विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 51–60

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 51–60

पृष्ठ 51

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 51 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानविद्युत् ४५ अन्न ब्रह्ममय चन्द्रमा अक्षर सोम इस अग्निरूपिणी पृथ्वी की सोम चारों ओर से परिक्रमा करता है । इसे चन्द्रमा कहते हैं- - " यह राजा सोम देवों का अन्न है जो चन्द्रमा है " - ऐसा श्रुति७ ने कहा है । सात लोकों का विभाग इस प्रकार परीरजा अव्यय का आश्रय लेकर ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि और सोम ये पांचों अक्षर पुरुष उत्तरोत्तर परिक्रमण करने वाले की परिक्रमा करते हुए समस्त क्षर सृष्टि चक्र का सञ्चालन करते हैं । यह वह सर्वोत्तम सत्यलोक है जो स्वयम्भू प्रजापति के प्राणमय, वाङ् मय, तथा वेदमय रश्मि मण्डल से विनिर्मित है तथा ब्रह्मानन्द स्वरूप है । वहां इस वाणी के महोक्थ, महाव्रत, तथा यजु अग्नि के तीन भेदों से त्रिविध होने के कारण प्रधान भूत यजु के सम्बन्ध से वह आनन्द स्थिति गति युक्त प्राण- मय परमाकाश कहा जाता है । अथ परमेष्ठिनः प्रजापतेरथर्वमयेन रश्मिमण्डलेन क्लृप्तं ब्रह्मानन्दं जनन्नाम मध्यमौ लोकः । तत्र लोकिनोऽथर्वण प्रापोवायुसोमभेदैस्त्रैविध्यात् प्रधानभूतानामपां सम्बन्धेन तदान्दं समुद्र उच्यते । वायोश्चायं समुद्रः । तत्रैतासानपां वायुरूपेण संचारि- त्वात् । तस्य यावति प्रदेशेऽयं सूर्य्यप्रकाशः प्रविष्टो विभ्राजते स वेनो नाम । तत ऊर्ध्व- मयमन्धकारोऽतिनिविडो यमोतमूर्ध्व परितः पश्यामः । अथ सूर्यस्य प्रजापतेज्योतिर्मयेन रश्मिण्डलेन क्लृप्तं ब्रह्मान्दं स्वर्गो नाम प्रथमो लोकः । तत्र लौकिनां देवानां वसुरुद्रादित्यभेदेस्त्रैविध्यात् प्रधानभूतादित्यसम्बन्धेन तदा- न्दं तेजोमयं हिरण्मयं वैश्वदेव्यसुच्यते । त एते स्वर्गादयः प्रथममध्यमोत्तमास्त्रयो लोकाः । तत्रैतस्मिन् प्रथमे हिरण्मय लोके सर्वेऽप्युपरितन लोकधर्म्मा अनुवर्तन्ते । उक्त च– "हिर नये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिराघुर्होपासतेऽमृतम् ॥ ”

" हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।

तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये " इति ॥

पृष्ठ 52

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 52 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४६ विज्ञानविद्यत् परमेष्ठी प्रजापति के अथर्वमय रश्मि मण्डल से निर्मित ब्रह्मानन्द मय जन नाम IIT मध्यम लोक है । वहां का लोकाधिपति जो अथर्वा है उसके अप्, वायु तथा सोम के भेद से त्रिविध होने के कारण तथा उनमें भी प्रधान भूत अप तत्व के सम्बन्ध से वह श्रानन्द समुद्र कहलाता है । यह समुद्र वायु का है । क्योंकि वहां यह अप् तत्व वायु के रूप में संचारित है । उसके जितने प्रदेश में यह सूर्य का प्रकाश प्रविष्ट होकर प्रकाशित होता है उसकी वेन संज्ञा है । उसके अपर यह अत्यन्त घना अन्धकार है जिसको हम ऊपर चारों ओर देख रहे हैं । सूर्य प्रजापति के ज्योतिर्मय रश्मि मण्डल से निर्मित ब्रह्मानन्द मय स्वर्गनाम का प्रथम लोक है । वहां के लोकाधिपति जो वसुरुद्र तथा आदित्य हैं उनके भेद में तीन रूपों के कारण तथा उनमें भी प्रधान भूत आदित्य के सम्बन्ध के कारण वह आनन्द तेजोमय हिरण्मय वैश्व दैव्य कहा जाता है । ये स्वर्ग आदि प्रथम, मध्यम, उत्तम तीन लोक हैं । इनमें से प्रथम हिरण्मय लोक में सभी ऊपर के लोक धर्मों का अनु वर्तन होता है । कहा गया है कि -" हिरण्मय परमकोश में निष्कल विरज ब्रह्म है, वह शुभ्र ज्योतियों की ज्योति है । उस अमृत की आयु के रूप में उपासना होती है । -- " हिरण्मय पात्र से सत्यमुख ढँका हुआ है है पूषन, आप उसे सत्य धर्मों की दृष्टिके लिए अपावृत कर दीजिए" - अपि च प्रतिलोकं पुनस्त्रविध्यात् त्रेधा त्रैलोक्यं सम्पद्यते । येय तावद् भूमिर्याम- for: सा पृथिवी । सूर्यो द्यौः । उभयी सेवा द्यावापृथिवी मध्यमेनान्तरिक्षण प्रथमा त्रिलोकी सम्पद्यते सा रोदसी नाम । एवमसौ सूर्यः पृथिवी । परमेष्ठी द्यौः । उभयी चैषा द्यावापृथिवी मध्यमेनान्तरि- क्षेण द्वितीया त्रिलोकी सम्पद्यते सा कन्दसी नाम । raat परमेष्ठी पृथिवी । स्वयम्भूयः । उभयी चासौ द्यावापृथिवी मध्यमेना न्तरिक्षण तृतीया त्रिलोकी सम्पद्यते सा संयती नाम । तिस्रः पृथिव्य: त्रीण्यन्तरिक्षाणि । तित्रो द्यावः - इत्याह भगवान् वसिष्टो मध्यमस्य परमेष्ठिनो वरुणस्य दिवः स्तुतौ--

पृष्ठ 53

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 53 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानविद्यत् ४७ " दिस्रो द्यावो निहिता अन्तरस्मिन् तित्रो भूमीरुपराः षंविधाना । सो राजा वरुणश्चक्र एतं दिवि प्रेङ्खं हिरण्मयं शुभेकम् ॥ " ( 7 । 87 ) अपिचाह-कर्मो गात्समदो मध्यमानां मित्रवरुणार्यर्णा दिवः स्तुतौ-- " तिस्रो भूमीर्धारयं स्त्रीरूतं द्यन् त्रीणि व्रता विदथेनन्तरेषाम् । ऋतेनादित्या महिवो महत्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चास । ( 2/27/81 ) पिचा दीर्घतमा मामतेय श्रौतथ्यः परमस्य स्वयंभुवो दिवः स्तुतौ-- "तिस्रो मातृस्त्रीन् पितृन् बिभ्रदेक उर्ध्वस्तथौ नेमवग्लापयन्ति । मन्त्रयन्ते दिवो पृष्ठो विश्वविदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ " 1 / 164/10 ॥ श्रपि चाह हिरण्यस्तूप प्राङ्गिरसः प्रथमस्यास्य सूर्यस्य दिवः स्तुतौ--

