विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 41–50

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

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विज्ञानविद्यत् ३५

अन्तरस्मिन्निमे लोकाः, प्रन्तविश्वमिदं जगत् ।

ब्रह्मव भूतानां ज्येष्ट तेन को हति स्पधितुम् ॥

ब्रह्मदेवास्त्रयस्त्रिंशद् ब्रह्मन्निन्द्रप्रजापती ।

ब्रह्मन् है विश्वा भूतानि नाववान्तः समाहिताः ॥

( अथर्वण 10/7/8 ] ) सोऽयमपौरुषेयवेदमय: स्वयंभूर्नाम द्वितीयः प्रजापतिः तस्य चैषा त्रयीविद्या प्रत्यर्थमग्न्यादित्यवायुपनीता प्रतिष्ठारूपेण संसज्जते । उत्तरतः प्रत्यर्थं संसज्जमानास्ते वेदाः पौरुषेयाः स्यु: अग्निवाथ्वादित्यैः पुरुषैरिहोपनीतत्वात् । पौरुषेयाणां वेदानां सहस्र- संज्ञा क्रियते- - "सहस्रं वा अस्मै तत्प्रायच्छद् -ऋचः सामानि यजूंषि" -ू यद्वा इदं किञ्च तत् त्रैधातव्या" इति मैत्रायण्यां सहितायां चतुर्थप्रपाठकस्थ तृतीयकण्डिकोक्तः । इन्द्रश्च विष्णुश्चैतत् सहस्रमधितिष्ठतः । तदुक्तं मैत्रायण्यां तत्रैव चतुर्थ कण्डिकायां तस्मिन्वा प्रवदताम् । सेयमस्या अध्यर्द्धा वागवदत्" । "उभा

जिग्यथुर्न पराजयेथे न पराजिग्ये कतरश्च नैनोः ।

इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधयां त्रेधा सहस्रं वितदैरयेथाम् " इति ॥ 1/6/7/7 ॥

तौ चेमौ इन्द्राविष्ण ब्रह्माणमवलम्बेते । प्राणमय स्वयम्भू ब्रह्मा उस परोरजा अव्यय के आश्रय से पांचों अव्यय पुरुष नाना शाखाओं में पृथक्- पृथक् अवलम्बित हैं । वहां महा विशाल माया बल मण्डल के नाभि में स्थित आनन्द विज्ञान सत्तामय रश्मियों को चारों ओर संचारित करते हुए अनिरुक्त प्रजाति रूपी परो- रजा अज नामक किसी अव्यय पुरुष के चारों ओर परिक्रमा करता हुआ अनिरुक्त प्रजापति के रूप में वाङ ्ममय मण्डल की नाभि में स्थित मन प्राण वाङ् मय रश्मियों को चारों ओर से संचारित करता हुआ अक्षरपुरुष ब्रह्मा ऋक्, साम, यजु भेदों वाली त्रयीविद्या को इस समस्त ब्रह्माण्ड में चारों ओर फैला रहा है ।

