विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 31–40

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 31–40

पृष्ठ 31

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 31 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानविद्यत् २५ यतिरिक्तानि यावन्ति वीर्याणि प्रजासु लोकेषु दृश्यन्ते यत्रयैरेषामिन्द्रिय- ग्राह्यतोपपद्यते, ते सर्वे धर्माः प्रजारूपाः । चतुर्विधो हि भावो धर्मभेदाच्चोपपद्यते दिव्य- भावाः, वीरभावाः, पशुभावाः, मृतभावाश्चेति भेदात् । एषामेव चतुर्णां भावानामुत्पा- प्राणविशेषा वीर्याणि । तानि चतुर्धा ब्रह्म क्षत्रं विट शूद्रञ्चेति । यतः शान्तिलक्षणो दिव्यो भावः सम्पद्यते तदिदं ब्रह्म । यत उत्साहलक्षणो वीरभावस्तत् क्षत्रम् । अध्या- त्मगौरवं पूर्ण भवतीति तत्सत्वं शरण्यं सम्पद्यते श्राश्रितानामापद्भ्यस्त्रायते । अथ यतः पशुभावः, यत्रात्मगौरवहीना शान्तिः येन वा श्रात्मानमापद्भ्यस्त्रातुमसमर्थः परात्मानमाश्रयते तद् वीर्यं विट् । सर्ववीर्यस्तम्भनलक्षणम्, सर्ववीर्यानुद्बोधलक्षगं वा- मृतवीर्यम् । पूर्वेस्त्रिभिर्वीर्ये: सत्वं धृतिमद् भवति । मृतवीर्यं तु सत्वं धृतेश्च्यवते, भयकातरतयाऽतिसामान्यतोऽपि दीर्यादुद्विजते, प्राशु द्रवति, तच्छद्रम् । क्षुद्रवीर्य्यः प्राणी शूद्रः । परे त्वाहुः यदेव किञ्चिच्छान्तं रूपम्, यत्र वा ज्ञानं क्रिया अर्थश्च प्रसन्न- रूपा उपपद्यन्ते, तद् ब्रह्मवीर्यम् । यत्त परिक्षुब्ध रूपन्, 'यत्र वा ज्ञानं, क्रिया, अर्थश्च विक्लिष्टाः परान् प्रत्याक्रममाणा उपपद्यन्ते, निग्रहानुग्रहाभ्यां परानात्मन्याधत्त, तत् क्षत्रवीर्य्यम् । अथ यच्छान्तं समृद्ध रूपम्, यत्र वा ज्ञानं क्रिया-अर्थश्चवरोह्यमाणा च विशन्तः प्रतिभान्ति तद् विड्वीर्यम् । एतच्च वीर्य्यत्रयमग्निवाय्वादित्यैरग्निविशेषः. कृतछन्दस्कं भवति । छन्दितत्त्वाच्च समर्यादीनि तानि त्रीणि वीर्याणि सम्यगाहितानि भवन्ति, न प्रच्यवन्ते, न पतन्ति । इनके अतिरिक्त जितने वीर्य प्रजाओं में तथा लोकों में दिखाई देते हैं, जिन वीर्यों के कारण इनकी इन्द्रियों के द्वारा ग्राह्यता बनती है । वे सभी धर्म प्रजारूप हैं । चार प्रकार के भाव धर्म के भेद से बनते हैं । दिव्यभाव, वीरभाव, पशु भाव, और मृत भाव है । इन्हीं चारों भावों के उत्पादक प्राण विशेष वीर्य कहे जाते हैं । वे चार प्रकार के हैं ब्रह्म, क्षत्र, विश और शूद्र । जिससे शान्तिस्वरूप वाला दिव्य भाव सम्पन्न होता है । वह है ब्रह्म वीर्य । जिससे उत्साह रूप वाला वीर भाव बनता है वह है क्षत्र वीर्यं । क्षत्रवीर्य में अध्यात्म का गौरवपूर्ण होता है, इसलिए यह क्षत्र बल शरण देने वाला होता है, यह आश्रितों की आपत्ति से रक्षा करता है । जहां होता है पशु भाव, जहाँ आत्मगौरव से रहित शान्ति रहती है अथवा जिसके कारण स्वयं की आपत्तियों से रक्षा में

