वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 111–120

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 111 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

म • ६४-६५ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता मन्त्रार्थ -- लोक में रहने वाले जो रुद्र हैं और जिनके बाण वृष्टिरूप हैं, उनको हम लोग सभी दिशाओं की ओर हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं । वे रुद्र हम लोगों की रक्षा करें, हमें सुख वें । जो हमारा द्वेष करता है तथा हम जिससे द्वेष करते हैं, उन शत्रुओं को हम रुद्र की बाढ में रख देते हैं, अर्थात् उन शत्रुओं का नाश हो ॥ ६४ ॥

इत उत्तरं त्रीणि यजूंषि कण्डिकात्रयात्मकानि प्रत्यवरोहसंज्ञानि धृतिछन्दस्कानि बहुरुद्रदेवत्यानि । एषु त्रिस्थानास्त्रिलोकीस्था रुद्राः स्तूयन्ते । दिवि द्युलोके ये रुद्रा वर्तन्ते । येषां च रुद्राणां वर्षं वृष्टिरेव इषवो बाणाः, एषामायुधस्थानीया वृष्टिः, अतिवृष्ट्यादीतिभिः प्राणिनो घ्नन्ति तेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः । तेभ्यो रुद्रेभ्यो दश दश-संख्याकाः प्राचीः प्रागभिमुखा दशाङ्गुलीः कृत्वा नमस्करोमि । प्राङ्मुखाञ्जलिबन्धेन प्राच्यो दशाङ्गुलयो भवन्ति । तथैव दक्षिणा दक्षिणाभिमुखा दशाङ्गुलीः कृत्वा नमस्करोमि । तथैव प्रतीची: प्रत्यङ्मुखा दशाङ्गुलीः कृत्वा नमस्करोमि । तथैव उदीचीर् उदङ्मुखा दशाङ्गुलोः कृत्वा नमस्करोमि । तथैव ऊर्ध्वा उपरि दशाङ्गुलीः कृत्वा नमस्करोमि । तेभ्यः साञ्जलिबन्धं नमोऽस्तु नमस्करोमि, ' दश वा अञ्जले रङ्गुलयो दिशि दिश्येवेभ्य एतदञ्जलि करोति ' ( श ० ९ ।१।१।३ ९ ) इति श्रुतेः । ते रुद्रा नोऽस्मानवन्तु रक्षन्तु । ते रुद्रा नोऽस्मान् मृडयन्तु सुखयन्तु । किञ्च, ते रुद्रा अस्मान् प्रति सन्तुष्टाः सन्तः, यं पुरुषं द्विषन्तीति शेषः । वयं च यं द्विष्मो यस्य द्वेषं कुर्मः, पुनर्यो नरो नोऽस्मान् द्वेष्टितं सर्वमपि पुरुषं पूर्वोक्तानामेषां रुद्राणां जम्भे दंष्ट्राकराले मुखे दध्मः स्थापयामः । अस्मद्विषम् अत्मद्द्द्वेष्यं च नरं पूर्वोक्ता रुद्रा भक्षयन्तु अस्मांश्चावन्तु ॥ ६४ ॥

नमो s स्तु रुद्रेभ्यो येऽन्तरिक्षे येषां वात इषवस्तेभ्यो दश प्राचीर्दशं दक्षिणा दर्श प्रतोच॒र्दशो दोच॒र्दशोर्ध्वास्तेभ्यो॒ नमो अस्तु ते नोऽवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विमो यश्च नो द्वेष्टितमेषां जम्भे दध्मः ॥ ६५ ॥

मन्त्रार्थ - आकाश में जो रुद्र रहते हैं और जिनके बाण वायुरूप हैं, उनको हम लोग हाथ जोड़कर पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर तथा ऊर्ध्वं दिशाओं की ओर दस अंगुलियों को करते हैं, अर्थात् सभी दिशाओं को हम हाथ जोड़-कर प्रणाम करते हैं 1 । वे रुद्र हम लोगों की रक्षा करें, हमें सुख वें । जो हमसे द्वेष करते हैं तथा हम जिनसे द्वेष करते हैं, उन शत्रुओं को हम लोग रुद्र की बाढ़ में रख देते हैं, अर्थात् उस शत्रु का नाश हो । ६५ ॥ इसके आगे तीन यजुः कण्डिकात्रयात्मक हैं, जो प्रत्यवरोहसंज्ञक हैं, धृति छन्दवाले हैं और बहुरुद्रदेवताक हैं । उनमें से त्रिलोकीस्थ रुद्रों की स्तुति की जा रही है । द्युलोक में जो रुद्र हैं और जिन रुद्रों के ' बाण ' वर्षण ( वृष्टि ) ही हैं, अर्थात् उनकी आयुधस्थानापन्न ' वृष्टि ' ही है; अतिवृष्टि आदि ईतियों से जो प्राणियों का हनन करते हैं, उन रुद्रों को प्रणाम है । उन रुद्रों के लिये दसों अंगुलियों को प्रागभिमुख करके मैं प्रणाम करता हूँ । प्राङ्मुख अंजलिबन्ध में दसों अंगुलियाँ प्राच्य नहीं होती हैं । तथैव दसों अंगुलियों को दक्षिणाभिमुख करके मैं प्रमाण करता हूँ । तथैव दसों अंगुलियों को प्रत्यङ्मुख करके मैं प्रमाण करता हूँ । तथैव दसों अंगुलियों को उदङ्मुख करके मैं प्रणाम करता हूँ । तथैव दसों अंगुलियों को ऊपर करके मैं प्रणाम करता हूँ । उन द्रों के लिये सांजलिबन्ध यानी अंजलि बाँध कर मैं प्रणाम करता हूँ । इसी अभिप्राय को शतपथश्रुति ने भी बताया है । वे रुद्र हमारी रक्षा करें । वे रुद्र हमें सुखी करें । किञ्च वे रुद्र हमारे प्रति सन्तुष्ट होते हुए जिस पुरुष से वे द्वेष रखते हैं, हम जिस पुरुष से द्वेष करते हैं और जो पुरुष हमसे द्वेष करता है, उन सभी पुरुषों को पूर्वोक्त रुद्रों के दंष्ट्राकराल मुख में हम स्थापित करते हैं । हमारे द्वेष्यभूत मनुष्य को पूर्वोक्त रुद्र भक्षण कर ले और हमारी रक्षा करें ॥ ६४ ॥

पृष्ठ 112

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 112 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७६ शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० १६ येऽन्तरिक्षे रुद्रा वर्तन्ते, तेभ्यो रुद्रेभ्यो नमोऽस्तु । येषां रुद्राणां वात इषवो वायुरायुधस्थानीयः, कुवातेन अन्नं विनाश्य वातरोगं चोत्पाद्य जनान् घ्नन्ति तेभ्योऽन्तरिक्षस्थेभ्यो रुद्रेभ्यो नमोऽस्तु । शेषं पूर्ववद् व्याख्येयम् ॥ ६५ ॥

नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये पंथि॒िव्यां येषामन्न॒मिष॑वस्तेभ्यो दश प्राचीदेश दक्षिणा दर्श व्र॒तोचोद॑शो ' दीचा॒ोद॑शोध्र्ध्वास्तेभ्यो नमो अस्तु ते नो ऽवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्चं नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः ॥ ६६ ॥

मन्त्रार्थ -- जो रुद्र पृथिवी पर रहते हैं और जिनके बाण अन्नरूप हैं, उन रुद्रों को हम लोग हाथ जोड़कर पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और ऊर्ध्व दिशाओं की ओर दसों अंगुलियां करते हैं, अर्थात् सब दिशाओं को हाथ जोड़कर हम नमस्कार करते हैं । वे रुद्र हमारी रक्षा करें और हमें सुख दें । जो हमसे द्वेष रखते हैं और जिनसे हम द्वेष रखते हैं, उन शत्रुओं को हम द्र की बाढ़ में रख देते हैं, अर्थात् उस शत्रु का नाश हो ॥ ६६ ॥