पृष्ठ 42

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३६ विज्ञानविद्यत् - " ब्रह्म की ज्येष्ठता में वीर्य एकत्र हैं, ब्रह्मा ने पहिले दिव का विस्तार किया, ऋत से पहिले ब्रह्म ही उत्पन्न हुआ, उस ब्रह्मा से कौन स्पर्धा कर सकता है " - “ – ये सब लोक इसी के भीतर हैं, इसी के भीतर यह सम्पूर्ण जगत् है । भूतों में ब्रह्मा ही ज्येष्ठ है, अतः ब्रह्मा से कौन स्पर्धा कर सकता है । - 11 "-तैतिस देवता ब्रह्मा ही है, इन्द्र और प्रजापति ब्रह्मा ही है । ब्रह्मा ही के भीतर समस्त विश्व आधारभूत नौका के समान समाहित हैं " - [अथर्व १० / ७/ ९] यह अपौरुषेय वेद मय स्वयं भू नाम का दूसरा प्रजापति है । उसकी यह त्रयी विद्या प्रत्येक पदार्थ में अग्नि आदित्य तथा वायु के द्वारा लाई जाकर प्रतिष्ठा के रूप में सज्जित होती है । अनन्तर प्रत्येक पदार्थ संसक्त होने वाले ये वेद पौरुषेय होंगे । क्योंकि ये अग्नि वायु आदित्य पुरुषों से यहां लाये गए हैं । जो पौंस्य वेद हैं उनकी संज्ञा है सहस्त्र । —- " इसके ऋक् यजु साम नामक सहस्त्र का प्रदान किया, यह जो भी कुछ है वह तीन धातुओं का स्वरूप है ।" यह विषय मैत्रायणी संहिता के चतुर्थ प्रपाठक की तृतीय कण्डिका की उक्ति है । इन्द्र तथा विष्णु इम सहस्त्र पर अधिष्ठित हैं । यह बात भी वहीं मैत्रायणी की चतुर्थ कण्डिका में कही गई है कि -"उसमें बोले । उससे आधी -आधी वाणी बोली ". - "दोनों जीतने की इच्छा वाले पराजित नहीं होते, और इन में से कौन पराजित नहीं होता । इन्द्र और विष्णु परस्पर स्पधं मान थे । उन्होंने सहस्त को तीन प्रकार से विभक्त करें प्रेरित किया" - [ १/६/७७ ] इन्द्र और विष्णु ब्रह्मा का अवलम्ब लेते हैं । श्रापोमयः परमेष्ठी विष्ण: एकस्मिन्नीश्वरशरीरे नानाब्रह्माणस्तत्रतत्रोपतिष्ठन्ते । एकैकं च तं तं ब्रह्माणं •विष्णुप्रभृतयोऽक्षराः क्रमेणावलम्बन्ते । तथा चास्त्रिन्नीश्वरशरीरे तदेके कब्रह्मणा समारब्धाः पञ्चाक्षरपुण्डीरा बह्व,यो बल्शाः संपद्यन्ते । तत्र यस्यां बल्शायां ममैषा पृथवी संप्रथते ताकशाखाप्रवर्तकं ब्रह्माणमेवेहाधिकृत्य सर्वमुत्तरत्तो निरूपयिष्यामः । स्वयंभूनामानं तमेतं वाङमयं ब्रह्माणं परमेष्ठी प्रजापतिरापोमयः परितः परिक्रमते । सोऽस्य परि- प्रार्धदेवः । वेदाः सत्यम्, नियन्तान्तर्यामी सत्यम्, सूत्रात्मा सत्यम्, इतीदं त्रिसत्यं यथा

