वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 61–70

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 61–70

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०११-१२ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यं संहिता २५ धायकत्वेन सर्वोत्पादकत्वात् परमेश्वरः सेवतृतमो भवति, तत्सम्बुद्धौ । ते तव हस्ते या हेतिर्वत्रोपमो बाणविशेषो विद्यते यच्च ते धनुर्बभूव अस्ति, तया धनरूपया अयक्ष्मया अविद्यमानो यक्ष्मा रोगो यस्यां सा अयक्ष्मा | ' नञोऽ-स्त्यर्थानां वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः ' ( पा ० सू ० २ २४, वा ० २ ) इति रूपसिद्धिः । तया रोगरहितया दृढया अनुपद्रवकारिण्या वा त्या विश्वतः सर्वतोऽस्मान् परिभुज परिपालय । ' भुज पालनाभ्यवहारयोः ' इति भुजेः धादिकस्य सतो विकरणव्यत्ययेन तौदादिकः शः । अपरस्त्वाह - ' हे अधिकवीर्यशालिन्, शत्रूणामुपरि मेघवच्छरवर्षक! त्वदीये हस्ते वज्रं धनुश्चास्ति, तेन अरुग्णेन विशुद्धबाणेन त्वं सर्वप्रकारेण अभितोऽस्मान् रक्ष । अत्र व्याख्याने द्वितीयस्य शब्दस्य व्याख्या न कृता ' इति, तन क्षोदक्षमम् शरवर्षकेऽर्थे मीढुष्टमशब्दस्य स्वाभाविक्या वृत्त्या अप्रवृत्तेः । जलवर्षणादिरूपेऽर्थे एव तस्य स्वाभाविक प्रवृत्तिः, अत्रापि लौकिकवीरस्तावकत्वेनानुवादकत्वेन वेदस्याप्रामाण्यापतेर्दुर्निवारत्वात् ॥ ११ ॥

परि॑ ते॒ धन्व॑नो हे तिर॒स्मान् वृणक्तु वि॒श्वत॑ः ।

अथो॒ य ईषु धिस्तवारे अ॒स्मन्निधे हि तम् ॥। १२ ॥

मन्त्रार्थ - हे रुद्र! तुम्हारा धनुषरूप आयुध सब और से हमारा त्याग करे, अर्थात् हमें न मारे । तुम अपने बाणों से भरे तूणीर को हमसे दूर रखो ॥ १२ ॥

रुद्र, ते तव धन्वनो धनुःसम्बन्धिनी धनुःप्रेरिता वा हेतिः । आयुधं विश्वतः सर्वतोऽस्मान् परि-वृणक्तु परिवर्जयतु मा हन्त्वित्यर्थः । अथो अपि च, यस्तव इषुधिस्तूणीरः, तमस्मद् अस्मत्सकाशाद् आरे दूरे निधेहि स्थापय । अपराधप्रसङ्गेन शत्रुकृतप्रयोगादिप्रभावेण वा प्रवृत्तानां रुद्रायुधादीनाम् अवरोधाय इय-मभ्यर्थना ज्ञेया । मीढुष्ट | तुम्हारे हाथ में जो वस्त्र के तुल्य बाणविशेष है और जो तुम्हारा धनुष है, उस धनुष रूप अयक्ष्मा से ' अविद्य-मानो यक्ष्मा रोगो यस्यां सा अयक्ष्मा ' । ' नवोऽस्त्यर्थानां वाच्यो वा चोत्तरपदलोप- ' ( पा ० सू ० २ २१४, वा ० २ ) इस रीति से ' अयक्ष्मा ' यह रूप सिद्ध होता है । इस रोगरहित दृढ अथवा अनुपद्रवकारी हेति ( शस्त्र ) से हमारा सर्वथा पालन करो । ' भुज पालनाभ्यवहारयोः " इस रोधादिक भुज धातु से विकरण व्यत्यय से तौदादिक ' श ' हुआ है । किसी ने इस मन्त्र की व्याख्या इस प्रकार की है - ' हे अधिक वीर्यशालिन्! शत्रुओं पर मेघ के समान बाणों की वर्षा करनेवाले! तुम्हारे हाथ में वज्र और धनुष है, उस अरुग्ण यानी विशुद्ध बाण से तुम सब प्रकार से चारों ओर से हमारी रक्षा करो ' । इस व्याख्या में द्वितीय ' ते ' शब्द की व्याख्या नहीं की गई है । ' मीदुष्टम ' शब्द स्वाभाविक नहीं है, क्योंकि वह जलवर्षणादि रूप अर्थ में साधारण है ', किन्तु यह कथन भी उचित नहीं है, क्योंकि शरवर्षक अर्थ में ' मीढुष्टम ' शब्द की स्वाभाविक वृत्ति से प्रवृत्ति नहीं है । जलवर्षणादि रूप अर्थ में ही उस शब्द की स्वाभाविक प्रवृत्ति है । यहाँ भी लौकिक की स्तुति होने से अनुवादकत्व कहना होगा, जिससे वेद में अप्रामाण्यापत्ति प्राप्त होगी, जो दुर्निवारणीय है ॥ ११ ॥

हे रुद्र! तुम्हारी धनुः सम्बन्धिनी अथवा धनुःप्रेरित हेति यानी आयुध सब ओर से हमें त्याग दे, अर्थात् हमें न मारे । अपि च, जो तुम्हारा तूणीर है, उसको हम लोगों से दूर रखो । अपराध के प्रसंग से अथवा शत्रुकृत प्रयोगादि के प्रभाव से प्रवृत्त रुद्रायुधादिकों के अवरोधनार्थ यह प्रार्थना है । ४

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२६ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० १६ अपर आह - हे रुद्र, त्वदीयधनुः सम्बन्धिनो बाणाः सर्वतोऽस्मान् रक्षन्तु । ये त्वदीया भवेत् बाणास्तान् । शस्त्रेषु दूरे रक्ष । शास्त्रागाराः शतघ्न्यादयो नगरात् पर्याप्तं दूरे तिष्ठन्तु । यतस्तेषां यतो ह्यत्रापि विस्फोटेन व्याख्याने नगरहानिर्न रुद्रपदेन राजैव विवक्षितः शतघ्न्यो नगरस्याभितो रक्षार्थं नियुज्यन्ताम् ' इति, तन्न रोचते, ध्रुवम् अनुवादकत्वेन वेदस्या-स्यात् । नीतिज्ञो राजा लोकत एवेतज्जानाति । वेदेनापि तदेव बोध्यते चेत्, तदा रूढो न शास्त्रागारे । नापीषु-प्रामाण्यमापतेत् । परिपूर्वकस्य वृजेर्वर्जनमेवार्थो न रक्षणम् । इषुधिशब्दोऽपि तूणीरे । द्विवारं तदुपयोगोऽपि शब्देन शतघ्न्यो बोध्यन्ते, निष्प्रमाणत्वात् । आरेशब्द एकधैव प्रयुक्तो दूरत्वबोधकः अशुद्ध एव ॥ १२ ॥

अवतत्य॒ धनुष्ट्व, सह॑स्राक्ष शते षुधे ।

निशीर्य ' शल्यानां मुखा शिवो नः सुमना भव ॥ १३ ॥

मन्त्रार्थ - हे सौ तूणीर और सहस्र नेत्रधारी इन्द्र! धनुष की प्रत्यंचा दूर करके और बाणों के अग्र भागों को तोड़ कर तुम हमारे विषय में शान्त और सद्बुद्धि धारण करो ॥ १३ ॥

