वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 51–60

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 51–60

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( ५१ ) afuser संख्या १३. यजमान सहित सभी ऋत्विजों द्वारा यूपखण्डों की आहवनीय अग्नि में आहुति १४. सोम याग के होता आदि सभी चमसी ऋत्विजों के द्वारा चात्वालकी पश्चिम दिशा में स्थापित अपने - अपने चमसों का स्पर्श १५-२३. नो मन्त्रों द्वारा ' समिष्टयजुष् ' नामक नौ आहुतियों का प्रदान २४. जल में समिधा के प्रक्षेप के बाद चतुर्गृहीत घृत की उस पर आहुति २५. सोमलता की गतसार सिट्टी ( ऋजीष ) को घट में भर कर उसकाजल पर प्लावन २६. ऋजीष कुंभ को जल पर बहा देने के बाद उसका उपस्थान २७. ऋजीष कुंभ को जल देना २८. अनुवन्ध्या गौ के गर्भवती होने पर प्रायश्चित करना २ ९. प्रतिप्रस्थाता द्वारा वशावदान की आहुति ३०. स्विष्टकृद् याग से पहले प्रतिप्रस्थाता द्वारा गर्भरस का अवदान, अध्वर्यु द्वारास्विष्टकृद् होम के बाद प्रचरणी से आहुति देना ३१. समिष्ट यजुर्होम के अनन्तर शामित्र अग्नि में स्वाहाकाररहित आहुति काप्रदान ३२. शामित्र अग्नि प्रदत्त हवि का अंगारों से आच्छादन ३३-३५. तीन मन्त्रों द्वारा षोडशी ग्रह का ग्रहण ३६. षोडशी ग्रह का उपस्थान, उसकी परब्रह्म के रूप में स्तुति ३७. षोडशी ग्रह पात्र में स्थित सोम का भक्षण ३८-४०. द्वादशाह संबन्धी अतिग्राह्य ग्रहों का ग्रहण एवं भक्षण ४१. गवामयन नामक संवत्सर सत्र के विषुवत् नाम के मध्यम दिन में अतिग्राह्यग्रह का ग्रहण ४२. गर्गत्रिरात्र आदि यामों में दातव्य सहस्र गायों की संख्या में हजार संख्या वाली रोहिणी गो को द्रोणकलश का आघ्राण कराना की पूर्ति करने ४३. उक्त रोहिणी गो के दाहिने कान में यजमान द्वारा मन्त्रवाचन ४४-४६. गवामयन के उपान्त्य महाव्रत के दिन ऐन्द्र ग्रह का ग्रहण ४७. औदुम्बर पात्र में सोमांशुग्रहण, निग्राभ्या जल का आनयन, तीन सोमलताओंकी आहुति तथा अदाभ्य ग्रह का ग्रहण ४८-४९. अदाम्य ग्रह में स्थित निग्राम्या जल का अध्वर्यु द्वारा आलोडन ५०. इस कण्डिका के तीन मन्त्रों से सांम खण्डों को अधिषवण प्रस्तरपर रखना ५१. अध्वर्यु द्वारा शालाद्वायं में सकृद् गृहीत घृत की आहुति ५२. सभी दीक्षित ऋत्विजों द्वारा प्रस्तुत ऋचा पर सामगान ५३. सभी दीक्षित यजमानों का हविर्धान के नीचे से झुक कर पूर्वाभिमुखनिष्क्रमण ५४ - ५ ९. मृण्मयं धर्मपात्र के टूट जाने पर चौतीस आहुतियों का प्रदान

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( ५२ ) efuser संख्या ५ ९. ' ययोरोजसा ' इत्यादि शेष मन्त्र से स्कन्न रसरूप सोम का जल से सेचन ६०-६१. रस रूप सोम द्रव्य का स्कन्दन होने पर प्रायश्चित्त का विधान ६२. श्रुत्युक्त काल में सकृद् गृहीत घृत से आहुति देकर यजमान द्वारा मन्त्र का वाचन ६३. सोम याग में यूप पर काक के बैठ जाने पर उद्गाता अथवा ब्रह्मा द्वारा आहुति नवम अध्याय १. वाजपेय याग की अंगभूत दीक्षणीया, प्रायणीया, आतिथ्या आदि इष्टियों के प्रसंग में सकृद्गृहीत घृत की आहुति २. प्रातः सवन के प्रसंग में आग्रयण, अतिग्राह्य और षोडशी ग्रहों का क्रमशः ग्रहण ३. वाजपेयिक चतुर्थं ग्रह का ग्रहण ४. वाजपेथिक पंचम ग्रह का ग्रहण 1. महामरुत्वतीय ग्रहप्रचार के अनन्तर माहेन्द्र ग्रह के ग्रहण से पूर्व अध्वर्यु द्वारा शकट से रथ का अवतारण ६. स्नान के लिये जल में प्रविष्ट अथवा स्नान के बाद आये हुए चार अश्वों का अध्वर्यु द्वारा afusar गत दो मन्त्रों से प्रोक्षण ७. रथ में दाहिने अश्व का योजन ८. रथ के उत्तर ( बाँये ) भाग में अश्व का योजन ९. रथ में प्रष्टि नामक तृतीय अश्व का योजन तथा रथ में नियुक्त अश्वों को बार्हस्पत्य चरु का अवघ्राणन १०. उत्कर स्थान के पास स्थापित सत्रह अरों से युक्त उदुम्बर काष्ठ से बनाये गये रथचक्र पर ब्रह्मा नामक ऋत्विक् का आरोहण ११. अध्वर्यु द्वारा वेदि के पास ऊँची जगह पर रखी सत्रह दुन्दुभियों में से एक का मन्त्रोच्चार के साथ तथा अन्य का तूष्णीं वादन १२. अध्वर्यु द्वारा एक दुन्दुभि का मन्त्रोच्चार के साथ तथा अन्य का तूष्णीं अवतारण १३. पूर्वोक्त विधि से अश्वसंयोजित रथ पर यजमान का आरोहण १४-१५. दो मन्त्रों से आज्य का हवन अथवा अनुमन्त्रण १६- १८. तीन मन्त्रों से आज्य की आहुति अथवा अश्वाभिमन्त्रण १ ९. यजमान द्वारा रथ से उतर कर नैवार चरु का स्पर्श तथा रथ से संयुक्त अश्वों को उसका आघ्रापण २०. कण्डिकागत छ: मन्त्रों से स्रुबाहुति प्रदान २१. कण्डिकागत छः मन्त्रों से स्रुवाहृति प्रदान, यज्ञरूप संवत्सरात्मक प्रजापति के निमित्त इन १२ आहुतियों का विधान अथवा १२ मन्त्रों का वाचन