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विज्ञान विद्युत् ३७ वाङ् मययस्य स्वयम्भुवो धातुत्रयं भवति, तथैतस्यापोमयस्य परमेष्ठिनोपि धातुत्रयं भाव्यम्-इडा -गौः - उ चेति । स यथा स्वयम्भू ह्या त्रयीवेदमयो व्याख्यातः, तथैवायं परमेष्ठी प्रजापतिरथर्ववेदमयः प्रतिपत्तव्यः । त्रयीवेदस्तावदग्निवेदः । अथववेदस्तवेषः सोमवेद - इति भेदः । षड्धा वै ब्रह्मणो द्वारः -अग्नि, वायुरापश्चन्द्रमाः, विद्य त्आदित्यः " ( शतप 11 / 3 / 2 / 1 ) इति हि श्रूयते । श्रापोमय परमेष्ठी विष्ण I एक ईश्वर के शरीर में नाना भावापन्न ब्रह्मा अपने अपने स्थान पर विद्यमान हैं । और उस एक एक ब्रह्मा विष्णु आदि अक्षर पुरुष क्रम से अवलम्ब ग्रहण करते हैं । और फिर इस ईश्वर के शरीर में उन एक एक ब्रह्मा के द्वारा प्रारम्भ की गई । पांच अक्षरों की पुण्डीर वाली अनेक शाखाएं निष्पन्न होती हैं । उनमें जिस शाखा में हमारी यह पृथ्वी फैली हुई है उस शाखा का प्रवर्तन करने वाले ब्रह्मा के ही सम्बन्ध में हमारा आगे का सारा निरूपण होगा । स्वयं भू नाम के इस प्रजापति वाङ् मय ब्रह्मा की आपोमय परमेष्ठो प्रजापति परिक्रमा करता है । वही इसका परि प्रार्धदेव है । वेद सत्य हैं, नियन्ता अन्तर्यामी सत्य है, सूत्रात्मा सत्य है, इस प्रकार ये तीन सत्यं जैसे -- वाङ्मय स्वयम्भू के तीन धातु हैं, उसी प्रकार इस आपोमय परमेष्ठी के भी तीन धातु हैं, इड़ागौ, तथा उर्क । जैसे -- स्वयम्भू ब्रह्मा वेद त्रयीमय के रूप में व्याख्यात हुआ है वैसे ही यह परमेष्ठी प्रजापति अथर्ववेदमय के रूप में समझा जाना चाहिए । त्रयी वेद, अग्नि वेद है.. और यह अथर्ववेद सोमवेद है यही इनका भेद है । - "ब्रह्म का द्वार छः प्रकार का है, अग्नि, वायु, जल, चन्द्रमा, विद्युत और आदित्य " - यह वेद अति है । तत्र अग्निवायुरादित्य इत्यङ्गिरसः, वायुः आपः चन्द्रमाः, इति भुगवः । भृग्वङ्गिरोऽत्रिमयश्चायमथर्ववेदो भवति । ऋत - सत्य संज्ञक मौलिकतत्त्वविज्ञानं वेदः । तत्र नाभिरहितो निरायतनोऽयमशरीरोऽर्थ ऋतम् । नाभि प्रधिभ्यां कृतसंस्थः सायतनोर्थः सत्यम् । तयोश्चेह यावता भृगवः प्रक्रमन्ते तदृतम् । यावता स्वङ्गिरसस्तत् सत्यम् ऋतं सत्ये धायि सत्यमृते धायि । अन्तरतश्च सत्यस्येदमृतं बहिर्धा च परितः सर्वत्रेद मृतं व्याप्नोति । तथाच श्रूयते-

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३८ विज्ञानवद्यत्

"ऋतमेव परमेष्ठि, ऋतं नात्येति किञ्चन ।

ऋते समुद्र प्राहित, ऋते भूमिरियं श्रिता " इति ॥

( तैत्तिरीय ब्रा. 2 काण्ड ) "अग्निर्वा ऋतमसावादित्यः सत्यम्" ताग्निरादित्यो वा प्रवयवस्थः सन् ऋतत्त्वेन विवक्ष्यते । भृग्वङ्गिरों- यं तमेतं परमेष्ठिनं प्रथमत प्रापोमयो वरुणः परिक्रामति । तचैनं वरुणं प्रथमतो भृगुः, ततोऽग्राः, ततोऽत्रिस्ततो विद्यत् इत्येते चत्वार उत्तरोत्तरक्रमेण परितः परिक्रामन्ति । तेऽस्य परमेष्ठिनः परिप्रार्ध देवाः । प्रापः, वायुः, सोमश्चेत्येते त्रयो भृगवः प्राणाः स्निग्धाः संसृष्टिहेतवः । ते च विरलानां संसर्जनेन घनीकरणात् पिण्डं जनयन्ति । तत्रापः परमेष्ठि संज्ञाः । ताश्च श्रम्भोमरीचिर्मरः श्रद्धा इत्येवं चतुविधा प्रापः | सूर्यादूर्ध्वमम्भः । सूयै- करस्था मरीचिः । पृथ्वी रूपेण परिणममाना सरः । चन्द्रराश्मिस्था प्रापः श्रद्धा । एता for free मृता प्रापः । यास्त्वाप इमाः पीयन्ते ता यौगिका याज्ञिका मर्त्याः । 4 प्रथ वायुः, मातरिश्वा, पवमानः, सविता इत्येते चतुविधा वायवः । अपामेवैतश्चतुविधवायुरूपत्वेन विकारे जाते ततस्तास्वाप्सु कश्चिदविकुर्वाण एवात्यल्पो भृगुभावोऽर्वावशिष्य ते सोऽथर्वा प्राण इत्यथर्ववेद व्याख्यातम् । एष एवाथर्वा - प्राणः सोमानां वायूनामपां चावलम्बन भवति । तस्मादेतेऽपि त्रयोऽथर्वाण एवोच्यन्ते । सोमस्तु श्रद्धामयो ब्रह्मणस्पतिसंज्ञोऽति- पवित्रतमो मनो जनको ज्ञानप्रयोजको मौलिकोऽर्थः । त एते त्रयो भृगवो व्याख्याताः । अग्नि, वायु और प्रादित्य ये आङ्गिरस हैं तथा वायु, आप और चन्द्रमा ये भृगु हैं । और यह अथर्ववेद भृगु अङ्गिरा और अत्रिमय है । वेद है ऋत सत्य मय मौलिक तत्व का विज्ञान । इनमें नाभि या केन्द्र रहित तथा आयतन रहित जो अशरीरी तत्व है, वह ऋत है । नाभि तथा प्रधि के द्वारा संस्थित जो आयतन बनाने वाला तत्व है, वह है इनमें जहां तक भृगुओं का संचरण होता है, वह ऋत भाग है । जहाँ अङ्गिरा का संचरण