हे सहस्राक्ष, सहस्रम् अक्षीणि नेत्राणि यस्य स सहस्राक्षः, तत्सम्बुद्धौ । है शतेषुधे शतम् मुखा इषुधयो मुखानि यस्य स शतेषुधिः, तत्सम्बुद्धौ । त्वं धनुर् अवतत्य अवतायें ज्यारहितं कृत्वा शल्यानां बाणफलानां । निशीर्य शातयित्वा कुण्ठितानि कृत्वा अस्मान् प्रति शिवः शान्तः सुमनाः शोभनचित्तो भव, अनुगृहाणेत्यर्थः अन्यस्त्वेवमाह — हे सहस्राक्ष, सहस्रशः कार्येषु दृष्टिमन्, बाणशततूणीरवान् शस्त्रागारवांश्च त्वं धनु-रवतत्य बाणमुखानि तीक्ष्णीकृत्य अस्मान् प्रति कल्याणकरः शुभचित्तश्च भव ' इति, तदपि पूर्वव्याख्यानसदृशमेव किसी ने इसकी व्याख्या यह की है - ' हे रुद्र! तुम्हारे धनुष के बाण हमारी सब तरह से रक्षा करें । जो उनके विस्फोट हो जाने तुम्हारे बाण हैं, उन्हें दूर रखो । शतघ्नी आदि शस्त्रागार नगर से पर्याप्त दूर स्थित रहें, क्योंकि की जाय ', किन्तु यह पर नगर की हानि न हो सके । नगर के चारों ओर रक्षणार्थं शस्त्रों में से शतनियों की नियुक्तियां इन सब बातों को व्याख्यान ठीक नहीं है, क्योंकि इसमें भी ' रुद्र ' पद से ' राजा ' की ही विवक्षा करनी होगी । नीतिज्ञ राजा होगा, लोक से हो जान लेता है, उन्हीं बातों को यदि वेद भी बोधन कराने लगे, तो निश्चित ही उसे अनुवादक । ' कहना इषुधि ' शब्द जिससे वेद में अप्रामाण्य का प्रसंग प्राप्त होगा । परिपूर्वक ' वृज ' धातु का ' वर्जन ' ही अर्थ है, ' रक्षण ' नहीं वे भी तूणीर में रूढ हैं, ' शस्त्रागार ' अर्थ में नहीं । ' इषु ' शब्द से ' शतनियों ' को बोधित नहीं किया जा सकता दो, बार क्योंकि प्रयोग निष्प्राण हैं । दूरत्व का बोधक ' आरे ' शब्द मन्त्र में एक ही बार प्रयुक्त हुआ है । व्याख्याकार के द्वारा उसका किया जाना भी अशुद्ध है ॥ १२ ॥

सहस्राक्ष कहते हे सहस्राक्ष! ' सहस्रम् अक्षीणि नेत्राणि यस्य स सहस्राक्षः, तत्सम्बुद्धी ' हजार नेत्र हैं जिसके, उसे ' सौ तूणीर है । हैं, उसके सम्बोधन में रूप बना ' सहस्राक्ष! ' हे शतेषुधे! ' शतम् इषुघयो यस्य स शतेषुधिः, तत्सम्बुद्धी को प्रत्यंचारहित करके जिसके पास, उसे शतेषुधि कहते हैं, उसके संबोधन में ' शतेषुधे ' रूप बनता है । तुम अपने धनुष करो । और बाणफलकों के मुखों को कुण्ठित करके हम लोगों के प्रति शान्त और प्रसन्नचित्त होकर हम पर अनुग्रह ! सैकड़ों किसी अन्य व्यक्ति ने यह अर्थं किया है -- ' हे सहस्राक्ष, यानी हजारों कार्यों में दृष्टि रखनेवाले कर हमारे प्रति बाण - तूणीर और शस्त्रागारों को रखनेवाले तुम अपने धनुष को खींचकर तथा बाणमुखों त्याज्य को तीक्ष्ण है । ' इषुधि ' शब्द को कल्याणकर और प्रसन्नचित्त हो जाओ ', किन्तु यह अर्थ भी पूर्वं व्याख्या के समान ही

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म ० १३-१४ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता २७ यम् इषुधिशब्दस्य शस्त्रागारार्थत्वस्य रूढिविरुद्धत्वात्, तूणीरे तस्य योगरूढत्वात् । अवपूर्वस्य ततेरवतारण-मेवार्थो न वातानम् । शुहिंसायामिति धातोर्निपूर्वकान्निष्पन्नस्य निशीर्यशब्दस्य हिंसनमेवार्थी नोत्तेजनम्, तथा प्रयोगादर्शनात् । सिद्धान्ते तु रुद्र ईश्वरोऽत्र प्रार्थ्यते । तस्य शस्त्राणि शत्रुषु वेदादिशास्त्रादिप्रतीपेषु सुतीक्ष्णान्यपि सन्मार्गस्थान् वैदिकान् प्रति कुण्ठितान्येव भवन्त्विति प्रार्थ्यते । यथा व्याघ्रादीनां नखा दंष्ट्राश्व हिंसनीयान् प्रति तीक्ष्णा अपि स्वशावकान् प्रति कुण्ठिता भवन्तीति, तद्वत् । सहस्राक्षशब्दस्यापि सहस्रकार्य दृष्टित्वं नार्थः, कार्य-शब्दस्य तत्रासत्त्वात् ॥ १३ ॥

नमस् उ॒भय॑

आयुधायानातताय धृ ष्णवे ।

ते॒ नमो॑ बा॒हुभ्या॒ तव॒ धन्व॑ने ॥ १४ ॥

मन्त्रार्थ - हे रुद्र! शत्रुओं को मारने में जो धृष्ट है, ऐसे और धनुष पर न चढ़ाये गये तुम्हारे बाण को हमारा प्रणाम है । तुम्हारे दोनों बाहुओं को और धनुष को भी हमारा प्रणाम है ॥ १४ ॥

रुद्र, ते तव अनातताय धनुष्यनारोपिताय आयुधाय बाणाय नमः । कीदृशाय? धृष्णवे धर्षणशीलाय शत्रुवधे प्रगल्भाय । उत अपि च, तव उभाभ्यां बाहुभ्यां नमः । अनातताय अवतारितज्याय धृष्णवे शत्रुवध-प्रगल्भाय धन्वने धनुषे च नमः । अपर आह -- ' आयुधाय अभितो योद्धे अनातताय धृष्णवे स्वल्पकायत्वेऽपि शत्रुपराजिष्णवे ते तुभ्यं वयं प्रजागणा नम आदरम् अन्नादिपदार्थांश्च समर्पयामः । त्वदीयपार्श्ववर्तिनीभ्यः सेनाभ्यश्च बलादन्नादिकमुप-नयतु । त्वदीयाय धनुष्मते सेनाबलाय च अन्नं वीर्यं चोपतिष्ठतु ' इति, तन्न शोभनम्, सर्वस्याप्यर्थस्य उदक्षरत्वात् शस्त्रागारार्थंक बताना रूढिविरुद्ध है, क्योंकि वह ' तूणीर ' के अर्थ में योगरूढ है । अवपूर्वक ' तत ' का ' अवतारण ' ही अर्थ होता है, ' आतानन ' नहीं । ' शू हिंसायाम् ' धातु को ' निर् ' उपसर्ग लगाकर निष्पन्न हुए ' निशीर्य ' शब्द का ' हिंसन ' अर्थं ही होता है, ' उत्तेजन ' नहीं, क्योंकि उस अर्थ में प्रयोग दिखाई नहीं देता । सिद्धान्त की दृष्टि से यहाँ पर भगवान् रुद्र ( ईश्वर ) की प्रार्थना की गई है । उस ईश्वर के शस्त्र वेद - शास्त्र के विपरीत चलनेवाले शत्रुओं पर सुतीक्ष्ण होकर गिरें और सन्मार्ग पर स्थिर रहने वाले वैदिकों के प्रति वे तीक्ष्ण शस्त्र कुण्ठित ही हो जाय । जैसे व्याघ्र आदि हिंसक प्राणियों के नख और दाढें हिंसनीय प्राणियों के लिये तीक्ष्ण रहती हुईं भी अपने बच्चों के लिये कुण्ठित ही हो जाती हैं, उसी तरह तुम्हारे सुतीक्ष्ण शस्त्र हमारे लिये कुण्ठित हों । ' सहस्राक्ष ' शब्द का अर्थ भी सहस्र कार्यों पर दृष्टि रखना नहीं है, क्योंकि ' कार्य ' शब्द वहाँ है ही नहीं ॥ १३ ॥

