वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 71–80

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 71–80

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 71 का मूल पृष्ठ
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मं ० १८-१९ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसहिता ३५ यत्तु - ' राज्यभरणपोषणकारिणे मृगयापरायणाय पुरुषाय वन्यपशुभ्यः क्षेत्राणां रक्षकाय च राष्ट्रि-यान्नाभोगः प्राप्नोतु । उत्पन्न प्राणिनां वृद्धये जङ्गमानां च पालकाय बलवीर्याणि लभ्यन्ताम् | चतुर्दिक्षु विततेषु शत्रुदलान्यालक्ष्य आक्रमणकारिभ्यो बलं प्राप्यताम् । अश्वनियन्त्रे युद्धेष्वप्रहारिणे क्षेत्राणां पालकाय वनानां पालकाय चान्नमुपतिष्ठतु ' इति, तन्न मनोरमम्, सर्वथाप्यस्यार्थस्य काल्पनिकत्वात्, अत्रार्थे मन्त्रस्यास्वारस्याच्च । तथाहि — कोऽयमाज्ञाप्रदः प्रार्थयिता वा? न प्रजाजनः राज्ञः सेनायाश्च भीत आत्मत्राणकामः पूर्वनिर्दिष्टः प्रजाजनः कथमाज्ञापयेत्? ईश्वरश्चेदाज्ञापकः, स कथमात्मपशुपुत्रादित्राणकामः स्यात् कथं वा कं नमस्कुर्यात्? तस्माद् उव्वटादिसम्मतः पूर्वोक्त एवार्थः साधीयान् ॥ १८ ॥

नमो॒रोहि॑ताय स्थपत॑ये वृक्षाणां पत॑ये नमो नमो ' भुवन्तये ' वारिवस्कृ तायौष-घोनां पतये नमो नमो मन्त्रिणे वाणिजाय कक्षाणां पतये नमो नम उच्चैर्घोषान्दय॑ते पत्तीनां पतये नमः॑ ॥ १ ९ ॥ मन्त्रार्थ - लोहित वर्ण का विश्वकर्मा रूप में गृहों का निर्मापक, वृक्षपालक, भूमण्डल का विस्तारक, ब्रव्योत्पादक, गाँव की और अरण्य को औषधियों का पालक, मन्त्री, व्यापारी, वन के तृण और गुल्मों का वर्धक, ऊंचा और महान् शब्द करने वाला तथा पैदल ( पदाति ) सेना का अधिपति जो रुद्र है, उसे हमारा प्रणाम है ॥ १ ९ ॥ रोहिताय वर्णतो निर्देशः । रोहितो लोहितवर्णः । शोणो धावतीतिवद् अजहल्लक्षणया शिवोऽत्र लक्ष्यते । स च कण्ठे नीलोऽन्यत्र लोहितः, नोललोहित इति यावत् तस्मै । स्थपतिर्गृहादिकर्ता विश्वकर्मरूपेण त्रिभुवनभवननिर्माता अनन्तानन्त ब्रह्माण्डभवननिर्माता परमेश्वर एव वा स्थपतिः शिल्पी | " येन शुक्लीकृता हंसाः शुकाश्च हरितीकृताः । मयूराश्चित्रिता येन " इति नारदपाञ्चरात्रवचनात् । येन महदादीनि शरीरान्तानि यह जो किसी ने कहा है- ' राज्यभरण पोषणकारी, मृगयापरायण पुरुष के लिये और वन्य पशुओं के लिये, क्षेत्ररक्षकों के लिये राष्ट्रिय अन्न का भोग प्राप्त हो । उत्पन्न हुए प्राणियों के संवर्धनार्थं अन्न प्राप्त हो । जङ्गमों के जो पालक हैं, उन्हें बल - वीर्यं प्राप्त हो । इन विशाल चारों दिशाओं में शत्रु दलों को लक्षित कर उन पर आक्रमण करने वालों के लिये बल प्राप्त हो । अश्व का नियन्त्रण करने वाले को, युद्धों में प्रहार न करने वाले को, क्षेत्रों के और वनों के पालक को अन्न प्राप्त हो ', किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है, क्योंकि सभी अर्थं काल्पनिक है । इस अर्थ में मन्त्र का स्वारस्य नहीं है । जैसे -- यह आज्ञा देने वाला कौन है? आशीर्वाद देने वाला अथवा प्रार्थना करने वाला । प्रजा में से तो कोई व्यक्ति हो नहीं सकता, क्योंकि राजा से और सेना से भयभीत हुआ अपनी रक्षा चाहने वाला कोई भी प्रजाजन आज्ञा कैसे दे सकता है? ईश्वर को यदि आज्ञापक कहो, तो उसे अपने पशु, पुत्र आदि के त्राण ( रक्षा ) की इच्छा क्यों होगी? ये किसी को वह क्यों नमस्कार करेगा? इसलिये उन्वट आदि प्राचीन व्याख्याकारों का संमत अर्थ ही सुन्दर और प्रामाणिक है ॥ १८ ॥

' रोहिताय ' यह वर्णतः निर्देश हैं । ' रोहित ' का अर्थ है लोहित वर्ण । ' शोणो धावति ' के तुल्य अजहल्लक्षणां से यहाँ ' शिव ' को लक्षित किया गया है । वह कण्ठ में नील है, अन्यत्र लोहित है अर्थात् ' नीललोहित ' है । ' स्थपति ' विश्वकर्मा के रूप में गृह आदि का निर्माण करनेवाला, अर्थात् नीललोहित विश्वकर्मा के रूप में स्थपति को और वृक्षों के पालक को नमस्कार । त्रिभुवन - निर्माता अथवा अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड रूपी भवन का निर्माता परमेश्वर हो स्थपति यानी शिल्पी है । ' येन शुक्लीकृता हंसाः शुकाव हरितीकृताः । मयूराश्वित्रिता येन ' यह नारद पाञ्चरात्र का वचन है | जिसने महदादि शरीरान्त विलक्षण कार्यों को रचा है, उस महाशिल्पी रुद्र को नमस्कार है ।