"तिस्रो द्यावः सवितुर्द्धा उपस्थां एका यमस्य भुवने विराषाट् ।

आणि न रथ्यममृताधितस्थुरिह ब्रवीतु यउ तश्चिकेत्तत् ॥ " 1/35/6 ॥

भगवान् याज्ञवल्कोऽप्याह- यो वा इमे त्रिवृतो । लोकाः, श्रद्धा वै तद् यदिमे लोकाः । अनद्धा वै तद् यदिमान् लोकानति चतुर्थम् । अस्ति वा न वा ( शतपथ) पुनश्च प्रत्येक लोक में पुनः त्रिविधता है अतः यह त्रिलोकी पुनः तीन भेदों में विभक्त हो जाती है । यह जो भूमि है, जिस पर हम स्थित हैं, वह तो पृथिवी है । सूर्य कघ जाता है । यह दोनों द्य और पृथिवी मध्यम में आये हुए अन्तरिक्ष के साथ प्रथम त्रिलोकी बनती है जिसे रोदसी शब्द से कहा जाता है । इसी प्रकार यह सूर्यं आगे की त्रिलोकी में पृथिवी बनता है, पृथिवी स्थानीय हैं, परमेष्ठी वहां द्यलोक है, इन दोनों के बीच में आये अन्तरिक्ष से यह मध्यम त्रिलोकी बन जाती है जिसका नाम क्रन्दसी है । इसी प्रकार तीसरी त्रिलोकी में यह परमेष्ठी ही पृथ्वी स्थानीय है स्वयम्भू वहां द्य लोक है, उनके बीच में आने वाले अन्तरिक्ष को लेकर यह त्रिलोकी बनती है जिसका नाम संयती है । इस प्रकार तीन त्रिलोकियों में तीन पृथिवी, तीन अन्तरिक्ष तथा तीन द्युलोक हैं । [इस विषय में अनेक प्रमाण है ] भगवान् वसिष्ठ ने मध्यम परमेष्ठी वरुण देव की स्तुति में कहा- -- इसके मध्य में तीन द्युलोक हैं, ऊपर ६ विधानों वाली तीन भूमियां हैं । गृत्स राजा वरुण ने स्वर्ग में दिखाई देने वाले इस हिरण्मय शुभ लोक की रचना की " - [ ७/६७ -

पृष्ठ 54

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 54 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४८ विज्ञानवद्य त् पुनश्च कूर्म गृत्समद ऋषि ने मध्यम मित्र वरुण अर्यमा देव की स्तुति में कहा तीन भूमियों को तथा तीन द्य लोकों को धारण करता हुआ तथा इनके मध्य में आने वाले तीन व्रतों (अन्तरिक्षों ) को देखता हुआ, ऋत से आदित्य की महिमा का विस्तार करता हुआ वह मित्र अर्यमा वरुण संस्थित हुप्रा" - पुनश्च दीर्घतमा मामतेय औतथ्य ऋषि ने परम स्वयंभू देव की स्तुति में कहा— -"तीन माताओं तथा तीन पिताओं को अकेला धारण करता हुआ जो ऊपर स्थित है । जिसे कोईखिन्न नहीं करता इसके पृष्ठ पर देव गण विश्व वेत्रा वाणी की विश्व व्यापकता की मन्त्रणा करते हैं । " -- हिरण्यस्तूप आङ्गिरस ऋषि ने इस प्रथम सूर्य देवता की स्तुति में कहा-- -"सविता के तीन लोक हैं --" आदि । भगवान् याज्ञवल्क्य ने भी कहा-- -- "ये तीन त्रिवृत लोक हैं -- ये वही लोक हैं यह निश्चित नहीं कि इनके अतिरिक्त चतुर्थ लोक है । वह हैं या नहीं " ( शतपथ ) एभिश्च त्रिभित्रैलोक्यैः क्रमसङ्कलितैः सप्तलोका उपपद्यन्ते । तत्र पृथिवीय- अग्निर्भूर्लोकः । चन्द्रमाः सोमो भुवर्लोकः । सूर्योऽयमिन्द्रः स्वर्लोकः । ब्रह्मणस्पतिभृगुश्च महर्लोकः । वरुणोपेतः परमेष्ठि विष्णुर्जनलोकः । परमेष्ठिस्वयम्भुवोर्मध्ये विद्यन्मयः afra दिन्द्रस्तपोलोकः । वेदमयो ब्रह्मा तु सत्यलोकः । त एते सप्तलोका रजांसि कथ्यन्ते । यस्तु सप्तभ्योऽप्येतेभ्यो राजोभ्यः परस्तादव्ययपुरुषोऽक्षराणामेषां पञ्चानामा- लम्वरूप विभ्राजते स रजोभ्यः परस्तादस्तीति परोरजा इत्युच्यते । तत्रायं वेदमयो ब्रह्मा षडप्यवराणि रजांसि विधत्य परस्मिन्नजेऽव्यये सन्निधत्ते । तं जिज्ञासामुखेन सूचयति भगवान् दीर्घतमा श्रौतभ्यः -- "अचिकित्वान्चिकितुषश्चिदत्र कवीन् पृच्छामि विद्यने न विद्वान् । वितस्तम्भ षडिमा रजांसि प्रजस्य रूपे किमपि स्विदेकम् ॥ " इति ।

