विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 61–70
विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 61–70
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विज्ञानविद्युत् ५५ रूप विष्णु शान्त हो जाता है । यह अन्न उर्फ प्राणों का एक दूसरे का ग्रहण करने के स्वरूप वाला यज्ञ जीवन धारण करने वाले जीव के जीवन का मूल बनता है । यह यज्ञमय विष्णु यज्ञात्मा नाम का द्वितीय आत्मा है । वैसे प्रथम शान्तात्मा शरीर में स्थित बीज समूह में देव समूह में तथा भूत समूह में आत्मा को धारण करने के स्वरूप वाली प्रतिष्ठा को तथा पशुओं को धारण करने के स्वरूप वाली प्रतिष्ठा को धारण करता हुआ यज्ञ को प्रवृत्त करता है । यथैवायमोजोधातुकृताशनः शान्त त्या स्वयंभूरसः यथैव चापमसृग्धातुकृताशयो विज्ञानात्मा सूर्यरसस्तथैवायमन्यो महानात्मा परमेष्ठिरसः प्रतिपत्तव्यः । स च शरीरे शुक्रधातुमभिव्याप्य तिष्ठति । तेनैतस्य परमेष्ठी प्रभवः । भ्रुवोणस्य च यः सन्धिः सोऽस्य योनिः । प्राहृदयमान सरन्धं प्रादेशद्वयमस्य प्रतिष्ठा । शुक्रधातुराशयः । यावन्तो वा मनुष्य- पशु- पक्षि कृषि-कीटादयो योन्याकृतिविशेषा दृश्यन्ते तेषां सर्वेषां मूलभूतोऽयं महानात्मा । महानेत्रायमक्षरो यथाकृतिरन्नये सन्निधत्त 1 तथैवायं भूतात्मा शरीरेणोपसं- पद्यते । श्रयते हि- "भूतं भविष्यत् प्रस्तौमि महद्ब्रह्मकमक्षरम् । बहु ब्रह्मकमक्षरम्" इति । प्रतिशरीरं चायमन्तरतस्तिष्ठ' स्तत्तच्छरीरस्याकारं स्वस्मिन्नासादयति । तथा चोपनिषदि श्रूयते- "अशरीरं शरीरेषु अनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥ ” भगवद्गीतायामप्युक्तम्-
" मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भ दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत! ॥
सर्वयोनिषु कौन्ते! मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥
त्राहं मम शब्दोऽव्ययाभिप्रायः । अव्यय एव हि तस्मिन्महत्यक्षरे बीजं सम्पा- दयति । बीजमिति कारणशरीरोपपादकं भवति । बीजाच्च देवतानि सूक्ष्मशरीररूपाणि तथा भूतानि स्थूलशरीरोपपादकानि च भवन्ति । तेनाशरीर एवायं महानात्मा कारण- सूक्ष्म-स्थूल-भेदात् त्रिभेदं शरीरं जनयति । तदित्थं परमेष्ठिसोमरसरूपो महानात्मा द्वितीय आत्मा व्याख्यातः ।
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५६ विज्ञानविद्युत् जैसे यह आज धातु के द्वारा सम्पन्न आशय वाला शान्तात्मा स्वयं भू रस है, नौर जैसे यह अस क ( रक्त ) धातु से निर्मित आशय वाला विज्ञानात्मा सूर्य रस है वैसे ही यह एक अन्य महानात्मा परमेष्ठी रस समझा जाता है । यह शरीर में शुक्र धातु में व्याप्त होकर रहता है । इसलिए परमेष्ठी इसका उत्पत्ति स्थान है । भ्रू तथा नासिका का जो सन्धि स्थल है वह इसका उत्पत्ति स्थान है । हृदय से लेकर ब्रह्मरन्ध्र तक दो प्रादेश (परिमाण) इसकी प्रतिष्ठा है । शुक्र धातु इसका आशय है । जितने मनुष्य, पशु, पक्षी, कीड़े आदि योनियों में विशेष आकृतियाँ दिखाई देती हैं उन सभी का मूलभूत यह महानात्मा है । यह महानात्मा अक्षर अपनी आकृतियों के साथ जैसे अव्यय में सन्निहित है, वैसे ही यह भूतात्मा शरोर से उपसंपन्न रहता है । सुना जाता है कि - "भूत और भविष्यत् एक ब्रह्म अक्षर को प्रस्तुत करता हूं' बहू ब्रह्म अक्षर को प्रस्तुत करता हू " -और यह प्रत्येक शरीर के भीतर रहता हुआ उस शरीर के आकार को स्वयं में प्राप्त करता है । यही उपनिषद में सुना गया है । अनवस्थित शरीरों अवस्थित है जो महान् विभु है ।, उसका कि— “स्मरण करके धीरपुरुष भगवद् गीता में कह गया में अशरीरशोक नहींरूप सेकरताजो ” आत्माहै, " महद् ब्रह्म योनि है, मैं उसमें गर्भ का आधान करता हूँ । है भारत, उसी से समस्त भूतों की उत्पत्ति होती है । " — “ हे कोन्तेय समस्त योनियों से जो मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं उन सबकी महद् ब्रह्म ही योनि है और मैं उनमें बीज देने वाला पिता हूँ । यहाँ “ अहं, " मम् ” शब्द अव्यय पुरुष का अभिप्राय रखते है । अव्यय पुरुष ही उस महान् अक्षर पुरुष में बीज का सम्पादन करता है । बीज कारण शरीर के उत्पादक की संज्ञा है, बीज से ही सूक्ष्म शरीर रूप देवता तथा स्थूल शरीर रूप भूतों का निर्माण होता है । इसलिए बिना शरीर का ही यह महान् आत्मा कारण शरीर स्थूश शरीर, तथा सूक्ष्म शरीर तीन प्रकार के शरीर बनाता है । इस प्रकार परमेष्ठी के सोम रस रूप वाले महा- नात्मा नामक द्वितीय आत्मा की व्याख्या हुई ।
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विज्ञान विद्युत् ५७ वाब्रह्ममयस्तृतीयो विज्ञानात्मा इन्द्र: अथैतं शान्तात्मानं ब्रह्माणमेतं यज्ञात्मानं विष्णु' चालम्ब्य सूर्यादुपस्थित इन्द्रो विज्ञानं शरीरे जनयति । स खल्विन्द्रो ज्योतिष्टोम-गोष्टोमा- युष्टोम-भेदात् त्रिस्तोमः सूर्यरसः शरीरस्थे यज्ञ प्राणो भूत्वाऽवतिष्ठते । एष एव च विज्ञानात्मा क्षेत्रज्ञात्मा इत्युच्यते । स हि भगवद्गीतोक्तप्रकारेणैकत्रिशत्कलं क्षेत्रं ज्ञानेन पर्याप्नोति तस्मात् क्षेत्रज्ञ इत्युच्यते । इह हि जीवशरीरे भौतिकज्ञानमयः प्राज्ञात्वा नाम भूतात्मा सर्वाणि संज्ञा-वह चेष्टावनाडीभ्यां जन्यमानानि ज्ञानकर्माणि जनयतीति वक्ष्यामि । तमेवैतं प्राज्ञ नाम भूतात्मानं सर्वाणि शरीरकर्माणि कुर्वन्तमेष विज्ञानात्मा क्षेत्रज्ञः कारयति । तदुक्त मनुना-
योस्यात्मनः कारयिता तं क्षेत्रज्ञ प्रचक्षते ।
यः करोति तु कर्माणि स भूतात्मोच्यते बुधः ॥
जीवसंज्ञोन्तरात्माऽन्यः सहजः सर्वदेहिनाम् ।
येन वेदयते सर्व सुखं दुःखञ्च जन्मसु ॥ इति॥