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३६ शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० १६ विलक्षणानि कार्याणि चितानि तस्मै महाशिल्पिने रुद्राय नमः । वृक्षाणां फलच्छायादिभिरुपकारकाणां पतये पालकाय नमः । भुवन्तये भुवं तनोतीति भुवन्तिः, भूमण्डल विस्तारको वराहपृथिव्यादिरूपेण वा परमेश्वरो रुद्रस्तस्मै । वारिवस्कृताय ' वरिवो धनम् ' ( नि ० २।१०१५ ), तत्कृतं येन स वरिवस्कृतः । स एव वारिवस्कृतः, प्रज्ञादित्वात् स्वार्थिकोऽण्, छान्दसं दीर्घत्वं वा, तस्मै स्थानभोग्यकराय भूपश्वन्नरत्नहिरण्यादिनिर्मात्रे वा रुद्राय नमः । ओषधीनां ग्राम्यारण्यानां पतये पालकाय नमः । मन्त्रिणे मन्त्रयतीति मन्त्री आलोचनकुशलो नीतिनिपुणो वा तस्मै, मन्त्राणां वैदिकतान्त्रिकाणामाविर्भावयित्रे वा । तदनुष्ठात्रे वा रुद्राय नमः । वाणिजाय वणिगेव वाणिजो व्यापारी क्रयविक्रयादिकर्ता । स्वार्थिकोऽण् । तस्मै तद्रूपाय रुद्राय नमः । कक्षाणां नदीतटगता गिरिवनादिगता वा तृणगुल्मवीरुधादयः कक्षाः तेषां पतये पालकाय रुद्राय नमः । उच्चैर्घोषाय उच्चैर्घोषो ध्वनिर्यस्य स उच्चैर्घोषः, तस्मे युद्धे महाशब्दायेत्यर्थः । आक्रन्दयते आसमन्तात् क्रन्दयति रोदयति शत्रूनिति आक्रन्दयन् तस्मै युद्धे महाशब्देन रिपुरोदकाय रुद्राय नमः । पत्तीनां पद्यन्ते पद्भ्यां गच्छन्तीति पत्तयः ० पदातयः तेषाम् । क्तिच् प्रत्ययः । सेनाविशेषाणां वा । ' एकेभैकरथा त्र्यश्वा पत्तिः पञ्चपदातिका ' ( अ ० को २ | ८ | ८० ) इत्यमरोक्तेः, ' एको रथो गजश्चैकों नराः पञ्च पदातयः । त्रयश्च तुरगास्तज्ज्ञेः पत्तिरित्यभिधीयते ॥ ' ( म ० भा ० १ ( २ / १ ९ ) इति भारतोक्तेश्च । पतये पालकाय तद्रूपाय रुद्राय नमः । अपर आह-- ' वृक्षारोपकाय गृहादिनिर्मात्रे तक्षणे शिल्पिने वृक्षाणां पालकाय पर्वतारण्यादिषु कृषि-योग्यभूमिनिर्मात्रे सेवकाय राजमन्त्रिणे व्यापारकुशलाय वन्यलताघासादिपालकाय राजगृहप्रान्तरक्षकाय राष्ट्रे राजाज्ञामुच्चैर्घोषयद्भयः शत्रुरोदकेभ्यः पदातिसेनापतिभ्यश्च अन्नमुपतिष्ठतु ' इति, तच्चिन्त्यम् नमः शब्देन सर्वत्र फल, छाया आदि के द्वारा उपकारक वृक्षों के पालन करने वाले को नमस्कार । ' भुवन्तये ' भुवं तनोति इति भुवन्तिः, भूमण्डल का विस्तार करनेवाला वराह अथवा पृथिवी आदि के रूप में परमेश्वर रुद्र को नमस्कार । ' वारिवस्कृताय ' ' वरिवो घनम् ' ( निघ ० २।१०।५ ) तत्कृतं येन स वरिवस्कृतः, स एव ' वारिवस्कृत ', प्रज्ञादित्वात् स्थाथं में अण् । अथवा ' दीर्घत्व ' छान्दस है, ऐसे रुद्र को नमस्कार । स्थान को भोग्य बनाने वाले अथवा भूपश्वन्नरत्नहिरण्यादि का निर्माण करने वाले रुद्र को नमस्कार । ' ओषधीनाम् ' ग्राम्यारण्य ओषधियों के पालक को नमस्कार । ' मन्त्रिणे ' मन्त्रयतीति मन्त्री यानी आलोचन कुशल अथवा नीतिनिपुण रुद्र को नमस्कार । अथवा वैदिक क्रय - तान्त्रिक - विक्रय मन्त्रों के आविर्भावक अथवा उनका अनुष्ठान करनेवाले रुद्र को नमस्कार । ' वाणिजाय ' वणिगेव वाणिजः, व्यापारी वीरुध करनेवाला । ' स्वार्थिक अण् ' तद्रूप रुद्र को नमस्कार । ' कक्षाणाम् ' नदीतटगत अथवा गिरि - वनादिगत तृण, गुल्म, आदि कक्षों के पालक रुद्र को नमस्कार । ' उच्चैर्घोषाय ' उच्चैर्घोषो ध्वनिर्यस्य स उच्चैघोषः, तस्मै, अर्थात् युद्ध में महान् शब्द करने वाले | ' आक्रन्दयते ' आसमन्तात् क्रन्दयति रोदयति शत्रून् इति आक्रन्दयन् तस्मै । अर्थात् युद्ध में महाशब्द करके शत्रुओं को रुलाने वाले रुद्र को नमस्कार । ' पत्तीनाम् ' पद्यन्ते पद्भ्यां गच्छन्तीति पत्तयः पदातयस्तेषाम् ' एको । क्तिन् रथो ' गजश्चैको प्रत्यय । अथवा सेनाविशेषों के — ' एकेभैकरथा त्र्यश्वा पत्तिः पञ्चपदातिका ' ऐसा अमरकोशकार ने कहा है । नराः पञ्च पदातयः । त्रयश्च तुरगास्तज्ज्ञैः पत्तिरित्यभिधीयते ॥ ' ( महाभा ० ( 1२1१ ९ ) ऐसा महाभारत कहा है । ' पतये ' पालक रुद्र को नमस्कार । आदि का निर्माण करनेवाले, भूमि का निर्माण करनेवाले, किसी ने इस मन्त्र का अर्थ यह किया है - ' वृक्षों का आरोपण करनेवाले, गृह शिल्पी ( तक्षा ) के लिये, वृक्षों का पालन करनेवाले, पर्वत अरण्य आदि स्थानों में कृषियोग्य राजाज्ञा को सेवक राजमन्त्री, व्यापारकुशल, वन्यलता घास आदि के पालक, राजगृह प्रान्त भाग के रक्षक और राष्ट्र । में किन्तु यह अर्थ जोर से घोषित करनेवाले, शत्रुओं को रुलानेवाले, पदाति, सेनापति के लिये अन्न का लाभ हो ' अन्न इति के नामों से ' अन्न ' चिन्तनीय है, क्योंकि ' नमः ' शब्द से सर्वत्र अन्नप्राप्ति का वर्णन करना निर्मूल है । निघण्टु में यद्यपि

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म ० १ ९ -२० ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता ३७ अन्नप्राप्तिवर्णनस्य निर्मूलत्वात् । निघण्टौ अन्ननामसु नमः शब्दपाठादपि नहि सर्वत्रैव अन्नार्थता तवाप्यभिप्रेता । बाहुभ्यामुत ते नम उत अपि च, बाहुभ्यां स्वभुजाभ्यामहं ते तुभ्यं नमः अन्नं समर्पयामीत्याद्यर्थाकरणात् । एतेभ्यः अन्नोपस्थापयिता च क:? न तावत् सर्वसाधारणः प्रजाजनः, सेनामध्ये तस्य प्रवेशानर्हत्वात् । न वा राजा, राजभृत्यैः सैनिकैरेव सर्वस्यैतस्य सम्पादनान् । प्रायेण सर्वे जनाः पुरुषार्थपरायणा भवन्ति राष्ट्रेषु । नहि तेषां कृतेऽन्नदानमपेक्षितम् स्वप्रयत्नेनैव अन्नाजंकत्वात् । सिद्धान्ते तु रुद्रस्य परमेश्वरस्य सार्वात्म्यबोधनाय अयमुपक्रमः । तेन तत्तद्रूपेभ्यो रुद्रेभ्यो नमस्काररूपं पूजनमेव समर्प्यते । यथा चायमर्थस्तथा दर्शित एव ॥ १ ९ ॥ नमः कृत्स्नायतया धाव॑ते॒ सव॑नां॒ पत॑ये नमो नमः सहमानाय निव्याधिनं आव्याधिनोनां पतये नमो नमो निषङ्गणे ककुभायं स्ते नानां पतये नमो नमो निचे रखे ' परिचरायारण्यानां पतये नमः ॥ २० ॥

मन्त्रार्थ- -कान तक खींचकर दोर्घ धनुष को लिये रणभूमि में दौड़ने वाला, प्राणों का स्वामी, शत्रुओं को पराजित करने वाला, विशेषतया उनका नाश करने वाला, शूर सेना का पालक, खड्ग धारण करने वाला, गुप्त चोरों का पालक, चौर्य और अपहरण की बुद्धि से जहाँ - तहाँ घूमने वाला, चोर का स्वरूप धारण करने वाला और मरण्यों का अधिपतिस्वरूप जो रुद्र है, उसे हमारा प्रणाम है ॥ २० ॥

