वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 51–60
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 51–60
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म ०५ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता १५ भिषग् वैद्यः, ' देवाद्यत्रो ( पा ० सू ० ४ १ ८५, वा ० २ ) इति रूपसिद्धिः । किमभिवदत्वित्याह-- अहीनिति । सर्वान् सर्वप्रकारान् अहीन् असुरान् सर्पव्याघ्रादीन् वा जम्भयन् नाशयन् । यातुधान्यो याति प्रापयति कष्टमिति यातुः यातना, धापयन्ति यास्ता धान्यः, यातूनां यातनानां धान्यो यातुधान्यस्ता राक्षसीश्व जम्भयन् । कथम्भूताः अधराचीः, अधोऽञ्चना अधोगमनशील्यः कृत्वा परासुव परिक्षिप, दूरतरा: कुर्वित्यर्थः । यद्वा - अध्यवोचत् सर्वोपरि राजमान ईश्वरों रुद्रोऽधिवक्ता अधिवदतु । किमित्यपेक्षायाम् – प्रथमो देव्य भिषग् अहीन् जम्भयन् यातुधानीश्च अधराचीः कृत्वा परासुव । रुद्रोऽभ्यवोचत् - मां सर्वाधिकम् अधिवक्तु । तेनोक्ते मम सर्वाधिक्यं भविष्यति, तस्यामोघवचनात् । सर्वाधिक्यमेव प्रकटयति- अधिवक्तेति । तद्वचनादह-मधिवक्ता ऐश्वर्येण वदनशीलो भविष्यामि, भिषग् रोगनाशकश्च भविष्यामि । यथा स्मरणमात्रेणापि रोगनाशको रुद्रः, तस्य वचनादहमपि तथाविध एव भविष्यामि, ' हरिस्मृतिः सर्वविपद्विमोक्षणम् ' ( भा ० पु ० ८/१०/५५ ) इति श्रीमद्भागवतवचनात् । एवं परोक्षमुक्त्वा प्रत्यक्षमुच्यते - हे रुद्र, सर्वाश्च यातुधानी राक्षसीः, अधराचीर् अधो गमनशीलाः कृत्वा परासुव अस्मत्तो दूरीकुरु । ईश्वरस्य सत्यसङ्कल्पत्वेन तदुक्तामोघवचनेन च भगवत्स्वरूपावाप्तिः सर्वविघ्ननिवृत्तिश्च । तदुक्तं वाल्मीकीये रामायणे - ' अमोघं देव वीर्यं ते न ते मोघाः पराक्रमाः ॥ अमोघं दर्शन राम अमोघस्तव संस्तवः | अमोधास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥ ( वा ० रा ०, युद्ध ० ११७ २ ९ -३० ) इति रामायणवचनात् ' सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः ' ( छा ० उ ० ८ ७३१ ) इति श्रुतेश्व । कामक्रोधपापतापादयोऽहयः, सर्पवत् कुटिलस्वभावत्वात् । तद्वासनाश्च यातुधान्यः, ता एव प्राणिभ्यो यातना धारयन्ति । उभयेषामेषां पराक्षेपेण निर्मलमनस्कोऽभ्युपैति परमात्मानम् । देवताओं से संबद्ध वह मुख्य वैद्य क्या कहे? अहीनिति । ( ' देव्यः ' यह रूप ' देवाद्यननो ' ( पा ० सू ० ४ | १ | ८५, वा ० २ ) से निष्पन्न होता है । ) सभी प्रकार के असुरों को अथवा सर्प - व्याघ्रादिकों को नष्ट करते हुए और राक्षसियों को अघोगमनशील करते हुए उन्हें अत्यन्त दूर कर दो । ' यातुधान्यः ' याति प्रापयति कष्टमिति यातुः = यातना । धापयन्ति यास्ता धान्यः । यातूनां यातनानां धान्यो यातुधान्यस्ताः ' । यातनाओं को देनेवाली राक्षसियाँ । अथवा ' अध्यवोचत् ' अर्थात् सर्वोपरि विराजमान ईश्वर यानी रुद्र अधिवक्ता कह दे । क्या कह दे? यह अपेक्षा होने पर कहा गया है कि पहिला दैव्य भिषक् अहियों को नष्ट करता हुआ और यातुधानियों को अधोगमनशील बनाता हुआ उन्हें दूर खदेड़ दे । रुद्र ने मुझे सर्वाधिक अधिवक्ता कहा है । इस प्रकार उसके कहने पर मैं सबसे अधिक हो जाऊँगा, क्योंकि उसका कथन अमोघ, यानी अव्यथं रहता है । सर्वाधिकता को ही प्रकट करते हैं-- अधिवक्तेति । उसके कहने से मैं अधिवक्ता, अर्थात् ऐश्वर्यं के साथ वदनशील बन जाऊँगा और भिषक् यानी रोगनाशक हो जाऊँगा । जैसे स्मरण करने मात्र से ही रुद्र रोगनाशक होता है, अतः उसके कहने मात्र से ही मैं भी वैसा हो हो जाऊँगा । ' हरिस्मृतिः सर्वविपद्विमोक्षणम् ' ( भाग ० ८/१०/५५ ) ऐसा श्रीमद्भागवत का वचन है । इस प्रकार से परोक्ष बताकर प्रत्यक्ष कहते हैं - हे रुद्र! समस्त राक्षसियों को अघोगमनशील बनाकर हमसे उन्हें दूर कर दो । ईश्वर सत्यसंकल्प है, उसके अमोघ वचन से भगवत्स्वरूप की प्राप्ति और सर्व विघ्नों की निवृत्ति होती है । यही बात वाल्मीकीय रामायण में कही गई है - - ' अमोघं देव वीर्यं ते न ते मोघाः पराक्रमाः ॥ अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः । अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥ ( वा ० रा ० यु ११७ । २ ९ -३० ) | ( सत्यकामः सत्यसंकल्पः ' ( छा ० उ ० ८२७११ ) यह श्रुतिवचन भी है । काम - क्रोध - पाप ताप आदि को ही ' अहि ' समझिये, क्योंकि ये भी सर्प के समान ही कुटिल स्वभाव के हैं । इनके जो संस्कार हैं, वे ही ' यातुधानियाँ ' हैं । वे यातुधानियाँ हो प्राणियों को विविध यातनाओं ( कष्टों = पीडाओं ) को देती रहती हैं । इन दोनों को त्यागने पर ( दोनों के नष्ट हो जाने पर ) निर्मल मन हुआ मनुष्य परमात्मा को पा लेता है ।
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१६ शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० १६ राष्ट्रगतानां च रोगपीडादीनां अपरस्तु - ' यः सर्वश्रेष्ठो देवानां राज्ञो विदुषां च हितकारी आज्ञां दद्यात् शरीरगतानां एवंविध सामर्थ्यपेत हे राजन्, यथा निवर्तनक्षमः, यश्च सर्वेषामुपर्यधिष्ठातृत्वेन आज्ञापको भूत्वा पुरुषानुपायैर्विनाशयन् सर्वप्रजानां पीडारोगकष्ट-सर्वानहीन् विषवैद्यो वशयति तथैव त्वं सर्पवत् कुटिलाचारान् राष्ट्राद् दूरीकुरु ' इति, तदपि स्वकपोलकल्पितम्, मन्त्रे बाधाप्रदायिनो: कुसृतिरता निकृष्टा योषितः शक्तीर्वा सम्बोधनपदस्यार्थे स्थापने नास्ति किमपि मूलम् । एवमेव सम्बोधनपदाभावात् । तथा च नानाविशेषणविशिष्टस्य तादृशेऽर्थे तस्याशक्तत्वात् । अध्यवोचदिति पदस्यार्थोऽपि अधिवक्तेति शब्दस्यापि सर्वोपरिशासक इति नार्थः परित्यक्तः ॥ ५ ॥
