वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 21–30

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 21–30

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( २१ ) परमात्मा के इन स्वरूपों की उपासना करनी चाहिये । आगे बताया गया है कि इनकी उपासना न करने पर ये क्रुद्ध हो जाते हैं । अतः इनकी सौम्यता के लिये उपासना अपेक्षित है । ४२ वें मन्त्र में पवमान को वेदान्त की दृष्टि से ब्रह्मवरिष्ठ कहा है । ४३ वें मन्त्र भगवद्गीता के प्रमाण से ज्ञान की निर्मल पवित्र शक्ति को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है । अगले मन्त्र में दुर्गासप्तशती के विस्तृत उद्धरण के आधार पर वैश्वदेवी भगवती की आराधना वर्णित है । यही राज-राजेश्वरी सौन्दर्यलहरी के प्रमाण से नीप वन में निवास करती है, मोक्षलक्ष्मी को देने वाली है । ४७ वें मन्त्र में भगवद्गीता के प्रमाण से देवयान और पितृयान मार्ग का उल्लेख कर इनकी महिमा वर्णित है । यहीं ब्रह्मसूत्र आदि के प्रमाण से इन द्विविध गतियों का निरूपण कर भगवान् शंकराचार्य की पद्धति से आतिवाहिक मार्ग आदि का भी स्वरूप प्रदर्शित है ( पृ ० २६७ - २६ ९ ) । जिज्ञासुओं के लिये यह प्रकरण विशेष रूप से अवधेय है । अगले मन्त्र ( १ ९ ।४८ ) में अन्न, पयस्, रेतस् जैसे शब्दों का आध्यात्मिक अर्थ किया गया है । अगले कुछ मन्त्रों में अभियुक्तवचन, महाभारत, भागवत पुराण आदि के प्रमाण पर सौम्य, बर्हिषद्, अग्निष्वात्त आदि पितरों को और कव्य-वाहन जातवेदा को परमात्मा का ही स्वरूप मान कर उनकी उपासना विहित है । ७१ वें मन्त्र में इन्द्र को परमेश्वर के रूप में वर्णित कर कहा गया है कि इनकी कृपा के बिना नमुचि रूपी अज्ञान का आवरण नष्ट नहीं होता । ७४ वें मन्त्र में बताया गया कि नीर और क्षीर के विवेक में निपुण हंस के समान जो साधक सार और असार तत्त्वों के विवेक में निपुण है, वह सांसारिक मृगतृष्णा में न पड़ कर शिवामृत का पान करता है । अगले मन्त्र में बताया गया है कि राजस और तामस वृत्तियों से मुक्त जीव ही मायामय पाश को काट सकता है । ७७ वें मन्त्र में कहा गया है कि परमेश्वर हो सत्य और असत्य के भेद का उपदेशक है । तदनुसार ही जीव में आस्तिक और नास्तिक भाव जागृत होते हैं । ८० वें मन्त्र का उपदेश है कि आचार्य और त्रयी विद्या से प्राप्त ज्ञानरूपी यज्ञ का अनुष्ठान करने से ही जीव का उपाधिजन्य सांसारिक स्वरूप विलीन होकर शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है । इस अध्याय के अन्तिम कुछ मन्त्रों में पुनः परमेश्वर की सर्वात्मकता वर्णित है । ८६ मन्त्र में बताया गया है कि सोत्रामणी गत स्थाली आदि पात्र ही इन्द्र के रुग्ण शरीर को स्वस्थ करने के लिये आंत आदि का रूप धारण कर लेते हैं । यह सब उस परमात्मा का लीलाविलास है । वही सौत्रामणी का और उसके उपकरणों का भी रूप धारण कर लेता है । इन सबसे उस परमात्मा का सार्वात्म्य ही प्रकट होता है । अन्तिम मन्त्र ( १ ९९ ५ ) में सौत्रामणी याग के उपदेशक उस परमात्मा के प्रति नमस्कार निवेदित है । इस खण्ड के अन्तिम २० वें अध्याय के अनेक मन्त्रों में साधक अपनी अपने विविध अंगों की तथा धन, ऐश्वर्यं और यश की रक्षा के लिये भगवान् से प्रार्थना करता है । मन्त्रद्रष्टा कहता है कि हे परमेश्वर आपके इन भक्तों की आप रक्षा करें । प्रथम मन्त्र में ही बताया गया है कि अंकुश के बिना जैसे हाथो और लगाम के बिना जैसे घोड़ा अनियमित हो जाता है, उसी तरह से क्षात्र धर्म परमात्मा के नियन्त्रण के बिना पथभ्रष्ट हो सकता है, धर्मविरोधी आचरणों में लिप्त हो सकता है । तृतीय मन्त्र के अश्विनी शब्द से अश्विनीकुमारों के समान परम सुन्दर भवरोग के वैद्य राम और लक्ष्मण का ग्रहण किया गया है । ' पृष्ठी में ' ( २०१८ ) मन्त्र में साधक को राष्ट्र के प्रति समष्टिभावना का उपदेश है, क्योंकि व्यष्टिभावना मृत्यु को और समष्टिभावना अमृतत्व को प्राप्त कराती है । नवें मन्त्र में साधक अपने नाभि आदि अंगों में चित्त आदि की भावना करता है । अगले मन्त्र में पुनः समष्टि भावना का उपदेश है । ११ वें मन्त्र में प्रार्थना की गई है कि ३३ देवता ब्रह्मज्ञान की सम्पत्ति प्रदान कर अविद्यालक्षण संसार से हमें मुक्ति दिलावें । अगले मन्त्र में रक्षा का प्रकार प्रदर्शित है कि ब्रह्मात्मसाक्षात्कार में श्रुति और सूत्र के अनुसार साधक सभी की अपेक्षा रखता है । १३ वें मन्त्र में प्रतिपादित है कि साधक भौतिक व्यष्टि कार्यकारणसंघात रूप न होकर समष्टिभावना द्वारा ज्ञेय हिरण्यगर्भ-स्वरूप है | आगे साधक वायु, सूर्य, मासर कुम्भ आदि के विभिन्न रूपों में विद्यमान परमात्मा की प्रार्थना करता है । १ ९ वें मन्त्र में प्रार्थना की गई है कि साधक का हृदय ब्रह्माकाराकारित वृत्ति से ब्रह्मानन्द रस से परिपूर्ण हो जाय, काम - क्रोध आदि उसके आध्यात्मिक शत्रु पराभूत हों । C

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( २२ ) २१ वें मन्त्र में ब्रह्म के उपासक अपने अनुभव का वर्णन करते हैं और २३ वें मन्त्र में जगत् के यावत् पदार्थों प्रकाशिका चिति - शक्ति की स्तुति है । इसी तरह से अगले मन्त्र में व्रतपति अग्निस्वरूप परमात्मा स्तुत को हैं कि ब्राह्म और क्षात्र तेज को सदा अविरोध भाव से रहना चाहिये । २६ वें मन्त्र में निर्दिष्ट है कि हैं । वेदों आगे में बताया के गया पर और अपर दोनों ही रूप प्रसिद्ध हैं । २७-२८ मन्त्रों में विश्वविस्मारिका ब्रह्मानन्दानुभूति की प्रार्थना है । ३३ ब्रह्म वें मन्त्र में निवेदनीय द्रव्य के प्रति उक्ति है कि मैं तुम्हें राम और लक्ष्मण, बलदेव और श्रीकृष्ण एवं ज्ञानरूपिणी सरस्वती निर्गुण - निराकार परमात्मा के लिये ग्रहण करता हूँ । अगले मन्त्र में निवेदित द्रव्य की प्रार्थना है । ३६ वें मन्त्र का के कहना लिये, कि इन्द्ररूपी परमात्मा धर्ममेघ नामक समाधि के विविध