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( ५३ ) afuser संख्या तथा २२. यूपारूढ यजमान का दिशाओं का निरीक्षण, भूमि का निरीक्षण, अध्वर्यु द्वारा धर्मास्तरण उस पर यजमान का बैठना २३ - २ ९. औदुम्बर पात्र में एकत्र जल, दुग्ध, सर्वान आदि की आहवनीय अग्नि में स्रुव द्वारा सात मन्त्रों से आहुति अभिषेक ३०. हवन के बाद औदुम्बर पात्र में अवशिष्ट पदार्थों से यजमान के सिर का ३१ - ३४. उज्जितिसंज्ञक चार मन्त्रों से सुवाहुति प्रदान अथवा मन्त्रवाचन राजसूय याग ३५. ऊबर भूमि में उल्मुक स्थापन पूर्वक निर्ऋति आदि के निमित्त आहुति प्रदान, ३६. पंचधा विभक्त आहवनीयाग्नि को एकत्र कर उसमें आहुति देना ३७. अपामार्ग - तण्डुल की आहुति देने के लिये दक्षिणाग्नि से उल्मुक का आदान पंचवातीय होम ३८. उल्मुक को सविधि स्थापित कर उसमें स्रुवस्थित अपामागं तण्डुलों की पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख हो आहुति देना के दक्षिण ३ ९ -४०. आठ देवसू आहुतियों में से अन्तिम आहुति को वारुण चह से समर्पित कर यजमान बाहु का ग्रहण और यथास्थान यजमान के तथा उसके माता - पिता के नाम का ग्रहण एवं आशीर्वचन दशम अध्याय १. उदुम्बर पात्र में सरस्वती नदी के जल का ग्रहण २- ४. आहुति प्रदान के बाद अन्य सोलह प्रकार के जलों का ग्रहण तथा चतुर्गृहीत आज्य से हवन ५. पालाश आदि चतुविध पात्रों का आसादन, व्याघ्रचर्म का आस्तरण तथा पार्थं संज्ञक आहुतियों का प्रदान ६. कुशपवित्रों का निर्माण, उनमें हिरण्यबन्धन तथा उनसे अभिषेकार्थं आनीत जल का उत्पवन ७. पवित्र जल का अभिषेक के लिये पालाश आदि के चार पात्रों में भरना ८. यजमान को क्षौम वस्त्र का परिधापन, श्वेत कम्बल का धारण, महाकंचुक तथा उष्णीष धारण एवं धनुष का विधिवत् ग्रहण ९. इषु ( बाण ) ग्रहण के बाद यजमान द्वारा कण्डिकागत ' आवित् ' संज्ञक सात मन्त्रों का वाचन में उपविष्ट क्लीब के मुख में १०. ' अवेष्टा दन्दशूकाः ' मन्त्र के इस भाग से अध्वर्यु द्वारा सदोमध्य ताम्र परिष्कृत लौह खण्ड का प्रक्षेप १०- १४. यजमान की भुजाओं को पकड़ कर अध्वर्यु द्वारा उसको क्रमशः प्राची, दक्षिणा, प्रतीची, उदीची और ऊध्वं दिशा की ओर ले जाना

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( ५४ ) afrat संख्या १५. अध्वर्यु द्वारा बाहुगृहीत यजमान का व्याघ्रचर्म पर चढाना और उसके पादतल के नीचे सुवर्ण के परिमण्डल को रखना १६. अध्वर्यु द्वारा यजमान की दोनों भुजाओं को ऊपर उठाना १७-१८. यजमान के सामने खड़े पुरोहित अथवा अध्वर्यु द्वारा सुवर्ण खण्ड से अलंकृत व्याघ्रचर्म पर खड़े पूर्वाभिमुख यजमान का पालाश पात्र में स्थित जल से अभिषेक १ ९. यजमान द्वारा कृष्णविषाणा कण्डूयनी से अभिषेक के जल का सारे शरीर पर लेपन २०. अध्वर्यु द्वारा राजा और राजपुत्र के पितापुत्रभाव की चर्चा के प्रसंग में सकृद् गृहीत घृत की शालाद्वायं अग्नि में आहुति २१. रथवाहण स्थान से रथ का अवतारण, अश्वयोजन तथा शताधिक गायों का प्रत्यर्पण के लिये स्थापन २२. यजमान का रथारोहण, शताधिक गायों का प्रत्यर्पण तथा यूप की प्रदक्षिणा करके अन्तःपात्य स्थान में रथस्थापन २३. अध्वर्यु द्वारा सकृद् गृहीत घुत से रथविमोचनीया नामक चार आहुतियों का प्रदान एवं रथावतरण के समय भूमि का दर्शन २४. सोपानत्क यजमान का रथ से उतरना २५. रथ के दक्षिण चक्र के मार्ग पर जाकर यजमान की बाहुओं में शतमान सुवर्ण की वर्तुल मणियों को बाँधना २६. खदिर काष्ठ की बनी आसन्दी का स्थापन और उस पर व्याघ्रचर्म का आस्तरण २७. अध्वर्यु द्वारा यजमान के हृदय का स्पर्श २८. यजमान के हाथ पर सोने की कोड़ी के रूप में बने पाँच अक्षों ( पासों ) का रखना और sa आदि के द्वारा यक्षिय वृक्षों की टहनी से यजमान की पीठ पर धीरे - धीरे आघात करना २ ९ जुआ खेलने की जगह पर सुवणं रख कर उस पर चतुर्गृहीत घृत की आहुति देना और वहाँ अक्षों का रखना ३०. पितामह आदि सोमयाजियों के दस गणों की गणना करके अन्य ब्राह्मणों का दशवाजपेय याग के सोत्य दिवस में अनुवाक से प्रसर्पण और विष्ण्योपस्थान उनके निमित्त ऋत्विक गण और ' विभुरसि ' मन्त्र से अथवा सावित्र राजसूयगत चरक सोत्रामणी के मन्त्र ३१. अनंकुरित चार मुट्ठी व्रीहि का ओदनपाक, उसमें चूर्णीकृत अविरूढ व्रीहि का मिलाना ३२. छानी गई सुरा में बदरी चूर्ण का मिलाना, उसको वैकंकत पात्र में भर कर देवताओं को अर्पित करना ३३ - ३४. सुराग्रहों के ग्रहण के याज्या और अनुवाक्या मन्त्र