सोऽयं तृतीयो विज्ञानात्मा महत्यात्मनि प्रज्ञानात्मनि प्राणात्मनि भूतात्मनि च प्रकाशमादधानो जीवनहेतुमायुः प्रवर्तयति । अध्यात्मं चैष हृदयस्थः सूर्यः । तस्यैतद् वैज्ञानिक रश्मिमण्डलं शोणिताकाशेऽभिव्याप्नोति । तथा च सूर्य्यः प्रभवः । ब्रह्मरन्ध धृतिर्नान्दनं योनिः । हृदयं प्रतिष्ठा । शोणितमाशय इति विज्ञानात्मनश्चत्वारोऽनुबन्धा भाव्याः । तदित्थं सूर्य रसरूपो विज्ञानात्मा व्याख्यातः ।
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५८ विज्ञानविद्यत् वाग् ब्रह्ममय तृतीय विज्ञानात्मा इन्द्र अब इस शान्त आत्मा ब्रह्मा का तथा इस यज्ञात्मा विष्णु का आलम्ब लेकर सूर्य से उपस्थित इन्द्र शरीर में विज्ञान को उत्पन्न करता है, वह इन्द्र ज्योति स्तोम, गो स्तोम तथा आयु स्तोम के भेद से तीन स्तोम वाले सूर्य रस के रूप में शरीर स्थित यज्ञ में प्राण बनकर अवस्थित है, यही विज्ञानात्मा क्षेत्रज्ञ आत्मा कहलाता है । वह भगवत् गीता में कही गई विधि से इकतीस कला पर्यन्त क्षेत्र को ज्ञान से वि- स्तृत करता है । इसलिए इसे क्षेत्रज्ञ कहते है । इस जीव के शरीर में भौतिक ज्ञानमय प्रज्ञा- त्मा नामका भूतात्मा ज्ञान का वहन करने वाली तथा चेष्टाओं का वहन करने वाली नाड़ियों से उत्पन्न होने वाले समस्त ज्ञान तथा कर्मों को उत्पन्न करता है । उसी प्राज्ञ नामक भूतात्मा को जो कि शरीर के समस्त कर्मों का सम्पादन करने वाला है, उसको विज्ञाना- - त्मा क्षेत्रज्ञ प्रेरित करता है । मनु ने कहा है –कि " -- जो इस आत्मा का कारयिता है उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं । जो कर्मों का सम्पादन करने वाला है उसे विद्वान् गण भूतात्मा कहते हैं । समस्त देह धारियों के साथ उत्पन्न होने वाला जीव नाम का एक अन्य अन्तरात्मा है जिसके द्वारा जन्मों में समस्त सुख तथा दुःख का ज्ञान होता है " -1 यह तीसरा विज्ञानात्मा, महान् आत्मा, प्रज्ञानात्मा, प्राणात्मा तथा भूतात्मा में प्रकाश देता हुआ जीवन की हेतु रूप आयु का प्रवर्तन करता है । अध्यात्म में यही हृदय में स्थित रहता है । उसी का यह वैज्ञानिक राशिम मण्डल शोणित के आकाश में अभिव्याप्त रहता है । सूर्य ही उसका उत्पत्ति स्थान है । ब्रह्मरन्ध्र इसका धारण स्थान है । नान्दन इसकी योनि है । हृदय इसकी प्रतिष्ठा है । शोणित इसका आशय है । इस प्रकार विज्ञानात्मा के चार अनुबन्ध समझने चाहिए । इस प्रकार सूर्य रस रूप विज्ञा- नाम की व्याख्या हुई ।
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विज्ञानविद्यत् ५६ अन्नब्रह्ममयश्चतुर्थ: प्रज्ञानात्मा सोमः इह हि पृथिवीपृष्ठ या एता श्रोषधयः प्रजायन्ते तासामुदर्कभूतस्यान्नस्यारम्भक- -द्रव्याणि त्रेधा विविच्यन्ते पार्थिवानि श्रान्तरीक्ष्याणि दिव्यानि चेति । श्रग्नौ चान्नपरिपा- कवशात् तदारम्भकाणां क्रमेण संबन्धविच्छेदे विशकलितयोरभृतमर्त्यभागयोरमृतं रसो भूत्वा प्राणरूर्ध्व नीर ते । मर्त्य मलं भूत्वाऽपानेनाधस्तान्निपात्यते । तत्र तावत्पार्थिवानां