वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 101–110
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 101–110
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म ० ४६-४७ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता ६५ हृदयं प्रधानम्, एवमेते रुद्राणां प्रधाना इत्यर्थः । कीदृशेभ्यस्तेभ्यः? किरिकेभ्यः कुर्वन्ति जगद् वृष्ट्यादिद्वारेति किरिकाः, तेभ्यः रुद्रेभ्यो नमः, ' एते हीदं सर्वं कुर्वन्ति ' ( श ० ९ | १ | १ | २३ ) इति श्रुतेः । पुनः कीदृशेभ्यः? विचिन्वत्केभ्यः, विचिन्वति विवेचयन्ति पृथक् पृथक् कुर्वन्ति धर्मिष्ठं पापिष्ठं चेति विचिन्वत्काः, तेभ्योऽग्न्या-दिभ्यो रुद्रेभ्यो नमः । पुनः कीदृशेभ्यः? विक्षिणत्केभ्यः, विविधं क्षिण्वन्ति हिंसन्ति सुकृतदुष्कृतसाक्षिण एते पापं रोगम् अकल्याणं भक्तानामिति विक्षिणत्काः तेभ्योऽग्न्यादिभ्यों रुद्रेभ्यो नमः । पुनः कीदृशेभ्यः? आनि-र्हतेभ्यः । आ समन्ताद् आभिमुख्येन निर्हता निर्गताः सर्गादौ लोकेभ्य इत्यानिर्हताः, तेभ्यो रुद्रावतारेभ्योऽग्निवायु-सूर्येभ्यो नमः । हन्तिर्गत्यर्थः, ' स इमांस्त्रील्लोकानभितताप । तेभ्यस्तप्तेभ्यस्त्रीणि ज्योतींष्यजायन्ताग्निर्योऽयं पवते सूर्य: ' ( श ० ११/५/८/२ ) इति श्रुतेः ॥ ४६ ॥
द्वापे अन्धस॑स्पते॒ दरि॑व॒ नीललोहित । आ॒सय॑ प्र॒जाना॑मे॒षां प॑शूनां मा भर्मारोङ मो चनः किञ्चनाममत् ॥ ४७ ॥
मन्त्रार्थ - पापियों को बुरी गति देनेवालें, सोमरस के स्वामी, किसी प्रकार का परिग्रह न करने वालें, जिसका rosera नील वर्ण का और शेष शरीर ताम्र वर्ण का है ऐसे हे रुद्र! हमारी पुत्रादि प्रजाओं तथा गो आदि पशुओं को भयभीत मत करो, उनको नष्ट मत करो और उनको किसी प्रकार के रोग से रुग्ण भी मत करो ॥ ४७ ॥
इतः प्रारभ्य सप्त ऋच एकरुद्रदेवत्याः । आद्या उपरिष्टाद्वृहती सप्ताष्टदशद्वादशार्णपादा । द्रापे द्रापयति कुत्सितां गतिं प्रापयत्ययथोक्तकारिणो दुष्कृतिन इति द्वापिः । ' द्रा कुत्सायां गतो ' तत्सम्बुद्धी, हे अन्धसस्पते! प्रथमतः चारों के साथ ही ' नमः ' शब्द का प्रयोग होने से चार हो यजु: हैं । आद्य चतुर्दश अक्षर का है, तीन यजुः सात अक्षरों के हैं । वे व्याहृतिसंज्ञक हैं । नमो व इति । देवानां हृदयेभ्यः, रुद्रों के हृदय के समान प्रधानभूत तुम अग्नि, वायु, सूर्य स्वरूपों को प्रणाम । इस रहस्य को शतपथ ने भी बताया है । हृदयानीव हृदयानि । हृदयों के समान ही हृदय हैं । जैसे अंगों में हृदय प्रधान होता है, वैसे ही ये रुद्रों में प्रधान हैं । वे अग्नि, वायु, सूर्य स्वरूप कैसे हैं, जिनको प्रणाम किया जा रहा है? तो उत्तर दे रहे हैं कि ' किरिकेभ्यः ' कुर्वन्ति जगद् वृष्ट्यादिद्वारेति किरिकाः, तेभ्यः किरिकेभ्यः । वृष्टि आदि के द्वारा जो जगत् का निर्माण करते हैं, उन्हें किरिक कहते हैं । उन रुद्रों को प्रणाम है । ' एते हीद ं सर्वं कुर्वन्ति ' ( श ० ब्रा ० ९ ।१।१।२३ ) इस शतपथश्रुति ने भी उसी बात को बनाया है । पुनः कीदृशेभ्यः? विचिन्वत्केभ्यः, विचिन्वन्ति पृथक् पृथक् कुर्वन्ति धर्मिष्ठं पापिष्ठं चेति विचिन्वत्काः तेभ्यः । पुनः कैसे हैं? यह प्रश्न होने पर उत्तर दे रहे हैं कि जो धर्मिष्ठ और पापिष्ठ जनों को पृथक् - पृथक् करते हैं, उन्हें ' विचिन्वत्क ' कहते हैं । उन अग्नि आदि रुद्रों को प्रणाम है । पुनः कीदृशेभ्यः? विक्षिणत्केभ्यः, विविधं क्षिन्ति हिंसन्ति सुकृतदुष्कृतसाक्षिण एते पापं रोगमकल्याणं भक्तानामिति विक्षिणत्काः तेभ्यः । भक्तों के पाप, रोग, अकल्याण को दूर कर देने वाले, सुकृत- दुष्कृत के साक्षी रहने वाले ये अग्नि आदि रुद्र हैं, उनको प्रणाम है । पुनः कीदृशेभ्यः? अनिर्हंतेभ्यः, आसमन्ताद् आभिमुख्येन निर्हता निर्गताः सर्गादौ लोकेभ्य इत्यनिहताः तेभ्यः । ये अग्नि, वायु, सूर्य सगं के आदि में आभिमुख्येन ( मुख्यतया ) इन लोकों से निर्गत हुए हैं, उन अग्नि, वायु, सूर्य स्वरूप रुद्रों को प्रणाम है । ये अग्नि वायु, सूर्यं रुद्र के अवतार है । ' स इमस्त्रींल्लोकान् अभितताप । तेभ्यस्तप्तेभ्यस्त्रीणि ज्योतीष्यजायन्ताग्निर्योऽयं पवते सूर्य: ' इस शतपथश्रुति ने भी यही बताया है ॥ ४६ ॥
यहाँ से आरम्भ करके सात ऋचाएँ एक रुद्रदेवता वाली हैं । ऊपर की आद्या ऋक् बृहती छन्द को है । वह सात, आठ और बारह अक्षरों की है । ' द्रापे ' द्रापयति कुत्सितां गतिं प्रापयत्ययथोक्तकारिणो दुष्कृतिन इति द्वापिः, ' द्रा कुत्सायां गतौ ', तत्सम्बुद्धौ । आज्ञा न मानने वाले दुष्कृतियों को जो कुत्सित गति को प्राप्त कराता है, उसे द्रापि कहते हैं ।