॥ इति षोडशोऽध्यायः समाप्तः ॥ ये पृथिव्यां रुद्रा वर्तन्ते येषामन्नमिषवः, अन्नमदनीयं वस्तु आयुधम्, अयथान्नभक्षणे कदन्नभक्षणे चौर्ये वा लोकान् प्रवर्त्य रोगमुत्पाद्य जनान् घ्नन्ति, तेभ्यः पृथिवीस्थानेभ्योऽन्नायुधेभ्यो रुद्रेभ्यो दश प्राचीदेश दक्षिणा दश प्रतीचीर्दशोदीचीर्दशोध्वस्तत्तद्दिगभिमुखा अङ्गुलीः कृत्वा साञ्जलिबन्ध नमस्करोमि । ते प्रसन्नाः सन्तो नोऽवन्तु नः अस्मांश्च सुखयन्तु । ते यं द्विषन्ति यं च वयं द्विष्मः, यश्च नो द्वेष्टि तं तान् सर्वानपि वयं रुद्राणां जम्भे दध्मः । सामाजिकेन तु इतः पूर्वं प्राय उब्वटमहीधराद्यनुसार्येवार्थो लिखित: । आशवे, आजिराय, शीघ्रयाय, शीभ्यायेत्यादिषु स्वाच्छन्द्यमेवाश्रितम् । शीघ्रकार्यकरत्वम्, निरन्तरतया चिरकालमविश्रम्य कार्यकरत्वम्, त्रयेण ये अन्तरिक्षे रुद्रावर्तन्ते, तेभ्यो रुद्रेभ्यो नमोऽस्तु । जो अन्तरिक्ष में रुद्र हैं, उन रुद्रों के लिये हमारा प्रणाम हो । येषां रुद्राणां वात इषवो वायुरायुधस्थानीयः, कुवातेन अन्नं विनाश्य वातरोगं चोत्पाद्य जनान् घ्नन्ति, तेभ्योऽन्तरिक्षस्थेभ्यो रुद्रेभ्यो नमोऽस्तु । शेषं पूर्ववद् व्याख्येयम् । अर्थात् जिन रुद्रों के ' बात ' ही बाण हैं, ' वायु ' ही आयुधस्थानापन्न है, कुवायु से अन्न का विनाश कर और वात रोग को उत्पन्न कर लोगों को मार दिया है, उन अन्तरिक्ष में स्थित रुद्रों को हमारा प्रणाम हो । शेष भाग की व्याख्या पूर्ववत् ही समझनी चाहिये ॥ ६५ ॥

जो पृथिवी पर रुद्र हैं, जिनके ' अन्न ' हो इषु ( बाण ) हैं, अर्थात् अदनीय ( भक्षणीय ) वस्तु ही आयुध है, अभिप्राय यह है कि कदन भक्षण में अथवा चौर्य में लोगों को प्रेरित कर और रोग उत्पन्न कर जो लोगों का नाश करते हैं, उन पृथिवी स्थान में स्थित एवं अन्नात्मक आयुष लिये हुए रुद्रों के लिये ' दश प्राचीदंश दक्षिणा दश प्रतीची दशोदीची देशो-व: ' अर्थात् तत्तद् दिशाओं के संमुख अंगुलियों को करके, अंजलि बाँधकर हम प्रणाम करते हैं । वे प्रसन्न होकर हमारी रक्षा करें और हमें सुखी करें । वे रुद्र जिससे द्वेष करते हैं. हम जिनसे द्वेष करते हैं और जो हमसे द्वेष करते हैं, उन सभी को हम रुद्रों की विकराल दंष्ट्रा में रख देते हैं । आर्यसमाजी ने इसके पूर्व तो प्रायः उम्वट, महोधरादि के अनुसार ही अर्थ लिखा है, किन्तु ' आशवे, आजिराय शीघ्राय, शीभ्याय इत्यादि पदों के अर्थों को अपनी स्वच्छन्द वृत्ति से ही बताया है । शीघ्रकार्यकरत्व अर्थात् निरन्तर चिरकाल तक बिना विश्राम किये ही कार्य करना, यानी शीघ्रता से चातुर्य से कार्य करना, तरंग से और उत्साह से कार्य

पृष्ठ 113

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 113 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मं ० ६६ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता ७७ चातुर्येण कार्यकरत्वम्, तरङ्गेण उत्साहेन च कार्यकरत्वमित्यादिकं कथमर्थ इति दर्शनीयमासीत् । उव्वटमहीधरा-दिभिः प्रदर्शितरीत्या व्युत्पत्तिस्तु पूर्वव्याख्याने स्पष्टैव । एवमेव उर्वर्याय कक्ष्याय, दुन्दुभ्याय, अहन्यायेत्यादिषु स्वाच्छन्द्येन तत्तत्पालकत्वाद्यर्थः प्रमाणशून्य एव । सिकत्यायेति वालुकाविज्ञानवान्, जलधाराविज्ञानवान्, बहुभार-वदुत्थापकयन्त्रनिर्मातेत्यादिकोऽर्थः कथं कैः शब्दैर्ज्ञातुं शक्य इति विषये व्याख्यातुः स्वाच्छन्द्यमेव शरणम् । पर्ण-शब्दस्य पर्णप्रतिभूरिति कथमर्थः? ४७ तमे मन्त्रे - ' हे राजन् प्रजापशूनां मध्ये कञ्चनापि रोगैर्मा पीडयस्वं ' इति व्याख्यानम् । एतद्रीत्या राजैव स्वराष्ट्रे रोगानप्युत्पादयतीत्यायातम् । तच्च प्रत्यक्षविरुद्धमेव । ४ ९ तमे मन्त्रे तनूरित्यस्य राजशक्तिरर्थः कृतोऽनेन व्याख्यात्रा । तदपि प्रमाणशून्यमेव । ५२ तमे मन्त्रे विकिरिद्रपदस्य व्याख्याने उब्वटमहीधरदयानन्दानां व्याख्याभेदा लिखिताः । विकिरीनिषून द्रावयतीति विकिरिद्र इत्युव्वटः । तदेतदुद्धरणमपि भ्रान्तिमूलकमेव, यत उव्वभाष्ये विकिरनिषून् द्रावयतीति विकिरिद्र इत्युट्टङ्कितम् । वृक्षेषु शष्पिजरा नीलग्रीवा इत्यादिष्वपि तत्तच्चिह्नधारका वृक्षमा रोहन्तीत्यर्थोऽपि स्वाच्छन्द्यमूलकः । ' येऽन्नेषु ' इति ६२ तमे मन्त्रे लिखितम् -- ' ये दुष्टा अन्नादिभोजनानां जलदुग्धादीनां च पात्रेषु पिबत्सु जनेषु प्रहरन्ति तेषां दूरीकरणाय सहस्रयोजने धनूंषि विस्तृतानि कुर्मः ' इति, तत्रेदं विचारणीयं यद् यत्तदोः सम्बन्धः स्वाभाविकः । तथा च ये विविध्यन्ति तेषां धन्वानीत्येव सम्बन्धो युक्तः । तमपहाय तेषां दूरीकरणाय धनुषां विस्तार इत्यर्थः सर्वथा विरुद्ध एव । किञ्च पूर्वं समष्टिकार्यकरणाय राजा सेनापतिर्वा प्रार्थ्यते स्म । इदानीं तु सहस्रयोजने धनुर्विस्तारस्य स्वकर्तृकत्वमेवोच्यते । वस्तुतस्तु राज्ञापि सहस्रयोजनेषु धनूंषि विस्तारयितुं न करना इत्यादि अर्थ कैसे होगा, यह प्रदर्शित करना चाहिये था । उव्वट, महीधर आदि के द्वारा प्रदर्शित रीति के अनुसार जो व्युत्पत्ति होती है, उसे पूर्वव्याख्यान में स्पष्ट कर ही चुके हैं । इसी तरह ' उर्वर्याय, दुन्दुभ्याय, अहन्याय ' इत्यादि इस पों में भी अपनी स्वच्छन्द वृत्ति के अनुसार ' तत्तत्पालकत्व ' आदि अर्थ किया है, जो प्रमाणशून्य है । ' शब्दों सिकत्याय से ' जाना पद का ' वालुकाविज्ञानवान्, जलधाराविज्ञानवान्, बहुभारवदुत्थापकयन्त्र निर्माता ' इत्यादि अर्थ कैसे किन अर्थं कैसे कर जा सकता है, इस विषय में व्याख्याता ने स्वच्छन्दता की ही शरण ली है । ' पर्ण ' शब्द का ' पर्णंप्रतिभू ' यह डाला है? ४७ वें मन्त्र में - ' हे राजन्! प्रजा- पशुओं में से किसी को भी रोगों से पीड़ित मत करो ऐसी व्याख्या की है । इस व्याख्या के अनुसार यह अर्थ सूचित होता है कि ' राजा ही अपने राष्ट्र में रोगों को भी उत्पन्न करता है ' । किन्तु यह तो प्रत्यक्ष से विरुद्ध ही है । ४ ९ वें मन्त्र में ' तनूः ' का अर्थ ' राजशक्ति ' किया है, किन्तु वह भी प्रमाणशून्य ही है । ५२ वें मन्त्र में - ' विकिरिद्र ' पद के व्याख्यान में उब्वट, महीधर, दयानन्द आदि के व्याख्या -भेदों को लिखा है । ' विकिरी निपून् द्रावयतीति विकिरिद्र ' इत्युव्वटः, किन्तु यह उद्धरण भी भ्रान्तिमूलक ही है । जब कि उव्वट भाष्य में ' विकिरन्निषून् द्रावयतीति विकिरिद्रः ' यह उल्लिखित है । ' वृक्षेषु शष्पिञ्जरा नीलग्रीवा: ' इनका अर्थ ' तत्तच्चिह्नधारका वृक्षमारोहन्ति ' किया है, किन्तु यह अर्थ भी स्वाच्छन्द्यमूलक ही है । ' येऽन्तेषु ' इस ६२ वें मन्त्र में लिखा है - ' ये दुष्टा अन्नादिभोजनानां जलदुग्धादीनां -चपात्रेषु पिबत्सु जनेषु प्रहरन्ति तेषां दूरीकरणाय सहस्र योजने धनूंषि विस्तृतानि कुर्मः ' । अर्थात् जो दुष्ट लोग अन्नादि भोजन तथा जल दुग्धादि को पात्रों से पीने वाले जनों पर प्रहार करते हैं, उनको दूर करने के लिये सहस्रयोजन पर धनुषों को हम विस्तृत करते हैं, किन्तु यहाँ यह विचारणीय है कि ' यत् और तत् ' दो शब्दों का स्वाभाविक सम्बन्ध रहता है । तथा च- ' ये विविध्यन्ति तेषां धन्वानि ' यही सम्बन्ध करना उचित है । किन्तु इस औचित्यपूर्ण सम्बन्ध को त्यागकर ' उनको दूर करने के लिये धनुषों का विस्तार ' यह अर्थ करना सर्वथा विरुद्ध ही है । किंच, पहले समष्टि कार्य करने के