" , रु॒द्रा अ॒भितो दि॒क्षु श्रताः अ॒सौ यस्ता॒स्रो अ॑रु॒ण उ॒त ब॒भ्रुः सुमङ्गलः 1 । ये चैन स॑हत॒शोऽव॑षा॒ हेड ईमहे ॥ ६ ॥
समय में पिंगल वर्णं का, समस्त मंगलों का प्रदायक मन्त्रार्थ- - उदय और अस्त के समय रक्त वर्णं तथा अन्य हम पर जो क्रोध है, रुद्रों ने उसका आश्रय किया है । उनका यह रविरूप रुद्र है । दसों दिशाओं में रहने वाले हजारों उसे हम भक्ति के द्वारा दूर करते हैं ॥ ६ ॥
। असौ यः प्रत्यक्षो रुद्रः स एव रुद्र आदित्यरूपेण स्तूयते, रुद्रस्य परमेश्वरस्यैव आदित्यरूपेणाविर्भावात् अरुणः, उतापि च अन्यदा बभ्रुः पिङ्गलवर्णंः सूर्यरूपः, स उदयकाले ताम्रवर्णः अत्यन्तरक्तः, यस्य अस्तमनकाले सः, तन्मूलत्वात् सर्वमङ्गलानाम् । ये चैनं भगवन्तमादित्यं कपिलवर्णो वा । सुमङ्गलः शोभनानि मङ्गलानि सर्वासु सहस्रशः असंख्याताः श्रिताः । प्रथमे एषां हेड: क्रोध-रुद्रा रश्मयः, अभित इतश्चेतश्च दिक्षु प्राच्यादिषु ० २ | १३ | १ ) । अव ईमहे अवनयामो भक्त्या निराकुर्मः । मस्मादिप्रमादजम् । ' हेड इति क्रोधनामसु पठितम् ' ( निघ में और विद्वानों में जो सर्वश्रेष्ठ है, किसी ने उक्त मन्त्र की ऐसी व्याख्या की है - ' देवताओं करने में में जो , राजाओं समर्थ है और जो सबके ऊपर अधिष्ठाता के रूप हितकारी है, शरीर और राष्ट्र के रोग तथा पीड़ाओं को नष्ट से युक्त हुए हे राजन्! जैसे कोई विषवैद्य समस्त सर्पों को अपने में आज्ञापक बनकर सबको आज्ञा दे सकता है, ऐसे सामथ्यं करने वाले लोगों को अनेक उपायों से विनष्ट कर सम्पूर्णं वश में कर लेता है, वैसे ही तुम सर्प की तरह कुटिल व्यवहार का राष्ट्र से निष्कासन निकृष्ट स्त्रियों का अथवा शक्तियों प्रजाओं को पीड़ा, रोग, कष्ट, बात्रा पहुँचाने वालीं कुमार्गगामिनी क्योंकि मन्त्र में संबोधन पद का अभाव है । तथा च अनेक विशेषणों कर दो ' । किन्तु यह व्याख्या भी कपोल - कल्पित ही है, है । एवमेव ' अधिवक्ता ' शब्द का भी ' सर्वोपरि शासक ' यह अर्थ से विशिष्ट संबोधन पद का अर्थ बताने में कोई मूल भी नहीं ही नहीं कर पाये, उसे शब्द उस अर्थ में शक्त नहीं है । वे ' अध्यवोचत् ' शब्द का अर्थ नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह छोड़ ही दिया है ॥ ५ ॥
के रूप में परमेश्वर रुद्र का ही आविर्भाव उसी रुद्र की आदित्य के रूप में स्तुति की जा रही है । आदित्य ताम्रवर्ण ) रहता है उदय काल में अत्यन्त लाल ( रक्तवर्ण हुआ है । जो यह प्रत्यक्ष दृश्यमान सूर्य है, वह रुद्र ही है । वह । इन दोनों कालों के अतिरिक्त समय में पिंगल वर्ण ( बभ्रु वर्ण ) और अस्त के समय में भी अरुण वर्ण ( लाल वर्णं ) का रहता है ही हुआ करते हैं, क्योंकि समस्त मंगल, सूर्यमूलक ही हैं । अथवा कपिल वर्ण का रहता है । उसके समस्त मंगल शोभन ) जो रश्मियां ( किरणें = रुद्र ) हैं, वे सभी इस भगवान् इधर - उधर ( अभितः ) पूर्व आदि दिशाओं में ( दिक्षु ) असंख्यात ( सहस्रशः ) से उत्पन्न हुआ जो इनका क्रोध ( हेड ) है, उसे हम सूर्य ( आदित्य ) के ही आश्रित रहती हैं । हम लोगों के प्रमादों ( अपराधों लोग उसकी भक्ति करके प्रथमतः निराकृत ( दूर ) करते हैं ।
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म ० ६-७ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता १७ अथवा रुद्र एव ताम्रवर्णः, अरुणवर्णः बभ्रुवर्णः सुमङ्गलः, कार्यवशात् स एवानेकानि रूपाणि बिर्भात । असंख्यातास्तदंशभूता अन्ये च रुद्रास्तमेनमभितः सर्वासु दिक्षु श्रिताः । अज्ञानप्रमादादिवशाज्जीवास्तान् प्रति स्वधर्मोल्लङ्घनतदवमानादिभिरपराध्नुवन्ति, अतस्तेषां भक्त्या तत्क्षमापणेन तन्निवारणं युक्तमेव, एकस्यैवा-खण्डचैतन्यात्मकस्य रुद्रस्यानन्तानन्तशक्तिमत्त्वेन तत्तच्छक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूपाणां रुद्राणामानन्त्यं युज्यत एव । आदित्यक्ष किरणा एव रुद्रा:, तेषामपि विचित्रशक्तित्वादनन्तत्वाच्च । अपर आह- ' असौ यः योऽयं ताम्रवद्रक्तोऽग्निवत्तेजस्वी सूर्यवद् भरणपोषणकारको राष्ट्रमङ्गलेच्छुः सेनापतिश्चान्ये शत्रुरोदकाः सैनिकगणा अस्याभितो दिक्षु सहस्रसंख्याका विराजन्ते तेषां क्रोधवृत्ति दूरयतु शमयतु वा ' इति, तत्कुतोऽयमर्थो लब्धः? पूर्वं रुद्रपदेन राजा गृहीतः, अतोऽत्रापि स एव ग्रहीतव्यः । सेनापतिबोधकः कः शब्द इत्यपि नोक्तम् । सेनापतिश्च ताम्रवद्रक्तः कथम्? अग्निवत्तेजस्वीति कस्य शब्दस्यार्थः? बभ्रुशब्दस्य तु पिङ्गलवर्ण: कपिलवर्णो वार्थः प्रसिद्धः । सर्वथापि वेदानामज्ञातज्ञापकत्वेन प्रामाण्यम् | अर्थनीत्यादिशास्त्रसिद्ध-स्यार्थस्यानुवादकत्वेन वेदानामप्रामाण्यापत्तिर्दुर्निवारा । तस्माद् वेदप्रामाण्यव्यवस्थायै उब्वटमहीधरोक्त एवार्थी ग्रहणीयः ॥ ६ ॥
असोऽव॒सर्पति॒ नोल॑प्रोवो विलोहितः । उ॒तैनं गोपा अ॑वृशवृश्रन्नुदहार्यः स दृष्टो ' डयाति नः ॥ ७ ॥
U मन्त्रार्थ - जिसे अज्ञानी गोप तथा जल भरने वाली दासियाँ भी प्रत्यक्ष देख सकती हैं, विष धारण करने से जिसका कण्ठ नील वर्ण का हो गया है, तथापि विशेषतः रक्त वर्ण का होकर जो सर्वदा उदय और अस्त को प्राप्त होकर गमन करता है, वह रविमण्डल स्थित रुद्र हमें सुखी कर दे ॥ ७ ॥
