विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 21–30

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 21–30

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विज्ञानविद्यतु १५ विष्णु इन्द्र अग्नि और सोम देवताओं के द्वारा यह समस्त जगत् नियम विधि से उत्पादित प्रतिष्ठापित तथा उपसंहृत तथा अनेक विकारों से परिवर्धित किया जा रहा है । (अक्षर पुरुष के इन पांच स्वरूपों के क्रम- तारतम्य की जब विभागीय व्यवस्था की ओर दृष्टि जाती है तब ) इस पांच अक्षरों में ब्रह्मा ही मुख्य होता है । कहा जाता है विष्णु और इन्द्र उसके अनुगत होकर संस्थित हैं । विष्णु तथा इन्द्र की सहभागिता से ब्रह्मा के ही सिद्ध होने वाले दूसरे दो अन्य रूप बन जाते है अग्नि और सोम । (उन में अग्नि की की उत्पत्ति इस प्रकार ध्यान में रखने योग्य है कि) इन्द्र का धर्म है वस्तु तत्व का विक्षेपण या उसे स्थान से प्रचिलत करना या फेकना । उससे जब या तो विष्णु को साथ रखता हुआ या शुद्ध स्वयं ही ब्रह्मा विक्षेप्य माण या चलायमान किया जाता है, तब वह अग्नि इस संज्ञा को प्राप्त करता है । "प्रजापति का अपना आधा भाग मर्त्य तथा आधा भाग अमृत था । याज्ञवल्क्य आदि ऋषि भी इस तत्व को जानते थे तत्र मत्यं स्थूलत्वान्नातिदूरं विक्षिप्यत इति यावदिदं ब्रह्म वितिष्ठते तदस्य मर्त्यस्य श्रान्ती साप, तच्छरीरमुच्यते । श्रतः परं परितो वारवन्तीयम् । श्रमृतं तु सूक्ष्मत मं वितायमानं पराः परावतो वितिष्ठते तद् ब्रह्म- साम पारावतम् । सा खल्वव्ययपुरुषस्य वाचः परा काष्ठा । "यावद् ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक् " इति श्रुतेः । सोऽयमष्टाचत्वारिंशः स्तोमः । श्रथ ब्रह्म प्रतिष्ठितोऽयं विष्णुरिन्द्रेण विक्षि- प्ययमाणस्त्रीन् विक्रमान् विक्रमते त्रीन् स्तोमान् त्रिवृतं पञ्चादशमेकविंशं चेति । त्रयस्ते स्तोमास्त्रयोऽग्नयोऽमृताः सम्पद्यन्ते । तत्र विष्ववच्छिन्न ब्रह्मव च विष्णुविक्रमणाद् वितायमानं सदेतदमृताग्निरूपेण परिणमते । तदिदमेकविंशं यावदग्निष्टोमसाम वारवन्तीय नाम । सर्वाणि भूतानि मत्यग्निः शरीरं वा त्रिवृतं वा यावत् । सर्वा देवता अमृताग्निरेकविंशं यावत् । अमृता- ग्नेरूर्ध्वो ब्रम्हामृतभागस्त्रयस्त्रिशस्तोमान्तः सोमः । तदित्थं पञ्चाक्षरा इमे पञ्च प्राणाः सिद्धाः । ( इन्द्र जब ब्रह्मा का प्रक्षेपण करता है तब) ब्रह्मा का मर्त्य भाग स्थूलता के कारण अधिक दूर नही फेंका जाता । इसलिए जहाँ तक यह ब्रह्मा स्थित रहता है वह इसके मर्त्य भाग का श्रयन्ती नामका साम है । इसके आगे चारों ओर वारवन्तीय साम है । जो अमृत भाग है अक्षर पुरुष ब्रह्मा का वह फैलता हुआ परावत के पर भाग में जाता है इसलिए ब्रह्मा का वह साम परावत साम कहा जाता है | यह है परा- काष्ठा अव्यय पुरुष की कला "वाक् " की । श्र तिने कहा है-

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१६ विज्ञानविद्यत् -- "जहां तक ब्रह्म का विस्तार है वहीं तका 'वाकू' तत्व भी विस्तृत है "- यह अड़तालिस स्तोम हैं । अब ब्रह्मा से प्रतिष्ठित होता हुआ यह विष्णु जब विक्षे- यमाण होता है (फेंका जाता है ) तब तीन विक्रमों का विस्तार करता है, वह तीन स्तोमों का त्रिवृत् करण होता है । और वह पन्द्रह तथा इक्कीस हो जाता है । इन तीन स्तोमों के रूप में विद्यमान तीन अग्नि अमृत स्वरूप हो जाते हैं । यहां विष्णु से वेष्टित