मृतद्रव्याणामग्निपरिपाकवशादुत्तरोत्तरविभागक्रमतो रसासृङ मांसमेदोऽस्थिमज्ज- शुक्राणि जायन्ते । ततः पार्थिवद्रव्याणामैकान्तिकनिर्हारे प्रापो -वायु-विद्य त्सोममयमान्त- मोजो नाम धातुः स्थिति लभते । प्रथैतस्मादोजसोऽप्यापोवाय्वोः पृथग्भावे विद्य- त्सोममयं यदवशिष्यते किञ्चित् तन्मनो नाम । तथा चैतदन्नस्थः सोमरसः क्रमेण विशुद्धो भूत्वा मनो नाम रूपं जायते इति सिद्धम् । तस्मिन्नस्मिन् स्वच्छतमे मनसि प्रतिबिम्बितः क्षेत्रज्ञसूर्य्य रश्मिज्र्ज्योत्स्नां जनयतीति मनः प्रज्ञानात्मा भवति । तमेतमैतरेयः प्राह- hts मात्मेति वयमुपास्महे, कतरः स श्रात्मा । येन वा पश्यति । येन वा शृणो- ति । येन वा गन्धानाजिध्छति । येन वा वाचं व्याकरोति । येन वा स्वादु चास्वादु च विजा नाति 1 यदेतद्ध दयं मनश्चैतत् संज्ञानमज्ञानं प्रज्ञानम्, मेधा दृष्टिध'तिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः ऋतुरस; कामोवशः -इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति । एष ब्रह्मा, एष इन्द्रः, एष प्रजापतिः, एते सर्वे देवाः, इमानि च पञ्चमहाभूतानि पृथिवी वायुराकाश प्रापो ज्योतींषि । यत्किञ्चेद प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्व तत् प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोक; प्रज्ञा प्रतिष्ठा, प्रज्ञानं ब्रह्म । स एतेन प्राज्ञ नात्मनाऽस्माल्लोकादुत्क्राम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः सम- भवत ॥ इति||
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६० विज्ञानविद्युत् अन्न ब्रह्ममय चतुर्थ प्रज्ञानात्मा सोम इस पृथ्वी के पृष्ठ पर जो ये औषधियां उत्पन्न होती हैं उनके उदर्क भूत या पोषक अन्न के आरम्भक द्रव्य तीन भेदों में विचारित होते हैं, पार्थिव, अन्तरिक्ष से आने वाले, तथा दिव्य | अग्नि में अन्न के परिपाक के कारण उसके आरम्भकों का क्रमशः सम्बन्ध विच्छेद होने पर जब अमृत और मर्त्य भाग विशकलित हो जाते हैं, तब अमृत भाग रस बन कर प्राणों के द्वारा ऊपर की ओर ले जाया जाता है । तथा मर्त्य भाग मल बन कर अपान के द्वारा नीचे की ओर गिरा दिया जाता है । वहां पार्थिव मर्त्य, अमृत और द्रव्यों का अग्नि के परि- पाक के कारण उत्तरोत्तर विभाग के क्रम से रस असृक् ( रक्त ) मांस, भेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र बनते हैं । इसके अनन्तर पार्थिव द्रव्यों के पूर्णतया हट जाने पर अप्, वायु, विद्यत् सोममय अन्तरिक्ष में स्थित ओज नाम का धातु स्थिति प्राप्त करता है । अब इस ओज से भी आप और वायु के पृथक् होने पर विद्यत् और सोममय जो कुछ अवशिष्ट रहता है उसका नाम मन है । तब सिद्ध यह हुआ कि इस अन्न में स्थित सोम रसक्रम से विशुद्ध होता हुआ मन के रूप में परिणत होता है । उस स्वच्छतम मन में प्रतिबिम्बित क्षेत्रज्ञ सूर्य की रश्मि