वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 11–20

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ७ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 11–20

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( १० ) । इस अध्याय के अन्तिम दो ( २६ / २५-२६ ) मन्त्रों का भी विनियोग जप, स्वाध्याय आदि में किया गया है । इन दोनों पावमानी ऋचाओं के देवता सोम हैं । पवमान सोम की ही एक विशेष अवस्था है । २७ वां अध्याय: पंचचितिकाग्नि मन्त्र २७ वा अध्याय पंचचितिक अग्नि से सम्बद्ध है । इसकी प्रारम्भ की नो ऋचाओं का विनियोग इष्टका पशु सम्बन्धी समिध्यमान और समिती के अन्तराल में अग्नि, बृहस्पति और सविता देवता की स्तुति में किया गया है । ' उद्वयम् ' ( २८ | १० ) इत्यादि मन्त्र सूर्य देवता का उपस्थान किया जाता है । आगे की प्रयाज देवता वाली आप्री संज्ञक बारह ऋचाओं ( २७/११ - २२ ) में अग्नि देवता की स्तुति है । ' पीवो अन्ना ' ( २७/२३ - २८ ) इत्यादि छ: हुत-पशु सम्बन्धी याज्यानुवाक्या मन्त्र हैं । तब आगे के छः मन्त्र ( २७१२ ९ - ३४ ) वायुदेवता वाले वायव्येष्टका पशुओं के ar आदि द्रव्यों की याज्यानुवाक्याओं से सम्बद्ध हैं । आगे के कुछ मन्त्र यहाँ ऐसे हैं, जिनका सामगान में उपयोग किया जाता है । प्रथम दो मन्त्रों ( २७ / ३५-३६ ) से रथन्तर साम का, आगे के दो मन्त्रों से ( २७/३७ - ३८ ) बृहत्साम का अन्य तीन मन्त्रों से ( २७ ३ ९ - ४१ ) वामदेव्य साम का और दो मन्त्रों से ( २७।४२-४३ ) यज्ञायज्ञीय साम का गायन किया जाता है । ' ऊर्जा नपातम् ' ( २७।४४ ) मन्त्र से यजमान अध्वर्यु की प्रार्थना करता है और इस अध्याय के अन्तिम ४५ वें मन्त्र में पंचसंवत्सरात्मक युगाध्यक्ष प्रजापति के रूप में चित्याग्नि की स्तुति की जाती है । २८ वां अध्याय: सौत्रामणी शेष १ ९ - २१ अध्यायों में सौत्रामणी याग का विस्तार से वर्णन किया जा चुका है । इस अध्याय में सोत्रमणी याग अंगभूत ऐन्द्रपशु से लेकर वायोधस पर्यन्त पशुओं के याज्यानुयाज्या मन्त्र हैं । आप्री संज्ञक देवता इन्द्र को ही • विभूतियाँ हैं । एकादश ऋचाओं के पहले अनुवाक ( २८ / १-११ ) में ऐन्द्र पशु सम्बन्धी आणी देवताओं के समित् तनूनपात् और आदित्य देवतावाले प्रयाजों के प्रेष मन्त्र हैं । आगे की ११ ऋचाओं ( २८।१२- २२ ) में ऐन्द्र पशु सम्बन्धी अनुयाजों के प्रैष मन्त्र हैं । ' अग्निमद्य ' ( २८ | २३ ) मन्त्र से यजमान होता अग्नि की प्रार्थना करता है । आगे ग्यारह ( २८ | २४-३४ ) वायोधस पशुसम्बन्धी प्रयाजों के प्रेष मन्त्र हैंऔर तब फिर आगे के ' होता यक्षत् ' अनुयाजों के प्रैष मन्त्रों के रूप में किया ( २८/३५ -४५ ) इत्यादि ११ ऋचाओं का विनियोग वायोघस पशुसम्बन्धी जाता है । अन्तिम मन्त्र ( २८ | ४६ ) से यजमान पुनः अग्नि की होता के रूप में स्तुति करता है । २ ९ वां अध्याय: अश्वमेध शेष यह अध्याय अश्वमेध यज्ञ से सम्बद्ध है । प्रारम्भ की ११ ऋचाएँ आत्री संज्ञक हैं । समित् तनूनपात् इडा आदि इनके देवता हैं । इनसे परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से अश्व की स्तुति की जाती है । इस तरह की प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष स्तुतियों का सामंजस्य बैठाने की पद्धति आठवें मन्त्र के भाष्य ( पृ ० २६७ ) में देखी जा सकती है । इन ग्यारह मन्त्रों से आगे के तेरह मन्त्र ( २ ९।१२- २४ ) भी अश्व की स्तुति में ही विनियुक्त हैं । यहाँ १३-१५ मन्त्रों में बताया गया है कि वसु देवताओं ने आदित्यमण्डल से इस अश्व को निकाला है । यम द्वारा प्रदत्त इस अश्व को त्रिस्थान वायु रथ में जोतता है और इन्द्र इस रथ पर बैठता है । गन्धर्व विश्वावसु इसकी रशना ( लगाम ) पकड़ता है । आदित्य लोक में इसके तीन बन्धन ऋक्, यजु और सामलक्षण, अन्तरिक्ष लोक में मेघ, विद्युत् और अशनिलक्षण तथा पृथ्वी १. " रसीभूतो यदा सोमः पवित्रात् क्षरति ग्रहम् । ऋग्भिः स्वादिष्ठयाद्याभिः पवमानः स उच्यते ॥ ” ( भा ०, पृ ० २०१ ) ।

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( ११ ) लोक में कृषि, वृष्टि और बीज लक्षण स्थित हैं । इसी प्रकार अन्य मन्त्रों में भी अश्वमेधीय अश्व की भूरिभूरि प्रशंसा की गई है । इस प्रकरण के अन्तिम २४ वें मन्त्र में अश्व स्तुति से कृतकृत्य हुए यजमान को सम्बोधित कर उसके प्रति शुभाशंसा प्रकट की गई है । आगे के आप्री संज्ञक १२ मन्त्रों में भी समित् तनूनपात् आदि देवताओं की स्तुति की गई है । इससे आगे के अनेक मन्त्रों ( २ ९ | ३७ - ५७ ) में अश्व के रक्षक योद्धाओं और उनके युद्ध के लिये उपयोगी उपकरणों की स्तुति है । प्रथमतः अग्नि देवता की और योद्धाओं की स्तुति करके तब धनुष, ज्या, धनुष्कोटि, इषुधिं, रथ, दुन्दुभि आदि की स्तुति की गई है । रथ को यहाँ रथवाहण और हविर्धान भी कहा गया है । ५३ वें मन्त्र में बताया गया है कि यूप, स्फ्य, रथ और शर ये चारों वस्त्र के ही प्रकार हैं । ५८ वें मन्त्र में अश्वमेघीय प्रथम एकादश ' पशुओं और उनके देवताओं का तथा ५ ९ वें मन्त्र में द्वितीय एकादश पशुओं और उनके देवताओं का वर्णन है । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र ( २ ९ / ६० ) में दस आहुति वाली अवेष्टि संज्ञक इष्टि की हवियों और उनके देवताओं का उल्लेख किया गया है । ३० वां अध्याय: पुरुषमेध ३० अध्याय से पुरुषमेध का प्रकरण चलता है । ' अतिष्ठाकाम ब्राह्मण अथवा राजन्य इसका अनुष्ठान करता है । चैत्र शुद्ध द्वादशी को इसका आरम्भ होता है । यहाँ २३ प्रकार की दीक्षा, बारह असद् और पाँच सुत्याएँ होती I इस प्रकार यह अनुष्ठान ४० दिन तक चलता है । इसमें यूपों की संख्या ११ और अग्नीषोमीय पशुओं की संख्या भी इतनी ही होती है । इनका प्रत्येक यूष में अथवा केवल मध्य यूप में बन्धन विहित है । सकृत् गृहीत आज्य से प्रथम चार मन्त्रों में से प्रत्येक से आहवनीय अग्नि में तीन - तीन आहुतियाँ दी जाती हैं । इससे आगे अध्याय की समाप्ति पर्यन्त पुरुषमेधीय पशुओं का विवरण है । प्रत्येक ग्रूप में एक - एक एकादशिन को नियुक्त कर ' ब्रह्मणे ब्राह्मणम् ' ( ३०।५ ) से लेकर ' प्रकामोद्यायोपसदम् ' ( ३०1 ९ ) पर्यन्त मन्त्रों में पठित ब्राह्मण आदि ४८ प्रकार के पुरुषों को यहाँ नियोजित किया जाता है और अन्य यूपों में ' वर्णायानुरुधम् ' ( ३०१ ९ -१ ९ ) इत्यादि मन्त्रों में पठित ११-११ पुरुषों को । किस यूप में कितने पुरुषों का किस प्रकार नियोजन होता है, इस विषय का स्पष्ट निरूपण २० वें मन्त्र के भाष्य में कर दिया गया है । वहीं यह भी स्पष्ट किया गया है कि २०-२१ मन्त्रों में पठित अन्य अवशिष्ट पशुओं का नियोजन द्वितीय उच्छ्रित यूप में करना चाहिये । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र ( ३०/२२ ) में आठ विपरीत स्वभाव वाले पशुओं का उल्लेख है । इस मन्त्र में जाति का स्पष्ट उल्लेख होने से ज्ञात होता है कि पूर्ववणित पुरुषों में जाति का नियम लागू नहीं होता । इसकी पूरी प्रक्रिया को भाष्य ( पृ ० ३१ ९ ) में ही देखना चाहिये । पुरुषमेध की समाप्ति के बाद यजमान को अपनी आत्मा में अग्नियों का समारोप कर वन में चले जाना चाहिये । इसके बाद भी यदि किसी की ग्राम में हो बसने की इच्छा हो, तो इसका विधान भी यहाँ बताया गया है ( पृ ० ३२० ) । शतपथ ब्राह्मण के अवधेय अंश इस खण्ड के २१-३० अध्यायों के मन्त्रों के कात्यायन प्रोक्त विनियोगों का समर्थन प्रायः शतपथ ब्राह्मण के १२-१३ काण्डों के वचनों को उद्धृत कर किया गया है । बीच - बीच में अन्य स्थलों के वचन भी व्याख्यान के प्रसंग में दिये गये हैं । १. " सर्वभूतान्यतिक्रम्य स्थानमतिष्ठा " ( भा ०, पृ ० ३०३ ) । २. जिस याग में एकादश पशुओं का विनियोग होता है, उसे एकादशिन् कहते हैं । १. अग्नि, २. सरस्वती, ३. सोम, ४. पूषा, ५. बृहस्पति, ६. विश्वेदेव, ७ इन्द्र, ८ मरुत्, ९ इन्द्राग्नी, १०. सविता और ११, वरुण - ये ग्यारह देवता एकादशिनी हैं " ( कात्या ० यज्ञ ०, पृ ० ४७५ ) ।

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( १२ ) २१ वें अध्याय में स्वतन्त्र रूप से शतपथ का कोई वचन उद्धृत नहीं है । २२ अध्याय के प्रथम मन्त्र में ही शतपथ के आधार पर अश्व की अमेध्यता का वर्णन कर उसकी पवित्रता के लिये ब्रह्मोदन का विधान और इस पद की व्याख्या की गई है । साथ ही दर्भमयी रशना के इतिवृत्त को सूचित किया गया है । ३-५ मन्त्रों की व्याख्या में अश्वमेधयाजी किस प्रकार सारी दिशाओं को जीत लेता है, इसके लिये स्वाहाकारों और स्वधाकारों का विधान किया गया है । छठे मन्त्र में शतपथ के आधार पर निष्क्रयणी आहुति, गायत्रीरात्र, अमिता होम, आज्याहुति आदि विषयों की विशद व्याख्या की गई है और आगे की दो कण्डिकाओं ( २२ | ७-८ ) में वर्णित अश्व की ४ ९ प्रकार की विभिन्न चेष्टाओं के आधार पर आहुतियों का विधान सप्रयोजन प्रदर्शित है । अश्व की इन चेष्टाओं का इतना सूक्ष्म विवरण शायद अश्व - सम्बन्धी अन्य साहित्य में दुर्लभ है । अश्व पर अनुसन्धान कर्ताओं के लिये यह प्रकरण अत्यन्त महत्त्व का सिद्ध हो सकता है । ये आहुतियाँ वहाँ कब दी जाय इनका विवरण १० वें में मन्त्र में है । आगे १ ९ वें मन्त्र में प्रजापति के द्वारा सृष्ट अश्वमेध याग की आख्यायिका को उपस्थापित कर इसके अनुष्ठान से प्राप्त होने वाली राष्ट्र और जनपद की समृद्धि का वर्णन कर बताया गया है कि ' शिशु ' यह अश्व का प्रिय नाम है । यहाँ यह भी कहा गया है कि सबल व्यक्ति ही इसका अनुष्ठान कर सकता है । २० वं मन्त्र में अश्वमेघीय दीक्षा का प्रतीकात्मक पद्धति से वर्णन कर सात दिन में दी जाने वाली २१ औद्भण आहुतियों का विधान बताया गया है । यहाँ भाष्यकार ने आचार्य हरिस्वामी द्वारा प्रस्तुत की गई इस प्रकरण की विशेष व्याख्या को भी प्रस्तुत किया है । २२ वें मन्त्र में कण्डिका के विभिन्न पदों की व्याख्या के प्रदर्शन में शतपथ के अनेक वचन उद्धृत हैं । २३ वें मन्त्र में शतपथ के इस प्रकरण को अन्नहम ब्राह्मण नाम दिया गया है और आचार्य हरिस्वामी के अनुसार हेयकल्प एवं स्थितिकल्प को प्रस्तुत किया गया है । इस अध्याय के अन्तिम मन्त्र ( २२/३४ ) में बताया गया है कि ' प्राणाय स्वाहा ' ( २२/२३ ) से लेकर इस अध्याय के अन्त तक की बारह कण्डिकाओं के अनुवाक से कालाग्नि आदि का शरीर धारण करने वाले देवताओं को आज्य आदि की आहुतियों से तृप्त करना चाहिये । ये सारे अवान्तर याग मुख्य अश्वमेध याग के उसी प्रकार अंग हैं भी, जैसे कि मनुष्य के शरीर ( अंगी ) के सिर, कान आदि अंग होते हैं । ये सारे देवता और अश्वमेधीय अश्व प्रजापति के अवयव हैं और यह सब परमात्मा का ही विलास है । इस प्रकार देखा जाय तो सर्वत्र उस परमात्मा का ही स्तवन और यजन हो रहा है । २३ वें अध्याय के ८ वें मन्त्र में शतपथ के वचनों के आधार