पृष्ठ 114

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 114 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७८ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० १६ शक्यन्ते । सिद्धान्ते तु हविषा हविर्दानेन स्तुतिनमस्कारादिभिः परमेश्वरमनुकूलयित्वा तद्द्वारेव धनूंष्यपज्यानि कुर्म इत्यर्थः । ---नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि ६४-६६ इत्यादिमन्त्रेष्वप्यस्य स्वाच्छन्द्यम् । तथाहि - ' द्युलोकस्थसूर्यादिसमाना मेघादितुल्या ये रुद्रा राजाश्रिता राजगणाः, येषां शस्त्रवर्षणमेव कार्यम्, तेभ्यः समादरोऽस्तु । अन्तरिक्षस्थवायु वायु- मेघादिबोधका सन्ति, वायुवत्तीव्रवेगवन्तो ये बाणाः सन्ति, तेभ्यो नमः ' इत्यर्थो विहितः । मूलमन्त्रेषु । किं सूर्य- राजाश्रितगणानां दिवि शब्दा न सन्त्येव । तत्र तु ये रुद्रा दिवि सन्ति, येषां वर्षमिषवः, तेभ्यो नमस्कारः । स्थितिः सम्भाव्यते? किञ्च वर्षमिषव इति सामानाधिकरण्यमुक्तम् । तेन वर्षस्य वर्षणस्यैव बाणवद्वशकारीत्य- इषुरूपत्वमुक्तम् शरवर्षणमेव येषां कर्मेति समानीतम् । तथात्वे च इषूणां वर्षणं येषां कार्यमित्युच्येत? एवमन्नं तेऽन्नरूपेण बाणेनैव र्थोऽपि चिन्त्यः । पोषकत्वघातकत्वाभ्यामन्नस्य इषूणां चातुल्यत्वं स्पष्टमेव । किञ्च यदि वशीकुर्वन्ति, तदा तेभ्यो भयाशङ्कव नास्ति, पुनः कथं तेभ्यो रक्षणं प्रार्थ्यते । द्युलोकस्थानामन्तरिक्षस्थानां शरवर्षणं वातवेगाश्च बाणास्त्वद्रीत्याप्यनिष्टकराण्येव । तत एव तेभ्यो रक्षणं काम्यते । ततः पृथिवीस्थानामन्नरूपा इषवोऽप्यनिष्टकरा एव मन्तव्याः । अन्यथा पौर्वापर्य वैरूप्यापत्तिः । तस्मात् सनातनसिद्धान्तानुसारिण्येव मन्त्राणां व्याख्या शुद्धा ॥ ६६ ॥

॥ इति श्री शुक्लयजुर्वेदवाजसनेयिसंहितायां वेदार्थपारिजातभाष्यमण्डितायां षोडशोऽध्यायः समाप्तः ॥ लिये राजा अथवा सेनापति की प्रार्थना की गई थी, किन्तु अब सहस्रयोजन तक धतुविस्तार करने में स्व - कर्तृकत्व हो बता रहे हैं | वास्तविकता तो यह है कि राजा भी सहस्र योजन तक धनुषों का विस्तार नहीं कर सकता । सिद्धान्त की दृष्टि से तो यह अर्थ होता है कि हविर्दान और स्तुति- नमस्कार आदि से परमेश्वर को अपने अनुकूल करके उसके द्वारा ही धनुषों को प्रत्यंचारहित हम करवा देते हैं । ' नमो s स्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि ' ( ६४-६६ ) इत्यादि मन्त्रों में भी इस व्याख्याकार की स्वच्छन्दता दृष्टिगोचर हो रही है । तथाहि - द्युलोकस्थसूर्यादिसमाना रुद्रा राजाश्रिता राजगणाः, येषां शस्त्रवर्षंणमेव कार्यम्, तेभ्यः समादरोऽस्तु । अन्तरिक्षस्य- राजाश्रित वायुमेघादितुल्याये सन्ति, वायुवत् तीव्र वेगवन्तो ये बाणाः सन्ति तेभ्यो नमः ' - द्युलोकस्थ सूर्य आदि के समान राजगण रुद्र हैं, जिनका शस्त्रवर्षण करना हो कार्यं है, उनके लिये हमारा समादर रहे । अन्तरिक्षस्थित वायु, मेघ आदि के तुल्य जो हैं, वायु के समान तीव्र वेगवाले जो बाण हैं, उनको नमस्कार है, यह अर्थं इस व्याख्याता ने किया है । किन्तु मूलभूत मन्त्रों में सूर्य, वायु, मेघ आदि के बोधक शब्द तो कोई है ही नहीं । मूलभूत मन्त्र में तो ' जो रुद्र द्युलोक में हैं, जिनका वर्षण ही इषु ( बाण ) रूप है, उन रुद्रों को नमस्कार कहा गया है । क्या राजाश्रित गणों की द्युलोक स्थिति संभव है? किंच, ' वर्षमिषवः ' ऐसा सामानाधिकरण्य मन्त्र में उक्त है । अतः वर्षण ही इषुरूप है । अर्थात् ' शरवर्षण ही करना जिनका कार्य है ' यह कहा जायगा । अन्न की बाण जिनका कर्म है ' यह फलित होता है । तब ' इषुओं की वर्षा से तुलना का जो अर्थ किया है, वह भी चिन्तनीय है, क्योंकि एक पोषक है और दूसरा घातक है । अतः इषुओं कर की लेते अन्न हैं से, तुलना नहीं हो सकती । दोनों को अतुल्यता ( असमानता ) स्पष्ट है । किंच, यदि वे अन्नरूप बाण से? ही द्युलोक वश में स्थितों और तो उनको भय की आशंका ही नहीं होनी चाहिये, तब वे उनसे रक्षण को प्रार्थना क्यों करते हैं ही हैं । इसलिये अन्तरिक्ष स्थितों के द्वारा किया जाने वाला शरवर्षण और वातवेग बाण तुम्हारी रीति से भी अनिष्टकारी ही समझने चाहिये । उनसे रक्षा की इच्छा की जाती है । अतः पृथिवी पर स्थिर रहने वालों के अन्नरूप इषु भी अनिष्टकर ६६ ॥ अन्यथा पौर्वापर्यंवैरूप्य होगा । तस्मात् सनातन सिद्धान्तानुसारिणी मन्त्रव्याख्या हो शुद्ध है || षोडश अध्याय समाप्त ॥

