वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 251–260

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 251–260

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२१८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्

यस्तु सर्वाणि भूतान्या॒त्मन्नेवानुपश्यति ।

सर्वभूतेषु चात्मानन्ततो न विजुगुप्सते ॥६ ॥

यस्मि॒न्सर्वा॑णि भू॒तान्य॒त्मैवाभूद्विजानतः ।

तत्र को मोहः कश्शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७ ॥

स पर्यंगाच्छु कर्म कायम॑न्रणम॑स्नावर II 1 शुद्धमपापविद्धम् । क॒विर्मनीषी प॑रि॒भूस्वय॒म्भूर्या॑थातथ्य॒तोऽ-र्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यस्समाभ्यः || ८ ||

अ॒न्धन्तः प्रविशन्ति॒ येऽविद्यामुपासते ।

ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥ ६ ॥

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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अ॒न्यदे॒वाहुवि॑द्यया॒न्यदा॑हु॒रवि॑द्यया । [ २१६ इति शुश्रुम धीराणाँय्ये नस्तद्विचचचिरे ॥१० ॥

I

विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तो भयं सह ।

विद्यया मृत्युन्तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥

अ॒न्धन्तम॒ः प्रविशन्ति॒ येऽसम्भूतिमुपासते ।

ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्या रताः ॥१२ ॥

-अ॒न्यदे॒वाहुस्स॑म्भवादन्यदा॑हु॒रसंभवात् ।

इति शुश्रुम धीराणांय्ये नस्तद्विचक्षिरे ॥१३ ॥

1

सम्भूतिंच विनाशञ्च यस्तद्वेदोभयः सह ।

विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥१४ ॥

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२२० ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वम्पू॒ष॒न्नावृ॑ स॒त्यध॑मय सत्यधर्माय दृष्टये ॥१५ ॥

पूषन कर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह ।

तेजो॒ यत्त॑ रू॒पङ्कल्या॑ण॒तम॒न्तत्ते॑ पश्यामि ।

योऽसावसौ पुरुषस्सोहमस्मि ॥१६ ॥

वायुरनि॑िलम॒मृतमथेदम्भ-स्मान्त ँशरीरम् । ॐ क्रतो स्मरं कृत ँ स्मर ऋतो स्मर कृत ँ स्मर ॥१७ ॥

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वेदार्थ पारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् 1 अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । यु॒योध्य॒स्मज्जु॑हु॒रा॒णमेनो॒ भूयिष्ठान्ते॒ [ २२१ नम उक्ति व्विधेम ॥१८ ॥

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* श्री हरिः विद्याऽविद्यादि तत्त्वमीमांसा संस्कृत साहित्य में वेद ' अनुश्रव ' कहे जाते हैं । अनुश्रव का भाव- - ' गुरोर्मुखादनुश्रूयते ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार यह होता है कि वे गुरुमुख से ही केवल सुने जाते हैं । इससे दो बातें सिद्ध होती हैं-एक तो यह कि वेद किसी से भी निर्मित नहीं हैं, केवल गुरुपरम्परा से सुने ही जाते हैं । अविच्छिन्न सम्प्रदाय - परम्परा से ही प्राप्त तथा अमितकर्तृक होने से ' अपौरुषेय ' हैं । उनमें पुरुषदोष के शंकारूप कलंक का स्पर्श नहीं है । वे स्वतः प्रमाण हैं । दूसरी बात यह कि वेदों का अध्ययन तथा तदर्थज्ञान आचार्य से ही करना चाहिये । मनमाना अध्ययन तथा अर्थज्ञान नहीं करना चाहिये । इस बात को श्रुति स्वयं कहती है कि - " तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ' ( मुण्डको ० १.२.१२ ) अवधारणार्थक ' एव ' शब्द का तात्पर्य यह है कि व्याकरण, काव्य, कोश आदि में कुशल पुरुष भी स्वयं वेद के अर्थज्ञान में प्रवृत्त न हो; किन्तु उसके विज्ञान के लिये समित्पाणि होकर श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ की शरण में जाय, कारण कि अनेक दोषदूषित प्राणी विपरीत अर्थ समझकर लाभ के बदले अपना सर्वस्व नाश कर सकता है । वेद भगवान् को भी भय होता है कि अल्पश्रुत मूढ मुझ पर प्रहार करेगा, अर्थात् कुछ का कुछ अर्थ करेगा -" इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृ ंहयेत् । बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ॥ ” ( महा ० आदि ० १.२६७, २६७३ ) वेदव्याख्याकार ' आचार्य ' मीमांसा, कल्प, निरुक्त आदि के आधार पर सम्प्रदाय के अनुरोध से व्याख्या लिखते हैं । आज - कल

