वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ५ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 21–30
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ५ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 21–30
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( २० ) कि घोड़े की लीद से ही क्यों उखा को धूप अनुष्ठान क्यों करना चाहिये, इस तरह की आधार पर किया गया । औद्ग्रमण जैसे सात चितियां कौन - कौन सी होती हैं? वचनों को विस्तार से उद्धृत कर स्पष्ट प्रकार आठवें मन्त्र के भाष्य में शतपथ के प्रमाण से यह बताया गया है देनी चाहिये । याज्ञिक प्रक्रिया में अवट ( गड्ढा ) खनन जैसी विधियों का अनेक विधियों का समर्थन शतपथ में पुरावृत्त, अर्थात् पूर्वकालीन घटनाओं के नामों की व्युत्पत्तियाँ भी यहाँ बताई गई हैं । यज्ञ को पांत क्यों कहते हैं? इस तरह के विषयों को भी यहाँ शतपथ ब्राह्मण, तैत्तिरीय संहिता आदि के किया गया है ( पृ ० ९ ० ) । बारहवें अध्याय के प्रथम मन्त्र में उद्धृत ब्राह्मण में यह बताया गया है कि सुवर्ण का धारण नाभि के ऊपर के भाग में ही करना चाहिये । आज भी लोक में इस नियम का पालन किया जाता है । गार्हपत्य - चयन के प्रसंग में ( १२।४६ ) उल्ब संस्तव, पशुसंस्तव, निवपन, परिश्रयण आदि विषयों को शतपथ के अनेक वचनों की सहायता से समझाया गया है । एक स्थान पर पुरुष का परिमाण व्याममात्र, चार अरत्नि बताया गया है तथा अन्यत्र १२० अंगुल का । अनेक विषयों को आख्यायिकाओं के द्वारा निरूपित करने वाले शतपथ ब्राह्मण के वचन भी यहाँ ५८- ६२ मन्त्रों की व्याख्या में विस्तार से उद्धृत हैं । ११५ वें मन्त्र की व्याख्या में उद्धृत ब्राह्मण में ऋक्शाखा के अध्येताओं के मत की समालोचना कर अपने सिद्धान्त की स्थापना की गई है । यहाँ यह भी बताया गया है कि कुछ कर्मों में मन्त्रों का उच्चारण ३ उपांशु रूप में क्यों करना चाहिये । अग्निग्रहण, सत्यसामगान, पुष्करवर्णोपधान आदि विधियों का शतपथ में संग्रह और विस्तार से वर्णन किया गया है । १३ वें अध्याय के पहले ही मन्त्र में भाष्यकार ने शतपथ के प्रमाण से बताया है कि अग्नि के ग्रहण से अध्वर्यु अग्नि के समान हो जाता है । इसी कारण से अध्वर्यु के द्वारा उत्पादित चित्याग्नि भी साक्षात् अग्निरूप हो जाती है । यहाँ अग्निग्रहण की गर्भाधान से और चयन की प्रसव से तुलना की गई है । दूसरे मन्त्र के भाप में पुष्करण जाने की आकाश से और हक्म की सूर्यमण्डल से तुलना है । इसी प्रकार चतुर्थ मन्त्र के भाष्य में रुक्म के मध्य में स्थापित किये १. अपने दोनों हाथों को पूरी तरह से दोनों तरफ फैला देने के बाद जितनी लम्बाई होती है, उसका नाम व्याम है | देखिये अमरकोश- ~~ “ ध्यामो बाह्वोः सकरयोस्ततयोस्तिर्यगन्तरम् ( २।६।८७ ) । व्याममात्र ही पुरुष की लम्बाई होती है । यह लम्बाई चार अरत्निप्रमाण होती है, जो कि ९ ६ अंगुल के बराबर होती है । घेरण्डसंहिता में भी यहीं कहा गया है – “ षण्णवत्यङ्गुलीमानं शरीरं कर्मरूपकम् " ( ५१८१ ) | भाष्यकार ने व्याम शब्द की व्युत्पत्ति भिन्न प्रकार से । की है - " व्यायम्यतेऽस्मिन् बाहुद्वयमिति व्युत्पत्त्या व्यायाम इति शब्दो निष्पद्यते स एवात्र वर्णलोपेन व्याम इत्युच्यते स च तिर्यक्प्रसारिती बाहू यावत्परिमाणौ भवतस्तस्य परिमाणविशेषस्य संज्ञा । चतुररलियम इति प्रसिद्धम् " ( पु ० १८४ ) | अमरकोश की टीका में इससे भिन्न तीन व्युत्पत्तियां दी गई हैं । उन्हें वहीं देखना चाहिये । २. विशत्यधिकशताङ्गुलिपरिमितः पुरुषः, तस्य दशमोंऽशः पादः, स प्रमाणं यासां ताः पादमाच्यः । तदुक्तं कात्यायनेन -“ पञ्चरत्नि देश वितस्तिविंशतिशताङ्गुलः पुरुषो द्वादशाङ्गुलं पदम् " ( का ० शु ० ८२ ) ( पृ ० १ ९ ० ) | अमरकोश में--" ऊर्ध्वं विस्तृतदोः पाणिनृमाने पौरुषं त्रिषु " ( २२६।८७ ) इस प्रकार इसका लक्षण बताया है । ३. शास्त्रों में जप के वाचिक ( भाष्य ), उपांशु और मानस नामक तीन प्रकार बताये गये हैं । वाचिक जप में मन्त्रों का उच्चारण दूसरों को भी सुस्पष्ट सुनाई पड़ता है । उपांशु जप चुपचाप किया जाता है । यह दूसरों को नहीं सुनाई पड़ता । मानस जप भावनात्मक होता है । इसमें शारीरिक अवयवों का कोई योगदान नहीं रहता । तन्त्रशास्त्र के अतिरिक्त मनुस्मृति ( २८५ ) में भी इनका वर्णन है । वहाँ बताया गया है कि विधि यज्ञ से जप यज्ञ ( वाचिक ) दस गुना श्रेष्ठ है । उपांशु जप सौ गुना और मानस जप हजार गुना श्रेष्ठ माना जाता है ।
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( २१ ) वाले हिरण्मय पुरुष को हिरण्यगर्भ से अभिन्न माना है । अष्टम मन्त्र के भाष्य में यज्ञ और नमस्कार की करने समान वाले महिमा मन्त्रों गाई गई है | नवें मन्त्र की व्याख्या के प्रसंग में बताया गया है कि प्रतिसर शब्द यहाँ राक्षसों का नाश के लिये प्रयुक्त हुआ है । यहाँ शतपथ के प्रमाण से इसकी विस्तृत व्याख्या की गई है । आगे के भाष्य में उदुम्बर आदि वृक्षों की उत्पत्ति को आख्यायिकाओं के सहारे समझाया गया है । स्वयमातृष्णा, द्वियजुः, रेतः सिक्, विश्वज्योति, ऋतव्या, ढा नामक इष्टकाओं का स्वरूप भी यहाँ विस्तार से वर्णित है । वचन में सात शीर्षण्य इसी तरह से २७-३१ मन्त्रों के भाष्य में कूर्मोपधान की प्रक्रिया भी शतपथ के आधार पर हो विस्तार से बताई गई है । आगे के मन्त्रों के भाष्य में उदुम्बर, उलूखल, मुसल, उखा आदि शब्दों को प्रवृत्ति के निमित्तों की व्याख्या प्रस्तुत कर इनके उपधान की विधि विस्तार से प्रदर्शित है । ३८ वें मन्त्र में उद्धृत शतपथ के दो नासिका के छिद्रों को प्राणों की चर्चा आई है । भाष्यकार ने यहाँ बताया है कि एक वाणी, दो नेत्र, दो श्रोत्र और वहाँ सात मिला कर शीर्षण्य प्राणों की संख्या सात होती है । इसी तरह से ५४ वें मन्त्र में दस प्राणों की चर्चा आती है । शीर्षण्य प्राणों के अतिरिक्त पायु, उपस्थ और नाभि की गिनती की गई है । ४१-४५ मन्त्रों के भाष्य में पाँच पशुओं के शिरों के उपधान की प्रक्रिया समझाई गई है । शाक्त तन्त्रों में पंचमुण्डी आसन पर देवमूर्ति की स्थापना और आराधना afra है । इस याज्ञिक प्रक्रिया से पंचमुण्डी आसन की प्रक्रिया का विश्लेषण किया जाना चाहिये । