वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1–10
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1–10
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शुक्लयजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता वेदार्थपारिजातभाष्यसमन्विता, Hroenare:: अनन्तश्री विभूषिताः स्वामिकरपात्रमहाराजाः २१- ३ ९ अध्यायात्मको भागः प्रफाशक: श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थानम् कलकत्ता * वृन्दावनम्
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शुक्लयजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता वेदार्थपारिजातभाष्यसमन्विता [ २१-३० अध्यायात्मकः, ३१-३९ अध्यायात्मकश्च भागः ] भाष्यप्रणेतारः अनन्तश्रीविभूषिताः स्वामिकरपात्रमहाराजाः सम्पादकः प ० व्रजवल्लभ द्विवेदी दर्शनाचार्यः सम्पूर्णानन्दसंस्कृत विश्वविद्यालये सांख्ययोगतन्त्रागमविभागाध्यक्षचर आचार्यश्च प्रकाशकः श्रीराधाकृष्णधानुका - प्रकाशनसंस्थानम् कलकत्ता • वृन्दावन प्रथमसंस्करणम्
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प्रकाशक-श्रो राधाकृष्णधानुका- प्रकाशन संस्थान कलकत्ता • वृन्दावन मूल्य: १५०.०० रूप्यकाणि अस्य ग्रन्थस्य सर्वेऽधिकारा राजकीयनियमानुसारेण सुरक्षिताः पुस्तकप्राप्तिस्थानम् -१. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ११३ पार्क स्ट्रीट, पोद्दार पोइन्ट, कलकत्ता - ७०००१६ २. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान ब्रह्मकुटीर, डी ० २५/१८ नारद घाट वाराणसी ( उ ० प्र ० ) ३. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान धर्मसंघ विद्यालय रमणरेती, वृन्दावन मथुरा ( उ ० प्र ० ) ४. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ४०१/४०४ राहेजा सेन्टर २१४, नारीमन पोइन्ट, बम्बई ४०००२१ ५. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड ई ० ४२४, ईस्ट पटेल नगर दिल्ली - ८ मुद्रक केशव मुद्रणालय खजुरी, वाराणसी
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परब्रह्मस्वरूप धर्मसम्राट् पूज्यपाद स्वामी श्री करपात्री जी महाराज
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॥ श्रीहरिः ॥ प्रकाशकीय वक्तव्य अनन्तश्री विभूषित पूज्यपाद प्रातःस्मरणीय स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज द्वारा विरचित यजुर्वेद संहिता के २१-३९ अध्यायों के भाग्य को मन्त्रार्थ और भाष्यनिष्कर्ष के साथ प्रकाशित करते हुए हमें बहुत हर्ष का अनुभव हो रहा है | इससे पूर्व प्रथम तीन अध्यायों का और चालीसवें अध्याय ( ईशावास्योपनिषद् ) का भाष्य भाषानुवाद के साथ एवं ११ से २० अध्यायों के दो भाग मन्त्रार्थं एवं भाष्यनिष्कर्ष के साथ प्रकाशित हो चुके हैं, यह आप लोगों को विदित ही है । प्रकाशन कार्य विस्तृत है । कई कठिनाइयों के कारण प्रकाशन का कार्य त्वरित गति से नहीं हो पा रहा था । अब चतुर्थ और पञ्चम अध्याय वाला भाग और छठे से दसवें अध्याय तक का