पृष्ठ 55

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 55 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानविद्यत् ४६ भगवानतरेयोऽप्याह- "यदक्षरादक्षरमेति युक्तं युज युक्ता अभि यत् संवहन्ति । सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ॥" ( ए. आ. 2. 3 प्र. 8 खण्ड इति ) क्रम से संकलित इन तीन त्रिलोकियों से सात लोक सम्पन्न होते हैं । उनमें यह रूपा पृथ्वी भूलोक है । सोम रूप चन्द्रमा भुवलोक है । इन्द्र रूप सूर्य स्वर्लोक है । ब्रह्मणस्पति भृगु मह लोक है । वरुण से युक्त परमेष्ठी विष्णु जन लोक है । परमेष्ठी तथा स्वयम्भू के मध्य विद्यन्मय इन्द्र तप लोक है । वेद मय ब्रह्मा सत्य लोक है । सात लोक रज शब्द से कहे जाते हैं । और जो इन सातों रज रूप लोकों से भी पर है, उत्कृष्ट है, ऊपर है, जो इन पांचों अक्षर पुरुषों का आलम्बन रूप होता हुआ प्रकाशमान है वह रज से पर होने के कारण परोरजा कहा जाता है । वहां यह वेदमय ब्रह्मा अवर कोटि में स्थित ६ संख्या वाले रज रूप लोकों को धारण करता हुआ, पर रूप अज अव्यय में सन्निधान रखता है । इस विषय को औतथ्य भगवान् दीर्घतमा जिज्ञासा के रूप प्रकट कर रहे हैं कि " मैं इस विषय को न जानने के कारण विद्वान् विचारक कवियों से पूछ रहा हू वह अज का कौन सा रूप है जो इन ६ लोक रूप रज का एक मात्र धारण किये हुए है" - भगवान् ऐतरेय ने भी कहा है कि-— ——“जो अक्षर से युक्त अक्षर को प्राप्त करता है जिसके योग से सब कुछ धारण वहन हो रहा है जो सत्य का सत्य है, जहां सभी देव एक हो रहे हैं"-- सप्तलोकानामेकाव्यपुरुषोदर वर्तित्वम् तत्तद् ब्रह्मणो रश्मिमण्डलमेतस्य स्वं स्वं वैश्वरूप्यं विज्ञायते । तत्रोत्तरमुत्तरं ब्रह्मक्रमेण पूर्वस्मिन् वैश्वरूप्ये संनिविशते । यथाऽयं चन्द्रमाः पृथ्वीवैश्वरूप्येऽन्तर्धं'त्त । एवमियं पृथिवी सूर्य्यवैश्वरूपये । तच्च परमेष्ठिवैश्वरूप्ये, तदपि वेदमये स्वयंभूवैश्वरूप्ये, तदापि च पुनः परोरजसो रश्मिमण्डलेऽन्तधत्त । न ततो बहिर्धा भवति । तदित्थमुत्त- रोत्तराणां पूर्वपूर्वमण्डल प्रालम्बितत्वात् सर्वेषामेषां स परोरजा अव्यय एव परमालम्बनं भवति । तथा श्रूयते--

पृष्ठ 56

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 56 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५० विज्ञानविद्युत् "एतदालम्बनं श्रेष्ठप्रेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ " इति ।

