वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ५ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 31–40
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ५ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 31–40
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( ३० ) यहाँ चोर ( गुप्त एवं प्रकट ), स्तेन, मलिम्लुच आदि चोरों के विविध भेदों का ( पृ ० १०५, १ ९ १ ) तथा अराति, द्वेषी, निन्दक नामक तीन प्रकार के शत्रुभेदों का सूक्ष्म अन्तर अताया गया है ( पृ ० १०६ ) । मलिम्लुच के प्रसंग में राक्षसी ( पृ ० १०५ ) दंष्ट्रा का भी उल्लेख हुआ है । अग्नि, वायु और सूर्य नामक तीन धामों की तो यहाँ ( १२।१ ९ ) चर्चा है ही, निरुक्त ( ९ १२८ ) प्रतिपादित स्थान, नाम और जन्म नामक तीन धामों का भी विवरण मिलता है ( पृ ० १३८, २१३ ) । गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि, अतिप्रणीत, धिष्ण्य, अन्वाहार्यपचन, आग्नीध्रीय आदि अग्नियों की भी प्रसंगवश चर्चा हुई है ( पृ ० १३८ ) । इसी तरह से अमीव ( पृ ० ११० ), व्याघ्र ( पृ ० १२२ ), ( पृ ० १५८ ), सुन ( पृ ० २०० ), पृष्टि ( पृ ० २ ९ ५ ) और अष्ठीवत् ( पृ ० ३ ९ ७ ) जैसे शब्दों की निरुक्ति भी यहाँ दो गई है | पाणिनि के धातुपाठ में दो हजार से अधिक धातुएँ हैं । लौकिक संस्कृत में इनमें से बहुत कम धातुओं का प्रयोग मिलता है । इस भाष्य में स्थान - स्थान पर शब्दव्युत्पत्ति के प्रसंग में इनको उद्धृत किया गया है । इन सबकी यदि एक सूची बना दी जाय, तो स्पष्ट हो सकता है कि वैदिक साहित्य में लोक में कैसी - कैसी अप्रचलित, अपरिचित धातुओं का उपयोग हुआ है । क्षीरस्वामी आदि विनि प्राचीन आचार्यों के द्वारा बताये गये इन धातुओं के विविध अर्थों का भी प्रसंगवश यहाँ उल्लेख किया गया है ( पृ ० ३८८ ) । वेदों में विविध चितियों का विधान है । उनमें से यजुर्वेद की प्रस्तुत संहिता के ११-१८ अध्यायों में सुपर्णं चिति काही विस्तार किया गया है । ' सुपर्णोऽसि गरुत्मान् ' ( १२०४ ) मन्त्र के भाष्य में रूपकालंकार के माध्यम से अग्नि की पण से समानता दिखाई गई है | यहाँ ( १२/५ ) विष्णु के तीन क्रमों का भी वर्णन है और कूर्म पुरुष ( १३।३० - ३३ ) का भी । इनमें हम विष्णु के त्रिविक्रम ( वामन ) और कूर्म अवतारों को देख सकते हैं । इस संहिता के १२ वें अध्याय के २७ मन्त्रों ( १२।७५-१०१ ) का विनियोग औषधियों की स्तुति में किया गया है । यह स्तुति अपने आप में आयुर्वेद के ज्ञान से परिपूर्ण है । बाट्कौशिक शरीर की भी यहाँ ( १२।६१ ) चर्चा आई है और भाष्य में बताया गया है । जीव के षट्कौशिक शरीर को त्वचा, मांस और रुधिर माता से प्राप्त होते हैं । वाचस्पति मिश्र की सांख्यतत्त्वकौमुदी भी इसका समर्थन करती है । वहाँ बताया गया है - ' मातृतो लोमलोहितमांसानि 3 पितृतस्तु स्नाय्वस्थिमज्जान: ' ( ३ ९ का ० ) । इस प्रकार यहाँ ११ से १५ अध्याय तक के मन्त्रभाष्य में उपदर्शित चतुर्विध विषयों को हमने संक्षेप में प्रस्तुत किया है । आशा है इससे हिन्दी पाठकों को भी इस अतिविशिष्ट भाष्य के विषयों का कुछ न कुछ आस्वाद अवश्य मिलेगा । अभी इतना ही कहकर हम अपनी लेखनी को विश्राम दे रहे हैं । वाराणसी अधिक वैशाख पूर्णिमा, संवत् २०४८ विद्वद्वशंवद व्रजवल्लभ द्विवेदी