ब्रह्मा ही विष्णु के विक्रमण से फैलता हुआ ) अमृत अग्नि के रूप में परिणत हो जाता है । यह इक्कीस स्तोम तक पहुंचा हुआ अग्निष्टोम कहलाने वाला ब्रह्मा का सामवारन्तीय कहलाता है । अक्षर पुरुष केअग्नि नामक का भेद का जो मर्त्य भाग है, वही समस्तभूत, शरीर तथा त्रिवृत स्तोम तक व्याप्त है । इसके अनन्तर इक्कीस स्तोम तक अग्नि का अमृत भाग है । जो समस्त देवताओं क रूप में वर्णित है । अमृत अग्नि का भी जो ऊर्ध्व भाग है वह तैतिस स्तोम तक व्याप्त सोम है । इस प्रकार ये पांच अक्षर पुरुष रुप प्राण सिद्ध होते हैं । तत्र ब्रम्हेन्द्रविrat हृदयदहरस्था- प्राणविशेषाः । श्रग्निस्तु स द्विविधः । शरीरमात्रो भूतमयो मर्त्योऽयमन्यः । प्रथा नृतो देवमयोऽयमन्यः । स च शरीरस्थः शरी- रा वहिस्थश्च । उभयविवोऽप्यवमग्निः पिण्डात्तस्थः कुतश्चिन्नामेरग्रगमनस्वभावोऽन- वरतं पिण्डतो बहिर्गन्तु प्रक्रमते । सोमस्तु सर्वतो दिग्भ्यः सूयमानः प्रतिपिण्ड' बहिः प्रदेशे तिष्ठन्- अनवरतं शरीरस्यास्य दहरविवरे प्रवेष्टु प्रवर्त्तते । ( उक्त अक्षर पुरुष की ब्रह्मा विष्णु अग्नि और सोम नाम की पांच कलाओं में ) ब्रह्मा, इन्द्र और विष्णु हृदय की गुहा में स्थित विशेष प्रकार के प्राण हैं । अग्नि जो चतुर्थ कला है अक्षर पुरुष कों उपे दो भेदों में विभक्त करके समझना होगा । उनमें एकतो है मर्त्य अग्नि, जो शरीर में रहता है, जो पांच महाभूतों में परिगणित होता हुआ ( क्षर और अक्षर का संमिश्रित स्वरूप है ) अक्षर अग्नि का दूसरा भाग है अमृताग्नि, जो देवमय है । यह अमृत अग्नि शरीर स्थित भी है, तथा शरीर से बाहर भी अपनी स्थिति रखता है । दोनों ही प्रकार का यह अग्नि शरोर पिण्ड़ के भीतर रह कर आगे उठने के लिए सचेष्ट होता हुआ नाभि प्रदेश से आगे निकल कर बाहर निकलने की चेष्टा में रहता है. अक्षर पुरुष की पांचवीं कला क रूप में जो सोम बतलाया गया है वह सभी दिशाओं से शरीर पिण्ड़ की ओर प्रवाहित है और प्रत्येक शरीर के बाहर के प्रदेशों में रहता हुआ, इस शरीर के हृदय प्रदेश में प्रवेश करने की चेष्टा में लगा रहता है ।

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विज्ञानविद्यत् १७. इह हि ब्रह्मणो वाड्. -मयत्वादुत्का मकेन्द्र कर्मणोत्क्रमितो ब्रह्मवितानोऽपि नून वागेव स्यात् । सेयं वाग् ब्रम्हणः स्थानात् पिण्डान्तर्दहरहृदयाद् यावद्दूरं बहिर्धा वितायते, तावतः प्रदेशस्याष्टाचत्वारिंशद्विभागाः कल्प्याः । तत्र ये त्रयस्त्रशद्विभागास्तान्यहानि । ये त्वां विभाजकावच्छेदास्ता रात्रयः । इत्थमहोरात्ररूपा एते विभागा इष्यन्ते । श्रहोरा- त्रसन्धयस्तु विष्णुसंज्ञाः सामवेदे निरुक्ताः । तत्र मर्त्ये पिण्डपर्यन्तं शरीरम्, तत्र मत्यग्निः संसृज्यते । शरीरपृष्ठसंसक्तात्त. भागत्रयादूर्ध्वः पञ्चभिः षट्कैः पञ्च स्तोमाः प्रभवन्ति । आद्यं तु भागत्रयमेकः स्तोमः । तस्मादूर्ध्व प्रथमषट्कयोगे त्रिवृत्त्सोमः । ततो द्वितीयषट्कयोगे पञ्चदशस्तोमः । ततस्तृतीयषट्कयोगे एकविंशस्तोमः । ततश्चतुर्थषट्कयोगे त्रिणवः स्तोमः । ततः पञ्चम- षट्कयोगे त्रयस्त्रिंशःस्तोमः । इत्थं पञ्च स्तोमाः सिद्धयन्ति । तत्र एकविंशस्तोमपर्यन्तम- मृताग्निभागः पर्यवसीदति । तदूर्ध्व द्वौ स्तोमौ सोमभागः । तत्थिमिदमग्नीसोमात्म कम- होरात्रं जगत् । अब यहां यह भी समझना आवश्यक है कि ब्रह्मा है वाड्.