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विज्ञानविद्युत् ३६ वह सत्य है । ऋत सत्य के आधार पर रहता है और सत्य ऋत पर आधारित है, और सत्य के भीतर और बाहर नथा चारों ओर यह ऋत व्याप्त रहता है । श्रुति कहती है कि- ——,ऋत ही परमेष्ठी है, ऋत का कोई अतिक्रमण नहीं करता, ऋत में ही समुद्र संस्थित है तथा ऋत में ही यह भूमि प्रतिष्ठित है । ” [तैतिरी ब्राह्मण 2 काण्ड } - "अग्नि ऋत है, यह आदित्य सत्य है ".- इस श्रुति में अपनें छोड़े हुए प्रभाव की अवस्था में (प्रवर्ग्य ) अग्नि अथवा आदित्य को ऋत कहा गया है । मृगु और अङ्गिरामय इस परमेष्ठी की पहिले आपोमय वरुण परिक्रमा करता है । इस परिक्रमण शील वरुण की, पहिले भगु, फिर अङ्गिरा, तदन- न्तर अत्रि और उसके उपरान्त विद्युत ये चारों एक के उपरान्त दूसरे के क्रम से परिक्रमा करते हैं । ये इस परमेष्ठी के परिप्रार्ध देव कहे जाते हैं । प्, वायु, तथा सोम ये तीनों जो भृगुप्राण हैं ये स्निग्ध स्वरूप वाले और संसृष्टि या मिलाने के कारण बनते हैं । ये विरल पदार्थों को इकट्ठा करके सघन बनाते हुए पिण्ड का आकार देते हैं । इन में आपकी परमेष्ठि संज्ञा है । ये आप चार रूप वाले हैं -- अम्भ, मरीचि, मर, तथा श्रद्धा । इन में सूर्य से ऊपर जो अप तत्व है वह ' अम्भ ' है । सूर्य की किरणों में जो अप तत्व है वह ' मरीचि' है । पृथ्वी के रूप में परिणत होने वाला अप् भाग ' म'र ' कहलाता है, तथा चन्द्र राशि में स्थित अप् तत्व को श्रद्धा कहा जाता है । ये हैं मौलिक नित्य, अमृत स्वरूप, अप् तत्व । जिस अप् या जल का पान किया जाता है, यह तो योग से समुत्पन्न यज्ञ प्रक्रिया से उद्भूत मर्त्यं या मरण धर्मा आगे वायु, मातरिश्वा, पवनमान, सविता ये चार भेद वाले वायु हैं । अप् तत्व के इन चार वायुओं के रूप में विकार को प्राप्त होने पर उसी अप् तत्व में विकृत न होने वाला अति अल्प मात्रा में नीचे की सतह पर भृगु का शेष रह जाता है, वह अथर्वा प्राण है, ऐसा अथर्व वेद में कहा गया है । यही अथर्वा नाम का प्राण, सोम, वायु और अप् का अवलम्बन वनता है । इसलिए ये तीनों भी अथर्वा ही कहे जाते हैं । सोम तो वह मौलिक अर्थ है जिसकी ब्रह्मणस्पति संज्ञा है, वह अत्यन्त पवित्र श्रद्धामय मन का जनक, ज्ञान का प्रयोजक तत्व है । इस प्रकार इन तीन भृगुओं का निरूपण हुआ ।

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४० विज्ञानविद्यत् मादित्य इत्येते त्रिविधा ग्रङ्गिरसः प्राणास्तेजांसि । तेजस्त्वं स्नेह- प्रतिबन्धधर्मः । ते च प्राणाः घनानामवयवसंयोग विच्छेिदाद्विरलत्वं जनयन्ति । तत्राग्नि- विकलनहेतुः । "द्वयं प्राणोवा अग्नेयोगिकेत्वर्थेषुरूपं निरुक्तञ्चानिरुक्तञ्चमौलिकानां याज्ञिकसंयोगं" ( विच्छिनत्तिको. 1/5 1 ) मृत्युप्राणोऽमृतस्य सोमस्याग्नौ आहुति निरुध्य याज्ञियोगयोग्यतां व्याहन्ति । श्रग्निः संयुक्तायस्प संयोगं वियोजयति । यमस्तु विद्युदग्निर्भविष्यन्तं संयोगं निरुणद्धि । श्रथायमादित्यप्राणः प्रत्यर्थसंसृष्टं सोमं तत श्रादायादाय तत्तद्धनपिण्डं स्वरू- पतः परिणमति । तदुक्तं कुत्सेनाङ्गिरसेन-

" तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं सध्याकर्तोविततं सञ्जभार " इति ।

अतएवैते त्रयोऽपि मृत्यव उच्यन्ते ॥

आङ्गिरस प्राण तेज रूप हैं जो अग्नि, यम तथा आदित्य हैं । तेज स्नेहन से विरोध रखने वाला धर्म होता है । और ये प्राण सघन भाव में स्थित पदार्थों के अवयवों का विच्छेदन करते हुए उन्हें विरल बनाने वाले हैं । इन में अग्नि विशकलन क्रिया का कारण है, यह परस्पर संयुक्त पदार्थों में मौलिक तत्वों का यज्ञ प्रक्रिया के द्वारा जो संयोग होता है उसका विच्छेद करता है । - "अग्नि के दो रूप होते हैं निरुक्त और अनिरुक्त' आगे यम नाम का जो मृत्यु प्राण है वह अमृत रूप सोम की अग्नि में होने वाली आहुति को रोक कर यज्ञ प्रक्रिया से होने वाले संयोग की योग्यता को समाप्त करता है । अग्नि तो करता है संयुक्त पदार्थ के संयोग का वियोजन और यम नाम का विद्युत् रूप अग्नि आगे संभावित संयोग को रोक देता है । तीसरा आङ्गिरस प्राण जो आदित्य है वह प्रत्येक पदार्थ में व्याप्त सोम को वहां से बार बार बाहर करता हुआ उस घन पिण्ड को अपने स्वरूप में पहुंचाता है । इसी बात की कुत्स आङ्गिरस ने कहा - -- "सूर्य का वह देवत्व है कि -- पिण्ड पदार्थ के मध्य से सोम खींचकर उससे स्वरूप में विस्तृत कर प्रकट करता है " - इसीलिए इन तीनों प्राणों को मृत्यु कहा गया है ।