तदित्यमधिदेवतं त्रः पुरुषा व्याख्याताः ।

इति श्राधिदैविकोतस्तृतीयः प्रकाशः ॥ 3॥।

सात लोकों का एक अव्यय पुरुष के उदर में निवास उन उन ब्रह्मा का रश्मि मण्डल इस का अपना अपना विश्वरूप जाना जाता है । वहां आगे आगे का रूप ब्रह्म के क्रम से पहिले विश्व रूप में प्रविष्ट होता है । जैसे यह चन्द्रमा पृथिवी के विश्व रूप में अन्तर्निविष्ट होता है । इसी प्रकार यह पृथ्वी सूर्य विश्व रूप में अन्तर्निविष्ट है और सूर्य परमेष्ठि के वैश्वरूय में, परमेष्ठि वेदमय स्वयंभू के वैश्वरूप्य' में अन्तर्निविष्ट है और वह भी परोरजा के वैश्वरूप्य में अन्तर्निविष्ट है । उससे बाहर वह नहीं रहते । इस प्रकार उत्तरोत्तर पूर्व पूर्व के मण्डल में आलम्बित हैं अतः इन सभी का परम आलम्बन वह परोरजा अव्यय ही है । इसी बात को श्रुति में सुना जाता है कि-- -- "यह श्रेष्ठ आलम्बन है, यह पर आलम्बन है, इस आलम्बन को जानकर जो जिसे चाहता है वह उसका हो जाता है । " इस प्रकार अधिदैवत में तीन पुरुषों की व्याख्या हुई । यह आधिदैविक उद्योत नाम का तीसरा प्रकाश पूर्ण हुआ । चतुर्थः प्रकाशः श्रथ प्राधिभौतिकनिरुक्तिः अथैतेषु चन्द्रपृथ्वीसूर्य्यपरमेष्ठ्यादिजडपिण्डेषु तत्तत्पिण्डोपजनितेषु च नानाविधेष जपिण्डेष ते त्रस्त्रः पुरुषा उपक्लृप्ता प्राधिभौतिका ज्ञेयाः ।

पृष्ठ 57

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 57 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानविद्युत् ५१ अथ प्राध्यात्मिकनिरुक्तिः श्रथाध्यात्वम् । योऽयमधिदैवतं पुरुषग्रामो भूतग्रामो वेश्वरशब्देनाख्यायते स सम्पूर्ण या वृत्तशरीरो द्रष्टव्यः । तस्य सर्वाः शक्तः सर्वा दिशमनु समानीः कार्यकारिण्यt भवन्ति । सर्वासु दिक्षु प्रप्रतिहतेन्द्रियसत्वात् । तथा च श्रूयते --

"सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।

सर्वतः श्रुतिमलोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥

"तस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चित् तस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् ।

वृक्ष इव स्तब्ध दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वम्" ॥

- चतुर्थ प्रकाश-- -आधिभौतिक निरुक्ति-- इन चन्द्र पृथ्वी सूर्यं परमेष्ठी आदि जड़ पिण्डों तथा उन पिण्ड़ों के द्वारा उत्पादित अनेक प्रकार के जड़ पिण्डों में जिन तीन तीन पुरुषों की कल्पना की गई है वे आधिदैवित हैं, ऐसा समझना चाहिए । आध्यात्मिक की निरुक्ति अब अध्यात्म की निरुक्ति प्रारम्भ होती है । अधिदेवत में जो पुरुष समूह अथवा भूत समूह ईश्वर शब्द से कहा जाता है उसके अवयव सम्पूर्ण होने को कारण वह गोलाकार शरीर वाला दिखाई देता है । उसकी सारी शक्तियां सभी दिशाओं की ओर समान रूप से कार्य करने वाली हैं । क्योंकि वह सभी दिशाओं में अप्रतिहत इन्द्रियों वाला है । श्रुति भी कहती है कि-- -- " उसके हाथ और पैर सभी ओर हैं, उसकी आंख, सिर और मुख सभी ओर हैं वह सभी ओर कान वाला है, वह सब को ढँक कर संस्थित है । ” — ' उससे श्रेष्ठ कोई दूसरा नहीं है, उससे अधिक बड़ा और कोई नहीं है । जैसे-- वृक्ष स्तब्ध होकर अपने स्थान पर स्थित रहता है वैसे ही वह द्यलोक में अकेला स्थित है उस पुरुष से यह सब कुछ पूर्ण बना हुआ है । " --

