वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1–10

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1–10

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वाजसनेयि- माध्यन्दिन शुक्ल यजुर्वेद - संहिता वेदार्थ पारिजातारव्य विभूषिता चत्वारिंशोऽध्यायः ईशावास्योपनिषत् करपात्र भाष्यम् प्रणेतारः अनन्त श्रीविभूषिताः स्वामि करपात्र महाराजाः प्रकाशकः श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थानम् कलकत्ता • वृन्दावनम्

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* श्रीहरिः श्रीमद्वाजसनेयि- माध्यन्दिन शुक्ल यजुर्वेद - संहिता वेदार्थपारिजाताख्यभाष्य विभूषिता चत्वारिंशोऽध्यायः ईशावास्योपनिषत् करपात्र - भाष्यम् प्रणेतारः अनन्त श्री विभूषिताः स्वामिकरपात्र महाराजाः भाषानुवादकः परमहंस श्री स्वामिवामदेव महाराजाः प्रकाशक: श्रीराधाकृष्णधानुका प्रकाशन संस्थानम् कलकत्ता # वृन्दावनम् श्रीवृन्दावनम् प्रथम संस्करणम् श्रीसंवत् २०४४

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प्रकाशकः श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थानम् कलकत्ता * वृन्दावनम् मूल्यं तीस रुपये अस्य ग्रन्थस्य सर्वेऽधिकाराः राजकीय नियमानुसारेण सुरक्षिता: पुस्तकप्राप्तिस्थानम् १. राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान C / o मैसूर पेट्रोकैमिकल्स लिमिटेड ral ११३, पार्कस्ट्रीट, सात तल्ला Pada कलकत्ता - 700216 २. राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान ब्रह्मकुटीर, डी ० २५.१८ नारदघाट वाराणसी ( उ ० प्र ० ) राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान धर्मसङ्घ विद्यालय रमणरेती, वृन्दावन, मथुरा ( उ ० प्र ० ) ४. राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान मुद्रक C / o. मैसूर पेट्रो केमिकल लिमिटेड श्रीहरिनाम प्रेस ४०१. ४०४ राहेजा सेण्टर श्रीहरिनामपथ, वृन्दावन २१४, नारीमन पोइन्ट, बम्बई ४०००२१ २८११२१ दूरभाष ४१५

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VIJASANEYI - MIDHYANDIN SHUKLA - YAJURVEDA - SAMHITI WITH THE VEDIR THA - PIRIJITA-' KARAPATRA.BHISYA 40 ISI VISYOPANISAD ISA BY ANANTA SHRI SWIMI KARAPITRIJI MAIIRIJA Hindi Translation By PARAMHANS SHRI VIMADEVA SWIMI JI Publisher SHRI RADHAKRISHNA DHANUKA PRAKASHAN SAMSTHANA Calcutta Vrindavan All Rights reserved by the Publisher FIRST EDITION Shri Vrindavan Chaitra Navaratri 2044 March 1987

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श्रीहरिः भूमिका न्त श्रीविभूषित जगद्गुरु - शङ्कराचार्य - पूर्वाम्नाय गोवर्द्धनमठ! पीठाधीश्वर स्वामी श्रीनिरञ्जनदेवतीर्थ महाराज

अत्यद्भुतमिदं भाष्यं करपात्रविनिर्मितम् ।

ईशावास्योपनिषदः श्रुतीनां हृदयं स्फुटम् ॥१ ॥

यथा प्रकाशितन्त्वत्र न तथान्यत्र दृश्यते ।

भगवत्पादभाष्येऽपि केवलं ज्ञाननिष्ठता ॥२ ॥

इति भ्रमो भवेन्नूनं केषाञ्चिदुविदुषां हृदि ।

परमत्र तथा नैव भ्रमस्यावसरो भवेत् ॥ ३ ॥

यतः कर्मपरामन्त्राः कर्मार्था एव सूचिताः ।

उपासना पराणाञ्च मन्त्राणामपि तत्पराः ॥४ ॥

अर्थाः स्पष्टं विनिर्दिष्टा युक्तिप्रौढिश्च दर्शिता ।

एवं ज्ञानपरामन्त्रा ज्ञानार्था एव दर्शिताः ॥ ५ ॥

भक्तिवादिषु भाष्येषु कर्मज्ञानपरा अपि ।

भक्ति भक्त्याग्रहेणैव भक्तिनिष्ठाः प्रदर्शिताः ॥६ ॥

परमस्मत्स्वामिपादैस्तथा नैवाग्रहः कृतः ।

अर्थो मन्त्रस्य यः किन्तु हार्दः स्वारसिकोऽपि च ॥७ ॥

स एव युक्तितर्काभ्यां प्रमाणैश्च प्रकाशितः ।

यथा मन्त्राः स्वरसतो भगवत्पादपारिताः ॥ ८ ॥

स्वामिपादैरपि तथा व्याख्याता मन्त्रवर्णकाः ।

आद्य शङ्करपादेभ्यः पश्चादेतादृशो न हि ॥ ६ ॥

विद्वान् कश्चित्समायातो येनैतादृशमीरितम् ।

भाष्यं स्पष्टार्थसंयुक्तं हृदयग्राहि सुन्दरम् ॥ १० ॥

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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशा वास्योपनिषत्

मर्मस्पृक् युक्तितर्काणां सन्निवेशो sa यादृशः ।

तादृशो नैव कुत्रापि मिलेदिति मतम्मम ॥११ ॥

सायणाचार्यवर्याणामुब्वटस्य च यन्मतम् ।

महीधरस्य यच्चापि तदध्यत्र समर्थितम् ॥१२ ॥

संन्यासस्योरकारे ब्राह्मणस्यैव सर्वथा ।

अधिकारो न चान्येषामिति यत् प्रौढयुक्तिभिः ॥१३॥६

सुसाधितं स्वामिपादैस्तदत्यन्तं हि दुर्लभम् ।

अतो भाव्यमिदं प्राज्ञैर्ज्ञेयं ध्येयञ्च यत्नतः ॥ १४ ॥

नम्रं सर्वेषां विदुषां पुरः । निवेदनमिदं नासूया चात्रकर्तव्या फाल्गुन शु ० ३,२०४३ बहादुरगढ़ ( हरियाणा ) ध्येतव्यन्तु भक्तितः ॥ १५ ॥

श्रीहरिः भूमिका [ ६ श्रीनिरञ्जनदेवतीर्थः पूज्य स्वामी श्रीकरपात्री जी द्वारा विरचित विलक्षण है । ' ईशावास्योपनिषद् ' की श्रुतियों यह भाष्य बड़ा इसमें प्रकाशित किया गया है, वैसा और कहीं का दृष्टि हृदय में नहीं जैसा स्पष्ट भगवत्पाद ( श्रीशङ्कराचार्य ) के भाष्य में भी कुछ लोगों के मन आता में । भ्रम हो सकता है कि इसमें केवल ज्ञान का ही निरूपण यह भाष्य में किसी ऐसे भ्रम के अंश का भी अवकाश है; किन्तु इस इसमें कर्म - परक- मन्त्रों को कर्मार्थक हो बतलाया नहीं है, क्योंकि परक तथा ज्ञानपरक मन्त्रों के अर्थ स्पष्टरूप से गया उपासना है और उपासना-ज्ञानपरक ही दिखलाया गया है । इस ' वेदार्थ पारिजात परक तथा में युक्ति की उत्कृष्टता भी दिखलायी गयी है । भक्तिवादी ' नामक भाष्यों भाष्यमें

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७ ] वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशा वास्योपनिषत् आग्रह केवल भक्ति पर ही रहा तथा लक्षणावृत्ति का आश्रय लेकर भी कर्म और ज्ञानपरक मंत्रों की निष्ठा भक्ति में ही दिखलायी गयी; किन्तु हमारे पूज्य श्रीस्वामीजी महाराज ने ऐसा कोई आग्रह नहीं किया है । मन्त्रों के जो हार्दिक स्वारसिक अर्थ हैं, उन्हीं को युक्ति, तर्क और प्रमाणों के द्वारा प्रदर्शित किया है । भगवान् शंकराचार्य ने मन्त्रों का जिस तरह स्वारसिक व्याख्यान किया है, पूज्य श्रीस्वामीजी महाराज ने भी मन्त्राक्षरों की उसी प्रकार व्याख्या की है । भगवत्पाद शंकराचार्य जी के अनन्तर ऐसा कोई विद्वान् नहीं आया, जिसने इस प्रकार की व्याख्या की हो । यह भाष्य स्पष्ट, हृदयग्राही और सुन्दर है । युक्ति और तर्कों का जैसा इसमें मर्मस्पर्शी प्रयोग किया गया है, ऐसा और कहीं मिलना सुलभ नहीं - यह मेरा मत है । श्रीसायणाचार्यं महोदय का, उव्वट का और महीधर का जो मत है, उसका भी इसमें समर्थन सहित दिग्दर्शन कराया गया है । ' सन्यासाश्रम को स्वीकार करने में केवल ब्राह्मण का ही अधिकार है, दूसरों का नहीं ' श्रीस्वामीजी महाराज ने प्रौढ़ - युक्तियों द्वारा भलीभाँति इस तथ्य को जिस प्रकार सिद्ध किया है, वैसा दूसरी जगह सुगमता से नहीं मिल सकता है । विद्वानों से मेरा नम्र निवेदन है कि इस भाष्य का यत्नपूर्वक अवगाहन और अनुशीलन करना चाहिए । इसमें असूया ( गुणों में दोष खोजना ) न करके भक्तिपूर्वक इसका अध्ययन करना चाहिये । - श्रीनिरञ्जनदेवतीर्थ