ज्योत्स्ना को उत्पन्न करती है अतः मन प्रज्ञानात्मा हो जाता है । इस विषय ऐतरेयने कहा है कि- "वह कौनसा आत्मा है जिसकी हम उपासना करते हैं । वह वह कौनसा आत्मा है, जिससे देखता है, जिससे सुनता है, जिससे गन्ध का आधाण करता है । जिससे वाणी का विशकलन होता है । जिससे स्वाद और अस्वाद को जानता है । यह हृदय, यह मत, यह संज्ञान, आज्ञान, प्रज्ञा, मेधा, दृष्टि, धृति, भति, मनीषा, जूति, स्मृति, संकल्प, ऋतुरस, वश में करने वाला काम ये सब प्रज्ञान के ही नाम हैं । यह ब्रह्मा, इन्द्र – यह प्रजापति, ये सभी देव, ये पांच महाभूत पृथिवी, वायु, आकाश, जल, ज्योति जो भी कुछ प्राणि जंगम, पक्षि, स्थावर हैं, वे प्रज्ञाने वाले हैं, प्रज्ञान में प्रतिष्ठित हैं, प्रज्ञात्र ही सारा लोक है प्रज्ञा प्रतिष्ठा है । प्रज्ञान ब्रह्म है । वह इस प्राज्ञ आत्मा के द्वारा इस लोक से उत्क्रमण करता हुआ स्वर्ग लोक में समस्त कामों को प्राप्त करके अमृत हो गया" -- ।
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विज्ञान विद्युत् ६१ इदं त्वापरं बोध्यम् - मनस्तावद् त्रिविधम् - चिदात्मकं प्राणात्मक मिन्द्रियात्मकं चेति । श्वोवसीयसमव्ययं मनिश्चदात्मकं तत्प्रथमम् । सर्वेन्द्रियप्रवर्त्त कमनिन्द्रियं मनः प्रा- णात्मकं तद् द्वितीयम् सुखदुःख वेदनीयगुणकं हृदयस्थानमिन्द्रियात्मकं तत्त तीयम् । तत्रेदं द्वितीयं मनः प्रज्ञानात्मा नाम । वाचि सा वाक् । रसनायां स रसः । धाणे स गन्धः । श्रोत्रे स शब्दः ।त्वचि स स्पर्शः । चक्षुषि तद्रूपम् । हृदि तन्मनः । भिन्नवर्णका चानुगतः सूर्य्यरश्मिर्यथा भिन्नवर्णस्तथायं प्रज्ञानात्मा भिन्नगुणकेन्द्रियानुगतो भिन्नगुणोऽभिनिष्पद्यते । स एक एवायं प्रज्ञानात्मा तत्तदिन्द्रियानुगतिवशात्तत्तदिन्द्रियज्योतिर्जनयतीति स एवायं प्राणात्मा नाम चन्द्रमा विज्ञातव्यः । स एष सोमःप्राणस्तस्मस्त्रयोऽग्नयो द्वौ सोमाविति पञ्चदेवा अन्वाभक्ता भवन्ति । तदुक्तमैतरेयके -- "प्रयाधिदैवतम् चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् प्राणः, ता एताः पंचदेवता इमं विष्टाः पुरुषम् । पञ्चावता देवता अयं विष्टः पुरुषः । सोऽत्रालोमभ्य श्रानखाग्रेभ्यः सर्वः साङ्ग प्राप्यते । तस्मात् सर्वाणि भूतानि आपिपीलिकाभ्यः प्राप्तान्येव जायन्ते (ऐ. १1- ३।६। इति । यहां यह दूसरी बात भी समझनी चाहिए कि मन तीन प्रकार का है, एक है चिदात्मक, दूसरा है प्राणात्मक तीसरा है इन्द्रियात्मक । जिसका नाम 'श्वोवसीयस' है, जो अव्यय पुरुष का मन है वह चिदात्मक प्रथम मन है । दूसरा वह प्राणात्मक है जो स्वयं इन्द्रिय न होते हुए भी इन्द्रियों का प्रवर्तक है । तीसरा मन इन्द्रियात्मक है जिसका गुण सुख दुःख का अनु- भव करना है और हृदय जिसका स्थान है । इनमें जो द्वितीय प्राणरूप मन है, उसका नाम प्रज्ञानात्मा है । वाणी में वही वाक् है । रसना में वही रस है । धाण में वही गन्ध है । कान में वही शब्द है | त्वचा में वही स्पर्श है । नेत्रों में वही रूप है । हृदय में वही मन है । विभिन्न वर्णों के काच में गिरने वाली सूर्य की किरणें जैसे विभिन्न रंगों की हो जाती हैं वैसे यह प्रज्ञानात्मा भिन्न गुणों की इन्द्रियों में अनुगत होकर भिन्न गुण वाला हो जाता है । वह एक ही प्रज्ञानात्मा विभिन्न इन्द्रियों में अनुगत होने के कारण विभिन्न इन्द्रियों में ज्योति को उत्पन्न करता है इसलिए इसी को प्राणात्मा नाम का चन्द्रमा समझना चाहिए यह सोम प्राण है, इसमें तीन अग्नियां और दो सोम ये पांच देव अनुषक्त हैं । यह बात ऐतरेयक श्रुति में कही गई है कि- “ अधिदैवत में - चक्षु, श्रोत्र, मन, वाक्, प्राण ये पांच देवता इस पुरुष में निविष्ट हैं । इन्हीं पांच देवताओं से यह पुरुष व्याप्त है । लोम से नख पर्यन्त सम्पूर्ण अङ्गों में ये व्याप्त हैं । इसलिए चींटी पर्यन्त समस्त भूत इन देवों से व्याप्त होकर ही उत्पन्न होते हैं । "
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६२ विज्ञानविद्यत् सएष प्रज्ञानात्मा प्राणात्मा नाम चन्द्रमा मुखस्थां वाग्लक्षणां पृथ्वीं परिक्रममा- णः -श्राहृदयमाकेशान्तं द्विप्रादेशलक्षणां स्त्रकक्षामध्यूढ़ः संचरति । तत्र हृदयस्थस्य क्षेत्रज्ञ- सूर्य्यस्य ज्योतिषा ज्योतिष्मानयं चन्द्रमाः शिरसि केशान्तस्थानस्थः पूर्णिमां कुर्वाणः शीर्षण्यानीन्द्रियाणि चन्द्रिकयेव प्रकाशयतीति बहिरिन्द्रियार्थानामाहरणाद् भूतात्मनो जाग्रदवस्थोपपद्यते । प्रथ तालुप्रदेशे गोस्तनस्थानस्थोऽष्टमीं जनयन् शीर्षण्यानी- न्द्रियाण्यस्पृशन्नधस्ताद् भावनावासनारूपान् संस्कारान् ज्योतिषा प्रकाशयतीति भूतात्मनः स्वप्नावस्थोपपद्यते । अथैतस्मादप्यधस्तात् संचरन् हृदयप्रदेशं गतः क्षेत्रज्ञसूर्येण सह वसती- त्यमावास्योपजायते, तत्र केवलमात्मानन्दमेवानुभवति नान्यं कंचन विषयत् । सैषा भूता- त्मनः सुषुप्त्यवस्थोपपद्यते । तदेतस्य चन्द्रमसो अध्यात्मं भूतात्मावस्थात्रयोपपादकं पदत्रयं भगवान् तित्तिरि: प्रदर्शयति । तस्यैतस्याध्यात्मिकस्य चन्द्रमसोऽयं संचारी यादृच्छिको न तु दिव्यचन्द्रवनियतकाल इति विशेषः । " सष एषोऽन्तहृदयाकाशः, तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः, श्रमृतो हिरण्मयः । अन्तरेण तालुके य एष स्तन इवावलम्बते -सेन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो विवर्तते व्यपोह्य शीर्षकपाले । श्राकाशशरीरं ब्रह्म सत्यात्मप्राणारामं मन - श्रानन्दम्, शान्तिसमृद्धममृतम् (तै. उपनिषत्)" इति । यह प्रज्ञानात्मा प्राणात्मा नामक चन्द्रमा मुखस्थित् वाक् रूपिणी पृथिवी की परिक्रमा करता हुआ हृदय से लेकर केश पर्यन्त दो प्रादेश तक फैली अपनी कक्षा में | वहां हृदय में आरूढ़ होकर संचार करता स्थित क्षेत्रज्ञ सूर्य की ज्योति