वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 261–270
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 261–270
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२२८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् सकता । इसी वास्ते कहा है कि अविद्या से मृत्यु अर्थात् स्वाभाविक-कामकर्मलक्षणमृत्यु को तैरकर विद्या से अमृतत्व को प्राप्त होता है । जैसे सुरापान आदि की निन्दा उनके त्याग के लिये की जाती है, वैसे यहाँ अविद्या की निन्दा उसके त्याग के लिये नहीं, किन्तु दोनों का एक साथ अनुष्ठान करने के लिये ही है । ठीक ऐसे ही छान्दोग्यो-पनिषत् में ' वैश्वानर विद्या ' में ५. १३ भी द्युलोकादिरूपमूर्धादि एक - एक अंग के उपासक की " मूर्धीतेव्यपतिष्यत् " इत्यादि से निन्दा की गई है, परन्तु वहीं एक - एक अङ्ग की उपासनाओं का फल भी बतलाया गया है । ये दोनों बातें विरुद्ध हैं । यदि एक अङ्ग की उपासना निन्दित है, तो उसका फल कैसा? कारण कि जो कृत्य निन्दित तथा अनिष्ट के हेतु हैं; उनका शुभ फल नहीं होता । यदि वह एकाङ्गोपासना शुभ फल का हेतु है उससे मूर्धपातरूप अनिष्ट फल बतलाकर उसकी निन्दा नहीं करनी चाहिये । कारण कि स्वर्गादिशुभफल के हेतु अग्नि-होत्रादि की निन्दा नहीं होती है । इसी वास्ते मूर्धपातादिसूत्रक अर्थवाद-वचन स्वार्थपर्यवसायी शुभफल प्राप्ति सूचक प्रमाण से विरुद्ध होने से केवल ' गुणवाद ' माने जाते हैं । अर्थात् उनका तात्पर्य एक - एक अङ्ग की उपासना की निन्दा में नहीं है, किन्तु सप्ताङ्ग उपासना के समुच्चय ही है । इसी वास्ते एकाङ्गोपासना की निन्दा की गई है - औपम-न्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव सुतं प्रसुतमा-सुतं कुले दृश्यते । अत्स्यन्न पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसंकुले य एतमेवात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति । " यहाँ सुतेजा दिवलोक रूपवैश्वानर की उपासना का फल कहकर मूर्धपातका भय दिखलाया है सप्ताङ्ग के समुच्चय के लिये । ठीक इस उदाहरण अनुसार ही प्रकृत विद्या तथा अविद्या के समुच्चय के लिये ही निन्दा है । अर्थवादों का स्वार्थ में तात्पर्य नहीं है । इसी वास्ते यहाँ पर कर्मठ एवं उपासकों को अन्धतम या घोर अन्धतम की प्राप्ति का समर्थन आवश्यक नहीं है । जैसे पूर्वोक्त वैश्वानरोपासना में मूर्धपात का समर्थन आवश्यक नहीं है । अतः इसके लिये ' विद्यायां रताः ' का विद्या में अभिमानकर दुराचारादि करना इत्यादि मनमानी अक्षरासम्बद्ध खींचातानी की आवश्यकता ही नहीं है । विद्या पद से ब्रह्मविद्या नहीं
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वेदार्थपारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् विवक्षित है, यह बात पूर्व में कह चुके हैं 1 [ २२६ यदि कोई मीमांसक कहे कि ' प्रकरणवश विद्या का अर्थ ' ब्रह्म-विद्या ' है, कारण ईशा वास्यन् ' इस मन्त्र से ब्रह्मविद्या प्रकृत है; प्रकृत-परित्यागपूर्वक अप्रकृतप्रक्रिया ठीक नहीं है ", तो इसका उत्तर यह है कि प्रकरण की अपेक्षा श्रुति बलवती होती है, अत: वह प्रकरण की for होती है । ' श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात् ' । ( जं ० सू ० ३.३.१४ ) से साबित है कि लिङ्ग, प्रकरण आदि सबसे श्रुति प्रबल होती है । यद्यपि प्रकरण से मालूम होता है कि विद्या से ब्रह्मविद्या ही गृहीत है और उसी से कर्म का समुच्चय विधित्सित है, परन्तु ' तमेतमात्मानं ब्राह्मणाः यज्ञेन दानेन तपसाऽनाश-ha विविदिषन्ति ' ( बृ ० ४.४.२२ ) उस श्रुति से यज्ञादिकर्मों का ब्रह्म-वेदन की इच्छा के प्रति या इष्यमाण वेदन के प्रति साधनरूप से अन्वय है । यदि कर्म ब्रह्मविविदिषा या इष्यमाण ब्रह्मवेदन का साधन है तो इसका ब्रह्मविद्या के साथ समुच्चय कैसे हो सकता है? कारण कि जहाँ साधन - साध्यभाव या प्रत्येक का स्वतन्त्र फल न होना निश्चित होता है, वहाँ अङ्गाङ्गिभाव होता है; समुच्चय नहीं होता । जैसे व्रीहिप्रोक्षण तथा दर्शपौर्णमास का अङ्गाङ्गिभाव माना जाता है, समुच्चय नहीं माना जाता । अङ्गाङ्गिभावशून्य स्वतन्त्र फलवाले दो कृत्यों का समुच्चय हुआ करता है । कर्मों का ब्रह्मविद्या के साथ समु-उच्चय ' यज्ञ ेन ' इत्यादि श्रुति से विरुद्ध है । क्योंकि ' श्रुति ' कर्म को विद्या में हेतु बतलाती है, अतः ' प्रकरण ' वश विद्या से ब्रह्मविद्या नहीं गृहीत हो सकती । कारण कि प्रकरण श्रुति से दुर्बल है । कर्म तथा विद्या का परस्पर विरोध होने से समुच्चय को असम्भव दिखा चुके हैं । अद्वैत ज्ञाननिष्ठ के आभासमय कर्मों में कर्तृत्व, नानात्वादि का अभि-निवेश नहीं होता, वे निष्फल तथा आभास मात्र होते हैं । वे किसी पुरुषार्थ के लिये समुच्चित नहीं कहे जा सकते । उपासनारूप विद्या ही यहाँ ' विद्या ' पद से विवक्षित है । उसी का कर्म के साथ समुच्चय हो सकता है । जहाँ कहीं ' माण्डूक्यकारिका ' व्याख्यादिकों में आचार्यों इस मन्त्र के विद्यापद से ब्रह्मविद्या ग्रहण की है, वहाँ पर कर्म के साथ ' क्रम- समुच्चय ' स्वीकार किया है । यानी प्रथम अज्ञान दशा में पुरुष कर्मानुष्ठान करे । अनन्तर योगारूढ़ होने पर वही ज्ञाननिष्ठ होवे । इस तरह क्रमशः एक पुरुषानुष्ठेय होने के कारण क्रम समुच्चय
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२३० ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् कहा है । सम - समुच्चय अर्थात् दोनों का साथ अनुष्ठान नहीं बन सकता । " विद्याञ्चाविद्यांच यस्तद्वेदोभयं सह " यहाँ पर लेखक जी कहते हैं कि " जो विद्या अविद्या को तत्त्व से जानता है; अर्थात् कर्म को भगवदर्थ समझता है तथा श्रवणादि से विद्या को वह पूर्व से मृत्युतरण तथा उत्तर से अमृतत्व प्राप्त करता है । " यह कथन तात्पर्य-गन्धसम्बन्धशून्यता का सूचक है । भला यहाँ कर्म तथा उपासना केवल अपने ज्ञान से कल्याण के हेतु होते हैं या अनुष्ठान की अपेक्षा रखते हैं? यदि प्रथम पक्ष है तो अनुष्ठान की व्यर्थता ही है । यदि द्वितीय पक्ष है तो यहाँ ' वेद ' का अर्थ ' उपास्ते ' है । अर्थात् यहाँ कर्मादि का तत्त्वज्ञान नहीं विवक्षित है, किन्तु कर्म तथा उपासना का साथ अनुष्ठान विवक्षित है । इससे अनुष्ठानोपयोगी ज्ञान अपने आप सिद्ध हो जायगा । कारण ज्ञान के बिना अनुष्ठान ही नहीं हो सकता । इस तरह ' वेद ' का अर्थ अनुष्ठान ही है । ' सम्भूति ' का परमात्मा तथा ' असम्भूति ' का देवता अर्थ करना भी अत्यन्त असम्बद्धालाप है । यदि सम्पूर्वक ' भू ' धातु का ' सम्यक् -सत्ता ' अर्थ ही हो तो ' सम्भवोऽस्य न विद्यते ', ' सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ' ( गी ० १४. ३ ) इत्यादि स्थल में सम्भव का ' उत्पत्ति ' अर्थ ही न बने; किन्तु इन स्थलों में सम्भव - सम्भूति इत्यादि का उत्पत्ति ही होता है । सम्भूति का अर्थ- ' सम्यग्भूतिरंश्वर्यं यस्य स सम्भूतिः ' इत्यादि व्युत्पत्ति के बल से ' हिरण्यगर्भ ' अर्थ लिया जा सकता है, तथापि आगे ' माण्डूक्यकारिका ' में ' सम्भूतेरपवादाच्च सम्भवः प्रतिषिद्धयते ' ३. २५ यहाँ पर कहा गया है कि हिरण्यगर्भ की निन्दा से उत्पत्तिमात्र का मन्त्र ने निषेध किया है । जब प्रधान कार्य हिरण्यगर्भ काही अपवाद है, तब सामान्य कार्य का अपवाद सुतरां सिद्ध है । इस तरह अजातवाद में ही शास्त्र का तात्पर्य है । यदि आपके मत में ' सम्भूति ' का अर्थ परमात्मा है तो ' सम्भूतै-रपवादाच्च ' यहाँ ' सम्भूति ' का क्या अर्थ होगा? क्या परमात्मा का अपवाद? साथ ही ' सम्भूत्यां रताः ' का क्या अर्थ होगा? क्या यह कि उससे भी घोरतम नरक में वे जायेंगे जो परमात्मा में निरत हैं? यदि ' रताः ' का अभिमान अर्थ करें तो कैसे? किसी प्रकृत प्रत्यय के बल
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वेदार्थपारिजातः ( वा सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २३१ पर या मनमानी ही? फिर अभिमान से भी तो अहंग्रहोपासना ही होती है, उससे घोर तम की प्राप्ति कैसी? फिर यदि ' सम्भूति ' में रमण करने वाले घोर तम में जायेंगे तब तो आत्मरत की यही दशा होगी । एवञ्च सम्भूति से देवता ही क्यों लिये जाते हैं, सम्यक् सत्तावाले तो पत्र - फल आदि भी हैं, वे ही क्यों नहीं गृहीत होते? फिर यदि ' सम्भूति - उपासना ' से देवता की उपासना विवक्षित हो तो विद्या और अविद्या से ही गतार्थता हो गई । कारण कर्म से इन्द्रादि देवताओं की उपासना और विद्या से परमात्मा की उपासना आ ही गयी, इन दोनों का समुच्चय पहले मन्त्रों से हो ही गया । ' सम्भूति ' और ' असम्भूति ' शब्द से भी उसी को कहने की क्या आवश्यकता थी? अतः यहाँ भाष्यकारकृत व्याख्यान ही युक्त है । प्रथम असम्भूति तथा सम्भूति दोनों की पृथक् - पृथक् उपासनाओं की निन्दा करके समुच्चय का विधान किया गया है । असम्भूति का अर्थ अव्याकृत जगत् का मूल-कारणप्रकृति गृहीत हुआ है । ' न सम्भूतिर्यस्य स असम्भूतिः ' जिसकी उत्पत्ति नहीं होती ऐसा मूलकारण ही असम्भूति है, क्योंकि वही सब का मूल है । उसका