भाग अलग - अलग प्रेसों में छप रहा है । प्रगति मन्द है, तथापि हम इस प्रयत्न में हैं कि विक्रम संवत् २०४८ के अन्त तक पूरा भाष्य विज्ञ पाठकों के करकमलों तक पहुँचा दिया जाय । विदित हो, पूज्यपाद श्री स्वामीजी महाराज की अद्वितीय कृति देश के जिन सन्तों, विद्वानों, उच्च शिक्षाविदों और afanta के पास पहुँचती है, वे अत्यन्त प्रभावित होकर हम लोगों को शेष भाग शीघ्र प्रकाशित करने की सत्प्रेरणा प्रदान करते हैं । भाष्य निष्कर्ष के लेखक, अनुवादक, समय - समय पर उचित परामर्शदाता, प्रूफ पुनरीक्षक, प्रेसकापी साधक, अनुच्छेद ( पैराग्राफ ) के निर्धारक के रूप में और प्रकाशन सम्बन्धी सभी साज - सज्जा को तैयार कर इस अमूल्य ग्रन्थरत्न को सबके सम्मुख प्रस्तुत करने वालों के रूप में जिन जिन - महानुभावों ने अपनी अहेतुकी कृपा से इस कार्य को सम्पन्न किया है, उन सभी परम सम्माननीय आत्मीय, पूज्य आचार्य, विद्वन्मूर्धन्यों के चरणकमलों में धन्यवाद और अभिनन्दनस्वरूप नतमस्तक होकर हम सदा ही इनकी कृपा की आशा रखते हैं । जिनके चरणों में धन्यवाद प्रस्तुत करते हैं, वे हैं --( १ ) अनन्तश्री जगद्गुरु शङ्कराचार्य पुरी पीठाधीश्वर स्वामी निरञ्जनदेव तीर्थजी महाराज ( २ ) स्वामी श्री निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज ( ३ ) पण्डित श्री मार्कण्डेय ब्रह्मचारीजी ( ४ ) पण्डित श्री व्रजवल्लभ द्विवेदीजी ( ५ ) पण्डित श्री जनार्दन पाण्डेयजी ( ६ ) पण्डित श्री राजवंशी द्विवेदीजी केशव मुद्रणालय के सुयोग्य प्रबन्धक तथा सहृदय कर्मचारियों के स्नेहपूर्ण सौजन्यभरे मुद्रणादि कार्यों के सम्पादन को स्मरण कर इन्हें बहुत धन्यवाद देते हैं । वृन्दावन धाम माघी पूर्णिमा • २०४८ वि ० सं ० निवेदक हनुमानप्रसाद धानुका अध्यक्ष, श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान
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दशाध्यायी ( २१-३० ) - भाष्यनिष्कर्ष वेदार्थपारिजातभाष्य और उसकी रचना शैली पर ११-१५ अध्याय के भाष्य निष्कर्ष के प्रारम्भ में प्रकाश शेष विषयों को डाला जा चुका है । १६-२० अध्याय के भाष्यनिष्कर्ष में प्रथम तीन अध्यायों में वर्णित अग्निचयन सम्बन्धी और १ ९ -२० अध्यायों में वर्णित सौत्रामणी याग की प्रक्रिया को भी निरूपित किया गया है । २१ वें अध्याय में भी यही विषय चलता है । इसको और आगे के २२- ३० तक के नौ अध्यायों में प्रतिपादित विषयों को अब क्रमशः यहाँ उपस्थापित किया जा रहा है । एकविंश अध्याय: सौत्रामणी याग २१ वें अध्याय के प्रथम दो मन्त्रों में अवभृथेष्टि से सम्बद्ध वारुण एककपाल पुरोडाश की ' पुरोनुवाक्या और याज्या प्रदर्शित हैं और आगे के दो मन्त्रों ( २१1३-४ ) में अवभृथेष्टि से हो सम्बद्ध आग्निवारुण याग को पुरोनुवाक्या और याज्या । इसी तरह से कात्यायन श्रौतसूत्र और शतपथ की पद्धति से अगले दो मन्त्रों का विनियोग आदित्य चरु की पुरोनुवाक्या और याज्या में होता है । सातवें मन्त्र में स्वर्गप्रापक यज्ञरूप नौका की स्तुति की गई है । ८ - ९ मन्त्र अवभृथ से उठने के बाद विहित मैत्रावरुणी पयस्या के पुरोनुवाक्या और याज्या में विनियुक्त हैं । पयस्या से सम्बद्ध वाजिन याग के पुरोनुवाक्या और याज्या का विधान अगले दो मन्त्रों ( २१।