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विषय - सूची प्रतिपाद्य विषय प्रकाशकीय वक्तव्य पंचाध्यायी ( ११ - १५ ) भाष्यनिष्कर्ष एकादश अध्याय: उखा - संभरण ause संख्या अध्वर्यु के द्वारा ' युञ्जानः ' इत्यादि आठ मन्त्रों से आहुति प्रदान १-८. वैणवी अनि ( वंशदण्ड ) का आदान एवं अभिमन्त्रण ९ - ११. १२ - १४. बिना स्पर्श किये अश्व, गर्दभ और अज का पूर्व दिशा को प्रेषण १५ - १६. वल्मीकवपा के छिद्र से मृत्पिण्ड का अन्वीक्षण १७. १८ - १ ९. अध्वर्यु द्वारा अश्व के पृष्ठ का हस्त से स्पर्श २०. मृत्पिण्ड से अश्व का पृथक्करण एवं अभिमन्त्रण २१ - २२. अभि द्वारा मृत्पिण्ड का तीन बार परिलेखन २५-२७. २८. अनि द्वारा मृत्पिण्ड के चारों तरफ की भूमि का खनन २ ९. मृत्पिण्ड के उत्तर भाग में कृष्णाजिन और पुष्करपर्ण का आस्तरण कृष्णाजिन और पुष्करपर्णं का अध्वर्यु द्वारा स्पर्श ३०-३१. मृत्पिण्ड का अध्वर्यु द्वारा पुरीष्य अग्नि के रूप में स्पर्श एवं स्तवन ३२- ३७. ३८. मृत्पिण्ड के गर्त जल का प्रक्षेप ३ ९. मृत्पिण्ड के गर्त में वायु का प्रेरण ४०. आहवनीय की उत्तर दिशा में मृत्पिण्ड का स्थापन ४७-४८. ५३. पूर्वगृहीत अजलोम का मृत्पिण्ड में प्रक्षेप ५४. सूक्ष्म सिकता, लोहरस और पाषाण चूर्ण का भी प्रक्षेप पृष्ठ संख्या ३ ५-३० १-२ २-१२ १२-१६ १६-१९ १ ९ –२१ २१-२२ २३-२४ २५ २६-२९ २ ९ -३२ ३२-३६ ३६-३७ ३७-३९ ३ ९ -४१ ४१-४७ ४८ ४ ९ ५०-५१ ५७-५९ ५ ९ -६२ ६७-६८ ६८-६९ [ भाष्य में शतपथ ब्राह्मण के षष्ठ काण्ड के तीन अध्यायों का विषषसंक्षेप ] अनि को हाथ में लेकर तृण से अश्व, गर्दभ और अज का अभिमन्त्रण पिण्ड के पास अश्व का अभिमन्त्रण और मृत्पिण्ड पर अश्व के सभ्य पाद का विन्यास २३-२४. मृत्पिण्ड के समीप बैठ कर अध्वर्यु द्वारा उस पर चिह्नित अश्वपद मुद्रा में दो आहुतियाँ देना बिछाये हुए कृष्णाजिन और पुष्करपर्ण के चारों कोनों को ऊपर उठाना ४१. कृष्णाजिन और पुष्करपर्ण से वेष्टित मृत्पिण्ड को हाथों में चुपचाप लेकर मन्त्रोच्चार पूर्वक उठना ५१-५२ ४२. अध्वर्यु का अपनी बाहुओं को फैलाकर उन्हें पूर्वाभिमुख कर मृत्पिण्ड को पूर्वाभिमुख झुकाना ५२-५४ ४३-४५. पिण्ड को नाभि तक नीचे उतार कर अश्व, गर्दभ और अज का अभिमन्त्रण ५४–५६ ४६-४७. अध्वर्यु द्वारा अश्व, रासभ और अज का बिना स्पर्श किये उनके ऊपर मृत्पिण्ड का धारण और अद्धापुरुष का ईक्षण ४ ९. मृत्पिण्ड के विस्रंसन और अजरोम के ग्रहण के बाद उक्त तीनों पशुओं का ईशान दिशा में छोड़ना ६३-६४ ५०-५२. दक्षिणाग्नि में पकाये पलाश की लकड़ी के काढ़े से मृत्पिण्ड का सिंचन ६४-६७
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afuser संख्या ( ३२ ) ५५-५७. मृत्पिण्ड में इन सबको भलीभांति मिला देना ५८. मृत्पिण्ड से प्रादेशमात्र विस्तार वाले उखातल का निर्माण ५ ९. उखा के तीन भाग कर उसमें मेखला आदि का निर्माण ६०. अध्वर्यु द्वारा ही दक्षिणाग्नि से प्रदीप्त अश्व की सात लीदों से उखा का धूपन ६१. अषाढा, उखा और विश्वज्योति को पकाने के लिये अभि के द्वारा चतुरस्र गतं का खनन ६२. गर्त में उक्त पात्रों को पकाने के लिये इन्धन डालना ६३. पात्रों के पक जाने पर भस्मीभूत इन्धन को हटाना ६४. गर्त में से दोनों हाथों से उखा पात्र को निकालना ६५. कण्डिका स्थित चार मन्त्रों से चार बार अजा दुग्ध से उखा पात्र का अवसेचन ६६-६७. उखा - संभरण के बाद औद्भण होम का अनुष्ठान ६८-६९. औद्मभण होम के उपरान्त कृष्णाजिन दीक्षा से लेकर दण्डोच्छ्रयणान्त कर्मों का अनुष्ठान, ईशानाभिमुख अध्वर्यु अथवा यजमान द्वारा मुंजकुलाय अथवा शणकुलाय का उखा में प्रक्षेप और उसका आहवनीयाग्नि में अधिश्रयण ७०-८२. प्रज्वलित अग्नि में वितस्तिप्रमाण कृमुक, पलाश आदि की तेरह समिधाओं का प्रक्षेप ८३. अध्वर्यु द्वारा प्रदत्त दुग्ध आदि से सिंचित समिधा का यजमान द्वारा उख्य अग्नि में आधान द्वादश अध्याय: उखा - धारण १. यजमान द्वारा कण्ठ में सुवर्णाभरण धारण २. गोल - गोल उखा धारण समर्थ इण्ड्वाओं से उखा का धारण ३. यजमान का छः रस्सियों से बने शिक्यपाश को गले में लटकाना ४. यजमान द्वारा बाहुओं को उठाकर पूर्व दिशा में शिक्य सहित उख्य अग्नि का धारण ५. यजमान द्वारा विष्णुक्रम नामक तीन पाद - विन्यास ६. ७-१०. पूर्व दिशा में