मय । उसका उत्क्रमण के केन्द्र के उत्क्रान्त होने वाले कर्म से ब्रह्म का वितान भो वाक् ही होगा । यह वाक् शरीर के भीतर हृदय प्रदेश रूपी गुहा से जितनी दूर तक बाहर फैलती है, वहां तक के अड़तालिस विभागों की कल्पना करनी होती है । उनमें जो तैतीस विभाग हैं, वे ' अह' या दिन कहे जाते हैं । और जो दिन के विभाजक भाग हैं, वे रात्रियां हैं । इस प्रकार ये विभाग अहोरात्र के रूप में अभीष्ट होते हैं । अहोरात्रों की सन्धियों को तो सामवेद में विष्णु रूप बतलाया गया है । वहां इस पिण्ड तक का जो शरीर है वह मर्त्य या मरण धर्मा है । उस में मर्त्य अग्नि का संयोग रहता है । शरीर के पृष्ठ भाग से संयुक्त तीन भागों के ऊपर स्थित पांच षट्क हैं उनसे पांच स्तोम बनते हैं । आदि के तीन भागों का एक स्तोम है । उसके ऊपर प्रथम षट्क के योग वाला त्रिवृत् स्तोम है । उसके अनन्तर दो षट्कों के होने पर पन्द्रह का स्तोम बनता है । उसके अनन्तर तीसरे षट्क से संयुक्त होने पर इक्किस का स्तोम है । उसके अनन्तर चतुर्थ षट्क के योग होने पर सत्ताइस का स्तोम है । उस के अनन्तर पञ्चम षट्क के योग होने पर तैंतीस का स्तोम बनता है । इस प्रकार ये पांच स्तोम सिद्ध होते हैं । इनमें इक्कीसवें स्तोम तक अमृताग्निका भाग समाप्त हो जाता है । उसके ऊपर के दो स्तोम सोम के भाग हैं । इस प्रकार यह अग्नि सोमात्मक अहोरात्र रूपी जगत्

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18 विज्ञानविद्यत तन त्रिवृत्पञ्चदशैकविंशभेदादग्निस्त्रेधा विभज्यते-अग्निश्च वायुश्च प्रादि- त्यश्च । तदर्ध्व स्तोमद्वयभेदात् सोमो द्वधा विभज्यते- ब्रम्हणस्पतिः सोमः, दिक्सोमश्च । तदित्थमग्निभेदत्रय- सोमभेदद्वयभेदात् पञ्चदेवताः संपद्यन्ते -श्रग्निवायुसूर्याः, भास्वरसोम- दिक्सोमौ च । तत्र द्वावपि सोमौ-श्रग्नित्रये नित्यं हूयेते । ततोग्निः सूर्ये वा पृथिव्यां वा, अस्माकं शरीरेषु वा नित्यं प्रज्वलितस्तिष्ठति । सोऽयं यज्ञः प्रतिव्यक्तिजीवनहेतुद्रष्टव्यः । सह यज्ञाः सर्वाः प्रजाः प्रजापतिना सृष्टाः सन्ति । यस्था व्यक्तः स्वयज्ञो नश्यति, सा व्यक्तिम्रियते विनश्यति । तत्रापि श्रग्निमयभागे पुनरन्ये त्रयस्त्रिंशद् देवा इष्यन्ते । त्रिवृतस्तोमेऽष्टौ वसवः, पञ्चदशस्तोमे' एकादश रुद्राः, एकविशस्तोमे द्वादशादित्याः -इत्थमेकत्रिंशत् । वहां त्रिवृत्, पञ्चदश ( पन्द्रह) तथा एकविंश ( इक्किस ) इन भेदों से अग्नि तीन प्रकार से विभक्त होता है- अग्नि, वायु और आदित्य । उसके ऊपर दो स्तोमों के भेद से सोम तत्व दो रूपों में विभक्त है - ब्रह्मणस्पति सोम, तथा दिक्सोम । इस प्रकार अग्नि के तीन भेद तथा सोमि के दो भेदों को सम्मिलित करने पर पांच देवता हैं - अग्नि, वायु, सूर्य, भास्वरसोम और दिक् सोम । ये दोनों प्रकार के सोम तीन अग्नियों में नित्य आहुत होरहे हैं । इसलिए अग्नि सूर्यरूप में पृथिवी या हमारे शरीरों में नित्य ही प्रज्वलित होता हुआ विराजमान है । सोम के अग्नि में आहुत होने से सम्पन्न होने वाला यह यज्ञ प्रत्येक व्यक्ति में जीवन के संचार का हेतु है यह समझना चाहिए । प्रजापति ने समस्त प्रजा को यज्ञ के साथ उत्पन्न किया है । जिस व्यक्ति का अपना यज्ञ नष्ट हो जाता वह व्यक्ति नष्ट हो जाता है या मर जाता है । वहां भी अग्निमय भाग में फिर तैतीस देवता हैं । त्रिवृत् स्तोम में आठ वसु हैं । पंचदश स्तोम में एकादश रुद्र हैं तथा इक्किस स्तोम में बारह आदित्य हैं । इस प्रकार ये हुए