विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 71–80

विज्ञान विद्युत - पण्डित मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 71–80

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विज्ञानविद्युत् ६५ सोऽयं प्रज्ञामयः प्राणः सूर्यरसत्त्वादिन्द्रो भुक्तान्नपरिणामजे चान्द्रमसरसमये सोमे मनसि प्रतिफलितः प्राज्ञो नाम भूतात्मोपपद्यते । तत्रैतस्मिन् मनसीदं ज्योतिर्विज्ञानात्मन एवोपलभ्यत इति विज्ञेयम् । स एष तृतीयो भूतात्मा कर्मात्मा नाम । यथा मर्त्याग्निमयः शरीरात्मा प्रथमो भूतात्मा, यथा वा वायुमयो हंसात्मा द्वितीयो भूतात्मा तथैव इन्द्रमयः कर्मात्मा तृतीयो भूतात्मा । एते हि अग्निवाविन्द्राः केनोपनिषत्प्रसिद्धाः पृथिव्यामेवोपल- भ्यन्ते । तस्मात् त्रिभिरेतैः पृथ्वीरसैस्त्रिविधा भूतात्मानः सम्पद्यन्ते । तीसरा भूतात्मा दिव्यात्मा प्राण यह दिव्यात्मा नाम का भूतात्मा तीन लोकों में विभक्त प्राणों की विविधता के कारण तीन प्रकार से विभक्त है, वैश्वानर अग्नि, तैजस वायु तथा प्राज्ञ नाम का इन्द्र । इनमें जो इन्द्र प्राण है वही प्राज्ञात्मा है । कौषीतकि ति में कहा गया हैं - "जो प्राण है, वही प्रज्ञा है, जो प्रज्ञा है वही प्राण है । ये दोनों इसी शरीर में साथ रहते हैं, साथ उठते हैं, उसकी तुम आयु, अमृत के रूप में उपासना करो ". इस प्रकार ज्ञानमय तथा कर्ममय यह प्राज्ञात्मा ज्ञान कर्म से उत्पादित भावना और वासना से आप्लुत होकर ज्ञानात्मा और कर्मात्मा हो जाता है । यह प्रज्ञामय प्राण सूर्य रस की सत्ता के कारण इन्द्र कहलाता है, वह खाये हुए अन्न के परिमाण से उत्पादित च- न्द्रमा के रसमय सोम रूप मन में प्रतिफलित होकर प्राज्ञ नामक भूतात्मा के रूप में संपन्न हो जाता है । इस मन में यह ज्योति विज्ञानात्मा की ही उपलब्ध होती है यह समझना चाहिए । यह तीसरा भूतात्मा कर्मात्मा नाम का है । जैसे मर्त्याग्निमय शरीरात्मा प्रथम भूतात्मा है, और जैसे वायुमय हंसात्मा दूसरा भूतात्मा है वैसे इन्द्रमय कर्मात्मा तीसरा भूतात्मा है । ये अग्नि वायु इन्द्र जो केनोपनिषत् में प्रसिद्ध हैं वे इस प्रकार पृथ्वी में ही उपलब्ध होते हैं । इस प्रकार पृथ्वी के इन तीनों रसों से तीनप्रकार के भूतात्मा सम्पा दित होते हैं ।

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६६ विज्ञानविद्युत् कर्मात्मत्रैविध्यनिरुक्तिः सोऽयं कर्मपरतन्त्रः कर्मात्मा त्रिविधो भवति, वैश्वानरः, तैजसः प्राज्ञ, इति तत्र वश्वानरोऽग्निमयः, तैजसो वायुमयः, प्राज्ञ इन्द्रमयः । तेषु यत्र केवले वैश्वानर एवं शरी- रतन्त्रधरो भवति न तैजसप्राज्ञौ स खनिजमणितरादिर्धातुजीवो भवति । यत्र तु वैश्वा- नरस्तैजसश्च तन्त्रधरौ भवतः स मूलजीवः यथा वनौषधिवनस्पत्यादिः । अथ यत्र शरीरे वैश्वानरस्तैजसः प्राज्ञ इति त्रयोऽपि देवा