पर दयानन्दीय व्याख्या का खण्डन किया गया है और बताया गया है कि इन ब्राह्मण वचनों से कात्यायन श्रौतसूत्र के विनियोगों को तथा सायण आदि के भाष्यों को ही समर्थन मिलता है, दयानन्दीय व्याख्या को नहीं । १२ वें मन्त्र में ब्रह्मोद्य की महिमा वर्णित है कि इसकी चर्चा से ब्रह्मवर्चस् की प्राप्ति होती है । प्रस्तुत ब्राह्मण में पूर्वचित्ति, बृहद्रय, पिलिप्पिला, पिशङ्गिला आदि पदों की व्याख्या भी प्रस्तुत की गई है । अगले दो मन्त्रों की व्याख्या में भी यही क्रम दिखाई पड़ता है । प्रसंगवश यहाँ ( पृ ० ८३ ) बताया गया है कि चरक शाखा वालों का चमस न्यग्रोध काष्ठ से निर्मित होता है । अमरकोश के टीकाकार रामाश्रम को भी यहाँ उद्धृत किया गया है । आगे कुछ मन्त्रों में मन्त्रार्थ के समर्थन में ही शतपथ स्मृत है । १८ वें मन्त्र में उद्धृत वचनों का विशेष महत्त्व है । वहाँ वास, अधिवास, हिरण्य आदि पदों का अर्थ और प्रयोजन दिखा कर शतपथ और कात्यायन के वचनों की हरिस्वामी द्वारा की गई समन्वित व्याख्या का उल्लेख है । भाष्यकार ने यहाँ स्वयं अपना मत भी प्रस्तुत किया है । अश्वमेधीय प्रकरण के इन ब्रह्मोद्य मन्त्रों की दयानन्दीय व्याख्या का खण्डन तथा महीघर आदि के व्याख्यानों को समर्थन देने के लिये यहां प्रायः प्रत्येक मन्त्र में शतपथ को उद्धृत किया गया है । इससे स्पष्ट हो जाता है कि महीधर आदि ने स्वामी दयानन्द की तरह बिना आधार का मनमाना अर्थ नहीं किया है | यहाँ ( पृ ० ९ ५ ) बताया गया है कि इन अभिमेथिका मन्त्रों में जो गूढ दर्शन छिपा हुआ है, उसे ब्राह्मण वचन स्पष्ट करते हैं । "

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( १३ ) इस पूरे प्रकरण के निष्कर्ष को हम यहाँ ( पृ ० १०१ - १०३ ) विस्तार से देख सकते हैं । इस अध्याय के ' सुभू ' ( २३/६३ ) इत्यादि मन्त्र के भाष्य में पुन: अनेक शतपथ - वचनों को उद्धृत कर बताया गया है कि इन श्रुतियों के आधार पर ही उव्वट, सायण आदि ने अपने - अपने भाष्यों की रचना की है । अतः दयानन्दीय भाष्य की अपेक्षा इनकी श्रेष्ठ निर्विवाद है । २४ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र के भाष्य में अश्वमेधीय पशुओं का किस किस ग्रुप में कितनी संख्या में नियोजन किया जाता है, इसके प्रमाण के रूप में शतपथ के वचन उद्धृत हैं । आगे १३ वें मन्त्र में वयोहोम में विनियुक्त मन्त्रों के वय शब्द के दयानन्दीय अर्थ के खण्डन के लिये शतपथ का प्रमाण दिया गया है कि यह कालवाचक शब्द है । इसी तरह से चातुर्मास्य पशुओं के प्रसंग में भी शतपथ स्मृत है ( पृ ० १३१ ) । तब अन्तिम मन्त्र ( २४ | ४० ) में अश्वमेघीय अश्वों की संख्या का परिगणन करते समय प्रमाणस्वरूप ब्राह्मण को उद्धृत किया गया है । साथ ही वहाँ यह मत भी दिखाया गया है कि जो दुर्लभ और दुर्ग्रह पशु हैं, उन सबका पट पर चित्र बनाकर उनको उपाकरण आदि संस्कारों से संस्कृत करना चाहिये । अश्व की उत्पत्ति प्रजापति से हुई है, इस विषय का यहाँ पुनः प्रतिपादन किया गया है । इसीलिये अश्वमेध यज्ञ के इस प्रकरण से ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त का विधान है । अश्व शब्द का निर्वाचन भी यहाँ दिया ' पारिप्ल-यहाँ उसके प्रभू, विभू आदि १२ नामों से की गई है ( पृ ० १४६ ) और अन्त में बताया गया है कि यहाँ सावन संवत्सर का ग्रहण किया गया है, पार्वण, सोर अथवा नाक्षत्र गया है । अश्व की स्तुति वाख्यान का उल्लेख कर संवत्सर का नहीं । २५ वें अध्याय के मन्त्रों का भी अश्वमेध याग में ही विनियोग है । इन मन्त्रों में प्रयुक्त द्वितीया विभक्ति भोक्त्री देवता को और तृतीया अश्व के विभिन्न भोग्य अंगों को सूचित करती है । इस विषय को शतपथ के वचनों से यहाँ समर्थन दिया गया है । २२ वे मन्त्र में उव्वटाचार्य द्वारा अपने व्याख्यान के प्रसंग में उद्धृत शतपथ के द्वितीय काण्ड के वचन का भी स्मरण किया गया है । इस अध्याय में स्वतन्त्र रूप से शतपथ द्वारा प्रतिपादित कोई विशेष विषय नहीं मिलता, किन्तु ४३ वें मन्त्र के भाष्य में शतपथ के हो अन्तिम भाग बृहदारण्यक उपनिषद् के " उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः " इस वाक्य में निर्दिष्ट अश्वमेघीय प्रकरण के दार्शनिक दृष्टिकोण की विस्तार से व्याख्या की गई है । ( पृ ० १८१ - १८२ ) | यह अवश्य ही हमारे लिये मननीय अंश है । १. अश्वमेध याग के अनुष्ठान के समय कहे जाने वाले आख्यान का नाम पारिप्लव है, जो यज्ञावकाश के समय वर्ष भर बार - बार किया जाता है । इसमें अन्य शास्त्रों के साथ इतिहास - पुराण आदि का भी वाचन होता है । इसका विशेष वर्णन म ० म ० पी ० वी ० काणे महोदय ने अपने धर्मशास्त्र के इतिहास के पुराण विषयक खण्ड में तथा पं ० श्री बलदेव उपाध्याय जी ने अपने पुराणविषयक ग्रन्थ में किया है । २. " वत्सरः पञ्चषा चान्द्रः, सौरः, सावनः, नाक्षत्रः, बार्हस्पत्य इति । शुक्लप्रतिपदादिदर्शान्तैश्चत्रादिसंज्ञ-दशभिर्मासैश्चतुःपञ्चाशदधिकशतत्र्यदिनः सति मलमासे त्रयोदशभिर्मासान्द्रो वत्सरः । चन्द्रस्यैव प्रभवो विभवः शुक्ल इत्याद्याः षष्टिसंज्ञाः । मेषादिषु द्वादशराशिषु रविभुतेषु पञ्चषष्ट्यधिकशतत्रयदिनैः सौरो वत्सरः सम्पद्यते । षष्टघुत्तरशतत्रयदिनैः सावनः । द्वादशभिर्नाक्षित्रमा सैनक्षत्रो वत्सरः । स च चतुर्विंशत्यधिकशतत्रयदिनैः स्यात् । मेषाद्यन्यतमराशौ बृहस्पतिना भुक्ते बार्हस्पत्यः । स च त्रिषष्ट्यधिकशतत्रयसंख्याकैदिनैर्भवति ” ( सुगम ज्योतिष, पृ ० ५१ ) | भाष्ये चान्द्रो वत्सरः पार्वणपदेनोक्त इति विज्ञेयम् ।