इकतिस देव गण । अथ पृथिव्यन्तरिक्षयोरन्तरिक्षदिवोश्चेति द्वौ सन्धी त्रयस्त्रशौ । अथवा द्यावापृ- थिव्यौ त्रयस्त्रयौ | अथवा अश्विनौ त्रयत्रिशौ । अथवा पृथवीगर्भस्थः प्रजापतिः, द्यगर्भ- स्थ इन्द्र इत्येतौ त्रयस्त्रिशौ । अथवा प्रजापतिवषट्कारौ त्रयस्त्रिशौ । नातिविशेषा इमे पक्षाः । तत्र नाभेः प्रधिपर्यन्तं विषूचीना वाक् वषट्कारः । तस्य त्रयस्त्रशत्स्तोमात्म- कत्वादस्य वषट्कारस्य यदुद्गीथरूपं हृदयं भवति, स सप्तदशः प्रजापतिः । वषट्कारस्य वाग्वितानरूपतया वितानस्येन्द्रधर्मतया चेन्द्रत्वमन्ये इच्छन्ति । इत्थमेते त्रयस्त्रशद् यज्ञिया देवा उच्यन्ते तदित्थमग्निः सर्वा देवताः सिद्धयन्ति । अथ सोमाहुत्यैव - अग्निरूपसिद्ध: सोमः सर्वा देवता इत्यपि सिद्धम् । इत्थमग्नीषोमो व्याख्यातौ ।

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विज्ञानविद्युत् १६. अब तैतीस संख्या की पूर्ति में पृथिवी तथा अन्तरिक्ष की सन्धि में स्थित तथा अन्तरिक्ष और लोक की संधि में स्थित दो देवों की गणना की जाती है । दूसरा मत या पक्ष द्यौ और पृथिवी को मिला कर देवताओं की तैतीस संख्या पूर्ण करने का है । तीसरा पक्ष आश्विनी कुमारों की गणना के द्वारा तैतीस संख्या की पूर्ति करता है । चौथा पक्ष इस अवशिष्ट दो की गणना में पृथिवी के गर्भ में स्थित प्रजापति तथा द्युलोक के गर्भ में स्थित इन्द्र को सम्मिलित करता है । पांचवां पक्ष प्रजापति और वषट् कार की गणना से सम्पन्न किया जाता है । ये सभी पक्ष ऐसे हैं जिन में कोई अधिक भेद नहीं है । यहां नाभि से प्रधिपर्यन्त विषूची नाम की वाक् को वषट्कार कहाजा है.। वह वषट्कार तौ तीस स्तोम तक है । अतः इस वषट्कार का जो उद्गीथ रूपी हृदय है, वह सत्रहवां प्रजापति है । अन्य आचार्य इस वषट्कार को इन्द्र ही कहना चाहते हैं क्योंकि वह वपट्कार वाक् का ही वितान या विस्तार है और वितान या विस्तार इन्द्र के धर्म के रूप में मान्य है । इस प्रकार ये ते तिस यज्ञ के देव हुए । अब हम सोम को भी सर्व देवमय मानते हैं क्योंकि अग्निको अपने स्वरूप की प्राप्ति सोम की आहुति के अनन्तर ही होती है । यह हुई व्यारव्या अग्नि और सोम की पंचाक्षर विवर्त्ताः वेद -यज्ञ - प्रजा -लोक -धर्माः एषु च पञ्चाक्षरेषु ब्रह्मा वेदमयः विष्णुर्यज्ञमयः इन्द्रः प्रजामयः अग्निर्लोकमयः सोमो धर्ममयः प्रतिपद्यते । एषामेव वेद -यज्ञ-प्रजा-लोक -धर्माणां संघरूपेयमेकैका व्यक्तिः प्रतिभाति । तत्र ऋक्- साम - यजूंषि, प्रथर्वा चेत्येते चत्वारो वेदाः । अक्षर के पांच विवर्त वेद, यज्ञ, प्रजा, लोक, धर्म इन पांचों अक्षरों में ब्रह्मा वेद मय है । विष्णु यज्ञ मय है । इन्द्र प्रजामय है । अग्नि लोकमय है । सोम धर्ममय है, यह समझाया गया है । इन्हीं वेद, यज्ञ, प्रजा, लोक और धर्मों का समूह रूपी यहां एक-एक व्यक्ति या व्यष्टि प्रकट है । चार वेद हैं - ऋक्, यजु, साम और अथर्व ।