ऊर्ध्वं बाहु यजमान द्वारा अग्नि का ग्रहण चार मन्त्रों से चार बार उख्याग्नि का धीरे - धीरे नीचे करना ११. नाभि के ऊपर उख्याग्नि का धारण एवं अभिमन्त्रण १२. शिक्यपाश और रुक्मपाशं का ऊर्ध्वं मार्ग से निष्कासन १३. उक्त पाशों के निष्कासन के बाद आग्नेय दिशा में उख्याग्नि का यजमान द्वारा धारण १४. उख्याग्नि का अवतारण और आसन्दी पर स्थापन १५ - १७. आसन्दी पर स्थापित करने के बाद उख्याग्नि का उपस्थान १८- २ ९. एकादश अथवा द्वादश ऋचा वाले वात्सप्र अनुवाक से अग्नि का उपस्थान ३०. उख्याग्नि में वनीवाहन नामक समिधा का आधान ३१. आसन्दी के साथ उख्याग्नि का दक्षिण में स्थित यजमान द्वारा शकट के पूर्व भाग में स्थापन ३२. शकट में बैलों को जोतकर प्राची दिशा में गमन ३३. शकट की धुरी से शब्द होने पर प्रस्तुत मन्त्र का जप ३४. उत्तर दिशा में पाँच भूसंस्कारों से संस्कृत प्रदेश में शकट से अग्नि का अवतारण
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( ३३ ) hushi संख्या ३५-४४. ४५. ४६. उखा के आसपास की भस्म का तडाग आदि के जल में प्रक्षेप पलाश की शाखा से गार्हपत्य स्थान का सम्मार्जन ऊषर प्रदेश स्थित पांसुओं का निवपन ४७-५३. श्रौतसूत्रीय पद्धति से विभिन्न दिशाओं में इष्टकोपधान ५४-५५. लोकम्पृणा इष्टकाओं का उपधान, सादन और अधिवदन ५६ चावल स्थान की मिट्टी का गार्हपत्य चिति पर प्रक्षेप ५७ - ६०. ६१. ६२ - ६४. ६५. पुरीष निवपन के बाद उख्याग्नि की गार्हपत्य चिति के नीचे स्थापना सिकता से पूर्ण उखा के मध्य में चुपचाप दुग्ध का सिंचन निर्ऋति देवताक पाक से कृष्ण तीन इष्टकाओं का उपधान शिक्य, रुक्मपाश, इण्ड्वा और आसन्दी का प्रक्षेप ६६. ब्रह्मा, यजमान और अध्वर्यु द्वारा शालाद्वार्यं अग्नि का उपस्थान ६७-६८. अध्वर्यु द्वारा छ, दस अथवा चौबीस बैलों से जोते जा रहे हल का अभिमन्त्रण ६ ९ -७२. ७३. ७४. ७५-८९. चार ऋत्विजों द्वारा चारों दिशाओं में सीता का कर्षण बैलों को हल से मुक्त कर उनका ईशान निशा में विसर्जन पंचगृहीत आज्य से कृष्ट क्षेत्र के मध्य में स्थापित कुशस्तम्भ पर आहुति प्रदान पन्द्रह ऋचाओं से नाना प्रकार की औषधियों का वपन ९ ० - १०१. बारह अनारभ्याधीत मन्त्रों का औषधियों की स्तुति आदि में विनियोग १०२-१०५. चार ऋचाओं से पूर्व आदि के क्रम से लोकेष्टकाओं का उपधान १०६-१११. छः ऋचाओं से उत्तरवेदि में सिकता प्रक्षेपपूर्वक आत्मभाग में उपधान ( अग्निस्तवन ) ११२ - ११४. आत्मोपहित सिकताओं का स्पर्श ( सोमस्तवन ) ११५ - ११७. पूर्व दिशा में श्वेत अश्व, अश्वेत अश्व अथवा बैल की उपस्थिति में होता द्वारा अनुवाचन त्रयोदश अध्याय: प्रथम चित्युपधान १. उत्तरवेदि के प्रोक्षण से लेकर सम्भार निवपन पर्यन्त कर्म के अनुष्ठान के उपरान्त यजमान द्वारा उत्तरवेदि के पश्चाद्भाग में इस मन्त्र का जप २. कुशस्तम्ब के ऊपर पुष्करपणं का उपधान ३. उस पर पराङ्मुख अध्वर्यु द्वारा सौवर्ण रुक्म का उपधान ४-५, सौवर्ण रुक्म पर प्राङ्मुख उत्तान सुवर्णमय पुरुषाकृति का उपधान ६-८. यजमान द्वारा हिरण्यपुरुष का उपस्थान ९ - १३. १४-१५. अध्वर्यु द्वारा संस्कृत आज्य को पांच बार ग्रहण कर उस हिरण्यपुरुष पर पाँच आहुतियां देना पूर्ण औदुम्बरी स्रुचा का उत्तर दिशा में उपधान १६–१९. हिरण्मय पुरुष के ऊपर स्वयमातृण्णा इष्टका का उपधान २०-२१. उदङ्मुख अध्वर्यु द्वारा स्वयमातृष्णा पर दुर्वेष्टका का उपधान २२-२३. दूर्वेष्टका के सामने द्वियजुः संज्ञक पद्यष्टका का उपधान २४. इसके पूर्व में रेतः सिक और विश्वज्योति नामक इष्टकाओं का उपधान