रुद्र! तुम्हारे धनुष पर अनारोपित ( अनातताय ) बाण रूप आयुध के लिये प्रणाम हो, जो आयुध घर्षणशील अर्थात् शत्रुवध करने में प्रगल्भ है । अपि च, तुम्हारे दोनों बाहुओं को प्रणाम है और अनातत अर्थात् जिसकी प्रत्यंचा उतारी नहीं गई है, अत एव शत्रुवध करने में प्रगल्भ है, उस धनुष के लिये प्रणाम है । कोई व्याख्याकार इस मन्त्र का अर्थ यह करता है - ' चारों ओर युद्ध करनेवाले, स्वल्प काय रहने पर भी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले तुमको हम लोग प्रजागण नमस्कार और आदर तथा अन्नादि पदार्थों को अर्पित करते हैं । तुम्हारी पार्श्ववर्तिनी सेनाओं को बल आदि प्राप्त हो । तुम्हारे धनुष और सेनाबल के लिये अन्न और वीर्यं प्राप्त हो ',

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II शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० १६ काल्पनिकत्वाच्च । शस्त्रास्त्रेषु रूढस्य आयुधशब्दस्य सर्वतो योद्धृपुरत्वं न सम्भवति । एवमेव नमःशब्दस्य न किमपि वीर्यादिप्रदानमपि नार्थः, तादृशेऽर्थे शक्तिग्रहाभावात् । बाहुभ्यामिति पदेन पार्श्ववर्तिनी सेनाग्रहणे नितरां बाध्यते । प्रमाणम् । वस्तुतस्तु परमेश्वरस्य रुद्ररूपस्य बाहुमस्वेन त्वदीयो निराकारत्वाभ्युपगमवादो तद्रक्षणायैव काल्पनिकनिष्प्रमाणार्थकल्पनम् ॥ १४ ॥

मानो महान्तमुत मानो ' अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मान॑ उक्षि॒तम् ।

मा नो वधोः पितरं मोत॑ मा॒तर् मा नः॑ प्रि॒यास्त॒न्वो रुद्र रीरिषः ॥ १५ ॥

मन्त्रार्थ - हे रुद्र! हमारे सम्बन्धी जो बालक, तरुण और वृद्ध हैं, उनका विनाश मत करो तथा हमारे गर्भस्थ सम्बन्धी और माता - पिता तथा प्रिय पुत्र - पौत्रों का भी नाश मत करो ॥ १५ ॥

हे रुद्र, नोऽस्माकं महान्तं वृद्धं वयसा विद्यया च गुरुपितृव्यादिकं मा वधीर्मा उक्षितं हिंसीः सिक्तं । उतापि गर्भस्थं नो च अस्माकम् अर्भकम् अल्पं बालं मा वधीः । नः उक्षन्तं सेचनसमर्थं तरुणम् उतापि न जातमेव, तथापि माधोः । उतापि नः पितरं मातरं च मा वधीः । यद्यपि महान्तमित्यनेनैव पित्रोरपि ग्रहणं रीरिषो मा मनो आदरातिशयार्थं पुनर्ग्रहणम् । नः प्रियास्तन्वस्तनूः प्रेमास्पदशरीरप्रायाणि पुत्रपौत्रादीनि च मा हिंसितुं कार्षीः । रिष हिंसायाम् ' इत्यस्य ण्यन्तस्य रूपम् । अन्य आह— ' हे सेनापते, त्वमस्माकं महतो वृद्धान् आदरणीयान् पूजनीयान् अर्भकान् निम्नपदस्थांश्च मा हिंसीः । वीर्यसेचनसमर्थान् अस्माकं तरुणपुरुषानपि मा हन्तु । गर्भस्थान् डिम्भांश्व मा नाशयतु । पितरं मातरं चमा हन्तु । हे दुष्ट रोदक, अस्मत्प्रियशरीराणि मा पीडयस्व ' इति, तदप्यशोभनम् विरुद्धार्थत्वात् । तथाहि - पूर्वं किन्तु यह अर्थ मन्त्राक्षरों से मेल न खाने के कारण शोभा नहीं दे रहा है । यह सम्पूर्ण अर्थ कल्पनाप्रसूत ही है । शस्त्र-अस्त्र के अर्थ में रूढ हुए ' आयुष ' शब्द का ' सर्वतो योद्धृपरत्व ' अर्थं करना कैसे संभव है? एवमेव ' नमः ' शब्द का ' वीर्यादिप्रदान करना ' अर्थ नहीं है, क्योंकि उस अर्थ में शक्तिग्रह नहीं है । ' बाहुभ्याम् ' पद से ' पारवर्तिनी सेना ' का अर्थ ग्रहण करने में कोई प्रमाण नहीं है । वस्तुतः इस प्रकार के काल्पनिक अर्थ के गढ़ने में रहस्य यह है कि रुद्र भगवान् के भुजाओं से युक्त होने के कारण तुम्हारा ' निराकारत्व ' का सिद्धान्त पूर्णतया भंग हो जाता है । अतः अपने निराकारत्व सिद्धान्त को यथाकथञ्चित् बचा पाने की इच्छा से ही उक्त काल्पनिक अर्थ को गढा गया है, किन्तु इसमें कोई प्रमाण नहीं है ॥ १४ ॥

हे रुद्र! हमारे वयोवृद्ध और विद्यावृद्ध गुरु पितृव्य आदि की हिंसा मत करो तथा हमारे छोटे बालकों को भी हिंसा मत करो । उसी प्रकार हमारे सेचनसमर्थ ( तरुण ) तथा सिक्त और गर्भस्थित शिशुओं की भी हिंसा मत करो, एवं हमारे पिता और माता को भी हिंसा मत करो । यद्यपि ' महान्तम् ' कह देने से ही माता - पिता का भी ग्रहण हो ही जाता है, तथापि आदरातिशय के प्रदर्शनार्थं पुनः ग्रहण किया है । हमारे प्रेमास्पद शरीरप्राय पुत्र - पौत्रादिकों की भी हिसा मत करो, अर्थात् उनकी हिंसा करने की बात मन में भी मत लाओ । ' रिष् हिंसायाम् ' धातु के ण्यन्त का रूप ' हिंसी: ' है । किसी ने इस मन्त्र की व्याख्या यह की है - ' हे सेनापते! तुम हमारे महान् वृद्ध, आदरणीय पूजनीय और निम्न पद पर स्थितों की हिंसा मत करो । हमारे वीर्यसेचन समर्थं तरुण पुरुषों की भी हिंसा मत करो । तथा गर्भस्थ और डिम्भों ( शिशु ) का भी नाश मत करो । हमारे पिता - माता का भी हनन मत करो । हे दुष्टरोदक! हमारे प्रिय शरीरों की भी