पृष्ठ 32

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 32 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२६ विज्ञानवद्य त् असमर्थता के कारण दूसरे का आश्रय लिया जाता है वह विट् वीर्य कहलाता है । समस्त वीर्य का स्तम्भन करने वाला, अथवा वीर्य को उद्बुद्ध न होने देने वाला मृत वीर्य होता है । इनमें प्रथम के तीन वीर्थों के द्वरा सत्व या अस्तित्व का धारण किया जाता है । मृत वीर्य वाला सत्व धारण शक्ति से विच्युत हो जाता है । भय से कातर भाव को प्राप्त होता हुआ वह अत्यन्त सामान्य वीर्य से भी घबडा जाता है । शीघ्र द्रुत होता है, इसलिए इसे शूद्र कहा गया । जो क्षुद्र वीर्य वाला प्राणी है वह शूद्र है । दूसरे विचारकों का कथन है कि जो भी शान्त रूप है, अथवा जहां ज्ञान क्रिया तथा अर्थ प्रसन्न रूप से उपसम्पन्न हैं, वह ब्रह्मवीर्य है । जो परिक्षुब्ध रूप है, अथवा जहां ज्ञान और क्रिया स्वयं' में क्लिष्ट होते हुए दूसरे पर आक्रमण करते हुए दिखाई देते हैं, जहां निग्रह तथा अनुग्रह दूसरे को अपने में समेटते हैं, वह क्षत्र वीर्य है । वह जो शान्त होता हुआ समृद्धिभय रूप है, जहां ज्ञान, क्रिया और अर्थ झुककर प्रवेश करते हुए प्रतीत होते हैं वह विड्वर्य है | ये तीनों ब्रह्म, क्षत्र तथा विवीर्य अग्नि, वायु तथा आदित्य इन अग्नि विशेषों से छन्दोबद्ध या मर्यादाबद्ध हैं । छन्द से आवृत होने के कारण ये तीनों वीर्य सम्यक् प्रकार से समाहित होते हैं, ये च्युत नहीं होते न गिरते हैं । यत्र तु च्छन्दस्तया मर्यादाराहित्यं तत्रैतानि त्रीणि वीर्याणि, सहसा सामा- न्येभ्य एव हेतुभ्यः प्रच्यवमानानि भवन्ति । एतान्येव विद्यमानान्यपि दौर्बल्यान विशिष्य कार्यकारीणि भवन्ति, तच्छौद्र वीर्य म् । शु-इति प्राशुशब्दः शीघ्रार्थः ।उदिति निपात उत्कृष्टार्थः, द्र इति द्रवणार्थी निद्रा- र्थश्च । तेन यः शीघ्रमधिकं द्रवति, भयाद्विहवलो भवति, अथवा निद्राति, आलस्याद- कर्मण्यो भवति, यत्र वीर्यत्रयं भवदपि नोल्वणं दृश्यते तच्छौद्र वीर्यम् । एतान्येव चत्वारि वीर्याणि चत्वारो धर्मा भवन्ति । एतैरेव चतुभिर्धा में: परिव्याप्तमिदं सर्व पृथक् पृथक् विशिष्यते। एतस्मादन्यद् भोग्यं भवति, भोक्ता वा इत्य- नुसन्धयम् । तदित्थं सर्वजगत्स्वरूपनिर्वाहमा वेद- पल प्रजा-लोक धर्रा एवैते पञ्च भावाः क्रमेण ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्रः, श्रग्निः सोमः - इत्येते पंचदेवाः पञ्चाक्षरपुरुषा वा संज्ञया व्याख्याताः । परन्तु जहां छन्दोबद्ध न होने के कारण मर्यादा नहीं है, वहां ये तीनों वीर्य सहसा सामान्य कारण उपस्थित होते ही प्रच्युत हो जाते हैं । ये वहां विद्यमान रहते हुए भी दुर्ब- लता के कारण विशिष्टकार्य नहीं कर पाते । यह शूद्रवीर्य है ।