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( ३४ ) २६. २७ - २ ९. ause संख्या २५. विश्वज्योति इष्टका के सामने ऋतव्या इष्टकाओं का उपधान ऋतव्या इष्टकाओं के सामने अषाढा इष्टका का उपधान दधि, मधु और घृत से कूमं का अंजन ३०-३२. तृतीय पद्यालोक में स्थापित अवकाओं में पुरुष के सामने कूर्म का उपधान और कम्पन आदि स्वयमातृष्णा के उत्तर में उलूखल और मुसल का स्थापन ३३. ३४-३५. उलूखल के ऊपर चुपचाप उखा का स्थापन और मन्त्रोच्चार के साथ उपधान ३६-३७. उखा के मध्य में दो आहुतियाँ देना ३८-४०. पाँच पशुओं के शिरोभाग में सात - सात सुवर्ण खण्डों का प्रक्षेप ४१-४५. ४६. ४७-५१. ५२. ५३. ५४-५७. ५८. १ - ५. ६. ७. ८. ९ -१०. ११ - १२. १३. १४. उखा की विभिन्न दिशाओं में पाँच पशुओं के शिरों का उपधान बीच के पुरुषशीर्ष पर दो आहुतियाँ देना पांच उत्सर्गसंज्ञक मन्त्रों से अध्वर्यु द्वारा पाँच पशुशीर्षों का उपस्थान अग्नि के समीप आकर अध्वर्यु द्वारा अर्धचित अग्नि का उपस्थान अध्वर्यु द्वारा अपस्या संज्ञक इष्टकाओं का उपधान व्याघारण होम के क्रम से प्राणभृत्संज्ञक इष्टकाओं का उपधान दक्षिण कोण से स्वयमातृष्णापर्यन्त लोकम्पृणाओं का उपधान चतुर्दश अध्याय: द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ चितियों का उपधान द्वितीय चिति में रेतः सिग् वेला में आश्विनी संज्ञक इष्टकाओं का उपधान ऋतव्या इष्टकाओं का उपधान पूर्व आदि दिशाओं में वैश्वदेवी संज्ञक इष्टकाओं का उपधान प्राणभृत् संज्ञक तथा अपस्या नामक इष्टकाओं का उपधान वयस्या अथवा छन्दस्या इष्टकाओं का उपधान तृतीय चिति में स्वयमातृष्णा इष्टकाओं का उपधान पाँच दिश्या इष्टकाओं का उपधान विश्वज्योति इष्टकाओं का उपधान १५. ऋतव्या इष्टकाओं का उपधान १६. अन्य दो ऋतव्या इष्टकाओं का उपधान १७. १८- २०. २१-२२. २३. प्राणभृत् संज्ञक दश इष्टकाओं का उपधान बारह - बारह छन्दस्या इष्टकाओं का उपधान सात वालखिल्या इष्टकाओं का उपधान चतुथं चिति में मृत्युमोहिनी आदि इष्टकाओं का उपधान २४. स्पूत संज्ञक दस इष्टकाओं का उपधान २५-२६. छः पद्याप्रमाण इष्टकाओं का उपधान २७. ऋतव्या इष्टकाओं का उपधान २८-३१. सृष्टिसंज्ञक सप्तदश इष्टकाओं का उपधान ३१. लोकम्पूणा इष्टकाओं का उपधान
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( ३५ ) पञ्चदश अध्याय: पंचम चिति का उपधान पंचम चिति में असपत्ना संज्ञक इष्टकाओं का उपधान विराट्संज्ञक छन्दस्या इष्टकाओं का उपधान स्तोमभाग संज्ञक इष्टकाओं का उपधान afuser संख्या १-३. ४५. ६ - ९. १०- १४. नाकसत् संज्ञक इष्टकाओं का उपधान १५-१९. पंचचूडा संज्ञक पांच इष्टकाओं का उपधान २०-२२. छन्दस्या इष्टकाओं का उपधान २३- २५. त्रिष्टुप् संज्ञक तीन इष्टकाओं का उपधान २६-२८. जगती संज्ञक तीन इष्टकाओं का उपधान २ ९ - ३१. अनुष्टुप् संज्ञक तीन इष्टकाओं का उपधान ३२-३४. ३५-३७. अषाढा के सामने बृहती संज्ञक तीन इष्टकाओं का उपधान उष्णिक् संज्ञक तीन इष्टकाओं का उपधान ३८ - ४०. बृहती संज्ञक तीन इष्टकाओं का उपधान पंक्तिसंज्ञक तीन इष्टकाओं का उपधान ४१-४३. ४४-४६. पथपंक्ति संज्ञक तीन इष्टकाओं का उपधान ४७-४८. पुरीषवती और अतिच्छन्दस् इष्टकाओं का उपधान ४ ९ -५६. आठ आग्नेयी ऋचाओं से गार्हपत्य चिति का उपधान ५७-६१. पंचम चिति की शेषभूत इष्टकाओं का उपधान ६२-६३. विकर्णी स्वयमातृष्णा आदि का उपधान ६४. पंचमी चिति के द्रष्टा प्रजापति ६५. इष्टकाचित अग्नि पर हिरण्य - शकलों का प्रक्षेप
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एकादशोऽध्यायः श्रीरामं परमेश्वरं त्रिजगतामात्मानमेवाव्ययं वाञ्छाकल्पतरुं सदा प्रणमतामानन्दकन्दं हरिम् । सीतालक्ष्मणवायुपुत्रसहितं नित्यं नवं सुस्थितं सेवे शाश्वतमप्रमेयमनघं तल्लब्धये केवलम् ॥ षष्ठस्य प्रथमेऽध्याये हिरण्यगर्भकर्तृका सृष्टिरुक्ता ' असद्वा इदमग्र आसीत् ' इत्यादिना, तत्र प्रश्नोत्तराभ्यामृषय एवासत्पदवाच्यत्वेनोक्ताः ' तत्र प्राणा वा ऋषयः ' इत्यादिना, केवलं लिङ्गशरीरमेवासीदिति निर्धारितम् । तत्र मध्यमप्राणस्य सर्वेन्द्रियपोषणद्वारा इन्द्रशब्दवाच्यत्वमुक्त्वा विराट्पुरुषस्य चित्याग्नेश्च साम्यमुक्तम् । सप्तपुरुषसम्पिण्डितस्य चित्याग्नेः शिरसो दर्शनं भवति । ते प्राणात्मका ऋषय एकैकानि स्वाश्रयप्रधानानि सप्तशरीराणि सृष्ट्वा परस्परमब्रुवन् -- इत्थ मे कैक प्रधानशरीरा अचाक्षुषमिदं स्थूलं शरीर-मुत्पादयितुं न शक्ष्यामः, अचक्षुषो वचनव्यापाराभावात्, अवचनस्य वचनासम्भवात् इन्द्रियाणां प्रतिनियत-व्यापारस्वादभिन्नशरीरत्वे कर्मकर्तृत्वं नोपपद्यते, अत एकं पुरुषं सर्वेन्द्रियाश्रयं करवाम इत्यालोच्य एतान् सप्तपुरुषाने कमकुर्वन् । तत्र नाभेरूध्वं द्वो पुरुषी स्थापितवन्तः । नाभेरर्वाग् द्वौ स्थापितवन्तः । एवं मध्ये देहे चत्वारः । द्वौ पुरुषी दक्षिणोत्तरपक्षी सम्पन्नौ । एकः पुरुषः प्रतिष्ठा पुच्छ्मासीत् । एवं शिरोवजितस्यैकस्य पुरुषस्य सप्तभिः पुरुषै रूपं सम्पन्नम् । तेषां पुरुषाणां श्रीभूतो यो रसस्तमूर्ध्वमुपरिभागे समुदितमकार्षुः शिरसि । स एकीभूतः सारोऽस्य शिरोऽभूत् । तस्मान् श्रीसमुद्ह्नेन शिरःशब्दनिष्पत्तिः । यद्वा तस्मिन्निष्पादिते प्रजापति -प्राणः अश्रयत्तस्मात् शिरः । सर्वस्मिन् देहे तेऽश्रयन्त । तस्माद्देहोऽपि शरीर उच्यते । स एव पुरुषः रभवत् । स सप्तभिः पुरुषैनिष्पन्न एकः पुरुषो विराट् प्रजापतिरभूत् । एवं लिङ्गशरीराभिमानिह्रिण्यगर्भकर्तृका ' विराडुत्पत्तिरुक्ता । तस्य विराजोऽग्निरूपतोता । ' स यः स पुरुषः प्रजापतिरभवदयमेव स योऽयमग्निश्चीयते ( श ० ६ | १ | ११५ ) । स चीयमानोऽग्निः सप्तपुरुषसम्मितो भवति । हिरण्मयः शकुनिर्ब्रह्मनाम - ' इति चतुर पक्षित्वेन आत्मनि पुच्छशब्दव्यवहारः । चित्याग्नेः सप्तपुरुषीयपक्षत्वं दशमे वक्ष्यते । आपस्तम्बोऽपि तथैवाह चिन्वीत सप्तविधो वाव पुरुषान् मिमीते पुरुषं दक्षिणे पक्षे पुरुषं पुच्छे पुरुषमुत्तर इति तदुह वै सप्तविधमेव दर्शयितु-प्राकृतोऽग्निः ' ( आप ० श्र ० १६ । १ ७ ) । तस्य विराडात्मकस्य सप्तपुरुष सम्मितस्य चित्याग्नेः शिरो माह - अथ यश्चितेऽग्निनिधीयत इत्यादि । ' अथ यश्चितेऽग्निनिधीयते येवैतेषा सप्तानां पुरुषाणा श्रीर्यो रसस्तमेतदूर्ध्व १७ समुद्हन्ति तदस्यै- ( श ० तच्छिरः । तस्मिन्नेतस्मिन् सर्वे देवाः श्रिताः । अत्र हि सर्वेभ्यो देवेभ्यो जुह्वति सप्तानां तस्माद्वेवैतच्छिरः पुरुषाणां श्रीः ' यश्च ६ । १ । १ । ७ ) । चिते ऐष्टके चितेऽग्नौ । अग्निराहवनीयो निधीयते । या वा एतेषां । रसः, स एवायमग्निरित्यध्याहारः । चित्याग्नेरण्डात्मकत्वाद् निधीयमानस्याग्नेहिरण्यगर्भात्मकत्वमित्यर्थः चोत्पत्तिरुक्ता । शेषं स्पष्टम् । ततश्चयनोपयुक्तायाः सृष्टेराम्नानं तस्यां त्रयीलक्षणस्य ब्रह्मणोऽपामाण्डस्य शुष्कार्द्रभावेन आण्डा ' ' अग्न्यश्वरासभाजानां पशूनामुत्पत्तेः कथनम् । ततः पृथिव्या उत्पत्तिमुक्त्वा तत्सकाशात्, ओषधिः, द्विविधमृत्तिकाः सिकतं वालुकाः, शर्करा अल्पपाषाणाः, अश्मानं स्थूलपाषाणम्, अयः, हिरण्यं सुवर्णम्
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शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० ११ वनस्पतय इत्येतैर्नवभिरिमामाच्छादितवान् । भूमिसृप्रेरनन्तरं प्रजापतिरिदं जगदधिकं भवेदिति कामयित्वा after पृथिवीं मिथुनत्वेन समयोजयत् । वयो संयोगेन अण्डं जातम् । वाय्वन्तरिक्षयोमिथुनाद् आदित्यस्य तद् अभ्यमृशत्, नानात्वेन पृष्टुं भवत्विति त्रिवार मण्डमभिलक्ष्याब्रवीत् । तत्राण्डस्यान्तर्गर्भाद् वायुर्जातः । अथ गर्भोदकं कपाललिप्सरसः कपालानि च पक्षिमरीच्यन्तरिक्षलोकात्मकान्यभूवन् । अथ वाय्वन्तरिक्षयोमिथुनत्वेन सङ्गात् पुनरेकमण्डमुत्पन्नम् । तत आदित्य उत्पन्नः । स एष यशोरूपः । पूर्ववद् गर्भोदकादीनि मेघरश्मि-द्युलोकात्मकानि जातानि । तृतीयपर्याये आदित्यद्यलोकयोमिथुनत्वेन गर्भः समजनि । तं प्रजापती रेतो