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२० विज्ञानविद्युत् तत्राग्निमयपिण्डहृदयात् प्रवर्त्तमाना एकविशस्तोमान्तं पिण्डवित्र' सनलज्ञणेन वितानेन वितायमाना श्रन्नादाग्निसमुच्चिता वागेव ऋगरूपम् । ऋचो मूर्तित्वात् मूर्तेः पिण्डत्त्वात्, पिण्डस्य चान्नादाग्निमयत्त्वात् । तस्या श्रग्निः प्रभवः । अन्नादाग्निसमुच्चितवा- गग्निरेवास्या रूपम् । श्रादित्यतः प्रत्यावर्त्तमाना ब्रह्मणि सोमाहुतिमाहूयमाना प्राण- ग्निसमुच्चता वागेव सामरूपम् । साम्नः सप्तमस्यावयवस्य निधनस्योच्चस्थानतया तत्र पिण्डोच्छेदादन्नादाग्निसमोपसंहा- रात् । तस्या श्रादित्यः प्रभवः । श्रथ साम्नस्तेजो लक्षणत्वात्, तेजसो विरलातिसूक्ष्मावयवत्वेनान्तः प्रवेशितया प्राणाग्नि- मयत्त्वात् । आदित्य एवास्या रूपम् । प्राणाग्निसमुञ्चितवागग्नेरेवादित्यरूपेणोत्पत्तेः प्राणाग्निवागग्नियोगस्यादित्यरूपानुविधा- नित्त्वमुपपद्यते । पुनश्च ऋक्सामयोरन्तरतश्चर- स्थिरभेदाद् द्वधा विभक्ता या वाक् सा यजुः । तत्र यो गतिमान् भावः स वायुर्नाम । यः स्थितिमान् भावः स श्राकाशो जूः नाम । वायुश्च श्रा- काशश्च परस्परतः सन्धीयेते-सा वाक् यज्जूः सती परोक्षतया यजुरित्युच्यते । इतो यजुष एव वाय्वाकाशरूपात् सर्वे यज्ञाः सर्वाः प्रजाः सर्वे लोकाः, सर्वे धर्माश्चोत्पद्यन्ते । वहां अग्नि के पिण्ड रूप हृदय से प्रादुर्भूत होती हुई इक्कीसवें स्तोम तक पिण्ड को वित्रसित करने वाले या चलायमान करने की पहिचान वाले फैलाव विस्तार या वितान से फैलने वाली अन्नाद नाम के अग्नि के द्वारा एकत्रीकृत जो वाक् है उसे ऋग्वेद का रूप समझना चाहिए । इसलिए ऋचा मूर्त है । मूर्ति पिण्ड है, और पिण्ड अन्नाद अग्निमय है । अग्नि ही उसका उत्पादक है । अन्न भक्षक अग्नि के द्वारा संप्रस्तुत वाक्रूपी अग्नि ही इस ऋग्वेद का रूप है । आदित्य से वापस लौटती हुई, ब्रह्मा में सोम की आहुति का आवाहन करती हुई, प्राणाग्नि से संगृहीत बाक् ही सामवेद स्वरूपिणी है । इस प्रक्रिया से फैलने वाली अन्नाद अग्नि के द्वारा एकत्रित वाक् ही ऋक् का रूप हैं । क्योंकि ऋचा मूर्ति है, मूर्ति पिण्ड होती है तथा पिण्ड अन्नाद अग्निमय होता है । अग्नि ही उसका उत्पत्ति स्थान है । अन्नाद अग्नि से एकत्रित वाक् रूपी अग्नि ही इसका रूप है । आदित्य से लौटने वाली ब्रह्मा में सोम की आ आवाहनकरने वाली प्राणाग्नि से एकत्रीकृत वाक् ही साम रूप है । क्योंकि साम के सप्तम अवयव निधन ऋचा के उच्च स्थान पर स्थित रहने के कारण वहां पिण्ड के उच्छेद होने से अन्नाद अग्नि तथा सोम का वहां उपसंहार हो जाता है । इस

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विज्ञानविद्यत् २१ साम रूपी वाक् का उत्पत्ति स्थान आदित्य है । इस साम रूपी वाक् का स्वरूप तेजोमय है । तेज विरल होता है और अत्यन्त सूक्ष्म अवयव वाला होने के कारण तथा अन्तः प्रवेश करने की क्षमता के कारण वह प्राणाग्निमय है । इसका रूप आदित्य ही है । प्राणाग्नि से एकत्रीकृत वाक् अग्नि ही आदित्य के रूप में उत्पन्न होती है अतः प्राणग्नि तथा वाक् रूपी अग्नि के योग से आदित्य के रूप का सम्पादन होना युक्ति युक्त है । इन दोनों ऋक् और साम के मध्य में संचरण करने वाली तथा स्थिर रहने वाली दो रूपों में प्रकट जो वाक् है वह यजु है । यजु का जो गतिमान स्वरूप है उसका नाम वायु है । तथा यजु का जो स्थिति मान रूप है वह आकाश है । यजु में यत् तथा जू ये दो शब्द हैं । फलतः यत को वायु कहा गया तथा जूः को आकाश । वायु और आकाश परस्पर मिले रहते हैं । उनके सन्धिस्थल में जो वाक् है उनका नाम "यज्जू " है । उसी को परोक्ष भाषा में यजु यह कहा जाता है । वायु आकाश रूपी इस यजु से ही समस्त यज्ञ, समस्त प्रजा, समस्त लोक, तथा समस्त धर्मं उत्पन्न होते हैं । शान्तक्षुब्धभेदाद् द्वधा विभक्तो यजुर्वेद ऐवैतेषां यज्ञप्रजालोकधर्माणां प्रभवः प्रतिष्ठा परायणञ्च । त एते त्रयो वेदा श्रग्निवाखादित्यरूपा श्रग्निमया एवेष्यन्ते । श्रग्निमयत्त्वमेव चंतस्था वेदत्रय्याः साधर्म्यम् । श्रत एव चैषा त्रयी सोममयाथर्ववेदात् पृथगध्यवसीयते । एकविशस्तोमादूर्ध्व त्रयस्त्रिशस्तोमपर्यन्तं सोममयी वागेवाऽथर्ववेद इत्य- थर्ववेदे गोपथब्राम्हणे निरूपितम् । एते चत्वारो वेदा वाड.