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सप्तमोऽध्यायः पूर्वोक्ते षष्ठेऽध्याये यूपसंस्कारादिसोमाभिषवपर्यन्ता मन्त्रा व्याख्याताः । अथ सप्तमेऽध्याये ग्रहग्रहणमन्त्रा ) । सूत्रेऽत्र व्याख्यायन्ते । ‘ उपा ७ शं च गृह्णाति वाचस्पतये देवो देवेभ्यो मधुमतीरिति ' ( का ० श्र ० ९ ।४।२० ग्रहं गृह्णीयाद् मन्त्रत्रयस्य प्रतीकोपादानात् निग्राभवाचनानन्तरं त्रिभिर्मन्त्रः प्रतिमन्त्रमेकैकेन मन्त्रेणोपांशुसंज्ञकं, एकैकेन मन्त्रेण प्रतिवर्गं तृतीयांशं गृह्णीयात् । अष्टकृत्वः प्रहृत्य वाचस्पतय इति, एकादशकृत्वः प्रहृत्य धाराग्रहः देव इति । द्वादशकृत्वः प्रहृत्य मध्विति । अयमुपांशुग्रहोऽन्तर्यामग्रहश्वा वक्ष्यमाणोऽधाराग्रहः । ऐन्द्रवायवग्रहस्तु तत्र जले प्रक्षिप्ते सोमयागे हि द्विप्रकारो ग्रहः - अधाराग्रहः, धाराग्रहश्च । तत्र दशापवित्रेऽभिषुतान् सोमान्निक्षिप्य तु धारामन्तरा अंशुन्निक्षिप्य ततो या धारा सोमरसस्य प्रवहति, तया धारया येषां ग्रहणं ते धाराग्रहाः, यस्य न रसस्य । तत्रैव जलक्षेपणं सोऽधाराग्रहः । इमौ चोपांश्वन्तर्यामग्रहौ अधाराग्रही । अतोऽत्रांशूनामेव ग्रहणं । पूर्वोत्तरा-प्राणदैवत्या विराट् । नववैराजत्रयोदशैर्नष्टरूपस्येतिलक्षणान्नष्टरूपा विराट् । प्रथमोऽर्णस्तेनैकोना र्धयोरुपांशुग्रहस्य प्रथमद्वितीयग्रहयोः क्रमेण विनियोगः ।

वा॒वस्पत॑ये॒ पश्स्व॒ वृष्णो॑ अ॒शुभ्य॒ गभ॑स्तिपू॒तः ।

दे॒वो दे॒वेभ्यः॑ः पवस्व येषां भागोऽसि ॥ १ ॥

: सम्बन्धिना मन्त्रेण मन्त्रार्थस्तु – हे सोम, पतये पालकदेवार्थं वाचो वाचा, विभक्तिव्यत्ययः, मन्त्रेण वाचः तत्र क्षिप्येते । तथा वा, पवस्व शुद्धो भव । कीदृशस्त्वम्? वृष्णो वर्षितुस्तव सम्बन्धिभ्यामंशुभ्यां पूतः । तौ । हि समासगतः पूतशब्दो गभस्तिपूतः ' पाणी वै गभस्ती ' ( श ० ४। १ । १ । ९ ) । अध्वर्योर्गभस्तिभ्यां पाणिभ्यां च पूतः श्रुत्यनुसारेण विच्छ्द्यिांशुभ्यामित्यनेनापि योज्यः । उव्वटाचार्यस्तु ' प्राणो वै वाचस्पति: ' ( श ० पव ० ४ । गतौ १ । १ ' । ९ इति ) इति धातोः । यस्त्वं हे सोम, वाचस्पतये प्राणाय त्वं पवस्व । पवनं देवतार्था प्रवृत्तिरित्याह । ' हे सोम, देवः सन् वृष्णोऽभीष्टवर्षणशीलस्य सोमस्यांशुभ्यामध्वर्योश्च गभस्तिभ्यां पूत इत्याह । द्वितीयं ? गृह्णाति येषां त्वं भागोऽसि, तेभ्यो देवेभ्योऽर्थाय पवस्व प्रवृत्ति कुरु । नह्यदेवो देवांस्तर्पयितुमलम् । केषां देवानाम् उदान एवा-देवेभ्यो दीप्यमानः सन् पवस्वेत्यर्थः । शतपथे ' प्राणो ह वा अस्योपा शुर्व्यान उपाशुसवन सोमयागस्य सकलस्य न्तर्यामः ' ( श ० ४।१।१।१ ) । तत्रादौ प्रातःसवनीयाः षोडश ग्रहाः । तत्रायमुपांशुग्रहः । अस्य हुए प्राणों की प्रीति के मन्त्रार्थ -- हे सोम! सम्पूर्ण कामनाओं को पूरा करने वाले तुम हमारे हाथों से इस पवित्र पात्र में बैठो और देवताओं के लिये इस पात्र में बैठो । हे सोमदेवता स्वरूप! तुम देवताओं की प्रीति के निमित्त भाग बनो ॥ १ ॥

की व्याख्या की गई हैं । भाष्यसार - पूर्वोक्त छठे अध्याय में यूपसंस्कार से प्रारम्भ करके सोमाभिषव तक के मन्त्रों २५ ) में वर्णित याज्ञिक सातवें अध्याय में ग्रह - ग्रहण के मन्त्रों की व्याख्या की जा रही है । कात्यायन श्रौतसूत्र ( ९ / ४ / २१ -