श्रात्मानस्तन्त्रधरा भवन्ति स चेतनजीवो यथा कृमिकीटपशुपक्षिमनुष्यादिः । त्रयोऽप्येते जीवाः क्रमेणासंज्ञाः, श्रन्तः संज्ञाः, ससंज्ञा दृश्यन्ते । तत्र धातुजीवेऽग्निरेको वैश्वानरः शारीरधातु संगठनकर्मा शरीरोपादानभूतान् शरीरधा- तूनं भिन्नभिन्नरूपेण सुवर्णरजतताम्रादिना जनयति । मूलशरीरे च काष्ठविशेषरूपाणि here you काण्डादीनि च भिन्नभिन्नरूपाणि जनयति । चेतनशरीरे च स एव वैश्वानरः शोणितमांसमेदोऽस्थ्यादि धातुविशेषरूपाण्युत्पादयति । अथायमन्यस्तैजसात्मा तु श्रारोहा- वरोहकर्मा प्रन्तःसंज्ञान् वृक्षादिमूलजीवान्, तथा ससंज्ञान् मनुष्यादिचेतनजीवान् क्रमेण परिवर्द्धयन् बाल्यतारुण्याद्यवस्थाविशेषैः संयोजयति सुवर्णादिषु पिण्डेषु च धातुजीवेषु न शरीरवृद्धयादिरूपोऽवस्थाकृतो विशेषः परिदृश्यते । तत्कारणस्य वायुमस्य तैजसप्राणस्य तत्राऽभावात् । कर्मात्मा के तीन भेदों की निरुक्ति यह कर्म परतन्त्र कर्मात्मा तीन प्रकार का होता है- वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ । इनमें वैश्वानर अग्निमय है, तेजस वायुमय है तथा प्राज्ञ इन्द्रमय है । इनमें जहां केवल वै- श्वानर ही शरीर के तन्त्र का धारण करने वाला होता है, तैजस और प्राज्ञ जहां शरीर के तन्त्र के धारक नहीं होते वह खनिज मणि प्रस्तर आदि धातुजीव होता है । और जहां वैश्वानर और तैजस शरीर के तन्त्र का धारण करने वाले होते हैं वह मूलजीव है । वन के ओषधि वनस्पति आदि उसी कोटि के हैं । जिस शरीर में वैश्वानर, तैजस तथा प्राज्ञ ये तीनों देव आत्मा के तन्त्र का धारण करने वाले होते हैं वह चेतनजीव होता है जैसे-कृमि, कीट, पशु, पक्षि, मनुष्य आदि । ये तीनों ही जीव क्रम से असंज्ञ, अन्तः संज्ञ, और ससंज्ञ दिखाई देते हैं । इन में धातु जीवों में एक वैश्वानर अग्नि शरीर के धातुओं का संगठन

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विज्ञानविद्यत् ६७ करने वाला है, वह शरीर के उपादान भूत शरीर के धातुओं को भिन्न-भिन्न रूप से सुवर्ण, रजत, ताम्र आदि रूप से उत्पन्न करता है । चेतन शरीर में वही वैश्वानर शोणित मांस दस्थ आदि धातु विशेषों के रूपों को उत्पन्न करता है । यह जो दूसरा तैजस आत्मा है, वह आरोहण और अवरोहण कर्म वाला है । वह अन्तः संज्ञा वाले वृक्ष आदि मूल जीवों का तथा ससंज्ञ मनुष्य आदि चेतन जीवों का क्रम परिवर्धन करता हुआ उन्हें बाल्य, तारुण्य आदि अवस्था विशेषों से संयुक्त करता है । सुवर्ण आदि पिण्ड जो धातु जीव हैं उनमें शरीर वृद्धि आदि रूप वाली अवस्थाकृत विशेषता नहीं दिखाई देती । क्योंकि इन अवस्थागत विशेषताओं को उत्पन्न करने वाले वायुमय तैजस प्राण का वहां अभाव है । अथ तृतीयस्तु प्रज्ञानात्मा वैश्वानरतैजसप्राणपरिपाकेनोत्पद्यते । स एव प्रज्ञाना- त्मा शरीरे श्रहं परबुद्ध यादि रूपं चैतन्यं जनयति । तत एव