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्रों में पाँच पशुशीर्षों के समान ही पाँच प्राणभृत्संज्ञक इष्टकाओं की उपधान विधि भी शतपथ ब्राह्मण के प्रमाण से ही वर्णित है । , वैश्वदेवी, प्राणभृत्, चतुर्दश अध्याय में द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ चितियों के प्रसंग में आश्विनी, ऋतव्या अपस्या, वयस्या, छन्दस्या, दिश्या आदि इष्टकाओं के उपधान की विधियों का तो विस्तार से वर्णन किया हो गया है, साथ ही अनेक विशिष्ट शब्दों की व्याख्या भी यहाँ की गई है । सात वालखिल्या इष्टकाओं की व्याख्या का प्रसंग भी प्राणों अभिन्नता विशेष रूप से अवलोकनीय है ( पृ ० ३७६- ३७७ ) । यहाँ वालखिल्या पद की व्युत्पत्ति बता कर इनकी प्रदर्शित की है । यहाँ सात प्राणों की एक भिन्न ही व्याख्या की गई है कि दो कोहनियों के ऊपर के और दो नीचे के अंगों के साथ शिर, ग्रीवा और नाभि - शरीर के ऊर्ध्व भाग के ये सात अंग ही सात प्राण हैं । इसी तरह से दो घुटनों के ऊपर के और दो नीचे के अंगों के साथ दो पैर और नाभि का अधोभाग-- शरीर के अधोभाग के ये सात अंग भी प्राण शब्द से ही कहे गये हैं ( पृ ० ३७७ ) । शतपथ ब्राह्मण में इनको पुरस्तात्प्राण और पश्चात्प्राण कहा गया है । चतुर्थं चिति के उपधान के प्रसंग में यहाँ संवत्सर रूप कालपुरुष का और तप, अभीवर्त, वर्चस्, संभरण, योनि, गर्भ, ओजस्, ऋतु प्रतिष्ठा, ब्रध्नस्यविष्टप, नाक, विवर्त और धर्त्र नामक विशेषणों से विशिष्ट नवदश, सविंश, द्वाविंश, त्रयोविंश, चतुर्विंश, पंचविंश, त्रिणव, एकत्रिंश, त्रयस्त्रिंश, चतुस्त्रिश, षट्त्रिंश, अष्टाचत्वारिश और चतुष्टोम नामक तेरह स्तोमों की विशेष रूप से व्याख्या की गई है ( पृ ० ३८५ ) । इसी तरह से स्पृत नामक ( पृ ० ३८८-३८९ ) और सृष्टिसंज्ञक ( पृ ० ३ ९ ३ - ३ ९ ४ ) इष्टकाओं के उपधान का प्रकार भी उसी पद्धति से वर्णित है । पन्द्रहवें अध्याय प्रथमतः पाँचवीं चिति में आधेय पांच असपत्ना नाम की इष्टकाओं के साथ छन्दस्या इष्टकाओं का स्वरूप विस्तार से बताया गया है । स्तोमभाग इष्टकाओं के उपधान के प्रसंग में स्तोमभाग शब्द का अर्थ बताते हुए इससे सम्बद्ध मन्त्रों की तीन प्रकार से व्याख्या की गई है । यहाँ त्रिविध जंगम और त्रिविध स्थावर अन्नों की भी व्याख्या की गयी है कि पिता, माता और पुत्र – ये जंगम अन्न हैं और तप, वृष्टि और बीज स्थावर अन्न । इसी तरह से नाकत और पंचचूडा ( पृ ० ४१ ९ ) इष्टकाओं की उपधानविधि भी शतपथ ब्राह्मण के सहारे ही समझाई गई है ।
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( २२ ) मन्त्रों का आध्यात्मिक अर्थ प्रस्तुत भाष्य में प्रत्येक मन्त्र का आध्यात्मिक अर्थ भी बताया गया है, इस बात का उल्लेख हम पहले कर चुके हैं । मन्त्रगत पदों से, विभक्तियों और वचनों से स्वाभाविक रूप से सूचित होने वाले परमात्मा के सामान्य और विशेष विभिन्न रूपों को स्मरण किया गया है । इनमें सविता, मित्र, सूर्य, अग्नि, जल, वायु, हिरण्यगर्भ, विष्णु, शिव, सोम ( साम्ब सदाशिव ), पशुपति, रुद्र, कालरुद्र, प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परमात्मा, भोक्ता जीव, प्रत्यगात्मा, जीवेश्वर, अदिति, श्रुति, पृथिवी, चिद्रपा परा देवता, मृत्यु, निर्ऋति, औषधि, महामाया, ब्रह्मविद्या आदि के साथ ही सीताराम, राधाकृष्ण, रुक्मिणीकृष्ण, बलरामकृष्ण, श्रीकृष्ण, श्रीराम, रामलक्ष्मण, राजा रामचन्द्र परमात्मा राम, पार्वती, परमेश्वर, गौरीशंकर, लक्ष्मीनारायण, नृसिंह, सीता, जनकनन्दिनी, राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी आदि प्रमुख हैं । कहीं - कहीं मनुष्य जिज्ञासा वृत्ति को, अपने इष्टदेव को, उपासक ( साधक ) को, भोक्ता जीव को, अपनी बुद्धि को और इन्द्रियों को भी संबोधित किया गया है । आध्यात्मिक अर्थ में धीर मनुष्य के हृदयाकाश में स्थित ब्रह्म को स्मरण किया जाय, यह तो अति-स्वाभाविक है । एक मन्त्र में चक्रवर्ती राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ से उत्पन्न हुए चारों पुत्रों और कौशल्या आदि इनकी माताओं का उल्लेख है । अन्यत्र अन्नमय आदि कोशों में स्थित पुरुष को संबोधित किया गया है । एक मन्त्र में बताया गया है कि अन्य देवताओं की आराधना में बड़ा कष्ट उठाना पड़ता है, भगवान् तो इतने करुणामय हैं कि गजेन्द्र के आह्वान पर वे अपने शीघ्रगामी गरुड़ को भी छोड़कर स्वयं दौड़ पड़ते हैं । अन्यत्र बताया गया है कि भगवान् के सभी रूप वेदान्त की दृष्टि से बौद्ध हैं, अर्थात् कल्पनामात्र सार हैं । निर्गुण, निराकार और सगुण साकार ये दोनों भगवान् के रूप हैं | अयोध्या, वृन्दावन आदि धामों में भगवान् का साकार स्वरूप ही विराजमान है । ११ वें अध्याय के ६१ वें मन्त्र का आध्यात्मिक अर्थ विशेष रूप से देखने लायक है | यहाँ ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इस श्रुति के सहारे और दुर्गासप्तशती