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६६ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० ] १६ श्रुतेः । है दरिद्र हे निष्परिग्रह सोमस्य पते पालक, ' अन्धसस्पत इति सोमस्य पत इत्येतत् ' ( श ० ९ | १ | १ | २४ । ) परमेश्वरस्यैव इति सगुणत्वेऽचिन्त्यानन्त-हे अशेषविशेषातीत, सजातीयविजातीय स्वगतभेदशून्यत्वेन अद्वितीयत्वात् अनन्ताखण्डानन्दबोधवपुष्टमेव, ज्ञानवैराग्याद्यैश्वर्यपूर्ण कल्याणगुणाकरत्वेऽपि निर्गुणस्य तस्यैव केवलस्य सर्वराहित्येन । निर्विशेषब्रह्मा-' मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम् ' ( भा ० पु ० ११ | १३ | ४० ) इति श्रीमद्भागवतवचनात् षोडश्याः सन्निधानेन त्मक कामेश्वर! हे नीललोहित, निराकारत्वेन आकाशवन्नीलत्वेऽपि सिन्दूरारुणविग्रहायाः । नीलश्वासी लोहितश्चेति नीललोहित-लोहित्यम् । अथवा कण्ठे नीलत्वेऽप्यन्यत्र लोहितत्वेन वा लौहित्यम् | १ | १ | २४ ) इति श्रुतेः । नोऽस्माकम्, आसां स्तत्सम्बुद्धी, ' नीललोहितेति नामानि चास्यैतानि रूपाणि च ' ( श ० कुरु ९ । सगुणत्वे संहारदेवतात्वात् त्वत्तोऽभय-प्रजानां पुत्रादीनाम्, एषां पशूनां गवाश्वादीनाम् त्वं मा भेर्भयं मा लुकि रूपम् । मा रोग् भङ्गं मा कार्षीः । ‘ रुजो प्रार्थना युक्तैव । ' बहुलं छन्दसि ' ( पा ० सू ० २।४।७३ ) इति शपो मो मा उ आममद् रुग्णं मा कार्षीत् । यद्वा भङ्गे ' । च पुनः, नोऽस्माकम् किञ्चन किमपि द्विपदचतुष्पदादिकम् ॥
रुग्णं माऽस्तु । ' अम् रोगे ' धातोरमागम आर्षः ॥ ४७
इमा रुद्रायं तवसे कपर्दिने । क्षयद्वीराय
प्रभ॑राम हे म॒तीः ।
यथा शमसंद् द्विपदे चतुष्पदे विश्वं ' पुष्टं ग्रामे ' अ॒स्मिन्न॑नातु रम् ॥ ४८ ॥
करते रहते हैं ), इस मन्त्रार्थ - हम अपनी बुद्धि को रुद्र के स्वाधीन करते हैं ( अर्थात् हम रुद्र का चिन्तन और रोगरहित हों । यह रुद्र शक्ति-कारण हमारे पुत्र- पशुओं को सुख प्राप्त हो, हमारे ग्राम के सम्पूर्ण प्राणी परिपुष्ट मान् है, जटाओं को धारण किये हुए है और शत्रुनाशक है ॥ ४८ ॥
प्रभुरामहे कुत्सदृष्टा जगती । वयमिमा अस्मदीयाः, मतोर्बुद्धीः, याभिर्भवांस्तूयते ताः, १ रुद्राय ) । कथम्भूताय शङ्कराय रुद्राय? प्रहराम हे समर्पयामः, प्रेरयामो वा । ' हृग्रहोर्भश्छन्दसि ' ( पा ० सू ० ८ २ ३२, वा ० सोमपालक! ' अन्धसस्पत इति उसके सम्बोधन में ' द्रापे ' रूप होता है । हे द्रापे! हे अन्धसस्पते! सोमस्य पते पालक! हे. , हे अशेषविशेषातीत! सजातीय - विजातीय-सोमस्य पत इत्येतत् ' इस श्रुति से भी यह अथं ज्ञात होता है । हे दरिद्र, हे निष्परिग्रह - ज्ञान - वैराग्यादि ऐश्वयंपूर्ण कल्याण-स्वगतभेदशून्य होने से तू अद्वितीय है । परमेश्वर के ही सगुण होने पर अचिन्त्य अखण्ड अनन्त - आनन्दबोध - शरीरत्व ही है, क्योंकि गुणाकर होने पर भी उसी निर्गुण केवल का सर्वसाहित्य होने से अनन्त - ब्रह्मात्मक कामेश्वर! हे नीललोहित! ' मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम् ' ऐसा भागवत का वचन है । हे निर्विशेष से आपमें लौहित्य भी निराकार होने से आकाश के समान नील रहने पर भी सिन्दूरारुण विग्रहवती षोडशो नीलश्चासौ के सन्निधान लोहितश्चेति नीललोहितः, है । अथवा कण्ठ में नीलता होने पर भी अन्यत्र लौहित्य रहने से आपमें लौहित्व है । ' तत्सम्बुद्धी हे नीललोहित! ' नीललोहितेति नामानि चास्यैतानि रूपाणि च ' यह श्रुति कह रही है ॥ हमारी इन नोऽस्माकम्, आसां प्रजानां पुत्रादीनाम् एषां पशूनां गवाश्वादीनाम् त्वं मा भेः तुम भयं संहार मा कुरु के भी देवता हो, पुत्रादि इन गाय अश्वरूप पशु आदि प्रजाओं को भय मत होने दो । तुम्हारे सगुण होने शप् का पर लुक् होने पर यह रूप है । अतः तुम्हारी दोनों प्रकार से प्रार्थना करना उचित हो है । ' बहुलं छन्दसि ' सूत्र से षष्ठी विभक्तियाँ हैं । पुनः मा रोक्, ' रुजो भङ्गे ', प्रजा - पशु आदि का नाश न होने दो । कर्म होने के दो अर्थ , में अथवा दोनों वह रुग्ण न होने पावे । हमारी जो भी द्विपाद - चतुष्पाद प्रजा है, उसे ' मा उ आममत् ', रोगग्रस्त मत ' अम् रोगे ' धातु से लङ् लकार में अमागम आषं है ॥ ४७ ॥
, याभिर्भवान् इस कण्डिका के द्रष्टा ऋषि ' कुत्स ' हैं, छन्द ' जगती ' है । वयमिमा अस्मदीयाः को, मतीः हम रुद्र बुद्धीः के लिये समर्पित स्तूयते ताः, हमलोगों को जो बुद्धियाँ हैं, जिनसे आपकी स्तुति की जाती है, उन बुद्धियों
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मं ० ४८-४९ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता ६७ तबसे महते बलवते वा, उभयत्र तवः, तवस इति शब्दपाठात् । कर्पादने जटिलाय जटाजूटधारिणे । क्षयद्वीराय क्षयन्तो निवसन्तो वीराः शूरा यत्रासौ क्षयद्वीरस्तस्मै, यमाश्रित्य वीराः शूराश्च वीर्यं शौर्यं च लभन्ते तस्मै, अनन्तशौर्य वीर्य पूर्णाय भगवते रुद्राय नमः । अथवा क्षयन्ति नश्यन्ति वा वीरास्त्रिपुरान्धकादयो यस्मात् स क्षय-द्वीरः शत्रुसंहारको भगवान्, तस्मै रुद्राय नमः । द्विपदे द्वौ पादौ यस्यासी द्विपात् तस्मै पुत्रपौत्रादये चतुष्पदे गवादिपशवे । यद्वा द्विपदे चतुष्पदे इति सप्तम्यो । पुत्रादिविषये गवादिविषये वा यथा येन प्रकारेण शं सुखम् असद् भवति, अस्मिन् ग्रामे वासस्थाने विश्वं सर्वं प्राणिजातं पुष्टं समृद्धम् अनातुरं निरुपद्रवं स्वस्थं च यथा असद् भवति, तथाभिप्रायेण स्वमतीः शिवाय समर्पयामः, तदीयस्मरणचिन्तनादिभक्तिपरायणा भवामः ॥ ४८ ॥