पृष्ठ 33

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 33 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानविद्यत् २७ शूद्र शब्द का अर्थ इस प्रकार है कि " शु " अर्थात् आशु, इसका अर्थ है शीघ्र ' उद्' यह निपात प्रकृष्ट अर्थ का बोतक है, 'द्र ' का अर्थ पिघलना तथा निद्रा है । (इन ' शू'- 'उद्'-' द्र' ) से मिलाक' शूद्र शब्द बनता है) इसका अर्थ होता है कि जो शीघ्रता से अधिक पिघल जाय, भय से विह्वल हो जाय, या सोता रहे, आलस्य से जो अकर्मण्य हो जाय, जहां ब्रह्म, क्षत्र, विड् इन तीनों वीर्यों के रहने पर भी वे उद्बुद्ध न हों वह शूद्रवीर्य है । ये ही चार वोर्य चार धर्म होते हैं । इन्हीं चार धर्मों से परिव्याप्त यह समस्त संसार पृथक् विशेषताए रखता है । एक कोई भोक्ता होता है, कोई दूसरा भोग्य होता है, यह समझना चाहिए । इस प्रकार समस्त जगत् के स्वरूप के निर्वाहक, वेद, यज्ञ, प्रजा, लोक, तथा धर्म जो ये पांच बतलाये गये वे ही क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम ये पाँच देव अथवा पाँच अक्षर पुरुष व्याख्यात हुए । श्रव्ययपुरुष निरुक्तिः उक्त पूर्वम्, क्षरपुरुषः परिणामिकारणम्, अक्षरपुरुषो निमित्तकारणम्, ताभ्यां यदन्यत्सोऽव्ययः पुरुषो न कार्यं न कारणमिति । यद्यप्येवमस्मिन्नव्ययपुरुषे कारणत्वं निषिध्यते, तथापि प्रकारान्तरेणाऽस्याव्ययपुरुषस्यैव सर्वकारणत्वं प्रत्येत- व्यम् । भगवद्गीतायामव्ययस्यैव सर्वजगत्कारणत्त्वप्रतिपादनात् । द्विविधं हि कार- णत्वं भवति -कार्योपधायकतालक्षणं स्वरूपसद्योग्यतालक्षणं चेति । द्विविधं यद्यपि क्षराक्षरपुरुषयोरेवास्ति, क्षरस्य समवायिकारणत्वात्, अक्षरस्य निमित्तकारणात्वाच्च । स्वरूपसद्योग्यतालक्षगं तु कारणत्वमव्ययस्याप्यस्त्येव । यथा हि दर्शनलक्षणे कार्ये चक्षुरेव कारणं न तु सूर्यदीपादिकं पश्यति । किन्तु यावता सूर्यप्रकाशेन दीपकाका- शेन वा चक्षुर्न संयुज्यते तावता चक्षुषो दृष्टिकार्योपधायकत्वं नोपपद्यते । तस्मात् प्रकाशहेतुः सूर्यदीपादिः स्त्ररूपतः सन्नेव चक्षुषः कार्ये निर्व्यापारकारणम् । एवम- व्ययपुरुषोऽपि स्वातन्त्र्येण स्वरूपतः पृथक् सन्नेव तदक्षरकार्ये निर्व्यापारं कारणं भवति । ये तु सूर्यदीपादीनां चक्षुषि सहकारिकारणत्वमाचक्षते, ये वा सामान्यतः कारण- त्वमभिप्रयन्तः कारणताया व्यावृत्तित्त्वमाचक्षते तेषामुभयेषामपि सामग्रीघटका- कद्रव्येषु यथा कारणतासमर्पकत्त्वलक्षणं विलक्षणं कारणत्वमभिप्रयते तथैव तस्मिन्नव्ययपुरुषेण्युपपद्यत एव ।