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( १४ ) २६ वें अध्याय शतपथ का कोई वचन उद्धृत नहीं है, किन्तु अन्तिम ( २६ । २६ ) मन्त्र में होतृधिष्ण्य, मैत्रा-वरुण विष्ण्य, ब्राह्मणाच्छंसी धिष्ण्य, पोतृ धिष्ण्य और नेष्टृ धिष्ण्य की व्याख्या शतपथ के आधार पर ही की गई प्रतीत होती है । यहाँ इन्हीं नाम वाले खरों का स्थान निर्धारित किया गया है । २७ वें अध्याय में केवल २५ वें मन्त्र में शतपथ को उद्धृत सृष्टि का प्रतिपादन है इस प्रसंग में बताया गया है कि पहले सब कुछ किया गया है । यहाँ आख्यायिका के सहारे सलिलमय था । उस जल से हिरण्मय अण्ड, संवत्सर प्रजापति, मनुष्य, देव, असुर आदि की सृष्टि हुई । इस सारी सृष्टिप्रक्रिया का स्मृतियों और पुराणों में हमें विस्तार मिलता है । यहाँ देवताओं की सृष्टि द्युलोक में बताई गई है, किन्तु आर्यसमाजी " विद्वांसो वै देवाः " इस शतपथ श्रुति के आधार पर ' देव ' पद का अर्थ सर्वत्र ' विद्वान् ' करते हैं । यह कितनी भ्रामक बात है, इस ओर भी भाष्यकार ने हमारा ध्यान आकृष्ट किया है । २८ वें अध्याय में केवल २१ वें मन्त्र में दभं की उत्पत्ति को बताने वाली शतपथश्रुति का स्मरण किया गया है । २ ९वें अध्याय के १४ वें मन्त्र में सूर्यमण्डल की स्तुति में विनियुक्त मण्डल - ब्राह्मण के वचन को उद्धृत किया गया है । ५३ वें मन्त्र में शतपथ को उद्धृत कर बताया गया है कि जब इन्द्र ने वज्ज्र का प्रहार किया, तो उसके चार भाग हो गये । इन भागों के क्रमश: चूप, स्पय, रथ और शर नाम रखे गये । इनमें यूप और स्फ्य को ब्राह्मणों ने ले लिया और क्षत्रियों ने रथ और शर का ग्रहण किया । ५८ वें मन्त्र में दो एकादशिन पशुओं का आलभन निर्देशित है । इस अध्याय के अन्तिम ६० वें मन्त्र में दशहविक अवेष्टिसंज्ञक इष्टि का प्रतिपादन करने वाली शतपथश्रुति स्मृत है । ३० वें अध्याय के केवल अन्तिम २२ वें मन्त्र में ही उत्तम पुरुषों का और उनकी प्राजापत्यता का प्रतिपादन करने वाला शतपथवचन मिलता है । उसके प्रमाण से यहाँ बताया गया है कि दक्षिण में स्थित ब्रह्मा पुरुषसूक्त से होता के समान भगवान् नारायण पुरुष की स्तुति करे । यहाँ ब्रह्मा में होता के धर्मों का अतिदेश किया गया है । मन्त्रों का आध्यात्मिक अर्थ प्रस्तुत खण्ड में भी प्रायः सभी मन्त्रों का आध्यात्मिक अर्थ बताया गया है । इस प्रक्रिया में वरुण, अग्नि, प्रजापति, बृहस्पति, वायु, इन्द्र आदि देवताओं के बोधक विशेष पदों की सामान्य रूप से परमात्मपरक व्याख्या की गई । है | अनेक मन्त्रों में परमात्मा ( ब्रह्म ) के सार्वात्म्य को, अर्थात् सब कुछ परमात्मा हो है, इस बात को अनेक युक्तियों और प्रमाणों से सिद्ध किया गया है । ऐसे प्रसंगों में प्रायः विवर्तवाद को ही स्थापित किया गया है । ऐसा करते समय उपनिषदों, पुराणों और भगवद्गीता आदि वेदान्त के ग्रन्थों का प्रमाण के रूप में स्मरण किया गया है । भगवान् । इसी श्रीराम और उनके पार्षद हनूमान् सुग्रीव, विभीषण आदि की भी यथाप्रसंग इस आध्यात्मिक अर्थ में चर्चा मन्त्रों है में उल्लेख प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण भी यहाँ चर्चित हैं । मित्रावरुण, अश्विनीकुमार आदि युगल देवताओं का जिन वायु, वाक् - प्राण, जीवात्मा - परमात्मा, हुआ है, वहाँ प्रायः इनका अर्थ राम - लक्ष्मण, राम - कृष्ण, कृष्ण - बलदेव, अग्नि को भी शिष्याचार्य, शास्त्राचार्य आदि किया गया है । अनेक मन्त्रों में यहाँ चिदात्मा, जीवात्मा, साधक और भक्त सम्बोधित किया गया है । देव देवी युगल की जिन मन्त्रों में चर्चा है, वहाँ प्रायः उनसे श्री लक्ष्मी, सीताराम, रुक्मिणीकृष्ण अश्व का ग्रहण किया गया है । संवत्सरात्मक प्रजापति का यहाँ अनेक मन्त्रों में उल्लेख है । इसी तरह अश्वमेधीय यथाप्रसंग प्रजापति का ही स्वरूप है, इस विषय को अनेक प्रसंगों में स्पष्ट किया गया है । भगवान् शिव को भी यहाँ राजराजेश्वरी स्मरण किया गया है और साथ ही भक्तिदेवी, ब्रह्मविद्या, वेदान्तवाणी, कुण्डलिनी ( २२/२ ), भगवती ) में वर्णित का भी अनेक मन्त्रों में उल्लेख है । भक्ति की यहाँ विशेष रूप में चर्चा की गई है । एक मन्त्र ( २२/२५ नाना प्रकार के जलों की परमात्मा के रूप में ही व्याख्या की गई है ।

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( १५ ) २१ वें अध्याय के ६-७ मन्त्रों का अर्थ विशेष रूप से अवधेय है । यहाँ ब्रह्मविद्या अथवा ज्ञानरूपी नौका के सहारे संसार - सागर को उत्तीर्ण करने की बात भगवद्गीता के प्रमाण से स्पष्ट की गई हं । २२ वें मन्त्र में बताया गया है कि क्रिया, कारक और द्रव्य सब कुछ ब्रह्मात्मक ही हैं । इस प्रसंग में भी गीता को उद्धृत किया गया है । २ ९ वें मन्त्र में द्रव्य देवता, कर्म और कर्ता की ब्रह्मात्मकता वर्णित है और कहा गया है कि अग्नि, इन्द्र आदि के रूप में भगवान् की हो आराधना की जाती है । ३१ वें मन्त्र में मनुस्मृति के प्रमाण से यज्ञीय तनू का उल्लेख है । ३३ वें मन्त्र का आध्यात्मिक अर्थ विशेष रूप से अवधेय है । यहाँ शतपथ को उद्धृत कर बताया गया है कि परमात्मा का अंशभूत जीव भी इन्द्र के ही समान माया से मोहित होकर विशीर्ण हो जाता है । अश्विनी पद से यहाँ रामलक्ष्मण अथवा बलकृष्ण का ग्रहण किया गया है । महशक्ति सीता अथवा राधा सरस्वती है । इनकी आराधना से जीव पुनः अपने ब्रह्मात्मभाव को प्राप्त करता है । ४३ वें मन्त्र में भी प्रायः यही प्रसंग दूसरे रूप में मिलता है । यहाँ बताया गया है कि वेद - पुराण वर्णित श्रवण, मनन आदि और स्मरण, सख्य, आत्मनिवेदन आदि उपायों से अश्विनीकुमारों के प्रतीक रामलक्ष्मण के प्रति स्वात्मार्पण किया जा सकता है । ५६ वें मन्त्र के अर्थ में महाकवि भारवि के प्रमाण से यह सिद्ध किया गया है कि व्यवहार में क्रोध की भी अपेक्षा है और यह भी भगवान् का ही स्वरूप है । ६० वें मन्त्र में भी ब्रह्म की सर्वात्मकता का उल्लेख है और अन्तिम मन्त्र ( २१।