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२ शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० ७ वा लोकस्यादौ गृह्यमाण उपांशुग्रहः प्राणः प्राणत्वेन प्रसिद्धः, ' प्राणो वा एष यदुपांशु: ' ( तै ० सं ० ६ | ४ | ५ ) इति श्रुतेः । उपांशुसहचारिण उपांशुसवनस्याऽन्तर्यामस्य च व्यानोदानतामाह - ' व्यान उपांशुसवन उदानोऽन्तर्यामः ' इति । कात्यायनोऽपि --- ' उपांशुसवनं पाणिना प्रमृज्योदचं व्यानाय त्वेति संस्पृष्टमुपविष्टयोरभिपुण्वन्ति चत्वारः पर्युपवेशनसामर्थ्यात् ' ( का ० श्र ० ९ ४ | ३७ ), तथा ( का ० श्र ० ९ ।५।१ ) । उपांशुसवनाख्ये पाषाणे लग्नमृजीषादिकं हस्तेनाधः पातयित्वा उदङ्मुखमुपांशुपात्रलग्नमेव तं सादयेत्, व्यानाय त्वेति मुखं चास्य येनाभिषवः सोमाभिषवं कृतः, उपांशुग्रहं हुत्वाऽधिषवणफलक समीपेऽध्वर्युयजमानयोरुपवेशनानन्तरमध्वर्युप्रतिप्रस्थातृनेष्ट्र नेतारः कुर्वन्ति, ' अधिषवणे पर्युपविशन्ति ' ( का ० श्र ० ९ | ४ | १ ) इत्यत्र परित उपविशन्तीति चतसृषु दिक्षूपवेशन-विधानसामर्थ्यात् । ' अथ यस्मादुपा ७ शुर्नाम । अ शुर्वै नाम ग्रहः स प्रजापतिस्तस्यैष प्राणस्तद्यदस्यैष प्राणस्तस्मादुपा शु-र्नाम ' ( श ० ४।१।१।२ ) उपांशोः प्राणत्वं प्रश्नपूर्वकमुपांशुव्युत्पत्त्यापि समर्थयते - अथ यस्मादिति । गृह्यतेऽनेनेति च ' यज्ञो बै व्युत्पत्त्या ग्रहो दारुमयं पात्रमंशुनामकम् । तस्य यज्ञासाधनत्वेन तस्मिन् यज्ञत्वोपचाराद् यज्ञस्य प्रजापतिः ' ( तै ० ब्रा ० १।३।१० ) इति श्रुत्या प्रजापतित्वात् स ग्रहः प्रजापतिः । तस्य प्रजापतिरूपस्य ग्रहस्य प्राणवतश्चरति तेनैष सोमरसः प्राणः । तत्सोमरसात्मकं द्रव्यं यस्मादस्यांशुग्रहात्मकप्रजापतेरेष उक्तोपपादनः प्राणस्तस्मादुपगतोंऽशुमिति विगृह्य ( पा ० सू ० १ ४ ७ ९ ) इति स्थलीयेन ' अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया ' इति वार्त्तिकेन द्वितीयासमासः । यद्वा अंशुं गृह्णातीति विहितः सोमग्रहोंऽशुः । स चानिरुक्तया प्राजापत्यया गृह्यत इति प्रजापत्यात्मकः । तं प्राणरूपेणोपगतो ग्रह उपांशुग्रहः । ' तं बहिष्पवित्राद् गृह्णाति परानमेवास्मिन्नेतत् प्राणं दधाति सोऽस्यायं पराङेव प्राणो निरर्दति तम शुभिः पावयति पूतो सदिति षड्भिः पावयति षड्वा ऋतव ऋतुभिरेवैन-मेतत् पावयति ' ( श ० ४। १ । १ । ३ ) | सोमात्मकस्य प्राणस्य गुणविशिष्टं ग्रहणं विधत्ते - तं बहिष्पवित्राद् गृह्णातीति । तं प्रकृतं प्राणात्मकं सोमरसं पवित्राद् दशापवित्राद् बहिः पृथक् पवित्रमन्तरेण गृह्णाति । अविधानादर्थसिद्धः पवित्रविरहो नान्तरिक्षे चिनोतीतिवन्नित्यप्राप्तोऽनुद्यते । पवित्रविरहस्य प्रयोजनमाह पराचमेवास्मिन्नेतत् प्राणं दातीति । एतदिति निधानक्रियाया विशेषणम् । तस्याश्चाख्याताभिधेयां भावनां प्रति कर्मत्वादेतदिति तद्विशेषणे द्वितीया । अस्मिन् ग्रहाख्ये प्रजापतौ बहिः सुखसचारक्षमप्राणकर्मकमेतन्निधानं करोति । एवं चास्य प्रजापते- । ‘ अर्द रेतत्सृष्टतया वा तदात्मकस्य सकललोकस्य सोऽयं परिदृश्यमानः प्राणो बहिरपि निरर्दति निर्गच्छत्येव गतौ याचने च ' । ततश्च श्वासप्रश्वासप्रतिबन्धो न कदाचिद् भवति । पवनसाधनदशापवित्राद् बहिस्त्वे विहितं ग्रहणमपूतस्यैव स्यात्, तथा मा भूदिति पावनमंशुकरणकं विधत्ते - तमंशुभिः पावयतीति । पूतोऽसदिति । इकारलोपः ( पा ० सू ० ३ | ४ / ९ ७ ), ' लेटोऽडाटो ' ( पा ० सू ० ३ | ४ | ९ ४ ) इत्यडागमः । पूतो भवतीत्यर्थः । विलस्योपरि अंशुं निधाय तत्र रसावनयनेन तं रसं शोधयेदित्यर्थः । अतीतानामंशूनां विनियोगासम्भवादर्थसिद्धमादानमिति ब्राह्मणेन पृथग्विहितम् । विस्पष्टीकरणार्थं तु सूत्रकारेण ' प्रतिप्रस्थाता शून् षडादत्ते ' इत्युक्तम् ' षडार्द्रानंशून् संश्लिष्टानादाय चर्मणि निधाय ' इत्यापस्तम्बश्रौतसूत्रात् । अंशुभिरित्युक्तस्य बहुत्वसामान्यस्य तद्विशेषे पर्यवसान-माह - षड्भिः पावयतीति । अंशूनां विहिता षट्त्वसंख्या स्तूयत ऋतुत्वसम्पादनेन षड्वा ऋतव इति । सोमरस कर्मकमेतत् पावनमृतुरूपैरेवांशुभिः कृतवान् भवेदित्यर्थः । आत्तानां षण्णामशूनां मध्ये वक्ष्यमाणेषूपांशु-ग्रहणपर्यायेषु त्रिष्वप्येकैकस्मिन् पर्याये द्वौ द्वावंशून् ग्रहबिले निदध्यात् । तदाह कात्यायनः -- ' आत्तानां च द्वौ प्रक्रिया के अनुसार ' बाचस्पतये पवस्व ' इत्यादि तीन मन्त्रों के द्वारा उपांशु नामक ग्रह का ग्रहण किया जाता है । यह उपांशु