पृष्ठ 58

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 58 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५२ विज्ञानविद्युत् श्रावयवभूते तु पृथिव्यादिपिण्डे समुत्पन्नोऽयं जीवो भवत्यर्धेन्द्रः । श्रधैनैवा त्मना समुत्पन्न इति कृत्वा एकतो दिशि स्वेन्द्रियैः प्रचरति न समं सर्वतो दिशि । यथास्य मुखतो दिशि चक्षुर्हस्तादिकाः प्रभवन्ति न तथा पृष्ठतो दिशि । श्रत एवायं जीवोs न्द्र- त्वादपूर्णात्मत्वाच्च दुःखमनुभवति, पूर्णत्वायैव च पत्नीमिच्छति स यदा पल्या संयुज्यते तदा पूर्णो भूत्वा पूर्णात्मानमीश्वरं यज्ञेन याजयितुं समर्थते-इति शुक्ल यजुर्वेदे कृष्णयजुर्वेदे च भूयसा निरूपितम् । अर्धोन्द्रत्वादयं जीवो वर्तुलवृत्तशरीरमलब्ध्वा दीर्घशरीरो भवति । ईश्वर के अवयव भूत पृथिवी आदि पिण्ड में उत्पन्न हुआ यह जीव तो अर्धेन्द्र होता है । यह आधे ही आत्म भाग से उत्पन्न हुआ है इस कारण यह अपनी इन्द्रियों से एक ही दिशा की ओर संचरण करता है, यह समान रूप से सभी दिशाओं की ओर संचरण नहीं करता । इसकी मुखवाली दिशा में या मुखवाले भाग में जैसे नेत्र हाथ आदि उत्पन्न होते हैं, वैसे पीछे के भाग की ओर उत्पन्न नहीं होते । इसलिए यह अर्धेन्द्र होने के कारण तथा अपूर्ण आत्मा होने के कारण दुःख का अनुभव करता है । यह पूर्ण होने के लिए ही पत्नी की इच्छा करता है । वह जब पत्नी से संयुक्त होता है तब पूर्ण होकर पूर्णात्मा ईश्वर की यज्ञ के द्वारा पूजा करने में समर्थ होता है । इस बात को शुक्लयजुर्वेद तथा कृष्णयजुर्वेद में पर्याप्त रूप से बतलाया गया है । अर्धेन्द्र होने से यह जीव गोलाकार शरीर वाला न हो- कर दीर्घ शरीर वाला होता है । अथ सर्वात्मनामाधारश्चिदात्मा तत्रायमात्मा पुरुषभेदाद् भिद्यते । तथा हीश्वर वज्जीवेऽप्येकस्मिन् परोरजस्यव्यये चिदात्मनि पञ्चाक्षराः पञ्चात्मानः क्रमेण संनिविशन्ते । ते च पञ्चापि जीवस्यार्धोन्द्र - तयाऽपूर्ण मात्रा दृश्यन्ते ।

पृष्ठ 59

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 59 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानविद्युत् ५३ सब श्रात्मानों का आधार चिदात्मा यह आत्मा पुरुषों के भेद से भिन्न-भिन्न हो जाता है । ईश्वर के समान ही जीवों में भी एक परोरजा अव्यय चिदात्मा में पाँच अक्षर पुरुष क्रम से सन्निवेश रखते हैं । और वे पाँच भी जीव के अर्धेन्द्र होने के कारण अपूर्ण मात्राओं वाले दिखाई देते हैं । प्रथमः प्राणमयः शान्तात्मा ब्रह्मा अध्यात्मं पञ्चाक्षरस्वरूपाणां पञ्चात्मनां प्रथमः प्राणमयः शान्तात्मा स्वयम्भू- ब्रह्मा ततः क्रमेणापोमयः परमेष्ठी महानात्मा, श्रथ वाङ् मयः सूर्यो विज्ञानात्मा, अथ अन्न- मयश्चन्द्रः प्रज्ञानात्मा, अथान्नादमयोऽग्निर्भूतात्मा इति विद्यात्। ब्रह्मवास्य सर्वस्य वेदमयः प्रतिष्ठा । तेनैतस्मिञ्छरीरे सर्वतः पूर्ण प्रतिष्ठा संनि धत्त । मातृगर्भे रेतस श्राधाने ब्रह्मणैव प्रतिष्ठां प्राप्य मातृगर्भे प्रतिष्ठितं रेतः शरीरनिर्मा- णाय प्रभवति । पश्चादपि षष्ठ मासि तच्छरीरहृदये प्रतिष्ठां प्राप्य ब्रह्मणेन्द्र विष्णू प्रति- ष्ठितौ सर्व" क्रियाकलापं ज्ञानकलापं च जनयन्तौ सन्तौ चैतन्यं कुरुतः । तस्मादेष प्रतिष्ठा- मको ब्रह्मा प्रथम श्रात्मा शान्तात्मा नाम । प्रथम प्राणमय शान्तात्मा ब्रह्मा अध्यात्म में पाँच अक्षर स्वरूपों में पाँच आत्माओं में प्रथम प्राणमय शान्तात्मा स्वयं भू ब्रह्मा का स्थान है । उसके अनन्तर क्रम से आपोमय परमेष्ठी महानात्मा है, तद- तर वाङमय सूर्य विज्ञानात्मा है । तदनन्तर अन्नमय चन्द्रमा प्रज्ञानात्मा है, उसके बाद अन्नादमय अग्नि भूतात्मा है यह समझना चाहिए । वेदमय ब्रह्माही इस सबकी प्रतिष्ठा है इसलिए इस शरीर में सबसे पहले प्रतिष्ठा का संविधान होता है । माता के गर्भ में शुक्र के आधान होने पर ब्रह्मा के द्वारा ही प्रतिष्ठा को प्राप्त कर वहां प्रतिष्ठित शुक्र शरीर के निर्माण के लिए सक्षम होता है । बाद में भी