६१ ) में " सर्वतः संप्लुतोदके " ( २।४५ ) गीता के इस वचन के भावार्थं को ग्रहण करते हुए बताया गया है कि मधुर रस के समुद्र में वापी, कूप, तडाग आदि सबका जैसे समावेश हो जाता है, उसी तरह सारी उपासनाएँ परमात्मा की प्राप्ति में ही पर्यवसित हो जाती हैं । २२ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में तैत्तिरीय उपनिषद् के आधार पर सत् और असत् की व्याख्या प्रस्तुत की गई है । दूसरे मन्त्र में मूलाधार से ब्रह्मबिल पर्यन्त प्राप्त, बिसतन्तु के समान अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप वाली, विद्युत्पुंज के समान पिंगल, तेजोदण्डरूप कुण्डलिनी शक्ति की उपासना वर्णित है । तृतीय मन्त्र में बृहदारण्यक के प्रमाण से बताया गया है कि अश्वमेध अश्व की प्रजापति के रूप में उपासना करनी चाहिये । प्रजापति समष्टि जीव का अभिमानी देवता है । चौदहवें मन्त्र में भी बृहदारण्यक के प्रमाण से ही दिखाया गया है कि जो व्यक्ति सर्वत्र भेद का दर्शन करता है, उसे देवगण हेय स्थिति में डाल देते हैं । २० वें मन्त्र में ब्रह्मा, राजराजेश्वरी और विष्णु की स्तुति की गई है । २२ वें मन्त्र में बताया गया है कि अध्यात्मनिष्ठ योगी सबके सुख की कामना करता है । यहाँ " सर्वेऽपि सुखिनः सन्तु " इस प्रसिद्ध श्लोक को और इसी अभिप्राय के भागवत के वचन को भी उद्धृत किया गया है । २३ वें अध्याय के पाँचवें मन्त्र में तैत्तिरीय ब्राह्मण, मुण्डकोपनिषद् और गीता के प्रमाण से स्थापित किया गया है कि उस चिदादित्य के प्रकाश से ही चन्द्र, सूर्य, तारका आदि अन्य सभी ज्योतियों को प्रकाश प्राप्त होता है । १२ वें मन्त्र में सूर्य शब्द से चिदादित्य का और चन्द्र शब्द से सोमात्मिका षोडशी महाशक्ति का ग्रहण कर " द्वा सुपर्णा " श्रुति के प्रमाण से जीव की अल्पता और परभाव की व्यापकता प्रतिपादित है । अगले मन्त्र में ब्रह्म के विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुर्य स्वरूपों का उल्लेख है । १४ वें मन्त्र में कठोपनिषद् के प्रमाण से भोक्ता के स्वरूप का प्रतिपादन कर मनोनिग्रह पर जोर दिया गया है । १८ वें मन्त्र में प्रतिपादित है कि बुद्धि परमात्मा को चाहते हुए भी अपनी वृत्तियों की पारस्परिक स्पर्धा के कारण उसको प्राप्त नहीं कर सकती । १ ९ वें मन्त्र में गीता के प्रमाण से यह स्थापित किया गया है कि त्रिगुणात्मिका जड़ प्रकृति ब्रह्मचैतन्य में प्रतिबिम्बित होकर अपने में चैतन्य की प्रतीति कर लेने पर भी विश्व की सृष्टि करने में समर्थ हो सकती है । २० वें मन्त्र के आध्यात्मिक अर्थ में शिष्य और आचार्य से प्रार्थना की गई है कि आप लोग चार पुरुषार्थों अथवा सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य नामक चतुविध मोक्ष की स्थिति का प्रचार करें और इस स्वर्गीपम भारतवर्ष के ज्ञानविज्ञान को सारे जगत् में फैला दें ।

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( १६ ) २१ और २२ मन्त्र में स्थापित किया गया है कि सत्त्व, रज और तम नामक तीनों गुणों की साम्यावस्था रूप प्रकृति को ही आगमों में त्रिकोणा योनि ( त्रिपुरा ) नाम दिया गया है । इसी से सारे जगत् उत्पत्ति होती है । व्यर्थं दुरुपयोग न मनुस्मृति को उद्धृत किया गया है । यहाँ ३७ वें मन्त्र में जीव को भी अश्व बताया २५ वें मन्त्र में बृहदारण्यक, शाट्यायन, मुण्डक आदि श्रुतियों के सहारे यह उपदिष्ट है कि वाणी का करे । ३१ वें मन्त्र में प्रवृत्ति की अपेक्षा निवृत्ति की महत्ता को दिखाते हुए और अगले मन्त्र में भी पुनः अश्वमेधीय अश्व की प्रजापतिरूपता दर्शित है । गया है और कहा गया है कि भगवत्स्तुति रूप सूचियों के वेध से उसका भी संस्कार किया जाता है । अगले मन्त्र में पुनः भोक्ता जीव को संबोधित कर गीता के प्रमाण से उसकी असंस्कार्यता प्रतिपादित है । ४० वें मन्त्र में भोक्ता जीव के व्यावहारिक ( आध्यासिक ) और पारमार्थिक स्वरूप की चर्चा है । ४८ वें मन्त्र में गीता, सूर्योपनिषद् और वाक्य -पदीय के प्रमाण से दिखाया गया है कि वेदान्तवेद्य, सत्यज्ञानानन्द लक्षण ब्रह्म ही शब्दतत्त्व हैं और वही सारे जगत् को प्रकाशित करता है । ५० वें मन्त्र की व्याख्या दो सहपाठियों के संवाद के रूप में की गई है कि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति एवं विराट् हिरण्यगर्भ और अव्याकृत अवस्थाएँ उस व्यापक विष्णु के साथ ही ओतप्रोत हैं । केवल भौतिक जगत् ही नहीं, यह सारा आध्यात्मिक और आधिदैविक जगत् भी उसीमें विलोन हो जाता है । ५८ वें मन्त्र के आध्यात्मिक अर्थ में अश्वमेधीय प्रकरण की एक अनोखी व्याख्या देखने को मिलती है कि यज्ञरूपी