अथवा रुद्र ही ताम्रवर्णं, बभ्रु वर्ण और सुमङ्गल स्वरूप है । कार्यंवशात् वही अनेक रूपों को धारण करताहै | उसी के अंशभूत अन्यान्य जो असंख्यात रुद्र हैं, वे सब दिशाओं में इसी के चारों ओर आश्रित हैं, किन्तु इस रहस्य को न समझते हुए किये जाने वाले प्रमादों के कारण ये जीवधारी लोग उनके प्रति अपने कर्तव्य को भूल कर स्वधर्मं का उल्लघंन करते रहते हैं । इस प्रकार उनका अपमान करने से ये जीवधारी निरन्तर अपराधी बनते जाते हैं । अतः उनकी भक्ति करके, उनसे क्षमा प्राप्त कर अपने अपराधों का निवारण करना उचित ही है । अखण्ड चैतन्यात्मक एक ही रुद्र अनन्त अनन्त शक्तियों से युक्त होने के कारण उनकी तत्तत् शक्ति से विशिष्ट हुए चैतन्यरूप रुद्रों का आनन्त्य जो बताया गया है, वह उचित ही है । आदित्यपक्ष में ' किरणें ' ही ' रुद्र ' हैं । उनको भी शक्तियां विचित्र, विलक्षण और अनन्त होती हैं । किसी ने इस मन्त्र की व्याख्या इस प्रकार की है - ' जो यह ताम्र के तुल्य रक्त वर्ण का और अग्नि के तुल्य तेजस्वी तथा सूर्य के समान भरण - पोषण करने वाला, एवं राष्ट्र के मंगल को चाहनेवाला सेनापति और अन्य भी जो शत्रुओं को रुलाने वाले सैनिकगण हैं, वे इसके चारों ओर समस्त विशाओं में हजारों की संख्या में विराज रहे हैं, उनकी क्रोधवृत्ति को दूर कर दो अथवा शान्त कर दो । किन्तु यह अर्थ मन्त्र के किस शब्द से उपलब्ध हो रहा है? पहले ' रुद्र ' शब्द से ' राजा ' बताया है, अतः यहाँ भी उसी को बताना चाहिये । ' सेनापति ' के अर्थ का बोधक कौन सा शब्द है? यह भी नहीं बताया । ' सेनापति ' को ताम्रवत् रक्त कैसे बताया है? ' अग्निवत् तेजस्वी ' यह किस शब्द का अर्थ है? ' बभ्रु ' शब्द का तो ' पिङ्गल वर्ण ' या ' कपिल वर्ण ' अर्थं सर्वत्र प्रसिद्ध है । वेदों का प्रामाण्य सर्वथा ' अज्ञात ज्ञापकत्वेन ' हुआ करता है । अर्थनीतिशास्त्र से सिद्ध अर्थ का अनुवादक होने से वेद की अप्रामाण्यापत्ति दुर्निवारणीय है । इसलिये वेदप्रामाण्य के व्यवस्था-पनार्थं उम्वट - महीधरोक्त अर्थ को ही स्वीकार करना चाहिये ॥ ६ ॥
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१८ शुक्ल यजुर्वेद संहिता [ अ ० १६ असो यः आदित्यरूपो रुद्रः अवसर्पति अस्तमनकाले अवाचीनं गच्छति । अस्तं गच्छन् नीलग्रीवो नीलकण्ठ इव लक्ष्यते । विलोहितो विशेषेण रक्तः । एनं गोपा गोपाला वेदादिसंस्कारशून्या उत अपि गवां प्रवेश-कालं मन्यमाना अदृश्रन् अभिपश्यन्ति । उदहार्य उदकं हरन्तीति मन्थोदनसक्तुबिन्दुवज्रभारहारवी वधगाहेषु ' च ( पा ० सू ६।३।६० ) इत्युदकशब्दस्य उदादेशः, जलभरणपरायणा नार्योऽपि अदृन् पश्यन्ति, आगोपालाङ्गना-प्रसिद्ध इति यावत् । स दृष्टो दृष्टमात्रः सन् नोऽस्मात् मृडयाति मूडयति सुखयतीत्यर्थः । मृदुतमहृदयो दयापरवशः स्तुत्यादिनिरपेक्षो दर्शनमात्रेण शं तनोति भगवान् रुद्रः । स्वेन रूपेणापि भक्त्या स्तुत्या प्रत्यक्षो भूत्वा भक्तस्था-भिमुखमागच्छति । नीलग्रीवो नीला ग्रीवा विषधारणेन यस्य सः, दयापरवश इति यावत् । सर्वजगद्रक्षणाय हालाहलविषपानं भगवता शिवेन कृतमिति पुराणप्रसिद्धम् । विलोहितो विगतकलुषभावो नित्यनिरस्तसमस्तानर्थ-व्रातः । अथवा विलोहितो विशेषेण रक्तः शिवाङ्कनिलयायाः सिन्दूरारुणविग्रहायाः श्रीमद्राजराजेश्वर्याः संश्लेषाद् आत्मना हृदयेन विग्रहेण च विशिष्टरागवान् अनायासेन दृष्टमात्रो मृडयाति, प्रिययाश्लिष्टत्वाच्च प्रहृष्टः सच्चिदा-नन्दरूपत्वात् सुखयति, ऐहिकामुष्मिक भोगापवर्ग प्रदानेन कृतार्थयति । ' एष ह्येवानन्दयाति ' ( तै ० उ ० २।७ ) इति श्रुतेः । अपरस्त्वाह- ' योऽयं नीलकण्ठो विशेषेण अरुणवस्त्रादिपरिहितः, निरन्तरं पुरो वर्धिष्णुस्तं गोपाला जलहारिण्यश्व प्रत्यभिजानन्ति । स नेत्रैर्दृष्टोऽस्मान् प्रजाजनान् सुखयतु ' इत्यादिकम्, तदपि न समञ्जसम्, कथं यह जो आदित्य रूप रुद्र है, वह अस्त के समय अवाचीन जाता है । अस्त होते समय नीलग्रीव ' नीलकण्ठ ' की तरह लक्षित होता है । ' विलोहितः ' का अर्थ ' विशेष रक्त ' होता है । गोपालक ग्वाले वेदादि संस्कार से शून्य रहने पर भी गायों का यह गोष्ठ में प्रवेश करने का काल है, ऐसा समझ कर इसे देखते हैं । जलभरणपरायण ( उदहायं ) नारियाँ भी उसे देखती हैं । तात्पर्य यह है कि यह आदित्यस्वरूप रुद्र आगोपालाङ्गना प्रसिद्ध है । ' उदकं हरन्ति इति उदहार्यः ' । यहाँ ' उदक ' शब्द को ' मन्थौदनसक्नु बिन्दुवज्रभार ' ( पा ० सू ० ६ | ३ | ६० ) सूत्र से ' उदादेश ' होता है । उसका दर्शनमात्र करने से वह हमें सुखी कर देता है । उसका हृदय मृदुतम होने से वह दयापरवश हो जाता है, स्तुति आदि की अपेक्षा उसे नहीं रहती । ऐसे भगवान् रुद्र दर्शन करने मात्र से ही हम दर्शक भक्तों को सुखी कर देते हैं । भक्तिपूर्वक उसकी स्तुति करने पर वह अपने निजी स्वरूप से भी प्रत्यक्ष दर्शन देकर भक्त के सामने आ जाते हैं । वह दयापरवश हुए विषपान करने से नीलग्रीव कहलाने लगे । सम्पूर्ण जगत् का रक्षण करने के लिये भगवान् शिव ने हालाहल विष का पान किया था, यह पुराणों ने बताया है । उस रुद्र में कलुषभार तो है ही नहीं, अर्थात् समस्त अनर्थसमूह जिससे नित्यनिरस्त रहते हैं, अत एव उसे ' विलोहित ' कहा गया है । अथवा ' विलोहित ' का अर्थ ' विशेषेण रक्तः ' यानी अत्य-धिक प्रसन्न भी किया जा सकता है, क्योंकि भगवान् शिव जी के अंक में बैठी हुई, सिन्दूर के तुल्य अरुण वर्णं के शरीरवाली श्रीराजराजेश्वरी का संश्लेष प्राप्त होने से हृदय और शरीर से भी अत्यधिक प्रसन्न होने वाले शिवजी का दर्शन करने मात्र से अनायास दर्शन करने वाले को सुखी कर देते हैं । वे अपनी प्रिया से आश्लिष्ट हैं, अतः प्रहृष्ट हैं और स्वयं सच्चि -दानन्दरूप भी हैं । अतः अपने भक्तों को सुख पहुँचाने में उन्हें किञ्चिन्मात्र भी आयास करने की आवश्यकता नहीं होती । fron यह है कि ऐहिक और आमुष्मिक भोग तथा अपवर्ग दिलाकर अपने भक्तों को ये कृतार्थं कर देते हैं । यही बात भगवती श्रुति के द्वारा भी कही गई है -- ' एष ह्येवानन्दयाति ' ( तै ० उ ० २।७ } । किसी ने जो यह कहा है- ' जो यह नीलकण्ठ है, विशेषेण अरुण वस्त्र आदि का परिधान जिसने किया है, निरन्तर - हरण करने वाली स्त्रियाँ पहचानती हैं । हमारे नेत्रों से दृष्ट हुआ वह पुरः ( सामने ) जो वर्धिष्णु है, उसे गोपाल और जल हम प्रजाजनों को सुखी करे ' आदि आदि, वह भी सुसंगत नहीं है । यह ' पुरः ' अर्थ कैसे और किससे निकल रहा है? इस
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भन्त्रः ७ ] पारिजातभाष्यसहिता १ ९ पुरोऽर्थंकत्वम्? तत्र च किं प्रमाणमित्यनुक्तेः । नेत्रैर्दृष्ट इत्यादिना सेनापतिरेवात्रापि वर्णितः । तत्रैवं पृच्छा? कश्चैवं वर्णयति? यदि कश्चन मनुष्य इति चेत्, मन्त्राणां पौरुषेयत्वापत्तिः, ईश्वरवक्तृको वेद इतिसिद्धान्तव्याहृतिश्च । ईश्वरवक्तृकत्वे च कथमीश्वरस्य स्वं प्रति तत्सुखयितृत्वकामना सम्भवति, ईश्वरस्य परमानन्दरूपत्वेन अवाप्त-समस्तकामत्वात् । अतः कस्य कं प्रत्येतद्वर्णनमित्यपि चिन्त्यमेव । तस्मादुव्वटमहीधरोक्त एव समीचीनो वेदार्थः । यच्च तेनोक्तम् —'ब्रह्मध्याने समाधिकाले ताम्रारुणबभ्रुनोलरक्तवर्णानां साक्षात्कारो भवति । तस्यात्मनः प्रभावाद् रोदनशीलाः सहस्रशः प्राणिन आश्रिताः । तस्यानादरं न कुर्मः, यतस्तत्र स एव चेतनांशो योऽस्मासु विद्यते । नीलमणिवत् स्वच्छं कान्तिमन्तं विशुद्धलोहितं जितेन्द्रिया अभ्यासिनो ब्रह्मामृतरसपायिनश्चित्तभूतयः प्रतीतावपि तेषामात्मना साक्षात्कुर्वन्ति, सोऽस्मान् सुखयतु ' इति, तदपि न युक्तम्, समाधिकाले नीलरक्तादिवर्णानां निराकारत्वेनाभि-कः सम्बन्धः? यदि त्वात्मन एवं ताम्रारुणादिवर्णवत्त्वेन भानम्, तदा दत्तो जलाञ्जलिस्त्वया मताय स्वसिद्धान्ताय । नीलमणिवत् स्वच्छत्वे कान्तिमत्त्वे च सति निराकारत्वहानिरेव । रक्तमणिवद्विशुद्धलोहि-तत्वमपि निराकारस्य न सम्भवत्येव, कण्ठशब्दस्य निरर्थकत्वापत्तिश्च । चित्तभूतयस्तु दृश्यत्वाज्जडत्वाच्च न सर्व- तं साक्षात्कर्तुं प्रभवेयुः, चक्षुषा द्रष्टुरिव दृश्याभिस्ताभिर्दृशोऽवभासासम्भवात् । सिद्धान्ते तु निराकारस्यापि शक्तिमतः परमेश्वरस्य दिव्यलीलाशक्त्या साकारत्वाद्युपपत्तिः । यदपि चोक्तम्- ' पातकिनां पीडकत्वात् ताम्रत्वम् शरणदत्वादरुणत्वम्, पोषकत्वाद बभ्रुत्वम्, सुख-येन रूपेण व्यापकत्वात् सुमङ्गलत्वम् । समस्तानां महाशक्तीनामाश्रयत्वात् तदनादरणं न युक्तम् । स एव प्रलय-' पुर: ' अर्थ के करने में क्या प्रमाण है? यह भी आपने नहीं बताया है । ' नेत्रदृष्टः ' से यहाँ पर भी ' सेनापति का ही वर्णन किया है । उस पर यह पूछा जा सकता है कि यह वर्णन कौन कर रहा है? इसके उत्तर में यदि यह कहें कि कोई मनुष्य वर्णन कर रहा है, तो ' मन्त्रों ' को पौरुषेय कहना होगा और ' ईश्वरवक्तक वेद ' है, इस सिद्धान्त को हानि होगी । ईश्वरवक्तक मानने पर उस ईश्वर के मन में दूसरों को सुखी करने की कामना क्यों होगी? क्योंकि ईश्वर तो परमानन्द-स्वरूप होने से वह तो अवाप्तसमस्तकाम है, उसे कोई कामना करनी नहीं है । अतः यह वर्णन किसका और किसके लिये है? यह विचारणीय ही है । तस्मात् उव्वट - महीघरोक्त अर्थं ही सुसंगत वेदार्थ हैं । यह जो उसने कहा है- ' ब्रह्म का ध्यान करने में, यानी समाधिकाल में ताम्र के तुल्य अरुण, बभ्रु,, नील, रक्तादि वर्णों का साक्षात्कार होता है । उस आत्मा के प्रभाव से रोदनशील सहस्रशः जो प्राणी आश्रित हैं, उनका अनादर हमें नहीं करना चाहिये, क्योंकि वहाँ भी वही चेतनांश है, जो हममें हैं । जितेन्द्रिय, अभ्यासी, ब्रह्मामृत के रस का पान करने में जिनका चित्त लगा हुआ है, वे लोग नीलमणि के तुल्य स्वच्छ कान्तिसम्पन्न विशुद्ध लोहित का साक्षात्कार कर पाते हैं, ऐसा वह विशुद्धलोहित हम लोगों को सुखी करे ' । किन्तु यह कथन भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि समाधिकाल में नील-रक्तादि वर्णों की प्रतीति होने पर भी उनका आत्मा के साथ क्या सम्बन्ध है? यदि यह कहो कि आत्मा के ताम्र - अरुण आदि वर्णों का भान होने से आत्मा का ही भान होता है, तब तो आपने अपने निराकारता के सिद्धान्त को जलाअलि ही दे दी, यही कहना पड़ेगा । नीलमणिवत् स्वच्छ और कान्तिमान् कहने पर ' निराकारत्व ' सिद्धान्त को हानि हो ही गई । रक्त मणि के समान विशुद्धलोहितत्व का संभव भी ' निराकार ' में कैसे हो सकेगा? तब ' कण्ठ ' शब्द को निरर्थक कहना होगा । चित्तभूमियां तो दृश्य और जड़ होने से उसका साक्षात्कार करने में समर्थ नहीं हो सकतीं । द्रष्टा को चक्षु से जैसा अवभास होता है, वैसा अवभास उन दृश्य और जड़ वित्तभूमियों को कदापि नहीं हो सकता । हमारे सिद्धान्त के अनुसार तो परमेश्वर निराकार होने पर भी सर्वशक्तिसम्पन्न रहने से अपनी दिव्य लीलाशक्ति के द्वारा उसका साकार होना भी उपपन्न है । यह जो कहा है- ' पातकियों को पीड़ा देने से उसकी ' ताम्रता ' है, शरणद होने से उसकी ' अरुणता ' है, पोषक होने से उसकी ' बभ्रुता ' है, अपने सुखमय रूप से सर्वत्र व्यापक रहने से उसकी ' सुमङ्गलता ' है और सम्पूर्ण महाशक्तियों का