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भ ० १५-१६ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता रुद्रपदेन राजा सम्बोधितः, इदानीं तु सेनापतिः सम्बोध्यते । राजा वा सेनापतिर्वा राष्ट्ररक्षको भवति, न राष्ट्र-पीडकः । तेन तत्कर्तृकः प्रजाया महदर्भक तरुणगर्भस्थ शिशुघातो मातापितृघातश्च अप्राप्त एवेति मुधैव तदभ्यर्थना । नन्वीश्वरपक्षेऽपि तस्य न्यायकारित्वात् तद्विघातोऽप्यप्राप्त एवेति चेन्न, जन्मान्तरीयदुष्कृतवशात् फलदातुरीश्वरस्य तत्फलदानरूपेण तथा प्रवृत्तिसम्भवात् । तावतापि न तस्य वैषम्यनैर्घृण्ये, कर्मसापेक्षत्वात्, ' वैषम्यनैर्घृण्ये न सापे-क्षत्वात्तथाहि दर्शयति ' ( बा ० सू ० २ | १ | ३४ ) इति बादरायणसूत्रे तथा निर्णयात् । नन्वेवमवश्यम्भावित्वेऽपि तथा-भ्यर्थनापार्थैवेति चेत्, तदपि तुच्छम् भक्त्या स्तुत्या दुष्कृतनाशस्य वेदादिशास्त्रेषु श्रवणात् त्वयापि तथाभ्यु-पगमाच्च । न चैवं राजादिषु जन्मान्तरीयदुष्कृतफलदातृत्वं सम्भवति तेषां पराग्दर्शित्वेन तद्बोधासम्भवात्, लोकप्रत्यक्षाणां कर्मणामेव फलदाने तेषामधिकाराच्च ॥ १५ ।

मान॑स्तोके तन॑ये॒ मा न आयु॑षि॒ मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः ।

मा' नो ' वीरान् द्र भामिनो ' वधोर्ह विष्मन्तः॒ सद॒मित्वा ' हवामहे ॥ १६ ॥

मन्त्रार्थ - हे रुद्र! हमारे पुत्र - पौत्र, आयु, गाय, घोड़ों आदि का नाश मत करो तथा हमारे क्रोधी भृत्यों का भी नाश मत करो । हम हमेशा ही हविर्धारण करके यज्ञ में तुमको बुलाते हैं ॥ १६ ॥

नः अस्माकम्, तोके पुत्रविषये, मा रीरिषः मा हिंसीः । तनये पौत्रे व मा हिंसीः । नः अस्माकमायुषि जीवने विषयभूते मा हिंसीः । नः अस्माकं गोषु धेनुषु विषयभूतासु मा हिंसीः । नः अस्माकमश्वेषु विषयभूतेषु मा हिंसीः । हिंसितुं मनोऽपि मा कार्षीः । अथवा विभक्तिव्यत्ययेन व्याख्यानम् । नः अस्माकम् तोकं तनयमायुर्गाः हिंसा मत करो, किन्तु यह व्याख्या विरुद्धार्थक होने से अशोभन ही है, क्योंकि पहले तो ' रुद्र ' पद से ' राजा ' को संबोधित किया था, किन्तु अब ' रुद्र ' पद से ' सेनापति ' को संबोधित कर रहे हैं । राजा अथवा सेनापति राष्ट्र का रक्षक होता है, राष्ट्र का पीड़क नहीं । इस कारण उस राजा या सेनापति के द्वारा वृद्ध, अर्भक, तरुण, गर्भस्थ शिशु आदि प्रजा का और माता - पिता का हनन हो ही नहीं सकता, अर्थात् उनका हनन अप्राप्त है, तब उसकी अभ्यर्थना करना व्यर्थ ही है । यदि कहो कि ईश्वरपक्ष में भी उसके न्यायकारी होने से उनका भी विघात अप्राप्त ही है, किन्तु यह विचार करना ठीक नहीं है । जन्म - जन्मान्तर के दुष्कृत के कारण उसका फल देने के लिये फलदाता ईश्वर की उस प्रकार की प्रवृत्ति होना संभव है । उस प्रवृत्ति से ईश्वर में किसी प्रकार भी वैषम्य नैर्घुण्य की संभावना नहीं की जा सकती, क्योंकि उसकी प्रवृत्ति में प्राणियों के कर्म की अपेक्षा रहती है । अर्थात् कर्मसापेक्ष उसकी प्रवृत्ति है । कहा भो है - ' वैषम्य - नैर्धृण्ये न सापेक्षत्वात्तथाहि दर्शयति ' ( बा ० सू ० २ १।३४ ) बादरायणसूत्र में उक्त निर्णय किया गया है । यदि कोई यह शंका करे कि इस प्रकार की अवश्यंभाविता रहने पर भी प्रार्थना की जा सकती है, उसे व्यर्थं कैसे कह सकते हैं? किन्तु यह शंका सारहीन है, क्योंकि भक्ति से, स्तुति से दुष्कृतपुंज का नाश होना बेदादि शास्त्रों में श्रुत है । तुमने उसे स्वीकार भी किया है । तब तो यह भी कह सकते हैं कि राजा भी जन्मान्तरीय दुष्कृत का फलदाता है । किन्तु यह कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि राजा पराग् दर्शी है, अतः जन्मान्तरीय दुष्कर्मों का ज्ञान उसे होना संभव नहीं है । उसे तो वर्तमान जन्म के ही कतिपय कर्मों का ज्ञान हो पाता है, इसीलिये लोकप्रत्यक्ष कर्मों के फलदान में ही उनका अधिकार बताया गया है ॥ १५ ॥

हमारे पुत्र ( तोक ) की हिंसा मत करो, पौत्र ( तनय ) की हिंसा मत करो, हमारी आयु की ( प्राणों की ) हिंसा मत करो, हमारी गायों की हिंसा मत करो, हमारे अश्वों ( घोड़ों ) की हिंसा मत करो, उनकी हिंसा करने बात की मन में भी मत लाओ । अथवा विभक्तिव्यत्यय करके व्याख्या इस प्रकार कर सकते हैं — हमारे तोक, तनय, आयु, गो, अश्व – इनको अपनी हिंसन क्रिया का साध्य मत बनाओ ।