विष्णु को छः विशिष्ट स्थितियाँ हैं । ये हैं तीन गुण और उनके अभिमानी तीन देवता । यह अनन्त रूपों में सर्वत्र व्याप्त पांच है । इसको ८० आहुतियां दी जाती हैं । पाँच शब्द आदि विषय, पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां और उनके विषय मिलकर २० होते हैं । इनमें से प्रत्येक के सात्त्विक, राजस, तामस और निर्गुण के रूप में चार - चार भेद होते हैं और सब मिलाकर इनकी संख्या ८० हो जाती है । चिदग्नि को प्रज्वलित करने वाले प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम नामक तीन प्रमाण ही यहाँ तीन समिधाएँ हैं । पाँच ज्ञानेन्द्रियां, मन और बुद्धि ये सात होता हैं, अथवा चार वर्ण और तीन आश्रम मिलकर सात होता होते हैं । ये परमात्मा की उपासना करते हैं । " त्रयो धर्मंस्कन्धाः ” इस छान्दोग्य श्रुति में आश्रमों की संख्या तीन हो मानी गई है । ६२ वें मन्त्र के आध्यात्मिक अर्थ की भी अपनी विशेषता है । तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और स्वयं इस संहिता के प्रमाण से यहाँ बताया गया है कि परमात्मस्वरूपा चितिशक्ति ही वेदि है | यहाँ माया का विलास समाप्त हो जाता है । सारा जगत् यहीं से उद्भूत होता है और इसी में विलीन हो ता है | यही ब्रह्म है । वेदलक्षण वाणी का यही परम स्थान है । इसी से चारों वेदों का प्रादुर्भाव होता है । २४ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में ही पुनः परमात्मा के सार्वात्म्य का निरूपण है । यहां बताया गया है कि इस अध्याय में वर्णित सारे पशु प्रजापति की सृष्टि हैं और प्रजापति में उसी प्रकार परमात्मा अवस्थित हैं, जैसे कि मिट्टी के सारे विकारों ( घट, शराव, उदंचन आदि ) में मिट्टी जुड़ी हुई है । इस अध्याय के आगे के अनेक मन्त्रों में भी इसी सिद्धान्त का विस्तार मिलता है । २५ वें मन्त्र में पशुओं के समान पक्षियों और उनके अधिपति देवताओं को भी परमात्मस्वरूप ही बताया गया है । यहाँ कहा गया है कि अधिष्ठान ( ब्रह्म ) की सत्ता के अतिरिक्त कल्पित सत्ता को वेद - वेदान्त शास्त्रों में अस्वीकार कर दिया गया है । इस प्रकार इस पूरे अध्याय में ब्रह्म की सर्वात्मकता का ही विस्तार से वर्णन मिलता है । २५ वें अध्याय में अश्वमेघीय अश्व की, उसके विभिन्न प्रतिपादित है, क्योंकि ब्रह्म ही इन रूपों में भासित होता है । प्राप्त करता है । यह सब कुछ ब्रह्मात्मक है, इस विषय की का " ब्रह्मार्पणम् " इत्यादि प्रसिद्ध अंगों की और उनसे तर्पणीय देवों की ब्रह्मात्मता देवताओं की इस आराधना से भी साधक ब्रह्मभाव को पुष्टि के लिये यहाँ दूसरे मन्त्र में और अन्यत्र भी गीता

श्लोक प्रमाण रूप से प्रदर्शित है । अगले मन्त्रों में भी विस्तार से यही विषय वर्णित

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( १७ ) है । सातवें मन्त्र में छान्दोग्य का " तज्जलान् " यह वचन इसी प्रसंग में उद्धृत है । ८ वें मन्त्र में बताया गया है कि द्रव्य और देवताओं का वैदिक वाङ्मय में कितना विस्तार है, अश्वमेघ याग के अध्ययन से इसको जाना जा सकताहै । अनेक मन्त्रों में यहाँ देवताओं की स्तुति भी की गई है । १५ वें मन्त्र में ऋग्वेद के प्रमाण से मनुष्य और देवताओं के सख्यभाव पर प्रकाश डाला गया है । इसी प्रकार १ ९ वें मन्त्र में ऋग्वेद के " एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति " इस प्रसिद्ध मन्त्र के आधार पर ही इन्द्र, मित्र, पूषा आदि देवों में एक ही परमात्मा की स्थिति प्रतिपादित है । २१ वें मन्त्र में भागवत के प्रमाण से भगवान् के अनुग्रह की महिमा गाई गई है । २४ वें मन्त्र में, अन्यत्र भी अनेक स्थलों पर वर्णित इस सिद्धान्तको पुनः पुष्ट किया गया है कि जैसे शालिग्राम की पूजा करते समय उसमें विष्णु को भावना की जाती है, उसी प्रकार अश्वमेधीय अश्त्र में भी प्रजापति की भावना करनी चाहिये । ३० वें मन्त्र में भी इसी विषय को दुहराया गया | २७ वें मन्त्र में अश्वमेध आदि यागों के अनुष्ठान से भी देवयान मार्ग की प्राप्ति बताई गई है । ३१ वें मन्त्र में वर्णित है कि केवल अश्व की ही नहीं, उसके उपयोग में आने वाले रज्जु, तृण आदि की भी उपासना प्रजापति के साथ अभेद बुद्धि रख कर की जाती है । अगले मन्त्र में यह आशा प्रकट की गई हैं कि अश्व के समान ही हमारी भी सारी प्रवृत्तियां भगवान् की प्रीति के लिये समर्पित हो जाये | ३४ वें मन्त्र में यह स्पष्ट किया गया है कि यह सब वैदिक fafe के निदेश और मन्त्र के बल से सम्भव हो पाता है । अगले मन्त्रों में भगवद्गीता, ऐतरेय ब्राह्मण आदि के प्रमाण बताया गया है कि भक्तिभावपूर्वक समर्पित पत्र, पुष्प आदि परमात्मा के तृतिकारक होते हैं और सत्संकल्प से सारे विघ्नों का अपसारण अपने आप हो जाता है । ४२ वें मन्त्र में व्यष्टि और समष्टि चेतन्य की चर्चा है और अगले मन्त्र में कहा गया है कि अज्ञान और लोभ से वर्जित व्यक्ति कर्मोपासना से भी अविद्या का नाश कर अमृतत्व को प्राप्त कर सकता है । ४३३ मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय यह है कि व्यक्ति इस क्षणभंगुर शरीर को भी अमृतत्व की प्राप्ति का साधन बना सकता है । इसकी पुष्टि में यहाँ भागवत महापुराण का प्रमाण दिया गया है । ४५ मन्त्र में यह बताया गया है कि प्रजापतिस्वरूप होने से अश्वमेधीय अश्व भी यजमान की कामनाओं को पूरा कर सकता है । २६ अध्याय के