चेन्द्रप्राणात् सर्वाणीन्द्रियाणि चक्षुः श्रोत्रवागादीनि यथायथं प्रादुर्भवन्ति । इन्द्राख्यप्राणजनितत्त्वादेव च ते प्राणा इन्द्रि याणीत्युच्यन्ते । यद्यपि वृक्षादिषु मूलजीवेष्वपि तानीन्द्रियाणि सन्ति, अतिसूक्ष्मदृष्ट्या तत्रापि चेतन जीववत् सुखदुःखादिप्रत्ययदर्शनात् तथापि चेतनजीवस्य सुप्तस्येव तत्र वृक्षा- दिषु इन्द्रिय वृत्त'रनुत्वणतया तेषां मूलजीवानामन्तः संज्ञत्वं महर्षय प्राचक्षते । तेषु हि अनु- बुद्धः प्रज्ञाप्राणश्चेतनजीवशरीरे सम्यगुद्बुद्धो भवति । तथा चैतत् प्राणत्रयतारतभ्यात् त्रिविध जीवः प्रतिपद्यते धातुः, मूलम्, चेतनश्चेति । तदित्थं वैश्वानरः तैजसः प्राज्ञ इति त्रेधा विभक्तः कर्मात्मानामायं भूतात्मा सिद्धो भवति तेन च शरीरात्मा, हंसात्मा, वैश्वा- नरात्मा तैजसात्मा, प्रज्ञात्मा, इत्येवं पञ्चधा विभक्तो भूतात्मा नाम द्रष्टव्यः । तत्र शरीरात्मा हंसात्मेति द्वौ बाह्यात्मानौ । वैश्वानरादयस्तु त्रयोऽन्तरात्मानः संज्ञायन्ते । पञ्चविधोऽप्ययं भूतात्मा प्रज्ञात्मना विशिष्यते तस्मादयं प्राज्ञात्मा इत्युच्यते । तदित्थं पृथ्वीरसमयः पञ्चमात्मा पञ्चभेदभिन्नो भूतात्मा नाम व्याख्यातः । तीसरा प्रज्ञानात्मा वैश्वानर और तैजस प्राणों के परिपाक से उत्पन्न होता है । वही प्रज्ञानात्मा शरीर में स्वकीय परकीय आदि बुद्धि के चैतन्य को उत्पन्न करता है । इसी इन्द्र प्राण से समस्त इन्द्रियां चक्षु, श्रोत्र, वाक् आदि यथाक्रम प्रादुर्भूत होते हैं । इन्द्र नामक मुख्य प्राण से उत्पन्न होने के कारण ही ये प्राण इन्द्रिय शब्द से कहे जाते हैं । यद्यपि वृक्षादि मूलजीवों में भी ये इन्द्रियां विद्यमान हैं क्योंकि अतिसूक्ष्म दृष्टि से देखने पर उनमें भी चेतन जीव की तरह सुख दुःख आदि का ज्ञान प्रतीत होता है, तथापि जैसे सोये हु चेतन जीव में इन्द्रियां सक्रिय नहीं रहतीं, वैसे ही वृक्ष आदि में भी इन्द्रियों की वृत्तियां उत्कट नहीं होने के कारण इन मूल जीवों को महर्षियों ने अन्तः संज्ञा वाला कहा है

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६८ विज्ञानविद्यतु उनमें जो अनुबुद्ध प्रज्ञा प्राण है वह चेतन जीव के शरीर में भली भांति उद्बुद्ध हो जाता है । इस प्रकार इन तीन प्राणों के न्यूनाधिक भाव से जीव तीन प्रकार का हो जाता है धातु, मूल तथा चेतना और उक्त रीति से वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ इन तीन भेदों में विभक्त कर्मात्मा नामका यह भूतात्मा सिद्ध होता है । इस प्रकार शरीरात्मा, हंसात्मा, वैश्वानरात्मा तैजसात्मा, प्रज्ञात्मा इन पांच प्रकारों से भूतात्मा को समझना चाहिए । इन में शरीरात्मा और हंसात्मा ये दो बाह्य आत्मा हैं तथा वैश्वानर आदि तीनअन्तरात्मा समझे जाते हैं । पांचों प्रकार का यह भूतात्मा प्रज्ञानात्मा विशिष्ट समझा जाता है । इसलिए यह प्राज्ञानात्मा कहा