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३० शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० १६ ल्युणिन्यच: ' अश्वान् मा रीरिषः हिंसीः । हे रुद्र, नः अस्माकम् भामिनः भामन्ते इति भामिनः, ' नन्दिग्रहिपचादिभ्यो वधीः । यतो हविष्मन्तो हवि-( पा ० सू ० ३ | १ | १३४ ) इति ग्रहादित्वाणिनिः तान् । क्रुद्धानपि वीरान् योद्धृन् मा त्वदेकशरणा युक्ता वयं सदं सदैव त्वा इत् त्वामेव, इच्छन्द एवार्थकः । यागाय आह्वयामहे आह्वयामः । सर्वदैव वयमिति भावः । सदैव अपर आह— ' हे दृष्टरोदक, अस्मन्नवजातशिशून् पञ्चवर्षाधिकवयस्कांश्च पुत्रान् मा हिंसीः कुतो । न वयं कृतम्? अन्नाद्युपहरणीयैः पदार्थैस्तवैव सम्मानं कुर्मः ' इति, अत्रापि ' गोषु अश्वेषु ' इत्यनयोः पदयोर्व्याख्यानं प्रवृत्तिः सम्भवति । हवामह इत्यस्य आदरकरणमर्थोऽप्रमाणकः । रुद्रस्य राज्ञः सेनापतेर्वा नहि प्राणिनां गवाश्वादिहनने प्राक्तनकर्मवशात् तथा प्रवृत्तौ वीरास्तु तदुपयोगिन एवेति कुतस्तद्धननं प्राप्यते? परमेश्वरस्य रुद्रस्य तु सेनापतेर्वा प्राक्तनकर्मज्ञानं न न काचिद्वाधा । शुभकर्मभिः स्तुत्यादिभिश्च तद्वारणमपि सम्भवत्येव । न च राज्ञः वा तदनुसारेण फलप्रदायकत्वम्? ॥ १६ ॥

नमो॒ हिर॑ण्यबाहवे सेना॒न्ये वि॒िशां च पत॑ये नमो नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यः पशूनां पत॑ये॒ नमो॒ नमः॑ श॒ष्वज॑राय॒ त्विषोमते पथो॒नां पत॑ये नमो नमो हरिकेशा-योपवीतिने पुष्टानां पतये - नमः ॥ १७ ॥

मन्त्रार्थ - जिसकी भुजाएं अलंकार स्वरूप हैं, सेनापति, दिक्पालक, हरित पत्रवाले वृक्षों का रूप धारण का, कान्तिमान्, भार्गों का करने वाला, जीवों का रक्षण करने वाला, बाल तृग के समान पीतता लिये हुए रक्त नरों वर्ण का अधिपति जो रुद्र है उसे रक्षक, कृष्ण केशयुक्त, मंगलार्थ यज्ञोपवीत धारण करने वाला, सम्पूर्ण गुणों से युक्त हमारा प्रणाम है ॥ १७ ॥

' नमो हिरण्यबाहवे ' ( कण्डिका १७ ) इत्यारभ्य ' द्रापे अन्धसस्पते ' ( कण्डिका ४७ ) इत्यतः प्राक् सर्वाणि यजूंषि यजुर्मन्त्राः, नियताक्षरावसानपादत्वाभावात् । हे रुद्र! क्रुद्ध होने पर भी उनका वध मत करो । ' भामिनः ', ' भामन्ते इति क्रुद्धान् भामिनः । क्रुद्ध ', ' होने नन्दिग्रहिपचादिम्यो वाले उन वीरों ल्युणिन्यचः ' ( पा ० सू ० ३ | १ | १३४ ) सूत्र से ग्रहादित्वात् णिनिः । तान् भामिनः, अर्थात् एव ) यज्ञ में आने के को मत मारो, क्योंकि हम हविष्मान् हैं । हवि लिये हुए हम सर्वदा ही ( सर्द ) तुम्हीं को ( इत् = लिये बुलाते हैं । सर्वदा हमलोग एकमात्र तुम्हारी शरण में हैं । और पांच वर्ष से किसी ने इस मन्त्र का अर्थ यह किया है - ' है दुष्टरोदक! हमारे नवजात शिशुओं के योग्य की पदार्थों से तुम्हारा अधिक अवस्था वाले वयस्कों की और पुत्रों की हिंसा मत करो । हम सदैव अन्नादि उपहारों क्यों नहीं की गई? ' हवामहे ' का ही सम्मान करते हैं ' इति । इस अर्थ में भी ' गोषु, अश्वेषु ' इन दो पदों की व्याख्या आदि के हनन में नहीं हो सकती, ' आदरकरण ' रूप अर्थ अप्रामाणिक है । राजा या सेनापति ( रुद्र ) की प्रवृत्ति गो अश्त्र क्यों होगी? परमेश्वर रुद्र की क्योंकि वीर लोग ही उसके उपयुक्त हैं, तब उनके हनन में राजा या सेनापति की प्रवृत्ति में कोई बाधा नहीं है । शुभ तो प्राणियों के प्राक्तन कर्मवशात् उस विषय में प्रवृत्ति हो सकती है । उसकी प्रवृत्ति होने को प्राक्तन कर्मों का ज्ञान होना कर्मों से और स्तुति आदि करने से उसका निवारण भी हो सकता है । राजा या सेनापति संभव नहीं और न ही तदनुसार उनका फलप्रदायकत्व ही है ॥ १६ ॥

सब यजुस्, ' नमो हिरण्यबाहवे ' ( कण्डिका १७ ) से आरंभ कर ' द्रापे अन्धसस्पते ' ( कण्डिका ४० ) के पूर्व तक अर्थात् यजुर्मन्त्र हैं, क्योंकि उनमें नियताक्षरावसानपादत्व नहीं है ।