से प्रकाशित होता हुआ यह चन्द्रमा सिर में केशान्त स्थान में स्थित होकर पूर्णिमा बनाता हुआ शीर्ष भाग स्थित इन्द्रियों को चन्द्रिक के समान प्रकाशित करता है अतः इन्द्रियों से बाहर की वस्तु को लाने के कारण भूतात्मा की जाग्रत अवस्था होती है । तालु प्रदेश में गोस्तन स्थान पर स्थित होता हुआ यह अष्टमी को उत्पन्न करता हुआ शीर्षस्थ इन्द्रियों का स्पर्श न करता हुआ नीचे की ओर भावना वासना रूप संस्कारों को ज्योति से प्रकाशित करता है अतः वह भूतात्मा की स्वप्नावस्था होती है । अब इससे भी नीचे की ओर संच- रण करता हुआ हृदय देश में पहुंच कर क्षेत्रज्ञ सूर्य के साथ निवास करता है तब अमावस्या होती है, वहां केवल आत्मानन्द का ही अनुभव करता है, अन्य किसी विषय का वहां अनु- भव नहीं होता । यह भूतात्मा की सुषुप्ति अवस्था होती है । इस चन्द्रमा की अध्यात्म इन भूतात्मा की तीन अवस्थाओं के उत्पन्न करने वाले तीन पादों को भगवान् तित्तिरि ने बतलाया है कि इस आध्यात्मिक चन्द्रमा का यह संचरण यादृच्छिक या अनियतकालिक है. यह दिव्य चन्द्रमा के समान नियत काल में नहीं होता ।
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विज्ञानविद्युत् ६३ -- "यह हृदय के भीतर आकाश है, उसके भीतर यह मनोमय पुरुष है जो अमृत हिरण्मय है । तालु के अन्तर में जो यह स्तन के समान अवलम्बित है वह इन्द्र योनि है । जहां यह शीर्ष और कपाल सहित केश तक घूमता है । ब्रह्मा आकाश शरीर वाला है । मन सत्यात्मक है वह प्राणों में विश्राम करता है, वह आनन्दमय है शान्ति समृद्धिमय है, वह अमृत है (ते. उपनिषत्) पंचमोन्नादमयो भूतात्मा शरीरात्मा- श्रग्निः अथाग्निमयः पृथ्वीरसरूपः पञ्चम आत्मा भूतात्मा नाम । स तावत् त्रिविध: - शरीरात्मा, हंसात्मा, दिव्यात्मा चेति । तत्र पञ्चभूतान्येव शरीराकारेण विशेषसन्निवेश- युक्तानि शरीरात्मा भवति । तत्रैतानि भूतानि मत्यग्निः पृथ्वीरसरूपो द्रष्टव्यः । स भूतात्मभेदेषु प्रथमो भूतात्मा शरीरात्मा मत्र्त्योऽग्निः । पञ्चम अन्नादमय भूतात्मा शरीरात्मा-अग्नि आगे अग्निमय पृथ्वी का रस रूप पांचवां आत्मा भूतात्मा नाम का है । वह तीन प्रकार का है शारीरात्मा, हंसात्मा, तथा दिव्यात्मा इनमें पांच महाभूत ही शरीर के आ- कार से विशेष प्रकार के ढांचे में ढालने पर शरीरात्मा कहलाता है । उनमें ये भूत मर्त्याग्नि पृथ्वी के रस के रूप में समझने चाहिए । भूतात्मा के भेदों में यह प्रथम भूतात्मा शरी- रामा मर्त्य अग्नि है । अथ द्वितीयो भूतात्मा हंसात्मा मर्त्यवायुः तत्रैतस्मिन् बाह्यात्मनि शरीरात्मनि प्रतिभूतमभिव्याप्नुवानो भूताभिमानी वायुः शरीरावच्छेदाकारेण सङ्गठितो हंसात्मा भवति । स च जीवनकाले भौतिकशरीरानुगतः शरीरे प्रविष्ट एव प्रायेणावतिष्ठते । किन्तु मरणोत्तरं शरीरनिखनने तदेव शरीरमालम्ब- मानो यतस्ततो वा सञ्चरति । शरीरदाहे तु शरीराभावान् मृन्मयशरीरवियुक्तो हंसात्मा अस्याः पृथिव्या उपरिष्टादेभूषवायौ वायव्यशरीरो यतस्ततीऽनुसञ्चरति । स च शतं वर्षाणि चिरञ्जीवति । सामान्यज्ञानवान्, जीवनकालीनज्ञानतुल्यज्ञानो वा, जीवनका- लीन सुखदुःखावस्था तुल्यावस्थो वा । स च वायव्यशरीरस्वात् परकायप्रवेशङ्करोति ।