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म ० १ ] वेदार्थ पारिजात भाष्यसहिता ६ द्वान्तर्दधाति ग्रहणभेदात् ' ( का ० श्र ० ९ | ४ | २२ ) । ' मन्त्रलिङ्गाच्च ' ( का ० श्र ० १।५।२३ ) | ग्रहणपर्यायाणां त्रित्वाद् वृष्णो अंशुभ्यामिति ( वा ० सं ० ७ १ ) ग्रहणमन्त्रगत द्विवचनलिङ्गाच्च । अस्मिन् पक्षे पर्यायत्रयसंख्यां संकलय्यषभिरिति ब्राह्मणे षट्त्वं द्रष्टव्यम् । ' अंशुभ्या ७ ह्येनं पावयति ' इति मन्त्रव्याख्यान ब्राह्मणगतां-शुद्वित्व परामर्शादपि षभिरिति बहुवचनं सङ्कलनाभिप्रायमेवेति निगम्यते । एकैकस्मिन् ग्रहणपर्यायेंऽशुषट्क-विधिपरं षड्भिः पावयतीति ब्राह्मणवाक्यमिति मत्वा वात्यायनेनोक्तम् -- ' षड्वा श्रुतिसामर्थ्यात् ' ( का ० श्र ० ९ ।४।२४ ) । ' अंशुभ्याम् ' ( वा ० सं ० ७ १ ) इति हि मन्त्रे द्विवचने लिङ्गम्, अंशुभ्यां ह्येनं पावयतीति तद् व्याख्यानं ब्राह्मणवाक्यं च मन्त्रार्थाविष्करणमात्रपरम्, न तु द्वित्वविधिपरम्! हीति प्रसिद्धिर्मन्त्राभिप्राय-विवक्षयैव । इत्थं मन्त्रलिङ्गाद् द्वित्वम्, षड्भिरिति विधिश्रुत्या तु बहुत्वम् । श्रुतिश्च लिङ्गाद्वलीयसी । यथा ' कदाचन स्तरी रसि ' ( वा ० सं ० ३ | ३४ ) इति ऐन्द्री ऋक् ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते ' इति कात्यायनस्याभिप्रायः । ' तदाहुः । यदशुभिरुपा ४ शुं पुनाति सर्वे सोमाः पवित्रपूता अथ केनास्याशवः पूता भवन्तीति । ( श ० ४।१।१।४ ) | आत्तानामंशूनां पुनरपि सोमे योजनविधानाय याज्ञिकानां जिज्ञासामवतारयति तदाहुरिति तत् तस्मिन्नंशुविषये आहुर्जिज्ञासन्ते यद् यस्मात् कारणादुपांशुसोमरसः षड्भिरंशुभिः पूयते, अन्यतर्यामादिसोमास्तु दशापवित्रेण पूयन्ते, न तृतीयं पावनसाधनमस्ति । अत एतेंऽशवः केन पूयन्ते? उक्तप्रश्नस्योत्तरत्वेन समन्त्र-कमुपनवापं विदधाति - ' तानुपनिवपति यत्ते सोमादाभ्यं नाम जागृवि तस्मै ते सोम सोमाय स्वाहेति तदस्य । स्वाहाकारेणैवाशवः पूता भवन्ति सर्वं वा एष ग्रहः सर्वेषा हि सवनाना रूपम् ' ( श ० ४। १ । १।५ ) षडंशूनन्तर्यामाद्यर्थे सन्निहिते सोमे यत्त इति मन्त्रेण क्षिपतीत्यर्थः । हे सोम, त्वदीयं यन्नाम शत्रुभिरदाभ्य- स्वाहा मतिरस्कार्यम्, जागृवि जागरूकम्, हे सोम! तस्मै सोमाय ते तादृक् सोमनामधारिणे तुभ्यमिदं सोमांशुद्वयं स्वाहुतमस्त्विति । क्षेपे च सति तैरेवान्तर्यामादिसोमैः सह प्रक्षिप्तानामशूनामपि वसतीवरीसंसर्गोऽभिषवणे । तत् दशापवित्रेण पवनमिति संस्कारा भविष्यन्ति । तदेवाह - तदस्य स्वाहाकारेणैवांशवः पूता भवन्तीति | तथा सत्यस्योपांशोरन्तर्धानार्था अंशवोऽपि स्वाहेति क्रियते यस्मिन् प्रक्षेपे तेन प्रक्षेपेण पूता भवन्तीति योजना उपांशोरन्तर्धानाय पृथगातानामंशूनां सवनत्रयसम्बन्धिनि सोमे पुनः प्रक्षेपे हेतुमाह - सर्वं वा । अयं ग्रहः सकल-सोमयागात्मकः, यतः सवनत्रयरूपमिह दृश्यते । अतः सवनत्रयात्मकैतद्ग्रहसम्बन्धिनामंशूनां सवनत्रयसम्बन्धन ह वै यज्ञं सोमे योजनमुचितमिति भावः । अस्य ग्रहस्य सवनत्रयात्मकत्वमभिषवविधि ब्राह्मणे स्पष्टम् । ' देवा तन्वानाः । ते असुरराक्षसेभ्य आसङ्गाद्विभयाञ्चक्रुस्ते होचुः सस्थापयाम यज्ञं यदि नोऽसुर राक्षसान्यासजेयुः सस्थित एव नो यज्ञः स्यादिति ' ( श ० ४ | १ | १ | ६ ) । उपांशुग्रहस्य सवनत्रयात्मकत्वं प्रातः सवनस्य सवन-त्रयात्मकत्वनिदर्शनेन द्रढयितुमाख्यायिकामाह - देवा इति । ' आ ' सायमनुष्ठीयमाने यज्ञे असुरा राक्षसा ऋक्तस्तेन ज्ञात्वा आसक्ताः सन्तो जघ्नुः । ' ते प्रातः सवन एव सर्वं यज्ञ समस्थापयन्नेतस्मिन्नेव ग्रहे यजुष्टः प्रथमे शस्त्र सस्थितेनैवात ऊर्ध्वं यज्ञेनाचरन् स एषोऽप्येतर्हि यज्ञः सन्तिष्ठत एतस्मिन्नेव ग्रहे यजुष्टः प्रथमे स्तोत्रे सामतः यज्ञं प्रथमेश ऋतस्तेन सस्थितेनैवात ऊर्ध्वं यज्ञेन चरति ' ( श ० ४।१।१७ ) । प्रातः सवनत्रयात्मकं समस्थापयन् । ऋग्यजुःसाममन्त्रैर्हि सवनत्रयात्मकं कर्म सम्पद्यते । अतः प्रातः सवने उपांशुग्रहगतयजुर्मन्त्रैरेव ग्रह तथा आगे उल्लिखित किया जाने वाला अन्तर्याम ग्रह ये दोनों अधाराग्रह हैं । ऐन्द्रवायव ग्रह तो धाराग्रह है । सोमयाग में दो प्रकार के ग्रह होते हैं - अधाराग्रह तथा धाराग्रह । शतपथ ब्राह्मण में याज्ञिक विनियोग के अनुकूल मन्त्रार्थं उपदिष्ट है ।