गया है । इस प्रकार पृथ्वी के रस से परिपूर्ण पंचम आत्मा जो पांच भेदों में व्याप्त है उस भूतात्मा की व्याख्या की गई । श्रात्मगतिविवेकः तत्र मरणोत्तरं शरीरात्मा पञ्चत्वं याति । श्रर्थात् पृथिव्यादयः पञ्च धातवः शरीरस्था विश्लथाः सन्त शरीरात् पृथग्भूय पृथिव्यादिषु यथायथं संसृज्य शारीरस्वरूपा- णि चत्वास्थित्वादीनि त्यजन्ति । सैषा शरीरस्थभूतानां पञ्चत्वगतिर्भवति । श्रथ वन, प्राणवा, चक्षुरादित्ये, श्रोत्रं दिक्चन्द्र, मनो ब्रह्मणस्पतिचन्द्र च यथायथं संसृज्याध्यात्मिकस्वरूपतश्च्यवन्ते । सैषा शरीरस्थदेवतानां पञ्चत्त्वगतिर्भवति । तथा च सूक्ष्मस्थूलभेदाद्विभक्तस्य शरीरात्मनः पञ्चत्त्वगतिर्व्याख्याता । आत्मा गति का विचार मृत्यु के उपरान्त शरीरात्मा पञ्चत्व को प्राप्त करता है । इसका अर्थ है कि शरीर में स्थित पृथ्वी आदि जो पांच धातु हैं वे विश्लथ होकर शरीर से अलग हो जाते हैं और पृथ्वी आदि पांचों धातुओं में मिल जाते हैं तथा वे शरीर के स्वरूप में स्थित चर्मत्व मांसत्व, आस्थित्व आदि को छोड़ देते हैं । यह शरीर स्थित भूतों की पञ्चत्व गति कह- लाती है । इसके साथ वाक् अग्नि में प्राण वायु में, चक्षु आदित्य में, श्रोत्र दिशा और चन्द्रमा में, मन ब्रह्मणस्पति और चन्द्रमा में क्रम से विलीन होकर अपने आध्यात्मिक स्व- रूप से अलग हो जाते हैं । यह शरीर स्थित देवताओं की पंचत्व गति होती है । यह सूक्ष्म तथा स्थूल भेद से विभक्त शरीरात्मा की पंचत्व गति बतलाई गई ।

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विज्ञानविद्युत् ६६ अथ हंसात्मनस्तु एमषवायो योनिविशेषरूपेण नवीनं जन्म भवति । तस्य तत्र चिरञ्जीवनं लोके दृश्यते । तस्य मृत्यौ बायो विलयनं सम्भाव्यते । अथ तृतीय भूतात्मा कर्मात्मा व्याख्यातः - स खलु पुण्यपापाभ्यां कर्मभ्यामनुब- ध्यमानः शरीरत्यागानन्तरं कर्मगतिं गतः पारवश्यात् पापान् वा लोकान् गच्छति पुण्यान् पृथिव्याः सकाशात् सूर्यविरुद्ध दिशि शनैश्चरपर्यन्तं लोकालोक पर्यन्तं वा गमनमधो- गतिः पापगतिर्भवति, साऽन्धकारप्रायत्त्वात् कृष्णा गतिः । पृथिव्याः सकाशात् सूर्यपर्यन्तं गमनं तूर्ध्वा गतिः पुण्यगतिः कथ्यते । सा प्रकाशमयस्वाच्छुक्ला गतिः । ताभ्यामन्यतरया गत्या गत्वा श्रधो लोके ऊर्ध्वलोके वा दुःखं सुखं वा भुक्त्वा क्षोणे पापे क्षीणे पुण्ये वा पुनरिमं मृत्युलोकमभिजायन्ते । सेवा कर्मगतिर्नाम । हंसात्मा का तो एमूष वायु में योनि विशेष के रूप में नया जन्म होता है । उसका चिर काल तक जीवित रहना उस लोक में माना जाता है । उसकी मृत्यु होने में वायु में विलयन होना संभावित होता है । तीसरा भूतात्मा कर्मात्मा कहा गया हैं । वह पुण्य पाप कर्मों से अनुबद्ध होता हुआ शरीर त्याग के अनन्तर कर्म गति को प्राप्त कर परवश होता हुआ या तो पापयुक्त लोकों में जाता है, अथवा पुण्य शाली