पृष्ठ 34

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 34 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२८ विज्ञानविद्युत् अव्यय पुरुष की निरुक्ति पहले कहा गया कि क्षर पुरुष जगत् का परिणामी कारण है, अक्षर पुरुष निमित्त कारण है, इन दोनों से पृथक् अव्यय पुरुष है । वह न कार्य है न कारण, इस प्रकार यद्यपि इस अव्यय पुरुष में कारणता का निषेध किया जाता है तब भो दूसरी दृष्टि से अव्यय पुरुष ही समस्त जगत् का कारण हैं यह समझना चाहिए । क्यों कि भगवद् गीता में अव्यय को ही समस्त जगत् का कारण बतलाया गया है । कारण दो प्रकार का होता है, एक कार्य पदार्थ का निर्माण करने वाला, दूसरा अपने स्वरूप से कार्य की सत्ता को प्रकट करने वाला । इनमें पहला कारण यद्यपि क्षर और अक्षर पुरुष ही है । क्षर पुरुष संसार का समवायि कारण है तथा अक्षर पुरुष निमित्त कारण है, किन्तु अपने स्वरूप से संसार को भासित करने वाली जो कारणता है वह तो अव्यय पुरुष में भी है । जैसे किसी पदार्थ के देखने रूपी कार्य में नेत्र ही कारण है । सूर्य या दीपक आदि देखते नहीं हैं, परन्तु जब तक नेत्र सूर्य के प्रकाश या दीपक के प्रकाश से संयुक्त नहीं होता तब तक नेत्र में दर्शन रूपी कार्य का सामर्थ्य नहीं आता । इसलिए प्रकाश को उत्पन्न करने वाले सूर्य दीपक आदि अपने स्वरूप से सत्तावान् होते हुए ही नेत्र के दर्शन कार्य में बिना किसी क्रिया को सम्पादित करने पर भी कारण होते हैं । इसी प्रकार अव्यय पुरुष भी अपने स्वरूप से स्वतन्त्रता पूर्वक पृथक्, पृथक् रहता हुआ ही उस अक्षर के कार्य में बिना किसी क्रिया को सम्पादित करतें हुए कारण बनता है । जो विद्वान, सूर्य दीपक आदि को नेत्रों की देखने की क्रिया में सहकारिकारण मानते हैं, अथवा जो लोग किसी भी कार्य के लिए अनेक कारणों की सामग्री को कारण मानते हुए किसी भी कार्य की कारणता को समूह में स्वीकार करते हैं, उन दोनों ही मतों में कारण सामग्री के अवयव अनेक द्रव्यों में जसे कारणता को उपस्थित करने वाला एक विलक्षण कारणत्व अभीष्ट है, वैसा ही कारणत्व अव्यय पुरुष में भी सिद्ध हो जाता है । "तत्तु समन्वयादि" ति भिक्षुसूत्रे समन्वयलक्षणायाः कारणताया श्रभियुक्त राख्यातत्वात् । दृश्यते हि--प्रकाशसमन्वितचक्षुत्र इव अव्ययपुरुषसमन्वितस्यैवा- क्षरपुरुषस्य सर्वस्मिन् कार्यजनने सामर्थ्यलाभः । तस्मात् सिद्धम्-प्रकारणस्याप्ये- तस्याव्ययपुरुषस्य सामान्यतः कारणत्त्वम् । किन्तु सत्यप्येवं कारणत्वे तस्याव्ययस्य विक्रियमाणत्वं नास्तीति परिणाम्युपादानत्वं प्रतिषिध्यते । तथा चाह भगवान् गीता- याम् - " सर्वकर्तारमपि मां विद्व्य कर्तारमव्ययम्" इति । श्रत एव च "न तस्य कार्य्यं करणञ्च विद्यते " इत्येवमादिरूपा कारणत्व- प्रतिषेधिका श्रुतिरपि न विरुध्यत इति बोध्यम् ।

पृष्ठ 35

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 35 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानविद्युत् २६ "तत्त समन्वयात्" इस वेदान्त सूत्र में सामन्य रूपिणी कारणता को आचार्यों ने स्वीकार किया है । देखा भी जाता है कि प्रकाश से समन्वित नेत्र के समान अव्यय पुरुष से समन्वित अक्षर पुरुष का समस्त कार्यों को उत्पन्न करने सामर्थ्य है । इससे सिद्ध हुआ कि कारण न होता हुआ भी यह अव्यय पुरुष समस्त प्रपञ्च का कारण है । किन्तु इस प्रकार कारण होने पर भी उस अव्यय पुरुष में कोई विकार नहीं आता इसलिए वह परि- णाम प्राप्त करने वाला उपादान कारण नहीं माना जाता । इसी बात को भगवान् ने गीता में कहा कि "सबका कर्त्ता होते हुए भी मुझ अव्यय को अकर्त्ता समझो । ” और इसीलिए “ उसका कोई कार्य या करण नहीं है । " इत्यादि उसके कारणत्व का निषेध करने वाली श्रुतियां भी विरुद्ध नहीं होती यह ध्यान देने योग्य है । ] अयं चाव्ययपुरुषः परात्परस्यैव रूपान्तरत्वेन तद्भेदेन च प्रतिपत्तव्यः । एतावस्तु विशेषः - सर्वबल विशिष्टो हि रसः परात्पर इत्याख्यायते । तत्र बलानामानन्त्येऽ- पि यत्तावदेकं मायानामकं बलं सर्वेतरबलापेक्षया समधिकविशालं भवति तावता परिच्छितो रसो रसान्तरात् पृथक्त्वेन भावित एवाव्ययपुरुषो नामोच्यते । श्रमितस्य मितत्त्वं यतः सम्पद्यते सा माया । बलोपहितो रसो वा, सर्वबलविशिष्टो रसो वा यद्य- पि दिग्देशकालानवच्छिन्नत्वादमितोऽवधार्यते किन्तु बलावच्छिन्नत्वे ततः परिमित- वत् क्रियते । तस्मिन् मितिकरणे मायाबले सर्वाण्यन्यानि बलान्युत्पद्यन्ते, प्रतितिष्ठ न्ति, विलीयन्ते । तस्मादयमव्ययपुरुषोऽपि परात्परेणाभिन्नत्वात् सर्वबलवैशिष्ट्याच्च परात्परवत् सर्वधर्मोपपन्नो द्रष्टव्यः । अत एवायमव्ययोऽप्युपनिषदि सर्वधर्मा, सर्वकर्मा, सर्वरसः, सर्वगुणः, इत्यादिभिः शब्देर्भूयसाऽनुव्यःख्यायते । यह अव्यय पुरुष परात्पर का ही दूसरा स्वरूप है या उससे अभिन्न है यह समझना चाहिए । इतनी विशेषता ध्यान में लेनी होगी कि समस्त बलों से विशिष्ट जो रस तत्व है वह परात्पर कहा जाता है । वहां बलों की अनन्तता में भी जो एक माया बल समस्त अन्यों बलों की अपेक्षा अधिक विशाल है, उससे आच्छन्न जो रस है उसे दूसरे रस से पृथक् रूप से समझा जानें पर वह अव्यय पुरुष कहा जाता है । माया वहु है जिससे असीम या अमित का ससीमत्व या सीमा में बन्धन संभावित होता है । बल से सीमित रस, अथवा समस्त बलों से विशिष्ट रस यद्यपि दिशा देश और काल की सीमा में आबद्ध नहीं है, अतः वह असीम रूप से निर्धारित होता है I किन्तु जब वह बल से अंवच्छिन्न या सीमाबद्ध होता है तब वह परिमित की तरह हो जाता है या कर दिया जाता है । परिमित करने वाले उस माया बल में अन्य समस्त बल उत्पन्न होते हैं, प्रतिष्ठित होते हैं और विलीन होते हैं । इसलिए यह अव्यय