कृत्स्नायतया कृत्स्नं समग्रम् आयतम् आकर्णमाकृष्टं धनुर्यस्य स कृत्स्नायतः, तस्य भावः कृत्स्नायतता, तया आकर्णपूर्णधनुष्ट्वेन । छान्दसस्तकारलोपः । धावते युद्धे शीघ्रं गच्छते रुद्राय नमः । अथवा कृत्स्नः सर्वविधो-ऽपि आयो लाभो यस्य स कृत्स्नायः, तस्य भावः कृत्स्नायता, तया । भक्तानामभ्युदयनिःश्रेयसलाभाय शीघ्र धावते । यद्वा भक्तानां योगक्षेमनिर्वाहाय शीघ्रं धावते । यद्वा कृत्स्नं च तदायतं च कृत्स्नायतं धनुः, तस्य भावः कृत्स्नायतता, तथा हेतुभूतया । छान्दसस्तकारलोपः । धावते भक्ताविधाय शीघ्रं गच्छते । शीघ्रगती सरतेर्धावा-शब्द का पाठ है, तथापि सर्वत्र ' नमः ' शब्द की अन्नार्थता आपको भी अभिप्रेत नहीं है । ' बाहुभ्यामुत ते नमः ' यहाँ पर ' उत ' का अर्थं ' अपि च ' है । ' बाहुभ्याम् ' अपनी दोनों भुजाओं से मैं तुमको ' नमः ' नमस्कार करता हूँ । यहाँ ' नमः ' का ' अन्नं समर्पयामि ' यह अर्थ नहीं किया है । इनके लिये अन्न का उपस्थापयिता कौन है? सर्वसाधारण प्रजाजन तो हो नहीं सकेगा, क्योंकि उसका सेना में प्रवेश नहीं है । उसी तरह राजा, राजसेवक या सैनिक भी अन्न के उपस्थापक नहीं हो सकते, क्योंकि सभी के पास इसका सम्पादन हुआ रहता है । प्रायः सभी लोग राष्ट्र में पुरुषार्थपरायण हुआ करते हैं । उनके लिये अन्नदान अपेक्षित नहीं है, क्योंकि वे स्व - प्रयत्न से ही अन्न सम्पादन कर लेते हैं । सिद्धान्त तो यह है कि यहाँ परमेश्वर का सावत्स्य बोधन करने के लिये यह उपक्रम किया गया है । उस कारण तत्तद्रूप में रुद्र भगवान् को नमस्काररूप पूजन ही समर्पित किया जा रहा है । जो इसका वास्तविक अर्थ है, उसे वैसा ही प्रदर्शित किया गया है ॥ १ ९ ॥ ' कृत्स्नायतया ' कृत्स्नं समग्रम् आयतम् आकर्णमाकुष्टं धनुर्यस्य स कृत्स्नायतः, तस्य भावः कृत्स्नायतता, तया यानी कान तक पूर्णरूप से धनुष को खींच कर । ' कृत्स्नायतया ' में तकार का लोप छान्दस है । ' धावते ' युद्ध में शीघ्र जानेवाले रुद्र को नमस्कार अथवा ' कृत्स्नः सर्वविधोऽपि आयो लाभो यस्य स कृत्स्नायः, तस्य भावः कृत्स्नायता, तया कृत्स्नायतया । सब प्रकार का लाभ जिसके पास है, उसे ' कृत्स्नाय ' कहते हैं, उसके भाव को ' कृत्स्नायता ' कहते हैं । उस कारण शीघ्र दौड़ कर जानेवाले, अर्थात् भक्तों के अभ्युदय निःश्रेयस लाभ के लिये शीघ्र गमन करनेवाले । अथवा भक्तों के योगक्षेम का निर्वाह

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३८ शुक्लयजुर्वेदसंहिता | अ ० १६ प्राणिनः तेषां देश: । सत्त्वनां समेषां प्राणिनां पतये पालकाय, पशुपतित्वात् । यद्वा सहमानः सत्त्वानः , तस्मै सात्त्विकाः । निव्याधिने शरणागताः नितरां विध्यतीति पालकाय रुद्राय नमः । सहमानाय सहते अभिभवत्यरीनिति आसमन्ताद् विध्यन्तीति आव्याधिन्यः शूरसेनाः, निव्याधी तस्मै नितरां शत्रुघातिने रुद्राय नमः । आव्याधिनीनाम् विजयमासादयन्ति । निषङ्गणे नितरां सजति तासां पालकाय । रुद्रानुग्रहेणैव शूरसेना अपि सुरक्षिताः सत्यो, तस्मै । ककुभाष महते रुद्राय नमः । ' कक लौल्ये ’ अङ्गेष्विति निषङ्गः खड्गः, तूणीरो वा सोऽस्यास्तीति निषङ्गी क्षमतेऽपराधानिति ककुभः, तस्मै । दिक्स्वरूपाय लौल्यं गर्वश्वापल्यं मर्षणं च । एतस्माद् उभः प्रत्ययः । ककते पाठः ' इत्युव्वटाचार्यः । स्तेनानां स्तेनयन्तीति स्तेना व्यापकाय वा, दिङ्नामसु पाठात् । ' ककुभशब्दस्य महनामसु जीवस्य शक्तिलाभात्, शक्तिप्रदानेन सर्वस्यैव पालकत्व-गुप्तचोराः, तेषां पतये पालकाय रुद्राय नमः । ईश्वरकृपयैव । लस्य रः । तस्मै रुद्राय नमः । परिचराय परित मीश्वरे । निचेर अपहारबुद्धया निरन्तरं चेलतीति निचेरुः । अरण्यानाम् ऋच्छन्ति गृहाद् गच्छन्ति यत्र आपणवाटिकादिषु हरणेच्छया चरतीति परिचरः, तस्मै रुद्राय नमः तेषां पतये पालकाय रुद्राय नमः । तानि अरण्यानि पुण्यारण्यानि वृन्दारण्य बदरिकारण्य - धर्मारण्यादीनि गृहीतम् । लीलया रुद्रस्य ' अर्तेनिच्च ' ( उ ० ३।१०२ ) इत्यन्यप्रत्ययः । वनानाम्पतये इत्यत्र तु अरण्यसामान्यं जीवान् बोधयन्ति, लक्षणया तु चौरादिरूपत्वम्, सार्वात्म्याद्वा । यद्वा स्तेनादिशब्दा अभिवाशक्त्या तांस्तान् प्रयोगात् । शाखाचन्द्रन्यायेन तत्तदन्तर्यामिणं बोधयन्ति मन्त्रेषु लक्ष्यार्थविवक्षया लौकिकशब्दानां बाहुल्येन भावः कृत्स्नायतता, तथा करने के लिये शीघ्र गमन करनेवाले । अथवा ' कृत्स्नं च तद् आयतं च कृत्स्नायतं धनुः । भक्तों तस्य के शत्रुओं का वध करने के हेतुभूतया । तकार का लोप छान्दस है । अर्थात् धनुष को सम्पूर्ण तान लेने के कारण है । ' सत्त्वनाम् ' समस्त प्राणियों के लिये शीघ्र दौड़कर जानेवाले । शीघ्रगति के अर्थ में ' सृ ' धातु को ' धाव् ' आदेश हुआ प्राणिनः तेषाम् । यानी पालक हैं, क्योंकि वे ' पशुपति ' हैं, उनके लिये नमस्कार । अथवा ' सत्वानः सात्त्विकाः शरणागताः इति सहमानः, तस्मै । शत्रुओं शरण में आये हुए प्राणियों के पालक रुद्र को नमस्कार । ' सहमानाय ' सहते अभिभवति अरोन् सम्यक् रीति से घात का अभिभव करनेवाला, उसके लिये । ' निव्याधिने ' नितरां विध्यति इति निव्याधी, तस्मै । शत्रुओं का पालकाय । रुद्र के करनेवाले रुद्र को नमस्कार । ' आव्याधिनीनाम् ' आ समन्ताद् विध्यन्तीति आव्याधिन्यः शूरसेनाः, तासां अनुग्रह से ही शूरसेना भी सुरक्षित रहती हुई विजय प्राप्त करती है । ' निषङ्गणे ' नितरां सजति अङ्गेषु इति निषङ्गः खड्गः, तूणीरो वा सोऽस्यास्तीति निषङ्गी ।, ' तस्मै कक ' से । खड्ग ' उभ ' अथवा प्रत्यय तूणीर लिये हुए और ' ककुभाय महते ' ' कक लौल्ये ' ' लौल्य ' का अर्थ है - ' गर्व, चापल्य और को मर्षण क्षमा करनेवाले दिक्स्वरूप करने पर ' ककुभ ' निष्पन्न होता है । ककते क्षमते अपराधान् इति ककुभः, तस्मै । अपराधों ' शब्द का महत् अथवा व्यापक रुद्र को नमस्कार । दिक् के नामों में ' ककुभ ' का पाठ है । उवट का कहना है कि ' ककुभ रुद्र को नमस्कार । के नामों में पाठ है । ' स्तेनानाम् ' स्तेनयन्तीति स्तेना, गुप्तचौराः, तेषां पतये अर्थात् गुप्त चौरों में के सर्वपालकत्व पालक है । ' निचेरवे ' ईश्वर की कृपा से ही जोव को शक्ति - लाभ होता है । शक्ति प्रदान के द्वारा ही ईश्वर । ' परिचराय ' परितः आपण-अपहारबुद्धया निरन्तरं चेलति इति निचेरुः । ' ल ' को ' र ' हुआ है । ऐसे रुद्र को नमस्कार रुद्र को नमस्कार । वाटिकादिषु हरणेच्छया चरतीति परिचरः । बाजार, वाटिका आदि में हरण करने की इच्छा से चलनेवाले तेषाम् । अरण्यानाम् ऋच्छन्ति गृहान् गच्छन्ति यत्र तानि अरण्यानि पुण्यारण्यानि वृन्दारण्यवदरिकारण्यधर्मारण्यादीनि पालक रुद्र को नमस्कार । जहाँ गृह के पति जाते हैं, ऐसे वृन्दारण्य, बदरिकारण्य, घर्मारण्य आदि पुण्यारण्यों के ग्रहण किया गया है । ' अर्तेनिच्च ' ( उ ० ३।१०२ ) से ' अन्य ' प्रत्यय हुआ है । ' वनानां पतये ' यहाँ पर तो अरण्यसामान्य । अथवा का स्तेनादि शब्द अपनी लीला से रुद्र का चौरादिरूपत्व है, अथवा सार्वात्म्य होने से चौरादिरूपत्व समझना चाहिये से तत्तदन्तर्यामी का बोध कराते हैं । अभिधा शक्ति से उन - उन जीवों का बोध कराते हैं । लक्षणा से तो शाखाचन्द्र न्याय मन्त्रों में लक्ष्यार्थं की विवक्षा से लौकिक शब्दों का बाहुल्येन प्रयोग होता है ।