पृष्ठ 60

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 60 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४ विज्ञानविद्युत् पाँचवे या षष्ठ मास में उस शरीर के हृदय प्रतिष्ठित होकर ब्रह्मा के द्वारा इन्द्र और विष्णु प्रतिष्ठित होते हैं तथा सारे क्रिया कलापों को तथा ज्ञान समूह को उत्पन्न करते हुए उसे चेतन बनाते हैं | इसलिए यह प्रतिष्ठात्मक ब्रह्मा शान्तात्मा नाम का प्रथम आत्मा है । अथ द्वितीय आपोमयो महानात्मा विष्णु: श्रस्य शान्तात्मन श्रालम्बेनास्मिन् शरीरे ब्रह्मसहचरः परमेष्ठी विष्णुः सन्निधाय यज्ञस्वाभाव्यात् स उक्थमर्कोऽशितिरित्येव त्रेधाऽऽत्मानं विभज्य यज्ञ तनोति । तत्रायमु वथरूपेण हृदये प्रतिष्ठितो विष्णुरको भूत्वा प्रत्युत्थितः । सोन्मादातु त्रिभिविक्रमविक्रमते । तस्य त्रिवत्स्तोमे पञ्चदशस्तोमे एकविंश स्तोमे चेतिकृत्वा त्रयोविक्रता भवन्ति । तैरयमकमिता परिणतोऽन्नादो विष्णुस्त्रिणव- यत्राभ्यां स्तोमाभ्यां सोमनुपादत्त । प्रनो प्राणक्रमेण तदन्नमुक्थे सम्प्रवेश्यायमर्कः संशाम्यति । एष एव चासनोंप्राणानामन्योन्यपरिग्रहलक्षणो यज्ञो जीवतो जीवस्य जीवनमूलं भवति । सोऽयं विष्णुर्यज्ञमयो द्वितीय श्रात्मा यज्ञात्मा नाम । स यथा प्रथमः शान्तात्मा शरीरस्थे बोजग्रामे देव से भूतग्रामे च प्रतिष्ठामात्मधू तिलक्षणां पशुविधति- लक्षणां चादधानो यज्ञ प्रवर्तयति एवमयं द्वितीयो महानात्मा त्रैगुण्यमहंकृतौ प्रकृतौ प्राकृतौ चादधानो यज्ञ प्रवर्तयति । द्वितीय आपोमय महानात्मा विष्णु इस शान्तात्मा के आलम्बन से इस शरीर में ब्रह्मा का सहचर परमेष्ठी विष्णु सन्नि- हित होकर यज्ञ स्वभाव वाला होने के कारण उक्थ, अर्क, अशिति, इन तीनों रूपों में स्वयं को विभक्त करके यज्ञ का विस्तार करता है । वहाँ यह उक्थ के रूप से हृदय में प्रतिष्ठित विष्णु अर्क बनकर प्रत्युत्थित होता है । वह अन्न को ग्रहण करने के लिए तीन विक्रमों से विस्तृत होता है । उसके त्रिवृत स्तोम में पंचदश स्तोम में तथा एकविंश स्तोम में क्रमशः तीन विक्रम होते हैं । इनके द्वारा यह अर्क रूप में परिणत अन्नाद विष्णु सत्ताइस तथा तैंतीस स्तोमों के द्वारा सोम का ग्रहण करता है । अन्न उर्क प्राण के क्रम से उस अन्न को उक्थ में प्रविष्ट करके यह ऊर्क