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२० शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० ] १६ काले जगल्लयाधारत्वाद् नीलग्रीवः, सृष्टिकाले विविधवस्तूनां नैरन्तर्येणोत्पादकत्वाद् विलोहितः, तं, हेडःशब्दस्य संयमिजना ब्रह्मरसपायिन्य ऋतम्भराश्चित्तवृत्तयश्च साक्षात्कुर्वन्ति । स ईश्वरो नो मृडयतु ' इति, तदपि चिन्त्यम् तदक-क्रोधार्थकत्वे हेडः क्रोधम् अव ईमहे अवनमयामो निवारयाम इत्यर्थो भवति । हेड इत्यस्य अनादरार्थत्वे रणबोधकत्वं कस्य शब्दस्यार्थ:? ' लीनमास्यं मुखं प्रवृत्तिद्वारं रागादि येषां ते तथा ' इति, तदपि न क्षोदक्षमम्, राज - सेनापति - सैनिक - महत्त्ववर्णनप्रसङ्गे परमेश्वरवर्णनस्याकाण्डताण्डवायितत्वात् विसङ्गतेश्च । असत्यामनुप-पत्तौ पदानां मुख्यार्थत्यागेन वृत्त्यन्तराश्रयणं दूषणमेव । किञ्च, साक्षात्कर्तृत्वमपि प्रमातृनिष्ठं भवति, न प्रमाण-रूपचित्तवृत्तिनिष्ठमित्यादि विभावनीयम् || ७ ||
नमोऽस्तु नीलग्रीवाय सहस्रा॒क्षय॑ म॒ढुषे॑ ।
अथो॒ ये अ॑स्य॒ सत्त्वा॑नो॒ऽहं तेभ्यो ऽकर्ं नमः ॥ ८ ॥
मन्त्रार्थ - नीलकण्ठ, सहस्रनेत्र, इन्द्रस्वरूप और वृष्टि करने वाले रुद्र को मेरा प्रणाम भृत्य हैं, उनको भी मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ८ ॥
1 उसके जो नीलग्रीवाय नीलकण्ठाय सहस्राक्षाय अनन्ताक्षिपादादिमते । सर्वप्राणिनामात्मत्वात् सर्वेषामक्षिपादा-दीनि तस्यैव । ' सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ' ( भ ० गी ० १३ | १३ ) । अथवा सहस्रं सहस्रसंख्या-परिमितानि, अक्षीणि चक्षूंषि ( इन्द्रस्वरूपे यस्य स सहस्राक्षस्तस्मै, ' बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् षच् ' ( पा ० सू ० ५ | ४ | ११३ ) इति रूपसिद्धिः । मीढुषे मिमेहेति मीढ्वान्, ' मिह सेचने ' अस्मात् ' दाश्वान्साह्वान मीढ्वांश्च ' ( पा ० सू ० ६ । १ । १२ ) इति क्वसन्तो निपातः । तस्मै नित्यतरुणाय शश्वदपरिणामिने भगवते । सेक्त्रे वृष्टिकर्त्रे आश्रय होने से उसका अनादर करना उचित नहीं है । वही प्रलय काल में सम्पूर्ण जगत् के लय का आधार होने से ' नील-ग्रीव ' है, सृष्टि काल में निरन्तर विविध वस्तुओं का उत्पादक होने से ' विलोहित ' है । उसका साक्षात्कार संयमी लोग और ब्रह्मरस का पान करने वाली ऋतम्भरा चित्तवृत्तियाँ किया करती हैं । वह ईश्वर हमें सुखी करे ' इति । किन्तु यह अर्थ भी विचारणीय है । ' हेड ' शब्द को क्रोधार्थक मानने पर ' हेडः क्रोधम् अव ईमहे ' अर्थात् क्रोध का निवारण करते हैं, यह अर्थ होता है । तथा ' हेड ' शब्द को अनादरार्थक मानने पर उसे न करने का बोध कराने वाला कौन सा शब्द है? ' लीयमानस्य मुखं प्रवृत्तिद्वारं रागादि येषां ते तथा ' अर्थात् ' लीन होने वाले के प्रवृत्तिद्वार रागादि हैं जिनके ' यह अर्थ भी असंगत है, क्योंकि राजा के सेनापति सैनिकों का महत्त्व वर्णन करने के प्रसंग में परमेश्वर का वर्णन कर बैठना अकाण्ड-ताण्डव का ही आचरण कर दिया है और वह असंगत भी है । किसी अनुपपत्ति के न होते हुए भी पदों के मुख्यार्थं का त्याग कर वृत्त्यन्तर का आश्रय करना तो दोष हो कहलायेगा । साक्षात्कारित्व भी प्रमातृनिष्ठ होता है, प्रमाणरूप चित्त-वृत्तिनिष्ठ नहीं । इत्यादि बातें सभी विचारणीय ही हैं ॥ ७ ॥
जो नीलकण्ठ है, जिसके अक्षि - पाद आदि अनन्त हैं, क्योंकि समस्त प्राणियों का वह आत्मा है, अतः सभी के जो अक्ष - पाद आदि हैं, वे सब उसी के हैं । श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है- ' सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् कहते हैं, अर्थात् ' ( १३।१३ ) । अथवा ' सहस्रम् ' सहस्र संख्या परिमित ' अक्षीणि ' चक्षु ( नेत्र ) हैं जिसके, उसे सहस्राक्ष ' देवराज इन्द्र ' | उस इन्द्र के लिये ' बहुव्रीही सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् षच् ' ( पा ० सू ० ५ | ४ | ११३ ) से इस ' सहस्राक्ष ' पद की की सिद्धि होती है । ' मोढुषे ' मिमेह इति मीढ्वान्, ' मिह सेचने ' धातु से ' दाश्वान्साह्वान्मीढ्वांश्च ' ( पा ० सू ० ६।१।१२ )
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मं ० ८ - ९ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता २१ पर्जन्यरूपाय वा । नमो नमस्कारः, हृद्वाग्वपुर्भिः प्रह्वीभावोऽस्तु । अथो अपि च, येऽस्य सत्त्वानः सत्त्वभूता रुद्रा भृत्या वा, अहं तेभ्यो नमो नमस्कारम् अकरं करोमि । ' छन्दसि लुललिट: ( पा ० सू ० ३ | ४ | ६ ) इति कालसामान्ये लङ् । अपर आह - ' नीलग्रीवाय नीलमणिभूषितकण्ठाय सहस्राक्षाय सहस्रसंख्याकेषु जनेषु दृष्टिमते मीढुषे प्रजासु सुखवर्षका सेनापतये नमोऽस्तु । शत्रूणां नमनानि वज्राणि अन्नमादरभावश्व उपनमन्तु । ये चास्याधीनाः सामर्थ्यवन्तो वीरास्तेभ्यो वयं प्रजाजना अन्नादिभोगपदार्थान् शस्त्रास्त्रबलानि सम्मानं चोपहरामः ' इति, तदपि नोदक्षमम् नमः पदेन नमस्कारविज्ञानात् । शस्त्रास्त्रबलादिभोगपदार्थ समर्पणं तु कुतो विज्ञायत इति व्याख्यातेव विचारयतु । सेनापतिः सैनिकाश्च काल्पनिका एवेत्युव्वट महीधरादिसम्मत एवार्थो युक्तः ॥ ८ ॥