१० - ११ ) में है । आगे की आत्री देवता वाली ११ ऋचाओं में वायोधस पशु सम्बन्धी प्रयाजयाज्याएँ हैं । तब अगले छः मन्त्र ( २१।२३ - २८ ) वायोधस पशु से ही सम्बद्ध वपा और पुरोडाश की याज्या और अनुवाक्या में विनियुक्त हैं । ' होता यक्षत् ' ( २१ । २ ९ - ४० ) इत्यादि १२ कण्डिकाओं में त्रिपशु सम्बन्धी प्रयाजयाज्याओं के प्रैष मन्त्र हैं । ' होता यक्षत् ' ( २१।४६ ) इस कण्डिका के तीन मन्त्रों का विनियोग तीन वपाओं के प्रेषों के रूप में बताया गया है और अगली कण्डिका में ग्रहसम्बन्धी चतुर्थं प्रेष मन्त्र है । आगे की तीन कण्डिकाओं ( २१/४३ - ४५ ) में आश्विन आदि हविर्यागों के प्रैष मन्त्र हैं । तब दो कण्डिकाओं ( २१।४६-४७ ) में वनस्पति याग और स्विष्टकृद् याग के प्रेष मन्त्रों का विधान है । त्रिपशु सम्बन्धी अनुयाजों से सम्बद्ध १. याग के समय जिस देवता का याग प्रस्तुत होता है, उस देवता के निमित्त मन्त्रपाठ के लिये अध्वर्यु होता को प्रैष देता है । तब होता जो मन्त्रपाठ करता है, वह पुरोनुवाक्या मन्त्र है । ये मन्त्र ऋग्वेदीय होते हैं ( कात्या ० यज्ञ ०, पृ ० ४ ९ ७ ) । २. आगू पूर्विका वषट्कारान्ता प्रायशोऽर्धचविसाना बहुस्थानेषु एकैव ऋक् क्वचिदनृगपि याज्यापदेनोच्यते ( श्रौत ०, पृ ० २८ ) । ३. प्रकर्षेण इज्यन्ते देवता यैः । याग से पूर्व जो आज्य की नियत आहुति दी जाती है, उसे प्रयाज कहते हैं । विभिन्न यागों में विधान के अनुसार उनकी संख्या पाँच, नौ और ग्यारह होती है ( कात्या ० यज्ञ ०, पृ ० ५०१ ) । ४. यजेत्यादिलोण्मध्यमपुरुषान्तपदघटितेन येन वाक्येन अध्वय्र्वादिना होत्रादिः प्रेयते, तद्वाक्यं प्रैष इत्युच्यते ( श्रौत ०, पृ ० २७ ) । ५. प्रधान याग के अनन्तर जो आज्य की आहुतियाँ दी जाती हैं, वह अनुयाज कहलाती हैं । विभिन्न यागों में ' उनकी संख्या तीन, नो और ग्यारह होती है ( कात्या ० यज्ञ ०, पृ ० ४५ ९ ) ।
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( ६ ) प्रैष और याज्या मन्त्रों की संख्या ग्यारह है ( २१।४८ - ५८ ) । इस अध्याय के अन्त की तीन कण्डिकाओं वाले सूक्त ( २१ / ५ ९ -६१ ) में ' सूक्तवाक प्रैष के मन्त्र हैं । २२- २५ अध्याय: अश्वमेध याग तीन अध्यायों ( १ ९ -२१ ) में सौत्रामणी याग का विधान बताने के बाद अगले चार अध्यायों ( २२-२५ ) में Rana arrot for विस्तार से वर्णित है । यहाँ के प्रथम अनुवाक में अश्वमेध के अंगभूत अश्व का संस्कार करने वाले मन्त्र वर्णित हैं । सब कुछ चाहने वाला राजा इसका अनुष्ठान करता है । फाल्गुन शुक्ल अष्टमी अथवा नवमी को आरम्भ होता है । सबसे पहले यहाँ के पहले मन्त्र का उच्चारण करते हुए यजमान को निष्क पहनाया जाता है । अभिषिक्त: क्षत्रिय को ही यहाँ राजा माना गया है । मीमांसा शास्त्र के अवेष्ट्यधिकरण ( २।