लोकों में जाता है । पृथ्वी से लेकर सूर्य की विरुद्ध दिशा शनैश्चर तक अथवा लोकालोक तक गमन अधोगति या पापगति होती है । यह अन्धकार प्राय होने से कृष्णगति कहलाती है । पृथ्वी से लेकर सूर्य तक जो ऊर्ध्व गति है वह पुण्य गति कहलाती है । यह प्रकाशमय होने से शुक्ल गति है । इन तोनों में से किसी एक गति से जाकर ऊर्ध्व लोक में या अधोलोक में सुख या दुःख का भोगकर, पाप के या पुण्य के क्षीण जो जाने पर पुन: इसी मृत्यु लोक में जन्म होता है । इसी को कर्म गति कहा जाता है । अध्यात्मं पंचाक्षर पुरुषोपसंहारः इत्थञ्च ब्रह्मा, विष्णुः, इन्द्रः, सोम अग्निरित्येते पंचाक्षरा अध्यात्मं जीवशरीरेऽ- नुवर्त्तमाना शान्तात्मा, विज्ञानात्मा, प्रज्ञानात्मा, भूतात्मा इत्येवं पंचभिरात्मभिरुप- व्याख्याता भवन्ति । एषां च पञ्चाक्षराणामालम्बनभूतः शरीरस्थोऽव्ययपुरुषो विरजा इत्युच्यते । तथा चाह भगवानैतरेयः --

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७० विज्ञानविद्युत् " यदक्षरं पञ्चविध समेति युजो युक्ता श्रभि यत् संवहन्ति । सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकी भवन्ति ॥ " (ऐ. प्रा. २ प्र. ३ ८ खं ) इति । "हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्र ज्योतिषां ज्योतिस्तद् यदात्मविदो विदुः" इति च । अध्यात्म में पंचाक्षर पुरुष का उपसंहार इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सोम, अग्नि ये पांच अक्षर अध्यात्म में जीव के शरीर में अनुवर्तमान होते हुए शान्तात्मा, महानात्मा, विज्ञानात्मा, प्रज्ञानात्मा भूतात्मा इन पांच आत्माओं के रूप में व्याख्यात होते हैं । इन पाँच अक्षरों का आलम्बनभूत शरी- रस्थ अव्यय पुरुष विरज कहलाता है । भगवान् ऐतरेय ने कहा है कि- “ – जो पांच प्रकार के अक्षर से युक्त शरीर का परिचालन होता है, जहां सत्य का भी सत्य युक्त होता है वहां समस्त देव एक हो जाते हैं । " –( ऐ. आ. २ आ. ३ अ. ८ खै. ) और भी कहा गया है । - "हिरण्मय परम कोश में विरज निष्कल ब्रह्म है, आत्म वेत्ताओं ने उस को ज्योतियों की ज्योति जाना है " - श्रव्ययधातूनामध्यात्मं विनियोगः श्रानन्दः, विज्ञानम् मनः, प्राणः, वाग्, इत्येवं या अव्ययस्य पञ्चभक्तयो व्याख्या- ताः, स एवैषां सर्वेषामक्षरपुरुषाणां क्षरपुरुषकार्याणां विकारसंघानां च यथायथमालम्बनं भवति । तत्र स विकारसंघ: क्षरपुरुषस्तावद् - अव्ययस्य वाग्धातुं प्राधान्येनावलम्बते । अक्षरपुरुषास्तु सर्वेऽव्ययस्य प्राणधातुम्, तत्रापि शान्तात्मा, महानात्मा, विज्ञानात्मा चेत्यात्मानस्त्रयोऽव्ययस्य विज्ञानधातु विशिष्यावलम्बन्ते । प्रज्ञानात्मा प्राणधातुम्, भूता- मातु वाधातुमिति भवति कश्चिद्विशेषः । भूतात्मस्वपि शरीरात्मा वाग्धातुम्, हंसात्मा प्राणधातुम् कर्मात्मा तु मनोधातु विशिष्यावलम्बते इति विशेषः । कर्मात्मस्वपि वैश्वा- नरो वागुधातुम्, तैजसः प्राणधातुम्, प्राज्ञः पुनरेष मनोधातुमवलम्बते ।