या ते रुद्र शि॒वा त॒नूः शि॒वा वि॒श्वाहा॑ भेष॒जी ।
शिवा ह॒तस्य॑ भेष॒जी तया नो मृड जीवसे ॥ ४ ९ ॥
मन्त्रार्थ हे द्र! तुम्हारा शरीर उत्तम है, यह सभी समय में कल्याणप्रद है, व्याधियों को नष्ट करने वाला भेषज ( औषधि ) रूप है, अतः हम लोगों को दीर्घ आयु देकर सुखी करो ॥ ४६ ॥
इयमनुष्टुप् । हे रुद्र, या ते तव ईदृशी मङ्गलमयी तनूः शरीरम् तया तन्वा नोऽस्मान् जीवसे जीवितुं सुख । कीदृशी तनूः? शिवा शान्ता अघोरा सुखमयी विश्वाहा विश्वानि च तान्यहानि च विश्वाहा | ' कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे ' ( पा ० सू ० २/३/५ ) इति द्वितीया, तस्था आकारः । सर्वेष्वहस्तु सर्वदा शिवा कल्याण-Sarfour भेषजी औषरूपा संसारव्याधिनिवर्तिका दिव्यौषधरूपा, रुतस्य शारीरव्याधेर्निवर्तिका, शिवा समी-करते हैं, अथवा प्रेरित करते हैं, अर्थात् रुद्र का स्मरण करते हैं । किस प्रकार के रुद्र को हम स्मरण करते हैं? ' तवसे ' महते बलवते वा, अर्थात् महान् अथवा बलवान् रुद्र को हम स्मरण या समर्पण करते हैं । दोनों जगह ' तवः तवसः ' शब्द का पाठ है । कपर्दिने जटिलाय जटाजूटधारिणे, अर्थात् जटाजूट धारण करने वाले । ' क्षयद्वीराय ' क्षयन्तो निवसन्तो वीराः शूरा यत्र असौ क्षयद्वीरः तस्मै । अर्थात् जिसका आश्रय करके शूर लोग वीर्यं और शौर्य को प्राप्त करते हैं, उस अनन्त शोयं • वीर्यपूर्ण भगवान् रुद्र के लिये प्रणाम है । अथवा क्षयन्ति नश्यन्ति वीरास्त्रिपुरान्यकादयो यस्मात् स क्षयद्वीरः, अर्थात् उस शत्रुसंहारक भगवान् रुद्र को प्रणाम है । ' द्विपदे ' द्वौ पादौ यस्याऽसौ द्विपात् तस्मै पुत्र - पौत्रादये चतुष्पदे गवादिपशवे । अथवा ' द्विपदे चतुष्पदे ' ये दोनों पद सप्तम्यन्त भी हो सकते हैं । तब अर्थ होगा कि पुत्रादि अथवा गवादि के विषय में जिस प्रकार से सुख प्राप्त हो, इस निवास स्थान में सम्पूर्ण प्राणिवर्ग समृद्ध और निरुपद्रव जैसे हो सके, उस अभिप्राय से हम अपनी बुद्धि को शिव के लिये समर्पित कर रहे हैं, अर्थात् उसके स्मरण - चिन्तन स्वरूप भक्ति में हम तत्पर हो रहे हैं ॥ ४८ ॥
यह कण्डिका अनुष्टुप् छन्द की है । हे रुद्र, या ते तव ईदृशी मङ्गलमयो तनूः शरीरम् तया तन्वा नः अस्मान् जीवसे जीवितुं मृड सुखय । अर्थात् हे रुद्र! तुम्हारा जो मङ्गलमय शरीर है, उससे हमें जीवित रहने के लिये सुखी बनाओ । कीदृशी तनूः? तुम्हारा शरीर कैसा है? शिवा शान्ता अघोरा सुखमयी, ' विश्वाहा ' विश्वानि च तान्यहानि च विश्वाहा, अर्थात् तुम्हारा शरीर शान्त है, सुखमय है और विश्वाहा यानी सभी दिन ( सर्वदा ) वह एकरूप है । वह तुम्हारी कल्याणकारिणी तनू साक्षात् भेषजी है, यानी औषधरूपा है, संसारव्याधि की निर्वार्तिका है, दिव्य औषधि स्वरूपा है । ' रुतस्य ' शारीर व्याधि की निर्वार्तिका है, शिवा यानी समीचीन औषधि है । यद्वा शिवारुतस्य शृगालोफेत्कृतस्य शब्दस्य भेषजी,
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६८ शुक्ल यजुर्वेद संहिता L अपशकुनस्य अपहन्त्री । चीना निवर्तकौषधिः । यद्वा शिवारुतस्य शृगालीफेत्कृतस्य भेषजी तदुपलक्षित ९ ॥ सर्वविधस्य ईदृश्या लोकोत्तरया अमङ्गलघ्न्या तन्वा नोऽस्मान् मृडयेत्यर्थः ॥ ४ परि॑ नो रु॒द्रस्य॑ हे तिर्वृणक्तु परि ' त्वे॒षस्य दुर्मतिर॑घा॒योः ' ॥। अव॑ स्थि॒रा म॒घव॑द्र्यस्तनुष्व॒ मोढ्व॑स्त॒काय॒ तन॑याय मृड ॥ ५० हम लोगों को वर्जित कर दे, अर्थात् मन्त्रार्थ - हे रुद्र! तुम्हारा आयुध और क्रुद्ध हुए द्वेषी पुरुषों वस्तुओं की दुर्बुद्धि की वृष्टि करनेवाले हे रुद्र! तुम अपने उनसे हम लोगों को किसी प्रकार की पीडा न हो पावे । अभिलषित दो और उनके पुत्र - पौत्रों को सुखी बनाओ || ५० ॥ धनुष को प्रत्यंचा से रहित करके यजमान पुरुषों के भय को दूर कर वर्जयतु । अस्मान् मा हन्त्वि-इयं त्रिष्टुप् । रुद्रस्य शिवस्य हेतिरायुधम्, नोऽस्मान् परिवृणक्तु तस्य क्रुद्धस्य परितो अघायोः परानिष्टेच्छोः, अघ त्यर्थः । त्वेषस्य त्वेषति दीप्यते, क्रोधेनेति त्वेषः, पचाद्यच् क्यच् ' ( पा ० सू ० ३ ( १८ ) इति सूत्रे छन्दसि परेच्छा-परस्येच्छतीति अघायति, अघायतीत्यघायुः, ' सुप आत्मनः क्यचि कृते ' क्यचि च ' ( पा ० सू ० यामपि क्यच् भवतीति व्याख्येयम् । व्याख्यानं पुनर्यदयमाचार्योऽघशब्दात् सू ० ७ । ४ । ३३ ) इत्यधशब्दस्यात्वं शास्ति । एतदेव ज्ञापयति ७ | ४ | ३३ ) इति प्राप्तत्वबाधनार्थम् ' अश्वाघस्यात् ' ( पा ० । ' क्याच्छन्दसि ' ( पा ० सू ० ३।