वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 11–20
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 11–20
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११ ] वेदार्थपारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशा वास्योपनिषत् तिष्ठेत् प्रणष्टकुहकः सुपथे नरौघः पारेऽम्बुधि जनगिरा प्रसरं प्रयातु । गावश्चरन्तु परितोऽस्तभया घटोध्न्यः स्वप्नस्तवेति यतिराट्! फलिता कदा नु! ॥ ७ ॥
यो दण्डिवर्थोऽतियतीन्द्रचर्यः श्रताऽध्वनोऽभूद्भुवनेषु धुर्यः । श्रेयो भृतां शश्वदपीह चार्यो धार्यः स चित्ते करपात्र आर्यः ॥ ८ ॥
श्रीहरिः करपात्राष्टकम् कुछ बुद्धिमान् जन भगवान् हरि ( विष्णु ) का भजन करते हैं और कुछ दूसरे संसार तापाहारी हर ( शङ्कर ) की सेवा करते हैं । ( किन्तु ) धर्म की ग्लानि से खिन्न मनवाले हम लोगों की उपासना का पात्र तो हरि और हर का वह अनुपम अद्वैत है, जिसे हमने अपनी आँखों से देखा है । ( श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज के संन्यास का नाम श्रीहरिहरानन्द सरस्वती है; फलतः वे श्रीहरिहरात्मक हैं । ) ॥ १ ॥
" क्या उदात्त - लोककल्याणकारिणी -- राजनीति में प्रवीण विष्णुगुप्त - आचार्य चाणक्य हैं, या समस्त शास्त्रों में दक्ष देवगुरु बृहस्पति ( किम्वा सर्वतन्त्र स्वतन्त्र वाचस्पति मिश्र ) हैं, या फिर श्रीप्रभु का गुणगान करने से धन्य हुए शुकदेव ही हैं? " जिनके सम्बन्ध में लोग इस प्रकार से ( विविध ) सन्देह किया करते थे – वे स्वामी करपात्री जी वन्दना के पात्र हैं ॥ २ ॥
" जिनकी जिह्वा पर नवरसमयी सरस्वती निवास करती थी, लेखों के रूप में जिनकी महान् यशोराशि की लेखाएँ आज भी शोभा पा रही हैं, ( और ) जिनके हृदय में कमल के मध्यभाग - सरीखी मृदुलता थी, वे सर्वभूतहृदय संयमी ( वशी ) स्वामी करपात्रीजी किसके स्मरणीय नहीं हैं? ॥३ ॥
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशा वास्योपनिषत् [ १२ वन्दनीय हैं वे स्वामी करपात्रीजी महाराज जिन मनीषी ने अनेकानेक धर्मसंस्थाओं की स्थापना की, जिन्होंने रामायण पर एवं वेदों पर सरस्वती धाराएँ प्रवाहित कीं, जिन्होंने भूमण्डल पर नैष्कर्म्य अर्थात् ज्ञानमार्ग की सर्वोच्च सिद्धान्तरूप में प्रतिष्ठापना की, किन्तु जो प्रयाणकाल तक दूसरों द्वारा सुतरां न किये गये कर्म का सम्पादन करते रहे || ४ || जो अनवद्य विद्यावान् ( शुक्र ) थे, जो गुरुओं के भी गुरु ( बृहस्पति ) थे, जो विद्वानों के कल्याणरूप ( मंगलमय ) थे, प्रचण्ड प्रताप में जो सूर्य थे और सज्जनों के लिये सोम ( चन्द्रमा ) थे, धर्म-द्वेषियों के लिये जो शनि थे; अहङ्कारियों के लिये राहु और कलियुग लिये केतु ( विजय- वैजयन्ती ) थे, वे विलक्षण यतिराज स्वामी करपात्री जी जयशील हैं ॥ ५ ॥
गोरक्षार्थ जेल यात्राओं से यहाँ तक कि सिर पर लाठी पड़ने से लगी चोटों से भी जो अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए, जो सनातन धर्ममार्ग के दीपक थे और जिनको जीतना देवगुरु बृहस्पति के लिए भी कठिन था, वे स्वामी ( करपात्री ) जी महाराज हमारे हृदय में सदा विराजमान हैं || ६ || " लोग छल- पाप छोड़कर सन्मार्ग पर आरूढ़ रहें, हिन्दी का -प्रसार समुद्रपार विदेशों में भी हो, घड़ों के सदृश थनोंवाली गाएँ ( हत्या के ) भय से मुक्त होकर चारों ओर विचरण करें " - यतिराज! आपका यह सपना भला कब फलीभूत होगा? ॥७ ॥
