वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 31–40
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 31–40
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बताया है कि इस विषय की करें । आगे १७ वें मन्त्र के के साथ बृहदारण्यक उपदिष्ट धर्मारण्य आदि पुण्यारण्यों की सम्भारपूर्वक दी गई है । ( ३१ ) का अवलोकन जिनको विशेष जानकारी अपेक्षित है, वे भाष्यकार - रचित रामायणमीमांसा एवं क्रममुक्ति की चर्चा भाष्य में अचिरादि और धूमादि मार्ग की तथा सद्योमुक्ति, बदरिकारण्य और तृतीय मार्ग की भी चर्चा है ( पृ ० ३२-३३ ) । २० वें मन्त्र में वृन्दारण्य शब्द की व्युत्पत्ति यहां चर्चा है ( पृ ० ३८ ) । ' परि नो ' ( १६।५० ) मन्त्र स्थित अघायु शंकु आदि संख्याओं का स्वरूप बताया १७ वें अध्याय के दूसरे मन्त्र में वाल्मीकिरामायण के प्रमाण से कोटि महत्त्व , है । आचार्य उब्वट के अनुसार यहाँ गया है । ' य इमा विश्वा भुवनानि ' ( १७।१७ ) मन्त्र का दार्शनिक ' दृष्टि ( १७/२० से विशेष ) मन्त्र में भी दार्शनिक प्रश्नों को उठाया गया ज्ञानकर्मसमुच्चयवाद का प्रतिपादन किया गया है । ' कि स्विद्वनम् के रहने से इन सबका दार्शनिक दृष्टि से विशेष महत्त्व है | वस्तुतः यहाँ के अनेक मन्त्रों में ब्रह्मविषयक प्रश्न प्रतिवचनों का प्रमाण देकर अच्छा विचार किया गया है । ७० वें है । आगे ७६ वें मन्त्र में सूर्मी शब्द के अर्थ के विषय में मनुस्मृति संस्थाओं का विवरण दर्शनीय है । इस अध्याय की मन्त्र में सात छन्दों, सात घामों ( अग्नियों ), सात होताओं और सात है । यहाँ वाणी की महिमा विशेष रूप से गाई ' चत्वारि शृङ्गाः ' ( १७।९ १ ) आदि कई ऋचाओं का अपना दार्शनिक का उल्लेख महत्त्व करने वाले इस मन्त्र की निरुक्त और महाभाष्य गई है । परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी नामक चार वाणियों है । में ही नहीं, तन्त्रशास्त्र के ग्रन्थों में भी विशेष रूप से व्याख्या की गई देते समय वषट्कार और १८ वें अध्याय के ३८ वें मन्त्र में बताया गया है कि पुरुष ' देवता के लिये आहुति जी का उच्चारण किया जाता है । ४ ९ मन्त्र में स्वामी करपात्री स्वाहाकार का तथा स्त्री देवता के लिये केवल स्वाहाकार कर उसमें अपनी अरुचि प्रदर्शित की है । इस महाराज ने निरुक्त के प्राचीन व्याख्याकार स्कन्दस्वामी के मत को उद्धृत करते हुए स्वामीजी ने शाकटायन व्याकरण की भी प्रसंग में निरुक्त और व्याकरण की अलग - अलग भूमिकाओं का उल्लेख । १ ९ वें अध्याय के २५ वें मन्त्र में ' न्युंख ' पद पर चर्चा की है | यह प्रसंग विद्वानों के लिये विशेष रूप में विचारणीय है दिखाया गया है । पाणिनि सूत्र ( १।२३४ ) विचार किया गया है और इसके उच्चारण के क्रम को शास्त्रीय गया पद्धति है से । १७ वें अध्याय के १७ वें मन्त्र में धूमादिमागं काशिका, पदमञ्जरी, सायण आदि के मत को भी यहाँ दिखाया और शांकर भाष्य के आधार पर इन पर और अचिरादि मार्ग की संक्षिप्त चर्चा हुई है । यहाँ ( पृ ० २६७ - २६ ९ ) ब्रह्मसूत्र है । विस्तार से चर्चा की गई है । साथ ही आतिवाहिक मार्ग का भी उल्लेख को और विशेष अवधेय इस प्रकार यहाँ १६ से २० अध्यायों तक के मन्त्रभाष्य में विवेचित चतुर्विध भाष्य विषयों के विषयों की अवश्य कुछ न अंशों को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है । इससे हिन्दी पाठकों को भी इस अतिविशिष्ट को भी शीघ्र प्रकाशित करा देने के लिये हम कुछ जानकारी मिलेगी, ऐसा हमारा पूरा विश्वास है । भाष्य के शेष भागों सतत प्रयत्नशील हैं । वाराणसी माघी पूर्णिमा, संवत् २०४८ ( भा ०, पृ ० १ ९ ५ ) । १. " स्वाहाकारवषट्काराभ्यां पुंसे हूयते, स्वाहाकारेणैव स्त्रीभ्यः " विद्वद्वशंवद व्रजवल्लभ द्विवेदी