पृष्ठ 36

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 36 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३० विज्ञानविद्यत् पुरुष भी परात्पर से अभिन्न होने के कारण तथा समस्त बलों से युक्त होने के कारण परा- त्पर के समान ही समस्त धर्मों से युक्त है यह समझना चाहिए । इसीलिए उपनिषदों में इस अव्यय को भी सर्वधर्म वाला, सर्वकर्म वाला, सर्वरस वाला, सर्वगुण वाला, इत्यादि शब्दों से बार बार बतलाया गया है । अव्ययस्य पंचधातुकत्वम् सोऽव्ययपुरुषः पञ्च कलो विज्ञायते । तथा हि--तस्मिन्नव्यये श्रन्तश्चिति- बहिश्चतिभेदाद्धा बलानां चितिर्भवति । मायाबलस्य परिच्छिनत्वात् तस्य हृदये बलानामनेकेषां परस्परबन्धनेन ग्रन्थोभावश्चितिः । तत्रैतानि बलानि द्विविधानि । बलग्रन्थौ पुनर्बलान्तरग्रन्थिग्रन्थमत्बलानां पुनर्ग्रन्थिरित्येवं सृष्टिलक्षणानि श्रविद्या- बलान्यन्यानि । हृद्ग्रन्थीनामनेकेषां मध्यात् कतिपयहृद्ग्रन्थिविमोक हेतुभूतानि तु विद्याबलान्यन्यानि । तत्राविद्याबलसञ्चयो बहिश्चितिः, विद्याबलसञ्चयस्त्वन्तश्चितिः । यत्र चेदं बलमन्तर्बहिर्वा चीयते तदव्ययं मन इत्याख्यायते । " मनो वा एतद्यदपरिमितम् । प्रजापतिर्वे मनः” ( कौ. ब्रा. 23/6 ) इति हि कौषीतक तिरस्य मनसः प्राधान्यमाष्टे । तस्मिन् मनस्यन्तश्चित्या विद्यावरणावि-योच्छेदादात्मज्योतिष उदयाद् विज्ञानं नाम रूपं जायते, ततोऽप्यन्तश्चित्या तदशेषावरणबलोच्छेदाद् रसमात्रप्राधान्ये श्रानन्दो नाम रूप भवति । एवं मनसि बहिर्धा बलानां चयने तदात्मज्योतिरावरणे वीर्य्यलक्षगं प्राणो नाम रूपं जायते । ततोऽपि बहिर्धा बलानां चयने अर्थलक्षणं वाग् नाम रूपं भवति । बहिर्धा च बलानामुत्तरोत्तरं ग्रन्थयो जायन्ते । तेन स्थूलं रूपं जायते । मनसोऽपेक्षया प्राणः स्थूलः । ततोऽप्यधिका वाक् स्थूला । अथान्तश्चितौ तु व्यवच्छेदक बलानां ग्रन्थय उद्वेदिता भूत्वा संसर्ज कबलोदलक्ष- मुबन्धनं भवतीति क्रमेण बलानामुच्छेदनाद् रसरूपं विकसितं भवति । तथा च प्रथमो रसविकास विज्ञानं नाम । ततोऽप्यधिकरसविकासे श्रानन्दो नाम रूपं जायते । तेन मनसोऽप्यपेक्षया विज्ञानं सूक्ष्मम्, ततोऽप्यधिक सूक्ष्मोऽयमानन्दः । यत्र यत्र यावद् बलं न्यूनं भवति तावत् सूक्ष्मताप्यधिका भवति । प्रथैतद्विपर्ययेण यावद् बलमुत्तरोत्तर- मधिकं भवति तावत् स्थूलताऽपि क्रमेण वर्धते । तथा च सूक्ष्मस्थूलभेदादव्ययेऽस्मिन् पञ्चरूपाणि सम्पद्यन्ते श्रानन्दः, विज्ञानम्, मनः प्राणः, वाक् चेति । तत्रायमानन्दः सर्वाधिक सूक्ष्मो विज्ञायते । अपि च बलानामत्यन्तन्यूनतया स आनन्दो रसप्रधानः ।