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विज्ञान विद्युत् ४१ अथ विद्युत्मीयsयमत्रिप्राणः । स च पिण्डेऽन्तरतोऽवस्थितः पारदर्शकता भावं नाश- यति । ज्योतिष्मतोऽर्थादाक्रममाणं ज्योतिः पिण्डात् प्रत्याहत्य विपरीतां दिशं प्रति विक्षिपति । पिण्डान्तः प्रवेशं ज्योतिषो निरुणद्धि । ततः पिण्डस्यान्यस्वित् पृष्ठ कृ- ष्णा रश्मयः प्रवर्तमाना दृश्यन्ते श्रत एवायमात्रैयश्रन्द्रः परज्योतिः सम्पद्यते । प्रत एवचेयमात्रे रजस्वला भवति । तदित्थं त्रयाणां भृग्वङ्गिरोडत्रिमागानाभि- हैवाथर्वणा जनितत्त्वादत्राथर्वणि तेषां समावेशादयं परमेष्ठी प्रजापतिरापोमयो वायुमयः सोममयश्च द्रष्टव्यः । तमेतं परमेष्ठिनं विष्णुरित्याचक्षते बहवः । श्रथैतं परमेष्ठि भगवन्तमापोमयो वरुणः परिक्रामति । वरुणं चैतं वायुमयेन हंसेन सोममयेन ब्रह्मण- स्पतिना सहितो भृगुः प्रथमस्थाने, सवित्रा सहितो बृहस्पतिरङ्गिरा द्वितीयस्थाने, तथवाय- मिन्द्रो विद्यदक्षरः सूर्याख्यस्तृतीयस्थाने परिक्रामति । भृगुवै वारुणिरित्याहुः । प्राथर्वणिकारत्वाहुः --- परमेष्ठिरेतसा सोमेन गर्भिता प्रापो द्वं धमभवत् । मिष्ठा अन्याः, क्षारा लवणमयाः पुनरिमा अन्याः । मिष्ठालु रेतो भृज्यमानं भृगुरभवत् । सच वायु-मातरिश्व पवमान-वात भेदाश्चतुर्धा विकुरुते । प्रविकुर्वाणस्तु तत्रा- त्यल्पमात्रोऽन्तर्हितः कश्चिदशोऽथर्वा नाम । सोऽयमानोमयः परमेष्विदन्यो ब्रह्माऽभवत् । ब्रह्मत्वात्मन्ये परिक्रामन्ति ब्रह्मणस्पत्यादपः । स प्रथमः परिचरः परमेष्ठितो वेदितव्यः । श्रथ क्षारा ग्रापस्तद् ब्रह्मरेतः सोमं पर्यावृत्यातिष्ठन् । सोऽद्धिर्वरणाद् वरुणोऽभवत् । पां समुद्रादमुच्यतेति मुच्यत्वान् मृत्युरुक्तः । सोऽयं वरुणो द्वितीयः परिचरः परमेष्ठितः संभाव्यते इति । अत्रि प्राण विद्युन्मय है | वह पिण्ड के भीतर स्थितिशील होता हुआ पारदर्शकता के रूप को नष्ट कर देता है । किसी ज्योतिर्मय तत्व से फैलती हुई ज्योति या प्रकाश ज्योति पिण्ड़ से आहत होकर विपरीत दिशा की ओर फेंकने वाला यह प्रत्रि प्राण है । यह ज्योति या प्रकाश को पिण्ड के भीतर प्रविष्ट होने से रोकता है । उस अवस्था में पिण्ड़ के दूसरे पृष्ठ पर काली रश्मियां फैलती दिखाई देती हैं । इसीलिए यह जो चन्द्रमा है वह आत्रेय ज्योति कहलाता है, यह परज्योति है । इसीलिए यह आत्रेयी ( रात्रि ) रजस्वला होती है । इस प्रकार भृगु, अङ्गिरा तथा अत्रि प्राणों की इसी अथर्व से उत्पत्ति के कारण अथर्व में