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वेदार्थपारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २२३ साहसवश कुछ लोग व्याकरणादि ज्ञानशून्य ' स्वयंभू ' आचार्य पूर्वाचार्यो के शास्त्रीय व्याख्यानों का खण्डन कर अटकलपच्चू मनगढन्त वेद व्याख्यान करते हैं । पाठकवृन्द! आज हम आपके सामने एक ऐसा ही विषय उपस्थित करते हैं । आप जानते होंगे - “ शङ्करः शङ्करः साक्षात् " के अनुसार भगवान् शङ्कर ने ही श्रीशङ्कराचार्यरूप से अवतीर्ण होकर उपनिषदादि प्रस्थानत्रयी का यथोचित व्याख्यान कर दुरवग्राह्य वेदार्थ को प्रकाशित करने की कृपा की है । ' कल्याण ' के वेदान्ताङ्क में श्रीजयदयाल गोयनका ने ' विद्या, अविद्या तथा संभूति और असंभूति ' शीर्षक लेख में एक विचित्र मन-गढन्त अर्थ करके भगवान् शङ्कराचार्य के अर्थ का निराकरण किया है । यद्यपि लेखक ने अपनी छद्ममयी नीति से आरम्भ में अपने को वेदार्थज्ञान के अयोग्य और उक्त लेख का अनधिकारी बतलाया है तथा परमाचार्यकृत व्याख्यान को निःसार तथा स्वकृत व्याख्या को महत्त्वपूर्ण कहकर छद्म का भी अन्त में भंडाफोड़ कर ही दिया है । यहाँ हम पहले इनके व्याख्यान का सार लिखते हुए उसकी समा-लोचना करते हैं । जिन मन्त्रों की आपने व्याख्या की है वे मन्त्र ये हैं- " अन्ध-न्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥ विद्यां चाविद्यां च यस्तद्व दोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ संभूत्यां रताः ॥ " लेखक का कहना है कि " बड़े - बड़े विद्वानों ने इन मन्त्रों के जो अर्थ किये हैं वे संगत नहीं मालूम पड़ते । इसीलिये इनका विचार यथाबुद्धि किया जाता है । सुतरां पहले विद्या तथा अविद्या का विचार करना चाहिये । यहाँ विद्या का अर्थ ब्रह्म-विद्या समझना चाहिए । जो लोग अविद्या में निरत हैं अर्थात् सकाम-कर्म करते हैं, वे अन्धतम में प्रविष्ट होते हैं और उससे भी तम में जाते हैं, जो विद्या में रत हैं अर्थात् ब्रह्मविद्या में अभिमान करने वाले हैं । ब्रह्मविद्या के अभिमान में पाप करनेवाले हैं । क्योंकि यदि कर्म का फल स्वर्गादि अन्धन्तम माना जाय, तो उससे भी अन्धन्तम सूकर कूकर आदि योनियाँ ही हो सकती हैं और वे विद्या का फल नहीं