पृष्ठ 37

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 37 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानविद्यत् ३१ वाक् तु बलाधिकवर्द्धनादतिस्थूला बलप्रधाना च । तत्र बलाधिक्याद् रसरूपं संवृतमिव निरानन्दे भवति । मनस्तु नातिसूक्ष्मं नातिस्थूलं मध्यमं रूपं ज्ञानकर्मोभयलक्षणमि च्छायं भवति । तदित्यमन्नादादिवातवित्तभागभेदात् पञ्चधातु कोऽयमव्ययपुरुषः सिद्धो भवति । brick lagia अव्यय की पांच धातुओं से युक्तता वह अव्यय पुरुष पांच कलाओं वाला समझाया गया है । इस अव्यय पुरुष में अन्तश्चिति और बहिश्चिति के भेद से दो प्रकार से बलों का चयन या जमाव होता है । माया बल के सीमाबद्ध होने के कारण उसके हृदय में अनेक बलों का जो ग्रन्थि बन्धन होता है उसे ही चितिया चयन कहा जता है । यहां ये बल दो प्रकार के हैं । एक तो वे बल हैं, जो सृष्टि स्वरूप वाले हैं, जिनसे सृष्टि होती है, वे अविद्या के बल हैं, उनका स्वरूप है कि बल की ग्रन्थि पर फिर बल की ग्रन्थि होती है । और इस प्रकार ग्रन्थि पडे हुए बल पर फिर ग्रन्थियां पड़ती जाती हैं । हृदय की अनेक ग्रन्थियों के मध्य से कुछ हृदय की ग्रन्थियों को खोलने वाले विद्या बल उनसे भिन्न प्रकार के होते हैं । इनमें जो अविद्या के बलों का सञ्चय होता है उसे बहिश्चिति कहा जाता है, और जो विद्या बलों का संचय होता है वह अन्तश्चिति है । भीतर और बाहर जहां इन बलों का चयन होता है वह अव्यय मन कहा जाता है । "यह मन अपरिमित है, निश्चय ही प्रजापति मन है " ( कौषीतकी ब्राह्मण २६ / ३) यह कौपीत कि ति इस मन की प्रधानता का आदेश कर रही है । उस मन में विद्या के आवरण और अविद्या के उच्छेद से आत्म ज्योति के उदय से विज्ञान नाम का रूप होता है । वहां की भी अनश्चिति से वहां के समस्त आवरण बल के हट जाने से रस मात्र की प्रधानता के कारण आनन्द नाम का रूप अविर्भूत होता है । इसी प्रकार मन में बाहर के बलों के चयन होने पर उस आत्म ज्योति के आवरण होने पर वीर्य के रूप में प्राण नामक रूप होता है । उससे भी बाहर बलों का जब चयन होता है तब अर्थ स्वरूप वाक् रूप उत्पन्न होती है । बाहर के चयन में उत्तरोत्तर ग्रन्थियां होती हैं, इससे स्थूल स्थूल रूप उत्पन्न होते हैं । मन की अपेक्षा प्राण स्थूल है, उससे भी अधिक स्थूल होतीं f है वाक् । अब जब होती है अन्तश्चिति तब आवरण करने वाले बलों की ग्रन्थियों में उद् भेदन होता है अर्थात् उन ग्रन्थियों के बन्धन खुलने लगते हैं और तव संसर्जक बलों के खुलने' के स्वरूप के प्रकट होने से क्रम से बलों का उच्छेद या तिरोधान होने से रस के रूप विकास होता है । इस प्रकार जो रस का प्रथम विकास होता है उसका नाम है