२।१७० ) छन्दसि पन्छायामपि क्यच् भवतीति । नहि कश्चनाप्यात्मनोऽघमिच्छति परिवर्जयतु । हे मीढ्वः, मेहति वर्षांत कामानिति इत्युः । तस्य द्रोग्धुर्दुर्मतिर्द्रोहबुद्धिः " अस्मान् परिवृणक्तु दृढानि, अर्थाद् धनूंषि त्वमवतनुष्व अवतारयः, मीढ्वान्, तत्सम्बुद्धी कामाभिवर्षुक । स्थिरा स्थिराणि ' ( निघ ० २ १० | २ ) । मघं हविर्लक्षणं मौर्वी रहितानि कुर्वित्यर्थः । किमर्थमिति चेत्? मघवद्भयः, ' मघमिति भयनिवृत्तय धननाम इति यावत् । किञ्च, तोकाय पुत्राय धनं विद्यते येषां ते मघवन्तो यजमानाः तेभ्यः । यजमानानां पूरयति कुलमिति तोकम् । तुः सौत्रो तनयाय पौत्राय च मृड पुत्र पौत्रं च सुखय । कर्मणि चतुर्थ्यो क्यन् । तौतीति ' ( उ ० ४ / ९९ ) इति रूपसिद्धिः || ५० ॥ धातुहिंसावृत्तिपूर्तिषु । तनोतीति तनयः । ' बलिमतितनिभ्यः रूपी शब्द की यानी सर्वविध अपशकुनों को निवारक तदुपलक्षितसर्वविधस्य अपशकुनस्य अपहन्त्री । अथवा शृगाली के अपशकुन को विनाशक अपनी तनू से हमें सुखी बना दो ॥। ४ ९ ॥ तुम्हारी मंगलमयी तनू है । इस प्रकार को अलौकिक और अमङ्गल परिवृणक्तु परितो वर्जयतु । शिव यह कण्डिका त्रिष्टुप् छन्द की है । रुद्रस्य शिवस्य हेतिर् आयुचम् नः अस्मान् तस्य क्रुद्धस्य, अघायोः पराऽनिष्टेच्छोः, का आयुध हमारा हनन न करे । ' स्वेषस्य ' त्वेषति दीप्यते क्रोधेनेति त्वेषः ' पचाद्यच् इत्यत्र परेच्छायामपि वाच्यमिति क्यच् । ' क्यचि अवं पापं परस्य इच्छतीत्यघायति, अचायतीत्यधायुः, ' सुप आत्मनः क्यच् हुआ है । खेषस्य क्रुद्धस्य अघायोः च ' इतीत्वे प्राप्ते ' अश्वाघस्थात् ' सूत्रेण आकार:, ' क्याच्छन्दसि ' सूत्र से ' उ ' वाले प्रत्यय क्रुद्ध पुरुष की दुष्टबुद्धि हमारा अनिष्ट द्रोग्धुः दुर्मतिः दुष्टमतिः द्रोहबुद्धिश्व अस्मान् परिवृणक्तु अर्थात् द्रोह करने मेहति वर्षति कामानिति मीढ्वान्, तत्सम्बुद्धौ न करने पावे, यानी हमको त्याग दे, अर्थात् हमसे दूर रहे । हे मीढ्वः! स्थिराणि दृढानि, अर्थात् धनूंषि, त्वम् हे मीढ्वः, कामनाओं ( फलों ) की वर्षा करने वाले! अर्थात् कामाभिवर्षक धनुषों! को स्थिरा प्रत्यचारहित कर दो । किमर्थमिति चेत् अवतनुष्व अवतारय मौर्वीरहितानि कुर्वित्यर्थः, अर्थात् अपते सुदृढ घनं विद्यते येषां ते मघवन्तो यजमानाः तेभ्यः । किस लिये धनुषों को प्रत्यञ्चारहित करें? तो ' मघवद्भय ' मघं हविर्लक्षणं ' । के भय का निवारण करने के लिये । ' मघमिति धननाम हविलक्षण धन को अपने पास सुरक्षित रखने वाले यजमानों सुखी कर दो । दोनों चतुर्थी विभक्तियां कर्म के किन, तोकाय पुत्राय तनयाय पौत्राय च मृड । अर्थात् हमारे पुत्र पौत्रों को है, उसे ' तोक ' कहते है । ' तुः सौत्रो धातुः ' तनोतीवि अर्थ में हैं । तौतीति पूरयति कुलमिति तोकम्, जो कुल को पूर्ण बनाता तनयः ॥ ५० ॥
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मं ० ५१-५२ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता ६ ९ मोदु॑ष्टम् शिव॑तम शि॒वो न॑ः सुमना भव । परमे वृक्ष आयुधं नि॒धाय॑ कृ॒त्त॒ वन आच॑र॒ पिनाकं विश्र॒दाग॑हि ॥ ५१ ॥
मन्त्रार्थ - - अभीष्ट फल और कल्याणों की अत्यधिक वृष्टि करनेवाले हे रुद्र! तुम हम पर प्रसन्न रहो, aur far आदि आयुधों को कहीं दूर स्थित वृक्षों पर रख दो, गजचर्म का परिधान करके तप करो और केबल शौभा के लिये धनुष मात्र लेकर आओ ॥ ५६ ॥
इयमेकोना यवमध्या त्रिष्टुप् । तृतीय एकादशार्णः । चत्वारोऽन्येऽष्टार्णाः । पञ्चपादा | हे मीढुष्टम, अतिशयेन मीढ्वान् मीढुष्टतमः, अतिशयेन अभीष्टकामवर्षुकः, तत्सम्बुद्धौ । शिवतम अतिशयेन शिवः कल्याणकर्ता शिवतमः, तत्सम्बुद्धौ परमकल्याणमय । नोऽस्मान् प्रति शिवः शान्तः सुमना हृष्ट चित्तश्च भव । किञ्च परमे दूरस्थे उन्नते वा वृक्षे वटादौ आयुधं त्रिशूलादिकं निधाय संस्थाप्य कृत्ति चर्म वसानः परिदधानः, आचर आगच्छ, तपश्चरणं कुर्विति वा । आगच्छन्नपि पिनाकं स्वीयमजगवं धनुः, बिभ्रद् धारयन् आगहि आगच्छ । ज्याशरहीनं धनुर्मा शोभार्थं धारयन्नागच्छेत्यर्थः ॥ ५१ ॥
विकिरिद्र विलोहित नम॑स्ते अस्तु भगवः ।
यास्ते ' सहस्रं हे तयोऽन्यमस्मन्निर्वपन्तु ताः ॥ ५२ ॥
मन्त्रार्थ - - विविध प्रकार के उपद्रवों का विनाश करने वाले तथा शुद्ध स्वरूप वाले हे भगवन् रुद्र! तुम्हें हमारा प्रणाम है, तुम्हारे जो असंख्य आयुध हैं, वे हमसे अतिरिक्त दूसरों पर जाकर गिरें ॥ ५२ ॥