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म ० २०-२१ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता ३ ९ यत्तु - ' पूर्णतया धनुरायम्य शत्रुषु वेगेन आक्रमणसमर्थाय वीर्यवतां सैनिकानां पतये शत्रूणां पराजेत्रे लक्षव्याधिने अभितः शस्त्रास्त्रप्रहारिणीनां सेनानां पतये शस्त्रागारपालकाय चोराणां वशयित्रे कारागारप्रधाना-ध्यक्षाय राजकार्य सम्बन्धिगुप्तचराय भृत्याय वनाध्यक्षाय चान्नमुपलब्धं भवतु ' इति, तत्तु यत्किञ्चित् तादृगर्थस्य निष्प्रयोजनत्वात् । सिद्धान्ते तु रुद्रपरत्वेन तत्स्तुतिः पुरुषार्थरूपा ॥ २० ॥

नमो॒ वच॑ते॒ परिवञ्च॑ते स्ताय नां पतये नमो नमो निषङ्गिणं इषुधिमते तस्कं-राणां पतये नमो नमः सृायिभ्यो॒ जिर्घासद्द्भ्यो मुष्ण॒तां पत॑ये॒ नमो॒ नमो ऽसि॒मद्भ्यो नक्तञ्चरद्भ्यो विकृन्तानां पतये नमः ॥ २१ ॥

-मन्त्रार्थ - एक अथवा अनेक लोगों को वंचना करके उनके द्रव्य को हर लेने वाला, गुप्त रूप से दूसरे के द्रव्य को हरण करने वाला, चोर के स्वरूप को धारण करने वाला, बाण और तूणीर को धारण करने वाला, प्रकट रूप में चोरी करने वालों का अधिपति, वज्रधारियों का तथा शत्रुओं का नाश चाहने वालों को स्वरूप धारण करने वाला, लुटेरों का अधिपति, खड्गधारी और रात्रि में संचार करने वालों का तथा दूसरों का नाश करके उनके द्रव्य को हरण करने वालों का अधिपति जो रुद्र है, उसे हमारा प्रणाम है ॥ २१ ॥

वञ्चते ' वञ्चु गतौ ' इति भौवादिकः, ' वञ्चु प्रलम्भने ' इति चौरादिकश्च । वञ्चति गच्छतीति वञ्चन् वैकल्पिकत्वस्य सामान्यापेक्षज्ञापनात्, तस्मै गन्ता तस्मै । वञ्चयते प्रलम्भयति प्रतारयतीति वा वञ्चन्, णिचो । य आप्यायितः रुद्राय नमः । परिवञ्चते परितो गन्त्रे सर्वव्यापकाय रुद्राय नमः । यद्वा सर्वतः प्रतारयित्रे रुद्राय नमः स स्वामिन आप्तो भूत्वा कुत्रचिद् व्यवहारे तदीयं धनमपहरति स वञ्चकः, यः सर्वत्रैव व्यवहारे धनमपहरति सन्धि कृत्वा परिवञ्चक इति विवेकः । स्तायूनां गुप्तचौराणाम् । गुप्तचोरा द्विविधाः । रात्री गृहे खातादिना स्वामिने पालकाय द्रव्यहर्तार एके । स्वीया एव अहर्निशमज्ञाता हर्तारोऽपरे । पूर्वे स्तेना उत्तरे स्तायवः । पतये रुद्राय नमः । तदन्तर्यामिण इति यावत् । निषङ्गिणे निषङ्गः खड्गों बाणो वा, तद्वते रुद्राय नमः । इषुधिमते और यह जो किसी ने कहा है कि ' पूर्णतया धनुष को खींचकर शत्रुओं पर वेग के साथ आक्रमण करने शस्त्रास्त्रों में समर्थ का प्रहार बलवान् सैनिकों के पालक, शत्रुओं को पराजित करनेवाले, लाखों को व्याधित करनेवाले, सब ओर के प्रधानाध्यक्ष से, राजकार्य -करनेवाली सेनाओं के पालक, शस्त्रागार के पालक और चोरों को वश में करनेवाले, कारागार , क्योंकि सम्बन्धो गुप्तचर, भृत्य तथा वनाध्यक्ष के लिये अन्न उपलब्ध होता रहे, यह अर्थ तो बिलकुल ही सारहीन है इस अर्थ से कोई प्रयोजन ही निष्पन्न नहीं हो पाता । सिद्धान्त पक्ष में तो रुद्रपरक अर्थ करने पर उसकी स्तुति पुरुषार्थरूप सिद्ध होती है || २० ॥ ' वञ्चते ' ' वञ्चु गतौ ' ( स्वा ० ), ' वञ्चु प्रलम्भने ( चुरा ० ) वञ्चति गच्छतीति वञ्चन् गन्ता, तस्मै । वञ्चयते । ' परिवञ्चते ' परितो गन्त्रे प्रलम्भयति प्रतारयति वा वञ्चन् । अर्थात् जानेवाले अथवा वञ्चना करनेवाले रुद्र को नमस्कार स्वामी का आप्त होकर अर्थात् सर्वव्यापक रुद्र को नमस्कार । अथवा सब तरह से प्रतारणा करनेवाले रुद्र को नमस्कार । जो जो सर्वत्रैव व्यावहारिक कार्यं भी किसी व्यावहारिक कार्य में उसके धन का अपहरण करता है, उसे ' वञ्चक ' कहते हैं और ' गुप्तचौराणाम् । गुप्त चोर दो में घन का अपहरण करता है, उसे ' परिवञ्चक ' कहते हैं, यही दोनों में भेद है । ' स्तायूनाम् हैं, दूसरे गुप्त चोर वे हैं, प्रकार के होते हैं - एक तो वे गुप्त चोर हैं, जो रात्रि के समय घर में सेंध लगाकर द्रव्यहरण हैं, उन्हें करते कोई पहिचान नहीं पाता । जो अपने ही लोग हैं, वे रातदिन द्रव्यहरण किया करते हैं, फिर भी वे अज्ञात रहते रुद्र उनका भी अन्तर्यामी है । इनमें पूर्व के ' स्त ' हैं और दूसरे ' स्तायु ' हैं । उनके पालक रुद्र को नमस्कार, अर्थात् वह