पृष्ठ 115

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 115 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तदशोऽध्यायः अश्म॒न्नू पर्व॑ते शिश्रियाणाम॒द्भ्य ओष॑धीभ्यो॒ वन॒स्पति॑भ्यो॒ अधि॒ सम्भृतं॒ पय॑ः । तां न इषमूर्ज धत्त मरुतः सराणा अश्मस्ते॒ क्षुन्मयि॑ त ऊर्क • यं द्विष्मस्तं ते शुच्छतु ॥ १ ॥

मन्त्रार्थ -- हे प्रसिद्धिदाता मरुद्गण! आप विन्ध्याचल, हिमालय आदि पर्वतों में आश्रित सारभूत बल के कारण जल, औषधि, अश्वत्थ आदि से अधिक सिद्ध तथा मेघजनित जल और गौ से उत्पन्न हुए दुग्ध रूप प्रसिद्ध अन्न और रस को हमारे लिये स्थापित कीजिये, अर्थात् हमें दीजिये । हे प्रस्तररूप सर्वभक्षक अग्निदेव, आपको हवि निरन्तर प्राप्त होती रहे । हे प्रस्तर, तुम्हारा सारभाग मेरी रक्षा करे । हे अग्निदेव, तुम्हारा क्रोध उस मनुष्य को प्राप्त हो, जिससे हम द्वेष करते हैं, अर्थात् जो कोई हमारा शत्रु हो, उसको तुम भस्म कर दो ॥ १ ॥

षो sss ये शतरुद्रियहोम उक्तः । सप्तदशे चित्यपरिषेकादिमन्त्रा उच्यन्ते । ' चित्यं परिषिञ्चत्यग्नीद् दक्षिणे निक्षेऽद्र कृत्वाश्मन्नूर्जमित्यप्रेरधि ' ( का ० श्र ० १८/२/१ ) | पक्षस्य अपरसन्धिः कक्षः, तस्य समीपं निकक्षम् | अग्नीद् दक्षिणपक्षस्य अपरसन्धिसमीपवर्तिन्यात्मभागे पाषाणं निधाय उदकुम्भमादाय तस्मादद्रेरारभ्य अश्मन्नूर्जमिति मन्त्रेण सपक्षपुच्छमग्नि प्रदक्षिणं जलधारया समन्तात् सिञ्चतीति सूत्रार्थः । यजुर्मरुद्देवत्यम्, आर्षी त्रिष्टुप् । हे मरुतः! तां प्रसिद्धाम् इषमन्नम् ऊर्जं रसं च नोऽस्मभ्यं धत्त दत्त, यूयमिति शेषः । किंभूता यूयम्? संरराणाः सम्यग् रान्ति ददति ये ते संरराणाः, सम्यग् दातारः । ' रा दाने ' इत्यस्माद् ' बहुलं छन्दसि ' ( पा ० सू ० २ | ४ | ७६ ) इत्यादादिकस्यापि रातेर्बहुलं श्लुः । श्लौ च द्वित्वम्, शानचि रूपम् । कीदृशीमिषमूर्जं रसरूपाम् । अश्मन् अश्मनि पाषाणे पाषाणमये पर्वते विन्ध्य हिमालयादौ शिश्रियाणाम् श्रयत इति शिश्रियाणा, ताम् । पूर्ववदेव इलुर्द्वित्वं कानञ्च । अथवा सारभूतां बलहेतुभृताम् । विन्ध्यहिमालयादिपाषाणसन्धिनिर्झरोद्भूताम् इषम् इष्यमाणाम् ऊर्जम् । यद्वा या अश्मन् अश्नातीत्यश्मा तस्मिन् अशनवति मेघे, पर्वते पर्वाणि सन्ति यस्मिन्नसौ पर्वतः । ' तत्पर्व मरुद्भयाम् ' ( पा ० सू ० ५/२/१२१, वा ० ९ ) इति तप् । तस्मिन् मेघे शिश्रियाणा आश्रिता ऊर्ग, उदकलक्षणा ताम्, वृष्टिसम्पाद्यामित्यर्थः । तथा अद्भयो जलेभ्यः, अधि सकाशात्, ओषधीभ्य ओष: प्लोषो दीप्तिर्वा धोयतेऽस्यां सा ओषधी, ' कर्मण्यधिकरणे चं ' ( पा ० सू ० ३ | ३ | ९ ३ ) इति कि:, ' कृदिकारादक्तिनः ' ( पा ० सू ०, ग ० सू ० ४।१४५ ) इति ङीषि रूपम् । यद्वा ' ओषं धयतीत्योषधी फलपाकान्ता जातिः ' इति क्षीरस्वामी । बहुवचने ओषध्यः, ताभ्यो यवादिभ्यः सकाशात् । वनस्पतिभ्यः अश्वत्थादिभ्यः सकाशात् । अधि सम्भृतम् अधिकं सम्पादितम्, गोद्वारेण पयो दुग्धं च शिश्रियाणाम् । गौः पयः पीत्वा ओषधीः वनस्पतींश्च भक्षयित्वा पयो जनयति । तामुभय-रूपां मेघसम्भवां गोसमुत्थां पयोरूपां च इषमूर्जमस्मभ्यं धत्त सम्यग् दत्त, ' मरुतो वै वर्षस्येशते ' ( श ० ९ / १२ / ५ ) इति श्रुतेः ।