द्वे अनुष्टुभौ । हे विकिरिद्र, विविधं यथा स्यात्तथा किरीन् उपद्रवान् द्रावयति नाशयतीति विकिरिद्रः, तत्सम्बुद्धी, हे सर्वोपद्रवनाशक, किरति विक्षिपति वैकल्यमापादपति शरीरे मनसि वेति किरि: उपद्रवः । ' कुशपकुटिभिदिछिदिभ्यश्च ' ( उ ० ४ १४४ ) इति इप्रत्यये साधुः । बहुवचने किरयः । अथवा विविधं किरन् बाणान् द्रावयति शत्रूनिति विकिरिद्रः, तत्सम्बुद्धौ । हे विलोहित, विगतं विनष्टं लोहितं रजोमयं कल्मषं यस्मादस यह कण्डिका एकोना यवमध्या त्रिष्टुप् है । तृतीय पाद एकादश अक्षर का है, अन्य चार आठ अक्षर के हैं । पाँच पाद हैं । हे मीढुष्टम! अतिशयेन मीढ्वान् मीढुष्टतमः । अत्यधिक अभीष्ट फलों की वर्षा करने वाला मीढुष्टतम कहलाता है, उसका संबोधन में रूप ' मीदुष्टतम ' है । ' शिवतम ' अतिशयेन शिवः कल्याणकर्ता शिवतमः, इसका संबोधन में रूप ' शिवतम ' है । अत्यन्तं कल्याणकर्तः ' नः ' हम लोगों के प्रति ' शिव: ' शान्त और ' सुमनाः ' प्रसन्नचित्त ' भव ' हो जाओ । किञ्च ' परमे ' दूर स्थित अथवा ऊँचे वट आदि वृक्ष पर ' आयुधं ' अपने त्रिशूलादि आयुध को ' निधाय ' रखकर ' कृत्तिम् ' चर्म को ' वसानः ' धारण किये हुए ' आचर ' आओ, अथवा तपश्चरण करो । आते हुए भी ' पिनाकम् ' अपने अजगव धनुष को धारण करते हुए ' आगहि ' आओ । अर्थात् प्रत्यञ्चा = शर से रहित केवल धनुष को शोभार्थं धारण करके आओ ॥ ५१ ॥
इस डिका में दो अनुष्टुप हैं । हे विकिरिद्र! विविधं यथा स्यात्तथा किरि घाताद्युपद्रवं द्रावयति नाशयति विकिरिद्रः, तत्सम्बुद्धी हे विकिरिद्र! हे सर्व उपद्रवों के विनाशक! किरति विक्षिपति वैकल्यमापादयति शरीरे मनसि वेति किरिः उपद्रवः | शरीर में अथवा मन में विकलता जिससे प्राप्त होती है, उसे ' किरि ' कहते हैं । अथवा विविधं किरन् बाणान् द्रावयति शत्रु निति विकिरिद्रः, तत्सम्बुद्धौ हे विकिरिद्र! विविध बाणों को छोड़ते हुए जो शत्रुओं को नष्ट करता है, उसे ' विकरिद्र ' कहते हैं । उसके संबोधन में ' विकिरिद्र ' रूप बनता है । हे विलोहित! विगतं विनष्टं लोहितं रजोमयं
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७० शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० १६ ' ( पा ० सू ० ८ | ३ | १ ) इति विलोहितः, तत्सम्बुद्धौ शुद्धसच्चिदानन्द । हे भगवः, भगवन् ' मतुवसोरुः सम्बुद्धौ आशिषं छन्दसि प्रार्थयते - हे रुद्र, तव याः नस्य रेफस्तस्य विसर्गः । ते तुभ्यं नमः प्रह्वीभावः अस्तु भवतु । एवमभिष्टुत्य निवपन्तु घ्नन्तु ॥ ५२ ॥
सहस्रं तयोऽसंख्यातान्यायुधानि ता हेतयोऽस्मदन्यमस्मद्वयतिरिक्तं सहस्राणि
सहस्रशो ब्राह्वोस्त॑व हे तयः ।
तासा॒मोश॑नो भगवः पराचीना मुखा कृधि ॥ ५३ ॥
, उनके अग्र भागों मन्त्रार्थ - जगत् के स्वामी हे रुद्र! तुम्हारे हाथों में हजारों प्रकार के जो असंख्य आयुध हैं ( मुखों ) को हमारी विरुद्ध दिशाओं की ओर कर दो, अर्थात् हम पर आयुधों का प्रयोग मत करो ॥ ५३ ॥
हे भगवः, हे भगवन्, षड्गुणैश्वर्यसम्पन्न, तव बाह्वोर्भुजयोर्याः सहस्राणि, सहस्रशोऽसंख्यातानि हेतयः सन्ति, तासां सहस्राणि, ' संख्यैकवचनाच्च वीप्सायाम् ' ( पा ० सू ० ५ | ४ | ४३ ) इति शस् अनन्तत्वप्रतिपादनार्थम् हेतीनां मुखा मुखानि शल्यानि पराचीना हेतीनां सहस्रसंख्याकानि धनुः शूलखङ्गादिभेदेन सहस्रसंख्याकत्वम् । तासां, कर्तुमकर्तुमन्यथाकत समर्थ अस्मत्तः पराङ्मुखानि त्वं कुधि कुरु यतो भवानीशानः सर्वं कर्तुमीष्टे इत्यर्थः ॥ ५३ ॥
अस॑ङ्ख्याता स॒हस्र॑ण॒ ये रु॒द्रा अधि॒ भूम्य॑म् ।
तेषां सहस्रयोजनेऽव धन्यानि तन्मसि ॥ ५४ ॥
I मन्त्रार्थ -- पृथ्वी पर जो असंख्य रुद्र हजारों रीति से निवास करते हैं, उनके असंख्प आयुधों को हम लोग हजारों कोसों के पार जो मार्ग है, उस पर ले जाकर डाल देते हैं ॥ ५४ ॥
असंख्यातानि बहुरुद्रदेवत्या दशानुष्टुभोऽवतानसंज्ञाः । पृथिवीस्थानां तेषां रुद्राणां नमस्कारः सहस्रं । असंख्याता योजनानि यस्मिन् स सहस्राणि अनन्ता ये रुद्रा भूम्यां पृथिव्या उपरि स्थिताः तेषां रुद्राणां सहस्रयोजने, अवतारयामः, सहस्रयोजनस्तस्मिन् अध्वन्यवस्थितानाम्, हविषा धन्वानि धनूंषि, अवतन्मसि अवतन्मः यानी रजोमय कल्मष जिससे, उसे कल्मषं यस्माद् असौ विलोहितः । तत्सम्बुद्धौ ' हे विलोहित ' । नष्ट हो गया है लोहित,! हे भगवः! हे भगवन्! ' विलोहित ' कहते हैं, उसके संबोधन में ' हे विलोहित ' रूप बना है । अर्थात् शुद्ध सच्चिदानन्द अभ्यर्थना की है । हे रुद्र! तुम्हारी जो तुम्हें हमारा प्रणाम हो । इस प्रकार भगवान् की स्तुति करके आशीर्वाद हों, उन प्राप्ति पर गिरें की, अर्थात् उनका नाश करें ॥ ५२ ॥
हजारों हेतियाँ यानी ' आयुध ' हैं, वे हमसे भिन्न जो तुम्हारे अभक्त आयुधों के हे भगवः! हे भगवन् षड्गुणैश्वर्यसम्पन्न! तुम्हारे हाथों में हजारों जो हेतियां यानी पर ' सहस्र आयुष ' हैं शब्द , उन अनन्तत्व के जो शल्य हैं, उन्हें हमसे पराङ्मुख करो, क्योंकि तुम कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ हो । यहाँ प्रतिपादनार्थ है ॥ ५३ ॥