के प्रमाण से मन्त्र की व्याख्या की गई है । योगसूत्र को भी यहाँ उद्धृत किया गया है | आध्यात्मिक अर्थ के प्रसंग में अन्यत्र भी अनेक शास्त्रों के वचन उद्धृत किये गये हैं; यह बात हम प्रारम्भ में ही बता चुके हैं । यहाँ यह भी प्रार्थना की गई है कि हमारी चित्तवृत्ति ब्रह्माकार में परिणत हो जाय । ज्ञानाग्नि इस सारे संसार को अपना ग्रास ( कौर ) बना ले । इसी अध्याय के ५०-७१ संख्या के मन्त्रों में ज्ञानाग्नि का वर्णन विशेष रूप से मिलता । एक मन्त्र की व्याख्या में बताया गया है कि भगवान् विश्वनाथ अथवा विष्णु को भक्त श्रद्धापूर्वक छप्पन भोग समर्पित करते हैं । इस प्रकार यहाँ भगवान् के व्यावहारिक और पारमार्थिक दोनों ही रूपों की चर्चा हुई है । १२ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में बताया गया है कि भक्तों के द्वारा आराधित परमेश्वर ब्रह्मात्मबोध रूप सुवर्ण की वर्षा करता है । अगले मन्त्र में माया, परमात्मा और ब्रह्मज्ञान रूप शिशु की चर्चा की गई है । अगले एक मन्त्र में राम रूप अग्नि और ई चिद्रूपिणी कामकला की स्तुति है । एक ही भगवान् के इन्द्र, वरुण, यम आदि अनेक रूप हैं, ऐसा बताते हुए यहाँ एक मन्त्र में कहा गया है कि माया, राग और कर्ममय तीन बन्धनों से व्यक्ति छुटकारा तभी पाता है, जब वह उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की उपासना करता है । ' हंसः शुचिषद् ' मन्त्र के भाग्य में बताया गया है कि इस मन्त्र की व्याख्या काठकोपनिषद् के भाष्य ( ५१२ ) में भगवत्पाद शंकराचार्य ने स्वयं की है । ' दिवस्परि ' मन्त्र की व्याख्या में ज्ञानाग्नि की तीन अवस्थाओं का निरूपण है और आगे के अनेक मन्त्रों में इस ज्ञानाग्नि की ही चर्चा है । एक मन्त्र ( १२१४५ ) में दिखाया गया है कि जप, ध्यान आदि के सहारे ही व्यक्ति भौम, आन्तरिक्ष और दिव्य, अर्थात् भूमि, अन्तरिक्ष और स्वर्ग की तरफ से आने वाले विघ्नों को दूर कर सकता है । परमेश्वर सम्यक् ज्ञान प्रदान कर ब्रह्मविद् साधकों की सहायता करता है । आगे बताया गया है कि वेदान्तियों के मत से साभासा बुद्धि ही बन्ध और मोक्ष दोनों का कारण बनती है । अन्यत्र ( १२/६४ ) अविद्या, काम और कर्म को बन्ध का हेतु बताया गया है । आगे के मन्त्र में कहा गया है कि अविद्या और विद्या शक्तियाँ ही बन्ध और मोक्ष का कारण हैं । ६ ९ वें मन्त्र के भाष्य में बताया गया है ।
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( २३ ) व्यक्ति के लिये कि परिष्कृत बुद्धिरूप भूमि में ही गुरु के उपदेश रूपी बीज बोये जा सकते हैं । ज्योति पद से अपर के ब्रह्म अतिरिक्त और कल्पित परब्रह्म दोनों का ही ग्रहण किया गया है । एक ( १२/७५ ) मन्त्र में बताया गया है कि अधिष्ठान सत्ता सत्ता को वेदान्त स्वीकार नहीं करता, अतः यह सारा संसार ब्रह्म का ही विवर्त है । चिति शक्ति कुण्डलिनी के की भी यहाँ ( १२।८३-८५ ) चर्चा आई है । एक अन्य मन्त्र ( १२ / ९ ५ ) में बताया गया है कि शान्त स्वभाव मन्त्रों में यहाँ कोई भी परेशानी नहीं बच पाती । सारा संसार ही उसके लिये नन्दन वन के समान हो जाता है । अगले विरति की प्रशंसा की गई है 1 । भक्ति को भी यहाँ ( १२ । १०५ ) ब्रह्मसाक्षात्कार का कारण माना गया है । भगवान् राम के देवताओं और ऋषियों के लिये यहाँ कहा गया है कि काक, गृध्र, वानर, भालू, निषाद, कोल, भील, किरात आदि के साथ मनोरथों को भी वे पूरा करते हैं ( १२1१०७ ) । में अग्नि आदि १३ वें अध्याय के तीसरे मन्त्र में सत्यज्ञानादिलक्षण ब्रह्म की व्याख्या की गई है । इस अध्याय है । शब्दों के प्रतिनिधि के रूप में श्रीराम का वर्णन अतिविस्तार से अनेक घटनाओं को प्रस्तुत करते हुए किया गया साधक, भक्तजन आदि बुद्धि, माया, प्रकृति, विराट् पुरुष, कालात्मक भगवान्, भगवती राजराजेश्वरी, ब्रह्मचिन्तनपरायण, सर्वान्तर्यामी का उल्लेख करते हुए यहाँ वेदान्तप्रतिपाद्य ब्रह्म का स्वरूप स्पष्ट किया गया है । हिरण्यश्मश्रु, हिरण्यकेश का तो यहाँ निरूपण है ही, राम के कार्य की सिद्धि के लिये समुद्र को भी यहाँ सम्बोधित है । बृहदारण्यक प्रतिपादित ब्रह्म के रूप में लाँघने वाले हनूमान् के प्रति देवताओं की शुभकामना भी यहाँ अभिव्यक्त की गई है । अग्नि की गया ब्रह्माग्नि है । परमेश्वर की व्याख्या तो अनेक स्थानों पर की ही गई हैं, कहीं कहीं इस शब्द से हनूमान् को भी सम्बोधित किया सर्वात्मकता का प्रतिपादन भी अनेक स्थानों पर हुआ है । इस १४ वें अध्याय में सर्वप्रथम जीव की ब्रह्मात्मज्ञाननिष्ठा को संबोधित किया गया है । चौथे मन्त्र के भाष्य में विषय को विशेष रूप से समझाया गया है । जल के जैसे हिम, कल्लोल आदि विविध रूप हैं, उसी तरह से चितिरूपा भगवती ही संसार में नाना नाम - रूपों में भासित होती है । भगवद्भजन में लगे हुए साधक के सभी सहायक हो जाते हैं । कालशक्ति, प्रत्यगभिन्न ब्रह्मचिति और चिद्रूपा भगवती को भी यहाँ संबोधित किया गया है । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्रों में परमात्मा को प्रजापति के रूप में स्मरण किया गया है । १५ वें अध्याय में अग्नि के रूप में परमेश्वर की और नाना रूपों में भगवती राजराजेश्वरी की स्तुति की गई है । यही परमा चिति है, परदेवता है, चिदानन्दस्वरूपा है । इसके प्रसाद से प्राप्त ज्ञानाग्नि साधनचतुष्टयसम्पन्न अधिकारियों को श्रवण, मनन, निदिध्यासन द्वारा परम पद को प्राप्त कराती है । उद्गाता, होता आदि भक्तजन इसी की स्तुति करते हैं । अग्निस्वरूप परमेश्वर राम, कृष्ण आदि के रूप में प्रकट होते हैं । ३२ वीं संख्या के मन्त्र में भक्तों को विशेष रूप से संबोधित किया गया है । आगे बताया गया है कि तप प्रभाव चित्त को एकाग्र कर वसिष्ठ आदि ऋषिगण ब्रह्मात्मक परमानन्द की अनुभूति करते हैं । भगवान् अग्निस्वरूप परमात्मा ही हमें वेदवाणी का अभिप्राय समझाने में समर्थ होते हैं । भगवान् राम के दिव्य धाम अयोध्या का अथर्ववेद में उल्लेख है । ५३ वें मन्त्र में भाष्यकार आचार्य नरहरि के मत को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि इस सिद्धान्त का प्रतिपादन मधुसूदन सरस्वती के भक्तिरसायन नामक ग्रन्थ में किया गया है और इसकी भूमिका में हमने इस सिद्धान्त को सुपुष्ट प्रमाणों के आधार पर स्थापित किया है । स्वामी दयानन्द के भाष्य की समालोचना पारिजातकार ने स्वामी दयानन्द के भाष्य का यहाँ तिलशः खण्डन किया है । स्वामी दयानन्द के भाष्य के अनुसार संहिता के मन्त्रों में परस्पर कोई अनुस्यूति नहीं है । कभी वे मनुष्य को संबोधित करते हैं, कभी पति - पत्नी को, कभी राजा और सेनापति को तो कहीं किसी योगी, विद्वान् अथवा वीर योद्धा को । २४, ३६ और ४८ वर्ष की उम्र तक
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( २४ ) ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले त्रिविध ब्रह्मचारियों का ये वसु, रुद्र और आदित्य शब्दों से ग्रहण करते हैं । अध्यापक, वैद्य, सन्तति, स्त्री - पुरुष, विदुषी अध्यापिका, विदुषी कन्या, ब्रह्मचारिणी कुमारी, ब्रह्मचारी कुमार, कुमार, कुमारी, गृहस्थ, सभापति, यजमान, पुरोहित, राजप्रजाजन, उपदेशक, परीक्षक आदि को ये मनमाने तरीके से संबोधित करते रहते हैं । कहीं ये बिजली के उत्पादन की बात करते हैं, तो अन्यत्र शिल्पविद्या, भूगर्भविद्या, अग्निविद्या, योगविद्या आदि की । इतना ही नहीं, बिना प्रसंग के ही ये नीतिशास्त्र और धर्मशास्त्र को भी घसीट ले आते हैं, योगियों की और नाडियों की चर्चा करने लगते हैं । अनेक मन्त्रों में वे पति - पत्नी के अत्यन्त लौकिक संवाद को सुनाने लगते हैं । भाष्यकार ने देवताधिकरण की व्याख्या के प्रसंग में भूमिका में विस्तार से मनुष्यों से भिन्न देवयोनिविशेष की स्थापना की है, किन्तु स्वामी दयानन्द ने अग्नि, इन्द्र आदि शब्दों की सब जगह मनुष्यपरक व्याख्या की है । ' विचित्र बात यह है कि इन शब्दों का भी कोई एक अर्थ नहीं किया है । गन्धर्व आदि देवयोनियों का तो इन्होंने पूरी तरह से अपलाप कर दिया है और as ओषधियों की प्रार्थना में मन्त्र का विनियोग बताया है । गौण अर्थ का सहारा तो इन्होंने प्रायः प्रत्येक मन्त्र की व्याख्या में लिया है । अनेक स्थलों पर इनकी अपनी हिन्दी और संस्कृत व्याख्या और भावार्थ में भी अन्तर देखने को मिलता है, भावार्थं का मूल अर्थ से कोई दूर का भी सम्बन्ध नजर नहीं आता । ये सायण, महीधर आदि के भाष्यों का खण्डन करने का प्रयत्न करते हैं, विशेष रूप से यह दिखाना चाहते हैं कि उनके द्वारा प्रस्तुत व्याकरण शास्त्र सम्बन्धी व्युत्पत्तियाँ ठीक नहीं हैं । रथन्तर साम, बृहत्साम आदि वैदिक पारिभाषिक शब्दों की व्याख्यायें हमें ताण्ड्य महाब्राह्मण जैसे ग्रन्थों में मिलती हैं । इन श्रुतिसूत्रशास्त्रसम्मत अर्थों का परित्याग कर स्वामी दयानन्द ने मनमाना अर्थ किया है । ऐसे सभी स्थलों पर स्वामी करपात्रीजी महाराज ने सही अर्थों को प्रदर्शित कर बताया है कि इन मन्त्रों की सही व्याख्या का ज्ञान हमें शतपथ ब्राह्मण, कात्यायन श्रौतसूत्र आदि की सहायता से ही हो सकता है तथा हरिस्वामी, उब्वट, सायण, महीधर आदि आचार्यों ने अपने - अपने भाष्यों में तदनुसार ही अर्थ किया है । प्रस्तुत भाष्य में बताया गया है कि स्वामी दयानन्द ने स्थान - स्थान पर जिस विद्युत् विज्ञान की चर्चा की है, वहाँ किसी विधि का खुलासा नहीं किया गया है कि उखा सम्भरण से किस तरह से बिजली पैदा होगी । जहाँ शिल्पविद्या का सूचक कोई पद नहीं है, वहाँ भी इस विद्या को खोज निकाला गया है । राजा, सेना, सेनापति आदि की चर्चा भी इसी प्रकार पूरी तरह से अप्रासंगिक लगती है । मीमांसा शास्त्र में बताया गया है कि विधि अज्ञात अर्थ का ज्ञापन करती है । ऐसे प्रसंगों में स्वामी दयानन्द ने सर्वत्र रागप्राप्त गृहनिर्माण, वस्त्रधारण जैसी अत्यन्त लौकिक बातों का उल्लेख किया है, जिनकी कि अज्ञातज्ञापकता किसी भी प्रकार से सिद्ध नहीं की जा सकती । आश्चर्य यह है कि यज्ञ की अदृष्टार्थता को भी इन्होंने अस्वीकार कर दिया है । स्वामी दयानन्द ने सविता, वायु, अग्नि आदि देववाचक पदों की ही नहीं; असुर, राक्षस, अज आदि विभिन्न योनियों और पशुओं के वाचक शब्दों की भी मनुष्यपरक ही व्याख्या की है । यम और यमी का अर्थ न्यायकर्ता न्यायाधीश किया है | भारतीय संस्कृति की लम्बी परम्परा को अस्वीकार कर देने के सिवाय इसका क्या प्रयोजन हो सकता है । ' गायत्री ' जैसे पवित्र शब्द की भी इन्होंने अनोखी व्याख्या की है । ' घोरे ' शब्द को ये पत्नी का संबोधन बताते हैं । ' द्विषः ' शब्द का अर्थ शत्रु होता है, पर यहाँ इसका अर्थ ' व्यभिचारिणी स्त्री ' किया गया है । ' स्वाहा ' शब्द का अर्थ सत्य किया है । इसी तरह से ' उद्वाप ' का अर्थ गर्भधारण और प्राणपोषिका बुद्धि का अर्थ आसुरी माया बताया है । इनके मत से प्राणरूप वायु मिल कर सूर्य को उत्पन्न करती है, यज्ञ का प्रयोजन वायु की शुद्धि है । पारिजातकार ने इन्हीं सब प्रसंगों को देखकर यह निष्कर्ष निकाला है कि स्वामी दयानन्द ने वेद की इस प्रकार की व्याख्या के बहाने लोकायतिक