प्रथम मन्त्र में भगवद्गीता में वर्णित आठ प्रकृतियों की चर्चा सात संसद् और आठवीं भूतसाधन के रूप में की गई है । ५ वें मन्त्र में निर्दिष्ट है कि परमेश्वर की पूजा के उपकरण जिन वस्तुओं से बनते हैं, वेद उन सबकी स्तुति करता है । पूजा के उपकरण ही नहीं, वैश्वानर परमात्मा के गरुड आदि वाहन भी छन्दोमय ( वेदस्वरूप ) माने जाते हैं । २२ वें मन्त्र में द्रविण पद से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही प्रकार का धन अभिप्रेत है | इनकी प्रवाहनित्यता का प्रतिपादन अगले मन्त्र में है । २४ वें मन्त्र में वर्णित है कि भक्त की प्रसन्नता को देख भगवान् भी प्रसन्न होते हैं । जैसे भक्तगण भगवान् को देखकर उनके सौदर्य रूपो अमृत का पान कर तृप्त हो जाते हैं, उसीतरह से भगवान् भी भक्तों के प्रेमरूपी अमृत का पान कर प्रसन्न होते हैं । अगले मन्त्र में इसी प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कहा गया है कि भक्त अन्ततः सबके एकमात्र आश्रयभूत भगवान् के प्रति अपना सर्वस्व ही नहीं, स्वयं अपने को भी समर्पित कर देता है । २७ वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में भगवान् राम की चर्चा की गई है । यहाँ बताया गया है कि वसिष्ठ आदि ऋषियों के समान देवगण भी भगवान् की माधुर्य भाव से उपासना करते हैं । आगे के मन्त्रों में भी भक्त और भगवान् की चर्चा है । ४ थे मन्त्र में क्रममुक्ति और कैवल्यमुक्ति की चर्चा है । १२ वें मन्त्र में बताया गया है कि प्रेम के बिना कर्म, ज्ञान और भक्तिमार्ग रूखे रह जाते हैं, इनको प्रेमरस से ही स्निग्ध किया जा सकता है । १४ वें मन्त्र में ज्ञान, ध्यान रूपी यज्ञ के अनुष्ठान से, प्रज्ञान अथवा भक्ति के बल से भगवान् की प्राप्ति की बात कही गई है । १६ वें मन्त्र में भागवत को उद्धृत कर बताया गया है कि मृषावाद से वाणी की, मृषागति से मन को और असत्पथ से इन्द्रियों की निवृत्ति भगवान् के " अनुग्रह से ही हो सकती है । कुत्ते और सियार आदि के भक्ष्य इस शरीर से अहन्ता ममता की निवृत्ति, देवमाया का ३

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( १८ ) अतितरण आदि सब कार्य विवेक ज्ञान के रहते हुए भी तब तक पूरे नहीं हो सकते, जब तक कि भगवान् का अनुग्रह नहीं प्राप्त हो जाता । १ ९ में मन्त्र में इडा को इन्द्रियों की, सरस्वती को ज्ञान - विज्ञान की और भारती को वाणी की अधिष्ठात्री देवी बताया गया है । २० वें मन्त्र में रत्न, सुवर्ण आदि को बाह्य धन तथा ज्ञान, वैराग्य आदि को आन्तर धन कहा है । २३ वें मन्त्र में मुण्डक श्रुति के प्रमाण से आत्मज्ञ की महिमा वर्णित है और महिम्नस्तोत्र के प्रमाण से बताया गया है कि यज्ञ आदि कर्मों के अनुष्ठाता को कर्मफल प्राप्त कराने की सारी जिम्मेदारी भगवान् स्वयं अपने ऊपर ले लेते हैं । २५ वें मन्त्र में शतपथ की आख्यायिका के आधार पर सृष्टि की प्रक्रिया प्रतिपादित है । यहाँ देवसृष्टि का लोक से सम्बन्ध बताया गया है, अतः पृथ्वीलोक में स्थित विद्वान् मनुष्यों को ही देवता के नाम से सम्बोधित करने वाले आर्यसमाजियों की इस विसंगति पर इससे अच्छा प्रकाश पड़ता है । यहाँ संवत्सर शब्द की व्युत्पत्ति भी देखने योग्य है । २७ वें मन्त्र में बताया गया है कि अर्थशास्त्र में धर्मानुबन्ध और अर्थानुबन्ध की प्रक्रिया से प्राप्त धन को ही आदर दिया गया है, अधर्मानुबन्ध, अनर्थानुबन्ध अथवा अननुबन्ध धन को नहीं । ३१ वें मन्त्र में कहा गया है कि आध्यात्मिक अर्थ करते समय तन्त्रों में आये पदों का भगवदर्थ में विनियोजन सरलता से किया जा सकता है । सहस्र पद अनन्त का बोधक है, इस विषय को तो अनेक स्थलों पर बताया गया है । ४२ वें मन्त्र में परमात्मस्वरूप अग्नि को ' षड्विध भावविकार से वर्जित बताया गया है । अगले मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना की गई है कि वह हमें अविद्या के प्रपंच से मुक्त कर अपने स्वरूप का साक्षात्कार कराते हुए हमारी रक्षा करे । ४४ वें मन्त्र में भी भक्तगण इसी प्रकार की प्रार्थना करते हैं । अन्तिम मन्त्र ( २७/४५ ) में सुपर्णाकार चिति में प्रतिष्ठित परमात्मस्वरूप अग्नि की पंचसंवत्सरात्मक काल के रूप में स्तुति की गई है । २८ वें अध्याय के तीसरे मन्त्र में भक्तों के द्वारा प्रेम से लबालब भरी भक्ति और श्रद्धा से दिये गये पत्र - पुष्प आदि को भी भगवान् ग्रहण करते हैं, इस विषय को पुनः गीता के वचन को उद्धृत कर कहा गया है । ९ वें मन्त्र में बताया गया है कि यह भगवान् ही मत्स्य, कूर्म, वराह, ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि का रूप धारण कर रावण जैसे कटकों का शोधन करते हैं । कामधेनु, चिन्तामणि, कल्पवृक्ष, कौस्तुभ आदि बाह्य धन और ज्ञान, बैराग्य आदि आन्तर धन से वस्तुतः वही सम्पन्न है । उसी के प्रसाद से व्यक्ति दोनों प्रकार से धन के सम्पन्न होता है । ३१ वें मन्त्र की संगति अधिष्ठान ब्रह्म के साथ विद्यमान तीन महाशक्तियों से की गई है और इन तीन शक्तियों का उल्लेख महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में ४१ वें मन्त्र में किया गया है । ज्ञान और क्रियाशक्ति भोग और अपवर्ग की दात्री है, इस विषय का उल्लेख ३८ वें और ४० वें मन्त्र में मिलता है । २ ९वें अध्याय के पहले मन्त्र में तैत्तिरीय और ईशावास्य उपनिषदों के प्रमाण से ब्रह्म के सर्वसाक्षी सर्वान्तर्यामी