पृष्ठ 116

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 116 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८० शुक्ल यजुर्वेद संहिता [ अ ० १७ ' अश्मंस्ते क्षुदित्यद्रो कुम्भं कृत्वा मयि त ऊर्मित्यादायैवं द्विरपरम् ' ( का ० श्री ० १८ २ २ - ३ ) । परिषेका-' नन्तरमग्नीद् अश्मंस्ते क्षुदिति मन्त्रेण तस्मिन् पाषाणे कुम्भं निधाय ' मयि त ऊर्क ' इति मन्त्रेण पाषाणात् कुम्भमादाय पुनः ' अश्मंस्ते क्षुद् ' इति मन्त्रेण कुम्भस्य पाषाणे निधानम्, पुनरपि ' मयि ते ' इति कुम्भादानम् ' अश्मन् ' इति परिषेकः । एवं पुनर्द्विरपरं परिषिञ्चेदिति सूत्रार्थः । अश्मा देवता, देवीबृहती छन्दः । अश्मन् अश्नातीत्यश्मा तत्सम्बुद्धौ । हे सर्वभक्षक अग्ने, ते तव क्षुत् क्षुधा अस्तु, बहुहविषां भोज्यत्वात् । कुम्भमादत्ते । आशीर्देवता । बृहती । हे अश्मन्! ते तव ऊर्क सारभागो मय्यस्तु इति शेषः । ' कुम्भेऽद्रि कृत्वा दक्षिणस्यां वेदिश्रोणी प्रा तिष्ठन् दक्षिणास्यति यं द्विष्म इति ' ( का ० श्री ० १८ २४ ) । अध्वर्युस्तस्मिन् कुम्भे तमेव पाषाणं निधाय दक्षिणस्यां श्रोण प्राङ्मुखस्तिष्ठन् दक्षिणस्यां दिशिअदूरे तमश्मगर्भं कुम्भं यं द्विष्म इति निरस्येदिति सूत्रार्थः । यं द्विष्म इति निरस्यति साश्मानं घटमिति । यजुर्बृहती शुक् देवता । हे अग्ने, ते तव शुक् शोकः, तं नरमृच्छतु । तं कम्? यं नरं वयं द्विष्मः, अस्मद्वेषविषयं तव शोको गच्छतु । अत्र ब्राह्मणम् — ' अग्नीत् परिषिञ्चति । अग्निरेष यदाग्नीधो नो वा आत्मात्मानॐ हिनस्त्यहि साया अश्मनोऽध्यश्मनो ह्यापः प्रभवन्ति निकक्षान्त्रिकक्षाद्धयापः प्रभवन्ति दक्षिणान्त्रिकक्षादक्षिणाद्धि निकक्षादापः प्रभवन्ति ' ( श ० ९ | १ | २ | ४ ) । पूर्वस्मिन् ब्राह्मणे शतरुद्रियहोमोऽभिहितः । अथास्मिन्नग्नो परिषेकधेनूकरणाव-कर्षणादिकं कर्म अभिधास्यते । आग्नीध्रो दक्षिणकक्षप्रदेशे पाषाणं निधाय ' अश्मन्नर्जम् ' इति मन्त्रेण पाषाणस्योपरि आरभ्य अग्नि चित्यं परिषिञ्चति । यतः संचितोऽनी रुद्ररूपत्वादशान्त:, अत एनं शान्त्यर्थमभिषिञ्चेत् । न चात्र संचितस्याग्ने रुद्ररूपत्वेन अशान्तस्य शमनार्थमेव शतरुद्रियहोमो विहितः, तथापि भूयोऽस्य शमनार्थम् ' अथैनमतः परिषिञ्चति ' ( श ० ९ ११ १२ १ ) इति श्रुतेः परिषेकः । ' भूय एव शमयति ' ( श ० ९ | १ | २ | १ ), ' त्रिष्कृत्वः परिषिञ्चति ' ( श ० ९ | १ | २२ ) इति श्रुतिभ्यां च । यद्यपि समाख्यावशाद् अध्वर्योः परिषेकप्राप्तिः, तथापि परिषिक्तस्याग्नेः शमनेऽक्षमत्वादध्वर्थौ परिषेक्तरि हिंसा सम्भाविता स्यात् । आग्नीध्रस्य पुनरग्न्यात्म-कत्वेन आत्मनैवात्मनो हिसाया असम्भवाद् आग्नीध्रकर्तृक एव परिषेकः । ' अश्मन्नुर्जं पर्वते शिश्रियाणमिति । अश्मनि वा एषोर्क, पर्वतेषु श्रिता यदापोऽद्भय ओषधीभ्यो वनस्पतिभ्यो अघि सम्भृतं पय इत्येतस्माद्धयेतत् सर्वस्मादधिसम्भृतं पयस्तान्न इषमूर्जं धत्त मरुतः सराणा इति मरुतो वे वर्षस्येशतेऽश्मंस्ते क्षुदिति निदधाति तदश्मनि क्षुधं दधाति तस्मादश्मा नाद्योऽथो स्थिरो वा अश्मा स्थिरा क्षुत्स्थिर एव तत्स्थिरं दधाति मयि त ऊगित्यपादत्ते तदात्मन्नूर्जं धत्ते तथा द्वितीयं तथा तृतीयम् ' ( श ० ९ | १ | २ | ५ ) । इत्थं सप्रकारं परिषेकं विधाय तत्र मन्त्रं विधाय व्याचष्टे - आप इति । एषा पर्वतेषु अश्मनि स्थिता ऊर्ग, रसः, पर्वतेषु पाषाणसन्धिभ्योऽपामुत्पत्तेः । अतश्च अश्मन्नूर्जमित्येष भागोऽप एवाभिधत्ते । शिश्रियाणामिति काचि इयङादेशे रूपम् । ' रराणा: ' इत्येतदपि कानजन्तम् । पर्वते अश्मनि शिश्रियाणा-माश्रिताम् । ऊर्जं रसमप इत्यर्थः । अशनवति पर्ववति मेघे वा शिश्रियाणां श्रितामूर्जं रसं जलम् | अद्भयो वनस्पतिभ्यः पयः क्षीरं गोद्वारा सम्पाद्यते । सम्पादितं च रसं पयो व्याहरन्ति तद्रसरूपत्वात् । एवं पर्वतोत्थ-मेघोत्थजलरूपां गोसमुत्थामयो वनस्पतिभ्य ओषधीभ्यो जातां पयोरूपामिषमूर्जं हे मरुतः संरराणाः सम्यग्ददाना यूयमस्मभ्यं धत्त । अश्मनि कुम्भस्य निधाने परिषेकेण शान्तस्य रुद्रस्य क्षुधं पाषाणे निहितवान् भवति । यतोऽश्मनि क्षुन्निहिता, तस्मादश्मा नाद्यो न भक्षणीयः, तस्य अग्निक्षुदाधारत्वेन घस्मरत्वात् । ननु तत्रैव किमिति क्षुन्निधीयते? तत्राह - अथो इति । अश्मा कठिनत्वात् स्थिरः, क्षुदपि स्थिरा, इदानीमुप-शान्ताया अपि कालान्तरेऽनुवर्तनात् । अश्मनि क्षुधो निधाने स्थिर एवं स्थिरं दधाति । अश्मनि निहितस्य कुम्भस्य पुनर्मन्त्रेण स्वीकारं विधत्ते - मयि त इति । तत् तेन स्वीकारेण पुनरात्मनि ऊर्जंम् अबात्मिकां धत्ते ।

पृष्ठ 117

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 117 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