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( चार्वाक ) दर्शन का ही प्रसार किया है । Fat fare को आज नकारा जा रहा है । ( ३५ ) इसी का यह प्रभाव है कि पुनरुत्थान के नाम पर भारतीय संस्कृति की वैदिक परम्परा के अनुसार वेदों में व्यक्तिविशेष का आख्यान वर्णित है, इस बात को नहीं माना जाता । सनातनी दृष्टि में यह एक अपसिद्धान्त है, क्योंकि इस तरह से तो वेद भी इतिहास के ग्रन्थ हो जायेंगे । इस विषय को पारिजातकार ने अपने भूमिका भाग में विशेष रूप से स्थापित किया है और प्रस्तुत भाष्य में भी प्रसंगवश अनेक स्थानों पर दयानन्दीय व्याख्या की समालोचना करते समय इस ओर इंगित किया है । स्वामी करपात्री जी महाराज ने स्वामी दयानन्द के भाष्य में निर्मूलाध्याहार, निर्मूल व्यत्यय, गौणार्थाश्रयण, श्रुतिसूत्रविरोध, अर्थाप्रसिद्धि, मन्त्रबाह्य पदव्याख्यान, अज्ञातज्ञापकता का अभाव, निघण्टु विरोध आदि दोषों की उद्भावना की है । इनके व्याख्यान को कल्पनामात्र प्रसूत, कपोलकल्पित, व्याख्यानाभास, अनर्गल और उपहासास्पद बताया है और कहा है कि यह सारा द्रविड़ प्राणायाम केवल मूर्ख जनों की प्रतारणा के लिये है । भास्करराय ने ऐसे प्रसंगों के लिये शिष्यदन्धन शब्द का प्रयोग किया है । स्वामी दयानन्द के भाष्य में शब्दों की अनर्गल व्युत्पत्तियों को देखकर पारिजातकार को किसी वैयाकरण की व्याघ्र शब्द की व्युत्पत्ति याद आ जाती है । ' जो विशेष रूप से सूंघता है ' इस व्युत्पत्ति के आधार पर व्याघ्र की खोज में निकला वैयाकरण जैसे उसका भोजन बन जाता है, उसी तरह से स्वामी दयानन्द की ये व्युत्पत्तियाँ कभी - कभी बड़ी अनर्थकारी हो जाती हैं । व्याकरणगत व्युत्पत्तियों को लेकर स्वामी दयानन्द ने अनेक स्थलों पर सायण, महीधर आदि आचार्यों पर वृथा आक्षेप किये हैं । ऐसे सभी स्थलों पर हमारे भाष्यकार ने प्राचीन आचार्यों की व्युत्पत्ति को युक्तियुक्त और व्याकरण-सम्मत बताया है और उन पर किये गये आक्षेपों का तिलशः खण्डन कर दिया है । ११ वें अध्याय में ऐसे प्रसंग अनेक स्थलों पर देखे जा सकते हैं । पृ ० १० और २७-२८ पर सायणाचार्य पर किये गये आक्षेपों का अत्यन्त प्रौढ़ युक्तियों के सहारे परिहार किया गया है । पृ ० ३५-३६, ४६, ५३-५४ पर दिये गये परिहार भी विशेष रूप से अवलोकनीय हैं । पृ ० ५४ पर भाष्यकार ने ' कणेहत्य ' शब्द का प्रयोग किया है । इस शब्द का प्रयोग वे तब करते हैं, जबकि किसी बात का उन्होंने बहुत विस्तार न किया हो । वे कहते हैं कि इस समाधान से यदि आप पूरी तरह से सन्तुष्ट नहीं हुए हैं, तो अमुक स्थान पर इस विषय का विस्तार देखिये । इसी प्रकार के प्रसंग अगले अध्यायों में भी ( पृ ० १११-११३, १२६, १७६, २०४, २१६, २२३, २६६ ) मिलते हैं । व्याकरण के परिनिष्ठित विद्वानों के लिये ये प्रसंग विशेष रूप से अवलोकनीय हैं । इन सामान्य बातों के अतिरिक्त हम पाठकों का ध्यान ११-१५ अध्यायों के दयानन्दनीय भाष्य की वेदार्थ-पारिजातकार द्वारा दिखाई गई विशेष त्रुटियों की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं । ११ वें अध्याय के पहले ही मन्त्र में भूगर्भ विद्या की और दूसरे मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार की बिना प्रसंग के चर्चा की गई है । २ ९ वें मन्त्र की व्याख्या में स्वामी दयानन्द ने योनि शब्द का अर्थ संयोग और विभाग को जानने वाला किया है तथा समुद्र में स्थित पदार्थों की जानकारी से इसे जोड़ा है । बिजली के संयोग और विभाग को जानने वाला समुद्र में स्थित पदार्थों को कैसे जान लेगा, इसकी प्रकिया वहाँ नहीं बताई गई । वस्तुतः दयानन्द वेद को धर्म ग्रन्थ न मानकर कहीं उसमें से अर्थशास्त्र निकालते हैं, कहीं कलाकौशल की चर्चा करते हैं । वायुयान, जलयान, भूगर्भशास्त्र, सामुद्रिक विज्ञान, इन सारे आधुनिक विज्ञानों की चर्चा इनके भाष्य में कर दी गई है, किन्तु केवल शब्दों को तोड़ - मरोड़ कर कोई अर्थ निकाल देने मात्र से तो ये सब वैज्ञानिक प्रयोग सिद्ध होने से रहे । इसी तरह से ४१ वें मन्त्र में ' व्यवहार ' का अर्थ ' हिंसनीय व्यवहार ' किया है, किन्तु इसमें कोई प्रमाण नहीं दिया । देह आदि की विशेष चेष्टाओं का ही तो नाम व्यवहार है । ये तो हिंसनीय और अहिंसनीय दोनों ही प्रकार के हो
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( २६ ) सकते हैं । फिर उनको हिंसनीय व्यवहार में ही सीमित कर देने के लिये कोई कारण चाहिये । इस कारण को यहाँ नहीं दिखाया गया है । ६१ वें मन्त्र की व्याख्या में अवट का अर्थ शिशु, उखा का कन्या और अदिति का अर्थ अध्यापिका किया है । वास्तव में अवट का अर्थं गर्त ( गड्ढा ), उखा का यज्ञीय पात्रविशेष और अदिति का अर्थं देवमाता है । दयानन्दीय अर्थों का खण्डन करते समय जैसे हमारे भाष्यकार ने वाल्मीकि रामायण और शतपथ ब्राह्मण आदि का प्रमाण दिया है, वैसा कोई प्रमाण स्वामी दयानन्द ने अपने अर्थों का समर्थन करने के लिये प्रस्तुत नहीं किया है । शाब्द नय में मनमानी नहीं चल सकती । शतपथ ब्राह्मण में इस मन्त्र के अनेक पदों का अर्थ स्वयं ही प्रदर्शित कर दिया गया | बिना प्रमाण के इन परम्परा प्राप्त अर्थों को छोड़ देने से अराजकता ही फैल सकती है । ७३ वें मन्त्र में ' दारूणि ' पद प्रथमा विभक्ति के बहुवचन का रूप है । स्वामी दयानन्द ने इसको बदल कर ' दारुणि ' कर दिया है, जो कि सप्तमी विभक्ति के एकवचन का रूप है । वेद को अनुभव कहा जाता है, अर्थात् इसको किताब से पढ़ा नहीं जाता, किन्तु गुरुमुख से सुना जाता है । गुरु जिस पद का जैसा उच्चारण करता है, उसी तरह का उच्चारण शिष्य भी करता है । इस छापाखाने के युग में भी वेद की यह