मार्गों का उद्घाटन करता है । ३७ वें मन्त्र में वानर, भुसुण्डी, है आदि से परिवृत भगवान् श्रीराम की आराधना का विधान है और आगे के तीन मन्त्रों ( २०१३८-४० ) में श्रीराम गरुड़ की महिमा वर्णित है । ४१ वें मन्त्र में बताया गया है कि तुलाविद्या और मूलाविद्या, अर्थात् बुद्धि और प्रकृति मिल कर नाना जन्मों के कर्मों की वासना से मलिन होकर परमात्मा को अपने स्वरूप में न देख कर जगत् के रूप में देखने लगती है । अगले मन्त्र में सत्व और क्षेत्रज्ञ का होता के रूप में वर्णन हैं और ४३ वें मन्त्र में सुषुम्ना, इडा और पिंगला नामक तीन नाड़ियाँ वर्णित हैं । ४५ वें मन्त्र में बताया गया है कि यूपभावापन्न परमात्मा, अथवा वृक्षभावापन्न यमलार्जुन पाशबद्ध भगवान् के स्पर्श से जैसे मुक्त हो गये, उसी प्रकार दुग्ध, दधि नवनीत आदि से उनकी सेवा करने वाला साधक भी अपने शुद्ध श्रीकृष्ण में प्रतिष्ठित हो जाता है | अगले मन्त्रों ( २०१४७ - ४ ९ ) में श्रीराम को, तब ( २०१५० -५२ ) इन्द्र की स्तुति है । स्वरूप दो विशिष्ट श्लोक भी यहाँ उद्धृत हैं ( पृ ० ३३ ९ ) । आगे बताया गया है कि भक्तगण विष्णु, राम अथवा इस प्रसंग से भावना के अनुसार भजते हैं । यहाँ भी भक्तियोग के प्रतिपादक दो विशिष्ट श्लोक हैं ( पृ ० ३४१ ) । ५५ वें मन्त्र कृष्ण में को ‘ अश्विनौ अपनी ’ पद का अर्थ सीताराम अथवा पार्वतीपरमेश्वर तथा धर्मं पद का ' ध्यान ' अर्थ कर भक्त की भावना को अभिव्यक्ति ५६ वें मन्त्र में श्रीमद्भागवत और सीतोपनिषद् के प्रमाण से राम, लक्ष्मण और सीता की आराधना वर्णित है । आगे दी गई है । में विष्णुपुराण के अनुसार भक्ति को महिमा बताते हुए भक्ति - मन्दाकिनो बहाई गई है । इस अध्याय में अश्विनी के मन्त्रों सरस्वती पदों के अनेक अर्थ किये गये हैं । और ६१-६२ मन्त्रों में विद्या और अविद्या दशा का वर्णन है । यहाँ बताया गया है कि ये एक के बिना दूसरो कुछ भी करने में असमर्थ है । देह, बुद्धि आदि और श्रवण, मनन आदि अविद्या के दोनों परस्पर सापेक्ष हैं, से ब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है । ६४ वें मन्त्र में अश्विनी पद से शास्त्र और आचार्य का तथा सरस्वती विलास हैं और इन्हीं mart faurant औषधि का ग्रहण कर बताया गया है कि इनके सेवन से पाशविक कल्पनाओं के निवर्तक वैदिक पद से उपासना प्रवृत्ति होती है और इससे भगवान् के प्रति प्रेमभाव अंकुरित होता है । ६५ वें मन्त्र में भुशुण्डीरामायण काम कर्मों को के अनुसार वर्णित हैं कि ऋतुकाल की प्रतीक्षा किये बिना हो वृक्ष श्रीराम के लिये फल प्रदान करने लगे और रामचरितमानस सरस्वती पदों के अनेक अर्थों की चर्चा ऊपर की जा चुकी है । ७८ वें मन्त्र में जगत् को अग्नीषोमात्मकता थे । अश्विनी और सोम प्रकृति और अग्नि पुरुष है । इनके संयोग से विश्व की उत्पत्ति होती है । आगे के मन्त्रों में विविध का निरूपण है । की स्तुति की गई है । यहाँ ब्रह्माकाराकारित चित्तवृत्ति के निष्पन्न होने की प्रक्रिया भी वर्णित है । रूपों में भगवान् मन्त्र ( २०१० ) में यह कामना की गई है कि श्रीराम सीता के प्रति पत्नीबुद्धि से और लक्ष्मण इस अध्याय के अन्तिम भक्त समर्पित द्रव्य का सोमबुद्धि से पान कर भक्त पर अनुग्रह करते हैं । मातृबुद्धि से प्रीतिमान् होकर स्वामी दयानन्द के भाष्य को समालोचना वेदार्थपारिजातकार ने स्वामी दयानन्द के भाष्य का चुन - चुन कर खण्डन किया है ११- १५ अध्यायों के भाष्य - निष्कर्ष ( पृ ० २३ - २५ ) में प्रकाश डाला गया है, अतः यहाँ पिष्टपेषण । इसकी सामान्य प्रक्रिया पर arrot में आये कुछ विशेष स्थलों की ही चर्चा की जायगी! से बचने के लिये १६-२०

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( २३ ) १६ वें अध्याय में अवरस्तु, अपरस्त्वाह, अपर आह, अन्य आह इत्यादि शब्दों से स्वामी दयानन्द ही बोधित हैं । यहाँ इन्होंने रुद्र पद का अर्थ राजा किया है, यह " रूढियोंग मपहरति " इस प्रसिद्ध न्याय के विपरीत है । द्वितीय मन्त्रगत गिरिशन्त पद का और आगे भी इसी तरह के अनेक पदों का अर्थ इन्होंने छोड दिया है । अनेक स्थलों पर पदों का अर्थ करते समय सायण आदि का अनुसरण किया है, किन्तु कहीं - कहीं उसको विकृत कर दिया है और उसके लिये कोई प्रमाण नहीं दिया । इनके बताये अनेक अर्थों से वेदों की अज्ञातज्ञापकता नष्ट हो जाती है । सप्तम मन्त्र के दयानन्दीय अर्थ की विशेष रूप से समालोचना की गई है । भाषानुवाद के सहारे जिज्ञासुओं को इसे अवश्य देखना चाहिये । नमः पद का अर्थं नमस्कार होता है, किन्तु यहाँ ( पृ ० २१ ) अन्न आदि भोग्य पदार्थ, शस्त्रास्त्र बल आदि किया है, जिसमें कि कोई प्रमाण नहीं दिया गया । ९वें मन्त्र में मुच् धातु का योजन अर्थ कर ' परावत ' क्रिया पद से शत्रु पद का अध्याहार किया है । इस प्रकार के अध्याहार में कोई प्रमाण नहीं है । १० वें मन्त्र में ' किम् ' शब्द की आक्षेपार्थकता तथा कपर्द पद का मुकुट के अर्थ में प्रयोग भी निष्प्रमाण है । इसी तरह से आगे के मन्त्रों में शस्त्रागार, शतघ्नी जैसे शब्दों का प्रयोग वेदविरुद्ध है । कुछ शब्दों का दुबारा प्रयोग भी शास्त्रविरुद्ध है । अनेक जगह इन्होंने काल्पनिक अर्थों की योजना की है । १४ वें मन्त्र में रुद्र की बाहुओं का वर्णन है । यह वर्णन उनके निराकारवाद के विपरीत पड़ता है, अत: उन्होंने इसका अर्थ पाश्ववर्तिनी सेना कर दिया । १५ वें मन्त्र में ईश्वर पर आरोपित वैषम्य और नैर्घुण्य दोषों का परिहार किया गया है और शास्त्रों के प्रमाण से यह भी बताया गया है कि भक्ति और स्तुति से सभी प्रकार के प्रत्यवाय दूर हो जाते हैं । स्वामी दयानन्द ने भी इस बात को स्वीकार किया है, किन्तु उनके अनुसार मन्त्र में संयोजित राजा अथवा सेनापति स्तोता के जन्मान्तरीय कर्मों में परिवर्तन करने में सामर्थ्यहीन हैं । आगे के मन्त्रों में हिरण्यबाहु आदि पदों का इन्होंने