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प्रतिपाद्य विषय प्रकाशकीय वक्तव्य पञ्चाध्यायी ( १६-२० ) - भाष्य निष्कर्ष ४७-५३. ५४-६३. २- ३. विषय - सूची षोडश अध्याय: शतरुद्रिय होममन्त्र सप्तदश अध्याय: चित्यपरिषेकादि मन्त्र का चयनप्रदेश के स्पर्शपूर्वक इन जलकुम्भ के परित्याग के बाद ईशानाभिमुख यजमान दो मन्त्रों का सस्वर पाठ बांधकर यजमान द्वारा अग्निक्षेत्र का ४- १०. बाँस में मंडूक, शैवाल और वेतस को शाखा को कर्षण और अग्निस्तवन संयुक्त पात्र को लेकर अध्वर्यु का ११. दघि, मधु, घृत, दर्भमुष्टि और हिरण्यशकल से चित्याग्नि स्थल पर आरोहण की पांच यजुमंत्रों द्वारा पाँच १२. अध्वर्यु का स्वयमातृष्णा इष्टका पर पंचगृहोत घृत आहुतियों का प्रदान और उनसे सपक्षपुच्छ चित्याग्नि १३-१४. पात्र में लगे दधि, मधु और घृत का कुशा से ग्रहण का प्रोक्षण १५. अग्निचयन स्थल में अध्वर्यु का अवतरण आज्य की शालाद्वायं पर १६. प्रवर्ग्य के उत्सादन के बाद यज्ञशाला में आकर पंचगृहीत आहुति देवता की स्तुति १-१६. सोलह ऋचाओं वाले अनुवाक से एकात्मक रुद्र की स्तुति १७-२८. उभयतः नमस्कार मन्त्रों के द्वारा नाना रुद्रों ( जातसंज्ञक रुद्रों की स्तुति, पृ ० ४३ ) की स्तुति २८-४६. अन्यतरतः नमस्कार मन्त्रों के द्वारा नाना रुद्रों ४६. उभयतः नमस्कार मन्त्रों के द्वारा नाना रुद्रों की स्तुति ४६. रुद्रहृदयस्वरूप तीन देवताओं की स्तुति सात ऋचाओं से एकात्मक रुद्र देवता की स्तुति की स्तुति अवतान संज्ञक दस मन्त्रों के द्वारा त्रिलोकी स्थित नाना रुद्रों की स्तुति ६४-६६. प्रत्यवरोह संज्ञक तीन यजुर्मंन्त्रों से नाना रुद्रों जल से सिञ्चन १. सपक्षपुच्छ अग्नि का प्रदक्षिण क्रम से चारों तरफ
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( ३३ ) आठ मन्त्रों के द्वारा शालाद्वायं पर १७- २४. जुहू में सोलह बार गृहीत आज्य के अधं भाग की एक साथ आहुति मन्त्रों के द्वारा शालाद्वायं पर एक २५- ३२. पूर्वगृहीत आज्य के अवशिष्ट अर्धं भाग की आठ ३३- ४४. ४५-४८. ४ ९. ५०-५२. सूक्त का पाठ अध्वर्यु संप्रेषित ब्रह्मा द्वारा बारह ऋचाओं वाले अप्रतिरथ इन्द्र आदि की स्तुति के मन्त्र कात्यायन श्रौतसूत्र में अविनियुक्त इषु, योद्धा, मरुत् और का प्रदान महाव्रत याग में क्षत्रिय के लिये अध्वर्यु द्वारा कवच समिधाओं की शालाद्वार्यं अशुष्क, रात्रिपर्यन्त घृतप्लुत, प्रादेश प्रमाण तीन औदुम्बर आहुति अध्वर्यु द्वारा शालाद्वायं ५३. होता द्वारा मन्त्र को तीन आवृत्ति करने पर प्रदीप्त इध्म का से उत्थापन प्रतिप्रस्थाता और यजमान का ५४-५८. पांच ऋचाओं का पाठ करते हुए ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु, चयन - स्थान के प्रति गमन की दक्षिण दिशा में चित्र -५ ९ -६०. अध्वर्यु द्वारा दो ऋचाओं का पाठ करते हुए आग्नीध्र गृह वर्ण के पाषाण का उपधान पाठ करते हुए सभी का ६१-६४. उक्त पाषाण को गुह्य देश में स्थापित कर चार ऋचाओं का चयनस्थान के प्रति गमन पर आरोहण ६५-६९. ऋत्विग् गणों का पाँच मन्त्रों का पाठ करते हुए चयनस्थान इध्मस्थ अग्नि में आहुति ७०-७१. गोदुग्ध से स्वयमातृष्णा को सिंचित करते हुए अध्वर्यु अग्नि की द्वारा स्थापना ७२-७३. वषट्कारान्त दो मन्त्रों द्वारा स्वयमातृष्णा पर तीन समिघाओं का आधान ७४-७६. चित्याग्नि में उख्याग्नि की स्थापना के बाद उसमें ७७-७८. समिदाधान के बाद अग्नि में दो घृताहुतियों का अर्पण ७ ९. घृतपूर्णं स्रुक् से पूर्णाहुति का प्रदान से याग का सम्पादन ८०-८६. वैश्वानर पुरोडाश से याग करने के उपरान्त मारुत पुरोडाशों द्वारा वाचन, पक्षान्तर से ८७ - ९९. तेरह ऋचाओं वाले अनुवाक का अध्वर्यु- प्रेषित यजमान १-२९. अध्वर्यु द्वारा स्वयं ही पठन अष्टादश अध्याय: वसोर्धारा तथा अन्य होम मन्त्र वाली घृत आठ अनुवाकों की उन्तीस कण्डिकाओं से वसुधारा संज्ञक अविच्छिन्न धारा की आहुति का प्रदान हवन ३०-३६. वाजप्रसवीय आहुतियों के बाद सात मन्त्रों से सर्वोषधियों द्वारा , कृष्णाजिन का ३७. कर्म की समाप्ति पर चतुष्कोण खुवा का माहवनीय अग्नि में प्रक्षेप द्वारा सर्वोषधशेष से आस्तरण और उस पर बैठे ब्रह्मवर्चसकाम यजमान का अध्वर्यु अभिषेक में स्थित बारह मन्त्रों से ३८-४३. द्वादशगृहीत आज्य के बारह विभाग कर छः कण्डिकाओं राष्टभूत् संज्ञक बारह आहुतियों का प्रदान