म ० १-२ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता ८१ क्षुधोऽपगमनार्थं पूर्वमश्मनि कुम्भो निहितः । आत्मन्यूर्जोधारणार्थं पुनस्तस्य स्वीकारः । परिषेकादि अश्म-निधानान्तं कर्म पुनर्द्विवारं कर्तव्यमित्याह -- तथा द्वितीयं तथा तृतीयमिति । ' अथ तमश्मानमुदहरणेऽवधाय । एता दिशं हरन्त्येषा वे नैर्ऋतो दिङ् नैर्ऋत्यमेव तद्दिशि शुचं दधाति ' ( ० ९ | १ | २ ९ ) । त्रिः पर्येत्य पश्चात् साश्मानं कुम्भं नैर्ऋत्यां दिशि प्रक्षिपेदित्याह - अथेति । ' स वेदेर्दक्षिणाया श्रोणौ । प्राङ् तिष्ठन् दक्षिणा निरस्यति यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छत्विति यमेव द्वेष्टितमस्य शुगृच्छति ' ( श ० ९ | १ | २ | १२ ) । उक्तप्रकारेण साश्मानं कुम्भं कृत्वा वेदेर्दक्षिणस्यां श्रोणी प्राङ्मुखस्तिष्ठन् ‘ यं द्विष्मः ' इत्यनेन मन्त्रेण दक्षिणतो निरस्यतीत्याह- - स वेदेरित्यादिना । अध्यात्मपक्षे - हे मरुतः! मरुदुपलक्षिता भगवदंशा देवा: सम्यग्दानशीलाः, तां प्रसिद्धामिषमन्नम् ऊर्जं रसं च यूयं नः अस्मभ्यं धत्तम् । हे अश्मन् सर्वभक्षक अग्ने परमेश्वर, ते तव क्षुद् अशनाया अस्तु भक्तसमर्पितानां हविषां भोज्यत्वात् । हे अश्मन्, ते तव ऊर्क, पराक्रमः, मय्यस्त्विति शेषः । हे अग्ने, ते तव शुक् शोकः क्रोधः, तमृच्छतु यं वयं द्विष्म इति । दयानन्दस्तु – ' हे सम्यग्दानशीला वायुवत् क्रियाकुशला मनुष्याः! यूयं पर्वताकार मेघावयवेषु स्थितां विद्युतं पराक्रममन्तं च नोऽस्मभ्यमाधिक्येन धत्त । जलाशयेभ्यो यवाद्योषधीभ्योऽश्वत्यादिवनस्पतिभ्यः सम्भूतं पोरसयुतं जलमिषमन्त्रमूर्जं पराक्रमं विद्युतं धारयत । हे मनुष्य यत्ते रसः पराक्रमोऽस्ति सोऽपि मय्यस्तु । या ते क्षुत् सा मय्यस्तु । समानसुखदुःखा भूत्वा वयं परस्परसहाया भूत्वा यं दुष्टं द्विष्मः तं ते तव शोको गच्छतु ' इति तदपि न समञ्जसम्, विसङ्गतत्वात् । मुख्यार्थत्यागे गौणार्थाश्रयणे च मानाभावेन वायुवत्क्रिया कुशला मनुष्या इत्यर्थासङ्गतेः । त्वद्रीत्या जडो वायुः । न तत्र क्रियाकौशलमपि विद्यते, कौशलस्य चेतनधर्मत्वात् । अनपराक्रमादिकं च स्वबलेनोपार्जनीयं भवति नान्येभ्यस्तद्याच्या युक्तेति कुतः परमेश्वरस्तदुपदिशेत्? अबोषधि-वनस्पतीनाम् ऊर्जा कः सम्बन्धः कथं च ततस्तत्प्राप्तिरित्यनुक्तेश्व । किञ्च, बहूनां द्वेषास्पदमेकस्यैव शोकः कथमृच्छेत्? सिद्धान्ते तु अग्नि सम्बोध्य सर्वे वयं यं द्विष्मः तं प्रति ते तव शोको गच्छत्वित्येवार्थः । कोऽयं यस्य शोकः सर्वद्वेषास्पदं गच्छत्विति प्रार्थ्यते? नहि कस्यचिद्वचनेनैव अन्यस्य शोकोऽन्यत्र गच्छति, तादृशसामर्थ्या-दर्शनात्, अन्यसमवेतधर्मस्य अन्यत्र संक्रमणस्याप्रामाणिकत्वात् ॥ १ ॥

इमा मे ' अग्न॒ इष्ट॑का धे॒नवः॑ स॒न्त्वेथा॑ च॒ दश॑ च॒ दश॑ च श॒तं च॑ श॒तं च॑ स॒हस्रं च सह चायुतं चायुतं च नियुते॑ च नि॒युते॑ च प्रयुतं चार्बुदं च न्यर्बुदं च समुद्रश्च मध्यं॒ चान्तं परार्धश्चैता में अग्न इष्टका धे॒नवः॑ सन्त्व॒ पु॒त्रा मुष्मिँल्लोके ॥ २ ॥

मन्त्रार्थ - हे अग्निदेव, ये पाँच चितियों में स्थापित इष्टकाएँ तुम्हारे प्रसाद से इस लोक में मुझे अभिमत फल देनेवाली गोरूप हों, उनकी संख्या निरन्तर दस गुनी होतो जाय । एक को बस से गुणा करने पर दस दस से करने पर सौ सौ को दस से गुणा करने से हजार हजार को दस गुना करने से दस हजार, दस हजार दस को गुणा को दस गुणा करने पर लाख लाख से दस लाख, दस लाख से एक करोड़, एक करोड़ से बस करोड़, दस करोड़ से एक अरब, दस अरब, खरब, दस खरब, निखर्व, महापद्म, शंख, समुद्र, मध्य अन्त और पराधं संख्या हो जाती हैं । हे अग्निदेव, ये इष्टकाएँ दूसरे जन्म में दूसरे लोक में मेरी कामनाओं को पूर्ण करें ॥ २ ॥

' अनपेक्षमेत्योदङ् प्राङ् तिष्ठन्नात्मन उपरि प्रापणान्ते जपतीमा म इति ' ( का ० श्री ० १८/२/१० ) । कुम्भ-निरसनानन्तरं पृष्ठतोऽनवलोकयन् यजमानोऽग्नि प्रत्यागत्य दक्षिणवेदिश्रोणिसमीपे ईशान दिगभिमुखस्तिष्ठन् आत्मन ११

पृष्ठ 118

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 118 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८२ शुक्ल यजुर्वेद संहिता [ अ १७ उपरि हस्ती प्रसार्य चयनप्रदेशं यावत् स्प्रष्टुं शक्नोति तावत् स्पृष्ट्वा ' इमा में ' इति कण्डिकाद्वयं सस्वरं जपेदिति सुत्रार्थः । विकृतिरग्निदेवत्या । तत्र प्रथमा यजुः, द्वितीया बृहती वा पङ्क्तिर्वेत्युव्वाचार्यः । हे अग्ने या इष्टकाः पञ्चसु चितिषूपहिताः, ता इमा मे मह्यं धेनवोऽभिमतफल दोग्ध्यः सन्तु, अस्मिँल्लोके, त्वत्प्रसादादिति शेषः । तासां संख्यामाह – एकेत्यादिना । अत्र एकादिपरार्धपर्यन्तैः शब्दैरुत्तरोत्तरं दशदशगुणिता संख्योच्यते । एका एकत्वसंख्याविशिष्टा सा दशगुणिता सती दशसंख्यामापद्यते । सा दशगुणिता शतं सम्पद्यते । पूर्व संख्यासहितोत्तरसंख्याग्र हणमाधिक्याय । शतं दशगुणितं सहस्रं भवति । सहस्रं दशगुणितमयुतं भवति । अयुतं दशगुणितं नियुतं भवति । नियुतं लक्षम् । नियुतं दशगुणितं प्रयुतं लक्षदशकम् । प्रयुतग्रहणं कोट-रुपलक्षकम् । प्रयुतं दशगुणं दशकोटिः । दशकोटिर्दशगुणिता अर्बदम् । अर्बुदं दशगुणं न्यर्बुदम् । न्यर्बुदशब्देन शङ्कसंख्या ज्ञेया । एतेषां ग्रहणमन्जसमुद्रान्तर्वर्तिनीनां खर्वपद्मशङ्गवादिसंख्यानामुपलक्षकमिति काभाष्ये सायणः । न्यर्बुदशब्देनाब्ज संख्या ज्ञेया । अब्जं दशगुणं खर्वम् । खवं दशगुणं निखर्वम् । निखवं दशगुणं महापद्मम् । महापद्मं दशगुणं शङ्कः । शङ्कर्दशगुणः समुद्रः । समुद्रो दशगुणो मध्यम् । मध्यं दशगुणमन्तः । अन्तो दशगुणः, परार्धम् । चकारा इतरेतरसमुच्चयार्थाः । एवमेकाद्यष्टादश संख्या संज्ञा सम्मिता इष्टका एता:, हे अग्ने मे धेनवः धेनव इवोपजीवनीया इति पूर्वोक्तस्य निगमनम् । एताः संख्या विस्तरशः क्रमरूपेण श्रीमद्वाल्मीकीये रामायणे युद्धकाण्डे अष्टाविंशे सर्गे उपनिबद्धाः । तथाहि-शतं शतसहस्राणां कोटिमाहुर्मनीषिणः । शतं कोटिसहस्राणां शङ्करित्यभिधीयते ॥ ३३ ॥

शतं शङ्कुसहस्राणां महाशङ्करिति स्मृतः । महाशङ्कुसहस्राणां शतं वृन्दमिहोच्यते ॥ ३४ ॥

शतं वृन्दसहस्राणां महावृन्दमिति स्मृतम् । महावृन्दसहस्राणां शतं पद्ममिहोच्यते ॥ ३५ ॥

शतं पद्मसहस्राणां महापद्ममिति स्मृतम् । महापद्मसहस्राणां शतं खर्वमिहोच्यते ॥ ३६ ॥