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२२४ ] वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् हो सकती हैं । इसलिये ' रताः ' इस पद का अर्थ अभिमानी ही है । इस वास्ते आगे विद्या तथा अविद्या को जाननेवाले के लिये मृत्युतरण और अमृतत्वप्राप्ति फल कहा है । अर्थात् जो भगवदर्थं निष्कामकर्म करता है तथा श्रवण, मनन और निदिध्यासन करके ब्रह्मविद्या को ठीक - ठीक जानता है, वह स्वर्गादिरूप मृत्यु को तैर कर मोक्ष पा लेता " इत्यादि । हम लेखक से यह पूछते हैं कि आपने ' विद्या ' पद से ' ब्रह्मविद्या ' कैसे समझी? देवविद्यारूप उपासना ही विद्या पद से क्यों न मान ली जाय, ' य एवं वेद ' इत्यादि स्थलों में सभी आचार्य ' वेद ' का ' उपास्ते ' अर्थ करते हैं । समस्त वैष्णव आचार्य भी विद्या का अर्थ उपासना ही करते हैं । ' विद्यया देवलोक: ' ( बृह ० १.५.१६ ) यहाँ पर भी विद्या का अर्थ उपासना ही होता है, फिर यहाँ विद्या पद से ब्रह्मविद्या क्यों मानी जाय? यद्यपि मीमांसकों के पास यहाँ बहुत कोटियाँ उपस्थित हो सकती हैं; परन्तु मनगढन्त व्याख्याताओं के पास क्या युक्ति हो सकती है! इसके सिवा ' अविद्या ' का अर्थ कर्म ही क्यों लिया गया? यदि कहें कि “ अविद्याकार्य होने से कर्म ही अविद्या पद से लिया जाता है " तो वह ठीक नहीं है, कारण कि वैदिककर्म भी यदि अविद्या है तो वैदिक उपासना भी अविद्या क्यों नहीं? ज्ञान भी यदि उत्पन्न होने वाला है, तब तो वह भी अविद्या का कार्य होने से अविद्या ही है । यदि नित्य है, तब तो उसके लिये साधन व्यर्थ हों । एवं यदि ' तरु ' बीज शब्द से नहीं कहा जाता तो ' कर्म ' अविद्या पद से कैसे कहा गया? इसके सिवा आपके नवीन सिद्धान्त में अविद्या का भी क्या अर्थ है? यदि पूर्वाचार्यों की उक्तियों की परवाह न करें तो अविद्या विद्या का अभावमात्र है, उससे कर्मरूप भावकार्य कैसे उत्पन्न हो सकता है? स्वर्गादि को अन्धतम भी किस आधार पर कहते हैं, कारण वह भी ज्योतिःस्वरूप है । ' विद्यायां रताः ' का अर्थ ' विद्या में अभिमान ' तो किसी तरह भी युक्तिसंगत हो ही नहीं सकता । यदि कुछ व्याकरण का बोध होता तो ' रताः ' का ' अभिमान ' अर्थ करने में कुछ तो संकोच मालूम पड़ता! क्या ' सर्वभूतहिते रताः ', ' आत्मरति ' इत्यादि स्थलों में क्रीडार्थक ' रम् ' धातु का अभिमान अर्थ लिया जाता है? यदि नहीं तो यहाँ कैसे अभिमान अर्थ हो गया? जो लेखक ने ' विद्या ' और

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २२५ ' अविद्या ' का स्वाभिमत अर्थ होने में यह कहा है, क्योंकि यहाँ पर ' विद्या ' और ' अविद्या ' के तत्त्व को समझने वालों की निन्दा करके इन दोनों के तत्त्व समझने वाले की प्रशंसा की गई है । इनके तत्त्व समझने का फल मृत्यु से तैर कर अमृतत्व की प्राप्ति बतलाई है । ऐसा फल उपर्युक्त अर्थ मानने पर ही हो सकता है । " परन्तु लेखक ने यह हेतु कहाँ से निकाला, इसका पता नहीं है । मन्त्र में तो अविद्या के उपासक तथा विद्या में रत की निन्दा पाई जाती है तथा ' विद्या ' और ' अविद्या ' का साथ अनुष्ठान करने वाले की मृत्युतरणपूर्वक अमृतत्व-प्राप्ति बतलाई गई है । ' विद्या ' और ' अविद्या ' के तत्त्वज्ञ की प्रशंसा का तो स्पर्श भी मन्त्र में नहीं है । सम्भव है कि ' यस्तद्व ेद ' के ' वेद ' शब्द से लेखक को विभ्रम हुआ हो, परन्तु पूर्व मन्त्रों के अनुसार यहाँ ' वेद ' का अर्थ उपासना ही है, अन्यथा पूर्वापर विरोध अनिवार्य होगा । ' निन्दा अविद्या उपासक एवं विद्यानिरत की तथा प्रशंसा अविद्या तथा विद्या के तत्त्व की ' इसका कुछ सम्बन्ध ही नहीं है । यदि कहें, " पहले ' अविद्यामुपासते ' का अर्थ कर्मतत्त्व को न जानना ही है " - तो इसका उत्तर यही है कि उच्छृङ्खल - पन्थियों की दृष्टि में भैंस भी ' उपासते ' का अर्थ हो सकता है, इसका उत्तर हमारे पास क्या है? कोई भी समझदार ' ये s विद्यामुपासते ', ' विद्यायां रताः ' का यही अर्थ कर सकता है कि ' जो अविद्या की उपासना अर्थात् अनुष्ठान करते हैं ', ' जो विद्या में रत हैं अर्थात् तन्निष्ठ हैं । ' इन पदों से ' विद्या अविद्या के तत्त्व को न जानने वाला, यह अर्थ कैसे निकला? जब पूर्वार्द्ध ' का ' तत्त्व न जानने वाला ' यह अर्थ नहीं हुआ, तब ' यस्तद्व दोभयं सह ' का अर्थ दोनों के तत्त्वों का जानने वाला कैसे हुआ? क्योंकि आपके कथनानुसार पहले अविद्यादि के तत्त्वज्ञानरहित की निन्दा की गयी है तथा अन्त में उनके तत्त्वज्ञों की प्रशंसा की गई है । सो पूर्वाद्ध बिगड़ने से उत्तरार्द्ध भी बिगड़ गया । इसके सिवाय प्रशंसा किन शब्दों का अर्थ है? अतः पूर्वकथना-नुसार ' वेद ' का ' उपास्ते ' ही अर्थ है । तात्पर्य यही है कि विद्या और अविद्या के पृथक् - पृथक् उपासना की निन्दा द्वारा ही दोनों के एक साथ अनुष्ठान की प्रशंसा करके दोनों के एक साथ अनुष्ठान करने वाले के लिये मृत्युतरणपूर्वक अमृतत्वप्राप्तिरूप फल बतलाया गया है । जिसके मत में विद्यादि के तत्त्वज्ञान से ही अमृतत्व - फल प्राप्त होगा, उसके यहाँ फिर अनुष्ठान की आवश्यकता ही नहीं सिद्ध होती है । यदि कहें कि ज्ञान के बाद अनुष्ठान भी अपेक्षित है तो अनुष्ठान किस