कोई मूल नहीं है, अतः उसकी उत्पत्ति नहीं होती, ' मूले मूलाभावादमूलं मूलम् ' ( सा. सू. ) । जो असम्भूति की उपासना करते हैं वे अन्धतम के भागी होते हैं तथा उनसे भी अधिक अन्धतम की प्राप्ति उन्हें होती है जो सम्भूति अर्थात् हिरण्यगर्भ की उपासना करते हैं । सम्भूति = उत्पत्ति होती है जिसकी, या सम्यक् भूति: - ऐश्वर्य है जिसका इस तरह से भी सम्भूति का हिरण्यगर्भ ही अर्थ होता है । इसके अनन्तर समुच्चय का हेतुभूत दोनों का भिन्न फलत्व दिखाया गया है ' अन्यदाहुः सम्भवात् ' * इत्यादि से । यहाँ पर भी निन्दा में तात्पर्य बिल्कुल नहीं है, केवल समुच्चय में ही तात्पर्य है । कारण दोनों उपासनाएँ शास्त्रविहित हैं तथा दोनों ही स्वतन्त्र फल वाली हैं । अतः निन्दा प्रमाणान्तर विरुद्ध होने से गुणवाद ही है । विधि ब्राह्मण भाग में ही होती है, इसी वास्ते शतपथ के चौदहवें कांड में कारण तथा कार्यब्रह्मरूप हिरण्यगर्भ की उपासना बहुधा विहित है । एतावता लेखक जी का यह कथन भी निर्मूल है कि यह उपासना कहीं मिलती ही नहीं । मीमांसकों की रूढ़ि यह है कि जहाँ अपूर्व द्रव्य - देवता देखते हैं वहाँ कर्म विधि की कल्पना करते हैं । जैसे " आग्ने-assere पालो भवति " ।
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२३२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् यहाँ पर आग्नेय याग का विधिप्रत्यय न होने पर भी विधि की कल्पना होती है | वैसे ही उपास्यस्वरूप देखकर उपासना का विधि-प्रत्यय न होने पर भी विधि की कल्पना करते हैं । पुराणों में भी अव्यक्तोपासकों को परमोत्कृष्ट फल बतलाया गया है । " ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महानव्यक्तमेव च । उत्तमां सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः || ” यहाँ इस स्मृति में अव्यक्त प्राप्ति को ही अन्तिम सात्त्विक फल कहा गया है ।
" दश मन्वन्तराणीह तिष्ठन्तीन्द्रियचिन्तकाः ।
पूर्णं शतसहस्रं तु तिष्ठन्त्यव्यक्तचिन्तकाः ॥
पुरुषं निर्गुणं प्राप्य कालसंख्या न विद्यते । ” लेखक जी ने जो कहा है कि " भाष्यकारीय व्याख्यान में समु-च्चय में भी यदि प्रकृतिलय ही फल हुआ, तो प्रकृति - उपासना के फल से क्या विलक्षणता हुई? " यह ठीक नहीं, कारण कि प्रकृतिलय रूप फल यहाँ अन्धतम शब्द से विवक्षित नहीं है । वह तो केवल विद्या की भाँति असम्भूति उपासना का अन्धतम फल बतलाकर समुच्चय के लिये केवल निन्दा की गई है । जैसे विद्या का फल अन्धतम नहीं हो सकता, केवल निन्दा मात्र के लिये यह उक्ति है । विद्या का फल तो देवलोका-दि ही है । वैसे ही केवल प्रकृति उपासना की निन्दा के लिये अन्धतम फल कहा गया है; वस्तुतः नहीं । प्रकृति उपासना का तो परमफल प्रकृतिसायुज्य ही है; जो कि मुक्ति के समान तथा पारलौकिक फलों में सर्वोत्कृष्ट फल है । प्रकृतिलय अन्धतम शब्द से विवक्षित नहीं है । वह तो समुच्चय के फल रूप में प्राप्त होगा । आगे ' सम्भूतिञ्च-विनाशञ्च ' इत्यादि से भी दोनों का