैर्ऋतं रूपमेतेन होमेन शमितवान् भवति । तथो हैनमित्यादिना नैर्ऋतहोमस्य प्रयोजनकथनम् । एतदु ह्यस्या ईरिणप्रदरात्मकं स्थानमस्यै अस्या भूमेः सम्बन्धि निर्ऋतिगृहीतम्, नित्या पापदेवतया आश्रयत्वेन गृहीतम् । अतस्तत्र नैर्ऋतहोमानुष्ठानं युक्तमिति । ' अथाप्रतीक्षं पुनरायन्ति । अथानुमत्याऽष्टाकपालेन पुरोडाशेन प्रचरतीयं वा अनुमतिः स यस्तत्कर्म शक्नोति कर्तुं यच्चिकीर्षतीय हास्मै तदनुमन्यते तदिमामेवैतत् प्रीणात्यनयाऽनुमत्याऽनुमतः सूया इति ' ( श ० ५ | २ | ३ | ४ ) । ततः पुनरागमनं विधत्ते अथाप्रतीक्षमिति । यत्र निर्ऋत्यै होमः कृतस्तं प्रदेशमनमीक्ष-माणा एव पुनर्गच्छेयुः । अथानुमतस्य हविषः प्रचारं विधते प्रचरन्तीति । आनुमतहविषः संवपनादिकं कुर्युः । इयं वा भूमिरनुमतिः यता । तयाऽनुमत्या भूम्याऽनुमतं राजसूयाख्यं कर्म करवाणी-, तुमिच्छति तदनुमन्यते त्यभिप्रायेणानुमतहविर्निर्वाणः । तत् तेन हविषा भूमिमेव प्रीणितवान् भवति । ' अथ यदष्टाकपालो भवति । अष्टाक्षरा वै गायत्री गायत्री वा इयं पृथिव्यथ यत्समानस्य हविष उभयत्र जुहोत्येषा ह्येवैतदुभयं तस्य वासो दक्षिणा यद्वै सवासा अरण्यं नोदाश सते निधाय वै तद्वासोऽतिमुच्यते तथो हैन सूयमानमासङ्गो न विन्दति ' ( श ० ५।२।३।५ ) । हविःश्रपणसाघन रुपाळगतामष्टसंख्यां गायत्रीद्वारा पृथिवीयोग्यत्वेन प्रशंसति - गायत्री वा इयं पृथिवीति । यत्समानस्य एकमेव हविरुभयत्र अनुमत्यै निर्ऋत्य च हूयते, उभयोरपि पृथिव्यात्मकत्वादिति । तस्य वासो दक्षिणेति । यथा लोके पुरुषो वस्त्रसहितः सन्नरण्ये गमनं चोरादिभयान्न कामयते । तद्वस्त्रं भयरहिते स्थाने निधाय चेद् गच्छति तदा अतिमुच्यते भयाद्विमुक्तो भवति, तद्वद्वासोदानेन सूयमानमेनं यजमानमासङ्गो भयं न प्राप्नोति । स पूर्वायें जुहोति । अग्निनेत्रेभ्यो देवेभ्य दक्षिणायें जुहोति पश्चायें ' ' ' ' उत्तरार्थ्ये ' ' ' ' ' मध्ये जुहोति ' ( ० ५ २/४/५ ) इति सायण दिव्याख्यानं सर्वथापि श्रौतमेव । अध्यात्मपक्षे तु हे निर्ऋते पापदेवते, एष ते भागो भजनीयोंऽशस्तं जुषस्व, तत्र तत्रार्चासु तादृशवलि-देवतानां स्मरणात् । यथा श्रीविद्यायां सर्वविघ्नकृद्भयो भूतेभ्यो हुँ फड् इति, यथा वा शिवाराधने चण्डाद्यंशः, यथा वा वासुदेवाराधने विष्वक्सेनाद्यंशः, तथैवात्र राजसूयप्रसङ्गे निर्ऋतिदेवतायै वल्युपहरणम् । पुरःसदोऽग्नि-मन्त्रों से अग्नि में हवन आदि क्रियाएं अनुष्ठित की जाती है । शतपथ ब्राह्मण तथा तैत्तिरीय संहिता में याज्ञिक विनियोग के अनुकूल अर्थ उपदिष्ट है । अध्यात्मपक्ष में अर्थं इस प्रकार है - हे पापदेवता निर्ऋति, यह आपका सेवनीय अंश है, इसको ग्रहण करें । विभिन्न पूजाओं में इस प्रकार के बलिभाजन देवताओं का स्मरण किया जाता है । जैसे कि श्रीविद्या में सर्वविघ्नकृद् भूतों के लिये ' हुँ फट् ' है, अथवा शिव की आराधना में चण्डांश आदि हैं, अथवा जैसे वासुदेव की उपासना में विष्वक्सेनांश आदि होते हैं, उसी प्रकार यहां राजसूय के प्रसंग में निर्ऋति देवता के लिये बलिप्रदान विहित है । संमुख स्थित अग्निनेत्र