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 58 का मूल पृष्ठ
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४ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० १ यजुष्ट्वाविशेषात् सवनान्तरवर्तियजुः साध्यमपि कर्म सम्पन्नम् । एवं प्रथमस्तोत्रशस्त्रगताभ्यामृक्सामाभ्यामिति संग्रहेण संस्थिते एव तु द्वितीयतृतीयसवने पुनविस्तारेणान्वतिष्ठन्निति । अत इदानीमपि तथा, अतो यथा प्रातः-सवनस्य सवनत्रयात्मकत्वमेवमुपांशुग्रहस्यापि । ' स वा अष्टौ कृत्वोऽभिपुणोति । अष्टाक्षरा वै गायत्री गायत्रं प्रातः-सवनं प्रातः सवनमेवैतत् क्रियते ' ( श ० ४ | १ | ११८ ) । स प्रहरति त्रिभिरभिषुणोतीति विहिताभिषवपर्याय त्रयमध्ये प्रथमपर्याये प्रहारसंख्याविशेषं विधत्ते - स वा अष्टौ कृत्वोऽभिषुणोतीति । सोमे गाव्णा अष्टकृत्वः प्रहारं करोतीत्यर्थः । संख्या सामान्येन प्रहारस्य गायत्र्यात्मकत्वात् तदात्मप्रातः सवनरूपमेतत्कर्म सम्पन्नमित्यर्थः । ' स गृह्णाति । वाचस्पतये पवस्वेति प्राणो वै वाचस्पतिः प्राण एष ग्रहस्तस्मादाह वाचस्पतये पवस्वेति वृष्णो अशुभ्यां गभस्तिपूत इति पाणी वै गभस्ती पाणिभ्या ७ होनं पावयति ' ( श ० ४ | १ | १ | ९ ) । बहिष्पवित्राद् गृह्णातीति विहितं ग्रहणं स गृह्णातीत्यनूद्य मन्त्रं विनियुज्य व्याचष्टे - स गृह्णातीत्यादिना गभस्तिपूत इत्यन्तेन मन्त्रेण । वैशब्दः प्रसिद्धौ । ' एष एव बृहस्पतिर्वाग्वै बृहती तस्या एष पतिः ' ( बृ ० उ ० ११३/२० ) इति बृहस्पति-निर्वचने वागात्मिकां बृहतीं प्रति प्राणस्य पतित्वाभिधानाद् वाचस्पतित्वं प्राणस्य प्रसिद्धम् । उपांशुपात्रे गतस्य सोमरसस्य च प्राणत्वं प्रागुक्तमेव -- ' प्राणो ह वास्य ' ( ४ | १ | १ | १ ) इति । हे सोमरस त्वं वाचस्पतित्वाय प्राणत्वापूतो भवेत्यर्थं इति सायणाचार्यः । वर्षति सोममिति वृषा सोमः, तस्याशुभ्याम् । अत्र पात्रधारणे पाण्योः करणत्वम्, तद्द्वारान्तर्धानेन तु सोमांशोरिति द्वारभेदेनैकस्मिन्नपि पात्रे पाण्योरंशोश्च न विकल्पः । ' अथैकादश-कृत्वोऽभिषुणोति । एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुप त्रैष्टुभं माध्यन्दिन सवनं माध्यन्दिनमेवैतत्सवनं क्रियते ' ( श ० ४।१।१।१० ) । ' सगृह्णाति । देवो देवेभ्यः पवस्वेति देवो ह्येष देवेभ्यः पवते येषां भागोऽसीति तेषामु ह्येष भागः ' ( ० ४ | १ | १ | ११ ) । द्वितीयग्रहणपर्याये प्रहार संख्याविशेषं विधत्ते - अथैकादशेति । संख्यासामान्येन प्रहारं त्रिष्टुबात्मकं माध्यन्दिनसवनमेवैतत्कर्म क्रियते । द्वितीयग्रहणपर्याये मन्त्रं विनियुञ्जानः क्रमेण तद्भागौ व्याचष्टे -गृह्णातीति । शुक्लप्रतिपदादितिथिषु चन्द्रस्यैकैक कलावृद्धौ सोमलताया एकैकं पत्रमुत्पद्यते । कृष्णप्रतिपदादिषु चन्द्रस्यैकैककलाहासे सोमलताया एकैकं पत्रं निपततीति सुश्रुतादौ प्रसिद्धम् । अतोऽयं सोमश्चन्द्रात्मकतया देवः । सा प्रसिद्धिर्हिशब्देनोच्यते - देवो हि येषां भागोऽसि तेषामु ह्येष भागः । अध्यात्मपक्षे -- हे साधक, वाचस्पतये वेदलक्षणाया वाचोऽधीश्वराय पवस्व शुद्धो भव । शुद्धो भूत्वा तमनुसर । वृष्णोऽभीष्टवर्षणशीलस्य परमात्मनोंऽशुभ्यां बाह्यान्तराभ्यामनुग्रहलक्षणाभ्यां किरणाभ्यामनुगृहीतः, तस्यैव गभस्तिभ्यां पाणिभ्यां पूतः सन् येषां देवानामर्चनेऽधिकृतोऽसि तेभ्यो देवेभ्यो देवो भूत्वा पवस्व तानर्चयितुमनुसर । ननु परमेश्वरस्य निराकारत्वात् कुतस्तस्य पाणिसम्बन्ध इति चेन्न, ' नमो हिरण्य बाहवे ' ( वा ० सं ० १६ । १७ ) इति परमेश्वरस्य हिरण्यबाहुत्वश्रवणात् । दयानन्दस्तु - ' हे मनुष्य, त्वं वाचस्पतये वाण्याः पालकायेश्वराय पवस्त्र पवित्रो भव, वृष्णो वीर्यवतों-शुभ्यां बाहुभ्यामिव बाह्याभ्यन्तरव्यवहाराय गभस्तिपूत इष गभस्तिभिः किरणैः पूत इव देवो विद्वान् देवेभ्यो अध्यात्मपक्ष में मन्त्र की अर्थयोजना इस प्रकार है - हे साधक, वेद - रूपिणी वाणी के अधिष्ठाता के लिये शुद्ध बनो । शुद्ध होकर उसका अनुसरण करो । अभीष्ट की वर्षा करने वाले परमात्मा की बाह्य और आन्तरिक अनुग्रहरूपी किरणों से अनुगृहीत होकर उसीके करस्पर्श से पवित्र होकर जिन देवताओं की अर्चना के लिये तुम अधिकृत हो, उन देवों के लिये देवतारूप होकर अर्चना करने हेतु अनुसरण करो । परमेश्वर के निराकार होने के कारण उनके हाथों का सम्बन्ध कैसे सिद्ध हो सकता है? यह शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि ' नमो हिरण्यबाहवे ' इत्यादि मन्त्रों में परमेश्वर की स्वर्णमय भुजाओं का वर्णन है ।

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ४ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 59 का मूल पृष्ठ
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म ० १-२ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता । विद्वद्भयः पवस्व शुद्धो भव । तेषां भागोऽसि भजनीयोऽसि ' इति, तदपि यत्किञ्चित् ? यो देवो भवति पूर्वोक्तश्रुतिसूत्रविरोधात् स शुद्ध एव भवति,