परम्परा सुरक्षित है । परम्परा प्राप्त पाठ को बदलना एक प्रकार की उच्छृङ्खलता ही तो है । इसी तरह से ८० वें मन्त्र में पठित ' मस्मसा ' पद को बदल कर स्वामी दयानन्द ने ' भस्मसा ' कर दिया है । ८१ वें मन्त्र के भाष्य में वे ब्रह्मकुल और क्षत्रकुल की चर्चा करते हैं, किन्तु उनकी यह व्याख्या वर्ण - व्यवस्था के सिद्धान्त को न मानने के कारण उनके सिद्धान्त के विपरीत पड़ती है । इसी तरह से स्वामी दयानन्द श्राद्ध आदि का भी निषेध करते हैं, किन्तु ८२ वें मन्त्र की व्याख्या में जो कुछ उन्होंने कहा है, वह उनके इस सिद्धान्त के विपरीत जाता है । ८२ मन्त्र में रोग निवारण के लिये वैद्यों और वैज्ञानिकों से प्रार्थना की गई है । वैद्य और वैज्ञानिक तो पैसा लेकर काम करते हैं, खाली प्रार्थना से वे पिघलने वाले नहीं हैं । यदि वे ऐसा करें भी, तो भूखों मर जायंगे । वास्तव में यहाँ रोगनिवृत्ति के लिये अग्नि आदि देवताओं से प्रार्थना की गई है । स्वामी दयानन्द तो देवताओं को मानते नहीं, अतः उनको यह निराला अर्थ करना पड़ा है । बारहवें अध्याय के दूसरे मन्त्र में दिव्य प्राणों को विद्युत् का धारक बताया गया है, किन्तु यह नहीं बताया गया कि ये दिव्य प्राण हैं क्या? द्यावापृथिवी शब्द का अर्थ माता और धाता बताना भी ठीक नहीं है, क्योंकि इनमें मन्त्रगत ' समनसा ' इत्यादि विशेषणों की संगति नहीं बैठेगी । इनमें समानविज्ञानवेद्यता नहीं है और न इनमें दिन और रात की कोई समानता है । तीसरे मन्त्र की व्याख्या में सूर्य को ज्ञानसम्पन्न और जगत् का उत्पादक बताया गया है, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि इनके मत में सूर्य जड़ पदार्थ है । उसमें ज्ञानवत्त्व और जगत्कर्तृत्व नामक चेतन - धर्म कैसे रह सकते हैं । चौदहवें मन्त्र की व्याख्या में भी यहाँ अनेक विसंगतियाँ बताई गई हैं । पहले ( ११।६१ ) उखा का अर्थ कन्या किया गया था, यहाँ १६ वें मन्त्र में ' उखा ' का अर्थ ' प्राप्त प्रजा ' किया है और इस अर्थ के समर्थन में इनके किसी अनुयायी ने शतपथ ब्राह्मण को उद्धृत किया है । यह पूरी तरह से निरर्थक है । उखा - सम्भरण के प्रसंग में इस प्रकरण की व्याख्या ऊपर की जा चुकी है । उखा सम्भरण प्राजापत्य कर्म हो सकता है, किन्तु ' उखा ' शब्द का अर्थ ' प्राप्त प्रजा ' करने के लिये अभी भी प्रमाण की अपेक्षा है, वह आपने दिया नहीं है । यहाँ की २१ वीं कण्डिका पहले छठी संख्या पर भी आ चुकी है | स्वामी दयानन्द ने एक ही मन्त्र के दो अलग - अलग अर्थ किये हैं । इन दोनों ही अर्थों की अप्रासंगिकता भी यहाँ दिखा दी गई है । ३८ वें मन्त्र की व्याख्या में पुरुष ( जीव ) को सूर्य के समान ज्योतिष्मान् बताया है । जीव तो नीरूप है, तब वह ज्योतिष्मान् कैसे हो सकता है? फिर इनके मत में तो जीव अणु है, व्यापक नहीं । वह सूर्य के जैसे ज्योतिष्पुंज स्वरूप कैसे हो सकता है? ' मातृभि: ' इस बहुवचन पद से भी उसकी संगति नहीं बैठेगी । जीव की चर्चा ८५ वें मन्त्र में भी इन्होंने की है । यह जीव अमूर्त है । व्याधि इसको कैसे पकड़ सकती है? व्याधि से भी देह का ही नाश होता है,
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( २७ ) जीव का नहीं । स्वामी दयानन्द ' देव ' पद प्रायः विद्वान् मनुष्य का ग्रहण करते हैं । ४ ९ वें मन्त्र में उन्होंने इस पद का विद्यार्थी किया है । देवता जब स्वयं विद्वान् हैं, तो उनको विद्यार्थी बनने की क्या आवश्यकता आ पड़ी? अज्ञात विधि के ज्ञापक वेद में लौकिक व्यवहारों का प्रतिपादन नहीं हो सकता । देवयोनि मनुष्ययोनि से भिन्न है, इस विषय पर यहाँ अनेक स्थलों पर प्रकाश डाला जा चुका है । ५५ वें मन्त्र की व्याख्या में भी इस विषय को दिखाया गया है । यहाँ पृश्नि शब्द के अर्थ पर निरुक्त, अमरकोश आदि के प्रमाण से विचार कर दयानन्दीय अर्थ की असंगतता को दिखाया गया है । ६३ वें मन्त्र के भाष्य में पति - पत्नी के लोकप्रसिद्ध अर्थ को ही बता कर यह कहा गया है कि यम और यमी अर्थात् न्यायाधीश और न्यायकर्त्री से प्रेरित होकर वे ऐसा करते हैं । क्या स्वामी दयानन्द वेद में से आधुनिक ' कोर्ट मेरिज ' को निकालना चाहते हैं । इसी तरह से ६५ वें मन्त्र में वे दम्पत्ती के संवाद का वर्णन करते हैं । निर्ऋति पद का अर्थ पृथिवी तुल्य स्त्री किया है । इस मन्त्र का भाष्य असंगत वाक्यावलियों के समूह का एक अच्छा उदाहरण है । ७० वें मन्त्र में काष्ठमयी सीता को घृत, दुग्ध, मधु आदि लगाने का क्या प्रयोजन है? और उसकी स्तुति किस लिये की जा रही है, यह भी यहीं नहीं बताया गया है । स्वामी दयानन्द देवयोनि को स्वीकार न करते हुए भी उनकी सनातनी प्रज्ञा की बात अपनी व्याख्या ( १२ / १० ९ ) में करते हैं । प्रज्ञा तो अनित्य है, वह सनातन कैसे हो सकती है? ११२ वें मन्त्र के सोम पद का अर्थ सोम के समान कान्तियुक्त राजपुरुष किया है । स्पष्ट ही यहाँ गौण अर्थं का ग्रहण किया गया है । अन्वयानुपपत्ति और तात्पर्यानुपपत्ति के बिना गौण अर्थं का सहारा नहीं लिया जाता । यहाँ ऐसी कोई बात नहीं है । सोम की सी कान्ति वाले राजपुरुष का यहाँ कोई प्रसंग भी नहीं है । ११३ वें मन्त्र में मनुष्य रूप सोम से संयुक्त होने की बात कही गई है । कोरे आशीर्वाद से कोई सोम से संयुक्त नहीं हो सकता । अभिमानी शत्रु के निवारण में समर्थ वीर भी कोरे आशीर्वाद से नहीं बनते । वे तो धनुर्वेद का ठीक से अभ्यास करने से ही बन सकते हैं । ११४ वें मन्त्र के विषय में पारिजातकार ने विकल्प उठाया है कि इस मन्त्र में जीव को आनन्द का उपदेश करने वाला व्यक्ति अल्पज्ञ है या सर्वज्ञ? अल्पज्ञ के उपदेष्टा होने पर वेद पौरुषेय हो जायगा । सर्वज्ञ इस तरह का उपदेश नहीं कर सकता, क्योंकि जो सर्वज्ञ है, वह किसी भी प्रकार की प्रार्थना क्यों करेगा? सुहृत् का वाचक मित्र शब्द सदा नपुंसक लिंग में प्रयुक्त होता है, इस बात को स्वयं दयानन्द भी स्वीकार करते हैं । तब भी यहाँ ( १२ । ११४ ) इन्होंने पुल्लिंग में मित्र पद का प्रयोग किया है । स्वामी दयानन्द ने कहा है कि ' अपां पृष्ठमसि ' ( १३1२ ) मन्त्र की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण ( ७ | ४ | १ | १ ) में की गई है, किन्तु वास्तव में यह व्याख्या वहाँ नहीं मिलती । तृतीय मन्त्र की व्याख्या में नाना प्रकार की आपत्तियाँ उठाई गई हैं । ' अम ' शब्द का प्रयोग सचिव के अर्थ में कहीं भी देखने को नहीं मिलता ( १३ । ९ ) । इसी तरह से समुद्र शब्द भी कोई प्रमाण नहीं है ( १३।१६ ) । इष्टका पद का ऐसा ही अर्थ अभिप्रेत होता, तो यहाँ इष्टका के स्थान अर्थ भी यहाँ ( १३।२४ ) मनमाना कर दिया गया है । मेघोदय की बात कही गई है । वास्तव में मेघोदय की का अर्थ ' जार ' करने में तथा सुपर्ण पद को पतिपरक मानने में अर्थं यहाँ ( १३।२१ ) दृढ़ शरीर वाली स्त्री किया है । यदि पर शैली शब्द का प्रयोग होता । प्राण और अन पदों का ' अपां गम्भन् ' ( १३।३० ) मन्त्र की व्याख्या में वसन्त ऋतु में कल्पना वर्षा ऋतु के लिये उचित है । वसन्त में तो उसे असमय की वर्षा कहा जाता है । यहाँ ३१ वें मन्त्र की संस्कृत और हिन्दी में जो व्याख्या की गई है, उनमें आपस में ही विरोध है । यहाँ ' श्रीन् समुद्रान् ' अथवा ' स्वर्गान् ' की जो व्याख्या हुई है, वह भी उनके मत के विपरीत है, क्योंकि वे स्वर्ग आदि लोकों की सत्ता को स्वीकार नहीं करते । इसी प्रकार इन्द्र पद का अर्थ जीव करना और कर्मों को स्पशंयोग्य बताना भी गलत है । कर्म तो अमूर्त होते हैं, उनका स्पर्श कैसे किया जा सकता है ( १३।३३ ) । ' इषे राये ' ( १३ | ३५ ) मन्त्र में कूपसदृश कोमलता का उल्लेख मिलता है, किन्तु कूप की कोमलता न तो वेद में प्रसिद्ध है और न लोक में ही ।
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( २८ ) अग्नि शब्द का अर्थ विद्वान् अथवा विद्युत् करना भी निष्प्रमाण है । इसी तरह ज्योति शब्द का अर्थ न्याय का प्रकाश करना भी अप्रामाणिक है ( १३ / ३ ९ ) । मनुष्य की शक्ति सीमित है । वह असंख्य सुखों को किसी भी तरह से नहीं दे सकता ( १३।४० ) । प्रतिमा पद का अर्थ सूर्य करने पर उसके लिये स्त्रीलिंग का प्रयोग कैसे किया जा सकता है ( १३।४१ ) । अद्रिबुघ्न शब्द का अर्थ मेघाकाश अथवा सूक्ष्म मेघ भी कहीं नहीं मिलता ( १३।४२ ) | आत्मा से आकाश आदि के क्रम से अग्नि की उत्पत्ति उपनिषदों में वर्णित है, किन्तु स्वामी दयानन्द ' यो अग्निम् ' ( १३।४५ ) इत्यादि मन्त्र में अग्नि से अग्नि की उत्पत्ति बताते हैं, यह असंगत है । वैदिक परम्परा में तो यहाँ तात्पर्यानुपपत्ति के आधार पर लक्षणा वृत्ति का सहारा लेकर पृथिवी के शोक से अग्निदेवताक अज को उत्पत्ति मानी गई है । इसी तरह से ' इमं मा ' ( १३ | ४७ ) मन्त्र में भी अनेक असंगतियाँ हैं । सनातनी पद्धति से तो देवता अनन्त शक्तियों से सम्पन्न हैं, अतः उनके प्रसाद से सब कुछ सिद्ध हो सकता है । ' इममूर्णायुम् ' ( १३।५० + ) मन्त्र की व्याख्या में अवि ( भेड़ ) को प्रजा का आदिम उत्पत्तिनिमित्त बताया है, किन्तु इसमें कोई प्रमाण नहीं दिया और न कोई पद्धति ही बताई । अगले मन्त्र में शरभ पद की शल्यार्थकता में भी कोई प्रमाण नहीं दिया गया । कोश ग्रन्थों में तो यह पद सिंह को भी मार डालने वाले अष्टापद नामक पशु के लिये प्रयुक्त हुआ है । इसी तरह से ' त्मना ' ( १३1५२ ) शब्द से मनुष्य अथवा पशु का ग्रहण करना निर्मूल है । आगे के मन्त्र में गायत्रीनिर्मित स्वच्छ अर्थ की चर्चा की गई है, किन्तु यह स्वच्छ अर्थ है क्या? इसका कुछ पता नहीं चलता । इसी पद्धति से इस अध्याय के अन्तिम कुछ मन्त्रों के दयानन्दीय अर्थ की असमंजसता पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है । अन्तिम मन्त्र की व्याख्या में बहुत ही स्पष्ट रूप से बताया गया है कि स्वामी दयानन्द वैदिक वाङ्मय से किस तरह से अपरिचित हैं । ताण्ड्य महाब्राह्मण में स्तोम के स्वरूप और उनके भेदों का निरूपण हुआ है । छान्दोग्य उपनिषद् में बताया गया है कि पाञ्चभक्तिक साम के अन्तिम भाग की संज्ञा ' निधन ' है । शाक्वर, रैवत आदि भी साम के ही भेद हैं । इन सब शब्दों की यहाँ शास्त्रीय व्याख्या प्रस्तुत न कर मनमाना अर्थ कर दिया गया है । इस तरह से यह दयानन्दीय व्याख्यान पूरी तरह से निष्प्रमाण है । १४ वें अध्याय के दूसरे मन्त्र में आये ' स्योने ' शब्द को स्वामी दयानन्द ने संबोधन पद माना है, जब कि निरुक्त के प्रमाण से सुखार्थक स्योन शब्द का प्रयोग नपुंसक लिंग में किया गया है, स्त्रीलिंग में नहीं । वास्तव में यह सप्तमी का के एकवचन का रूप हैं । ' कुलायिनी ' शब्द का अर्थ भी यहाँ निरर्थक कल्पनाओं पर आश्रित है, क्योंकि किसी कोश आदि प्रमाण नहीं दिया गया है । तीसरे मन्त्र के पदों का भी एक दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध प्रतीत नहीं होता । चौथे मन्त्र की व्याख्या में ' पृष्ठ ' पद और ' अप्स ' शब्द का अर्थ निरर्गल लगता है । पाँचवें मन्त्र में ' विश्वकर्मा ' पद का अर्थ सामान्य मनुष्य, पति अथवा ऋषि में से कोई भी संभव नहीं है । अनेक मन्त्रों के भावार्थ में और संस्कृत तथा हिन्दी अर्थ में परस्पर बड़ी भिन्नता है, यह तो पहले ही बताया जा चुका है । आठवें मन्त्र में स्त्रीपुरुष आदि की प्रार्थना से प्राणरक्षा की बात कही गई है । यहाँ भाष्यकार ने तीन विकल्प प्रस्तुत कर इस अर्थ का खण्डन कर दिया है । आगे के मन्त्रों में आये वयस् और छन्दस् शब्दों के भी बिना प्रमाण के मनमाने अर्थ किये गये हैं । इनको कथमपि प्रमाण नहीं माना जा सकता । १२ वें मन्त्र में भी ' विश्वकर्मा ' पद का अर्थ पति किया है । इसी प्रकार पृष्ठ, प्रतिष्ठा, अन्तरिक्ष जैसे शब्दों के अर्थं भी लौकिक और वैदिक परम्परा के विरुद्ध दिये गये हैं । मास, ऋतु, पृथिवी, अन्तरिक्ष, जल, औषधि - ये सब जड़ पदार्थ हैं । इनकी प्रार्थना से मनुष्य कैसे समर्थ हो सकता है ( १४।