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( ३४ ) पर पांच आहुतियों का प्रदान ४४. पंचगृहीत आज्य को पंचधा विभक्त कर रथशीर्ष वातहोम नामक तीन आहुतियों ४५. उत्तरवेदि के मध्य में प्राङ्मुख रथ के तीन स्थानों पर का प्रदान आहुतियों का पाँच कण्डिकाओं में स्थित नौ ४६-५०. पूर्वं संस्कृत आज्य से एक - एक कर नौ मन्त्रों से समर्पण ५०. अर्काश्वमेध सन्तति संज्ञक पाँच आहुतियां का संयोजन ५१-५३. तीन ऋचाओं से परिधियों पर अग्नि कर अग्नि का विमोचन ५४-५५. दक्षिणोत्तर परिधि सन्धियों का उपस्पर्शन दो आहुतियों का समर्पण ५६-५७. समिष्ट यजुः संज्ञक होम के बाद अग्नि - सम्बन्धी से आठ वैश्वकर्म आहुतियों का समर्पण ५८-६५. हृदयशूल के समीप आठ मन्त्रों द्वारा स्रुवा की भावना ६६. यजमान द्वारा अपने में अग्नि से अभिन्नता ६७. चित्याग्नि का उपस्थान ६८-७७ से चित्याग्नि का उपस्थान पुरीषनिवाप के बाद सात, आठ अथवा दस मन्त्रों एकोनविंश अध्याय: सौत्रामणी याग १. सौत्रामणी याग के लिये सुरा - निष्पादक द्रव्यों का क्रय २. गोदुग्ध से अध्वर्युं द्वारा सुरा का सेचन ३-४. पवित्र की गई सुरा का पालाश पात्र में स्थापन ५. वेतस वृक्ष के पात्र में पवित्र की गई सुरा की स्थापना ६. सुरा और दुग्ध से पूरित तीन पयो ग्रहों का ग्रहण ग्रहण ७. तीन सुराग्रहों के द्रव्यों का मृत्तिका निर्मित स्थालियों में व्यत्यस्त देना ८. अध्वर्यु द्वारा तीनों सुराग्रहों के द्रव्यों की अग्नि में आहुति गोधूम आदि के चूर्ण का प्रक्षेप ९. आश्विन ग्रह के ग्रहण के उपरान्त उसमें का श्येन पिच्छ से प्रोक्षण १०. अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता के द्वारा यजमानअग्नि के ईक्षण के लिये प्रैष देना ११. अध्वर्यु द्वारा यजमान का उत्तर वेदि की सोम याग की समानता का नाना १२- ३१. बीस अनुष्टुप् यजुर्मन्त्रों द्वारा सौत्रामणी याग और रूपों में प्रदर्शन ( भाष्य में न्यूंख के स्वरूप का विवेचन, पु ० २५० ) ३२. अध्वर्युं द्वारा तीन पयोग्रहीय द्रव्यों की एक साथ आहुति देना ३३. प्रतिप्रस्थाता द्वारा दक्षिणाग्नि में सुराग्रहों की पालाश आश्विन उलूखलों आदि से पयो आहुति ग्रहों का भक्षण ३४. अध्वर्यु, प्रतिप्रस्थाता और अग्नीत् आदि के भक्षण द्वारा, अवघाणन अथवा पान ३५. इन्हीं के द्वारा इसी क्रम से सौर ग्रहों का ३६. पक्ष के रूप में आहवनीय अग्नि में भक्षण, अवघ्राणन और पान के अतिरिक्त चतुर्थं ग्रहों की आहुति के ऊपर शिवय पर स्थापना और उसमें हिरण्य ३७-४४. शतच्छिद्रा कुम्भी की आहवनीय अग्नि आदि का प्रक्षेप
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( ३५ ) प्राचीनावोती दक्षिणमुख यजमान द्वारा सकृत् गृहीत आज्य की दक्षिणाग्नि में जुहू द्वारा आहुति उपवीती उत्तरमुख यजमान द्वारा सकृत् गृहीत आज्य की आहवनीय अग्नि में आहुति सभी ऋत्विजों द्वारा यजमान का अनुवर्तन और अध्वर्यु द्वारा दुग्ध की आहुति उखा स्थित शेष दुग्ध का यजमान द्वारा भक्षण तेरह ऋचाओं वाले अनुवाक के मन्त्रों का सोमपा, बर्हिषद् और अग्निष्वात्त नामक पितरों की प्रसन्नता के लिये अध्वर्यु प्रेषित यजमान द्वारा वाचन दस ऋचाओं वाले इस अनुवाक का पूर्वं अनुवाक की तेरह ऋचाओं के साथ श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन के समय वाचन ( पाठ ) । आठ ऋचाओं वाले अनुवाक से अध्वर्यु के द्वारा पयोग्रहों और सुराग्रहों का एक साथ उपस्थान सोलह मन्त्रों में से प्रत्येक के दो दो विभाग कर बनाये गये बत्तीस मन्त्रों से अध्वर्यु द्वारा बत्तीस वसाग्रहों की आहुति विंश अध्याय: सौश्रामणी याग दक्षिण और उत्तर वेदि के मध्य यथानिर्दिष्ट आसन्दी का निधान यजमान का कृष्णाजिन पर उपवेशन आसन्दी स्थित उद्वर्तित यजमान का अध्वर्यु द्वारा वसाग्रहशेष से अभिषेचन अध्वर्यु द्वारा यजमान का स्पर्श तथा यजमान द्वारा अपने सम्बन्धियों का आह्वान यजमान द्वारा अपने शरीर के विभिन्न अंगों का स्पर्श यजमान का