अपने प्रमुञ्च॒
धन्व॑न॒स्त्वमु॒ भयो॒ोरात्र्योर्ज्याम् ।
याश्च॑ ते॒ हस्त॒ इष॑व॒ रा ता भ॑गवो वप ॥ ९ ॥
मन्त्रार्थ - हे भगवन्! आप धनुष की दोनों कोटियों में अटकी हुई डोरी ( प्रत्यंचा ) का त्याग कर दें और हाथ में स्थित बाणों का भी त्याग कर दें ॥ ९ ॥
तमेव भगवन्तं स्तुवन्नाह - हे भगवः, भगं षड्विधमैश्वर्यमस्यास्तीति भगवान् । ' भूमनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने । सम्बन्धेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुबादयः || ' इति रीत्या नित्ययोगेऽतिशायने चात्र ' तदस्या-स्त्यस्मिन्निति च यत्र ' मतुप् ' ( पा ० सू ० ५ | २ | ९ ४ ) इति मतुप्प्रत्ययो बोध्यः । तेन षड्विधमैश्वर्यं नित्यं निरतिशयं स्यात्, स एव भगवान् भवति । अत एव - ' ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इन वसन्त शब्दों का निपातन किया गया है । नित्यतरुण, शश्वत् अपरिणामी भगवान् लिये नमस्कार, अर्थात् हृदय, वाणी, शरीर यानी शरीर, वाणी और मन से हमारा सर्वदा प्रह्वीभाव रहे । ' अथो ' = अपि च, जो इसके सत्त्वभूत रुद्र अथवा भृत्य हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ । मन्त्र में ' अकरम् ' यह कालसामान्य में ' लङ् ' का प्रयोग किया गया है । किसी ने उक्त मन्त्र की व्याख्या यह की है- ' नीलमणि भूषित कण्ठवाले और हजारों जनों में जो दृष्टिमान् है तथा प्रजाओं पर सुख की वर्षा करने वाले सेनापति के लिये हमारा नमस्कार रहे । शत्रुओं के नमन, वज्र, अन्न और आदरभाव ये सब हमें प्राप्त हों । जो इसके अधीन रहने वाले सामर्थ्यवान् वीर हैं, उनके लिये हम प्रजाजन अन्नादि भोग्य पदार्थ और शस्त्र अस्त्र बल सम्मान देते रहें ' । किन्तु यह अर्थ उचित नहीं है, क्योंकि ' नमः ' पद से नमस्कार विज्ञान, शस्त्रास्त्र बलादि भोगपदार्थ समर्पण करना, यह आपने किस शब्द से जान लिया? इसका विचार व्याख्याता हीं करे । सेनापति और सैनिक सब कपोलकल्पित ही बना लिये हैं । अतः उव्वट - महीधरादिसम्मत अर्थ ही उचित है ॥ ८ ॥
उसी भगवान् की स्तुति करते हुए कह रहे हैं - हे भगवः! ' भगं षड्विधमैश्वर्यं यस्यास्तीति भगवान् ' अर्थात् षड्विध ऐश्वर्य है जिसके पास, उसे भगवान् कहते हैं । ' भूमनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने । सम्बन्धेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुबादयः ॥ ' इस रीति से यहाँ पर नित्ययोग और अतिशायन अर्थ में ' तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् ' ( पा. सू. ५।२।९ ४ ) सूत्र से ' मतुप् ' प्रत्यय हुआ समझना चाहिये । अतः जहाँ यानी जिसके पास षड्विध ऐश्वर्यं नित्य और निरतिशय हो, उसी को ' भगवान् ' कहाजा सकता है । अत एव - - ' ' ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव
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२२ [ अ ० १६ इतीरणा ॥ ' ( विष्णुपुराण ६ ५/७४ ) इत्यत्र समग्रमिति विशेषणमैश्वर्यादिभिः सर्वैरेव शब्देः सम्बद्धयते । समग्रस्य नित्यस्य निरतिशयस्य ऐश्वर्यस्य तथाविधस्यैव धर्मादेश्व भग इतीरणा, भगशब्देनैते ज्ञायन्त इत्यर्थः । ' ईर गतौ कम्पने च ' इति धातुः । अत एव तदनुग्रहेणैव अन्येऽपोन्द्रादयो देवा ऐश्वर्यभाजो भवन्ति I । ' उत्पत्ति प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥ ' एवंविधो भगवानीश्वर एव भवति । अन्यत्र तु गोण्या वृत्त्यैव भगवच्छब्दप्रयोगः, तत्सम्बुद्धौ हे भगवन्, धन्वनो धनुषः, उभयोर् आय: कोटयोः स्थितां ज्यां मौवीं त्वं प्रमुञ्च प्रकृष्टतया दूरीकुरु । याश्च ते हस्ते इपवों बाणास्ता इषूः परावप पराक्षिप | भक्तानां निर्भयत्वाय परित्यजेत्यर्थः । अपर आह- ' हे सेनापते, धन्वनो धनुषः, आयोः कोटयोः, जयदायिनी ज्यां योजय । ये च त्वदीयहस्ते बाणाः सन्ति, तान हे ऐश्वर्यवन्, दूरपर्यन्तं शत्रुषु प्रक्षिप ' इति, तदपि कल्पनादावदग्धम्, प्रोपसृष्टस्य मोक्षणार्थस्य मुचेः क्रियापदस्य प्रकर्षतया मोक्षणमर्थः, न तु योजनम् । मन्त्रे योजनार्थको नास्ति कश्चन शब्दः । परावपेति क्रियापदस्य दूरदेशसम्बन्धेनैव नैराकाक्ष्ये शत्रुष्वित्यादिशब्दाध्याहारे कि मूलम्? शत्रुष्वित्यादीनामध्याहारेण वा नैराकाङ्क्ष्ये दूरपर्यन्तेत्यध्याहारे वा न किमपि मूलमिति विचारे क्रियमाणे व्याख्याया निःसारत्वान-पायात् ॥ ९ ॥
विज्यं धनु: कप॒दो विश॑त्य॒ वाज॑वाँ २ ॥ उ॒त ।
अन्नस्य॒ या इष॑व आ॒भुर॑स्य निषङ्गधिः ॥ १० ॥
मन्त्रार्थ - जटाजूट धारण करने वाले रुद्र का धनुष प्रत्यंचारहित रहे तूणीर में स्थित बाणों के नोकदार अग्र भाग नष्ट हो जाय, उसके बाण नष्ट हो जाँय तथा तलवार का कोष भी तलवार से रहित हो जाय ॥ १० ॥