मया ब्रम्हणो रूपं भवति । एभिरेव चतुभिर्वेरियमेकैका व्यक्तिः प्रतिष्ठां लभते । प्रतिष्ठितायां व्यक्तावस्तीति बुद्धि- भवति । प्रतवोक्तं वेदे— "ब्रम्हास्य सर्वस्य प्रतिष्ठा ' ( शत 61181 ) । "सर्वाणीमानि भूतानि त्रय्यां बाव प्रतिष्ठितानि”" (शत. 10। 4 । 2। 22 ) इति च । ऋक्सामयोर्यजुषोऽथर्वणश्चेत्येतेषां वेदविशेषाणां रूपमन्यत्र विस्तरतो व्याख्यातं द्रष्टव्यम् । शान्त तथा क्षुब्ध इन भेदों में दो रूपों में विभक्त यजुर्वेद ही इन यज्ञ, प्रजा, लोक और धर्मों का उत्पादक प्रतिष्ठापक तथा लयस्थान है । ये तीनों वेद अग्नि वायु तथा आदित्य रूप हैं 1। ये अग्नि रूप ही माने गये हैं । अग्निरूपता ही इन तीनों भेदों की समान धर्म है । इसीलिए यह त्रयी सोममय अथर्ववेद से पृथक् समझी जाती है । इक्कीस स्तोम के ऊपर तौ तीस स्तोम तक जो सोममयी वाक् है वह अथर्ववेद है, यह विषय अथर्ववेद के गोपथ ब्राह्मण में निरूपित हुआ है । ये वाड, मय चारों वेद ब्रह्मा के रूप बनते हैं । इन्हीं चारों वेदों से एक-एक व्यक्ति प्रतिष्ठा प्राप्त करता है । प्रतिष्ठित होने के अनन्तर व्यक्ति में अस्तित्व आता है । इसलिए वेद में कहा गया है कि,

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२२ विज्ञानविद्य त् " इस सभी की ब्रह्म ही प्रतिष्ठा है [रा. ब्रा. ६ / १ / ८] "यह समस्त भूत त्रयी विद्या में प्रतिष्ठित है । ऋक् साम, यजु तथा अथर्व इन वेद विशेषों का स्वरूपतः व्याख्यान विस्तार से अन्य ग्रन्थों में मिलेगा । एभिरेव च वेदैर्यज्ञस्वरूपं सम्पद्यते । तत्र च ब्रम्हणस्तावत् त्रैविध्यं भवति- उक्थम्, अर्कः, अशितिश्च । तत्र उक्थं ब्रम्हणो वाड्.मयस्य हृद्ग्रन्थिमयो रूप विशेषः । यतोऽर्क उत्तिष्ठते तदुक्थं भूमिविशेषः । तत उत्थितो योऽन्नमत्तं मर्चश्चरति सोऽर्को नाम । सोऽयमन्नादः प्राणाऽन्नमभिप्रवर्तमानो यतस्ततः स्वामशिति बलात् परिगृहणन् आत्म- न्यागत्य शान्तो भवति । प्रशितिरन्नम् । तदन्नमर्कप्राणे प्रविशत् सदर्क सम्पद्यते । ऊच रसः । स पश्चादर्कप्राणो भूत्वा स्वरूपतश्च्यवते । प्राणश्चोक्थे विलीयते, - इत्ये- षः क्रमः सर्वत्रानवरतमनुवर्तमानो भवति । तत्रायमन्नोर्क प्राणानामन्योऽन्यपरिग्रहो यज्ञ इति यजुर्वेदे वाजसनेयब्राह्मणे निरूपितम् । तदित्थं ब्रह्मणि प्रवर्तमानो यज्ञ एवायं वि- माख्यायते । एष यज्ञमयो विष्णुरेव प्रतिष्ठमानानां सर्वेषां जीवनरूपा स्थिति- भवति । यावदयमात्मयज्ञस्तावदेवायं पुरुषो जीवंस्तिष्ठति, यज्ञविनाशे, सर्वो म्रियते विन- श्यति । सोऽयं यज्ञोऽन्नादप्राणः । इन्हीं वेदों से यज्ञ के स्वरूप का सम्पादन होता है । वहाँ ब्रह्मा तीन रूपों में विभक्त हो जाता है । उन रूपों के नाम है उक्थ, अर्क, तथा अशिति । इनमें वङमय ब्रह्मा का हृदय ग्रन्थिमयं विशेष रूप उक्थ कहलाता है । वह विशेष भूमी उक्थ है जहाँ से अर्क का उत्थान होता है । उक्थ से उठकर जो अन्न का भक्षण करने के लिए विचरण करता है उसका नाम अर्क है । यह वही अन्नाद है जो प्राणों के चारों ओर घूमता हुआ अपने भोक्तव्य को