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२२६ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् शब्द का अर्थ है? ' वेद ' का अर्थ तो आपने तत्त्वज्ञान कर लिया, अनुष्ठान अर्थ अब कैसे निकलेगा? अब श्रीमच्छङ्करभगवत्पूज्यपाद के व्याख्यान का अभिप्राय दिखाया जाता है । " वे अदर्शनात्मक तम में प्रविष्ट होते हैं जो अविद्या पदवाच्य कर्म की उपासना करते हैं और वे उनसे भी अधिक अदर्शना-त्मक तम में प्रविष्ट होते हैं जो विद्या अर्थात् हिरण्यगर्भोपासना में निरत हैं । " जैसे अधर्मपद से धर्मविरुद्ध निषिद्ध कृत्य ही गृहीत होता है धर्मा-भाव मात्र गृहीत नहीं होता, वैसे ही यहाँ पर्युदासार्थक नत्र के योग से शास्त्रविहित विद्या से अन्य शास्त्रविहित कर्म ही अविद्या पदवाच्य हैं । यहाँ विद्या और अविद्या के समुच्चय विधान के लिये एक - एक की निन्दा है । कर्म तथा ब्रह्मविद्या का विरोध होने से समुच्चय नहीं हो सकता, कारण कि तबुद्धिपूर्वककर्म का अद्वैतबुद्धिरूपविद्या के साथ विरोध प्रत्यक्ष है । इसी वास्ते ' विद्या ' पद से ब्रह्मविद्या नहीं गृहीत है, किन्तु कार्यब्रह्म की उपासनारूप अपरविद्या ही गृहीत है । लेखक जी ने जो कहा है " यदि ' रताः ' का अर्थ विद्या में अभिमान न माना जाय तो विद्या में रत को कर्मरत से भी अधिक तम की प्राप्ति होना कैसे सम्भव होगा? यदि अविद्या ( कर्म ) में रत को अन्तम की प्राप्ति होगी तब तो विद्यारत को उससे भी अधिक अन्ध-तमश्व, सूकर आदि योनियों की प्राप्ति होगी । परन्तु यह सब विरुद्ध है । अविद्या के तत्त्व को न जानकर सकामभाव से अनुष्ठान करने वाले को अनित्य स्वर्गादि प्राप्त होता है, यह अविद्या - रत को अन्धतम की प्राप्ति है । विद्या के तत्त्व को न जानकर विद्या का अभिमान कर यथेष्टाचरण करनेवाले को स्वर्गादि से भी अपकृष्ट श्व- शूकर आदि योनिरूप, घोर अन्धतम की प्राप्ति होती है । जो लोग विद्या तथा अविद्या को तत्त्वतः जानकर अनुष्ठान करते हैं, वे अविद्या से मृत्यु को तैरकर विद्या से अमृत अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं । " इत्यादि कथन सूचन करता है कि वे वेदार्थनिर्णायक पूर्वमीमां-सादिशास्त्रों से परिचित नहीं हैं । सिद्धान्ततः विद्या अविद्या - समुच्चय विधि के अर्थवादभूत वचनों का तात्पर्य केवल समुच्चय की स्तुति में