१६ ) । १८ वें मन्त्र की व्याख्या में एक ही छन्दस् शब्द के मनमाने अनेक अर्थ किये हैं, किन्तु उनमें कोई प्रमाण नहीं दिया है कि एक ही शब्द के ये अनेक अर्थं कैसे हो गये । पृथिवी आदि जड़ पदार्थों में स्वतन्त्रता नहीं रह सकती और न मनुष्य के लिये बकरी, बैल, अश्त्र आदि अनुकरणीय ही हो सकते हैं ( १४ । १ ९ ) । २३-२४ मन्त्रों की व्याख्या में
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( २ ९ ) fafe संख्यावाची शब्दों के और विविध स्तोमों के निराले ही अर्थ दिये गये हैं । इनमें भी कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया । यह पहले ही बताया जा चुका है कि सामवेद में विविध संख्याओं से सम्पन्न स्तोमों का विधान किया गया है । कहीं - कहीं तो गौण अर्थ का सहारा लेने के उपरान्त भी मन्त्रार्थं को असंगति दूर नहीं होने पाती । ऐसा लगता है कि स्वामी दयानन्द जैसे सामवेद उपदिष्ट स्तोमों से एक दम अपरिचित हैं । २८ वें मन्त्र में प्राण, अपान, व्यान आदि तथा नाग, कूर्म, कुकर आदि प्राणों के द्वारा स्तुति की बात कही गई हैं । जड़ प्राण आदि के द्वारा यह कैसे संभव हो सकता है । आपके सिद्धान्त के विरुद्ध होने से इनको चेतन जीव का अधिष्ठाता भी नहीं मान सकते । ३० वें मन्त्र में शूद्र और आर्य शब्द का एक साथ प्रयोग हुआ है । इससे स्पष्ट होता है कि ये दोनों भिन्न - भिन्न जातियाँ हैं । आर्यसमाजो परिहार स्वामी दयानन्द ने नहीं किया और इस प्रकार वे स्वयं ही अपने व्याख्या करते हैं । सनातनी दृष्टि से तो यहाँ वैश्य वाचक अयं शब्द है, भाष्य में २ ९ अंगों की सूचना दी गई है, किन्तु यह नहीं बताया गया कि तो सभी को आर्य मानते हैं । इस आपत्ति का प्रतिपादित सिद्धान्त के विपरीत इस मन्त्र की आ नहीं । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र के ये २ ९ अंग कौन - कौन से हैं । १५. वें अध्याय के पहले मन्त्र में ' वरूथ ' शब्द का अर्थ आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक सुख किया गया है । यह उनकी मनमानी कल्पना है | निघण्टु ( ३१४ ) में गृह के पर्यायवाची नामों में इसकी गणना है । स्वयं स्वामी दयानन्द ने भी अपनी उणादि वृत्ति में वरूथ शब्द का यह अर्थ नहीं बताया है । इसी तरह से यहाँ तीसरे और छठे मन्त्र की व्याख्या में भी अनेक असंगतियां बताई गई हैं । १०-११ मन्त्रों में पुन: बताया गया है कि स्वामी दयानन्द वैदिक शब्दों की मर्यादा से सर्वथा अपरिचित हैं । सामविधान, ताण्ड्य महाब्राह्मण आदि को इन्होंने देखा होता, तो त्रिवृत्स्तोम रथन्तर साम, उक्थ, शस्त्र, प्रउग आदि शब्दों के अर्थों से अवश्य परिचित होते और तब उनको इस प्रकार के अप्रामाणिक अर्थों की शरण न लेनी पड़ती । १४- १६ मन्त्रों की व्याख्या में भी यहाँ अनेक प्रकार की असंगतियां दिखाई गई हैं । पुंजिकास्था, रथस्वन, रथचित्र जैसे शब्दों का अर्थ भी यहाँ स्पष्ट नहीं किया गया है । इसी तरह से प्रतीक शब्द का अर्थ प्रतीति करना और प्रतीति का अर्थ वृद्धि करना भी पूरी तरह से असंगत है. ( १५/२७ ) | वेद मनुष्य को घन की याचना का उपदेश कभी नहीं कर सकता, किन्तु यहाँ अनेक स्थलों पर ऐसा किया गया है । मुख्यार्थ का बाघ होने पर ही लक्षणा वृत्ति का सहारा लिया जाता है, इस बात को वेदार्थपारिजातकार अनेक बार बता चुके हैं, किन्तु इस अध्याय के ४२ वें मन्त्र के भाष्य में स्वामी दयानन्द के मत का खण्डन करते समय उत्तर-: मीमांसा ( वेदान्त ) के आनन्दमयाधिकरण के आधार पर शास्त्रीय पद्धति से गंभीर विचार प्रस्तुत किया गया है । ४४ वें मन्त्र में प्रज्ञान और बोध का उपमानोपमेयभाव बताया गया है । ये दोनों शब्द तो एक ही अर्थ को बताते हैं । तब इनमें परस्पर भेदबोधक. यह संबन्ध कैसे बन सकता है । ४ ९ वें मन्त्र में यहाँ सत्र शब्द को लेकर विचार हुआ है । स्वयं स्वामी दयानन्द ही अपनी अलग - अलग व्याख्याओं में इसके परस्परविरोधी अर्थ बताते है । शत्रुओं को तो कोई भी तिरस्कृत करना चाहता ही है । इसके लिये किसी उपदेश की क्या आवश्यकता है ( १५/५१ ) । वात, व्रजन, आयु आदि शब्दों के अर्थ भी यहाँ ( १५ / ६२-६३ ) बिना कोश, व्याकरण, व्यवहार, आप्तवचन आदि को उपस्थापित किये मनमाने ढंग से कर दिये गये हैं । कृमुक ( धमन ), विकङ्कत, उदुम्बर ( गूलर ) और पलाश की समिधा के अतिरिक्त यहाँ ( पृ ० ९५-१०२ ) ( दीमक ) और वन ( चींटी ) भक्षित वृक्षों की समिधा का भी विधान है । अपरशुवृक्त्र शब्द का यहाँ प्रयोग हुआ है, अर्थात् कुल्हाड़ी से काटी गई लकड़ी का उपयोग यज्ञीय कार्य में नहीं करना चाहिये । यह एक समृद्ध वैदिक यज्ञीय संस्कृति का सूचक है कि धर्म कार्य के लिये भी हरे वृक्षों को नहीं काटा जाता था । एक है आज की अर्थप्रधान संस्कृति, जिसने बहुत बड़े भूभाग को वृक्षविहीन बना कर सारी प्रजा को अनावृष्टि और अतिवृष्टि की विभीषिका में डाल दिया है ।