पृष्ठ 38

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 38 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३२ विज्ञानविद्युत विज्ञान । उससे भी अधिक जब रस का विकास होता है तब आनन्द रूप प्रादुर्भूत होता है । इससे समझना होगा कि मन की भी अपेक्षा विज्ञान सूक्ष्म है और उससे भी अधिक सूक्ष्म है यह आनन्द । जहां जहां बल जितना कम होता है वहां सूक्ष्मता भी अधिक होती है । इसके विपरीत जहां बल की उत्तरोत्तर अधिकता होती है वहां क्रम से स्थूलता भी अधिक बढ़ती है । इस प्रकार स्थूल सूक्ष्म के भेद से इस अव्यय में पांच रूप सम्पन्न होते हैं, वे हैं आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् । उनमें यह आनन्द सबसे अधिक सूक्ष्म समझा जाता है । और वहां बलों की अत्यन्त न्यूनता के कारण वह आनन्द रस प्रधान होता है । वाक् तो बलों के अधिक बढ़नें से अति स्थूल होती है और उसमें प्रधानता भी बल की रहती है । वाक् में बल की अधिकता के कारण रस का रूप ढँका सा रहता है । और वहआनन्द रहित रहता है । जो मन है, वह न तो अतिसूक्ष्म है और न ही अति स्थूल है । वह ज्ञान कर्म इन दोनों का स्वरूप धारण करता हुआ इच्छामय होता है । इस प्रकार आनन्द से प्रारम्भ करके अन्तिम वाक् तक विभागों के भेद से यह अव्यय पुरुष पांच धातुओं वाला सिद्ध होता है । श्रव्ययस्य सृष्टिसाक्षित्वमुक्तिसाक्षित्व विवेक: एषु पञ्चस्वव्ययधातुषु उत्तराभ्यां प्राणवाग्भ्यां सहितं मनः संसाराय हेतुर्भवति । तत्र प्राणवाग्भ्यां जगदुत्पादने विज्ञानानन्दौ सहकारिणौ भवतः । विज्ञा- नेनानन्देन च सहकृतं मनो वाचि भिन्नविधान् प्राणान् सन्निवेश्य नानाविधान् भावानुत्पादयति । श्रथ विज्ञानानन्दाभ्यां सहितं मनो निस्ताराय हेतुर्भवति ।तत्र विज्ञा- नानन्देन च हृद्ग्रन्थिमोक्षगेन बलानामुद्बन्धनेन च जगतो मोक्षसाधने प्राणवाच सहकारिकारणौ भवतः । न प्राणेन वाचा वा विना कस्यचिदात्मनो मोक्षः सम्पद्यते । तदित्थं प्राणवाग्भ्यां जगतः संसाराय, श्रानन्दविज्ञानाभ्यां जगतो निस्ताराय च मन एवैकं प्रयोजकं भवति । अत एवाहुरभियुक्ताः-- न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप! मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ इति ॥ इत्थं चानन्दः, विज्ञानम्, मनः प्राणः, वाक् इत्येवं पञ्चधातुकोऽयमव्यय- पुरुषः संसारनिस्तारयोमुख्यहेतुरिति प्रतिपत्तव्यम् ।

पृष्ठ 39

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 39 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानविद्युत् ३३ अव्यय के सृष्टि साक्षित्व और मुक्ति साक्षित्व का विचार -पुरुष --- इन पांच अव्यय पुरुष के धातुओं में आगे के दो धातु जो प्राण और वाक् हैं उनके साथ जब मन रह्ता है तब वह संसार का हेतु बनता है । मन के साथ प्राण और वाक् के द्वारा जगत् के उत्पादन में विज्ञान और आनन्द सहकारी होते हैं । विज्ञान और आनन्द को साथ लेता हुआ मन वाक् में भिन्न-भिन्न प्रकार के प्राणों का सन्नि वेश करता हुआ नाना प्रकार के भावों को उत्पन्न करता है । वही मन जब विज्ञान और आनन्द के साथ मिलता है तो मोक्ष का हेतु बन जाता है । यहां भी पूर्व वत् विज्ञान और आनन्द के द्वारा हृदय की ग्रन्थि के विमोक्षण होने या खुल जाने पर तथा बलों से छुटकारा हो जाने के द्वारा जगत् के मोक्ष की साधना में प्राण और वाक् सहकारि कारण हो जाते हैं । प्राण और वाक् के बिना किसी भी आत्मा की मोक्ष की साधना निष्पन्न नहीं होती है । इस प्रकार प्राण और वाक् तत्वों के साथ जगत को संसार भाव में लाने के लिए तथा आनन्द और विज्ञान के साथ जगत् के मोक्ष भाव के लिए मन ही एक मात्र प्रयोजक बनता है । इसलिए प्रामाणिक वचन हैं कि-- हे परन्तप मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण न तो देह है, न जीवात्मा' है और न इन्द्रियां ही है, वह मन ही हैं जो मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण बनता है । इस प्रकार आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् इन पांच धातुओं वाला यह अव्यय पुरुष संसार दशा और मोक्ष अवस्था का प्रधान कारण है यह समझना होगा । पुरुषन्नय के उद्द्योत मैं यह द्वितीय प्रकाश पूर्ण हुआ । तृतीयः प्रकाशः श्रव्ययस्याधिकरणत्रयानुगतौ तावदधिदैवतनिरुक्तिः एष चाव्यययुरुषोऽधिकरणभेदेन त्रेधा द्रष्टव्यः - अधिदैवतम्, अध्यात्मम्, अधिभूतञ्चेति । तत्राधिदैवत मीश्वरशरीरम् । तस्तिन्महाब्रह्मण्डविकारसंघस्यान्तरतस्त्रयः पुरुषा नानाब्रह्माण्डानां सर्वानेव भावान् युगपत् संचारयन्ति । तत्रायमीश्वरशरीरे प्रवर्तमानोऽव्ययपुरुषः स्वमायायाबलेन महाविशालं यावन्तं प्रदेशमभिव्याप्नोति तदस्य