जो दण्ड सन्यासियों के शिरोमणि थे । बड़े - बड़े यतिराज भी जिनकी जीवनचर्या को जीवन में चरितार्थ ( उतार कर जिनकी तुलना या समानता ) नहीं कर सकते, जो देश - विदेश में श्रुतिमार्ग के एकमात्र रक्षक थे और जो यहाँ श्रेयभाजन और श्रेयप्राप्त सुजनों के स्वामी थे - वे श्लाध्य श्रीकरपात्री जी महाराज हमारे हृदय ( सिंहासन ) में धारणीय हैं || ८ ||
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TK Shares परब्रह्मस्वरूप धर्मसम्राट पूज्यपाद स्वामी श्री करपात्री जी महाराज
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SHREE KARAPATRASTAKAM 1 ) Some wise men worship Hari ( Vishnu ) while others pray to Hara ( Shiva ) who relieves the sufferings that comprise the world. However, for us, aggrieved on account of the decline of Dharma, the peerless pair of Hari and Hara, that we visualise as One, has always been worthy of our devotion. ( 2 ) Worthy of worship was this Sage about whom doubts, such as these used to arise; ' Is he Vishnu Gupta ( Chanakya) adept in the science of polity, or is he the Jupiter ( Vachaspati ) well versed in all the scriptures, or is he Shukdeva, the blessed singer of the glory of the Almighty. ( 3 ) Who would not venerate Self - Controlled Swami Karpatriji whose tongue was the seat of Sarswati, the personified goddess of Nine Rasas & Learning, whose writings full of novel thoughts still shine as the symbols of his vast fame and whose heart was as tender as the petals of the lotus flowers. ( 4 ) Worthy of adoration is learned Karpatri ji who founded
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वेदार्थपारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ I a number of religious institutions and who propounded num. erous schools of philosophical thoughts relating to the Ramayana and the Vedas and established the supremacy of the Monastic philosophy having faith in the knowledge ( jan ) and not the Actions ( Karma ) as the key to salvation and who upto the last breath of his life kept busy in producing unique works. ( 5 ) Victory to the great Dandi Swami Karpatri ji who was a versatile scholar ( Venus ), godly teacher of teachers Jupiter, holy guardian of the learned ( Mars ), Sun among tha brilliants, solace giving Moon for the gentle, terrible saturn for the enemies of righteousness, horrible Rahu for the haughty and fearful ketu for the disruptive forces. ( 6 ) Frequent imprisonments ( on account of participation in the movements for Saving the cow ) and even painful head injuries caused by the blows of the lathi - charge could not deviate this Sage from his path of Righteousness ( Dharma ) That Sage, Swami Karpatriji, who could not be overpowered even by the god Jupiter, is always alive in our hearts. ( 7 ) People may follow the course of Righteousness, giving up the path of vices, Hindi may spread beyond the limits of Oceans and Cow may roam about here and there freely with out the fear of slaughter ', O Kingly Ascetics, who knows when your this cherished wish be realised.