षण्णां भग इतीरणा ' ( वि ० पु ० ६।५।७४ ) | यहाँ पर ' समय ' इस विशेषण का सम्बन्ध ऐश्वर्यादि सभी शब्दों के साथ है । अर्थात् समग्र नित्य निरतिशय ऐश्वर्य को, उसी प्रकार के धर्म आदि को भी ' मग ' शब्द से जाना जाता है । ' ईरणा ' में ' ईर गतौ कम्पने च ' धातु है । उस भगवान् के ही अनुग्रह से अन्य इन्द्र आदि देवता भी ऐश्वर्यवान् हो जाते हैं । ' उत्पत्ति प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् । वेति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति || " इस प्रकार का भगवान् तो ईश्वर ही हो सकता है । उसके अतिरिक्त जहाँ कहीं ' भगवत् ' शब्द का प्रयोग किया जाता है, वह गोणी वृत्ति से ही किया जाता है । ' भगवत् ' शब्द के संबोधन का एकवचन ' हे भगवः ' यानी हे भगवन्! तुम धनुष की दोनों कोटियों पर स्थित मौर्वी ( प्रत्यंचा ) को ' प्रमुञ्च ' अर्थात् प्रकृष्टतया दूर कर दी । तथा तुम्हारे हाथ में जो बाण है, उन बाणों को भक्तों की निर्भयता के लिये त्याग दो । किसी ने इस मन्त्र की व्याख्या यह की है - ' हे सेनापते! धनुष की दोनों कोटियों पर जय देने वाली प्रत्यंचा को चढ़ाओ । तुम्हारे हाथ में जो बाण हैं, उन्हें हे ऐश्वर्यशालिन्! दूर तक शत्रुओं में जला पर दिया फेंको है ' । इति ' प्र । ' किन्तु इस प्रकार से की गई अपनो व्याख्या को व्याख्याकार ने ही अपनी कल्पना की दावाग्नि ' करना उपसर्गपूर्वक मोक्षणार्थं ' मुच् ' धातु से निष्पन्न ' प्रमुञ्च ' क्रियापद का अर्थ ' प्रकर्षतया मोक्षण ' होता है, ' योजन, ' दूरदेश नहीं । मन्त्र में ' योजना ' के अर्थ को बताने वाला कोई भी शब्द नहीं है । ' परावप ' इस क्रियापद की आकांक्षा है । के सम्बन्ध ' से ही शान्त हो जाती है, तब ' शत्रुओं पर ' इत्यादि शब्द के अध्याहार करने की निर्मूलता करने स्पष्ट में कोई हो भी अथवा ' शत्रु ' इस अध्याहार से ही नैराकांक्ष्य मान लिया जाय, तो ' दूरपर्यन्तम् ' इस प्रकार के अध्याहार मूल नहीं है । इस रीति से विचार करने पर व्याख्या की निःसारता स्पष्ट हो जाती है ॥ ९ ॥
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मन्त्रः १० ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता २३ कर्पादनो जटाबन्धनवतः । पर्वणं पर, ' पर्व पूरणे ' इत्यस्मात् सम्पदादित्वाद् भावे किप् । ' राल्लोप: ' ( पा ० सू ० ६ | ४ | २१ ) इति वकारस्य लोपे पर् । केन सुखेन अनायासेन जलेन वा परं भक्तमनोरथानां पूरणं ददातीति कपर्दः । अथवा कस्य जलस्य परा पूरणेन दायति शोधयति मनोमलमिति कपर्दः, ' कपर्दोऽस्य जटाजूट: ' ( अ ० को ० १ | १ | ३५ ) इति कोषात् । कपर्दोऽस्यास्तीति कपर्दी, तस्य रुद्रस्य धनुः, विज्यं विगता ज्या यस्मात् तत्, मौर्वी-रहितमस्तु । उतापि च बाणवान् बाणाः सन्त्यस्मिनिति इषुधिः, इषवो धीयन्तेऽस्मिन्निति स तथोक्तो विशल्यः शल्यं बाणाग्रगतो लौहभागः, विगतं शल्यं फलं यस्मात् स तथाविधः अस्य तूणीरः फलरहितबाणवान् भवत्वित्यर्थः । अस्य रुद्रस्य या इषवः फलरहितबाणाः, ता अपि अनेशन् नश्यन्तु | अदर्शनार्थकस्य नरोर्लुङि प्रथमपुरुषबहुवचने पुषादित्वात् चलेरङि नशेरत एवे च अनेशन्निति रूपम् । किञ्चास्य रुद्रस्य निषङ्गधिः, निषज्यते गात्रेष्विति निषङ्गः खड्गः, स धीयते ऽस्मिन्निति निषङ्गधि: असिकोश: 1 आभुः आसमन्ताद् भावयति प्रकाशयति स्वात्मरूप-मिति आभुः रिक्तः । ' आपरयोः खनिशृभ्यां ङिच्च ' ( उ ० ११३३ ) इति बाहुलकाद् उप्रत्यये रूपम् । अस्य असिकोशोऽपि खड्गरहितो भवत्वित्यर्थः । अथवा नितरां सजति सङ्गं करोतीति निषङ्गधिस्तूणीरो arrat श: । ' नो सोधिन् ' ( उ ० ४।८८ ) इति निपूर्वकात् परिष्वङ्गार्थकात् सर्वधिनुप्रत्ययः । ' लशकर्ताद्धिते ' चजोः कु घिण्यतो: ' ( पा ० सू ० ७ | ३ | ५२ इति कुत्वे ( पा ० सू ० ११३८ ) इति घकारस्येत्संज्ञायाम्, ' रूपम् । अस्मान् प्रति न्यस्तसर्वशस्त्रो भगवान् रुद्रो भवत्वित्यर्थः । यथा व्याघ्रया नखा दंष्ट्राश्च स्वशावकान् प्रति अकिञ्चित्करा भवन्ति तथैव भगवतः सर्वाणि शस्त्रास्त्राप्यनुद्वेगकराणि भक्तरक्षकाणि च भवन्त्वित्यर्थः । ' कपर्दिन: ' जटाबन्धन से युक्त । ' पर्वणं पर् ' ' पवं पूरणे ' धातु से ' सम्पदादित्वात् ' भाव अर्थ में ' क्विप् ' प्रत्यय, और ' राल्लोप: ' ( पा ० सू ० ६ | ४ | २१ ) से ' वकार ' का लोप कर देने से ' पर् ' बना । ' केन सुखेन अनायासेन जलेन वा परं भक्तमनोरथानां पूरणं ददाति इति कपदं । अर्थात् अनायास ही अथवा जल से भक्तों के मनोरथों को जो पूर्ण कर देता है. वह कपर्द है | अथवा ' कस्य जलस्य परा पूरणेनदायति शोधयति मनोबलम् इति कपर्द: ' । अर्थात् जल का पूरण करके मनोबल का जो शोधन करता है, उसे कपदं कहते हैं । ' कपर्द ' शब्द का अर्थ ' कपर्दोऽस्य जटाजूट: ' कोष के अनुसार ' जटाजूट ' है । ' कपर्दः अस्य अस्तीति कपर्दी तस्य कर्पादिनः ' । जटाजूट है जिसके उसे कपर्दी कहते हैं, उस कपर्दी यानी रुद्र का धनुष प्रत्यञ्चारहित हो और ' बाणवान् ' बाणाः सन्ति अस्मिन् इति ऐसा ' इषुधिः ' इषत्रो धीयन्ते अस्मिन् इति सः अर्थात् बाण जिसमें रखे जाते हैं, यानी तरकस ( भाता ) विशल्य रहे । ' शल्यः ' अर्थात् बाण का अग्र भाग ( लौह भाग ) ' विगतं शल्यं फलं यस्मात् सः ' लौह भाग से रहित रहे, अर्थात् उसका तूणीर ( तरकस ) फलरहित बाणवान् रहे । उरा रुद्र के इषु ( बाण ) यानी फलरहित ब्राण भी नष्ट हो । ' नश् ' धातु से लुङ् लकार में ' पुषादित्वात् च्लेरङि ' से नश के अकार को एत्व और तकार को नकार होने पर ' अनेशन् ' रूप सिद्ध होता है । किञ्च अदर्शनार्थंक नश् धातु से लुङ् लकार के प्रथम पुरुष बहुवचन में ' पुषादित्वात् चलेरङि ' चिल को अङ् होने पर नश के अकार को एत्व करने पर ' अनेशन् ' रूप बनता है । किञ्च इस रुद्र का ' निषङ्गधि: ' निषज्यते गात्रेषु इति निषङ्गः, स धीयते अस्मिन् इति निषङ्गधिः, अर्थात् असिकोष, ' आभुः ' आसमन्ताद् भावयति प्रकाशयति स्वात्मरूपम् इति आभुः अर्थात् रिक्त हो जाय । ' आङ्परयोः खनिशृभ्यां ङिच्च ' ( उ ० ११३३ ) से बाहुजकात् ' उ ' प्रत्यय करने पर ' आभुः ' रूप बनता है । अर्थात् इसका असिकोश भी खड्गरहित हो जाय । अर्थात् हमारे प्रति समस्त शस्त्रों को त्याग कर भगवान् रुद्र शान्त हो जाय । व्याघ्री के नख और दंष्ट्राएँ अपने बच्चों के प्रति जैसे अकिञ्चित्कर रहते हैं, वैसे ही भगवान् के समस्त शस्त्र अस्त्र भी हम लोगों के लिये अनुद्वेगकर और भक्तरक्षक हो जाँय ।