पृष्ठ 40

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 40 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३४ विज्ञानविद्युत् विश्वरूपं नाम मण्डलं भवति, तावदेवेदमीश्वरशरीरं सम्पद्यते । तस्यचेश्वरशरीरस्य हृदयबिन्दौ पञ्चधातुकोऽयमव्यययुरुषोऽवतिष्ठते । तस्य च रश्मयः सर्वा महाब्रह्माण्ड- भूमिभिव्यानुवाना हृदयेन बद्धाः सञ्चरन्ति । तमेतमव्ययपुरुषं परोरजा इत्याचक्षते । सोऽयं महेश्वरी नामै कः प्रथमः प्रजापतिः । तृतीय प्रकाश अव्यय के तीन अधिकरणों के प्रसंग में अधिदैवत यह अव्यय आधारों के भेद से तीन प्रकार से देखा जाता है - अधिदैवत, अध्यात्म और अधिभूत । इन में अधिदैवत ईश्वर का शरीर है । इस में महाब्रह्माण्ड के विकारों के समूह के भीतर से तीन पुरुष अनेक विध ब्रह्माण्डों के समस्त भावों का साथ साथ संचालन कर रहे हैं । वहां यह ईश्वर के शरीर में संचरित होने वाला अव्यय पुरुष अपनी माया के बल से महाविशाल जितने प्रदेश को अपनी परिधि में लेता है वह इसका विश्व रूप नाम का मण्डल बनता है, उतना ही यह ईश्वर का शरीर निष्पन्न होता है । ईश्वर के उस शरीर के हृदय बिन्दु में पांच धातुओं वाला यह अव्यय पुरुष प्रतिष्ठित है । उसकी रश्मियां समस्त महाब्रह्माण्ड की भूमि में अभिव्याप्त होकर हृदय से बँध कर संचरण करती हैं । इस अव्यय पुरुष को परोरजा शब्द से कहा जाता है । यह महेश्वर नाम का प्रथम प्रजा- पति है । प्राणमयः स्वयम्भूर्ब्रह्मा तस्य परोरजसोऽव्ययस्याश्रयेण पञ्चाप्यक्षरपुरुषा नानाशाखाः पृथक् पृथ- गवलम्बन्ते । तत्रादौ महाविशालमायाबल मण्डलनाभिस्थमानन्दविज्ञानसत्तामयान् रश्मीन् सर्वतः सञ्चारयन्तमनिरुक्तप्रजापतिरूपं परोरजसमजं नाम कंचिदव्यपुरुषं परितः परिक्रममाणोऽनिरूक्तप्रजापतिरूपेण वाड." मयमन्डलनाभिस्थो मनः प्राणावाङ्"मय रश्मीन् परितः संचारयन् ब्रह्माक्षरपुरुषस्तावद् ऋक्सामयजुर्भेदभिन्नां त्रयीं विद्यामस्मिन्नखिल- ब्रह्माण्डे परितः सञ्चारयति ।

ब्रह्मज्येष्ठा वीर्या संभूतानि ब्रह्मान ज्येष्ठ दिवमाततान ।

ऋतस्य ब्रह्म प्रथमोत जज्ञ तेनार्हति ब्रह्मणा स्पधितुं कः ॥