बलात ग्रहण करता हुआ वापस आत्मा में पहुंचकर शान्त हो जाता है । अशिति अन्न को ही कहते हैं, वह अन्न अर्क प्राण में प्रवेश करता हुआ ऊर्क बन जाता है । ऊर्क ही रस कहलाता है, बाद में वह अर्क प्राण होकर अपने स्वरूप को छोड़ता है । प्राण उक्थ में विलीन हो जाता है । यही वह क्रम है जो सर्वत्र निरन्तर अनुवर्त्तमान होता है । अन्न और अर्क प्राणों का एक दूसरे में परिवर्तन होना है । यह विषय यजुर्वेद के वाजसनेयि ब्राह्मण में निरूपितः हुआ है । इस प्रकार ब्रह्मा में प्रवृत्त होने वाला यज्ञ ही विष्णु के नाम से विख्यात होता है । यह यज्ञमय विष्णु ही सभी विद्यमान जगत् की जीवनरूपिणी स्थिति होती है । जब तक यह आत्म यज्ञ चलता है तभी तक पुरुष जीवित रहता है । यज्ञ को बिनष्ट होने पर सभी का मरण या विनाश हो जाता है । यह यज्ञ अन्नाद प्राण ह ।

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विज्ञानविद्यत् २३ अथ ब्रह्मणि यज्ञवशादुत्पद्यमाना यजुर्वेद विकारभूताः सर्वेऽप्यर्थाः प्रजा उच्य न्ते । ताश्च प्रजास्त्रेधा- बीजस्, देवाः, भूतानि च । श्राकाशवायुतेजोजल पृथिव्याः पञ्च- भूतानि । श्रग्निवाय्वादित्य-चन्द्रवरुण-नामानोऽग्नित्रय - सोमद्वयरूपविशेषाः पञ्चदेवाः । एवमविद्या, अस्मिता, राग द्वेषौ, अभिनिवेश इति पञ्चवलेशाः कर्ममयानि भोग बी- जानि । पञ्चबीजमयं कारणशरीरम् पञ्चदेवमयं सूक्ष्मशरीरम् । पञ्चभूतमयं स्थूलशरी- रम् । इत्थमेताः पञ्चदशकला इन्द्रमात्मानं षोडशिनमावृत्य परितस्तिष्ठन्ति । ता एता इन्द्रस्य प्रजा भवन्ति । श्रभिरेव प्रजाभिः कृते भोगायतने शरीरे परिव्याप्य तिष्ठन्नय- मिन्द्रः स्वैरिन्द्रियैः सर्वान् भोगानुपभुङ्क्त । सोऽयमिन्द्रः प्रजामयः । अब ब्रह्मा में यज्ञ के कारण उत्पन्न होने वाले यजुर्वेद के विकार स्वरूप सभी पदार्थ प्रजा कहलाते हैं । यह प्रजा तीन प्रकार की है - बीज, देव, तथा भूत । आकाश वायु, तेज, जल और पृथिवी ये पांच भूत हैं । अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्र, वरुण नाम क तीन अग्नि और दो सोम के रूप विशेष पांच देवता हैं । इसी प्रकार अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश ये पांच क्लेश हैं, ये हो कर्मों से उत्पन्न होने वाले भोगों को बीज हैं । पांच बीज वाला कारण शरीर है । पांच देवों वाला सूक्ष्म शरीर है । पांच भूतों वाला स्थूल शरीर है । इस प्रकार ये पन्द्रह कलाएं हैं । ये सोहलवें आत्म स्वरूप इन्द्र का चारों और से आवरण करके स्थित हैं । यही इन्द्रकी प्रजा हैं । इन्हीं प्रजाओं के द्वारा बनाये गए भोगों के आयतन शरीर में व्याप्त होकर यह इन्द्र अपनी इन्द्रियों से समस्त भोगों का उपभोग करता है । यही प्रजामय इन्द्र है । ता एताः प्रजायं भावमुपेत्य संहता अपूर्वेर्नामरूपकर्मभिः संपन्नतमा लोक्यन्ते स एवासां लोको नामाख्यायते । स त्रिविधः सप्तभुवनरूपः त्रिभुवनरूपः जनश्च । भूः- भुवः -स्वः - महः-जनः -तपः - सत्यम् - इति सप्तैतानि भुवनानि । पृथ्वी -अन्तरिक्ष-द्यौ: - इति त्रीणि भुवनानि । अथ मनः प्राणः-वाक् वायुः - तेजः-आपः - श्रन्नम्- इति संचरक्रमे सप्त जनाः । अन्नम्-श्रापः -तेजः -वायुः -वाक् प्राणः -मनः-इति प्रतिसंच रक्रमे सप्त जनाः । तमी सप्तलोका भाव्याः । सर्वाणि भूतान्येषामेवान्यतमे कस्मिंश्चिदेकभावे लोक्यन्ते । श्रपि: -चाहुः -जीवलोक: -देवलोक: - पितृलोक इत्येते त्रयो लोकाः । इयमेव पृथ्वी जीव- लोकः । एष सूर्यो देवलोकः । एष चन्द्रामाः पितृलोकः । एषामेवान्यतमे देशविभागे क्वचि दयमात्मा प्रचरन्नुपपद्यते नातोऽन्यत्र तिष्ठति वा गच्छति वा । अपि च नक्तं दृष्टा चन्द्रि का दिवापि सति चन्द्र सम्भाव्यते, किन्तु नोपलभ्यते । न वा चन्द्रिका सूर्यज्योतिषि कचिद्विशेष धोयते, सूर्यज्योतिष: शुक्लपक्षे कृष्णपक्षे चाविशेषेण दृष्टत्वात् । तस्मादेषा