३।१ ) में यह निर्णीत है कि राजा के पद पर अभिषिक्त क्षत्रिय के लिये ही इस पद का प्रयोग किया जाता है । सर्वकाम का अर्थ है मुमुक्षु, क्योंकि मोक्ष की प्राप्ति होने पर ही मनुष्य की सारी कामनाएँ पूरी हो सकती हैं । राजपद का ग्रहण होने से ब्राह्मण और वैश्य इस योग को करने के लिये अधिकृत नहीं हैं । अन्य आचार्यों के मत से इस योग का आरम्भ ज्येष्ठ और आषाढ मास के अन्तराल में शुक्ल अष्टमी अथवा नवमी को करना चाहिये । इस यज्ञ का आरम्भ ब्रह्मोदन पाक से होता है । अध्वर्यु ऋत्विजों के लिये इसे पकाता है और यजमान के कण्ठ में निष्क को पहनाने के बाद अश्व के कण्ठ में अगले तीन मन्त्रों ( २११२-४ ) से रशना लगाम ) पहनाता है । इसके बाद अब्र्यु तालाब आदि के स्थिर जल के पास जाकर पांचवीं कण्डिका के पाँच मन्त्रों से पांच बार अश्व का प्रोक्षण करता है । वहाँ से अश्व को अग्नि के पास लाकर ' अग्नये स्वाहा ' ( २२६ ) कण्डिका के प्रत्येक मन्त्र से सकृत् गृहीत आज्य की स्तोकीय संज्ञक दस आहुतियाँ देता है अथवा इस मन्त्र की सौ बार आवृत्ति कर एक हजार आहुतियाँ देता है | अगली दो कण्डिकाओं के मन्त्रों से भी अश्व के निमित्त ही दक्षिणाग्नि में प्रक्रम संज्ञक ४ ९ आहृतियाँ दी जाती हैं । इन दो कण्डिकाओं में अश्व की ४ ९ प्रकार की चेष्टाओं का वर्णन किया गया है । इससे आगे की छः ऋचाओं ( २२१ ९ - १४ ) का विनियोग सावित्री नामक इष्टि की याज्यानुवाक्याओं के रूप में किया जाता है । ' अग्नि स्तोमेन ' ( २२।१५ - १७ ) इत्यादि तीन मन्त्रों में स्विष्टकृद् याग की पुरोनुवाक्यायें हैं । ' अजीजन: ' ( २२ | १८ ) मन्त्र से पवमान की स्तुति की जाती है । तृतीय सावित्र इष्टि की समाप्ति के बाद अध्वर्यु और यजमान अश्व के दाहिने कान में ' विभूर्मात्रा ' ( २२।१ ९ ) मन्त्र का जप करते हैं । चतुर्थं अध्याय सातवीं और आठवीं कण्डिकाओं में चार आध्वरिक औद्ग्रभण संज्ञक मन्त्र पढ़े गये हैं । इन मन्त्रों से चार आहुतियाँ देने के बाद यहाँ के ' काय स्वाहा ' ( २२।२० ) १. दर्शपौर्णमास प्रभृति यागों में आहवनीय खर के तीनों ओर परिधि ( पालाश समित् ) रखी जाती है । अध्वर्यु पश्चिम की ओर संस्थापित परिधि को छूकर आश्रावण करता है । आग्नीध्र प्रत्याश्रावण करता है । तब अध्वर्यु होता को जिन " इदं द्यावापृथिवी " इत्यादि मन्त्रों का पाठ करने के लिये जो प्रैष देता है, वह सूक्तवाक प्रेष कहलाता है ( कात्या ० यज्ञ ०, पृ ० ५२४ ) । २. चतुः सुवर्णनिर्मित आभरणविशेषो निष्कः ( भा ०, पृ ० ४२ ) । ३. अध्वर्युप्रेषितो होता एकश्रुत्या पुरोनुवाक्यां पठति । सा च प्रायः एकैव ऋग् भवति । तस्याः प्रथमाधर्षे एकमवसानम्, चतुर्मात्रप्रणवान्तद्वितीयार्धर्चे द्वितीयमवसानम् । यस्मिन् यागे मैत्रावरुणो भवति, तत्र स एव पुरोनुवाक्यां पठति । पुरः पूर्वं यागाद् देवतामनुकूलयितुं या ऋगुच्यत इति व्युत्पत्त्या पुरोनुवाक्यापदमनुयाज्यापदं च ऋग्विशेषबोधकम् ( श्रीत ०, पृ ० २८ ) ।