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४२ विज्ञानविद्यII त् ही उनका समावेश होने से यह परमेष्ठी प्रजापति आपोमय, वायुमय, तथा सोममय समझा जाना चाहिए । इस परमेष्ठी को बहुत विद्वान् विष्णु कहते हैं । इस भगवान् परमेष्ठी की आपोमय वरुण परिक्रमा करता है । और इस वरुण की वायुमय हंसारूढ़ होकर, सोममय ब्रह्मणस्पति के सहित भृगु प्रथम स्थान में परिक्रमा करता है, सविता के साथ अङ्गिरा बृहस्पति द्वितीय स्थान में परिक्रमा करता है, और उसी प्रकार यह विद्युत् रूपी इन्द्र जिसे सूर्य नाम से जाना जाता है वह तृतीय स्थान में परिक्रमा करता है । कहा गया है कि भृगु ही वारुणि है । अथर्ववेद के ज्ञाताओं का कहना है कि परमेष्ठी के रेत से सोम से गर्भित अप् दो रूपों में विभक्त हुआ, एक मीठा तथा दूसरा क्षार लवणमया मिष्ठ ( मीठे ) अप् में जब रेत का समिश्रण हुआ तो वह भृगु हुआ । वह वायु, मातरिश्वा, पवनमान तथा बात इन भेदों से चार रूपों में विकार को प्राप्त करता है । जो विकार को प्राप्त करता है । जो विकार को प्राप्त नहीं करता वह अत्यन्त अल्पमात्रा में अन्तर्हित होकर अंशतः अथर्वा है । वह आपोमय परमेष्ठी की तरह अन्य ब्रह्मा हो गया । ब्रह्मा होने के कारण अन्य ब्रह्मणस्पति आदि उसकी परिक्रमा करते हैं । उसे परमेष्ठी का प्रथम परिचर समझना चाहिए । जो क्षार अप् तत्व है वह ब्रह्म के रेत सोम का पर्यावरण करके स्थित हुआ अप के द्वारा वरण किये जाने के कारण वह वरुण कहलाया । अप् के समुद्र से वह मुक्त हुआ अतः मुक्त होने से वह मृत्यु कहा गया । यह वरुण परमेष्ठी के द्वितीय परिचर के रूप में संभावित है । वाग्ब्रह्ममयः सूर्य्य इन्द्रोअक्षर: अथान्ये पुनरन्यथा पश्यन्ति प्रस्थ वरुणस्याङ्गरसेभ्योऽङ्गिरसोनी श्रादित्ययमा- यः प्रादुर्भूताः इत्यतः स सूर्य प्रादित्यस्तं वरुणं परितः परिक्रामति । सूर्यो वरुणं परि- क्रामतीत्याह भगवान् देवरातो वैश्वामित्र:-

" उरूं' हि राजा वरुणश्च कार सूर्याय पन्या मन्वेतवा उ ।

पदे पादा प्रतिघातवे कुरुता वक्ता हृदया विधश्चित् ॥ " ऋ 1 / 24 / 8 ॥

स यथायं प्राणमयः स्वयंभू ह्या आपोमयः परमेष्ठी विष्णु, तद्वदेवात्रं बाड, मयः सूर्य इन्द्रः प्रतिपत्तव्यः । स एष सूर्योऽपि स्वयम्भूपरमेष्ठिवत् त्रिधातुर्भवति ।