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म ० १७ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता ३१ तत्र ' नमो हिरण्यबाहवे ' इत्यारभ्य ' धनुष्कृद्भयश्च वो नमः ' इत्यन्तानां चत्वारिंशदधिकद्विशतसंख्याकानां यजुषां तावन्तो रुद्रा देवताः, ' नमो वः किरिकेभ्यः ' इत्यादि चतुर्णाम् अग्निवायसूर्या देवता रुद्राणां प्रधानभूताः । छन्दांसि तु चतुरक्षरं देवी बृहती, पञ्चाक्षरं देवी पङ्क्तिः, षडक्षरं यजुर्गायत्री, सप्ताक्षरं यजुरुष्णग्, अष्टाक्षरं यजुरनुष्टुप्, नवाक्षरं यजुर्बृहती, दशाक्षरं यजुः पङ्क्तिः, एकादशाक्षरं यजुस्त्रिष्टुप, द्वादशाक्षरं यजुजंगती, चतुर्दशाक्षरं साम उष्णिक् । एकमेव किरिकेभ्य इति चतुर्णाम् । तद्रुद्रमध्ये केचनोभयतोनमस्काराः । अर्थात् पदद्वयात् पूर्वं पदोच्चारणात् पश्चाच्च नमः पदं येषां ते । ' हिरण्यबाहवे ' इत्यारभ्य ' श्वपतिभ्यश्च वो नमः ' ( कण्डिका २८ ) इत्यन्तम् । ततोऽन्यतरतोनमस्काराः, अन्यतरत आदावेव यजुर्द्वयस्य नमस्कारो येषां ते । ' नमो भवाय च रुद्राय च ' ( कण्डिका २८ ) इत्यारभ्य ' प्रखिदते च ' ( कण्डिका ४६ ) इत्यन्ताः । तत उभयतोनमस्काराः, ' नम इषुकृद्भयश्च वो नमः ' ( कण्डिका ४६ ) इति । ' नमः सभाभ्यः ' ( कण्डिका २४ ) इत्यारभ्य जातसंज्ञा रुद्राः । तेषामुभयतोनमस्कारा घोरतरा अशान्ततराः । अन्यतरतोनमस्काराः शान्ततराः । तथा चाह ब्राह्मणम् — ' तेषां वा उभयतोनमस्कारा अन्येऽन्यतरतोनमस्कारा अन्ये ते ह ते घोरतरा अशान्ततरा य उभयतोनमस्कारा उभयत एवेनानेतद्यज्ञेन नमस्कारेण शमयति ' ( श ० ९ । १ । १ । २० ) इति । अथ मन्त्राणामर्था उच्यन्ते । एकैकस्यां कण्डिकायाम् अष्टावष्टी रुद्राः । मन्त्रार्थस्तु - हिरण्यबाहवे हिरण्यं स्वर्णमयमाभरणं बाह्वोर्यस्य स हिरण्यबाहुस्तस्मै रुद्राय नमः । स्पष्टमत्र रुद्रस्य परमेश्वरस्य सगुणसाकार-विग्रहवत्त्वं विज्ञायते । सेनान्ये हिरण्यबाहू रुद्रश्व सेनां नयतीति सञ्चालयतीति सेनानीः, तस्मै रुद्राय नमः । दिशां च पतये पालकाय रुद्राय नमः । हरिकेशेभ्यः हरयो हरितवर्णाः केशाः पर्णरूपा येषां ते हरिकेशास्तेभ्यः, वृक्षेभ्यः वृक्षरूपरुद्रेभ्यो नमः । पशूनाम्पतये रागद्वेषादिदोषान्धाः सन्तः सर्वमविशेषमेव पश्यन्तीति पशवो जीवाः, तेषां पतये उनमें ' नमो हिरण्यबाहवे ' से आरम्भ कर ' धनुष्कृद्भयश्च वो नमः ' तक दो सौ चालीस ( २४० ) यजुस् ( यजुमंन्त्र ) हैं, उतने ही उनके रुद्र देवता हैं और ' नमो वः किरिकेभ्यः ' इत्यादि चार मन्त्रों के अग्नि, वायु, सूर्य देवता हैं. जो रुद्रों के प्रधान-भूत हैं । उनके छन्द तो अनेक हैं । चार अक्षर वाले दैवी बृहती, पाँच अक्षरवाले दैवी पक्ति, छह अक्षरों वाली यजुर्गायत्री, सात अक्षरों वाली यजुरु ष्णिक्, आठ अक्षरों वाली यजुरनुष्टुप् नो अक्षरों वाली यजुबृंहती, दश अक्षरों वाली यजुः पङ्क्ति, न्यारह अक्षरों वाली यजुस्त्रिष्टुप् बारह अक्षरों वाली यजुजंगती, चौदह अक्षरों वाली साम उष्णिक्, किरिकों के लिये एक ही । उन रुद्रों में से कुछ के दोनों ओर नमस्कार हैं, अर्थात् पदोच्चारण से पूर्व और पश्चात् ' नमः ' पद है, ' हिरण्य -बाहवे ' से आरम्भ करके ' श्वपतिभ्यश्च वो नमः ' ( कण्डिका २८ ) के अन्त तक । उसके बाद एक ओर से नमस्कार है, ' अन्यतरतः ' आदि में ही दो यजुओं को नमस्कार है । ' नमो भवाय च रुद्राय च ' ( कण्डिका २८ ) से आरम्भ कर प्रखिदते ' च ' ( कण्डिका ४६ ) के अन्त तक । उसके आगे उभयतः नमस्कार हैं, ' नम इषुकृद्भयो धनुष्कृयश्च वो नमः ' ( कण्डिका ४६ ) इति । ' नमः सभाभ्यः ' ( कण्डिका २४ ) से आरम्भ करके जातसंज्ञक रुद्र हैं । उनको उभयतः नमस्कार हैं, जो घोरतर यानी अशान्तर हैं । जो शान्ततर हैं, उनको अन्यतरतः नमस्कार है । इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण ( ९ | १ | १ | १० ) भो बता रहा है । एक - एक ' कण्डिका में आठ - आठ रुद्र हैं । मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है- स्वर्णमय आभरण है बाहुओं में जिसके, उस हिरण्यबाहु रुद्र के लिये नमस्कार । इससे स्पष्ट है कि परमेश्वर रुद्र सगुण - साकार विग्रहधारी है । वह हिरण्यबाहु रुद्र सेना का संचालन करता है, इसलिये उसे ' सेनानी ' कहते हैं, उस सेनानी रुद्र को नमस्कार हैं । दिशाओं के पालक रुद्र को नमस्कार है । हरित वर्ण के हैं पर्णरूप केश जिनके, वे हरिकेश कहलाते हैं, वे हरिकेश वृक्ष हैं । उन वृक्षरूप रुद्रों को नमस्कार है । ' पशूनाम्पतये ' रागद्वेषादि दोषों से अन्ध होकर सबको समान रूप से जो देखते हैं, वे पशु कहलाते हैं । उन

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३२ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० १६ , छान्दसष्टिलोपः, तस्मै । पालकाय रुद्राय नमः । शष्पिञ्जराय शष्पं बालतृणं तद्वत् पिञ्जरः पीतरक्तवर्णः दीर्घभात्रः शष्पिञ्जरः , त्विषीमान् तस्मै । ईदृशाय त्विषीमते त्विषिर्दीप्तिरस्यास्तीति त्विषिमान् । संहितायां त्विषिशब्दस्य स्थाने पथीनामिति छान्दसं रूपम् । रुद्राय नमः । पथीनां मार्गाणां पतये पालकाय रुद्राय नमः । पथामित्यस्य ब्रह्मविदो जनाः ॥ धूमो रात्रिस्तथा ' अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता प्राप्य गच्छन्ति निवर्तते ब्रह्म । शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी नृप वेदगीते त्वयाभिपृष्टे ह मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥ ' ( भ ० गी ० ८ २४-२६ ) ' एते सृती ० पु ते ० २ १२ ३२ ) इत्यचिरादिमार्गो सनातने च । ये वै पुरा ब्रह्मण आह पृष्ट आराधितो भगवान् वासुदेवः || ' ( भा । तथा च श्रुतिः - ' यदा सर्वे धूमादिमार्गश्चेति द्वे सृती, यद्वा सद्योमुक्तिः क्रममुक्तिश्चेति द्वे सृती, सनातने वेदगीते || ' ( बृ ० उ ० ४ | ४ | ७ ) इति सद्यो -प्रमुच्यन्ते कामा येस्य हृदि स्थिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते २ १६ ) इति क्रममुक्तिः मुक्तिः, ' तेऽचिरभिसम्भवन्ति ' ( बृ ० उ ० ६।२।१५ ), ' ते धूममभिसम्भवन्ति ' ( बृ ० उ ० ६ दन्दशूकम् ' ( बृ ० उ ० संसाराभिगमनं चेति मार्गद्वयं प्रतिपाद्य य एती पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतङ्गा यदिदं के समान पीत- रक्तवर्ण को शष्पि-पशु कहलाने वाले जोवों के पालक स्वरूप रुद्र को नमस्कार है । ' शष्पिञ्जराय ' त्विषीमते ' बालतृण स्विषि: दीप्तिः अस्य अस्ति इति ञ्जर कहते हैं । यहाँ ' टि ' लोप छान्दस हुआ है । पीत रक्तवर्णं वाले और बना है । उस पीतरक्त वर्णं वाले और त्विषिमान् ' । अर्थात् कान्तिमान् । संहिता में त्विषि शब्द को दीर्घं होकर त्विषीमान् नमस्कार । ' पथीनां पतये ' मार्गों के पालक बने हुए रुद्र को नमस्कार । ' पथाम् ' के स्थान में कान्तिसम्पन्न रुद्र के लिये ' पथीनाम् ' यह छान्दस रूप है । श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत महापुराण में अचिरादि मार्ग और धूमादि मागं, ये दोनों सृतियां ( मार्ग ) बताई ये दो सृतियाँ सनातन हैं, ऐसा वेद ने बताया है । भगवती श्रुति कह रही है-गई हैं, अथवा सद्योमुक्ति और क्रममुक्ति, । अर्थात् ' यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ ' ( बृ ० उ ० ४।४।७ ) है और इस जिस समय इसके हृदय में आश्रित संपूर्ण कामनाओं का नाश हो जाता है, तो फिर यह मरणधर्मा अमृत हो जाता शरीर में ही उसे ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है । यह सद्योमुक्ति, ' तेऽचिरभिसम्भवन्ति ' ( बृह ० उ ० ६।२।१५ ) इस है वचन कि जो के द्वारा देवयान मार्ग ( सद्योमुक्ति ) को बताया गया है । इस द्वितीय ब्राह्मण की पन्द्रहवीं श्रुति में यह बताया गृहस्थ इस पञ्चाग्नि विद्या को जानते हैं तथा जो संन्यासी अथवा वानप्रस्थ वन में श्रद्धायुक्त होकर अभिमानी सत्य, अर्थात् देवता ब्रह्म- को, हिरण्यगर्भ की उपासना करते हैं, वे ज्योति के अभिमानी देवताओं को प्राप्त होते हैं, वहां से दिन के को, वहाँ से वहां से शुक्लपक्षाभिमानी देवता को वहाँ से उत्तरायण के अभिमानी देवता को प्राप्त होते हैं । वहाँ से देवलोक आदित्य को, वहाँ से विद्युत् सम्बन्धी देवताओं को प्राप्त होते हैं । वैद्युत देवों के पास एक मानस पुरुष आकर उन्हें ब्रह्मलोक में ले जाता है । वे उन ब्रह्मलोकों में अनन्त संवत्सर तक रहते हैं । उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती । उसी तरह ' ते धूममभिसम्भवन्ति ' ( बृ ० उ ० ६ । २ । १६ ) इस वचन से क्रममुक्ति को बताया गया है । इसमें का वर्णन किया है । जो लोग यज्ञ - दान- तप के द्वारा लोकों को जीतते हैं, वे धूमाभिमानी देवता को प्राप्त होते धूमयान मार्ग प्राप्त हैं । वहाँ से रात्रि देवता को, वहाँ से कृष्णपक्षाभिमानी देवता को वहाँ से दक्षिणायन मार्ग के अभिमानी हैं देवता । वहाँ को जैसे होते हैं । वहाँ से पितृलोक को, वहाँ से चन्द्रमा को प्राप्त होते हैं, चन्द्रमा में पहुँच कर वे ' अन्न ' हो जाते भक्षण कर ऋत्विकगण सोम राजा को ' आप्यायस्व, अपक्षीयस्व ' कहकर चमस में भरकर पी जाते हैं, उसी प्रकार इन्हें देवगण आकाश से आकाश को ही प्राप्त होते हैं । को, उससे वृष्टि हैं, तो वे इस वायु जाते हैं । जब उनके कर्म क्षीण हो जाते है, को, उससे पृथ्वी को प्राप्त होते हैं । वहाँ पर वे अन्त हो जाते हैं, फिर उनका पुरुष रूप अग्नि में हवन किया जाता स्त्रीरूप अग्नि में हवन किया जाता है । इस प्रकार वे पुनः पुनः परिवर्तित होते रहते हैं । इस प्रकार के दो मार्गों को बता