मनुष्यस्य सम्बोध्यत्वेऽपि मूलं चिन्त्यम् । मनुष्यः कथं गभस्तिभिः पूयते ॥ १ ॥

पुनर्देवो देवेभ्यो विद्वद्भयः कथं शुद्धः स्यात्? वाचकोपमालङ्काराश्रयणमपि निर्मूलमेव मधु॑मतीन॒ इष॑स्कृ॒षि॒ यत्ते॑ स॒मादा॑भ्य॒ नाम॒ जागृ॑ति॒ तस्मै॑ ते सोम॒ सोमा॑य॒ स्वाहा॑ स्वाहा॑र्व॒न्तरि॑क्ष॒मन्वे॑म ॥ २ ॥

W 1 तृतीयं गृह्णाति । लिङ्गोक्तदैवतम् । हे सोम, त्वं नोऽस्माकमिषोऽन्नानि पूर्वं गृहीतान् मधुमतीर्मधुररसोपेतानि षडंशून् प्रतिप्रस्थाता कृधि कुरु सोमे ' यत्त इत्यात्तान् सोमे निदधाति ' ( का ० श्र ० ९ ४ । २५ ) | पावनार्थं । यतो गृहीतास्तत्र प्रतिक्षेप इति निदध्यात् । सोमे लतासोम इति कर्कः । ऋजीषरूप इति प्राचीनसम्प्रदायः जागरणशीलं यन्नामास्ति सोमेति, हे युक्तम् । सौम्यम् । हे सोम, तव अदाभ्यमहिंस्यं दभ्नोतिहिंसार्थः, जागृवि निष्क्रमणम् ' ( का ० श्रौ ० सोम, तस्मै तन्नामवते तुभ्यं सोमाय स्वाहा सुहुतमस्तु । ' स्वाहेत्यक्षरद्वयमुक्त्वा कुर्यात् । उरु विस्तीर्ण-९ ।४।२ ९ ) । परिमृज्यानासाद्यैव स्वाहेति मन्त्रमुक्त्वा हविर्धानान्निष्क्रमणमध्वर्युर्ग्रहहस्तः मन्तरिक्षमन्वेभ्यनुगच्छामि । शतपथे विवृतोऽयं मन्त्रः - ' अथ द्वादशकृत्वोऽभिषुणोति । द्वादशाक्षरा वै जगती विधत्ते जागतं - तृतीयसवनं द्वादशकृत्व तृतीयसवनमेवैतत् क्रियते ' ( श ० ४। १ । १ । १२ ) । तृतीयग्रहणपर्याये प्रहार संख्याविशेषं इषस्कृधीति इति । अत्रापि पूर्ववत् संख्यासामान्यात्मकत्वेन तृतीयसवनात्मकत्वम् । स गृह्णाति । मधुमतीनं ' रसमेवास्मिन्नेतद्दधाति स्वदयत्येवैनमेतद्देवेभ्यस्तस्मादेषु हतो न पूयत्यथ यज्जुहोति नोऽस्माकमिषोऽन्नानि सस्थापयत्येवैनमेतत् मधुमती -( श ० ४।१।१।१३ ) । ग्रहमनूद्य मन्त्रं विनियुक्त - स गृह्णातीति । हे सोम, त्वं तदाह रसमेवास्मिन्नेतद्दधाति र्माधुर्योपेतानि कुर्वित्यर्थः । अर्थात् त्वमपि देवानामन्नात्मकः, स्वादुर्भवेति यावत् । हतोऽभिषुतो स्वदयत्येवैनमेतद् देवेभ्यस्तस्मादेष हतो न पूयति, एतन्मन्त्रवाक्यम् । तस्मात् स्वादूकरणाद् कर्म एतदु-न पूयति रसान्तरं नापद्यते । गृहीतस्य सोमरसस्य होमं विधत्ते - अथ यज्जुहोति । यत्रतत् होमाख्यं पांशुग्रहव्यापारं परिपूरयत्येव, अर्थाद् जुहुयादिति गम्यते । ' अष्टावष्टौ कृत्वो १ | १४ ) ब्रह्मवर्चसकामस्याभिषुणुयादित्या- | अभिषवे काम्यं संख्याविशेषं हुरष्टाक्षरा वै गायत्री ब्रह्म गायत्री ब्रह्मवर्चसी हैव भवति ' ( ० ४ | ३ | । ' स मुखतस्त्रिवृतं निरमिमीत विधत्ते – ब्रह्मवर्चसकामस्येति । सगुणब्रह्मणः प्रजापतेर्मुखादुत्पन्नत्वाद् ब्रह्म गायत्री भवति । चतुर्विंशतिर्वै तमग्निर्देवताऽन्वसृज्यत गायत्रीच्छन्द: ' ( तै ० सं ० 1 '1१ ) । ' तच्चतुर्विंशति कृत्वाऽभिषुतं मात्रा तावन्तमेवैतत् सस्था-संवत्सरस्यार्धमासाः संवत्सरः प्रजापतिः प्रजापतिर्यज्ञः स यावानेव यज्ञो यावत्यस्य है | मनुष्य को स्वामी दयानन्द द्वारा वर्णित अर्थं श्रुति तथा सूत्र के वचनों से विरुद्ध होने के कारण अग्राह्य के द्वारा कैसे शुद्ध सम्बोधित करने में भी प्रमाण अपेक्षित 1 जो देवता है, वह तो शुद्ध ही होता है । फिर देवता विद्वानों होगा? वाचकोपमा अलंकार का आश्रय लेना भी अप्रामाणिक है ॥ १ ॥

मन्त्राथ हे सोम! हमारे अन्न को मधुर

हे सोम! तुम्हारे निमित्त यह अंशुद्रव्य प्रदत्त है ।

अन्तरिक्ष में विचरण करता हूँ ॥ २ ॥

रसयुक्त सुस्वादु बनाओ । तुम हिंसाशून्य तथा जागरणशील बनो । देवता की प्रीति के लिये ये भली प्रकार आहूत हैं । मैं विस्तीर्ण - ' मधुमती ' इस कण्डिका के मन्त्रों से ग्रह - ग्रहण, छ: अंशुओं का सोम में पुनःस्थापन, निष्क्रमण आदि भाष्यसार -