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( ७ ) efuser मन्त्रों से तीन आश्वमेधिक औद्भण आहुतियां देनी चाहिये । इन औद्ग्रभण आहुतियों को देने के बाद दीक्षणीया " इष्टि का शेष कर्म पूरा कर उपवेशनान्त कृष्णाजिन दीक्षा का अनुष्ठान किया जाता है । इसकी विशेष प्रक्रिया भाष्य ( पृ ० ६० ) में ही देखनी चाहिये । सातवीं दीक्षणीया इष्टि की कुछ विशेषता है । प्रतिदिन दी जाने वाली चार आवरिक औण आहुतियों के स्थान पर यहाँ छः आग्निक आहुतियों और तीन आश्वमेधिक आहुतियों के बाद ' विश्वो देवस्य ' ( २२।२१ ) मन्त्र से दसवीं औद्ग्रभण आहुति दी जाती है । कृष्णाजिन दीक्षा से प्रारम्भ कर उखा में तेरह समिधाओं के आधान तक की प्रक्रिया पूरी कर अध्वर्यु ' आ ब्रह्मन् ' ( २२।२२ ) मन्त्र का जप करता हैं । शतपथ के अनुसार यह जप उत्सगं मन्त्रों से उपहित पशुशिरों के उपस्थान के समय किया जाता है । अन्य आचार्यों का मत है कि अव का उत्सर्ग करते समय ' विभूर्मात्रा ' ( २२०१ ९ ) मन्त्र के जप के बाद ही इसका जप करना चाहिये । इसके बाद इस अध्याय की अन्तिम बारह कण्डिकाओं वाले अनुवाक के मन्त्रों से आज्य, सक्तु, घाना और लाजा की पूरी रात रात्रि के प्रत्येक प्रहर में उत्तरवेदि स्थित अग्नि में आहुतियाँ दी जाती हैं । इसकी प्रक्रिया भी भाग्य ( पृ ० ६४-६५ ) में ही देखनी चाहिये | इस प्रकार बाईसवें अध्याय में होम के मन्त्र निर्दिष्ट हैं । २३ वें अध्याय में बचे हुए कर्मों का निरूपण इस प्रकार किया गया है - दूसरे दिन का कृत्य उक्थसंस्थ कहलाता है । वहाँ महिम नाम के दो ग्रहों का ग्रहण किया जाता है । यह कार्य आग्रयण और उक्थ्य ग्रहों के बीच में किया जाता है । इनमें से प्रथम महिम ग्रह का ग्रहण सौवर्णं उलूखल द्वारा ' हिरण्यगर्भः ' ( २३ | १ ) मन्त्र से और द्वितीय महिम ग्रह का ग्रहण राजत उलूखल द्वारा ' यः प्राणतः ' ( २३ | ३ ) मन्त्र से किया जाता है । दशापवित्र से ग्रह का परिमार्जन कर ' एष ते योनिः ' ( २३1२ ) मन्त्र से उसका सादन किया जाता है । वपा याग के अन्त में द्वितीय महिम ग्रह में गृहीत सोम की आहुति चौथे मन्त्र से दी जाती है । इसके बाद ' युञ्जन्ति ' ( २३।५ ) मन्त्र से अश्व को रथ में जोता जाता है । अगले मन्त्र ( २३ | ६ ) से शेष तीन अश्वों को भी रथ में जोत दिया जाता है । यहाँ प्रत्येक अश्व को जोतते समय मन्त्र की आवृत्ति करनी चाहिये । इन चार अश्वों से युक्त रथ पर बैठकर यजमान जलाशय के पास जाता है । वहाँ अश्वों के जल में प्रवेश करने पर अध्वर्यु यजमान से ' यद्वात: ' ( २३/७ ) मन्त्र का पाठ कराता है । इस मन्त्र का पाठ यहाँ प्रायश्चित्त के रूप में किया जाता है, क्योंकि अश्वमेधीय अश्व के लिये जलावगाहन और वडवासंग, ये दोनों ही वर्जित हैं । जलाशय से वापस देवयजन स्थान में आने पर रथ से वियुक्त अश्व के पूर्वकाय, मध्यकाय और अपरकाय पर क्रमशः राजमहिषी, वावाता और परिवृक्ता घृत का लेप करती हैं । बाद में ये तीनों अश्व के शिर, कन्धे और पुच्छ के बालों में एक सौ एक - एक सौ एक मणियाँ बांधती हैं और रात्रि में दी गई आहुतियों से बचे हुए सन्तु, धाना, लाजा आदि को भक्षण के निमित्त अश्व को देती हैं । यह सारा कार्य यहाँ आठवीं कण्डिका के मन्त्रों से किया जाता है । अगले चार मन्त्रों ( ३३ ९ - १२ ) में ब्रह्मा और होता का प्रश्नोत्तर रूप संवाद है । तब आगे की चार कण्डिकाओं ( २३/१३ - १६ ) से अश्वमेधीय अश्व के अभिषेकार्थ उसका प्रोक्षण किया जाता है । इसके बाद षष्ठ अध्याय के ' अपां पेरुः ' ( ६।१० ) इस प्राकृत मन्त्र से और यहाँ के ' अग्निः पशुः ' ( २३ | १७ ) इति वैकृत मन्त्र से अश्व के मुख में प्रोक्षणी रखी जाती है । श्रोतसूत्र प्रदर्शित दो आहुतियों के बाद अगले मन्त्र ( २३ | १८ ) से तीन आहुतियाँ दी जाती १. श्रौतपदार्थनिर्वचन ( पृ ० १ ९७-१९ ८ ) में दीक्षिणीयेष्टि का विस्तार से परिचय दिया गया है । २. शतपथ ब्राह्मण ( ३।३।२ / ९ ) में तथा श्रोत ग्रन्थों में वस्त्र के किनारे या झालर को दशा कहा गया है । दशापवित्र झालरदार छानने के वस्त्र का नाम है ( वैदिक कोश, पृ ० १ ९ १ ) ।
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( 6 ) हैं । इन आहुतियों से अश्व को प्राणवान् बनाया जाता है । अब नेष्टा " पान्नेजन हाथ में ली हुई राजपत्नियों को पशुओं की तरफ ले जाता है और ' नमस्ते आतान ' ( ६।१२ ) इस प्राकृत मन्त्र का तथा इसी कंण्डिका के ' अम्बे अम्बालिके ' ( २३।१८ ) इस वैकृत मन्त्र का वाचन कराता है । ये सब राजपत्नियाँ पान्नेजन हाथ में लिये हुए ही अश्व की तीन प्रदक्षिणाएँ करती हैं । इनमें से पहली प्रदक्षिणा के समय ' गणानां त्वा ' ( २३ | १ ९ ) मन्त्र का पाठ किया जाता है । और दो प्रदक्षिणाएँ तूष्णी की जाती हैं । दूसरी प्रदक्षिणा पितरों के प्रति की जाने वाली प्रदक्षिणा के समान विपरीत क्रम से होती है । इसका क्रम भाष्य ( पृ ० ८ ९ - ९ ० ) में स्पष्ट किया गया है । इस प्रकार अश्व के प्राणों का शोधन करने के उपरान्त इसी कण्डिका के शेष भाग का पाठ करते हुए महिषी अश्व के साथ शयन करती है । तब अगले ( २३।२० ) मन्त्र द्वारा अघोवास ( बहुमूल्य कम्बल ) से उनको ढक दिया जाता है । ' उत्सवथ्या ' ( २२।२१ ) मन्त्र से यजमान अव का प्रोक्षण करता है । इसके बाद अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता, होता और क्षत्ता का यजमान की कुमारी चार पत्नियों संवाद होता है । प्रत्येक का यह पुत्री से और संवाद दो - दो मन्त्रों में, अर्थात् कुल दस मन्त्रों में ( २३२२- ३१ ) वर्णित है । इस अश्लील संवाद के अन्त में वाणी के दोष की शुद्धि के लिये ' दधिक्राव्ण: ' ( २३३२ ) मन्त्र का पाठ विहित है । अब तीन राजपत्नियाँ क्रमशः दो - दो मन्त्रों ( २३ / ३३-३८ ) ताम्र, रजत और सुवर्ण निर्मित सूचियों से ra का तोदन करती हैं और अगले छः मन्त्रों ( २३३३ ९ -४४ ) से वपा की प्राप्ति के लिये अश्व का विशसन और उसके उदर का विपाटन किया जाता है । आगे की १८ ऋचाएँ ब्रह्मोद्यसंज्ञक हैं । यज्ञीय अवसरों पर ऋत्विजों का जीव, जगत् और ब्रह्म के विषय में जो संवाद होता है, उसे ' ब्रह्मोय ' कहा जाता है । महाकवि बाण ने भी हर्षचरित are a year य के प्रारम्भ में इस शब्द का प्रयोग किया है । यहाँ प्रथम चार ऋचाओं ( २३।