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मंत्र: १७ ] वेदार्थपारिजात भाष्यसहिता ३३ ६/२/१६ ) इति शास्त्रेषु मार्गत्रयं प्रसिद्धम् । तेषां मार्गाणाम्, अर्थात् तन्मार्गजुषां जीवानां पतये पालकाय रुद्राय नमः । हरिकेशाय हरयो नीलवर्णाः केशा यस्य स हरिकेशो नित्यतरुणः, नित्यनव इति यावत् तस्मै उपवीतिने मङ्गलार्थं यज्ञोपवीतधारिणे रुद्राय नमः । अथवा हरिश्च कश्च ईशश्च वशे सन्ति यस्यासी हरिकेशस्तस्मै ब्रह्माण्डसृष्टिस्थितिप्रलय कारिणामपि स्वामिने । पुष्टानां गुणपुर्णानां समृद्धानां वा पतये स्वामिने रुद्राय नमः । अपरस्त्वाह — ' हिरण्यबाहवे स्वर्णपदकभूषितबाहवे सेनानायकाय वज्रं बलं च प्राप्नोतु । दिशाम्पाल-केभ्योऽन्नमुपनमतु । क्लेश हारिभ्यः शत्रुहन्तृभ्यो वीरपुरुषेभ्योऽन्नं बलं चोपनमतु । पशुपालकेभ्यो वीरेभ्योऽपि तदन्नादिकमुपतिष्ठतु । शुष्कतृणवच्छत्रुदाहकाय तेजस्वि पुरुषाय मार्गेषु मार्गयात्रिपालकेभ्यो मार्गाध्यक्षेभ्यश्च राष्ट्रिय-मन्नं बलं च प्राप्तं भवतु । नीलकेशेभ्यो यज्ञोपवीतिने बालब्रह्मचारिणे हृष्टपुष्टबालकानां मातापितृभ्योऽन्नमादरश्चो-पलभ्यताम् । अथवा सेनान्यादयो राष्ट्रस्य विभिन्नविभागाधिकारिणः । तेषामेव हिरण्यबाहु - हिरण्यकेश- त्विषीम-दादिसम्मानवाचकपदानि, तेभ्यो राष्ट्रियान्नादीनि प्राप्नुवन्तु ' इति, अत्रापि परमेश्वरस्य हिरण्यबाहुत्वेन ज्योतिर्मय -शरीरत्वं सिद्ध्यति । ततो निराकारत्व भङ्गमिया तद्विरुद्धा स्वाभाविकार्थकल्पनं स्वामिना कृतम् । ' पुष्टानां बाल-कानां पतये ' इत्यनेन मातापित्रोर्ग्रहणमपि निरभिप्रायमेव, बालकाबालकसाधारणानामपि मात्रादीनां सम्मा-नावश्यकत्वात् ॥ १७ ॥