सोपाधिक स्वरूप को चर्चा है । चौथे मन्त्र में अदिति शब्द का अर्थ अखण्डनीय, निर्गुण, निर्विशेष और सविशेष चिति-शक्ति किया गया है और यहाँ ललितासहस्रनाम का प्रमाण दिया गया है । ७ वें मन्त्र में दिव्य दम्पती के रूप में सीताराम, रुक्मिणीकृष्ण, सत्त्वक्षेत्रज्ञ, बुद्धि - जीवात्मा अथवा पुरंजन पुरंजनी का ग्रहण किया गया है । अश्वमेधीय प्रकरण में अश्व की प्रजापति के रूप में अथवा संवत्सरात्मक काल के रूप में उपासना की जाती है, यह विषय तो यहाँ अनेक बार उल्लिखित है, किन्तु २२ वें मन्त्र में प्रजापतिरूप अश्व की कूर्म और ब्रह्माण्डपुराण एवं मनुस्मृति के प्रमाण से अग्न्यादिरूपता भी वर्णित है । २३ वें मन्त्र के आध्यात्मिक अर्थ में बताया गया है कि अन्य सारे पशु इस अश्वमेधीय १. षड् भावविकारा भवन्तीति वार्ष्यायणिः -- जायते, अस्ति, विपरिणमते, वर्धते, अपक्षीयते, विनश्यतीति " ( निरु ० १।३ ) | २. श्रीमद्भागवत चतुर्थं स्कन्ध के २५ - २८ अध्यायों में वर्णित पुरंजनोपाख्यान देखिये ।

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( १ ९ ) अव के ही अंगभूत हैं । इसकी महिमा अपार है । २४ वें मन्त्र में उपासना से समुच्चित कर्म का माहात्म्य दिखाया गया है | २ ९वें मन्त्र में ईशावास्य श्रुति के प्रमाण पर अध्यारोप और अपवाद न्याय से ब्रह्म के साक्षात्कार की चर्चा है । ३१ वें मन्त्र में प्रतिपादित है कि विद्या और अविद्या, कर्म और उपासना का समन्वित रूप ही योनि है । यही सत्त्व, रज और तम नामक तीन गुणों की साम्यावस्था रूप प्रकृति है और यही त्रिकोणा भगवती त्रिपुरसुन्दरी है । ३३ वें मन्त्र में भारती, इडा और सरस्वती को इच्छा, ज्ञान और क्रिया रूप तीन शक्तियों का प्रतिनिधि माना गया है । ३८ मन्त्र में प्रतिपादित है कि चण्डीकवच, नारायणकवच और ब्रह्मसाक्षात्कार लक्षण कवच को धारण कर साधक काम, क्रोध, लोभ, दंभ, मोह आदि से अविजित रहता है । ३ ९ -४० मन्त्रों में मुण्डक और कठ श्रुति को उद्धृत कर इन शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की विधि प्रदर्शित है । ४१ वें मन्त्र में उपनिषदों और पुराणों के प्रमाण से काशी में मृत्यु होने पर मुक्ति की बात बताई गई है । इसी प्रकार ४२ मन्त्र में प्रश्नोपनिषद् के प्रमाण से समष्टि जीवस्वरूप हिरण्यगर्भ की अधिष्ठानभूत ब्रह्म में अध्यस्तता उल्लिखित 1 अगले मन्त्र में कठोपनिषद् के " आत्मानं रथिनं विद्धि " इस वचन की व्याख्या की गई है और ४४ वें मन्त्र में गीता के प्रमाण से बताया गया है कि विषयविषयक प्राण तो भगवद्विषयक वासना से क्षीण हो जाते हैं, किन्तु भगवद्विषयक प्राण स्वयं कभी नष्ट नहीं होते । वे अपने विपक्षी का आदि शत्रुओं का ही नाश करते हैं । ४५ वें मन्त्र में कहा गया है कि मनुष्य की देह का रथवाहण यह पहला नाम है और दूसरा नाम हविर्धान है । नारायणकवच, शिवकवच, चण्डीकवच और नाना प्रकार के न्यासों से इसकी रक्षा को जाती है । ४८ वें मन्त्र में जीवन्मुक्ति की प्राप्ति की प्रक्रिया दिखाई गई है और अगले मन्त्र में प्रत्यक् चिति को ही राजराजेश्वरी भगवती महात्रिपुरसुन्दरी कहा गया है । अन्तिम तीन मन्त्रों ( २ ९ ५८-६० ) में पुनः परमेश्वर का सर्वात्म्य वर्णित है । ३० वें अध्याय के पहले मन्त्र में अतिष्ठापद का उल्लेख है । इस अध्याय के भी अनेक मन्त्रों में ब्रह्म की सर्वात्मकता प्रतिपादित है । ८ वें मन्त्र में कहा गया है कि देवताबोधक विविध पदों के विविध अर्थ अवश्य हो सकते हैं, किन्तु उन सबमें एक ब्रह्म का स्वरूप ही सर्वत्र झलकता है । यहाँ प्रसिद्धि की प्रधानता को दिखाने लिये परमात्मपरक अर्थ की विशेष व्याख्या नहीं की गई है । १० वें मन्त्र में सभी द्रव्यों और देवताओं की आनन्दरसात्मकता निर्दिष्ट है । १३ वें मन्त्र में पुरुष - पशुओं की ब्रह्मात्मकता बोधित है । १६ वें मन्त्र में निर्दिष्ट है कि आधिदैविक और आधिभौतिक सारे पदार्थं आध्यात्मिक ब्रह्म के ही स्वरूप हैं । अतः राग और द्वेष से मुक्त होकर साधक को सदा सर्वत्र ब्रह्म का ही अनुसन्धान करना चाहिये । इस अध्याय के अन्तिम २२ वें मन्त्र में भगवद्गीता और स्वयं इस संहिता के प्रमाण से पशु, पुरोडाश, ब्रह्मा आदि ऋत्विकगण और यजन आदि के फल के रूप में भी सर्वत्र ब्रह्मरूपता की भावना करने का विधान है । स्वामी दयानन्द के भाष्य की समालोचना वेदार्थपारिजातकार ने यहां स्वामी दयानन्द के भाष्य का पूरी तरह से खण्डन किया है । हमने स्वामी दयानन्द के भाष्य की सामान्य त्रुटियों का उल्लेख विस्तार से ११-१५ अध्यायों के भाष्यनिष्कर्ष ( पृ ० २३ - २५ ) में कर दिया है | प्रसंगवश ' देव ' आदि पदों के विषय में यहाँ भी कुछ इंगित है । पहले ही मन्त्र २१1१ ) में वरुण पद का अर्थ विद्वान् पुरुष किया है । तीसरे मन्त्र में किये गये ' अव ' पद की निषेधार्थकता में कोई प्रमाण नहीं दिया गया । अग्नि, वरुण आदि पदों के मुख्य अर्थ को छोड़ देने में भी कोई प्रमाण नहीं है । ५ वें मन्त्र में पृथ्वी की सत्य पत्नी के साथ तुला असंगत है । पृथिवी तो षड्विध भावविकारों से सम्पृक्त है, अतः उसकी अजरता भी नहीं मानी जा सकती । ७ मन्त्र का अर्थ किया गया है - हे मनुष्यों! मैं सौ पतवार वाली नाव पर चढ़ता हूँ । यहाँ वक्ता कौन है? यह ' स्पष्ट निर्दिष्ट नहीं है । जीव के वक्ता होने पर वेद की पौरुषेयता का दोष आवेगा और ईश्वर को नाव पर चढ़ कर नदी,