सेनापति, शिल्पी, सेवक, राजमन्त्री आदि अर्थ किया है, जिससे कि निराकारवाद को बचाया जा सके, किन्तु वहां इनकी कोई संगति नहीं बैठती । नमः शब्द का अर्थ सर्वत्र अन्न नहीं किया जा सकता | वेद में सेना, राष्ट्र, राज्य आदि शब्दों का प्रयोग वेद की प्रकृति के विपरीत है । इस अध्याय के २३ से ६५ संख्या तक के मन्त्रों का दयानन्दीय अर्थ इसी पद्धति पर चला है, अतः यहाँ उनका अलग से उल्लेख न कर अन्तिम ६६ वें मन्त्र में बताया गया है । कि स्वामी दयानन्द ने यद्यपि अनेक स्थानों पर इन मन्त्रों में आये पदों का अर्थ उन्चट और महीघर के अनुसार ही किया है, तो भी अनेक पदों का अर्थ करने में अपनी मनमानी को छोड़ा नहीं है । अनेक पदों की इस प्रकार की असंभव व्याख्या का यहाँ उल्लेख किया गया है । भाषानुवाद के सहारे उसको देखा जा सकता है । १७ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में स्वामी दयानन्द पर्वताकार मेघों में छिपी विद्युत् के उपयोग के लिये वायु के समान क्रिया कुशल मनुष्यों की बात करते हैं । यह अर्थ मुख्यार्थ के त्याग और गौणार्थं के ग्रहण के बिना सम्भव नहीं हैं । और ऐसा अर्थ की अनुपपत्ति के बिना नहीं किया जा सकता । दूसरे मन्त्र इन्होंने इष्ट का अर्थं यज्ञसामग्री और अग्नि अर्थ विद्वान् किया है, किन्तु ऐसा करने का प्रयोजन क्या है, यह उन्होंने नहीं बताया । आगे के मन्त्रों में कहीं स्त्री, कहीं सभापति, कहीं विदुषी स्त्री और कहीं विद्वान् पुरुष को सम्बोधित किया गया है । इन सब पदों का यौगिक अर्थं तब तक नहीं लिया जा सकता, जब तक कि रूढि विद्यमान हो । यहाँ कुछ पदों का अर्थ ही नहीं किया । १० वें मन्त्र में सेनापति को सम्बोधित कर बल ( सेना ) और राज्य की चर्चा है, किन्तु ये दोनों पद मन्त्र में हैं ही नहीं । मन्त्रगत ' ततृषाणः ' पद का अभी यहाँ गलत किया गया है । इसी तरह से ११ वें मन्त्र में नमः, हेतयः शिवः - इन पदों के अर्थ सही नहीं दिये गये हैं । १२ वें मन्त्र में सभापति के न्यायासनस्थ होने का निर्देश और वेट् पद की विविधार्थता भी विचारणीय है । १३ वें मन्त्र में विद्वान् का अताद विशेषण अनावश्यक है, क्योंकि यदि कोई विद्वान् हुताद होता, तब इसकी आवश्यकता पड़ती । १ ९ वें मन्त्र में स्वामी दयानन्द परमाणुओं से आकाश की उत्पत्ति की बात कहते हैं । यह कथन स्पष्ट ही श्रुति और दर्शनशास्त्र के भी विपरीत है | यही स्थिति इस मन्त्र के बाहु, पाद आदि शब्दों के अर्थ की भी है । अनेक पदों का अर्थ स्वामी दयानन्द ने मनमाना किया है । २५ वें मन्त्र में प्रजापुरुषों को सम्बोधित कर ' चक्षु ' का अर्थ उपदेशक किया है । यह सारा अर्थं अस्त-

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( २४ ) व्यस्त है | उपदेशक का पिता कौन है? वह घृत को कैसे पैदा करता है? उसको ऐसा करने का अधिकार किसने दिया? यह सब कुछ ' अव्यापारेषु व्यापारम् ' है । २६ वें मन्त्र की व्याख्या में दोष यह है कि यहाँ यम्, प्राप्य और जीव पद का निर्मूल अध्याहार किया गया है । ' सप्त ऋषीन् ' शब्दों से पाँच प्राणों के ग्रहण में कोई प्रमाण नहीं है । मरीचि आदि सात ऋषि शास्त्रों में अवश्य प्रसिद्ध हैं । २८ मन्त्र में भी अनेक पदों और क्रियाओं की उनके बताये अर्थ में शक्ति नहीं है । यही स्थिति २ ९वें मन्त्र के प्रथम और गर्भ शब्दों की है । ३० वें मन्त्र में निर्विकार ब्रह्म में गर्भाधान की चर्चा निष्प्रमाण है । भगवद्गीता में प्रकृति अथवा शक्ति का कारण के रूप में वर्णन है, गर्भ के रूप में नहीं । ३१ वें मन्त्र में नीहार पद का अर्थ धूम किया गया हैं । यह भी निष्प्रमाण है । ३२ वें मन्त्र में धनंजय को प्राणों का पिता मान कर आकाश से भी पहले उसकी उत्पत्ति बताई गई है । धनंजय को उपप्राणों में गणना की जाती है । वह प्राणों का पिता कैसे हो सकता है? फिर प्राण तो वायुरूप है । ऐसी स्थिति में उसकी आकाश से पहले उत्पत्ति कैसे मानी जा सकती है? इन्द्र पद का अर्थ सेनापति करना भी निर्मूल है ( पृ ० ११४ ) । भुशुण्डी, शतघ्नी आदि अर्थों की कल्पना भी निराधार है ( पृ ० ११५ ) । इन्द्र, बृहस्पति आदि शब्दों की मुख्यार्थता के रहते उनका गौणार्थं करना गलत है, किन्तु अर्धनास्तियों को ऐसा अर्थ करने के लिये बाध्य होनापड़ता है । ४४ मन्त्र में ' निर्ऋति ' पद का अर्थ ' प्राणापनेत्री क्षत्रिया ' किया है । यह ठीक नहीं है । वस्तुतः ' निर्ऋति ' ' प्राणापनेत्री कृत्या ' का पर्याय है, क्षत्रिया से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है । इस मन्त्र की व्याख्या महात्मा दयानन्द ने ऐसी की है, जो कि उनकी ही उक्ति के विपरीत है । ४५ वें मन्त्र में बाणविद्या में कुशल सेनापति को पत्नी के युद्ध में जाने की चर्चा की गई है । वीर पुरुषों के रहते ऐसी कल्पना आर्यमर्यादा के विपरीत है । ४६ वें मन्त्र को व्याख्या में दोष यह है कि यहाँ समीपस्थ पदों का अन्वय न कर उनको दूरस्थ पदों से संयोजित किया गया है, जो कि उचित नहीं माना जाता । ४७ वें मन्त्र में अपव्रत और तमस् शब्द का अर्थ गलत किया गया है । दूरस्थ पदों से अन्वय करने का दोष ५१ मन्त्र में भी है । ५४ वें मन्त्र में यज्ञ पद का अर्थ गृहाश्रम और देव पद का अर्थ विद्वान् किया है । यह सब सही नहीं है । इस विषय की चर्चा भूमिका - भाग के देवता सम्बन्धी प्रकरण में विस्तार से हो चुकी है । सूत्र और ब्राह्मण ग्रन्थों के विपरीत व्याख्या करना तो इनकी क्षेत्रिय व्याधि है, स्वभाव बन गया है ( पृ ० १२८ ) । उक्थ आदि वैदिक शब्दों के अर्थों का या तो इनको ज्ञान नहीं है, अथवा ये जानबूझ कर इनका मनमाना अर्थं करते हैं । ' धर्म ' पद ' महावीर ' के अर्थ में प्रयुक्त है । उसका अर्थ ' अग्निहोत्र ' कथमपि नहीं हो सकता ( १७ ) ५५ ) । अगले मन्त्र में बताया गया है कि संविधान आदि से उपस्थित योग्य पद को छोड़ कर अनुपस्थित दूरस्थ पद से अन्वय जोड़ना उचित नहीं माना जाता । विद्वान् मनुष्य की प्रसन्नता के लिये यज्ञ करने की कोई आवश्यकता नहीं है, वह तो अन्य कार्यों से भी प्रसन्न हो सकता है । जगत् को धारण करने की सामर्थ्य उसमें है भी नहीं । ५८ वें मन्त्र की समालोचना में बताया गया है कि ' ददाति ' पद का मन्त्र में अभाव हैं और मंन्त्र में आये केश पद का अर्थ यहाँ नहीं दिया गया है । विद्या पद भी मन्त्र में नहीं | स्वामी दयानन्द के भाष्य में इस प्रकार के दोष सामान्य रूप से अनेक स्थलों पर मिलते हैं कि वे निर्मूल अध्याहार करते रहते हैं और मन्त्रगत कुछ अनभोष्ट पदों को अपनी व्याख्या में छोड़ देते हैं । ५ ९ वें मन्त्र में उन्होंने ' अभिचष्टे ' पद का अर्थ गलत किया है और सविता को स्थिर सिद्ध किया है, जो कि " देवो याति भुवनानि पश्यन् ” इस मन्त्र वचन के विपरीत है । सविता की स्थिरता को भूमिका - भाग में स्थापित किया जा चुका है । ६० वें मन्त्र में अन्ति अथवा अन्तु शब्द का अर्थ बन्धन दिया है, जो कि हमारे लिये विचारणीय है । ६२ वें मन्त्र में बताया गया है कि शाब्दी मर्यादा का उल्लंघन उच्छृङ्खलता को ही जन्म देता है । इस पद्धति से अर्थ करने पर तो उनके अपने मत के विपरीत भी बातें उसी मन्त्र से निकाली जा सकती हैं । यहाँ ( १७१६२ ) ' देवान् ' पद का अर्थ दिव्य गुण अथवा दिव्य भोग करना उसी का उदाहरण है । ६३ वे मन्त्र में सेनापति पद है ही नहीं । यही स्थिति ६४ वें मन्त्र की हूँ । वहाँ सेनापति पद का प्रयोग द्विवचन में किया गया है, जिसका कोई आधार नहीं है । ६६ वें मन्त्र में सभेश का पूर्व

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( ३५ ) दिशा में गमन किस लिये निर्दिष्ट है, इसका कोई प्रयोजन वहाँ नहीं बताया गया । सिद्धान्त पक्ष में तो आहवनीय अग्नि की स्थिति यज्ञशाला की पूर्व दिशा में रहने से प्राचीगमन उचित ही है । द्यावापृथिवी के मध्य में सोपाधिक सुख की ही प्राप्ति हो सकती है, आत्यन्तिक सुख की नहीं । भगवद्गीता में भी यही बात कही गई है ( पृ ० १४१ ) । ७१ वें मन्त्र में अक्षि पद का अर्थ चक्षु तो हो सकता है, किन्तु चक्षुविज्ञान अर्थ बिना लक्षणा के सम्भव नहीं है और लक्षणा के लिये अन्वयानुपपत्ति अथवा तात्पर्यानुपपत्ति अपेक्षित है, जो कि यहाँ नहीं है । ७२ वें मन्त्र में पर्णं शब्द का अर्थ पूर्णं तथा गरुत्मान् का अर्थ गुर्वात्मा क्रिया है । प्रक्षेप और अव्याहार द्वारा व्याख्या करना कभी उचित नहीं माना जाता । इस मन्त्र में सविता, राज्यम् आदि पदों का निरर्थक आक्षेप किया गया है, जब कि सिद्धान्त की पद्धति से बिना इन पदों का आक्षेप किये मन्त्रार्थ परिपूर्ण हो जाता है । अगले मन्त्र में अग्नि पद का अर्थ योगाभ्यास से प्रकाशित आत्मा किया से सुप्रतीक, योनि, विश्वेदेव आदि शब्दों का मनमाना अर्थ कर दिया गया है । शब्दशास्त्र की इस अराजकता है । इसी तरह अनेक स्थलों पर की जा चुकी है । की चर्चा यहाँ अर्थ, काम और मोक्ष का ग्रहण भी ७४ वें मन्त्र में कण्व पद प्रसिद्ध अर्थ को छोड़ दिया गया है और यहाँ अविद्यमान यथा तथा पदों का निरर्थक अध्याहार किया गया है । ७५ वें मन्त्र में अग्नि पद का अर्थ योगी किया है । बिना लक्षणा के यह सम्भव नहीं है योगाग्नि में दुःख के होन की बात भी निराधार है । भगवान् पतंजलि द्वारा प्रदर्शित चित्तवृत्ति के निरोध से । की निवृत्त हो सकती है । चार्वाक दर्शन का अनुसरण करते हुए स्वामी दयानन्द ने सिद्धियों को अस्वीकार कर अवश्य दिया दुःख है । अतः संकल्प की सिद्धि से भी ऐसा नहीं हो सकता । ७८ वें मन्त्र में चित्ति और जुहोमि पदों का अर्थ निराधार हैं मन्त्र में अग्नि को सात समिधाओं का उल्लेख किया है, किन्तु उनके नाम नहीं बताये गये । सात ऋषियों । ७ ९ वें अपान आदि का ग्रहण किया है, जब कि इनकी संख्या १० है । घाम पद से धर्म, के रूप में प्राण, प्रतारणामात्र है । सात होता और सात ऋत्विक् कौन हैं? यह भी यहाँ प्रदर्शित नहीं है । ८० वें मन्त्र में ईश्वर को ज्योतिर्मय बताया गया है | आपके मत से निराकार ईश्वर कैसे ज्योतिर्मय हो सकता है? ८४ वें मन्त्र में मरुत् पद का अर्थ विद्वान् किया हैं । इसी तरह से इस मन्त्र में ' सदृक्षासः ' इत्यादि अनेक पदों का अर्थ निराधार है । ८६ वें मन्त्र में इन्द्र पद का अर्थ सामान्य राजा कर विद्वानों की प्रजा और मूर्खों को प्रजा का उल्लेख है । यह सब निराधार कल्पनामात्र निश्रेयस की सिद्धि ही वेदोपदेश का प्रयोजन है । इसके विपरीत अर्थ को उसमें से निकालना अनुचित है है । अभ्युदय और ज्ञापकता ही शास्त्र निर्दिष्ट है, कारकता नहीं ( पृ ० १६१ ) । ८ ९ वें मन्त्र में ऊर्ध्वगामिनी मधुमती तरंगों । फिर शब्द की गया है, किन्तु ऐसी तरंगें न तो शास्त्रों में निर्दिष्ट हैं और न कहीं उपलब्ध ही हैं । अगले का उल्लेख किया पदों का निराधार अर्थ किया गया है । मन्त्र में भी अवमीत् यज्ञ आदि ' चत्वारि शृङ्गाः ' ( १७ ९ १ ) मन्त्र की व्याख्या में इनको अनपेक्षित रूप से निरुक्त किन्तु महाभाष्यकार और निरुक्तकार ने यहाँ यज्ञ, सवन आदि की जो व्याख्या की है, उसे ये स्वीकार का सहारा नहीं लेना पड़ा है, मत से वायुशुद्धिमात्र यज्ञ का प्रयोजन है । इसके लिये सवनों की कोई अपेक्षा नहीं है । करते । इनके मानते । उनके बिना प्रायणीय, उदयनीय आदि शब्दों का अर्थ कैसे ज्ञात हो सकता है कात्यायन सूत्रों को ये प्रमाण नहीं ? ' सिन्धोरिव ' ( १७१५ ) मन्त्र में लहरियों को बात से अनुमेय बताया गया है । लहरियाँ तो प्रत्यक्ष हैं, इसके लिये अनुमान सामने खड़ा हो तब चीत्कार से उसका अनुमान करने को क्या आवश्यकता है? अगले की अपेक्षा नहीं है । हाथी जब की धारा बताया गया है । इसकी प्रस्तुत मन्त्र से कोई संगति नहीं बैठती । ९ ८ वें मन्त्र मन्त्र में में स्त्री वाणी - पुरुषों को घृत, अर्थात् ज्ञान को सम्बोधित कर इसके लिये उपदेश की अपेक्षा नहीं रहती । घन और प्रशंसा प्राप्त करने को कहा गया है । यह सब तो रागप्राप्त है, ' अभ्यर्षत ' क्रिया का ' प्राप्ति ' अर्थ भी निराधार हैं । संग्राम की प्राप्ति किसी के भी लिये कभी अध्याय के अन्तिम ( १७ ) ९९ ) मन्त्र में जगदीश और सभापति को सम्बोधित कर जो कहा अभीष्ट नहीं हो सकती । इस गया है, वह सर्वथा अस्पष्ट है ।