शतं खर्वसहस्राणां समुद्रमभिधोयते । शतं समुद्रसाहस्रं महौघमिति विश्रुतम् ॥ ३७ ॥ इति ।

एतद्धेनुभवनं कुत्र प्रार्थ्यते? तदाह - अमुत्र जन्मान्तरे तथा अमुष्मिन् स्वर्गे लोके । सर्वत्र इष्टाः सन्त्वित्यर्थः । यद्यपि नियतसंख्याका एवेष्टकाश्चीयन्ते तथापि मन्त्रसामर्थ्याद् वर्धमाना एकादिपरावन्तिसंख्या भवन्तीति भाव इति सायणाचार्यः । इमाम इति द्वाभ्यां कण्डिकाभ्यामग्निमभिमृश्येष्टका धेनूः कुरुते । अग्निस्त्वासां धेनुकरणस्येष्टे इत्यग्निरुच्यते । हे अग्ने, इमा इष्टका मे धेनव इवोपजीवनीयाः सन्तु । अस्मिल्लोक इति शेषः । किंसंख्याकाः? एकाप्रभृति दशसंख्यागुणिताः परार्धपर्यन्ताः । पूर्वोत्तरसंख्याविशेषसमुच्चितं वर्धमान संख्येयनिष्ठं संख्याजातमभिधाय अग्निमाह - हे अग्ने, एता मे मम इष्टका धेनवः सन्तु । अमुत्रेति जन्मान्तरनिर्देशः । अमुष्मिल्लोक इति इष्टलोक-निर्देश इत्युव्वाचार्यः । अत्र ब्राह्मणम् -- ' प्रत्येत्येष्टका धेनुः कुरुते । एता एनं देवाः शतरुद्रियेण चाद्भिश्च शमयित्वा शुचमस्य पाप्मानमपहत्य प्रत्येत्येष्टका धेनूरकुर्वत तथैवैनमयमेतच्छतरुद्रियेण चाद्भिश्च शमयित्वा शुचमस्य पाप्मानमपहत्य प्रत्येत्येष्टका धेनूः कुरुते ' ( श ० ९ | १ | २ | १३ ) | साश्मानं कुम्भं निरस्य प्रत्येत्येष्टका धेनूः कुर्यादित्याह —– प्रत्येत्येति । धेनुकरणं नाम वक्ष्यमाणमन्त्र जपपूर्वकं धेनुरूपेणानुसन्धानम् । शतरुद्रियादिकुम्भनिरसनान्तं कर्म कृत्वा प्रत्येत्य देवैर्धेनुकरणाद् यजमानोऽप्येतेन तथैव कृतवान् भवति । स्पष्टमन्यत् । ' उदङ् प्राङ् तिष्ठन् । पुरस्ताद्वा एषा प्रतीची यजमानं धेनुरुपतिष्ठते दक्षिणतो वे प्रतोचीं धेनुं तिष्ठन्तीमुपसोदन्ति ' ( श ० ९ | १ | २ | १५ ) | उदङ् प्राङिति ऐशानी दिगुच्यते, तदभिमुखस्तिष्ठन्नित्यर्थः । लोके हि यजमानपूर्वभागे धेनोः प्रत्यङ्मुखतयाऽवस्थानात्, दोग्धृणां च

पृष्ठ 119

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 119 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मं ० २ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता ८३ प्रत्यङ्मुखाया धेनोदक्षिणतो दोहनात् स्वाभिलषितदोहनार्थे इष्टकानां धेनुकरणे तथा करणमुचितमित्याह-पुरस्ताद्वा इति । ' स यत्राभ्याप्नोति । तदभिमृश्यैतद्यजुर्जपतीमा मे अग्न इष्टका धेनवः सन्त्वित्यग्निर्हेतासां धेनुकरणस्येष्टे तस्मादेतावतीनां देवतानामग्निमेवामन्त्रयत एकाच दश चान्तश्च... परार्धश्वावरार्धतश्चैवैना एतत्परार्धतश्च परिगृह्य देवा धेनूरकुर्वंत तथैवैना अयमेतदवरार्धतश्चैव परार्धतश्च परिगृह्य धेनूः कुरुते तस्मादपि नाद्रियेत बह्वीः कर्तुममुत्र वा एष एता ब्रह्मणा यजुषा बह्वीः कुरुतेऽथ यत्सन्तनोति कामानेव तत्सन्तनोति ' ( श ० ९ ।१।२।१६ ) । धेनुकरणे स्थानविशेष स्पर्शपूर्वकं मन्त्रं विधत्ते - स यत्रेति । अग्नेरात्मभागस्योपरि यत्र स्प्रष्टुमाप्नोति, तत्स्थान-मभिमृश्य ' इमा मे अग्ने ' इति मन्त्र जपेत् । सतीष्वपि बह्वीषु देवतास्वग्नेः प्राधान्येन सम्बोधने कारणमाह-अग्निर्हेतासामिति । य एष अवरार्ध्वो भूमा अवकृष्टं बहुत्वम् अवरसंख्याचरमसीमा, एकत्वमिति यावत्, ततोऽर्वा-चीनायाः संख्याया अभावात् । परार्थ्यो भूमा उत्कृष्टं बहुत्वम् अधिकसंख्याचरमसीमा, परार्ध इति यावत् । तत उत्कृष्टसंख्याया अभावात् । नन्वेवं सति मन्त्रे यत्संख्याकानामिष्टकानां धेनुरूपता सम्पाद्यते, तत्संख्याका इष्टका धेनवः क्रियन्ते, किन्तु उक्तसंख्यातिक्रमाद्बह्वीः कर्तुं नाद्रियेत । कथं तथेष्टकास्तत्संख्याका धेनवः सम्पाद्यन्ते? इत्यत आह - अमुत्र वा इति । अमुष्मिन् लोके । उपलक्षणमेतत्, इह लोकेऽपि ब्रह्मणा बृहता वीर्यवतेत्यर्थः । यजुषा यजुर्मन्त्रेण बह्वीः कुरुते । मन्त्रसामर्थ्याद् अल्पस्य बहुभवनं तैत्तिरीयक आम्नातम् — ' धान्यमसि धिनुहि देवानित्याह । एतस्य यजुषो वीर्येण । यावदेका देवता कामयते तावदाहुतिः प्रथते । नहि तदस्ति यत्तावदेव स्याद् यावज्जुहोति ' ( तै ० ब्रा ० ३।२।६।३ ) । ' यद्वेवेष्टका धेनूः कुरुते । वाग्वा अयमग्निर्वाचा हि चितः स यदाहैका च दश चान्तश्च परार्धश्चेति वाग्वा एका वाग् दश वागन्तो वाक् परार्धो वाचमेव तद्देवा धेनुमकुर्वत तथैवैतद्यजमाना वाचमेव धेनुं कुरुतेऽथ यत्सन्तनोति वाचमेव तत्सन्तनोत्येता मे अग्न इष्टका धेनवः सन्त्वमुत्रामुष्मिल्लोक इत्येतद्वा एना अस्मिल्ला के धेनूः कुरुतेऽथैना एतदमुष्मिल्लोके धेनूः कुरुते तथो हैनमेता उभयोलकियोर्भुञ्जन्त्यस्मिश्चामुष्मिश्च ' ( श ० ९ | १ | २ | १७ ) । तदेवेष्टकाधेनुकरणं वाग्धेनुकरणात्मना प्रशंसति - यद्वेवेति । मन्त्ररूपया वाचा चितत्वादग्नि-र्वागात्मकः । एकत्वादिकाः संख्या अपि वाचा प्रकाश्यमानत्वाद् वागात्मिकाः । एवं च सत्यग्न्यवयवी भूताना-मिष्टकानाम् ' एका च दश च ' इत्यादिसंख्याप्रकाशकेन मन्त्रेण देवा वाचमेव धेनुमकुर्वन् । अत एव यजमानोऽपि तथैव करोति । एकत्वादिसंख्यानां वागात्मकत्वाद् उत्तरोत्तराधिकसंख्यासन्तानेन वाचमेव भूयसीमविच्छिन्नां सम्पादितवान् भवतीत्याह -- अथेति । ननु ' इमा मे अग्न इष्टका धेनवः ' इत्यनेन धेनुरूपत्वसम्पादनात् ' एता मे अग्ने ' इत्यादिना पुनरपि तदेव सम्पाद्यत इति पौनरुक्त्याशङ्कां निवारयति - एतद्वा इति । ' इमा मे अग्ने ' इत्यनेनैता इष्टका अस्मिन् लोके धेनुः करोति, ' एता मे अग्ने ' इत्यनेन स्वर्गे धेनूः करोति । अतः पृथगर्थत्वान्न पुनरुक्तिः । अध्यात्मपक्षे - चयनादेरपि परमेश्वराराधनरूपत्वात् चित्याग्न्यवयवभूताः पूर्वोक्ता इष्टकाः पूर्वोक्तरीत्या स्पृष्ट्वा अग्नि परमेश्वरं पूर्ववत् सम्बोध्य प्रार्थयते । यद्वा कश्चिद् भक्तः पाण्डुरङ्गाय भगवते सशक्तिकाय आसनत्वेन एकैकामिकां दत्त्वा भगवतो मन्दिरादिनिर्माणाय शेषा इष्टकाः प्रयोजयति । तासामिष्टकानामिदं धेनूकरणम् । व्याख्यानं तु पूर्ववदेव । दयानन्दस्तु – ' इष्टसुखसाधकत्वाद् यज्ञसामग्रय इष्टकाः । ता एव गोतुल्या भवन्तु । वेदिगता वा इष्टका एव धेनुतुल्या भवन्त्विति वा । अग्निपदेन तु विद्वान् सम्बोध्यते ' इति, सर्वोऽप्ययमर्थ उपेक्षणीयः,