आसन्दी से उतर कर कृष्णाजिन पर बैठना शस्त्र मन्त्र की समाप्ति पर वषट्कार का उच्चारण करते हुए यजमान द्वारा ३३ वें ग्रह की आहुति यजमान द्वारा ग्रहशेष का भक्षण अवभृथेष्टि के अनुष्ठान के बाद साढी चार कण्डिकाओं का पाठ करते हुए यजमान द्वारा मासरकुंभ का जल में अवतारण कण्डिकाशेष से मासरकुंभ को जल में डुबाना यजमान का अवभृथ स्नान से पहले दो डग आगे बढ़ कर जलग्रहण और शत्रु की दिशा में उसका प्रक्षेप यजमान दम्पती का अवभृथ स्नान के उपरान्त घृत वस्त्रों का जल में प्रक्षेप जल से निष्क्रमण, मन्त्रपाठ के साथ त्रिपशु - देश में प्रत्यागमन यजमान द्वारा आहवनीय अग्नि का उपस्थान यजमान द्वारा समिधा का ग्रहण और उसका अग्नि में प्रक्षेप सौत्रामणी के प्रारंभ में आदित्येष्टि के अनुष्ठान के बाद त्रिपशुनिमित्तक अन्वाधान और ब्रह्मवरण, यजमान द्वारा तीन मन्त्रों से आहवनीय अग्नि में तीन समिधाओं का आधान सुरा संसर्जन
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श्रवण कर्म के निमित्त घाना - होम २८. कारोतर से पूत सुरा का पात्र २ ९. ३०. ३१. ) ग्रहण अध्वर्युप्रेषित ब्रह्मा द्वारा साम के रूप में प्रस्तुत मन्त्र का गान ब्रह्मा द्वारा पूयमान दुग्ध का अनुमन्त्रण अध्वर्यु द्वारा तैतीसवें वसाग्रह का ग्रहण और हवन ३२- ३३. अवशिष्ट अंश का अवघ्राणन ३४-३५. तैतीसवें वसाग्रह के होम के अनन्तर ऋत्विजों द्वारा ३६-४६. ४७-५२. का विधान एकादश ऋचाओं में प्रथम ऐन्द्र पशु के प्रयाजयाज्या मन्त्रों वपा और पशुपुरोडाश के याज्यानुवाक्या मन्त्र ५३-५४. इन्द्र की स्तुति में विनियुक्त मन्त्र मन्त्र ५५- ६६. त्रिपशुसम्बन्धी प्रयाजयाज्या रूप बारह अनुष्टुप् छन्दोमय ६७-६९. तीन वपाओं के याज्या अनुयाज्या मन्त्र ७०-७२. तीन पशुपुरोडाशों के याज्यानुवाक्या मन्त्र ७३-७५. तीन हवियों के याज्यानुवाक्या मन्त्र ७६-७७. तीन पयोग्रहों और सुराग्रहों के याज्यानुवाक्या मन्त्र ७८-७९ ८० - ९ ०. पशु - स्विष्टकृद् याग के याज्यानुवाक्या मन्त्र प्रतिगर के लिये तैतीसवें वसाग्रह के सादन के अनन्तर अध्वर्यु का होता के सामने उपवेशन, होता द्वारा एकादश ऋगात्मक शस्त्र का शंसन
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षोडशोऽध्यायः
नम॑स्ते॑ रुद्र म॒न्यव॑ उ॒तो त॒ इष॑वे॒ नमः॑ः । ब॒हुभ्या॑मु॒त ते॒ नमः॑ ॥ १ ॥
मन्त्रार्थ - हे दुःखनाशक रुद्र! तुम्हारे क्रोध, बाण और हस्तों को हम प्रणाम करते हैं ॥ १ ॥
इतः पूर्वं पञ्चदशेऽध्याये चयनमन्त्रा उक्ताः । अस्मिन् षोडशेऽध्याये शतरुद्रियहोममन्त्रा उच्यन्ते । हिरण्यशकलैरग्निप्रोक्षणानन्तरं शतरुद्रियसंज्ञो होम: । ' अथातः शतरुद्रियं जुहोति ' ( श ० ९ | १ | १ | १ ) इत्युपक्रम्य ' स एषोऽत्र दीप्यमानोऽतिष्ठदन्नमिच्छमानः ' ( ० ९ | १ | १ | १ ) इत्यादिश्रुत्या बुभुक्षमाणस्याग्ने रुद्ररूपताव्याहरणात् तस्माद्भीतैर्देवैस्तत्तर्पणं कृतम् । तस्य आहवनीयाग्नौ होमे प्राप्ते तदपवादमाह कात्यायनः - ' शतरुद्रियहोम उत्तरपक्षस्यापरस्यां स्रक्त्यां परिश्रित्स्वर्कपर्णेनार्क काष्ठेन शातयन्त्सन्ततं जतिलमिश्रान् गवेधुकासक्तूनजा-क्षीरमेके तिष्ठन्नुदङ् नमस्त इत्यध्यायेन त्र्यनुवाकान्ते स्वाहाकारों जानुमात्रे, पञ्चान्ते नाभिमात्रे, प्राक् च प्रत्यवरोहेभ्यो मुखमात्रे, प्रतिलोमं प्रत्यवरोहान् जुहोति प्रमाणेषु नमोऽस्त्विति प्रतिमन्त्रम् ' ( का ० श्र ० १८ | १ | १-५ ) इति । उत्तरपक्षस्य वायव्यकोणे पूर्वं निखातासु जङ्घामात्र्याद्यासु परिश्रित्सु शतरुद्रियसंज्ञको होमः कार्यः । तत्प्रकारमाह - जतिलमिश्रितान् गवेधुकासक्तून् दक्षिणहस्तस्थितेन जुहूस्थानीयेन तिष्ठन्नुदङ्मुखोऽध्वर्युर्नमस्त इत्यध्यायेन जुहोति । किं कुर्वन्? तान् सक्नर्ककाष्ठेन सव्यहस्तघृतेन परिश्रित्सु पातयन् । एके आचार्य अत्र अजाक्षीरं जुह्वति, न जर्तिलमिश्रितान् गवेधुकासक्तून् । जतिला आरण्यतिलाः । गवेधुका आरण्यगोधूमा इति प्रथमसूत्रार्थः । अत्र नाहवनीय इति शेषणीयम् । ' नमस्ते ' इति षोडशर्च: प्रथमोऽनुवाकः । ततः