पर स्थित यह कण्डिका बहुरुद्रदेवत्या है । अनुष्टुप् छन्द की इन दस कण्डिकाओं की अवतान संज्ञा है । पृथिवी भूम्यां पृथिव्या उपरि स्थिताः तेषां रुद्राणां उन रुद्रों को प्रणाम है | असंख्याताः असंख्यातानि सहस्राणि अनन्ता ये रुद्रा धन्वानि धनूंषि, अवतन्मसि अवतन्मः सहस्रयोजने सहस्रं योजनानि यस्मिन् सहस्रयोजनः तस्मिन् अध्वनि स्थितानां हविषा हैं, ऐसे हजारों जो रुद्र हैं, वे भूमि पर स्थित अवतारयामः, अवज्यानि कृत्वा अस्मत्तो दूरं क्षिपाम इत्यर्थः । जिनका अन्त नहीं को हम उतार रहे हैं, अर्थात् धनुषों को हैं, उन रुद्रों के लिये जो सहस्र योजन के मार्ग पर स्थित हैं, हवि देकर उनके धनुषों
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म ० ५४-५७ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता st कृत्वा अस्मत्तो दूरं क्षिपाम इत्यर्थः । भवत्या परमेश्वरमनुकूल्य तद्द्वारेव तेषां धनूंष्यपज्यानि कुर्म इत्यर्थः ॥ ५४ ॥
अस्मिन् मह त्यर्ण वेऽन्तरिक्षे भवा अधि । ते सहस्त्रयोज॒नेऽव॒ धन्व॑नि तन्मसि ॥ ५५ ॥
मन्त्रार्थं - महान् मेघमण्डल से भरे हुए आकाश में जो रुद्र रहते हैं, उनके असंख्य धनुषों को हम लोग हजारों कोसों के पार जो मार्ग है, उस पर ले जाकर डाल देते हैं ॥ ५५ ॥
अन्तरिक्षस्थानां तेषां रुद्राणां नमस्कारः । अस्मिन् अन्तरिक्षरूपे महति विशाले अर्णवे अर्णांसि जलानि विद्यन्ते यत्र तद् अर्णवम्, मेघाधारत्वादन्तरिक्षमर्णव उच्यते । ' अर्णसो लोपश्च ' ( पा ० सू ० ५२ १० ९, वा ० २ ) इति वप्रत्ययेऽन्त्यलोपे च रूपसिद्धिः । तस्मिन् अधिश्रित्य ये भवा रुद्राः स्थिताः, तेषां धन्वानि धनूंषि, अवतन्मसि अवतारयामः ॥ ५५ ॥
नीलग्रीवाः शितिकण्ठा दिवं रुद्रा उपथिताः । तेषां सहस्त्रयोजनेऽव॒ धन्व॑नि तन्मसि ॥ ५६ ॥
मन्त्रार्थं - जिनका कण्ठ कुछ हिस्से में नील वर्ण है और कुछ हिस्से में श्वेत वर्ण है, द्युलोक में निवास करने बाउन रुद्रों के असंख्य धनुषों को हम लोग हजारों कोस दूर के मार्ग पर ले जाकर डाल देते हैं ॥ ५६ ॥
द्युस्थानां तेषां रुद्राणां नमस्कारः । ये रुद्रा दिवं द्युलोकमुपचिताः स्वर्गस्थाः । कीदृशाः? नीलग्रीवाः । कृष्णवचनो नीलशब्दः । शितिशब्दः श्वेतवचनः । नीला ग्रीवा येषां ते । शितिः कण्ठो येषां ते । विषग्रासात् कियान् कण्ठभागः कृष्णः कियानपि श्वेत इत्यर्थः । तेषामित्यादीनां व्याख्यानं पूर्ववत् ॥ ५६ ॥
नोल प्रोवाः शितिकण्ठाः श॒र्वा अ॒धः क्षमाच॒राः । ते सहत्रयोजनेव • धन्वानि तन्मसि ॥ ५७ ॥
प्रत्यंचारहित करके अपने से दूर फिकवा देते हैं । अभिप्राय यह है कि उन रुद्रों की भक्तिपूर्वक उपासना करके उस भक्ति के द्वारा ही उनके धनुषों को हम प्रत्यंचारहित कर देते हैं ॥ ५४ ॥
अन्तरिक्ष में स्थित रहनेवाले उन रुद्रों को प्रणाम है । अस्मिन् अन्तरिक्षे महति विशाले अर्णवे असि जलानि विद्यन्ते यत्र तद् अर्णवम्, मेघाधारत्वाद् अन्तरिक्षमणव उच्यते । इस विशाल अन्तरिक्ष रूप अर्णव में उसके आश्रित होकर जो रुद्र स्थित रहते हैं, उनके धनुषों को हम उतरवा देते हैं । मेघों का आधार होने से उस अन्तरिक्ष में जल रहता है, इसलिये अन्तरिक्ष को अर्णव शब्द से कहा जाता है ॥ ५५ ॥
द्युलोक में स्थित रहने वाले उन रुद्रों को प्रणाम है । जो रुद्र स्वर्ग में स्थित हैं, उनकी ग्रीवा नील है और उनका कण्ठ श्वेत है, क्योंकि विषपान करने से कण्ठ का भाग कृष्ण हैं और उसी का कुछ भाग श्वेत है । अग्रिम अंश की व्याख्या पूर्ववत् ही है । ' नील ' शब्द कृष्ण वर्ण का वाचक है और ' शिति ' शब्द श्वेत वर्ण का वाचक है ॥ ५६ ॥
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७२ शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० १६ अधोभाग में स्थित मन्त्रार्थ - कुछ भाग में नील वर्ण और कुछ भाग में शुक्ल वर्ण के कण्ठ वाले भूमि के पर ले जाकर डाल पाताल लोक में निवास करने वाले रुद्रों के असंख्य धनुषों को हम लोग हजारों कोस दूर मार्ग देते हैं ॥ ५७ ॥
पातालस्थानां तेषां रुद्राणां नमस्कारः । अधः अधोभागे ये शर्वा रुद्राः क्षमाचराः क्षमाया भुवोऽधोभागे
चरन्ति गच्छन्तीति, पाताले वर्तमाना इति यावत् । शेषं पूर्ववद् व्याख्येयम् ॥ ५७ ॥
ये वृक्षेषु ' शब्पञ्जरा नीलग्रीवा विलो ' हिताः ।
तेषा सहस्रयोजने व धन्वानि तन्मसि ॥ ५८ ॥
मन्त्रार्थ -- बाल तृण के समान हरित वर्ण के तथा कुछ भाग में नील वर्ण एवं कुछ भाग में शुक्ल वर्ण के कण्ठ शरीर रहने से उन शरीरों रक्त और मांस नहीं रहता ) हैं, वे अश्वत्थ आदि के वृक्षों वाले, जो रुधिररहित रुद्र ( तेजोमय जाकर डाल देते हैं ॥ ५८ ॥