४५-४८ ) में होता और अध्वर्यु का, अन्य चार ( २३।४ ९ -५२ ) में ब्रह्मा और उद्गाता का, तब आगे के चार मन्त्रों ( २३।५३-५६ ) में होता और अध्वर्यु का, बाद की चार ऋचाओं ( २३१५७-६० ) में उद्गाता और ब्रह्मा का तब अन्तिम दो मन्त्रों ( २३४६१-६२ ) में यजमान और अध्वर्यु का संवाद है । इस प्रकार कुल १८ मन्त्रों में यह संवाद पूरा होता है । इस ब्रह्मोद्य कथा के उपरान्त महिम ग्रह सम्बन्धी पुरोनुवाक्या, प्रेष और याज्या संज्ञक तीन मन्त्रों ( २३ / ६३-६५ ) का विधान किया गया है । इसी के साथ यह अध्याय समाप्त हो जाता है । २४ अध्याय में अश्वमेधीय पशुओं और उनके देवताओं के पारस्परिक सम्बन्ध को बताया गया है । अश्वमेध में २१ यूप गाड़े जाते हैं । इनमें से मध्यम यूप का नाम अग्निष्ठ है । इसमें १७ पशु बाँधे जाते हैं । यहाँ की प्रथम afuser में वर्णित १५ पशु पर्यग्य कहलाते हैं । इन २१ यूपों में से प्रथम १३ यूपों में नियोजनीय पंचदशिन् पशुओं का उनके अधिपति देवताओं के साथ वर्णन यहाँ की १३ कण्डिकाओं में किया गया है । आगे की छः कण्डिकाओं ( २४ । १४-१९ ) में शेष आठ यूपों में बन्धनीय चातुर्मास्य वरुणप्रघासीय, साकमेधीय, माहेन्द्रष्टि, पित्र्येष्टि और शुनासी रीय पशुओं का उनके अधिपति देवताओं के साथ वर्णन किया गया है । अश्वमेघीय २१ यूपों और उनमें बन्धनीय पशुओं का उनके अधिपति देवताओं के साथ ऊपर वर्णन किया गया है । इन २१ यूपों के बीच २० खाली जगहों की यहाँ अन्तराल संज्ञा है । इनमें बन्धनीय पशुओं और उनके अधिपति देवताओं का वर्णन आगे के मन्त्रों में अध्याय की समाप्ति तक ( २४ / २०-४० ) किया गया है । इनमें आरण्य पशुओं का विधान है । इनका परिचय भाष्यकार ने उम्वट, सायण, महीधर आदि प्राचीन १. पाद प्रक्षालन के लिये प्रयुक्त एक पात्र का नाम पान्वेजन है ( वैदिक कोश, पृ ० २८२ ) ।
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( ९ ) भाष्यकारों के प्रमाण से दिया है । यहाँ ( पृ ० १४५ ) अश्वमेधीय पशुओं की संख्या भी बताई गई हैं और कुछ आचार्यों के इस पक्ष को भी बताया गया है कि दुर्लभ आरण्य पशुओं का पट पर चित्र बनाकर उनके उपाकरण आदि सारे संस्कार करने चाहिये । पूर्व अध्याय में यूपों और यूपान्तरों में बन्धनीय पशुओं का निरूपण करने के बाद अब २५ वें अध्याय में अश्वमेध यज्ञ की शेष प्रक्रिया इस प्रकार बताई गई है -- वनस्पति याग के बाद और स्विष्टकृत् याग से पहले प्रजापति के निमित्त शूल्य मांस की आहुति देकर इस अध्याय के प्रथम नौ मन्त्रों में वर्णित शाद से लेकर पृथिवी पर्यन्त देवताओं को अश्व के दन्त आदि विभिन्न अंगों की आहुति घृत के साथ देकर अन्त में जुम्बकाहुति दी जाती है । जुम्बका गायत्री से दी गई बहुत का विवरण भाष्य ( पृ ० १५७ ) ही देखना चाहिये । इसके आगे की चार कण्डिकाएँ ( २५ / १०-१३ ) अश्व आदि प्राजापत्य पशुओं की याज्यानुवाक्या के रूप में विनियुक्त हैं । आगे के दस मन्त्रों ( २५।