बिभृहीति तोरूपत्वेन धारयेति गर्भमवसृष्टवान् । अत्रापि गर्भोदककपालतिर सतत्कपालानि नक्षत्रायान्तरदिङ्महादि-गात्मकानि सम्पन्नानि । पुनश्च प्रजापतिरेषु लोकेषु प्रजाः सृजेयमिति विचार्य स्वकीयवाङ्मनसयोमिथुनीभवनेन स्वय-मष्टद्रप्सरूपगर्भवानभवत् । ततोऽष्टाभ्यो व्रप्सेभ्योऽष्टौ वसवः सञ्जाताः । तानष्टवसूनस्यां भूमौ निहितवान् । पुनर्वामनयोर्युग्मेन एकादशरुद्रान् सृष्ट्वा तानन्तरिक्षे स्थापितवान् । द्वादशादित्यांच सृष्ट्वा तान् द्युलोके उपदधाति स्म । विश्वान् देवान् दिक्षु निहितवान् । केपाञ्चिद्रीत्या अग्निपूर्वा पूर्वोक्ता दसुरुद्रादिसृष्टिः । अपरेषां ब्रह्मविदां रीत्या प्रजापतिरेव लोकत्रयं सृष्ट्वा पृथिव्यां प्रतिष्ठितः सन् पक्वान्नरूपा ओषधीः प्राश्य गर्भीभूत्वा स ऊर्ध्वेभ्यः प्राणेभ्यो देवान् सृष्टवान् । अवाचीनेभ्यः प्राणेभ्यो मर्त्याः प्रजा इति । अत्र सर्वोत्पादकस्य प्रजापतेश्चित्याग्निरूपताया आख्यायिकया प्रदर्शनम् । प्रसङ्गाद्धितोपहित शब्दयोरर्थप्रदर्शनं चिति संख्या प्रदर्शन पुरस्सरं सार्थवाद प्रजापतेश्चित्यत्वप्रदर्शनम् चित्योपरि निधीयमानस्याहवनीयस्याग्नेरादित्य-रूपत्वाभिधानम्, इष्टका शब्दनिर्वचनम्, अक्ताक्ष्यमतेन यजुष्मतीष्टका भूमस्त्वेनोपधेयाः, ताण्ड्यमतेन लोकम्पृणेष्टका भूयस्त्वेनोपधेया इति सोपपत्तिकमभिधाय दूपयित्वा सिद्धान्तपक्षनिरूपणम्, इकायाश्चतुः-सक्तित्वरूपगुणस्याभिधानम् । द्वितीयाध्याये पञ्चपश्वालम्भपक्षं विधातुं प्रजापतिवृत्तान्तकथनं पशूनामग्न्यात्म-कत्वादिकथनम् । तृतीये चायनीय मन्त्राणां विनियोगकथनम् । युञ्जानः प्रथमं मन॑स्व॒त्वाय॑ अग्नेज्योर्तिनिचाय्यं पृथिव्या सवि॒ता धियः! अध्याभि॑रत् ॥ १ ॥
मन्त्रार्थ सबको प्रेरणा देने वाले प्रजापति ने आरम्भ में मन को एकाग्र कर अग्नि के तेज को और इसका आदि के ज्ञान को पाँच पशुओं में प्रविष्ट जान कर बुद्धिपूर्वक मानस भूमि में धारण किया ॥ १ ॥
इत आरभ्याष्टादशाध्यायपर्यन्तमग्निचयनाङ्गमन्त्रा निरूप्यन्ते । ' प्रजापतिः प्रथमां चितिमपश्यत् प्रजापतिरेव तस्या आर्षेयम् । देवा द्वितीयां चितिमपश्यन् देवा एव तस्या आर्षेयम् । इन्द्राग्नी च विश्वकर्मा च तृतीयां चितिमपश्यन् त एव तस्या आर्षेयम् । ऋषयश्चतुर्थी चितिमपश्यन् ऋषय एव तस्या आर्षेयम् । परमेष्ठी पञ्चमीं चितिमपश्यत् परमेष्ठ्येव तस्या आर्षेयमिति ' ( श ० ६ २ | ३ | १० ) इति श्रुतेः पञ्चचित्यात्मकाग्निसम्बन्धिमन्त्राणां प्रजापत्यादय ऋषयः, सोऽग्निरेव देवता, विविधानि छन्दांसि तत्तच्चितिषु विनियोगः तत्राग्निपदेन इष्टकाभिः सम्पादितम् अग्न्याधारभूतं विशिष्टं स्थण्डिलमुच्यते । चयनयागं चिकीर्षुः फाल्गुनकृष्णप्रतिपदि पौर्णमासेष्टिं कृत्वा पुरुषाश्वगो: व्यजानालभ्याजेन यागं कृत्वा पञ्चानां शिरांसि घृताक्तानि प्रथमचितावृपधानार्थं क्वचित् संस्थाप्य तेषां कबन्धान् यज्ञशेषं च मृद्युक्ते तडागादिजले प्रास्येत् । उखार्थमिष्टकार्थं च मृदं जलं च तत एवादेयम् । ततः फाल्गुन कृष्णाष्टम्यामुखासम्भरणम् ।
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मन्त्रः १ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता तदर्थमाहवनीय दक्षिणाग्नी उद्धृत्याहवनीयात् प्राक्कृते चतुष्कोणे गर्ते ततस्तडागाद् मृत्पिण्डमानीय भूसमं स्थापयेत् पिण्डाहवनीयान्तराले सच्छिद्रां वल्मीकमृदं निदध्यात् । आहवनीयाद् दक्षिणदेशे अश्वगर्दभाजाः प्राङ्मुखाः प्रागपरा मुञ्जरसनाबद्धाः स्थाप्याः । जाहवनीयोत्तरे वैण्वी उभयतस्तीक्ष्णा कल्माषी हिरण्मयी वात्रिः स्थाप्या ' इति महीधराचार्य: । ' अष्टगृहीतं जुहोति सन्ततमुद्गृह्णन् युञ्जान इति ' ( का ० श्र ० १६।२।