पर रहते हैं । उन रुद्रों के धनुषों को हम लोग हजारों कोसों के पार किसी मार्ग पर ले । ये रुद्रा वाश्वत्थादिवृक्षेषु स्थिताः । कीदृशाः? शष्पिञ्जराः शष्पं बालतृणं विशेषेण तद्वत् रक्तवर्णाः पिञ्जरा । हरितवर्णाः यद्वा विगतं पकारलोपश्छान्दसः । नीलग्रीवाः केचन कण्ठे नोलवर्णाः, तथा केचन विरोहिता इति यावत् । शेषं लोहितं रक्तं रक्तोपलक्षितं मांसमज्जास्त्र्यादि भौतिकं येषां ते अप्राकृतचिन्मयदिव्यविग्रहा पूर्ववद् व्याख्येयम् ॥ ५८ ॥
यो भूतानामधिपतयो विशिखासः तेषा॑भिः॒ सहस्रयोजनेऽव॒ धन्व॑नि
कर्पादनः ।
तन्मसि ॥ ५ ९ ॥
हैं, मन्त्रार्थ - जिनके शिर पर केश नहीं हैं जो जटाजूट धारण किये हैं और पिशाचों के जो अधिपति उन रुद्रों के धनुषों को हम लोग हजारों कोसों के पार किसी मार्ग पर ले जाकर डाल देते हैं ॥ ५६ ॥
ये भूतानां प्राणिनामधिपतयः स्वामिनः पालका रुद्राः, यद्वा भूतानां भूतप्रेतपिशाचादीनाम् , मुण्डितमुण्डा अन्तर्धानादि- इति शक्तिमतां देवविशेषाणामधिपतयः पालका रुद्राः तेषु केचिद् विशिखासः शिखाकेशादिहीनाः पूर्ववद् व्याख्येयम् ॥ ५ ९ ॥ यावत् । केचिच्च कर्पादनो जटाजूटधारिणः तेषां धन्वानि धनूंषि अवतारयाम इति ) हैं, वे ' क्षमाचराः ' अर्थात् पाताल लोक में रहने वाले उन रुद्रों को प्रणाम है । अधो भाग में जो शर्व ( रुद्र उन्हें क्षमाचर कहते हैं, क्षमाया भुवोऽधोभागे चरन्ति गच्छन्तीति ते ' क्षमाचराः पृथिवी के निचले भाग में जो चलते ५७ हैं ॥, यानी पाताल में विद्यमान रहने वाले । शेष भाग की व्याख्या पूर्ववत् ही समझनी चाहिये ॥ के समान हरित वर्णं जो रुद्र वट, अश्वत्थ आदि वृक्षों पर स्थित रहते हैं । वे कैसे हैं? ' शष्पिञ्जराः ' बाल तृण वर्ण के हैं । यद्वा विगतं के हैं । ' नीलग्रीवा: ' कुछ तो नीलवर्ण के कण्ठ वाले हैं तथा कुछ ' विलोहिताः ' विशेष रूप से मांस रक्त - मज्जा अस्थि आदि भौतिक लोहितं रक्तं रक्तोपलक्षितं मांसमज्जाऽस्थ्यादि भौतिकं येषां ते विलोहिताः, अर्थात् रक्त वाले और हैं । चिन्मय दिव्य शरीर वाले हैं, पदार्थों से रहित हैं, यानी लोहितादि धातुओं से रहित हैं, अर्थात् तेजोमय शरीर प्राकृत नहीं हैं । शेष भाग की व्याख्या पूर्ववत् ही है ॥ ५८ ॥
शक्ति वाले जो प्राणियों के अधिपति यानी स्वामी, अर्थात् पालक रुद्र हैं, यद्वा ' भूतानां ' अन्तर्धान हो जाने की - केश आदि से हीन हैं, भूत - प्रेत - पिशाच आदि हैं, ऐसे देवविशेषों के पालक जो रुद्र हैं उनमें से कुछ तो ' विशिखास: ' शिखा हैं । ऐसी पूर्ववत् यानी मुण्डित शिर वाले हैं और कुछ ' कपर्दिन: ' जटाजूटवारी हैं, उनके धनुषों को हम उनसे दूर करवाते ही व्याख्या है ॥ ५ ९ ॥
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म ० ६०-६१ ] वेदार्थं पारिजातभाष्यसहिता
ये पथ प॑थि॒रक्ष॑य ऐलव॒दा आयुर्युधः ।
तन्मसि ॥ ६० ॥
७३ तेषं सहस्रयोजनेऽव धन्यानि , लौकिक वैदिक मार्ग का रक्षण मन्त्रार्थ -- अन्न देकर प्राणियों का पोषण करने वाले, आजीवन युद्ध करने वाले कोसों के पार किसी मार्ग पर ले जाकर करने वाले तथा अधिपति कहलाने वाले रुद्रों के धनुषों को हम लोग हजारों डाल देते हैं ॥ ६० ॥
, ये च ये रुद्राः पथां लौकिकवैदिकमार्गाणाम् अधिपतयो रक्षकाः पथामधिपतय च ऐलबृदा इति इलानाम् पूर्वर्चेनानुषङ्गः अन्नानां समूह पथि रक्षयः पथो मार्गांस्तानेवान्यानपि वा रक्षन्ति पालयन्ति ते पथिरक्षयः, ऐलभृतः ये सन्तः परोक्षवृत्त्या ऐलबुदा ऐलम् । यद्वा इला पृथ्वी, तस्या इदमैलम् अन्नम्, तद् जीवनेन बिभ्रतीत्यैलभृतः युद्धयन्ते, इत्यायुर्युधः, यावज्जीवं युद्धकर्तार इति उच्यन्ते, अन्नेर्जन्तूनां पोषका इत्यर्थः । आयुर्युध आयुषा तेषां धनूंषि सहस्रयोजने अवतारयाम इति पूर्ववद् यावत् । अथवा आयुर्वा पणीकृत्य ये युध्यन्ते ते आयुर्युधः व्याख्येयम् ॥ ६० ॥
सहस्रयोजनेऽव धन्यानि ये तीर्थानि प्रचरन्ति सकार्हस्ता निङ्गणः । तेर्षा तमसि ॥ ६१ ॥
जो रुद्र तीर्थों पर जाते हैं, उनके धनुषों को मन्त्रार्थ -- आयुधों को हाथ में लेकर और खड्गों को धारण कर डाल आते हैं ॥ ६१ ॥
हम ' लोग हजारों कोसों के पार किसी मार्ग पर ले जाकर । कीदृशाः? सृकाहस्ताः ये रुद्रास्तीर्थानि काशी- प्रयाग कुरुक्षेत्र पुष्कर प्रभृतीनि ' ( प्रचरन्ति निघ ० २ ( २०१६ गच्छन्ति ) । ' सृवृभू सुषिमुषिभ्यः कक् ' । सृका आयुधानि हस्ते येषां ते तथोक्ताः । ' सृकेत्यायुधनामसु निषङ्गाः खड्गा विद्यन्ते येषां ते तथोक्ताः । उभाभ्यां सरतीति सृकः । वज्रं तद्वदायुधमिति यावत् । निषङ्गणो पुरतश्च युद्धकरणसमर्थाः । तेषां धनूंषीत्यादि पूर्ववद् हस्ताभ्यां वज्रखड्गधारयितारः । युगपद् उभयपार्श्वतः व्याख्येयम् ॥ ६१ ॥