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २२७ ही है । ' विधिना वेकवाक्यत्वात्स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः ' जै. १.२.६ ( विधि के साथएकवाक्यता होने से अर्थवाद विधियों की स्तुति के लिये होते हैं । ) । अर्थवादवचन से प्रसिद्ध अर्थ मानान्तर से सिद्ध हो तब तो अर्थवाद ' अनुवाद ' माना जाता है । जैसे ' अग्निहिमस्य भेषजम् ' यहाँ अग्नि का शीतभेषजत्व प्रत्यक्ष से ही ज्ञात है । सिद्ध अर्थ का द्योतक होने से यह अनुवाद है | मानान्तर अविरुद्ध अर्थ का द्योतन करनेवाले अर्थवाद को ' भूतार्थवाद ' कहते हैं । अर्थात् महातात्पर्य, विधि की स्तुति में होते हुए अवान्तरतात्पर्य स्वार्थ में भी रखनेवाले अर्थवाद को भूतार्थवाद कहते हैं, जैसे ' वज्रहस्तः पुरन्दरः ' यहाँ इन्द्र का वज्रहस्तत्व आगसा-तिरिक्त मान से अज्ञात है । अज्ञातज्ञापक होने से यह भूतार्थवाद है । मानान्तरविरुद्ध अर्थ का प्रतिपादन करनेवाले अर्थवाद को ' गुणवाद ' कहते हैं । अर्थात् उसका स्वार्थ में कुछ भी तात्पर्य नहीं होता । यहाँ ' विद्यया देवलोकः ', ' कर्मणा पितृलोक: ' ( वृ ० १.५.१६ ) इत्यादि श्रुति से कर्मनिष्ठ एवं उपासनानिष्ठ को पितृ, देवलोक आदि की प्राप्ति श्रुत है । यह अर्थवाद मानान्तर विरुद्ध होने से गुणवाद है । ' नहि निन्दा निन्द्य " निन्दितुम्प्रवर्तते, अपितु विधेयं स्तोतुम् ' -' निन्दा का तात्पर्य निन्दा में नहीं, अपि तु विधेय की स्तुति में है ' ऐसी मीमांसकों की रुढि है । जो अविद्या पदवाच्यकर्म में निरत हैं, उनकी निन्दा विद्या के समुच्चय के लिये की गई है । विद्याफल की अपेक्षा अविद्याफल स्वर्गादि की प्राप्ति निकृष्ट है । उसे अन्धतम की प्राप्ति कहकर उसकी निन्दा की गई है । जो केवल विद्या में निरत हैं; वर्णा श्रमानुसार श्रौतस्मार्तधर्म का अनुष्ठान नहीं करते, उन्हें अविद्यारतो से भी अधिक अन्धतम की प्राप्ति कही गयी है, कारण कि अविद्या पदवाच्य श्रौतस्मार्तधर्मनिरत तो विद्याफल से ही वञ्चित रहेंगे अविद्याफलस्वर्गादि के भागी तो अवश्य होंगे । परन्तु कर्म - धर्म छोड़कर विद्या में रत तो कर्म और उपासना दोनों के ही फल से वञ्चित रहेंगे । कारण कि ' उपासना ' लक्ष्याकाराकारितवृत्ति का दीर्घकाल निरन्तर सत्कारपूर्वक आवर्त्तन को कहते हैं । चित्त की चंचलता की निवृत्ति के बिना वह असम्भव है । चित्त की चंचलता की निवृत्ति देहेन्द्रियचाञ्चल्य की निवृत्ति के विना असम्भव है । बहिरङ्ग चांचल्य निवृत्ति के बिना मानस चाञ्चल्य निवृत्ति असम्भव है । देह तथ इन्द्रियों का चाञ्चल्य श्रौतस्मार्त धर्मानुष्ठान के विना नहीं मि