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४० शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० १६ इषवों धीयन्तेऽस्मिन्निति इषुधिस्तूणीरः, सोऽस्यास्तीति इषुधिमान् तस्मै रुद्राय नमः | तस्कराणां करपत्योश्चोरदेवतयोः सुट् तलोपश्च ' ( पा ० सू ० तत्कुर्वन्तीति तस्कराः प्रकटचौराः ' तद्वृहतोः रुद्राय नमः । सुकायिभ्यः ६।१।१५७ वा ० १ ) इति साधुः । तेषां पतये स्वामिने श्रीकृष्णरूपाय चोराग्रगण्याय । ' सृक इति वज्रनाम ' सृकेण वज्रेण सार्धमेतुं शीलं येषां ते सृकायिणः । तेभ्यो वज्रेण सहागमनशीलेभ्यः , जिघांसन्तीति जिघांसन्तः, तेभ्यो ( निघ ० २/२०१६ ) जिघांसद्भयो हन्तुमिच्छन्ति जिघांसन्ति क्षेत्रादिषु स्थितं धान्यादिकमिति हन्तुमिच्छद्भयो रुद्रेभ्यो नमः । हन्तेः सन्नन्तात् शता । मुष्णतां मुष्णन्ति । असिमद्भयः असयः खड्गाः सन्ति येषु मुष्णन्तः, ' मुष् स्तेये ' इत्यस्य रूपम्, तेषां पतये पालकाय रुद्राय नमः चरन्तः, तेभ्यो रात्रौ गच्छद्भयो नमः । ते असिमन्तः, तेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः । नक्तञ्चरद्भथः नक्तं रात्रौ चरन्तीति रुद्राय नमः । विकृन्तानां विशेषेण कृन्तन्ति छिन्दन्तीति विकृन्ता:, छित्वा छित्वापहारिणः, तेषां पतये पालकाय भगवद्विभूतिः । विशिष्टतत्तद्रूपावच्छिन्न चैतन्यरूपा रुद्रविभूतयः । तेन तद्रूपेभ्यो रुद्रेभ्यो चोराणां नमः । द्यूतमपि मध्ये चोराग्रगणोऽपि ' द्यूतं छलयतामस्मि ' ( भ ० गो ० १० ३६ ) इति गीतायां भगवदुक्तेः । तद्वदेव त्वं मम तेजोऽशसम्भवम् || ' ( भ ० गो ० भगवद्विभूतिरेव । ' यद्यद्विभूतिमत्त्वं श्रीमदुर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ सत्त्वेऽपि साधर्म्य वैधर्म्यादौ परमार्थ-१०।४१ ) इति गीतातां भगवदुक्तेः । किञ्च सर्वेषामपि पदार्थानां व्यवहारे परमार्थतो भेदमात्र-तोऽधिष्ठानदृष्ट्या सर्वस्य रुद्रत्वमेव । व्यवहारे साधुत्वा साधुत्वग्राह्यत्वाग्राह्यत्वादिभेदसत्त्वेऽपि । साधुष्वपि च पापेषु सम-स्थासत्त्वेन अधिष्ठानभूतस्य रुद्रस्य समत्वमेव । ' सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु बुद्धिवशिष्यते ॥ ' ( भ ० गो ० ६ ९ ) इति भगवदुक्तेः । इति इषुधिस्तूणीरः, ' निषङ्गिणे ' खड्ग अथवा बाण धारण करनेवाले रुद्र को नमस्कार । ' इषुधिमते ' इषवो । धीयन्तेऽस्मिन् ' तस्कराणाम् ' तत्कुर्वन्तीति तस्कराः स अस्य अस्तोति इषुधिमान्, तस्मै । अर्थात् तूणीर धारण करनेवाले रुद्र को नमस्कार वा ० १ ) से ' तस्कर ' शब्द निष्पन्न प्रकटचौराः । ' तद्वृहतोः करपत्योश्वोर देवतयोः सुप् तलोपश्र्च ' ( पा ० सू ० ६ । १ । १५८, होता है । उन तस्करों के स्वामी श्रीकृष्णरूप चौराग्रगण्य रुद्र को नमस्कार । लिये । ' सुकायिभ्यः ' सृकेण वज्रेण सार्धम् एतुं शीलं येषां ते सृकायिणस्तेभ्यः, अर्थात् वज्र के साथ आनेवाले जिघांसन्तस्तेभ्यः के । ' सृक ' यह वज्र का नाम है ( निध ० २।२०१६ ) | ( जिघांसन्द्रयः ' हन्तुमिच्छन्ति जिघांसन्ति, जिघांसन्तीति ' मुष्णन्ति क्षेत्रादिषु मारने की इच्छा करनेवाले रुद्रों को नमस्कार । सन्नन्त हन् धातु से शतृ प्रत्ययान्त हुए रूप है धान्यादि । ' मुष्णताम् को चुरानेवाले चोरों के स्थितं धान्यादिकमिति मुष्णन्तः । ' मुष् स्तेये ' का यह रूप है, अर्थात् क्षेत्र में लगे । यानी खड्गधारी रुद्रों को नमस्कार । पालक रुद्र को नमस्कार । ' असिमद्भयः ' असयः खड्गाः सन्ति येषु ते असिमन्तः, तेभ्यः विशेषेण कृन्तन्ति छिन्दन्तीति ' नक्तञ्चरद्भयः ' नक्तं रात्रौ गच्छन्द्रयः । रात्रिचर रुद्रों को नमस्कार । विकृन्तानाम्पतये तत्तद्रूपावच्छिन्न विकृन्ताः, तेषां पतये । अर्थात् छीन छीनकर अपहरण करनेवालों के पालक रुद्र को नमस्कार ॥ ' विशिष्ट द्यूत ' भी भगवान् की ही चैतन्यरूप जो हैं, वे सब रुद्र की ही विभूतियाँ हैं, अतः तद्रूप रुद्रों को नमस्कार किया गया है । उसी प्रकार चौरों में विभूति है । ' द्यूतं छलयतामस्मि ' ( भ ० गी ० १०।३६ ) इस प्रकार गीता में भगवान् श्रीमदूर्जितमेव ने ही कहा वा है । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम जो चौराग्रगण्य है, वह भी भगवान् की विभूति ही है । ' यद्यद् विभूतिमत् सत्त्वं तेजोंऽशसम्भवम् ॥ ' ( १०१४१ ) भगवद्गीता में भगवान् ने स्वयं यह बताया है । दृष्टि किञ्च, व्यवहार में सभी पदार्थों का सत्व रहने पर भी उनके साधर्म्यं वैधर्म्यादि में आदि परमार्थतः का भेद अधिष्ठान विद्यमान की रहने से सभी की रुद्ररूपता ही प्रतीत होती है । व्यवहार में साधुत्व असाधुत्व, ग्राह्यत्व - अग्राह्यत्व - ' सुहृन्मित्रार्युदासीन -पर भी वस्तुतः भेदमात्र का असत्त्व रहने से अधिष्ठानरूप रुद्र का समत्व ही प्रतीत ) ऐसा होता भगवान् है, ने क्योंकि ही कहा है । मध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ' ( भ ० गो ० ६ । ९

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म ० २२-२१ ] वेदार्थपारिजातभाष्यसहिता ४१ यत्तु —— छद्मना शत्रुसेनापदार्थोलब्धे शत्रु सेनासु कपटेन निवसते खड्गधारणसमर्थाय बाणतूणीरादिवाह-काय कार्यकारिभ्यः शत्रूणां जिघांसद्भयः खड्गवद्भयो गृहेभ्यः प्रहरिभ्यो जङ्गलच्छेत्तृभ्योऽधिकारिगणेभ्यः क्षेत्रेभ्यश्च अन्नादिपदार्थान् आहरद्भूयोऽन्नमुपनमतु ' इति, तन्न, कः कं प्रार्थयते इति निर्देशमन्तरा सर्वस्याप्येवं-विधस्यार्थस्य असङ्गतत्वात्, उन्मत्तप्रलापायितत्वाच्च । सर्वत्र राष्ट्रेषु तासु तासु शासनव्यवस्थासु । न स्वतन्त्राः तत्राज्ञा पुरुषार्थपरायणा जनाः स्वयमेव अन्नमुपार्जयन्ति । कर्मचारिगणाः परस्परं समयबन्धेन वेतनमुपलभन्ते • प्रार्थना वाऽपेक्षिता । मन्त्रार्थस्तु सिद्धान्तानुसारी उक्त एव । ' वञ्चु गतौ ', ' वञ्चु प्रलम्भने ' इति धातुभ्यां निष्पन्नस्य वञ्चत इति पदस्य छद्मनाऽर्थप्रापक इति कथङ्कारमर्थः? गतिर्वञ्चनं वा तदर्थः प्रसिद्धः । स्तायूना-मित्यस्य कायिभ्य इत्यस्यापि चार्थो नोक्तः ॥ २१ ॥

नमं उष्णीषिणे गिरिचराय॑ कुलु ज्वानां पत॑ये नमो नम॑ इषु मद्भ्यो ' धन्वायिभ्य॑श्च वो॒ नमो॒ नम॑ आतन्वा॒नेभ्यः॑ः प्रतिदधानेभ्यश्च वो नमो नम॑ आ॒यच्छेद्भ्यो स्य॑द॒द्भ्यश्च वो॒ नमः ॥ २२ ॥