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६४ विज्ञानविद्युत् नानाजीवशरीराकृतिधारणसमर्थः स कदाचिद् दृश्यो भवति, स्वप्नेचागत्य वक्त, क्षमते । जीवतोऽपि शरीरसन्निधौ कदाचिदागत्याहश्यः किञ्चित् कर्णे ब्रूते, किन्तु न दृश्यते । तमेव योनिविशेषं भूत इत्याचक्षते लोकाः । गवाश्राद्धेन तस्य हंसात्मनः शरीरनाशी भव- तीति केचिद वैज्ञानिका आहुः । तदित्यं पृथ्वीलोकगतैमूववायुमयोऽयं हंसात्मा नाम भतात्मा व्याख्यातः । दूसरा भूतात्मा हंसात्मा मर्त्य वायु वहां इस बाह्य आत्मा शरीरात्मा में प्रत्येक भूत में अभिव्याप्त होता हुआ भूतों का जीवनअभिमानीकालजोमें•वायुवह हैभौतिकवह शरीरशरीरकोमें घेरनेअनुगतवालेहोकरआकारशरीरमें सङ्गठितमें प्रायः होकरप्रतिष्ठितहंसात्मारहाहोताकरताहै । है । परन्तु मृत्यु के उपरान्त जब शरीर को गाड दिया जाता है तब उसी शरीर का अव- लम्ब लेता हुआ इधर- उधर वायु में सडचरण करता है । शरीर को जला दिया जाने पर तो शरीर के अभाव में भौतिक शरीर से वियुक्त होकर यह हंसात्मा इस पृथ्वी के ऊपर एमूष वायु में वायवीय शरीर में इधर - उधर गतिमान् रहता है । वह सौ वर्षों के काल तक जीवित रहता है । वह या तो सामान्य ज्ञान रखता है, या जीवन काल के ज्ञान के समान ज्ञान वाला रहता है अथवा जीवन काल की सुख दुःख अवस्थाओं के तुल्य अवस्था वाला होता है । वह वायवीय शरीर वाला होने से परकाय प्रवेश करता है । नाना जीवों के शरीर की आकृतियों के धारण करने में समर्थ वह कभी दिखाई देता है । वह स्वप्न में भी आकर बोलने में समर्थ होता है । जीवित व्यक्ति के शरीर के समीप भी कभी आकर अह- श्य होता हुआ कान में बोलता है, किन्तु दिखाई नहीं देता । इसी विशेष प्रकार की योनि को लोक प्रचलित भाषा में "भूत " भी कहां जाता है । कुछ वैज्ञानिकों का कथन है कि गया श्राद्ध करने से उस हंसात्मा का शरीर नाश हो जाता है । इस प्रकार पृथ्वी लोक गत एमूष वायुमय इस हंसात्मा नामक भूतात्मा को व्याख्या हुई । श्रथ तृतीयो भूतात्मा दिव्यात्मा प्राणः एष च दिव्यात्मा भूतात्मा लोकत्रयविभक्तप्राणत्रैविध्यात् त्रिधा विभक्तो वक्ष्यते- aparisग्निः, तेजसो वायुः, प्राज्ञो नामेन्द्रश्चेति । तत्रायमिन्द्रः प्राण एव प्रज्ञात्मा । "यः प्राणः सा प्रज्ञा या प्रज्ञा स प्राणः । सह ह्येतावस्मिन् शरीरे वसतः सहो- तिष्ठतः । तमेतमायुरमृतमित्युपास्वे " यह कौषीतकि तिः । तथा च ज्ञानमयः कर्ममयश्चायं प्राज्ञो ज्ञानकर्मजनिता भ्यां भावना -वासनाभ्यां संपरिप्लुतो ज्ञानात्मा च भवति कर्मात्मा च ।