पञ्चभिः पञ्चभिः भाष्य भाषानुवाद इसके पूर्व पन्द्रहवें अध्याय में चयन - मन्त्र कहे गये हैं । इस सोलहवें अध्याय में शतरुद्रिय होम के मन्त्र बताये जा रहे हैं । हिरण्य - शकलों से अग्निप्रोक्षणानन्तर शतरुद्रियसंज्ञक होम होता है । ' अथातः शतरुद्रियं जुहोति ' ऐसा उपक्रम कर ' स एषोऽत्र दीप्यमानोऽतिष्ठदन्नमिच्छमान: ' इस ब्राह्मण श्रुति ने बुभुक्षमाण अग्नि की रुद्ररूपता बताई है । उस कारण भयभीत हुए देवताओं ने उसको तृप्त किया है । उसका आहवनीय अग्नि में होम प्राप्त होने पर कात्यायन महर्षि उसका अपवाद बताते हैं - उत्तर पक्ष के वायव्य कोण में पूर्व से निखात की हुई जंघामात्र परिमाण की परिश्रित् में शतरुद्रियसंज्ञक होम करना चाहिये | उसका प्रकार बताते हैं - जर्तिलमिश्रित गवेधुका सक्तु की दक्षिण हस्त में स्थित जुहूस्थानीय ' नमस्ते ' इस अध्याय से उदङ्मुख खड़े होकर अध्वर्यु आहुति देता है । क्या करते हुए? सव्य हस्त में लिये हुए अकाष्ठ से उन सक्तुओं को की परिश्रित में गिराते हुए । अन्य आचार्य यहाँ पर अजाक्षीर की आहुति देना बताते हैं, जतिलमिश्रित गवेधुका सतुओं नहीं । आरण्य तिलों को जतिल कहते हैं । ' आरण्य गोधूमों को गवेधुक कहते हैं । इस प्रकार प्रथम सूत्र का अर्थ है । यहाँ ' नाहवनीये ' यह शेष रखना चाहिये । ' नमस्ते ' यह सोलह ऋचाओं का प्रथम अनुवाक है । उसके पश्चात् पाँच - पाँच कण्डिकाओं के दो अनुवाक हैं । इन छब्बीस कण्डिकाओं के अन्त में जानुमात्र परिमाण के परिश्रित् में स्वाहाकार करना चाहिये । यह द्वितीय सूत्र का अर्थ है । तदनन्तर ग्यारह कण्डिकाओं के चतुर्थ और पंचम दो अनुवाक हैं । उनकी समाप्ति पर ' सुधन्वने च ' जब कहा जाय, तब नाभिपरिमाण के परिश्रित में स्वाहाकार करना चाहिये । यह तृतीय सूत्र का अर्थ है । ' नमोऽस्तु रुद्रेभ्यः ' ये
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२ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० ] १६ कण्डिकाभिरनुवाकद्वयम् । एवं च षड्विंशतिकण्डिकानामन्ते जानुमात्रे परिश्रिति स्वाहाकारो विधेय इति द्वितीय-सूत्रार्थः । तत एकादशभिः कण्डिकाभिश्चतुर्थपञ्चमावनुवाकौ । तदन्ते सुधन्वने चेत्यत्र नाभिमा परिि स्वाहाकारः कर्तव्य इति तृतीयसूत्रार्थः । नमोऽस्तु रुद्रेभ्य इति तिस्रः कण्डिकाः प्रत्यवरोहाः । तेभ्यः प्राग् मुखमा परिश्रिति स्वाहाकारः कर्तव्य इति चतुर्थसुत्रार्थः । नमोऽस्त्विति कण्डिकात्रयेण प्रतिलोम होम: । ' नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि ' इति मुखमात्रे, ' नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो येन्तरिक्षे ' इति नाभिमात्रे, ' नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये पृथिव्याम् ' इति जानुमात्र इति पञ्चमसूत्रार्थः । अस्याध्यायस्य परमेष्ठिदेव प्रजापतयः ऋषयः । ' मानो महान्तम् मा नस्तोके ' इत्यनयोः कुत्सोऽपि ऋषिः । अत्र प्रथमः षोडशचऽनुवाक एकरुद्रदेवत्यः । आद्या गायत्री, तिस्रोऽनुष्टुभः, तिस्रः पङ्क्तयः सप्तानुष्टुभः, द्वे जगत् । अथ कण्डिकार्थ: -- यजमानाः, ऋत्विजः अन्ये वा भक्ता भगवन्तं नानारूपेण स्तुवन्ति । हे रुद्र परमेश्वर! रोदयतीति रुत् तापत्रयात्मकं संसारदुःखम्, दुःखहेतुर्वा - रुद् दुःखं दुःखहेतुर्वा द्रावयत्येव नः प्रभुः । रुद्र इत्युच्यते सद्भिः शिवः परमकारणम् ॥ अशुभं द्रावयन् रुद्रो यज्जहार पुनर्भवम् ॥ ' इदं वचनं ' रुद्र जलाष भेषज ' ( अ ० सं ० २२७/६ ) इति मन्त्रव्याख्याने सायणेनोद्धृतम् । तथा हि तदीयं वचनम् - ' अथवा रुद् रोदनकरं सांसारिकं दुःखम्, तद्धेतुभूतामविद्यां वा द्रावयति विनाशयतीति रुद्रः । तदुक्तं वायवीयसंहितायाम् - रुद् दुःखं दुःखहेतुर्वा तद् द्रावयति नः प्रभुः । रुद्र इत्युच्यते तस्मात् शिवः परमकारणम् ॥ ' इति । एवं च अशुभं द्रावयन् रुद्रः, भवं जन्ममरणाविच्छेदलक्षणं संसारमपहरन् हर इति स एव गीयते । यद्वा रुद् दुःखं पीडा रोगो विपत्तिर्वा, तद् द्रावयतीति रुद्रः, परमेश्वराश्रयणादेव दुःखाब्धिसन्तरणसम्भवात् तत्सम्बुद्धौ । यद्वा रवणं रुत् । ' रु शब्दे ' | शब्दस्य ज्ञान एवं पर्यवसानम, शक्तिग्रहादेः शब्देनैव जायमानत्वात् । रुद् ज्ञानं स्वात्मसाक्षात्काररूपं राति ददातीति रुद्रः, ज्ञानप्रद इत्यर्थ: । ' तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ' ( कठो ० ११२ २३ ), ' ददामि बुद्धियोगं तं ata afuser ' प्रत्यवरोह ' हैं । उनसे पूर्व मुखमात्र के परिश्रित में स्वाहाकार करना चाहिये । यह चतुर्थ सूत्र का अर्थ है । ' नमो s स्तु ' इन तीन कण्डिकाओं से प्रतिलोम होम करना चाहिये । ' नमो s स्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि ' से मुखपरिमाण वाले, ' नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ऽन्तरिक्षे ' से नाभि परिमाण वाले, और ' नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये पृथिव्याम् ' से जानुपरिमाण वाले परिश्रित में स्वाहाकार करना चाहिये । यह पंचम सूत्र का अर्थ है । इस अध्याय के परमेष्ठी, देव, प्रजापति ऋषि हैं । ' मा नो महान्तम् ', ' मा नस्तोके इन दो के कुत्स भी ऋषि हैं । इनमें प्रथम सोलह ऋचाओं का एक अनुवाक है और एकरुद्र देवता है । आद्या गायत्री, तीन अनुष्टुप् तीन पंक्ति, सात अनुष्टुप् छन्द की और दो जगती छन्द की ऋचाएँ हैं । कण्डिका का अर्थ यह है यजमान, ऋत्विक् अथवा अन्य भक्तगण भगवान् की अनेक रूपों में स्तुति करते हैं । हे रुद्र परमेश्वर! यह वचन ' रुद्र जलाष भेषज ' इस अथर्ववेद के मन्त्र की व्याख्या में सायणाचार्य ने उद्धृत किया है । वह उनका वचन इस प्रकार है - ' अथवा रुद् रोदनकरं सांसारिकं दुःखम्, तद्धेतुभूतामविद्यां च द्रावयति विनाशयतीति रुद्रः । तदुक्तं वायवीयसंहितायाम् --- ' रुद् दुःखं दुःखहेतुर्वा तद् द्रावयति नः प्रभुः । रुद्र इत्युच्यते तस्मात् शिवः परमकारणम् ॥ ' इति । एवं च अशुभ को जो खदेड़ देता है, उसे रुद्र कहते हैं । भव अर्थात् जन्म - मरण के अविच्छेद लक्षण संसार का अपहरण करनेवाला ' हर ' कहलाता है, अतः उसी को गाया जाता है । ' रोदयतीति रुत्, तापत्रयात्मक संसारदुःख, अथवा दुःखहेतु । कहा भी है- ' रुद् दुःखं दुःखहेतुर्वा द्रावयत्येव नः प्रभुः । रुद्र इत्युच्यते सद्भिः शिवः परमकारणम् ॥ अशुभं द्रावयन् रुद्रो यज्जहार पुनर्भवम् ॥ ' इति । इस रोति से अशुभ को नष्ट कर अपुनर्भव को जो प्राप्त कराता है, वह रुद्र ही है । अथवा ' रुत् ' यानी दुःख पीडा रोग अथवा विपत्ति को जो विनष्ट करता है, वह रुद्र है । परमेश्वर का आश्रय करने से ही.. दु: खसागर से पार होना संभव है । उसके संबोधन के एकवचन में हे रुद्र! कहा गया है । अथवा ' रवणं रुत् ', ' रु शब्दे '
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मन्त्रः १ ] वेदार्थ पारिजात भाष्यसहिता । यद्वा रुतिर्वेदरूपा वाणी, तथा येन मामुपयान्ति ते ( भ ० गी ० १० | १० ) इति श्रुतिस्मृतिभ्याम् तत्सम्बुद्धौ ।, यद्वा तत्सम्बुद्धौ रुत्या प्रणवरूपया वाण्या द्रावयति प्रापयति द्रावयति बोधयति धर्मब्रह्मादीति रुद्रः, ' द्रु गतौ ', प्रविशति मर्त्यानिति रुद्र: शिव उच्यते । स्वात्मानमिति रुद्रः, तत्सम्बुद्धौ । अथवा रोरूयमाणो द्रवति अपसारयति स रुद्रः, तत्सम्बुद्धी । अथवा रुत् शब्द रोधिका बन्धिका च शक्तिरेव रुत्, तां भक्तेभ्यो द्रावयति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ' ( २० उ ० वेदात्मानं कल्पादौ ब्रह्मणे ददातीति रुद्र:, ' यो ब्रह्माणं विदधाति ६।