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Abstract of Bhumika, Written by Jagadguru Shankaracharyapad Goverdhan Matha Puri Peethadhishwar Swami Shri Niranjan Devji Tirtha Maharaj. PREFACE This thoughtful critical study of Ishavasyopanishada by Swami Karpatri ji is unique. The clear view of the thought of Ishavasyopanishada as presented here is not found elsewhere. The critical study by God - gifted Shankaracharya may breed a suspicion in the heart of some people that it comprises only the interpretations of the knowledge ( jnan ). But there is no scope for even the slightest kind of such a doubt about this critical study because here those verses which aim at the Actions ( leading to the fulfilment of desires ) have been shown worthy of such Actions while the verses which aim at the worship ( of the Lord ) have been interpretted as worthy of such a worship and the supremacy of these devices has also been laid bear. In a similar manner those verses which aim at the knowledge ( of the Lord ) have been shown worthy of knowledge. In the various other interpretations of these verses by scholars having faith in the Bhakti cult, there has always been emphasis on Bhakti and so with the help of theories of Associationism even the verses aiming at the actions and the kmowledge have been interpretted as having faith in the Bhakti cult. But our Respected Swamiji, has not laid any such emphasis anywhere. Only the real unbiased meanings of the various verses

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& ] वेदार्थ पारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशा वास्योपनिषत् have been shown here with the help of logical approach and convincing proofs. The way as adopted by Bhagwan Shankaracharya in the interpretations of various verses, has also been followed here by our Respected Swamiji Maharaj in the critical interpretations and elucidation of verses. After the God - gifted Adi Shankaracharya, no eminent scholar who has attempted such a kind of critical study, has appeared so for on the scene. This study is full of unprecedented clarity and beauty and is heart searching. The use of logical and rational approach as found here, will not be easily found elsewhere. - This is my opinion. The view points of Saynacharya, Uvvata and Mahidhar have also been elaborately discussed here. The fact that only Brahmins exclusively have the right to adopt ' Sanyas Ashram ', has been substantiated with an unparalleled logical force and manner. The scholars, therefore, are advised to go through this treatise thoughtfully and meditatively. It is my humble request to all the learned people and readers that they should study this work not with an eye to find fault but with devotion and love. *

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श्रीहरिः श्रीकरपात्राष्टकम् ( डा ० श्रीशशिधर शर्मा महामहोपाध्यायः, सप्तविषयाचार्यः ) केचिद् भजन्ति विबुधा हरिमीशितार-ञ्चाऽन्ये हरं भवनिदाघहरं श्रयन्ति । धर्मातखिन्नमनसां प्रत्यक्षितं हरिहराद्वयमद्वयन्नः ॥१ ॥

सद्राजनीतिनिपुणः किमु भगवद्गुणगानधन्यो वाचस्पतिर्निखिलशास्त्रविचक्षणो वा । आहो शुको नु यस्मिन्नितीव समशायि यतिः स वन्द्यः ॥ २ ॥

यस्यावसन्नव रसा रसने सरस्व -त्याभान्ति लेखतनवोऽतनुकोति लेखाः । चेतस्य भूत्सरसिजोदरसौकुमार्य स्मार्यो न कस्य स वशी शयभाजनार्यः ॥ ३ ॥

वन्द्यः स योऽकृतकृती सुकृतार्थ संस्था: रामायणे श्रुतिषु चातत वाक्प्रवाहान् । नैष्कर्म्य मूर्ध्वमधिताधिधरं तथापि कर्मेतराऽकृततरं व्यधिताऽऽप्रयाणम् ॥४ ॥

यः सत्कविगुरुगुरु ' धमङ्गलात्मा तीव्रप्रतापतपनश्च सतां च सोमः । धर्मद्विषां शनिरथो मदिनाञ्च राहुः कलेर्जयति दण्डिवरः स कोऽपि ॥ ५ ॥

कारागमैः शिरसि दण्डनिपातघात रप्येजनं न जनितं किल यस्य जातु । दीप: सनातन सृतेरपि गीतेर्यो वार्येतरो हृदि विभाति स नः सदाऽऽर्यः ॥ ६ ॥