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विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 30 का मूल पृष्ठ
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२४ विज्ञानविद्यत् चन्द्रिका सूर्यज्योतिषाऽभिभूयमाना सूर्यज्योतीषीरूपे परिवर्तते इति लोकान्तरीभाव उप- चर्य्यते । तथा चाहु:- "अग्ने म एव दिवा दृश्यते नाचिः । अचिरेव नक्तं दृश्यते न धूम ” इति । सोऽयं भावानामवस्थापरिणामो लोकाल्लोकान्तरे गमनमुपपद्यते । तस्य तथाsa स्थाया विलोक्यमानत्वात् अद्भिश्चैते सर्वे लोका अन्यथाऽन्यथा नामरूपा जायन्ते । तेषु सर्वेषु लोकेषूपंस्थित मग्निमेवान्यथान्यथा पश्यन्तीति पशुरयमग्निः । लोकावस्थानभेदाच्चैतस्य पाशुकस्याग्नेरियमनेकधा भिन्नाऽवस्था दृश्यते । तथा चायमग्निर्लोकमयो व्याख्यातः । यह प्रजा जिस भाव को प्राप्त कर एकत्रित होकर अपूर्व नाम रूप और कर्मों से अत्यन्त सम्पन्न दिखाई देती है वह इन का लोक कहलाता है । वह तीन प्रकार का है-सप्त भुवन रूप, त्रिभुवन रूप तथा जन लोक । भू, भुवः स्वः, महः, जनः, तप तथा सत्य ये' सात भुवन हैं । पृथिवी, अन्तरिक्ष तथा द्य, ये तीन भुवन हैं । मन, प्राण, वाक्, वायु, तेज, अप्. अन्न ये संचरक्रम में सात जन हैं । प्रतिसचर क्रम में सात जन हैं अन्न, अप्, तेज, वायु, वाक् प्राण और मन | ये लोक समझने चाहिये | समस्त भूत इन्हीं में से किसी न किसी क भाव में दिखाई देते हैं । कुछ अन्य मत यह भी है कि जीवलोक, देवलोक, पितृ लोक ये तीन लोक हैं । यह पृथ्वी जीवलोक है । सूर्य देवलोक है । चन्द्रमा पितृलोक है । ' इन्हीं लोको को किसी देश के विभाग में घूमता हुआ यह आत्मा प्रतीत होता है । इनके अतिरिक्त यह कहीं न जाता है न रहता है । पुनश्च रात्रि में दिखाई देने वाली चांदनी दिन में चन्द्रमा को रहने पर संभावित है, किन्तु उसकी उपलब्धि नहीं होती । ऐसा भी नहीं है कि चांदनी क द्वारा सूर्य के प्रकाश में कोई विशेषता लाई जा रही हो, क्योंकि, सूर्य की ज्योति शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में समान ही रहती है । इसलिए यह चन्द्र की ज्योति सूर्य के प्रकाश से दबती हुई सूर्य को प्रकाश क रूप में ही बदल जाती है, इसलिए उसे दूसराकेक · गौण रूप में मान लिया जाता है । कहा गया है कि "अग्नि का धुंआ ही दिन में दिखाई देता है, ज्वाला नहीं दिखाई देती, रात्रि में ज्वाला ही दिखाई देती है, धुंआ नहीं दिखाई देता ” यह पदार्थों या भावों की अवस्था का परिणाम ही एक लोक से दूसरे लोक में गमन समझा जाता है । क्योंकि पदार्थों की ऐसी ही अवस्था दिखाई देती है । जल के द्वारा ये सारे लोक दूसरे नाम और रूप वाले हो जाते हैं ।उन सब लोकों में उपस्थित जो अग्नि है वही अन्य अन्य रूपों दिखाई देने से यह अग्नि पशु भाव को प्राप्त हो जाता है । लोकों में अपनी संस्थिति के भेद से पशु भावापन्न इस अग्नि की भिन्न अवस्थाएं दिखाई देती । इस प्रकार यह अग्नि लोकमय है यह व्याख्यान किया गया ।)