मन्त्रार्थ - सिर पर पगड़ी पहने हुआ, पर्वतादि करने वालों का अधिपति जो रुद्र है, उसे हमारा प्रणाम है । पर प्रत्यंचा चढ़ाने वाले, धनुष पर बाण सन्धान करने वाले, रुद्र हैं. उनको हमारा प्रणाम प्राप्त हो ॥ २२ ॥

दुर्गम स्थानों में संचार करने वाला, छोटी - मोटी चोरी उसी तरह बाण और धनुष धारण करने वाले, धनुष धनुष का आकर्षण करने वाले और बाण चलाने वाले जो किरीटं उष्णीषिणे उष्णं तदुपलक्षितं शीतादिकं सर्वं बाधकम् ईषते तिरोदधातीति ) उष्णीषं इति कः शिरोवेष्टनं शकन्ध्वादित्वात् वा । ' ईष गतिहिंसादर्शनेषु ' इत्यस्मात् ' इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः ' ( पा ० गिरी सू ० ३ पर्वते | १ | १३५ चरतीति गिरिचरस्तस्मै रुद्राय पररूपम्, तदस्यास्तीति उष्णीषी, तस्मै रुद्राय नमः । गिरिचराय में कपटपूर्वक निवास किसी ने यह कहा है – ' कपट से शत्रुसेना के पदार्थों को उपलब्ध करने वाले, शत्रुसेना , काम करने वाले, शत्रुओं को मारने की इच्छा करने वाले, खड्ग धारण करने वाले, बाण तूणीर आदि अपने पास रखनेवाले के लिये, क्षेत्रों से , जंगल काटने वाले अधिकारियों करने वाले खड्गधारियों के लिये, घर के लोगों के लिये, प्रहरियों के लिये अर्थ ठीक नहीं है, क्योंकि कौन किससे प्रार्थना अन्न आदि पदार्थों को लाने वालों के लिये अन्न प्राप्त हो ' इति । किन्तु यह ही यह ही है, उन्मत्त के प्रलाप के समान कर रहा है, इसका निर्देश किये बिना इस प्रकार का सम्पूर्ण अर्थ असंगत जन स्वतन्त्र और पुरुषार्थपरायण अर्थं प्रतीत हो रहा है । सर्वत्र राष्ट्रों में तत्तत् शासन व्यवस्थाओं में नियुक्त हुए समय - बन्ध करके वेतन प्राप्त करते हैं । करते हैं । वे स्वयं ही अन्नोपार्जन कर लेते हैं । कर्मचारीगण आपस में परस्पर हुआ गतौ ', ' वञ्चु प्रलम्भने ' इन दो धातुओं से निष्पन्न हुए उसमें आज्ञा या प्रार्थना की अपेक्षा नहीं होती । किञ्च, ' वञ्चु अर्थप्रापकः ' यह अर्थं कैसे निकला है? ' वञ्चते ' का अर्थ तो ' वञ्चते ' पद का ' कपट से अर्थ प्राप्त करने वाला ' छद्मना ' सृकायिभ्यः ' इन दो पदों का अर्थ तो आपने बताया

' गति अथवा वञ्चन करना ' सर्वत्र प्रसिद्ध है । किञ्च, ' स्तायूनाम् ' और २१ ॥

ही नहीं । सिद्धान्त के अनुसार मन्त्रार्थं की पूर्व बता ही चुके हैं ॥

वा । अर्थात् उष्ण-' उष्णीषिणे ' उष्णं तदुपलक्षितं शीतादिकं सर्वबाधकम् ईषते तिरोदघातीत्युष्णीषं शिरोवेष्टनं किरीटं करने वाली पगड़ी, साफा अथवा किरीट शीत आदि बाघकों को जो तिरोहित करता है, उसे ' उष्णीष ' यानी शिर को वेष्टित ) सूत्र से ' क ' प्रत्यय और शकन्ध्वादित्वात् कहते हैं । ' ईष गतिहिंसादर्शनेषु ' धातु से ' इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः ' ( पा ० सू ० ३ | किरीट १ । १३५ पहने हुए रुद्र को नमस्कार । ' गिरिचराय ' पररूप हुआ है । वह उष्णीष है जिसके पास, उसे ' उष्णीषी ' कहते हैं । उस पतये ' कुत्सितं लुञ्चन्तीति कुलुञ्चाः, गिरी पर्वते चरतीति गिरिचरस्तस्मै । पर्यंतचारी रुद्र को नमस्कार । ' कुलुञ्चानां ६

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४२ शुक्लयजुर्वेदसंहिता [ अ ० १६ नमः । कुलुञ्चानां कुत्सितं लुञ्चन्तीति कुलुञ्चाः कुत्सितदुष्टघातकाः 1 तेषां पतये स्वामिने रुद्राय नमः । अथवा कुलानि दुष्टकुलानि लुञ्चन्तीति कुलुञ्चाः, कुं भूमिं क्षेत्रारामगृहादिरूपां वा लुञ्चन्ति हरन्तीति कुलुञ्चाः, तेषां पतये पालकाय रुद्राय नमः । इषुमद्रय इषवो बाणाः सन्ति येषां त इषुमन्तः, तेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः । धन्वा -यिभ्यश्च धन्वति गच्छति आखेटार्थमनेनेति धन्वा, धविर्गत्यर्थको भौवादिकः अस्मात् ' कनिन् युवृषितक्षिराजि-धन्विप्रतिदिवः ' ( उ ० १११५६ ) इति कनिन्प्रत्ययः । धन्वना धनुषा सह यन्ति गच्छन्ति तच्छीला इति धन्वा -यिनः, तेभ्यः । हे रुद्राः, धनुर्धरेभ्यश्च वो युष्मभ्यं नमः । चकारो मन्त्रभेदज्ञापनार्थः । एवमग्रेऽपि । आतन्वानेभ्यः आतन्वन्ति आरोपयन्ति मौर्वी धनुषीत्यातन्वानाः तेभ्यस्तद्रूपेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः । प्रतिदधानेभ्यः प्रतिदधते सन्दधते बाणं धनुषीति प्रतिदधानाः तेभ्यो रुद्रेभ्यो वो युष्मभ्यं नमः । आयच्छद्भद्य आयच्छन्ति आकर्षन्ति धनूंषि ये त आयच्छन्तः, तेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः । अस्यद्भयः अस्यन्ति क्षिपन्ति बाणानिति अस्यन्तः, तेभ्यो वो युष्मभ्यं रुद्रेभ्यो नमः । यत्तु - ' उष्णीषिणे शिरोवेष्टनवस्त्र विशेषधारिणे ग्रामपतये पर्वतीयकुलानामध्यक्षाय बाणवद्भयो धनुर्ध-रेभ्योऽधिज्येभ्यः, तत्र लक्ष्यं प्रति बाणान् सन्दधानेभ्यः शत्रुनिग्रहकारिभ्यः शस्त्राण्यस्यद्भश्च अन्नमुपलब्धमस्तु ' इति, तदपि यत्किञ्चित्, अध्यक्षग्रामपत्याद्यर्थानां मन्त्रबाह्यत्वात् ॥ २२ ॥

' नमो ' विसृजद्भ्यो विध्यंदभ्यश्च वो नमो नमः स्वपद्द्भ्यो जाग्रंद्द्भ्यश्च वो नमो नमः शयनेभ्य आसीनेभ्यश्च वो नमो नमस्तिष्ठद्द्भ्यो धावद्भ्यश्च वो नमः ॥ २३ ॥

मन्त्रार्थ - शत्रुओं पर बाण छोड़ने वाले, शत्रुओं को विद्ध करने वाले, स्वप्न, जागृति और सुषुप्ति की अवस्थाओं को धारण करने वाले, बैठने वाले, उठने वाले और दौड़ने वाले जो रुद्र हैं, उन्हें हमारा प्रणाम प्राप्त हो ॥ २३ ॥