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( २६ ) सभापति के प्राणों के भीतर संसार की कल्पना भी निराधार है । सिद्धान्त पक्ष में तो “ विश्वं दर्पण दृश्यमाननगरीतुल्यम् ” इत्यादि दक्षिणामूर्ति स्तोत्र की पद्धति से संगति बैठ जाती है । तथा ' वाज: ' इत्यादि पदों के स्वामी १८ वें अध्याय के ' वाजच ' ( १८1१-२७ ) इत्यादि मन्त्रों में आये चकारों के प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि ये दयानन्द ने बिना प्रमाण के मनमाने अर्थ किये हैं । उनको किसी भी प्रकार से हैं । पारिजातभाष्यकार ने उस विषय को शतपथ ब्राह्मण, श्रौतसूत्र आदि के द्वारा समर्थित अर्थ के पूरी तरह से विपरीत है । २ ९वें मन्त्रपर्यन्त स्वामी दयानन्द के ७, २१ और २४ मन्त्र में उक्त मत के खण्डन के अवसर पर स्पष्ट कर दिया व्याख्यान की यही स्थिति है । ३१ वें मन्त्र में विद्वान् मनुष्यों से अभीष्ट सिद्धि की प्रार्थना की गई हैं, किन्तु विद्वान् होती सभी है मनुष्यों , प्रार्थनामात्र की कामना से पूरी नहीं कर सकता । अगले मन्त्र की भी यही स्थिति है, क्योंकि अन्न आदि की प्राप्ति प्रयत्न में मनुष्यों से को संबोधित कर जड़ नहीं । शस्त्र के प्रहार से भी उपदेशमात्र से कोई बच नहीं सकता । ३३ वे मन्त्र अन्न की प्रार्थना का निर्देश किया गया है । जड़ पदार्थ की कोई क्यों प्रार्थना करेगा वेग रूप गुण की सहायता से वसन्त मन्त्र में जयेयम् आदि ऋतुएँ समीचीन गुणों का समर्थन करती है, इस अर्थ की क्या संगति है? ' वाज: ' ( १८ ३४ ) अर्थात् इत्यादि शुद्ध आत्मा के और यत् पद का बिना प्रमाण के अध्याहार किया गया 1 ३५ मन्त्र को व्याख्या में भोक्ता, है भी नहीं । ३७ वें पृथिवी, जल और ओषधि से संमिश्रण की चर्चा है । यह कैसे संभव होगा? मन्त्र में यह शब्द अदृष्ट उत्पन्न होता है, मन्त्र में अभिषेक से वाक्सिद्धि और ऐश्वर्य प्राप्ति की चर्चा है, किन्तु अभिषेक से कोई पुण्य या ) मन्त्र की इनकी इस बात को जब आप स्वीकार नहीं करते, तो यह कैसे संभव हो सकता है? ' ऋताषाट् ' ( १७:३८ और वाट् इन दो व्याख्या भी यहीं भाष्य में उद्धृत श्रुति के विपरीत होने से प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती । स्वाहा मन्त्र की व्याख्या भी शब्दों का प्रयोग एक साथ क्यों किया गया, इसका भी इनके पास कोई उत्तर नहीं है । ३ ९वें श्रुति के विपरीत ही है । कोई भी विद्वान् सूर्य नहीं हो सकता और न पृथिवी को धारण ही कर सकता है । भाष्यकार पदों का अर्थ - ने इस मन्त्र की व्याख्या में अन्य भी अनेक विसंगतियां दिखाई हैं । ४० वें मन्त्र में किया गया वाट् और स्वाहा भी वैदिक मर्यादा के विरुद्ध है । वक्ता उसको कँसे प्राप्त कर शंका उठती है कि किसकी ४४ वें मन्त्र में तो इनकी संस्कृत और हिन्दी व्याख्या में भी परस्पर कोई संगति नहीं है । ४ ९वें मन्त्र की व्याख्या में भी अनेक विसंगतियां हैं । यजमान जिसको चाहता है, जिसको प्राप्त करता है, सकता है? मनुष्य से आयु आदि की कामना पूरी तरह से असंगत है । ५० वें मन्त्र में यह नहीं है, उनमें तो सत्यक्रिया से किस विधि से धर्म आदि सुखतुल्य हो जाते हैं? मनुष्यों की सत्क्रिया से यह संभव पूरी तरह से मन्त्राक्षरों असत्क्रिया भी रहती है, उससे दुःखतुल्यता भी उत्पन्न हो सकती हैं । इस मन्त्र का भावार्थ तो से विपरीत है । ५२ वें मन्त्र में मनुष्य के दो पंखों की चर्चा की गई है, जिससे कि वह दुष्टों को मारता है । कार्यकारणभाव को हम पंख नहीं कह सकते, क्योंकि उनसे वह उड़ नहीं सकता । इधर के सारे मन्त्रों में यहाँ विद्वान् को सम्बोधित किया गया है, किन्तु मनुष्य में वह सामर्थ्य नहीं हो सकती, जिसकी कि इन मन्त्रों में चर्चा हैं । चेतन विग्रहवती देवता को ये स्वीकार नहीं करते । मनुष्य में जल की नदी बहा देने की भो सामर्थ्य नहीं है, वह घृत और दूध को नदा कहाँ से बहावेगा । ५८ मन्त्र के दयानन्दीय अर्थं का यहाँ विस्तार से खण्डन किया गया है । वेद नित्य हैं । उनमें किसी लौकिक घटना और इतिहास की कल्पना नहीं की जा सकती । भाख्यायिका सरलता से मन्त्रार्थ को समझाने के लिये दी जाती है । इनमें देवताओं के बाह्य अथवा आन्तर व्यापार के वर्णन के व्याज से वर्णाश्रम धर्म सम्बन्धी आचारों का वर्णन अवश्य मिल सकता है । ये आख्यायिकाएँ कहीं विधि की स्तुति में अर्थवाद का रूप ले लेती हैं और अर्थवाद के सहारे विधि की भी कल्पना कहीं - कहीं की जाती है ।

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( २७ ) ६३ वें मन्त्र में प्रस्तर और परिधि शब्द का अर्थं गलत किया गया है । वस्तुतः ये दोनों शब्द कुशमुष्टि और बहुपरिमित काष्ठय के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । इसी तरह से ६४ वें मन्त्र में पूर्त शब्द का अर्थ भी सही नहीं है है ॥ ६५ में मन्त्र में घृतधारा का तो विधान मिलता है, किन्तु वैदिक वाङ्मय में मधु की धारा का कहीं उल्लेख नहीं ६६ वें मन्त्र में जीव की सर्वव्यापकता का, घृत की प्रकाशकता का और अग्नि में हुत द्रव्य को अमृतता का उल्लेख है । दी गई आहुति तो नष्ट हो जाती है । आपके मत जीव को अणुप्रमाण कहा गया है, घृत स्वयं प्रकाशशून्य है और अग्नि में है । ६८ वें के अनुसार उससे अदृष्ट की उत्पत्ति भी नहीं होती । त्रिधातु और विमान पद का अर्थ भी यहाँ गलत मन्त्र में वृत्र पद का अर्थ वर्तमान शत्रु करने में कोई प्रमाण नहीं है । आवरक अज्ञान, मेघ या अन्धकार ही इसका अर्थं हो सकता है । ७१ वें मन्त्र कुचर पद का कुटिल गति और मृग का सिंहतुल्य अर्थं भी काल्पनिक है । इसी तरह से आगे के मन्त्र में वैश्वानर और परावत् शब्दों का अर्थ भी प्रमाणरहित है । मनुष्य की स्तुति की अपेक्षा परमेश्वर की स्तुति में ही मन्त्रों का विनियोग उचित है । ७३ वें मन्त्र में उपमावाचक कोई पद नहीं है । ७४ वें मन्त्र में वाज पद का अर्थं संग्राम में विजय प्राप्त करना बताया है और मनुष्य की अजरता की चर्चा है । जिसका जन्म हुआ है, वह जरा आदि विकारों से अवश्य ग्रस्त होगा और वाज पद के उक्त अर्थ में कोई प्रमाण नहीं है । ७६ वें मन्त्र में अग्नि पद का इन्द्र अर्थ करना भी प्रमाणशून्य है । १ ९ वें अध्याय के पहले ही मन्त्र में बिना प्रमाण के वैद्य और औषधी की चर्चा की गई है । यह शतपथ ब्राह्मण और कात्यायन श्रौतसूत्र से समर्थित नहीं है । आयुर्वेद में ही वैद्य और ओषधी की चर्चा उचित है । धर्म और ब्रह्म के प्रतिपादक वेद से इनको निकालना सर्वथा असंगत है । दूसरे मन्त्र में हवि पद से सामान्य भोजन का ग्रहण किया गया है और मेघ से सोम की उत्पत्ति मानी गई है । वस्तुतः ' हवि ' पद आहुति के अर्थ में प्रयुक्त है और सोम आदि की उत्पत्ति भूमि से होती है, मेघ से नहीं । इस पूरे अध्याय में सुरा और सोम की चर्चा है, किन्तु स्वामी दयानन्द ने नाना प्रकार की ओषधियों को और विद्वान् वैद्य की चर्चा मानी है । इसका उत्तर ऊपर दिया जा चुका है । सुरा और सोम दो भिन्न पदार्थ हैं । इनकी एकता भी नहीं मानी जा सकती । १० वें मन्त्र में विदुषी राज्ञो के लिये विषूचिका विशेषण दिया गया है । लोक में यह शब्द एक बुरे रोग के लिये प्रयुक्त है । सामान्य स्त्री के लिये भी इसका प्रयोग हमारे लिये उद्वेगकारी हो सकता है | ११ वें मन्त्र में पितृ ऋण से विमुक्ति की चर्चा एक दम निराधार है । फिर एक व्यक्ति के पुण्य - पाप किसी दूसरे व्यक्ति में संक्रान्त नहीं हो सकते । १२ वें मन्त्र में विसंगति यह है कि केवल वाणी से न तो रोग हो दूर हो सकते हैं और न ऐश्वयं की प्राप्ति ही हो सकती है । अश्विनीकुमारों और सरस्वती की योजना यहाँ तीन वैद्यों के रूप की गई हैं । इनमें दो पुरुष हैं और एक स्त्री । ऐसा करते समय इन्होंने प्रमाण नहीं दिया । मनमाना अर्थ करने का यही फल होता है कि कभी - कभी उसका जबाब देना भारी पड़ जाता है । अगले मन्त्र में भी दीक्षा, प्राग्रणीय आदि वैदिक शब्दों का व्युत्पत्ति के सहारे मनमाना अर्थं किया गया है । मासर, नग्न, महावीर, परिस्रुत्, सरस्वती, आसन्दी, कारोतर, यूप आदि शब्दों के अर्थ भी पूरी तरह से वैदिक प्रसिद्धि के विपरीत किये गये हैं । इस तरह के निरर्थक प्रसंगों को चर्चा यहाँ मात्र विद्वानों के मनोविनोद के लिये और उनके कौतुक वषट्कार से के लिये की गई है ( पृ ० २४६ ) । १ ९ वें मन्त्र में प्रैष, आप्री और अनुयाज शब्दों की भी यही स्थिति है । आहुति प्राप्त नहीं होती, दी जाती है । पुरोडाश, आमिक्षा, वाजिन, धाय्या, प्रगाथ, उक्थ, सवन, इडा, व्रत, दीक्षा, दक्षिणा आदि सभी वैदिक शब्दों की यहाँ पूरी तरह से दुर्गति को गई है । इन सबका निरूपण करने के साथ यहाँ ३० वें मन्त्र में " तं परमेश्वरं धर्मं वा आप्यते " इस वाक्यगत अशुद्धि को दिखाया गया है । ३१ वें मन्त्र में सौत्रामणी जैसे प्रसिद्ध शब्द का अर्थ भी गलत किया है । ३२ वें मन्त्र में बताया गया है कि आपके मत से यज्ञ से केवल वायु - शुद्धि होती है । इस स्थिति में उससे वीरभाव की प्राप्ति कैसे हो सकती है? यज्ञ की अन्तरिक्ष में स्थिति भी नहीं मानी जा सकती, क्योंकि आप अदृष्ट को नहीं मानते । ३३ वें मन्त्र में आनन्द को ओषधि का रस बताना सर्वधा निरर्थक है, क्योंकि यह तो आत्मा

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( २८ ) का अर्थ अध्यापक करके जो कुछ कहा गया का धर्म है । इस मन्त्र में सरस्वती का अर्थ विदुषी और अश्विनीकुमारों की भी विचित्र स्थिति है । मृत पितरों के श्राद्ध की बात है, वह अतीव हास्यास्पद है । ३६ वें मन्त्र के दयानन्दीय अर्थ शब्दों का उच्चारण निरर्थक है । शास्त्रीय पद्धति से मनुष्यों आप स्वीकार नहीं करते । जीवित पितरों के लिये स्वधा आदि स्वाहाकारपूर्वक हवि आदि द्रव्य अर्पित किये जाते हैं । के लिये हन्तकार, पितरों के लिये स्वधाकार और देवताओं के लिये केवल मनुष्यों के लिये इन तीन तरह के शब्दों के आपके मत में पितरों और देवताओं की कोई स्थिति नहीं है, तो फिर उपवीती होकर किया जाता है । इसका भी कारण प्रयोग का प्रयोजन क्या है? पितृकार्यं अपसव्य होकर और देवकार्यं एक दोष यह भी आवेगा कि तब देवयान और पितृयान बताना होगा । मनुष्यों, देवों और पितरों में कोई भेद न करने शब्द से से माता - पिता के ग्रहण करने में कोई प्रमाण नहीं है । नामक दो मार्गों की क्या आवश्यकता है? फिर द्यावापृथिवी नहीं ( पृ ० २६२ ) । ' सृती ' शब्द से देवयान और पितृयान का ही ग्रहण होता है, जननमरण का है? अश्वमेघ सम्बन्धी महीघर व्याख्या की ४८ वें मन्त्र में अग्नि पद से पति का ग्रहण करने में क्या प्रमाण पर इस प्रकार का अश्लील अर्थ करते हैं, उसका अश्लीलता की स्वामी दयानन्द निन्दा करते हैं. किन्तु वे स्वयं स्थान का - स्थान अर्थ देखा जा सकता है । ४ ९वें मन्त्र में वृक शब्द का यह मन्त्र एक उदाहरण है । यहाँ ६२ वें मन्त्र में भी इसी प्रकार तरह से यम शब्द की सन्तानार्थता भी अप्रसिद्ध है ( पृ ० २७३ ) । अर्थं चोर किया है, किन्तु इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसी है । अगले मन्त्र में भी इसी तरह के अनेक पद अध्याहृत ५२ वें मन्त्र में अविद्यमान ' यं तं माम् ' पदों का अध्याहार अनावश्यक हैं । ५८ वें मन्त्र के ' अग्निष्वात्ताः ' पद का और अगले मन्त्र हैं । ५६ वें मन्त्र की संस्कृत और हिन्दी व्याख्याएँ परस्परविरुद्ध पद की भी यही स्थिति के स्वधा पद की और अगले मन्त्र नाराशंस के ' बहि ' शब्द का अर्थ अपारम्परिक है । ६० वें मन्त्र घुटने जोड़ कर दक्षिण दिशा में मुँह कर कुतप आदि का है । ६३ वें मन्त्र में दिवंगत पितरों की स्तुति की गई है, श्राद्ध क्योंकि, तर्पण आदि के विरोधी हैं । इसलिये ऐसे स्थलों पर इनको दान पितरों के लिये हो किया जाता है । स्वामी दयानन्द गये हैं । यहाँ ( पृ ० २८२ ) तो इनकी इनकी कल्पना के शिकार हो क्लिष्ट कल्पना करनी पड़ती है । हव्य और कव्य शब्द भी में हव्य और स्वधा शब्द का अर्थं यदि एक ही है, तब दोनों का एक व्याकरणगत अशुद्धि भी उजागर होती है । ६६ वें को मन्त्र स्वीकार किये बिना इस प्रकार के अर्थों की कोई कल्पना नहीं को जा साथ प्रयोग अनावश्यक है । चार्वाकों के सिद्धान्त में हैं ही नहीं । अरुणी पद सुशील स्त्री का बोधक है, इसमें भी कोई सकती । ६ ९वे मन्त्र में अविद्या और आवरण पद मन्त्र अथवा पुत्र किया गया है । स्थापन और संदीपन तो अग्नि का प्रमाण नहीं है । ७० वे मन्त्र के अग्नि पद का । अर्थ विद्यार्थी ही हो सकता है, पुत्र अथवा शिष्य का नहीं को उद्धृत कर दिखाया गया है । ७४ वें मन्त्र की व्याख्या में कितनी अस्पष्टता है, इसको है उनकी । यह वाक्यावली स्थिति स्वजन और श्वजन, सकृत् और शकृत् ७५ वें मन्त्र में इन्होंने अन्ध और अन्धस् शब्दों को एक ने ही अन्धस् मान लिया शब्द अन्धकारार्थक नहीं माना है । आगे के मन्त्रों में स्थित को एक मान लेने के समान है । किसी भी कोशकार गया है कि मन्त्रात्मक वेदभाग में विधि का उल्लेख नहीं है और अन्धस् शब्द की भी यही स्थिति है । ७८ वें मन्त्र में बताया वेद नहीं मानते । आगे के मन्त्रों में सौत्रामणी यागगत परिश्रुत्, सोस, विधि - निषेधप्रधान ब्राह्मणभाग को स्वामी दयानन्द अर्थ किया गया है । ८७ वें मन्त्र में कुंभ और कुंभी शब्द का अर्थ सूत्र, शष्प, वेम, नग्नहु, नासत्य आदि शब्दों का काल्पनिक नहीं है । ८ ९ वें मन्त्र में ' अश्विनी ' पद से दम्पती के ग्रहण को भी यही स्त्री और पुरुष किया गया है, किन्तु इसमें कोई प्रमाण छोड़ा है । अगले मन्त्र में अश्वि पद का अर्थ ढेर सारा खाने वाले स्त्री-स्थिति है | अश्लीलता ने इनका यहाँ भी पिण्ड नहीं तो अनेक मन्त्रों में देखने को मिलती है । ' अङ्गान्यात्मन् ’ पुरुष किया है | मन्त्रार्थ और भावार्थ की विसंगति और अस्पष्टता और आत्मा के समाधान की चर्चा की गई है । वस्तुतः समाधान ( १ ९।९ ३ ) मन्त्र में बिना प्रसंग के योगांगों का उल्लेख है में पण्डितराज जगन्नाथ ने कहा है- ' समाधानं बुद्धेः ' । इस चित्त का होता है, आत्मा का नहीं । जैसा कि गंगालहरी मन्त्रों के समान यहाँ भी ' अश्विभ्याम् ' पद से वैद्यों का ग्रहण अध्याय के अन्तिम मन्त्र को स्थिति यह है कि अन्य अनेक

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( २ ९ ) किया गया है । यहाँ विचारणीय विषय यह है कि जब इस पद से लौकिक वैद्य का ग्रहण करना है, तो उस शब्द के साथ वेदों में सर्वत्र द्विवचन के जुड़े रहने की क्या संगति है? सुतासुत शब्द की द्विवचनान्तता की भी यहाँ संगति नहीं बैठती शब्दों! ब्राह्मण ग्रन्थों में तो यहाँ परिस्रुत् और पयस् का ग्रहण किया गया है । इसलिये इनके लिये क्रमशः सुत और असुत का द्विवचनान्त प्रयोग शास्त्र संगत है । २० वें अध्याय का आरम्भ ' क्षत्रस्य योनि ' से होता है । यहाँ स्वामी दयानन्द ने क्षत्र का अर्थ राज्य किया है । वस्तुतः क्षत्र शब्द जातिविशेष में रूढ़ है । काशिका, सिद्धान्तकौमुदी और महाकवि कालिदास का प्रयोग – ये सब इसी अर्थ की पुष्टि करते हैं । मनुष्य मनुष्य की अपमृत्यु से रक्षा करने में असमर्थ है और इस तरह की प्रार्थना भी वीर पुरुषों के लिये उचित नहीं है । इसीलिये द्वितीय मन्त्र का अर्थ भी असंगत है । ' पस्त्या ' पद न्यायगृह के अर्थ में कहीं प्रयुक्त हुआ नहीं मिलता । छठे मन्त्र में अंगुलियों की मोद - प्रमोदरूपता असंगत है । सिद्धान्त पक्ष में तो सभी जड़ और अजड़ पदार्थों में ब्रह्म की भावना उसी प्रकार की जाती है, जैसे कि शालिग्राम में विष्णु की बुद्धि तथा स्त्री में अग्नि को बुद्धि । आगे माना के मन्त्रों के अर्थ में अखण्ड प्रतीकोपासना को न मानने के कारण असंगति रहेगी । सर्वत्र उद्देश्य और विधेय का भेद ही जाता है । आपके ऐसा न मानने से नर्वे मन्त्र का अर्थ असंगत हो जाता है । ११ वें मन्त्र में आठ वसु, दस प्राण, जीवात्मा, बारह मास, विद्युत् और यज्ञ - ३३ देवों के रूप में आपको मान्य हैं । इन सबकी रक्षा की सामर्थ्यं मनुष्य में नहीं है । ११ रुद्रों को आपने भी चर्चा की है । यहाँ उनको छोड़ देने का क्या कारण है? शस्त्र, स्तोत्र, पुरोनुवाक्या, याज्या, धाय्या, भारतीय वषट्कार – ये सब वेदों के पारिभाषिक शब्द हैं । १३ वें मन्त्र में इनका मनमाना अर्थ किया गया है । यह सब परम्परा के विपरीत है । स्वामी दयानन्द ने देव पद का अर्थ सर्वत्र विद्वान् किया है । यह हाथ के लड्डू को छोड़ कर अंगुलियों को चाटने वाली कहावत को चरितार्थं करने वाला है । विद्वान् मनुष्य भी अन्य जीवों के जाग्रत् अथवा स्वप्नावस्था में किये गये अपराधों को क्षमा करने में असमर्थ है । ' उद्वयम् ' ( २०२१ ) मन्त्र के अर्थ में भी विसंगति है, क्योंकि आपके मत से परमात्मा के नीरूप होने से उसकी चक्षुगोचरता असंभव है । हमारे मत में तो सूर्य का चक्षु से, हिरण्यश्मश्रुत्व आदि विशेषणों से संयुक्त परमात्मा का ध्यान से और नीरूप ब्रह्मज्योति का अपने प्रत्यगात्मस्वरूप से साक्षात्कार संभव है । आप तो आत्मा और परमात्मा का भेद मानने वाले हैं, अतः आपके यहाँ यह व्यवस्था संभव नहीं है । २२ वें मन्त्र में जलविद्या की चर्चा का कोई आधार नहीं है । वेद में मधुर जलपान की चर्चा का भी क्या तुक हो सकता है । २३ वें मन्त्र में अनेक पदों का निरर्थक अध्याहार किया गया है और स्वाहा पद का अर्थ भी पारम्परिक नहीं है । २४ वें मन्त्र में समित्, श्रद्धा आदि पदों का अर्थ निराधार है । २७ वें मन्त्र में आत्मगत अच्युत गन्ध और रस को चर्चा है । इसमें असंगति यह है कि