कर ' एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतङ्गा यदिदं दन्दशूकम् ' ( बृ ० उ ० ६।२।१६ ), अर्थात् जो इन दोनों मार्गों को नहीं जानते, वे कीट पतंग और डाँस मच्छर आदि होते हैं । इस प्रकार शास्त्र में तीन मागं प्रसिद्ध है । उन मार्गों की सेवा करने वाले जीवों के पालक रुद्र को नमस्कार है । ' हरिकेशाय ' नील वर्ण के हैं केश जिसके, वह हरिकेश यानी नित्यतरुण ( नित्यनवीन ) उस उपवीतधारी, अर्थात् मंगलार्थं यज्ञोपवीत धारण करने वाले रुद्र को नमस्कार । अथवा ' हरिश्च कश्च ईशश्च वशे सन्ति यस्य असौ हरिकेशः, तस्मै । अर्थात् हरि, ब्रह्मा, शिव हैं वश में जिसके, वह ' हरिकेश ' है । अभिप्राय यह है कि ब्रह्माण्ड की सृष्टि - स्थिति - प्रलय करने वालों के भी स्वामी के लिये और ' पुष्टानां पतये ' गुणों से पूर्णं अथवा समृद्धि से पूर्ण लोगों के स्वामी रुद्र के लिये नमस्कार है । किसी ने इस मन्त्र का अर्थ यह किया है - ' हिरण्यबाहवे ' स्वर्णपदक से विभूषित बाहु वाले सेनानायक के लिये वज्र और बल प्राप्त हो । दिशाओं के पालकों के लिये अन्न प्राप्त हो । क्लेशों के हरण करने वाले शत्रुओं का हनन करने वाले वीर पुरुषों को अन्न और बल प्राप्त हो । पशुओं का पालन करने वाले वीरों के लिये भी वह अन्न आदि प्राप्त हो । शुष्क तृण के समान शत्रुओं के दाहक तेजस्वी पुरुष के लिये, मार्गों में मार्ग के यात्रियों के पालक और मार्ग के अध्यक्षों के लिये राष्ट्रिय अन्न और बल प्राप्त हो । नोलकेश, यज्ञोपवीती बालब्रह्मचारी हृष्ट - पुष्ट बालकों के माता-पिताओं के लिये अन्न और आदर प्राप्त हो । अथवा जो सेनानी आदि हैं, जो विभिन्न विभागों के अधिकारी हैं, उन्हीं को हिरण्यबाहु, हिरण्यकेश, त्विषीमत् आदि सम्मानवाचक पद और उन्हीं को राष्ट्रिय अन्न आदि प्राप्त हों । इस मन्त्र में भी परमेश्वर को हिरण्यबाहु बताकर उसका ज्योतिर्मय शरीर सिद्ध किया गया है । इस कारण निराकारत्व सिद्धान्त के भंग हो जाने की भीति से विरुद्ध और अस्वाभाविक अर्थ की कल्पना दयानन्द स्वामी ने की है । ' पुष्टानां बालकानां पतये ' से माता - पिता का ग्रहण भी अभिप्रायशून्य ही है । बालक - अबालक साधारण माता आदि को भी संमान की आवश्यकता होती है ॥ १७ ॥

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३४ शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ १६ नमो बलु शायं व्याधिनेऽन्नानां पतये नमो नमो ' भवस्य हे त्ये जगतां पतये नमो नमो रुद्रायाततायिने क्षेत्रीणां पतये नमो नमः सू तायार्हन्त्ये वनानां पतये नमः ॥ १८ ॥

मन्त्रार्थ --- कपिल वर्ण, शत्रुनाशक, अम्नपालक, संसारनाशक, आयुधस्वरूपी जगत्पति, आततायी, क्षेत्र-पालक, हनन न करनेवाला, सारथीरूपों, वनों का पालक जो रुद्र है, उसे हमारा प्रणाम है ॥ १८ ॥

बलुशाय, बभ्रुः पिङ्गलवर्ण: ( भूरा इति भाषायाम् ) अस्ति अस्येति बभ्लुशः । ' लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः ' ( पा ० सू ० ५१२/१०० ) इति लोमादित्वात् रेफस्थाने लः । यद्वा बिर्भात रुद्रमिति बभ्रुः वृषभः, तस्मिन् शेते इति बभ्रुशः, रेफस्य शप्रत्ययः तस्मै रुद्राय नमः । व्याधिने वियति शत्रूनिति व्याधी, णिनिः, तस्मै रुद्राय नमः । अन्नानां भोग्यपदार्थानां लः, तस्मै वृषवाहनाय रुद्राय नमः । भवस्य जननमरणाविच्छेदलक्षणस्य संसारस्य हेत्यै छेदकाय संसारनिवर्तकाय पालकाय रुद्राय नमः । जगतां जङ्गमानां पालकाय रुद्राय योगक्षेमप्रदानेन सर्वेषां पालकाय नमः | आततायिने मोक्षदात्रे आततेन रुद्राय नमः । आयुधेन सह एतीत्याततायी, तस्मै उद्यतायुधाय रुद्राय नमः | क्षेत्राणां धान्यवपनभूमीनां व्रीह्यादिसस्योपेतानां उद्यतेन स्थूल सूक्ष्म - कारणरूपाणां शरीरत्रयाणां पतये पालकाय नमः । महाभूतादित्यन्तानां पालकाय क्षेत्रज्ञरूपाय अन्तर्यामिरूपाय वा रुद्राय नमः । ' इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते वा गीतोक्तानां क्षेत्राणां तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः || " महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिव्यक्तमेव च ॥ इन्द्रियाणि दर्शकं च । एतद्यो वेत्ति गोचराः ॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन पञ्च चेन्द्रिय-१३१, ५-६ ) इत्यादिस्मृतिभ्यः । अहन्त्यै न हन्तीत्यहन्तिः " ( उ ० ४। १८१ ) इति सविकारमुदाहृतम् बाहुलकात् ॥ ' ( भ ० गी ० इति यावत् । सुताय रथसारथ्ये तद्रूपाय रुद्राय नमः । पार्थसारथिः कृष्णो वा अहन्तिः, तिः, तस्ये, अहन्त्रे हतवान् । वनानामरण्यानां वननीयाभीष्टफलानां वा पतये रुद्राय नमः । न कञ्चित्तदानी ' बम्लुशाय ' बभ्रुः पिङ्गलवर्ण: ( भूरा रंग ) अस्ति अस्य इति बभ्लुशः । रेफ के स्थान ' लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः ' ( पा ० सू ० ५१२/१०० ) सूत्र से लोमादित्वात् में ' ल ' होता है । वर्ण वाले रुद्र के लिये नमस्कार । अथवा ' बिर्भात रुद्रमिति बभ्रुः वृषभः तस्मिन् ' श ' प्रत्यय हुआ है, तस्मै पिंगल हो गया है, तस्मै वृषभवाहन रुद्र के लिये नमस्कार | ' व्याधिने ' विध्यति शत्रुन् इति शेते इति व्याधी बभ्रुशः । रेफ को ' ल ' को बेधने वाले रुद्र को नमस्कार । भोग्य पदार्थों के पालक रुद्र को नमस्कार ।, णिनिस्तस्मै शत्रुओं छेदक अर्थात् संसारनिवर्तक यानी मोक्षदायक रुद्र को नमस्कार । ' जगता जनन - मरण के अविच्छेदलक्षण संसार के द्वारा सबके पालक रुद्र को नमस्कार । ' आततायिने ' आततेन उद्यतेन आयुधेन पतये ' जङ्गमों सह एति के पालक और योग - क्षेम प्रदान के उठाये हुए रुद्र को नमस्कार | ' क्षेत्राणां पतये ' धान्यवपन ( बोना ) करने को भूमियों के व्रीहि इत्याततायी आदि धान्य, तस्मै ( । आयुध को तथा स्थूल - सूक्ष्म - कारणरूप त्रिविध शरीरों के पालक को नमस्कार । महाभूतादि धृत्यन्त गीता में सत्य ) से भरे हुए यानी क्षेत्रज्ञ, अर्थात् अन्तर्यामी रूप रुद्र को नमस्कार । यह सब श्रीमद्भगवद्गीता उक्त क्षेत्रों के पालक संख्या वाले श्लोकों में बताया गया है । ' सुतायाहन्त्यै ' अहन्त्यै न हन्ति इति अहन्तिः के तेरहवें अध्याय में एक, पांच, छह , ( उ ० ४।१८१ ) बाहुलकात् ' तिः ' । तस्मै अहन्त्रे इत्यर्थः । किसी को न मारनेवाले ' सूताय ' रथ के सारथीरूप रुद्र कृष्ण ' अहन्ति ' है, क्योंकि उस समय ( युद्ध में ) किसी को भी उन्होंने नहीं मारा था । को ' वनानाम्पतये नमस्कार । अथवा पार्थसारथी वनतीय अभीष्ट फलों के स्वामी रुद्र को नमस्कार । ' अरण्यों के अथवा