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ( 8 ) [ १५ In our hearts is always enshrined that Respected Swami Karpatri ji who as the Pole star of the Dandi Sanyasis and whose life could not be emulated even by the great sages and who alone on the surface of this earth was the Saviour of the path of holy Vedas and who was the fountain head of all those who attained the spiritual prosperity.
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श्रीहरिः दिग्दर्शन सम्पादकीय श्री स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती १. अवतरण ' ईशावास्योपनिषत् ' शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन तथा काण्व -संहिता का अन्तिम चालीसवाँ अध्याय है । इसका प्रारम्भ ' ईशा वास्यम् ' इस मन्त्र से होता है । जिस अद्वितीय प्रत्यगात्मतत्त्व के बोध से कर्म ‘ अकर्म ’. हो जाते हैं, उसीके प्रतिपादक होने से ' ईशा वास्यं ' आदि मन्त्र वेद के शिरोभागरूप ' वेदान्त ' या ' उपनिषत् ' कहे जाते हैं २. उद्बोधन काण्वशाखा की उपनिषत् पर भगवत्पाद शङ्कर और श्रीसायणाचार्य का भाष्य है, जबकि माध्यन्दिन पर श्रीउव्वट और श्रीमहीधर का । श्री श्रीसायण, उब्वट यदि आचार्यों ने और श्री आनन्दगिरि तथा श्रीशङ्करानन्दादि मनीषियों ने भगवत्पाद शङ्कर के दृष्टिकोण को ही अभिव्यक्त किया है । भजनीय तत्त्व श्रीभगवान् के लोकोत्तर स्वभाव, प्रभाव, रूप और स्वरूप के उत्कर्ष ख्यापन, भगव-दर्थ कर्मानुष्ठान और भगवद्भजन के पोषण में भक्तिप्रधान आचार्यों ईशादि मन्त्रों को विनियुक्त माना है । माध्यन्दिनशाखीय प्रस्तुत भाष्य ' वेदार्थ पारिजात ' परम प्रसन्न और गम्भीर है । इसके रचयिता हैं सर्वभूतहृदय धर्मसम्राट् पूज्यपाद
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१७ j वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशा वास्योपनिषत् श्रीस्वामी करपात्री जी महाराज । इसमें उन्होंने कर्म, उपासना और योगादि की यथास्थान उपयोगिता और अनुपम महत्ताका उदारता पूर्वक समर्थन तथा प्रतिपादन जहाँ दक्षता और सरसता पूर्वक किया है, वहाँ उपनिषदादि समस्त शास्त्रों का चरम तात्पर्य निर्विशेष प्रत्य-गात्मस्वरूप सच्चिदानन्दघन ब्रह्मात्मतत्त्व में ही सन्निहित सिद्ध किया प्रथम मन्त्र ' ईशा वास्यं ' के भाष्य में उन्होंने यह भाव दर्शाया है । कि सर्व शास्ता परमेष्वर सर्वप्राणियों का अन्तरात्मा है, वही सबका नियन्ता है | वह नियम्य से बाहर स्थित सामान्य राजा और कार्तवीर्या-जुन तुल्ययोगसिद्ध शासक सदृश तटस्थ नहीं है । वह सम्पूर्ण जगत् का विवर्ती उपादान है । मायाभूमि में प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सिद्ध दृष्टादृष्ट नाम - रूप - क्रियात्मक जगत् मिथ्या है; अतः आत्मसत्य के अनुबोध से ज्ञात रस्सी से कल्पित सर्पादि के समान आच्छादनीय-बाधनीय है । आत्मा क्योंकि ब्रह्मस्वरूप ही है; अतः सर्वेषणा के त्याग से अध्यास का निराकरणरूप आत्मपालन ही कर्तव्य है, न कि मिथ्या धन की अभिलाषा । ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि ' इस द्वितीय मन्त्र की व्याख्या के सन्दर्भ में ग्रन्थकार के द्वारा यह दर्शाया गया है कि जीवन की इच्छा विधेय नहीं है; वह तो रागतः प्राप्त है । रागी कर्म का और विरागी ज्ञानका अधिकारी है । आत्मा नरत्वादि सकल संसारधर्मों से रहित है । सौ वर्षों तक जीवित रहने की इच्छा वाले अनात्मज्ञ के कल्याण का एकमात्र यही उपाय है कि वह पाप से अलिप्त रहने के लिए यावज्जीवन स्ववर्णाश्रमोचित अग्निहोत्रादि कर्मों को करता रहे । ' असुर्या नाम ते लोका: ' इस तृतीय मन्त्र की व्याख्या में यह दर्शाया गया है कि देहेन्द्रियादि अशोभन अनात्मप्रपञ्च में रमण करने वाले भले ही देवादि देहों को ही प्राप्त क्यों न हों, पर आत्मतिर-स्कारकर्ता होने से वे आत्महत्यारे ही मान्य हैं । देवादिदेहरूप लोक भी आत्मरति, आत्मतृप्त आत्मसंतुष्टों को प्राप्त स्वप्रकाश आत्मलोक की अपेक्षा ' आसुर ' ही हैं । ' अनेजदेकं ' इस चतुर्थ मन्त्र के भाष्य में यह दर्शाया गया है कि ' आत्मा ' सदा एकरस अद्वितीयतत्त्व है । व्यापक और स्वप्रकाश आत्मा की महिमा से महिमान्वित होकर ही मन में सुदूर अवस्थित ब्रह्मादि
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १८ लोकों का स्फुरण होता है । सोपाधिक आत्मतत्त्व मन की गतिका भी अतिक्रमण करनेवाला है । स्वप्रकाश होने से आत्मा अधिदेव सहित इन्द्रियों का भी भास्य नहीं है । ज्ञान और कर्मका आधार, कार्य-करणात्मक स्थूल सूक्ष्म देहद्वय का उद्दीपक और रक्षक, हिरण्यगर्भ और सूत्रात्मक ' वायुतत्त्व ' निज उद्गम और विहरण - स्थान प्रकृति और अन्तरिक्ष सहित स्वतः सिद्ध आत्मा से ही सत्ता लाभ करने में समर्थ है । ' तदेजति ' इस पाँचवें मन्त्र के भाष्यानुसार यह तथ्य प्राप्त है कि आत्मतत्त्व अचल, निर्विकार है । अज्ञों की दृष्टि में वह चलता-सा है । अज्ञों को पहुंच उस तक नहीं, अतः वह दूर सा है । विज्ञों की दृष्टि में तो वह सर्वथा प्रत्यगात्मस्वरूप होकर स्फुरित होता है, अतः समीप ही है । इस नाम - रूप - क्रियात्मक जगत् में उसकी अनुगति है, वह इनका परमाश्रय ( अधिष्ठान ) होकर विद्यमान है, इसलिये भी समीप ही है । सम्पूर्ण जगत् के रूप में उसीकी स्फूर्ति है । जङ्गमरूप से चल और स्थावर - रूप से वह अचल है । नक्षत्रादिरूप से दूर और पृथ्वी आदि रूप से समीप है । अथवा ब्रह्मादि देवशिरोमणियों के रूप से वह चलता है - लीला से व्यवहार करता है और स्वरूप से अचल है । अन्तर्यामी और प्रत्यगात्मरूप से सबके अन्दर और विषयरूप से बाहर 1 ' यस्तु सर्वाणि भूतानि ' इस छठे मन्त्र के माध्यम से इस रहस्य को चित्रित किया गया है कि जो मुमुक्षु - संन्यासी ब्रह्म से अभिन्न आत्मा में अव्यक्त से लेकर स्थावरपर्यन्त ( शास्त्रगम्य और प्रत्यक्ष ) भूतों को अनुभव करता है - आत्मा से अतिरिक्त नहीं जानता तथा उन सर्वभूतों में कारणरूप से या आत्मरूप से स्वयं को अनुगत ( अनुस्यूत - प्रोत ) जानता है, वह तत्त्वदर्शी उस आत्मदर्शन के फलस्वरूप ' न विचिकित्सति ' -- संशय नहीं करता, ' न विजुगुप्सते ' - घृणा नहीं करता । ' यस्मिन् सर्वाणि भूतानि ' इस सप्तम मन्त्र में यह भाव अङ्कित किया गया है कि जिस कालविशेष अथवा आत्मा में ब्रह्मात्मतत्त्व की सर्वरूपता को जाननेवाले के लिये सर्वभूत अपने कल्पित स्वरूप को
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१६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् त्यागकर अकल्पित चिदानन्दस्वरूप आत्मा ही हो जाता है; उस काल अथवा आत्मा में असङ्ग अद्वितीय आत्मा के एकत्वदर्शी को कारण सहित संसारका निवारण हो जाने से शोक और मोह नहीं होता । ' स पर्यगात् ' इस अष्टम मन्त्र में यह तथ्य दर्शाया गया है कि ' ब्रह्म ' चिदानन्दस्वरूप निर्गुण - निर्विशेष- कर्तृत्वशून्य कर्तव्य विधायक-सर्वद्रष्टा सर्वज्ञ - सर्वरूप सर्वात्मा सर्वशक्ति और सर्वव्यापक है । एकत्व-विज्ञान से उसकी उपलब्धि होती है । वह स्वानुरूप दिव्यविग्रहयुक्त होने पर भी जीवोचित और भगवत्समसत्ताक स्थूल सूक्ष्म- कारणदेह रहित है । ' अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ' इस नवम ( काण्व ०१२ ) मन्त्र के भाष्य में इस रहस्य का प्रकाश किया गया है कि इसमें नैरात्म-वादी लोकायतिकों और विज्ञानवादियों के देह और विज्ञानरूप आत्मा का निराकरण किया गया है । अथवा ' असंभूति ' - अक्षर, अव्याकृत, कारणब्रह्मरूप अव्यक्त के उपासकों की निन्दा और उसकी अपेक्षा भी ' संभूति ' - व्यक्तोपासक की अधिक निन्दा दोनों की समुच्चित - उपासना अभिप्राय से की गयी है । ' अन्यदेवाहुः संभवात् ' इस दशम ( का ० १३ ) मन्त्र में इस तथ्य का प्रतिपादन किया गया है कि ' संभव ' - कार्यब्रह्म की उपासना का फल अणिमादि - ऐश्वर्योपलब्धिरूप अन्य ही है और ' असंभव ' - कारण-ब्रह्मरूप अव्याकृत की उपासना से प्राप्त होनेवाला प्रकृतिलयरूप फल अन्य ही है । ' सम्भूतिञ्च विनाशञ्च ' इस ग्यारहवें ( का ० १४ ) मन्त्र के भाष्य में इस सिद्धान्त का निरूपण किया गया है कि सम्पूर्ण जगत् के ' संभव ' ( अभिव्यक्ति ) का जो परमकारण है, वह परब्रह्म है । वही विविध शरीरों में शरीरी ( क्षेत्रज्ञ, क्षेत्री ) रूप से विद्यमान है । विनाशशील शरीर ' विनाश ' है । योगी ( आरुरुक्षु - योगारूढ होने की इच्छावाला ) दोनों तादात्म्यापन्न को विभागपूर्वक जानता है, अर्थात् देह भिन्न होने पर भी कर्मवशात् स्वयं को देह में अवस्थित जानता है । जो योगी ज्ञानोत्पत्ति की भावना से कर्मासक्ति, फलासक्ति और अहङ्कृति को तनु ( शिथिल ) कर घृत्युत्साहपूर्वक भगवदर्थ कर्मों ( निष्कामकर्मों ) को करता है, वह शुद्धिसम्पादन के योग से ' विनाश '