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२४ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० १६ यत्तु कश्चित् – ' शिरसि शुभं पल्लवाङ्करं शिरोभूषणं मुकुटविशेषं वा धृतवतो वीरपुरुषस्य नश्यन्ति? धनुः एवं किं कि ज्यारहितं सम्भवति? न चेत्तदीयतूणीरमपि बाणशून्यं कथं स्थास्यति? तस्य तञ्चिन्त्यम् बाणा:, किं मन्त्रेऽस्मिन्नाक्षेपार्थकस्य तस्यासिकोशोऽसिहीनः सम्भवति? नैतत्सर्वं कदाचिदपि सम्भवति ' इति, । किमादेरप्रयोगात् । उतेति निपातोऽप्यर्थकः । एवं कपर्दशब्दो जटाजूटे प्रसिद्धः । इति तथा चामरसिंहवचनमुद्धृतम् पदस्यार्थोऽपि न कृतः । तद्वान् कपर्दी शङ्कर एवात्र गृह्यते, तत्रास्य शब्दस्य योगरूढत्वात् । विशल्य वेदाक्षरानुसारी त्वक्षरार्थं उव्वटमहीधरसम्मतो मदुक्त एव ग्राह्यः ॥ १० ॥
या ते ' हे तिर्मो ' दृष्टम् हस्ते ' ब॒भूव॑ ते॒ धनुः ।
तय॒स्मान् वि॒श्वत॒स्त्वम॑य॒क्ष्मया॒ परि॑भुज ॥ १ ॥
मन्त्रार्थ - हे अत्यधिक वृष्टि करने वाले रुद्र! तुम्हारे हाथ में जो धनुष है, उस सुदृढ धनुष से हमारी सब ओर से रक्षा करो ॥। ११ ॥ हे दुष्ट, अतिशयेन वर्षणशील! ' दाश्वान्साह्वान्मीढ्वांश्च ' ( पा ० सू ० ६ | १ | १२ ) इति सूत्रेण, कसन्तो ' वसोः निपातो मीढ्वानिति । अतिशयेन मीढ्वान् मीढुष्टमः । ' तसौ मत्वर्थे ' ( वा ० सू ० ११४ / १ ९ १०८ ) इति ) इति भसंज्ञायाम् पूर्वरूपे, ' आदेश-सम्प्रसारणम् ' ( पा ० सू ० ६ । ४ । १३१ ) इति सम्प्रसारणे, ' सम्प्रसारणाच्च ' ( पा ० सू ० ६ । १ । रूपसिद्धिः । सेक्तृतमो प्रत्यययोः ' ( पा ० सू ० ८ | ३ | ५ ९ ) इति मूर्धन्यादेशे, ' ष्टुना ष्टुः ' ( पा ० सू ० ८ | ४ | ४१ ) इति ९ ) ष्टुत्वे इत्युक्तेः । परिणामनिषेधेन वर्षक: यविष्ठो वा ' नमो बंहिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः ' ( महिम्नस्तोत्र ० २ ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् | षड्विधभावविकारविवर्जितः परमेश्वरोऽत्र सम्बोध्यते । अथवा – ' मम योनिर्महद् योनी स्वप्रतिबिम्बमयवीर्या-सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत || ' ( भ ० गी ० १४ । ३ ) इति रीत्या प्रकृतिरूपायां को धारण किसी ने यह व्याख्या की है— सिर पर शुभ पल्लवाङ्कुररूप शिरोभूषण होना अथवा संभव मुकुट नहीं विशेष है, तो उससे करने वाले वीर पुरुष का धनुष क्या प्रत्यञ्चा से रहित हो सकता है? यदि ज्यारहित हैं? उसी प्रकार क्या उसका असिकोष सम्बद्ध तूणीर भी बाणशुन्य कैसे रहेगा? उसके बाण क्या नष्ट होते चिन्तनीय ही है, क्योंकि असिरहित होना संभव है? ये सब बातें कदापि संभव नहीं हो सकती ' | किन्तु यह ' व्याख्या अपि ' के अर्थ में है । इसी प्रकार प्रस्तुत मन्त्र में आक्षेपार्थंक ' किम् ' आदि शब्दों का प्रयोग नहीं है । ' उत ' यह निपात दिया है । तद्वान् यानी ' कपर्द ' शब्द ' जटाजूट ' में प्रसिद्ध है । उसके समर्थन में अमरसिंह का वचन पहले उद्धृत अर्थ कर में यह ही कपर्दी शब्द योगरूढ़ है । जटाजूटवान् कपर्दी शब्द से ' शङ्कर ' का ग्रहण यहाँ पर किया जाता है । शङ्कर अक्षरार्थं के को हमने ऊपर बताया है, अत: ' विशल्य ' पद का अर्थ भी नहीं किया । उव्त्रट - महीधरसम्मत वेदाक्षरानुसारी वही ग्राह्य है ॥ १० ॥
हे मीढुष्टम! खूब अच्छी तरह से वर्षण करने वाले! ' दाश्वान्साह्वान्मीढ्वांश्च ' मत्वर्थे ( पा ० ' सू ( ० पा ० ६।१।१२ सू ० १ | ) ४ सूत्र | १ ९ से ) ' मीवान् ' यह वसन्त निपात किया गया है । अतिशयेन मोवान् इति मोदुष्टतमः । ' तसौ ० सू ० ६।१।१०८ ) से भसंज्ञा और ' वसोः सम्प्रसारणम् ' ( पा ० सू ० ६ | ४ | १३१ ) से सम्प्रसारण, तदन्तर ' सम्प्रसारणाच्च ' ( ) पा से ष्टुत्व करने पर से पूर्वरूप और ' आदेशप्रत्ययो: ' ( पा ० सू ० ८ | ३ | ५ ९ ) से मूर्धन्यादेश, ' ष्टुना ष्टु ' ( अथवा पा ० सू यविष्ठ ० ७१४१४१ , क्योंकि महिम्नस्तोत्र में ' मीढुष्टतमः ' रूप निष्पन्न होता है । ' मोदुष्टतम ' का अर्थ है - सेक्तृतम, वर्षुक निषेध से षड्भाव विकारों से विवर्जित कहा गया है - ' नमो बंहिष्ठाय त्रिनयनयविष्ठाय च नमः ' ( महि ० स्तो ० १ ९ ) । परिणाम सर्व-किया गया है । अथवा – ' मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् । सम्भवः परमेश्वर को ही यहाँ सम्बोधित स्वप्रतिबिम्बमय वीर्य के आधायक भूतानां ततो भवति भारत || ' ( भ ० गी ० १४।३ ) इस वचन की रीति से प्रकृति रूप योनि में है, उसका संबोधन में रूप है — हे होने से सर्वोत्पादक परमेश्वर है, अतः वह सेक्तृतम कहलाता है, यानी मीढुष्टतम कहलाता