: ' मार्गों का अथवा अन्यों का भी पालन ( रक्षण ) जो रुद्र लौकिक और वैदिक मार्गों के रक्षक हैं, जो ' पथिरक्षय तस्या इदम् ऐलम् अन्नसमूहः । यद्वा -- इला पृथिवी करते हैं, जो ' ऐलबुदाः ' इलानाम् अन्नानां समूह ऐलम्, ऐलबुदा अर्थात् उच्यन्ते । अर्थात् अन्न के द्वारा प्राणियों के जो पोषक हैं । अन्नम्, तद् बिभ्रतीत्यैलभृतः, ऐलभृतः सन्तः परोक्षवृत्त्या जीवन भर युद्ध करने वाले । अथवा ' आयुः ' जीवनं पणीकृत्य ' आयुर्युधः ' आयुषा जीवनेन युध्यन्त इति आयुर्युधः, अर्थात् युद्ध करते हैं, उन्हें ' आयुर्युध ' कहते हैं । उन रुद्रों के धनुषों युध्यन्ते त आयुयुधः, अर्थात् जीवन की बाजी देते हैं लगाकर । ऐसी जो पूर्ववत् ही व्याख्या करनी चाहिये ॥ ६० ॥
को हम अपने से हजार योजन दूर उतरवा ? सृकाहस्ताः सृका आयुधानि ये रुद्रास्तीर्थानि काशी प्रयागकुरुक्षेत्र पुष्करप्रभृतीनि प्रचरन्ति गच्छन्ति । कीदृशाः ० २।२०१६ ) | जो रुद्र यावत् । ' सुकेत्यायुधनामसु ' ( निध हस्ते येषां ते सृकाहस्ताः । सरतीति सृको वज्रम्, तद्वदायुधमिति हैं, वे सुक नाम के आयुधों को हाथ में लिये रहते हैं । जो सरण काशी, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, पुष्कर प्रभृति तीर्थों में चलते रहते | ' निषङ्गिणः ' निषङ्गाः खड्गा विद्यन्ते तेषां ते निषङ्गिणः । करता है, उसे सृक कहते हैं, यानी वज्र के समान आयुधविशेष पुरतच युद्धकरणसमर्थाः । जिनके पास खड्ग है, वे उभाभ्यां हस्ताभ्यां वज्रखड्गधारयितारः । युगपद् उभयपार्श्वतः किये रहते हैं । यानी युगपत् दोनों ओर से और सामने से निषङ्गी कहलाते हैं, अर्थात् दोनों हाथों में वज्र, खड्ग धारण को हम उनके पास से दूर करवा देते हैं, इत्यादि पूर्ववत् ही भी युद्ध करने में समर्थ रहते हैं । उनके धनुष आदि आयुधों व्याख्या समझनी चाहिये ॥ ६१ ॥
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७४ शुक्ल यजुर्वेदसंहिता [ अ ० १६ येनेषु विविधय॑न्ति॒ पात्रेषु पिव॑तो॒ जना॑न् । तेषा॑भिः॒ सहस्रयोज॒नेऽव॒ धन्वनि तन्मसि ॥ ६२ ॥
मन्त्रार्थ – अन्नभक्षण और जलपान करने पर उनमें स्थित जो रुद्र हैं, वे अन्नभक्षण तथा जलपान करने ॥ वाले प्राणियों को पीड़ा देते हैं । उन रुद्रों के धनुषों को हम लोग हजारों कोसों के पार किसी मार्ग पर डाल देते हैं || ६२ ये रुद्रा अन्नेषु भुज्यमानेषु स्थिताः सन्तो जनान् विविध्यन्ति विशेषेण ताडयन्ति, धातुवैषम्यं कृत्वा रोगानुत्पादयन्तीत्यर्थः । तथा पात्रेषु पात्रस्थक्षीरोदकादिषु स्थिताः सन्तः पिबतः क्षीरादिपानं कुर्वतो जनान् विविध्यन्ति अन्नपानादिभोजनपानपरायणान् स्वधर्मविमुखान् ये विविधं ताडयन्ति तेषां धनूंषीत्यादि पूर्ववत् ॥ ६२ ॥
य ए॒ताव॑न्तश्च॒ भूय॑सश्च दिशो रु॒द्रा वितस्थिरे । तेषा सहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि ॥ ६३ ॥
मन्त्रार्थ दसों दिशाओं में व्याप्त रहने वाले जो अत्यधिक रुद्र हैं, उनके धनुषों को हम लोग हजारों कोसों के पार किसी मार्ग पर ले जाकर डाल देते हैं ॥ ६३ ॥
ये रुद्रा एतावन्त एतत्प्रमाणं येषां ते तथोक्ता उक्तप्रमाणाः । भूयांसश्च अतिशयेन बहव इति भूयांसः । उक्तप्रमाणेभ्योऽपि बहुतरा इत्यर्थः । दिशो दशदिशो वितस्थिरे विष्टभ्य स्थिताः तेषां धनूंषीत्यादि पूर्ववद् व्याख्येयम् || ६३ || नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये दि॒वि येषां व॒र्षमिष॑व॒स्तेभ्यो॒ो दश प्राचोर्दश दक्षिणा दर्श प्र॒तीचीद॑शोद॑च॒ द॑शोर्ध्वास्तेभ्यो नमो अस्तु ते नो ' s वन् ते नो मृडघन्तु तेयं द्विमो यश्च॑ नो द्वेष्टितमेषां जम्भे दमः ॥ ६४ ॥
ये रुद्रा अन्नेषु भुज्यमानेषु स्थिताः सन्तो जनान् विविधयन्ति विशेषेण ताडयन्ति, धातुवैषम्यं कृत्वा रोगानुत्पाद-यन्तीत्यर्थः, जो रुद्र भोज्य अन्न में स्थित होकर लोगों को विशेष रूप से ताडित ' करते हैं, अर्थात् धातुवैषम्य को उत्पन्न कर रोगों को पैदा करते हैं, तथा पात्रेषु पात्रस्थक्षीरोदकादिषु स्थिताः सन्तः पिबतः क्षीरादिपानं कुर्वतो जनान् विविध्यन्ति अन्नपानादिभोजनपानपरायणान् स्वधर्मविमुखान् ये विविधं ताडयन्ति । उसी प्रकार पात्रस्थित क्षीर, उदक आदि में स्थित होकर क्षीर, उदक पान करने वाले लोगों को, अर्थात् खान - पान में ही तत्पर ( परायण ) रह कर स्वधर्म से विमुख रहने वाले लोगों को जो विविध प्रकार से प्रताडित करते हैं, उन रुद्रों के धनुरादि आयुधों को हम उनसे दूर करवा देते हैं, अर्थात् हम लोगों की भक्ति - उपासना आदि से प्रसन्न होकर वे अपने आयुधों का प्रयोग हम पर न करके उन्हें दूर रख देते हैं ॥ ६२ ॥
ये रुद्रा एतावन्त एतत्प्रमाणं येषां ते तथोक्ता उक्तप्रमाणाः । भूयांसश्च अतिशयेन बहव इति भूयांसः । उक्त-प्रमाणेभ्योऽपि बहुत इत्यर्थः । अर्थात् पूर्वोक्त प्रमाण वाले ये रुद्र बहुत अधिक हैं, यानी उक्त प्रमाणों से भी बहुत अधिक हैं । दिशो दशदिशो वितस्थिरे विष्टभ्य स्थिताः । दसों दिशाओं में वे स्थित हैं । उनके धनुरादि आयुधों को हम उनकी भक्ति-पूर्वक उपासना के द्वारा उनसे दूर करवा देते हैं । ऐसी पूर्ववत् ही व्याख्या कर लेनी चाहिये ॥ ६३ ॥