अर्थात् कुत्सित दुष्टघातकों के स्वामी रुद्र को नमस्कार । अथवा ' कुलानि दुष्टकुलानि लुञ्चन्तीति कुलुञ्चाः, अर्थात् दुष्ट कुलों को जो नष्ट करते हैं, उनको कुलुञ्च कहते हैं । अथवा ' कुं भूमि क्षेत्रारामगृहादिरूपां लुञ्चन्ति हरन्तीति । यानी क्षेत्र, बगीचा, गृहादिरूप भूमि ( कु ) के हरण करने वालों को कुलुञ्च कहते हैं । उन कुलुञ्चों के पालक कुलुञ्चाः रुद्र को नमस्कार | ' इषुमन्द्रय: ' इषवो बाणाः सन्ति येषां ते इषुमन्तः । अनेक बाणों को पास रखने वाले रुद्रों गत्यर्थक को नमस्कार । ' धन्वायिभ्य ' धन्वति गच्छति आखेटार्थमनेनेति धन्वा । मृगया को जाने वाला यानी शिकारी । विधातु भौवादि है, उससे ' कनिन् युवृषितक्षिराजिधन्विद्यु प्रतिदिवः ' ( उ ० १११५६ ) सूत्र से ' कनिन् ' प्रत्यय होता है | धन्वना धनुषा सह यन्ति गच्छन्ति तच्छीला इति धन्वायिनः तेभ्यः । हे रुद्रों! तुम धनुर्धारियों को नमस्कार । ' चकार ' का प्रयोग मन्त्रभेद के ज्ञापनार्थ है । इस प्रकार आगे भी समझना चाहिये | ' आतन्वानेभ्यः ' आतन्वन्ति आरोपयन्ति मौर्वी धनुषी त्यातन्वानाः, तेभ्यस्तद्रूपेभ्यः । धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ा कर तानने वाले रुद्रों को नमस्कार । ' प्रतिदधानेभ्यः ' प्रतिदधते सन्दधते बाणं धनुषीति प्रतिदधानाः तेभ्यः । धनुष पर बाण - संधान करनेवाले तुम रुद्रों को नमस्कार | ' आयच्छद्भयः ' आयच्छन्ति आकर्षन्ति धनूंषि ये ते आयच्छन्तः, तेभ्यः । धनुषों को खींचने वाले उन रुद्रों को नमस्कार | ' अस्यद्भयः ' अस्यन्ति क्षिपन्ति बाणान् इति अस्यन्तः तेभ्यः । बाणों को फेंकने वाले तुम रुद्रों के लिये नमस्कार । यह जो किसी ने अर्थ किया है कि ' उष्णीषिणे ' शिरोवेष्टन - वस्त्र विशेष को धारण करनेवाले ग्रामपति के लिये, पर्वतीय कुलों के अध्यक्ष के लिये धनुर्बाण को लिये हुओं के लिये, घनुष को सज्ज रखनेवालों के लिये, लक्ष्य के प्रति बाणों का संधान करने वालों के लिये, शत्रुओं का निग्रह करने वालों के लिये, शस्त्रप्रक्षेप करने वालों के लिये अन्न की उपलब्धि होती रहे ' । किन्तु यह अर्थ भी मन्त्र के शब्दों से नहीं निकल रहा है, मन्त्रबाह्य अर्थ हैं, क्योंकि अध्यक्ष, ग्रामपति इत्यादि अर्थ मन्त्र के किसी शब्द से भी निष्पन्न नहीं हो रहा है ॥ २२ ॥

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म ० २४ ] वेदार्थ पारिजातभाष्यसंहिता विसृजद्भयो विसृजन्ति बाणान् योद्धृषु इति विसृजन्तः तेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः । विध्यद्भयश्च विध्यन्ति ताडयन्ति शत्रुनिति विध्यन्तः तेभ्यो वो युष्मभ्यं रुद्रेभ्यो नमः । मुक्तस्य बाणस्य लक्ष्ये प्रवेशो वेधः । स्वपद्भ्यः स्वप्नावस्थामनुभवन्तीति स्वपन्तः, तेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः । जाग्रद्भयो जाग्रति इन्द्रियैरर्थोपलब्धिरूपां जाग्रदवस्था-मनुभवन्तीति जाग्रतः, तेभ्यो वो युष्मभ्यं रुद्रेभ्यो नमः । शयानेभ्यः शेरतेऽज्ञानमात्रमनुभवन्तीति शयानाः, तेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः । आसीनेभ्यश्च आसत उपविशन्तीत्यासीनाः । ' आस उपवेशने ' इति धातो: शानचि ' ईदास: ' ( पा ० सू ० ७२/८३ ) इत्याकारस्य ईत्वे रूपसिद्धिः । तेभ्यो वो युष्मभ्यं रुद्रेभ्यो नमः । तिष्ठद्भयः, तिष्ठन्तीति गमनमवरुद्धय वर्तन्त इति तिष्ठन्तः तेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः । धावद्भयो धावन्ति भूयसा वेगेन गच्छन्तीति धावन्तः तेभ्यो वो युष्मभ्यं रुद्रेभ्यो नमः ॥ २३ ॥

नमः॑ स॒भाभ्यः॑ स॒भाप॑तिभ्यश्च वो नमो नमोऽश्वेभ्योऽश्व॑पतिभ्यश्च वो नमो नम॑ आव्या॒धिनीभ्यो वि॒विध्य॑न्तोभ्यश्च वो॒ नमो॒ नम॒ उप॑णाभ्यस्तृह् तीभ्य॑श्च वो॒ नमः॑ः ॥ २४ ॥

मन्त्रार्थ -- सभा सभापति, अश्व और अश्वपति के स्वरूप को धारण करने वाले जो रुद्र हैं, उनको हमारा प्रणाम है । सब ओर से विशेष कर विद्व करने वाले, उत्कृष्ट सेवकों से युक्त, वध करने में समर्थ ब्रह्मादि देवताओं को हमारा प्रणाम प्राप्त हो ॥ २४ ॥

इत उत्तरं ' जातेभ्यो जुहोति ' ( ० ९ | १ | १ | १ ९ ) इति जातसंज्ञा रुद्रा रुद्रलोके सन्ति, त इहोच्यन्ते रुद्राद्वैत-प्रतिपादनाय, ' अथो एव हैतानि रुद्राणां जातानि ' ( ० ९ | १ | १ | १ ९ ) इति श्रुतेः । रुद्रलोके किल इत्थंभूता रुद्रासन्ति, तेभ्यो जुहोति । सभाभ्यः सभारूपेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः । सभादिषु रुद्रदृष्टिः कर्तव्येति तात्पर्यम् । उव्वट-महीधरौ बाधसामानाधिकरण्येन रुद्रदृष्टिमाहुः, अर्थादधिष्ठानज्ञानेन सभादीन् बाधित्वा तत्र रुद्रयाथात्म्य-' विसृजद्भयः ' विसृजन्ति बाणान् योद्धृष्विति विसृजन्तः, तेभ्यः । योद्धाओं पर बाण छोड़ने वाले रुद्रों के लिये नमस्कार । ' विद्ध्यद्भयश्च ' विध्यन्ति ताडयन्ति शत्रून् इति विध्यन्तः, तेभ्यः । शत्रुओं को ताडित करनेवाले तुम रुद्रों के लिये ' स्वपन्तः, तेभ्यः । नमस्कार । छोड़े गये बाण का लक्ष्य में प्रवेश होना ' वेष ' कहलाता है । ' स्वपद्भ्यः स्वप्नावस्थामनुभवन्तीति स्वप्नावस्था का अनुभव करनेवाले रुद्रों को नमस्कार । ' जाग्रद्भयः ' जाग्रति इन्द्रियैरर्योपलब्धिरूपां जाग्रदवस्थामनुभवन्तीति जाग्रतः, तेभ्यः । इन्द्रियों के द्वारा अर्थोपलब्धिरूप जाग्रदवस्था का जो अनुभव करते हैं, उन्हें जाग्रत् कहते हैं: उन जाग्रत् स्वरूप तुम रुद्रों को नमस्कार । ' शयानेभ्यः ' शेरते प्रज्ञानमात्रमनुभवन्तीति शयानाः तेभ्यः । केवल ज्ञानमात्र का अनुभव करनेवाले शयान स्वरूप रुद्रों को नमस्कार! ' आसीनेभ्यश्च ' आसने उपविशन्तीति आसीना: । ' आस उपवेशने ' घातु ' शानच् ' करके ' ईदास: ' ( पा ० सू ० ७/२८३ ) सूत्र से आकार का ईत्व करने पर यह रूप सिद्ध होता है । आसन पर बैठने वाले तुम रुद्रों को नमस्कार । ' तिष्ठद्भयः ' तिष्ठन्तीति गमनमवरुद्धय वर्तन्त इति तिष्ठन्तः तेभ्यः । स्थित रहने वाले उन रुद्रों को नमस्कार । ' घावद्भयः ' घावन्ति भूयसा वेगेन गच्छन्तीति धावन्तः तेभ्यः । बहुत तेजी से जाने वाले तुम रुद्रों को नमस्कार ॥ २३ । . इसके आगे ' जातेभ्यो जुहोति ' ( श ० ब्रा ० ९ ।१।१।१ ९ ) जातसंज्ञक ' रुद्र ' रुद्रलोक में हैं, उन्हें यहाँ बताया जा रहा है, जिससे रुद्राऽद्वैत का प्रतिपादन हो सके । क्योंकि ' अथो एव हैतानि रुद्राणां जातानि ' ( श ० ब्रा ० ९ ।१।१।१ ९ ) श्रुति कहती है | रुद्रलोक में निश्चित ही इस प्रकार के रुद्र हैं । उनके लिये हवन करना चाहिये । ' सभाभ्य ' सभारूप रुद्रों को नमस्कार । सभा आदि में रुद्रदृष्टि करनी चाहिये, यह तात्पर्य है । उव्वट - महीघर दोनों ने बाघसामानाधिकरण्य से रुद्रदृष्टि करने के लिये कहा है । अर्थात् अधिष्ठान के ज्ञान से सभा आदि का बाघ करके उसमें रुद्रयाथात्म्य दृष्टि का सम्पादन करना