१४-२३ ) में विश्वेदेव देवता वाले पशुओं की याज्यानुवाक्याएँ हैं । तब ' मा नः ' ( २५ | २४- ३ ९ ) इत्यादि सोलह मन्त्रों से चतुर्गृहीत आज्य की आहुति दी जाती है । ' यत्ते ' ( २५ ४०-४५ ) इत्यादि छः मन्त्रों से अश्वमेधीय अश्व की स्तुति के साथ उससे याचना की जाती है । अन्त की दो कण्डिकाओं ( २५ / ४६-४७ ) में स्थित छः मन्त्रों से अयस्मय और अश्वलोहित के होम के अनन्तर छ: आहुतियां दी जाती हैं । इस अश्वमेध यज्ञ और उसकी आध्यात्मिक उपासना से व्यक्ति का महान् अभ्युदय होता है । यह यज्ञ क्रममुक्ति तथा बुद्धि की शुद्धि के साथ परम निःश्रेयस को देने वाला है । यह अश्वमेघ यज्ञ एक वर्ष और सत्ताईस दिन में पूरा होता है । इनमें से एक वर्ष पर्यन्त अश्व यथेच्छ भ्रमण करता है । बारह दीक्षा दिन, बारह उपसद् दिन और तीन सुत्या दिनों को मिलाने पर सत्ताईस दिन होते हैं । आगे २ ९वेंअध्याय अश्वमेघीय हौत्र मन्त्रों का विधान है । २६ वां अध्याय: खिल मन्त्र अब तक के २५ अध्यायों में दर्शपौर्णमास, पितृयज्ञ, अग्न्याधान, अग्न्युपस्थान, चातुर्मास्य, अग्निष्टोम, वाजपेय, राजसूय, अग्निचयन, सौत्रामणी और अश्वमेघ याग ' सम्बन्धी मन्त्रों की व्याख्या प्रस्तुत की गई है । अब प्रस्तुत २६ वें अध्याय में खिल मन्त्रों का विधान दिखाया जा रहा है । यहाँ जिन मन्त्रों का श्रुति द्वारा स्पष्ट विनियोग नहीं बताया गया, उनका लैंगिक विनियोग किया जाता है । शब्द की सामर्थ्य को ही यहाँ लिंग माना गया है । शब्द की उस सामर्थ्य के सहारे इस अध्याय को प्रथम कण्डिका के ७ सन्नति मन्त्रों का विनियोग इन देवताओं के नमन में किया गया है । द्वितीय मन्त्र से यजमान भगवान् से प्रार्थना करता है । ' बृहस्पते ' ( २६ | ३ ) मन्त्र में बृहस्पति - सव के बार्हस्पत्य ग्रह का ग्रहण किया जाता है और अगले दो मन्त्रों ( २६ ४ - ५ ) से गोसव के लिये ऐन्द्र ग्रह का ग्रहण | आगे के तीन मन्त्रों नवां मन्त्र अग्निदेवता की पुरोनुवाक्या और १० वां महेन्द्र देवता की ( २६।६-८ ) में वैश्वानरीय पुरोनुवाक्याएँ हैं । पुरोनुवाक्या से सम्बद्ध है । ‘ तं वः ’ ( २६।११ ) इत्यादि मन्त्र जप, स्वाध्याय आदि में विनियुक्त है । अग्निदेवता की और फिर ' उपह्वरे ' ( २६ । १५ - १८ ) इत्यादि चार मन्त्रों से जाती है । ' अनु वीरैः ' ( २६।१ ९ ) इत्यादि मन्त्र आशीर्वादपरक हैं । आगे की याज्या - मन्त्र हैं । इनमें से पहली का प्रातः सवनीय चमस याग में, आगे की दो का ऋतुयाग में, चमस याग में और पाँचवीं का विनियोग तृतीय सवन के चमस याग में याज्या मन्त्रों के रूप में आगे के तीन मन्त्रों ( २६।१२-१४ ) सोम देवता की भक्तिपूर्वक स्तुति की पाँच ऋचाओं ( २६।२०–२४ ) में चौथी का माध्यन्दिनीय नेष्टा द्वारा पाठ किया जाता है । इनमें से प्रथम के देवता अग्नि, आगे के दो मन्त्रों का ऋतु औरबाकी के दो मन्त्रों के देवता इन्द्र और त्वष्टा २ 0