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शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० ७ पयति ' ( श ० ४।१।१।१५ ) । यज्ञस्य यावती परम्परया सम्बन्धिनी मात्रा परिच्छेदिनी चतुर्विंशतिसंख्या, तद्योगाद् यज्ञस्तावतः सकलस्यैव यज्ञस्यैतत्परिपूरणमिति पर्यायत्रयगतैस्त्रिभिरभिषुताष्टकृत्वश्चतुर्विंशतिसंख्यानिष्पत्तेः । ‘ पञ्च पञ्चकृत्वः । पशुकामस्याभिषुणुयादित्याहुः पाङ्क्ताः पशवः पशूनेवावरुन्धे पञ्च वा ऋतवः संवत्सरस्य ' ' ' ' ' ( श ० ४ | १ | १ | १६ ) | ' तं गृहीत्वा परिमाष्ट । नेद्वयव रच्योतदिति तं न सादयति प्राणो ह्यस्यैष तस्मादयमसन्नः प्राणः सञ्चरति यदि त्वभिचरेदन सादयेदमुष्य त्वा प्राण १७ सादयामीति तथा ह तस्मिन्न पुनरस्ति यम्नानुसृजति तेनो अध्वर्युश्च यजमानश्च न्योग्जीवतः ' ( श ० ४। १ । १ । १७ ) | ग्रहणानन्तरकृत्यमाह तं गृहीत्वा परिमाष्टति । प्रयोजनमाह - अपरिमार्जने रसो विश्चोतेत नेत् ततो महद्भयम् । ' नेदिति परिभये निपातः ' ( निरु ० १ १० )! व्यवश्चोतदिति ' छन्दसि लुङ्लिङ्लट ' ( पा ० सू ० ३ | ४ | ६ ), ' लिङथें लेट् ' ( पा ० सू ० ३।४।७ ), ' श्च्युतिर क्षरणे ' इति धातो रूपम् । तं न सादयति । अस्य प्रजापत्यात्मकस्य ग्रहस्य एष रसः प्राणः । तस्मात् प्राणात्मक सोमरसानासादनाद् असन्नोऽन्तरे वा शीण लोकानां प्राणी बहिः सञ्चरति । अभिचरतो मन्त्रविशिष्टं सादनमाह - यदि त्वभिचरेदिति । ग्रहणमन्वेनं ग्रहमविसृजन् सादयन् हे सोम, अमुकनाम्नः शत्रोः प्राणरूपं त्वां विशीर्णमवसन्नं वा करोमीति मन्त्रार्थः । तादृक्सादनफलमाह - तथा ह तस्मिन्निति । तथा कृते तस्मिन् शत्रौ पुनः स प्राणो न तिष्ठति, किन्तु तत्रैव विशीर्यत्यवसीदति, यतः पात्रं न विसृजति । विसृजति चेदवसन्नः श्वासो निर्गच्छेदपि । तेन शत्रोरवसादनेनैव निरुपद्रवावध्वर्युयजमानौ चिरं जीवतः । ' अथो अप्येवैनं दध्यात् अमुष्य त्वा प्राणमपि दधामीति तथा ह तस्मिन्न पुनरस्ति यन्न सादयति तेनो प्राणान्न लोभयति ' ( श ० ४। १ । १ । १८ ) । सादितस्य पात्रस्य समन्त्रकं पिधानमाह-- अथो अप्येवैनं दध्यादिति । एनं ग्रहम् अमुष्येत्यादिमन्त्रेणापिदध्यात् । आच्छादने च तस्मिन् प्राणो न तिष्ठेत् । सादनापिधानयोरकरणे बाधक-माह - यन्न सादयतीति । तेन प्रागान्न लोभयति न विमोहयेद्वा नाकुलीकुर्यात् । ' स वा अन्तरेव सत्स्वाहेति करोति । देवा ह वै बिभयान कुर्यद्वै नः पुरैवास्य ग्रहस्य होमादसुरराक्षसानीमं ग्रहं न हन्युरिति तमन्तरेव सन्तः स्वाहाकारेणाजुहुवुस्त हुतमेव सन्तमग्नावजुहुवुस्तथो एवैनमेष एतदन्तरेव सन्त्स्वाहाकारेण जुहोति त हुतमेव सन्तमग्नौ जुहोति ' ( श ० १ | १ | १ | १ ९ ) । अभिचरता हि यत्तु प्राणा आकुली व र्तव्या इति विधत्ते - स वा अन्त-रेवेति । विधनमध्ये वर्तमान एव सन् ' स्वाहा ' इत्युच्चरेदित्यर्थः । तथोच्चारणस्य प्रयोजनमाह - देवा ह वै । होमात् पूर्वमसुर राक्षसकर्तृकं ग्रहस्य पिधानं परिहर्तुं हविर्धानमध्ये स्थितमेव सोमं स्वाहाकारमात्रेण हुत्वा पश्चाद् हुतमेव सन्तं ग्रहं ‘ स्वाङ्कृतोऽसि ' ( वा ० सं ० ७१३ ) इति मन्त्रेण जुहुवुः । अत इदानीमपि तथा कुर्यात् । ' अथो-पनिष्क्रामति ' ( श ० ४ | १ | १ | २० ) इति हविर्धानान्निष्क्रमणमाह । ' अथ वरं वृणीते । बलवद्ध वै देवा एतस्य ग्रहस्य होमं प्रेप्सन्ति ते अस्मा एतं वर १ समर्धयन्ति क्षिप्रे न इमं ग्रहं जुहवदिति तस्माद्वरं वृणीते ' ( श ० ४।१।१।२१ ) । वरवरणं विधत्ते - अथ वरं वृणीत इति । वरप्रार्थनाहेतुमाह - बलवद्ध वै देवा इति । एतस्योपांशुसोमरसस्य होमं देवा अत्यन्तमिच्छन्ति । इत्थमस्मै अध्वर्यवे तं यजमानार्थं वृतं वरं समृद्धं कुर्वन्ति । समर्धयतां देवानाम-यमाशयः - समृद्विमभिक्षयन् यजमानोऽध्वर्यवे वरं ददातु । दत्तवरश्चाध्वर्युस्तुष्टः सन्नस्माकमिममुपांशुग्रहम-सुरसमागमात् पूर्वमेव त्वरया जुहोत्विति । हुते सति सम्पूर्णो यज्ञो नः सम्पन्नः स्यादिति । यस्माद्देवकृतां समृद्धिमिच्छन् यजमानोऽवश्यं दास्यति, तस्मादध्वर्युर्वरं वृणीते । क्रियाएँ अनुष्ठित की जाती हैं । यह याज्ञिक विनियोग कात्यायन श्रौतसूत्र ( ९ ।४।२६ - ३० ) में प्रतिपादित है । शतपथ ब्राह्मण में याज्ञिक प्रक्रिया के अनुकूल मन्त्रार्थ उपदिष्ट है ।