१८ ) इति श्रुतेः, तत्सम्बुद्धौ । अथवा पातकिनो जनान् दुःखभोगदानेन रोदयतीति उन्निनीषते रुद्रः परमात्मा एवेनमसाधुकर्म , शुभकर्मणामिवाशुभकर्मणामपि कारयति तं यमेभ्यो तस्यैव फलदातृत्वात् । ' एष ह्येवेनं साधु कर्म कारयति तं ' ( ब्र ० सू ० ३ | २ | ३८ ) इति श्रुतिसूत्राभ्याम् । तस्यैव लोकेभ्योऽधो निनीषते ( कौ ० ब्रा ० उ ० ३८ ), ' फलमत उपपत्तेः सोऽरोदीद्यदरोदीत् तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम् ' ( तै ० सं ० रुद्रस्य अंशभूतो रुद्रो ब्रह्मणो जातो रुरोदेति पौराणिका:, ' तस्य पूर्वदेहाद् देहान्तरगमनेन जनानां १ | ५ | १ | १ ) इति श्रुतेश्च, तत्सम्बुद्धी । अथवा एकादशेन्द्रियाधिष्ठातृदैवतरूपेण गिरित्रम् ' ( भा ० पु ० २ | १ | ३५ ) इति श्रीम-रोदन हेतुत्वादपि रुद्रः । एकादशत्वं चापि तेनैव, ' सर्वात्मनोऽन्तःकरणं शब्द से ही हुआ करते हैं । एवं च ' रुत् ' यानी यहाँ शब्द से तात्पर्य ' ज्ञान ' हो समझना चाहिये, क्योंकि शक्तिग्रह । तास आदि यह है कि स्वात्मसाक्षात्काररूप ज्ञान को देनेवाला ज्ञानम्, अपने यथार्थं अर्थात् स्वात्मसाक्षात्काररूपं राति ददाति इति ' रुद्र: ' स्वरूप को ' अर्थात् यह आत्मा उसके लिये ' रुद्र ' है, अर्थात् वह ' ज्ञानप्रद ' है । ' तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ते ये श्रुति और स्मृति के वचन उपर्युक्त कथन का प्रकट कर देती है । उसी तरह ' ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति समर्थन करते हैं । अथवा ' रुतिः ' वेदरूपा वाणी, उसके द्वारा द्रावयति यानी बोधयति = ज्ञान करा देता है, धर्म, ब्रह्म आदि का, एकवचन है - हे रुद्र! अथवा ' रुत्या उसे ' रुद्र ' कहते हैं । ' द्रु गतौ ' धातु से यह अर्थ निकलता है । उसकी संबुद्धि में यह जो पहुँचा देता है, उसे - प्रणवरूप वाणी के द्वारा, द्रावयति = प्रापयति स्वात्मानम् - आत्मतत्त्व के प्रति प्रणवरूपया वाण्या ' रुद्र ' कहते हैं, उसके संबोधन में हे रुद्र! कहा गया है । अथवा ' रोरूयमाणो द्रवति प्रविशति मर्त्यान् इति रुद्रः ', अर्थात् जो मत्यों को हैं, है, उसे ' रुद्र ' यानी ' शिव ' कहते हैं । राधिका और बन्धिका शक्ति को ही ' रुत् ' कहते रुद्र ' है । से दूर करता है, उसे ' रुद्र ' कहते हैं । उसके संबोधन का रूप ' हे देखता हुआ उनमें प्रवेश करता उस शक्ति को जो अपने भक्तों शब्द को कल्प के आरंभ में अथवा ' रुत् शब्दं वेदात्मानं कल्पादौ ब्रह्मणे ददातीति रुद्रः ', अर्थात् रुत् = वेदात्मक वै रही है - ' यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो ब्रह्मा के लिये जो देता है, उसे ' रुद्र ' कहते हैं । क्योंकि भगवतो में हे श्रुति रुद्र कह ! रूप है | वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ' ( श्वे ० उ ० ६।१८ ) । उसका संबोधन लोगों को दुःखभोग दिलाकर जो अथवा ' पातकिनो जनान् दुःखभोगदानेन रोदयतीति रुद्र:, अर्थात् पातको स्मृति के कर्म वह करवाता है, यह बात श्रुति रुलाता है, उसे रुद्र कहते हैं । जो पुण्यवान् या पापी रहते हैं, उनसे उत्पन्न वैसे होकर ही रोने लगा, ऐसा पौराणिकों ने बताया है । वचनों से अवगत होती है । उसी रुद्र का अंशभूत रुद्र ब्रह्मा से भी उसी बात को बता रहा है । उसके संबोधन ' सोऽरोदीद्यदरोदीत् तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम् ' ( तै ० सं ० १ | ५ | १ | १ ) यह श्रुतिवचन में हे रुद्र! रूप निष्पन्न होता है । से शरीरान्तर में जाकर लोगों के रुदन अथवा ग्यारह इन्द्रियों की अधिष्ठात्री देवता के रूप में उसके भी पूर्वं उसी शरीर से होती है । श्रीमद्भागवत में अहङ्कार के में जो कारणीभूत होता है, उसे रुद्र कहते हैं । उसकी एकादश संख्या
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शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० १६ द्भागवतेऽहङ्काररूपेणोपास्यत्वाभिधानात् । तथा चाह श्रीतोटकाचार्य: - ' यदि सा न भवेज्जनमोहकरी व्यवहारमिमं न जनोऽनुभवेत् ' इति । सा अहङ्कृतिरित्यर्थः, तत्सम्बुद्धौ । ते तव सम्बन्धिने मन्यवे क्रोधाय नमो नमस्का es-स्तु । उतो अपि च ते तव सम्बन्धिने इषवे काण्डाय शराय वा नमो नमस्कारोऽस्तु । उत अपि च ते सम्बन्धिभ्यां बाहुभ्यां नमो नमस्कारोऽस्तु । तव क्रोधबाणहस्ता अस्मदरिष्वेव प्रसरन्तु, नास्मास्वित्यर्थः । तव तस्य परमेश्वरस्य निर्गुणत्वे निराकारत्वे च सत्यपि लोकसंचालनाय भक्तहिताय च सगुणत्व त्वादिकं च । अनन्तानन्तब्रह्माण्डनिर्माणक्षमस्य तस्य दिव्यगुणविग्रहादिधारणे सुतरां सक्षमत्वम् । न चैतावतापि