एक तो आत्मा में इनकी स्थिति हो ही नहीं सकती, फिर ये भौतिक गन्ध और रस कभी अनश्वर नहीं हो सकते । २८ वें मन्त्र में ' किं त्वो वदति ' का अर्थ असंगत है । अगले मन्त्र में करम्भ और इन्द्र पद की भी यही स्थिति है । ३० वें मन्त्र में मरुत् पद के प्रसिद्ध अर्थ को छोड़ दिया गया है । सत्य की वृद्धि असंगत है और परमात्मज्योति के नित्य होने से उसकी उत्पत्ति भी नहीं मानी जा सकती । ३१ वें मन्त्र की ' पुनीहि ' क्रिया सकर्मक है, अतः उसका ' पवित्रा भव ' अर्थ नहीं किया जा सकता । ३३ वें है । ३८ वें मन्त्र में ' हवि ' मन्त्र में अश्वि, इन्द्र और सुत्राम पदों का अर्थ असंगत है । ३५ वें मन्त्र में वाक्यार्थं की असंगति । मन्त्रों से तो देवताओं का पद का अर्थ ' सद्विद्यादान ' किया है और मन्त्रों के द्वारा सेनापति के आह्वान का विधान है स्वयंवर का विधान बताते हैं । आह्वान किया जाता है । ४० वें मन्त्र में इन्द्र की स्तुति है, किन्तु स्वामी दयानन्द यहाँ का अनुगमन करें, यह भी ४१ वें मन्त्र में उषस्, पयस् आदि शब्दों का अर्थं निराधार है । सभी मनुष्य किसी शूरवीर वें मन्त्र में स्वष्टा पद का अर्थ जरूरी नहीं है, क्योंकि वीतराग मनुष्य के लिये इसकी कोई आवश्यकता नहीं है । ४४ शब्द के प्रसिद्ध अर्थ को ' विद्युत् के समान विद्वान् ' किया है, किन्तु इसमें कोई प्रमाण नहीं है । ४५ वें मन्त्र में वनस्पति D

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( ३० खिलवाड़ हो तो है । ४६ वें मन्त्र में ' घृतप्रुषा ' छोड़ कर ' वृक्ष समूह का पालक मनुष्य ' अर्थ किया है । यह आदि शब्दों पदों के साथ की तथा ४८ वें मन्त्र में तुर्वणि पद की भी यही पद का भी मनमाना अर्थ है । अगले मन्त्र में पूर्वी, तविषी और हरि पद का सुशिक्षित अर्थं किया है । वह भी स्थिति है । ४ ९वें मन्त्र में वज्री पद का अर्थं शस्त्रविद्याकुशल निष्प्रमाण है । और ५५ वें मन्त्र के ' अश्विनों ' का स्त्री-५२ वें मन्त्र में इन्द्र पद का अर्थ ' पिता के समान वर्तमान ' किया समय है कोश आदि का कोई प्रमाण नहीं दिया गया । पुरुष, धर्म का यज्ञ और इन्द्रिय का धन अर्थ किया है, किन्तु ऐसा – करते ये सब शब्द देवताओं के वैद्यों के लिये प्रसिद्ध हैं, जो ५६ वें मन्त्र की भी यही स्थिति है । अश्विनी, भिषजौ, नासत्यो वैद्य के साथ सदा दो संख्या के रहने का प्रयोजन कि दोनों सदा एक साथ रहते हैं । इस अर्थ के अभाव में लौकिक हो सकता है, किन्तु इससे स्त्री और पुरुष का ग्रहण बताना पड़ेगा । गौण अर्थं करने पर भी दो सुन्दर पुरुष तो अर्थ और नराशंस पद का अर्थ पूरी तरह से हास्यास्पद किस आधार पर किया जायगा? ५७ वें मन्त्र में नग्न पद की व्युत्पत्ति इनके यहाँ मूल से कोई संबन्ध नहीं रहता, इस है । ६२ वें मन्त्र में इन्द्र का अर्थ सोमलता किया गया है । भावार्थ का पद की व्याख्या पूरी तरह से श्रुति और सूत्र के बात की चर्चा तो यहाँ बहुत जगह हो चुकी है । ६६ वें मन्त्र में मासर अनोखा है । ७० वें मन्त्र के पदों की ऐसी व्याख्या को विरुद्ध है । ६७ वें मन्त्र में नमुचि और इन्द्र पद का अर्थ भी बड़ा ७२ वें मन्त्र में यूयं और प्राप्नोति पदों का व्यर्थ ही गई है कि आपस में इन पदों की संगति ही ठीक से नहीं बैठ पाती पुरुषार्थता । में भी कोई प्रमाण नहीं है । कहाँ तक गिनाया अध्याहार किया गया है । ७३ वें मन्त्र में निर्दिष्ट ' हु ' धातु की हैं । की विप्रतिपत्तियों के दर्शन होते जाय, स्वामी दयानन्द के किये अर्थ में सर्वत्र इसी तरह सरस्वती का अर्थ सुवर्ण से व्यवहार करने ७४ वें मन्त्र के संस्कृत और हिन्दी अर्थों में परस्पर विरोध है । यहाँ बार - बार देने का यह एक अच्छा प्रयास है । यह वाली स्त्री किया है । इस तरह से वेदों को चार्वाक की झोली में डाल और सरस्वती पद का प्रयोग सदा एकवचन में होता पूंछा जा चुका है कि वैद्यों के साथ सदा जो द्वित्व संख्या जुड़ी प्रमाण हुई है देना होगा । ७६ वें मन्त्र में मेघ की नित्यता बताई गई है, इसका क्या कारण है? इन्द्र पद की ऐश्वर्यार्थता में भी उसमें तो प्रवाहनित्यता भी नहीं मानी जा सकती । ७८ वें है । ग्रीष्म आदि ऋतुओं में मेघ की कोई स्थिति नहीं रहती, अतः नेत्र आदि के धारण - सामर्थ्य की अर्थ पूरी तरह से असंगत है | ८० वै मन्त्र में मनुष्यों के प्राण, मन्त्र में सोमपृष्ठ का अधीन नहीं है । ऐसा होता तो मनुष्य कभी मरता ही नहीं । ८४ वें चर्चा की गई है, किन्तु प्राण आदि का घारण मनुष्य के नहीं है, क्योंकि ज्ञान तो चिदात्मा का गुण है । ८७ वें मन्त्र में वाणी की विज्ञानाश्रयता बताई गई है, किन्तु यह सम्भव कोई धर्म का अंग नहीं है, जिसकी स्तुति में वेद की प्रवृत्ति मन्त्र का राजा की स्तुति में विनियोग बताया गया है । धन राजपूजा अर्थ किया है । क्या मनुष्य - जीवन की सार्थकता अन्न और धन के मानी जाय । ८८ वें मन्त्र में ब्रह्म पद का अन्न और पद के साथ सुत्रामा और वृत्रहा पदों का भी गोण उपार्जन में ही है? इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र ( २०1 ९ ० ) में अश्वि की सम्भावना के रहने पर गौण अर्थ करना ठीक नहीं अर्थ किया गया है । यह अनेक बार बताया जा चुका है कि मुख्यार्थ उपयोगिता भी नहीं है और न वह अश्विनीकुमारों है | सभी मनुष्यों को ओषधियों के रस के पान का उपदेश करने की कोई की तरह सबको सुलभ ही है । भाष्य के विशेष अवधेय अंश , निराकार स्वरूप के १६ वें अध्याय के पहिले और दूसरे मन्त्र ( पृ ० ४-६, १०-११ ) में परमेश्वर , वाल्मीकिरामायण के निर्गुण, महाभारत, पुराण साथ सगुण साकार स्वरूप की प्रतिष्ठा छान्दोग्य, बृहदारण्यक, केन आदि उपनिषदों आदि के प्रमाण से की गई । और रामतापनीय, गोपालतापनीय, नृसिंहतापनीय, त्रिपुरातापनीय, गणेशाथवंशीषं गया सूर्योपनिषद् है । यहाँ ( पृ ० ६ ) भाष्यकार ने है । साथ ही ईश्वर के एकत्व एवं अनेकत्व से सम्बद्ध पक्षों का भी समाधान किया