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विज्ञानविद्यत् ४३ ज्योतिः, गौः श्रायुः इत्येते त्रयः सूर्यस्य धातवः । एष सूर्यः प्रथमा द्यौः, परमेष्ठी द्वितीया, स्वयम्भूस्तृतीया । यत्तु तृतीयस्यामितो दिवि सोम श्रासीदिति परमेष्ठिन एव तृतीयत्वमा चज्ञते तत्पृथ्वी सूर्ययोरन्तरालमन्तरिक्षमपेक्ष्येति सन्तोष्टव्यम् । अन्तरिक्ष स्यापि पदेन विवक्षितत्त्वात् । सूर्यस्य रश्मिमण्डलं प्रथमं विश्वरूपम् परमेष्ठिमण्डलं द्वितीयम्, स्वयम्भूमण्डलं तृतीयमित्येवैतत् त्रितयमाथर्वणे श्रयते - "यत्परभमवमं दश्च मध्ममं प्रजापतिः ससृजे विश्वरूपम् । कियता स्कम्भः प्रविवेश तत्र यन्न प्राविशत् कियत्तद् बभ्रुव ॥ " 10 / 7 / 8 / इति वाग्ब्रह्ममय सूर्य इन्द्र अक्षर यहां अन्यमत दूसरे प्रकार का है कि इस वरुण के अङ्ग के रस से ये आदित्य यम और प्रादुर्भूत हुए हैं इसलिए वह सूर्य आदित्य उस वरुण के चारों ओर परिक्रम करता है । सूर्य वरुण की परिक्रमा करता है ऐसा कहा गया है कि - " राज वरुण ने सूर्य के लिए मार्ग का निर्माण किया.. जैसे यह प्राणमय स्वयं भू ब्रह्मा हैं, आपोमय परमेष्ठी विष्णु है, उसी प्रकार यह वाङ्मय सूर्य इन्द्र समझा जा सकता है । वह सूर्य भी स्वयं भू परमेष्ठी के समान तीन धातुओं वाला है । ज्योति, गौ तथा आयु ये तीन सूर्य के धातु हैं । यह सूर्य प्रथम द्युलोक है । परमेष्ठी दूसरा द्युलोक है । स्वयंभू तीसरा द्युलोक है । जो यह मत है किं तीसरे द्युलोक के चारों ओर अन्तरिक्ष में अमित सोम है, और इसलिए परमेष्ठी ही तृतीय अन्तरिक्ष है, वह मत पृथ्वी तथा सूर्य के अन्तराल की ( मध्य) अपेक्षा कर के बनता है यह समझ कर सन्तोष करना होगा । क्योंकि अन्तरिक्ष की भी द्यलोक रूप में विवक्षा होती है । सूर्य का जो रश्मि मण्डल है, वह प्रथम विश्व रूप है, परमेष्ठी मण्डल दूसरा विश्व रूप है । तथा स्वयम्भू मण्डल तीसरा विश्व रूप है, इन्हीं तीन का अथर्व श्रुति में वर्णन है कि- "जिस परम मध्यम तथा अवम विश्व रूप को प्रजापति ने उत्पन्न किया उसमें कितना अंश (स्कम्भ) प्रविष्ट हुआ और जो प्रविष्ट नहीं हुआ वह कितना था ।” [ १०/७/८ ]

पृष्ठ 50

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४४ विज्ञानविद्युत् अन्नादब्रह्ममयी पृथिवी अग्निरक्षर: अथैतं सूर्यमिन्द्र परितोऽयमग्रिः परिक्रामति । सोऽङ्गिरोरूपः । “त्वमग्नेऽङ्गिराः प्रथम ऋषिः " इति श्रुतेः । अग्निर्यम प्रादित्य इत्येतानि त्रीणि प्रङ्गिरसो रूपाणि । तमेत- मङ्गिरोममग्न पृथ्वीत्याचक्षते । अन्नाद ब्रह्ममयी पृथ्वी तथा अक्षर अग्नि अब यह कहना है कि इस सूर्य के चारों ओर यह अग्नि परिक्रमा करता है । वह - अग्नि अङ्गिरा रूप है । उसका आधार यह श्रुति है कि- "हे अग्ने, तुम प्रथम ऋषि अङ्गिरा हो "' 1 अग्नयम और आदित्य ये तीन अङ्गिरा के रूप हैं । इस अङ्गिरामय अग्नि को पृथ्वी कहा जाता हैं । अन्नब्रह्ममयश्चन्द्रमाः सोमोअक्षर: तामेतामग्निरूपां पृथ्वी सोमः परितः परिक्रामति, तं चन्द्रमा इत्याचक्षते । "एष वै सोमो राजा देवानामन्नं यञ्चन्द्रमाः" इति श्रुतेः । सप्तलोकविभागः तदित्थं परोरजसमव्ययमाश्रित्य ब्रह्मा, विष्णुः, इन्द्रः अग्निः सोम इत्येते पञ्चा- ध्यक्षरपुरुषा उत्तरोत्तरं परिक्रामन्तं परिक्रममाणाः सर्व क्षरसृष्टिचक्र सञ्चालयन्ति । एषु स्वयम्भुवः प्रजापतेः प्राणमयेन वाडमयेन वेदमयेन वा रश्मिमण्डलेन क्लृप्तं ब्रह्मन्दं सत्यं नामोत्तमो लोकः । तत्रेतस्या वाचो महोक्थ -महाव्रत - जुरग्निभेदेन विध्वात् प्रधानभूत जुः सम्ब- न्धेन तदानन्दं स्थितिगतिमत्प्राणमयं परमाकाशमुच्यते ।