७ ) । गार्हपत्ये घृतं संस्कृत्य जुहूं स्रुवं च सम्मृज्य स्रुच्यष्टगृहीतमाज्यमाहवनीये परिस्तरणसमिदाधानपूर्व सन्ततमविच्छेदेन उद्गृह्णन् ऊर्ध्वं गृह्णन् अध्वर्युः ' युञ्जानः ' इत्याद्यष्टमन्त्रः सवितृदेवत्यैर्जुहुयात् । सान्तत्यं चार्यान्ते स्वाहाकारपर्यन्तम् । एतेषां यजुष्ट्वं यजुर्वेदे पाठात् अन्यथा पादबद्धानां यजुष्ट्वानुपपत्तेः । यद्वा यजुःसंहितापठिता मन्त्राश्छत्रिन्यायेन यजुः शब्देनोच्यन्ते । अत्राष्टमो मन्त्रो यजुः, ' यजुरष्टमाभिर्ऋग्भिरेकामाहुति जुहोति ' ( आप ० श्र ० १६ | १ | ४ ) इत्यापस्तम्बोक्तेः । आद्या अनुष्टुप् तृतीयः सप्ताक्षरः । अष्टानां सविता ऋषिः । सवितैव देवतापि । अथ मन्त्रार्थ: - सविता सर्वस्य स्वकार्यार्थ प्रेरक: परमेश्वरः सूर्यः प्रथममादौ अग्निचयनविषये मनः ज्ञानसाधनभूतं चित्तं युञ्जानः समादधानः कर्मविषयं ज्ञानमुत्पादयितुमात्मना संयुक्तं कुर्वन् वा अनन्तरं धियो बुद्धी: प्राणान् वा तत्वाय तनित्वा विस्तार्य, इष्टकाविषयाणि वा ज्ञानानि तनित्वा । तनोतेः क्त्वाप्रत्यये भावपक्षे ' अनिदितां हल उपधायाः विति ' ( पा ० सू ० ६।४।२४ ) इति नलोपे ' क्त्वो यक् ' ( पा ० सू ० ७५ १/४७ ) इति यगागमे रूपम् । यद्वा एकं वाक्यम्, प्रथमं मनोज्ञानसाधनं धियं तत्कार्यं ज्ञानं च । ' तत्वाय ' इति चतुर्थी । छान्दसस्तकारलोपः । तत्वं नामाग्नित्वम् । शतपथे प्रकृतत्वात् तच्छब्देनाग्निः परामृश्यते । तस्य भावस्तत्वम् अग्निभावस्तस्मै अग्निभावासये मनोज्ञानं च नियुञ्जानः । अग्नेनिचीयमानस्य सम्बन्धि ज्योतिः पञ्चसु पशुषु प्रविष्टं तेजो निवाय्य हवा सकलानां कर्मणां साधनभूतं निश्चित्य वा । ' चाय पूजानिशामनयो: ' इति निपातनात् । निशामनं दर्शनम् । पृथिव्याः पशुशरीरान्वितायाश्चिताया अधि उपरि विशिष्टदेशं प्रति आभर | ततः पशुभ्यः सकाशाद् अग्नि तेज आहृतवान् । ' हृग्रहोर्भश्छन्दसि ' ( पा ० सू ० वा ० ८२ ३२ ) इति हकारस्य भकारः । अध्याहृतत्रान् आनीतवान् वाग्निम् इप्रका कृत्वा चितवानग्निम् | श्रुती प्रजापतिः कर्तृत्वेनोपदिष्टः । इदानीन्तना अपि यजमानास्तदनुकृत्य कर्तारो भवन्ति । तत्र ब्राह्मणम् -'ता संततां जुहोति संतता हि ता आप आयन्नथ यः स प्रजापतिस्त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशप स चैरेतद्यजुभिर्जुहोति ' ( श ० ६ ३ ३ १११० ) । आहुतिसाधनात् मन्त्रान् प्रशंसति अथ यः स प्रजापतिस्त्रया विद्यति । पूर्व प्रजापतिरूपः सृवा त्र्योमय्या विद्यया सह ता अपः प्रविष्टवान् । अत इदानीमपि मन्त्राणां त्रयीरूपत्वात् तैहमकरणं प्रजापते बहुधोत्पत्तये विद्यया सहोदकप्रवेशसमानम्, ' सोऽकामयताभ्योऽद्भयो-ऽधि प्रजायेयेति सोऽनया त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशत् ' ( श ० ६ १११ | १० ) इति श्रुतेः । तद्यानि त्रीणि प्रथमानि । इमे ते लोका अथ यच्चतुर्थं यजुस्त्रयी सा विद्या जगती सा भवति जगती सर्वाणि छन्दा सर्वाणि छन्दासि त्रयी विद्याथ यानि चत्वार्युत्तमानि दिशस्तानीमे च वै लोका दिशश्च प्रजापतिरथैषा यी विद्या ' ( ० ६ | ३ | १ | ११ ) । यानि प्रथमानि त्रीणि यजूंषि तानि पृथिव्यन्तरिक्षद्युलोकात्मकानि चतुर्थो मन्त्रस्त्रयीविद्यात्मकः । त्रयोत्वं छन्दोद्वारा प्रतिपादयति जगती सर्वाणि छन्दांसीति । ' युञ्जते मनः ' ( वा ० सं ० १ ९ ४ ) इति चतुर्थो मन्त्रो जगतीछन्दस्कः, जगत्याः सर्वछन्दोमयत्वात् त्रय्याश्च तत्सम्भवात् १. चिन्त्यमिदम् तत्वायेति पदैक्यात्, तत्र पदच्छेदाभावात् । तनोतेस्त्वाप्रत्ययेन तत्वायेति स्पेसिले पुनश्छान्दसतकार-लोगादिकथनं गोरवावहमेव ।