तत्त्वज्ञान विवक्षित नहीं है; किन्तु साथ उपासना विवक्षित है । विनाशपद से कार्यरूप हिरण्यगर्भ विवक्षित है, जो कि कार्य होने से विनाशधर्मक है । ' विनाशो धर्मोऽस्यास्तीति विनास: ' इस व्युत्पत्ति से अर्श अच् से अजन्त विनाश शब्द विनाश धर्मवाले हिरण्यगर्भ का वाचक है; जोकि प्रकरणवश गृहीत होता है । उसकी उपासना से अनैश्वर्य - दारिद्र्यरूप मृत्यु तेरी जाती है । कारण हिरण्यगर्भोपासना से ऐश्वर्य प्राप्ति होती है । उससे
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २३३ अनैश्वर्य मिट जाता है । दुःख रूप होने से तथा संसारवासना भी शांत का होती हेतु होने से ऐश्वर्य से मृत्युरूप दारिद्यू दूर होता है । अभिलाषा है । तदनन्तर असंभूति की उपासना से कारणसायुज्यरूप महाफल ही प्राप्त उपा-होता है, जिस फल के आगे बस कैवल्य ही है । जैसे कर्म के साथ सना को स्वफल संपादन में सुविधा होती है; वैसे ही सम्भूति - उपासना सहित ही असम्भूति उपासना को स्वफल संपादन में सुविधा होती है । इसी वास्ते जैसे केवल विद्या में रत रहने से उसका फल नहीं होता; वैसे ही केवल असंभूति उपासना से प्रकृतिसायुज्य नहीं हो सकता, किन्तु असं-संभूति उपासना से राग, दुःखादि निदान दारिद्य को तर कर ही भूति से तत्सायुज्य होगा । कहा जा सकता है कि “ यदि सम्भूति उपासना से ब्रह्मलोक प्राप्त होता है और वहाँ से क्रममुक्ति होती है, तब तो संभूति की उपासना से क्रमशः प्राणी मुक्त होता है । असंभूति उपासना से तो कारणमें लय होना होगा और कालान्तर में पुनः संसार अनिवार्य होगा; अतः उलटा असंभूतिका समुच्चय अनर्थ का हेतु हुआ । " परन्तु सो कहना ठीक नहीं, क्योंकि ' आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽजु ' न ' ( गी. ८.१६ ) के अनुसार कार्यब्रह्मोपासकों का भी ब्रह्मलोक से पुनरावर्तन होता है । क्रममुक्ति दहरविद्या, शाण्डिल्यविद्या आदि से ही होती है । इसी वास्ते जहाँ इमं मानवमावर्त्तं नावर्तन्ते ' ( छा ४.६.१ ) इत्यादि स्थलों में भी इदं पद का निर्देश है वहाँ केवल वर्त्तमान मानवावर्त में ही आवृत्ति का निषेध है; अर्थात् आवर्तान्तर में उनकी आवृत्ति होती है, अतः सिद्ध हुआ कि कार्यब्रह्म की उपासना की अपेक्षा कारण ब्रह्म की उपासना श्रेष्ठ ही है । उसका फल भी बड़ा है । जैसे केवल कार्य की उपासना नहीं; किन्तु कार्य्यावच्छिन्न ब्रह्म की ही उपासना है, वैसे ही प्रकृत्यवच्छिन्न चैतन्य की उपासना अव्यक्तोपासना है । उससे बहुत काल तक कारण-सायुज्य के उपरान्त कारणानुग्रह से कारणातीत निर्गुणतत्त्व की भी प्राप्ति क्रमशः होती है; अतः कोई दोष नहीं है । समुच्चयानपेक्ष केवल ब्रह्मविद्या का फल निर्विशेष ब्रह्मभावापत्ति ही है । जिसका सविस्तार उपनिषदों में वर्णन है । यहाँ पर लेखक ने जो सूचना की है कि सम्भूति निकालने के लिये दो जगह अकार का अध्याहार करना पड़ता है, सो भी निर्मूल है । कारण, तात्पर्य से वेदों का अर्थ निकाला जाता है । वेदों में सहस्रों स्थलों में ऐसा किया जाता है । जब विनाश शब्द का तात्पर्य पूर्वयुक्ति से हिरण्यगर्भ हुआ, तब सुतरां संभूति के पीछे