पृष्ठ 120

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 120 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८४ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० १७ अपर्याप्तत्वात् । तथाहि-- एकादिपरान्तानां संख्यानामत्र के उपयोग नोपयोगमुक्तवान् । न चात्र मन्त्रबलेन इष्टकानां धेनूकरणम्, न वा इति तु नोक्तवान् । विदुषः सम्बोधनस्यापि एवार्थः ॥ २ ॥ बह्वीकरणमत्रोक्तम् । एवं सत्यपर्याप्त

ऋतवः स्थ ऋता॒वृर्ध ऋतुष्ठाः स्थं ऋता॒वृधः॑ ।

घृत॒श्च॒तो ' मधुश्च॒तो वि॒राजो॒ नाम॑ काम॒दुघा अक्षीयमाणाः ॥ ३ ॥

मन्त्रार्थ - हे इष्टके, तुम सत्य या यज्ञ को बढ़ाने वाली वसन्त आदि ऋतुओं में स्थित हो । घृत और मधु का क्षरण करने वसन्त वाली आदि ऋतुरूप हो, यज्ञ को वृद्धि करने वाली कामना पूरी करने वाली हो । हमारी कामनाएं अक्षय रूप से पूरी करो हो, विराज नाम से प्रसिद्ध हो, तुम सबकी ॥ ३ ॥

बृहती पङ्क्तिर्वा, अष्टात्रिंशदक्षरत्वाद्विकल्पः । अग्निदेवत्या यूयम् एवंविधाः स्थ भवथ, ता मे धेनवः सन्त्विति पूर्वेण सम्बन्धः इष्टकादेवत्या वा । हे इष्टकाः! या कोदृश्यः? ऋतावध ऋतं सत्यं यज्ञं वा वर्धयन्तीति ऋतावृधः । कीदृश्यः? ऋतवो वसन्तादिरूपाः । पुनः ऋतुष्ठा ऋतुषु वसन्तादिषु तिष्ठन्तीति । स्थशब्दस्य पुनरुक्तिः । संहितायामित्यधिकारे दीर्घः पूर्वपदस्य । घृत तो घृतं इच्योतन्तीति घृतश्च्युतो घृतस्राविण्यः । छान्दसे पादपूरणाय । ऋतावृध इति पुनर्वचनमादरार्थम् । मधुरच्युतो मधुस्राविण्यः । छान्दसे यकारलोपे मधुश्चुत इति यकारलोपे घृतश्चुतः । मधुश्चुतो मधुश्च्योतन्तीति इति विराजः । दशलोकम्पूणाभिप्रायमेतत् । अथवा । नामेति प्रसिद्धौ । विराजो विशेषेण राजन्ते दीप्यन्ते तथोक्ताः । यत्काम्यं तस्य दोग्ध्रयः पूरयित्र्यः । नाम्ना विराज इति ख्याताः । कामदुघाः कामान् दुहन्तीति Ear | अक्षीयमाणा न क्षोयन्ते इत्यक्षीयमाणाः क्षयरहिताः ' दुहः कन्वश्व ' ( पा ० सू ० ३ ( २/७० ) इति कपू, ह्कारस्य च । एवंविशेषणविशिष्टा भवथेत्यर्थः । अत्र ब्राह्मणम् ~ ' ऋतवः स्थेति । ऋतवो होता इत्यहोरात्राणि वा इष्टका ऋतुषु वा अहोरात्राणि तिष्ठन्ति ऋतावृध इति सत्यवृध इत्येतदृष्टाः स्थ ऋतावृध कुरुते ' ( श ० ९ | १ | २ | १८ ) । तत्रैव मन्त्रान्तरं प्रदर्शयन् धृतश्चुतो मधुश्चुत इति तदेना घृतश्चुतश्च मधुश्चुतश्च सवत्सरात्मकस्य अग्नेरवयवत्वात् । अहोरात्राणि वा व्याचष्टे - ऋतवः स्थेति । एता इष्टका ऋतवः खलु, इष्टका नामभिरुपाह्वयन्त यथायथैना एतदाचक्षते इष्टकाः, तथात्वादेव । ' विराजो नामेति । एतद्वै देवा एता नान्यो निममित्यस्ता विराजो नामाकुर्वत ता एनानभ्युपावर्तन्त ता एनानभ्युपावर्तन्ताथ लोकम्पृणा एव पराच्यस्तस्थु रचिहित-मन्त्रयते तदेना विराजः कुरुते दशाक्षरा हि विराट कामदुधा तस्माद्दशदशेष्टका उपधाय लोकम्पूणयाऽभि-कुरुते ' ( श ० १ / २ / १ ९ ) । एतस्मिन् काले खलु देवा यथायथा अक्षीयमाणा इति तदेनाः कामदुघा अक्षीयमाणाः आचक्षते जनास्तैरेव नामभिः स्वयमप्युपाह्वयन्त । ततश्चैता एता इष्टका आचक्षाणा येनमभिरेना इष्टका अथ लोकम्पूणा इत्येता अविहितनाम्न्यो धेनुरूपतया निमेमिहत्यो इष्टका एतान् देवान् अभ्युपावर्तन्त समीपमगमन् । पराङ्मुख्य एव तस्थुः । अन्यासामिष्टकानां स्वयमातृष्णा रेतः सिग्विश्वज्योति नितरां मेहनं कुर्वन्त्यः, अत्यर्थं मूत्रं विसृजन्त्यः विद्यन्ते । लोकम्पूणानां तु तथा प्रातिस्विकनामधेयाभावादित रपस्या- प्राणभृदित्यादिकानि नामानि इत्यर्थः । पश्चाद् देवास्ता इष्टका विराङ्नाम्नीरकुर्वत, अतः रेष्टकावत् स्वसमानाङ्खानेन विमुखीभूता अवस्थिता वसरेऽपि लोकम्पृणा दश दशोपवाय मन्त्रेण अभिमन्त्रयते । एवं स्वयमपि तत्समीपमगमन् । अत एव तदुपधाना-भवतीति मन्त्रे लोकम्पूणा उद्दिश्य विराजो नामेति प्रयुक्तम् । स्पष्टमन्यद् च सति विराजो दशाक्षरत्वादेता विराजः कृतवान् ब्राह्मणम् ।