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शुक्लयजुर्वेद संहिता | अ ० ११ चतुर्थस्यास्य त्रयीरूपत्वम् । इमानि चत्वारि यजूंषि प्रागादिमहादिशः, संख्यासाम्यात् । इमे वै लोका इत्यादिना सप्तानां मन्त्राणां प्रजापतिरूपत्वमेकस्यास्त्रयीरूपत्वं च प्रदर्शितम् । ' स जुहोति युञ्जानः प्रथमं मन इति प्रजापतिर्वै खानः स मन एतस्मै कर्मणेऽयुक्त तद्यन्मन एतस्मै कर्मणेऽयुक्त तस्मात् प्रजापतिर्युञ्जान ' ( श ० ६ | ३ | १ | १२ ) | होममनूद्य प्रथमामृचं विधत्ते -- स जुहोतीति । मन्त्रं प्रतिपादमनूद्य व्याचष्टे - प्रजापतिर्वै युञ्जान इति । अत्र सवितृपदेन धात्वर्थं मात्रमाश्रित्य प्रजापतिरुच्यते । स एतस्मै कर्मणेऽयुक्त | ' तत्वाय सविता धिय इति । मनोवै सविता प्राणा धियोऽग्नेर्ज्योतिर्निचाय्येत्यग्नेर्ज्योतिर्दृश् वेत्येतत्पृथिव्या अध्याभरदिति पृथिव्यं ह्येनदध्याभरति ' ( श ० ६ | ३ | १ | १३ )! अग्नेर्ज्योतिः पशुषु दृष्ट्वेत्यादिकं सर्वं पूर्ववद् व्याख्येयम् । स एतान् पञ्च पशूनपश्यत् पुरुषमश्वं गामविमजं यदपश्यत्तस्मादेते पशवः ' ( श ० ६ | २ | ११२ ), स एतान् पञ्च पशून् प्राविशत् ', ' स एतान् पञ्च पशूनपश्यत् ' ( श ० ६ । २ । १ । ३ - ४ ) । तेषु पशुषु तादात्म्येन प्रविष्टमेतमग्नि प्रजापतिरप्यद्राक्षीत् । अध्यात्मपक्षे - धियः सविता प्रेरको भूत्वा साधको मनः अन्तःकरणं युञ्जानः समाहितं कुर्वाणः प्रथमं ब्रह्मात्मतत्त्व प्राप्त पृथिव्याः पृथिव्युपलक्षिताया भूतप्रकृतेः अधि उपरि मनः सङ्कल्परूपा वृत्ती: ( श्वेताश्वतरोप निषद्भाष्ये २1१ ), धियो निश्चयात्मिका वृत्तीच आभरद् धारयेत् । किं कृत्वा? अग्नेः परमेश्वरस्य सम्बन्धि ज्योतिर्देहादिषु जीव रूपेण व्याप्तं प्रकाशं निचाय्य विविच्येति! दयानन्दस्तु - यः सविता ऐश्वर्येच्छुः मनुष्यः प्रथममादौ तत्त्वाय तेषां परमेश्वरादीनां पदार्थानां भावा मनोऽन्तःकरणस्य मननात्मिका वृत्तीधियो धारणात्मिका अन्तःकरणवृत्तीः, युञ्जानः योगाभ्यासं भूगर्भविद्यां च कुर्वाणः, अग्नेः पृथिव्यादिस्याया विद्युतो ज्योतिः प्रकाशं निचाय्य निश्चित्य पृथिव्या अधि उपरि आ समन्ताद् भरद्धरेत् स पदार्थविद्याविच्च जायते ' इति, तदपि यत्किञ्चित् गौणार्थाश्रयणात् । नहि सवितृपद मैश्वर्यच्छं बोधयति, तादृशेऽर्थे तस्याशक्तेः । ऐश्वर्यार्थकस्य सूतेरेश्वर्यवानित्यर्थो भवति, नैश्वर्येच्छुरिति । तत्त्वाय इत्यस्य परमेश्वरादीनां पदार्थानां भावायेत्यर्थोऽप्यनर्थं एव तेषां भावस्य स्वतः सिद्धत्वात् । यत्तु --- ' तस्य भावस्तत्त्वं तस्मै, तादर्थे चतुर्थी, परमेश्वरादीनां तत्त्वज्ञानायेति यावत् ' इति, तदपि तुच्छम्, तत्त्वशब्दस्य तत्त्व-ज्ञानार्थतानुपपत्तेः । कथं पृथिव्या उपरि पृथिव्यादिस्थाया विद्युतः प्रकाशस्य धारणमित्युक्त्या भूगर्भविद्या सिद्धयति? यद्यपि पृथिव्यामग्नौ च नानाशक्तयः सन्ति, सुवर्णादीनां धातूनां तत्र सत्त्वमप्यस्ति तथापि नात्र मन्त्रे तन्निरूपणं दृश्यते ॥ १ ॥
यु॒क्तेन॒ मन॑सा व॒यं दे॒वस्य॑ सवि॒तुः स॒वे । स्व॒या॑य॒ शक्त्यां ॥ २ ॥
मन्त्रार्थ - संसार को अपने - अपने कार्यों में प्रवृत्त कराने वाले सविता देव की आज्ञा में वर्तमान हम एकाग्र मन से स्वर्ग के साधनस्वरूप यज्ञीय कार्यों को सम्पन्न करने में अपनी सामर्थ्यं के अनुसार प्रयत्न करते हैं || २ || गायत्री । सवितुर्देवस्य प्रजापतेः सवे प्रसवे आज्ञायां वर्तमाना वयं यजमाना युक्तेन इन्द्रियार्थेभ्यो निगृहीतेनैकाग्रेण मनसा स्वर्ग्याय स्वर्गाय हितं स्वग्यं तस्मै स्वर्गसाधकाय कर्मणे शक्त्या स्वसामर्थ्येन, यतामह् इति शेषः । युक्तेन कर्मविषये एकाग्रेण मनसा । अन्यत्र प्रसृते मनसि कर्म कर्तुं न शक्यते, अतः कर्मणि युक्तेन मनसा सहिताः सवितुर्देवस्य सर्वे अभ्यनुज्ञाने वर्तमाना वयमनुष्ठातारः, स्वर्याय स्वर्गाय हितमिति स्थिती ' तस्मै हितम् ' ( पा ० सू ० ५ ११५ ) इति हितार्थे यत् प्रत्ययः । अथवा स्वर्याय स्वर्गेयाय स्वर्गे लोके गीयमानायाग्नये वा । शक्त्या कर्मकरणसामर्थ्यन तदर्थं द्रव्यसामर्थ्येन च प्रयत्तनीये इति शेषः । नित्ये कर्मणि यथा शक्नुयात्तथा कुर्यादिति प्रकारवाचिना यथाशब्देन शक्तेर्यथासम्भवतोक्तिः । काम्ये यदा शक्नुया-