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वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ६ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 80 का मूल पृष्ठ
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४४ शुक्लयजुर्वेद संहिता [ अ ० १६ दृष्टिरूपार्जनोया । सभापतिभ्यः सदसस्पतिभ्यश्च वो युष्मभ्यं नमः । अश्वपतिभ्यश्च अश्वानां पतयोऽश्वपतयस्तेभ्यो वो युष्मभ्यं रुद्रेभ्यो नमः । अश्वेभ्यस्तुरगेभ्यस्तद्रूपेभ्यो रुद्रेभ्यो न्तीति आव्याधिन्यो रुद्रदेव्यो रुद्रशक्तयो रुद्रसेना गणरूपा रुद्रेभ्यो नमः । आव्याधिनीभ्य आसमन्ताद् विध्य-विध्यन्तीति विविध्यन्त्यः, ताभ्यो रुद्ररूपाभ्यो वो युष्मभ्यं वा नमः , ताभ्यो रुद्ररूपाभ्यो नमः । विविध्यन्तीभ्यो विशेषेण भृत्यभक्तादिसमूहावा यासां ता उगणाः, पृषोदरादित्वाद् उपसर्गान्त्यिलोपः । उगणाभ्य उद् उदीर्णा उद्गर्णा उद्रिक्ता गणा ' ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी वैष्णवी तथा । चामुण्डा च तथेन्द्राणी । ब्राह्मयाद्या मातरः, ताभ्यो नमः । हृतीभ्यस्तृहन्तिघ्नन्तीति हत्यो हन्तुं समर्था दुर्गादयः, ताभ्यो रुद्ररूपाभ्यो वाराही सप्त मातरः ॥ ' इति शिष्टोक्तेः । स्तौदादिकः । रुद्रसेना एव वा विविधविशेषणाः ॥ २४ ॥ वो युष्मभ्यं नमः | तूंहू हिसार्थक-नमो गणेभ्यो ' गृ॒णप॑तिभ्यश्च वो नमो नमो व्रातेभ्यो व्रातपतिभ्यश्च

गुत्सँभ्यो गुरसंपतिभ्यश्च वो नमो नमो विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्च वो नमः ॥ २५ वो नमो ॥ नमो मन्त्रार्थ - भूतविशेषों के संघों के और देवताओं के सेवकसमूहों के बुद्धिमान् और बुद्धिमानों के पालक, विकृत स्वरूप वाले और अश्वमुख आदि भिन्न - पालक भिन्न रूपों , भित्र - भिन्न जातियों के पालक, हमारा प्रणाम प्राप्त हो ॥ २५ ॥ वाले जो रन हैं, उनको

गणेभ्यः, देवानुचरा नन्दिभृङ्गयादयो भूतविशेषाः समूहा वा गणाः पतिभ्यो गणानां भूतप्रेतादिगणानां महदादिगणानां देवगणानां वा पतयः, तेभ्यो रुद्ररूपेभ्यो नमः । गण-युष्मभ्यं नमः । व्रातेभ्यो नानाजातीयसङ्घातेभ्यो रुद्ररूपेभ्यो नमः पालका गणपतयः, तेभ्यो रुद्ररूपेभ्यो वो ( पा ० सू ० ३।१।२१ ) इत्यादिना णिजन्ताद् घत्रि व्रातशब्दो निष्पन्नः ॥ यद्वा व्रत्यते भोजननियमार्थे नियम्यते व्रतशब्दात् ' मुण्डमिश्र ' इति व्रातः, व्रातर्हन्तीति चाहिये । ' सभापतिभ्यः ' अर्थात् सदसत्पतिरूप तुम रुद्रों को नमस्कार । ' अश्वपतिभ्यश्च ' अश्वपति स्वरूप तुम रुद्रों को नमस्कार । ' आव्याधिनीभ्यः ' ' अश्वेभ्यः ' आसमन्ताद् ' तुरगस्वरूप रुद्रों को नमस्कार । रुद्रशक्तयो रुद्रसेना गणरूपा वा, ताभ्यः । चारों ओर से बंधने वाली को आव्याधिनी विध्यन्तीति आव्याधिन्यो रुद्रदेव्यो या रुद्रसेना, या रुद्रगण के रूप में होती है, उन रुद्ररूपिणियों को नमस्कार कहते हैं । वह रुद्रदेवी, या रुद्रशक्ति, विविध्यन्त्यः ताभ्यः । विशेष रूप जो बेघती हैं, वह विविध्यन्ती ' कही जाती है । ' विविधयन्तीभ्यः ' विशेषेण विध्यन्तीति रुद्ररूपिणियों के रूप में स्थित रुद्रों को नमस्कार । ' उगणाभ्यः ' अद् उदीर्णा उद्गुर्णा । अर्थात् विशेषतया बेधनेवाली उन यासां ता उगणाः । अर्थात् जिन रुद्ररूपा शक्तियों के सेवक - भक्तादिगण अथवा समूह उद्रिक्ता गणा भृत्यभक्तादिसमूहा वा प्रकट हो रहे हैं, उन शक्तियों को ' उगण ' कहा गया है । उन उगण ब्राह्मी आदि इतनी अधिक संख्या में उमड़ रहे हैं, उगण में पृषोदरादित्वात् उपसर्गान्त्यलोपः । शिष्टों ने कहा भी है-- ' ब्राह्मी माहेश्वरी मातृकाओं को नमस्कार । ' उत् + गण ' च तथेन्द्राणी वाराही सप्तमातरः ॥ ' इति । ' तृहृतीभ्यः ' तूंहन्ति घ्नन्तीति हत्यो हन्तुं चैव कौमारी वैष्णवी तथा । चामुण्डा में समर्थ दुर्गा आदि रूप वाले रुद्र देवताओं को नमस्कार | तूंह हिंसार्थक तौदादिक घातु समर्था है, दुर्गादयः ताभ्यः । हनन करने विशेषण हो सकते हैं ॥ २४ ॥ अथवा रुद्रसेना के ही ये विविध

' गणेभ्यः ' देवानुचर नन्दी भृङ्गी आदि भूतविशेष अथवा समूह को ' गण ' कहा नमस्कार | ' गणपतिभ्यः ' भूत - प्रेतादिगण, या महदादिगण, या देवगणों के जो पति यानी गया है । उन रुद्ररूप गणों को है । उन रुद्ररूप गणपतियों को नमस्कार । ' व्रातेभ्यः ' रुद्ररूप नानाजातीय संघातों के पालक हैं, उन्हें गणपति कहा गया नियम के अर्थ में ' व्रत ' शब्द के होने से ' मुण्डमिश्र ' ( पा ० सू ० ३।१।२१ ) सूत्र से णिजन्त लिये नमस्कार | अथवा भोजन-' व्रत ' शब्द निष्पन्न होता । ' व्रत्यते नियम्यत इति व्रातः व्रातमर्हन्तीति व्राताः तेभ्यः । नियमित धातु से किये धन् जाने प्रत्यय करने पर वाले रुद्ररूप