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२३४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अकारच्छेदकर असम्भूति निकालना उचित है । कारण जिसकी संभूति नहीं उसका तो विनाश ( स्वाभाविक ) धर्म हुआ ही नहीं करता, जिसकी सम्भूति होती है, ऐसे कार्य का विनाश धर्म हुआ करता है । सर्वत्र भवति, उत्पद्यते, भावयति, उत्पादयति, सम्भव, उत्पत्ति, सम्भूति: - ये सब उत्पत्त्यर्थक माने जाते हैं । अतः अगत्या विनाश शब्द से सम्भूति ली गई है । परिशेष असम्भूति ही बची और उसके लिये अकार छेदयुक्त ही है । अवैयाकरणों को ही यह सन्देह हो सकता है । वैयाकरणों के लिये ' एङ पदान्तादति ' ( पा. सू. ), ' अकः सवर्णे दीर्घः ' ( पा. सू. ) सूत्रों से लुप्तादि अकार का बोध सहज में ही हो सकता है, ' विचक्षिरेऽसम्भूतिञ्च तत्वसम्भूत्यामृतमभूते ' लेखक जी को अध्याहार अनुकर्षण आदि का पहले अर्थ समझने का प्रयत्न करना चाहिये; तब भगवान् भाष्यकार के व्याख्यान में अध्याहारदूषण उद्भावन करना चाहिये । यद्यपि इस पर उचित अन्यान्य बहुत से विचार उठाये जा सकते थे, तथापि लेखक ने निरर्थक विचारों का उत्थापन किया है जो कि केवल दुःसाहस का सूचक है उस पर कुछ भी लिखना केवल समय का अपव्यय करना है । तथापि अज्ञजनता को कहीं भगवान् शंकराचार्य के लेख में भ्रम न हो जावे, बस केवल इसी लिए लेखनी को किञ्चित् श्रम दिया गया है, बुद्धिमानों के लिये तो कुछ कहना ही नहीं है ।
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ईशावास्योपनिषत् श्रीहरिः द्ध- प • सभाष्य- संपरिशिष्ट १ ७ १ हिन्दी ४ दिये पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध १ वाजसनेय कर्मव विनियुक्ताः शुद्ध वाजसनेयि कर्मस्वविनियुक्ताः दिये गये हिन्दी ६ २ हिन्दी १ मन्त्रों को मन्त्रों की प्रमाण हिन्दी २ प्रमाणों वचन वचनों ४ १० द्विजाति द्विजातिः ५ ४ ब्रह्मात्म्यैक्ये-६ ३ तानिलिङ्गानि ६ ह रितम् तानि लिङ्गानि रितम् । ६ ३ त्यां १० सम्ब १२ ४ भावे-१ १५ कार्यस्य कारणेनैव ५ पारमार्थिक कल्पनाऽनुपपत्तेः मित भक्षणेन १८ २२ २५ ४ स्वत्यागानुवादेन २५ ११ नानुध्याद् २७ ४ कर्मविहितम् २६ ४ धर्मः त्यां -सम्व भावे कार्यस्य कारणेनैव पारमार्थिककल्पनानुपपत्ते मितभक्षणेन स्व त्यागानुवादेन नानुध्यायाद् कर्म विहितम् धर्मो
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११ ३० ३१ १० ३२ ३४ ५ ७७ ८३ ८४ २ ६२ ६३ ५ १३८ हिन्दी १ १७२ टिप्पणी १ १८२ जातिष्ठ ० तत्तद्दाढ्य परमाप्नोति पूरुषः भुज्यन्तेविषया यत्तुकेनचित् उननिषत्सुदर्शनात् साध्य णा दो भूतेनस्व [ जातु तिष्ठ तद्दाढ्य परमाप्नोति पूरुषः भुज्यन्ते विषया यत्तु केनचित् उपनिषत्सु दर्शनात् साध्य णां वैश्यस्याद्यौ बा भूतेन स्व वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्
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