साकार-सगुणत्वनिर्गुणत्वयो: साकारनिराकारत्वयोश्च विरोधः, समानसत्ताकयोरेव भावाभावयोविरोधो न विषमसत्ताकयो-रिति न्यायस्य सुप्रसिद्धत्वात् । अत एव व्यावहारिकसत्ताकर जताभाववत्यामपि शुक्तिकायां प्रातिभासिकसत्ताक रजतं भवत्येव । तथैव भगवत्स्वरूपसत्तापेक्षया किञ्चिन्न्यून सत्ताकानां दिव्यगुणलीलाविग्रहादीनां सत्त्वे भावः । न च सत्यत्वे भेदाभावान्न वैषम्यमिति वाच्यम्, ' वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' बाधा- ( छा ० उ ० ६ ( १४ ), ' आप इत्येव सत्यम् ', ' तेज इत्येव सत्यम् ' इति श्रुतिषु सत्यभेदश्रवणात् । यथा साधारणराजापेक्षया राजराजस्य वैशिष्ट्यम्, तथैव ' प्राणा वं सत्यं तेषामेष सत्यम् ' ( बृ ० उ ० २११ ( २० ) इति भगवत: श्रोत्रस्य श्रोत्रत्व-वत्, मनसा मनस्त्ववत् सत्यानां सत्यत्वश्रवणात् । तथा च रामायणे - ' सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ह्यग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः । श्रियाः श्रीश्च भवेदग्रथा कीर्त्याः कीर्तिः क्षमा क्षमा । ( वा ० रा ० अ ० ४४ | १५ ) । यथा नित्यनिरति-शयदाहकत्वप्रकाशकत्ववतो वह्नेः प्रसादादेव अयस्पिण्डादी सातिशयानित्यदाहकत्वादिकं भवति, यथा वा नित्य-रूप में उसे उपास्य बताया है । इसी बात को श्री तोटकाचार्य भी बता रहे हैं - ' यदि सा न भवेज्जनमोहकरी व्यवहारमिमं म जनोऽनुभवेत् ' इति । यहाँ ' सा ' शब्द से अहंकृति समझनी चाहिये । उसकी सम्बुद्धि में ' हे रुद्र ' रूप बना है । है रुद्र! तुम्हारे क्रोध को मेरा प्रणाम रहे । उसी तरह तुम्हारे काण्ड अथवा शर को मेरा प्रणाम रहे । तुम्हारे दोनों बाहुओ को मेरा प्रणाम रहे । अर्थात् तुम्हारे क्रोध, बाण और हाथ हमारे शत्रुओं पर ही चलें, हम पर नहीं । उस परमेश्वर की निर्गुणता, निराकारता रहने पर भी लोकसंचालनार्थ और भक्त जनों के कल्याणार्थ उसकी सगुणता, साकारता भी हुआ करती है । अनन्त अनन्त ब्रह्माण्डों के निर्माण करने में समर्थ रहने वाले उस परमात्मा की दिव्यगुणविग्रह धारण करने में भी पूर्णरूपेण क्षमता है । उस कारण उसके सगुणत्व - निर्गुणत्व, साकारत्व - निराकारख के स्वीकार करने में कोई विरोध नहीं होना चाहिये । ' समानसत्ता वाले भाव -अभाव का विरोध हुआ करता है, विषमसत्ताक भाव - अभाव का विरोध नहीं है - यह नियम तो सर्वत्र सुप्रसिद्ध ही है । अत एव व्यावहारिकसत्ताक रजतभाव वाली शुक्तिका पर भी प्रातिभासिकसत्ताक रजत की प्रतीति होती ही है । उसी तरह भगवत्स्वरूप की सत्ता की अपेक्षा किञ्चित् न्यू सत्ता वाले दिव्यगुण लीलाविग्रह आदि के होने में कोई किसी तरह का बाघ होता दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है । सत्य में भेद न रहने से वैषम्य के अभाव की शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि श्रुति ने अनेक वचनों के द्वारा सत्य में भी भेद बताया है - ' वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' ( छा ० उ ० ६ ११४ ), ' आप इत्येव सत्यम् ', ' तेज इत्येन सत्यम् ' इति । जैसे साधारण राजा की अपेक्षा राजाधिराज की विशेषता रहती है, तथैव ' प्राणा वै सत्यं तेषामेव सत्यम् ' ( बु ० उ ० २।१।२० ) इस वचन से भगवान् के ' श्रोत्रस्य श्रोत्रत्वम् ', ' मनसो मनस्त्वम् ' के समान ' सत्यानां सत्यत्वम् ' भी सुना जाता है । उसी तरह रामायण में कहा भी है - ' सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ह्यग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः । श्रियाः श्रीश्च भवेदग्रया कीत्यः कीर्तिः क्षमा क्षमा । ( वा ० रा ० अयो ० ४४ । १५ ) । जैसे नित्य निरतिशय दाहकत्व प्रकाशत्व धर्मं वाले अग्नि के अनुग्रह से हो अयःपिण्ड आदि में अत्यधिक after दाहकत्व आदि धर्मं प्राप्त होते हैं, अथवा नित्य निरवद्य स्वप्रकाश चैतन्य के अनुग्रह से ही श्रोत्र आदि की वृत्तियों में अपने. विषय का प्रकाशत्व होता है, उसी तरह पारमार्थिक सत्त्वरजस्तमस् गुणों के सत्य होने से ही माया और उसके कार्यभूत