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विज्ञानविद्युत् ७१ अव्यय के धातुओं का अध्यात्म में विनियोग आनन्द, विज्ञान, भन, प्राण, वाक् ये जो पांच अध्यय के भेद बतलाये गए हैं वे ही सभी अक्षर पुरुषों के, क्षरपुरुष के कार्यों के तथा विकार समूहों के यथाक्रम से आलम्बन होते हैं । इन में विकारों का समूह जो क्षर पुरुष है वह अव्यय पुरुष के वाक् नामक धातु का प्रधानतया आश्रय लेता है । अक्षर पुरुष के जो भेद हैं, वे अव्यय पुरुष के प्राण धातु का आश्रय लेते हैं । इनमें भी शान्तात्मा, महानात्मा, विज्ञानात्मा ये तीन आत्मा अव्यय पुरुष के विज्ञान धातु का विशेष रूप से अवलम्ब ग्रहण करते हैं । प्रज्ञानात्मा प्राण धातु का आश्रय लेता है, इस प्रक. र कुछ विशेषता आती है । भूतात्माओं में भी शरीरात्मा वाक धातु का तथा हंसात्मा प्राण धातु का, तथा व मत्मा मनोधातु का विशेष रूप से आश्रय ग्रहण करता है, यह विशेषता होती है । कर्मात्माओं में भी वैश्वानर वाक् धातु का, तथा तैजस प्राण धातु का आश्रय लेता है और प्राज्ञ मनोधातु का अवलम्ब लेता है । यद्यपि सर्वेऽप्येतेऽक्षरपुरुषाः क्षरपुरुषा वा अव्ययस्यैकं मनोधातुमेवावलम्बन्ते, तथापि कार्योपधानकाले स्वस्वानुकूलं भिन्नं भिन्नं धातुमेवावलम्ब्य जगतः सृष्टि मुक्ति वा संभावयन्तीति भाव्यम् । तत्रापि सृष्टि कुर्वन्तो मुख्यतया मनोमयप्राणगभितां वा- चमाश्रयन्ते, सहकारिविधया तु विज्ञानं चानन्दं च गृह्णन्ति । श्रथ मुक्तिमपेक्षमाणा मुख्य- तया प्रान्दमयविज्ञानगर्भितं मनः समाश्रयन्ते, सहकारिविधया तु प्राणं च वाचं च गृह्ण- न्तीति विशेषः । यद्यपि ये सभी अक्षर पुरुष और क्षर पुरुष अव्यय पुरुष के एक मनो धातु का ही अवलम्ब ग्रहण करते हैं, तथापि कार्योन्मुख होते हुए अपने- अपने अनुकूल भिन्न-भिन्न अव्यय धातुओं का अवलम्ब ग्रहण करते हुए जगत् की सृष्टि और मुक्ति की संभावना करते हैं, यह समझना चाहिए । वहां सृष्टि का निर्माण करते हुए मनोमय प्राण गर्भिता वाक् का आश्रय लेते हैं, सहकारि के रूप में विज्ञान और आनन्द का ग्रहण करते हैं । और जब मुक्ति की अपेक्षा करते हैं तब मुख्य रूप से आनन्दमय विज्ञान गर्भित मन का आश्रय लेते हैं तथा सह कारी के रूप में प्राण और वाक् का आश्रय लेते हैं, यह विशेषता होती है ।

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७२ विज्ञानविद्युत् अव्ययकलानामध्यात्मं पंचकोशत्वम् श्रत एवैतस्याव्यपुरुषस्यैताः पञ्चभक्तयः पञ्चकोशा उच्यन्ते - अन्नमयकोषः, प्राणमयकोषः, मनोमयकोषः, विज्ञानमयकोषः श्रानन्दमयकोषः, इति तैत्तिरीयके प्रपञ्चितम । यद्यपि " हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलमि" त्यादावनात्मनोऽवरब्रह्मणः कोशत्वमाख्याय तत्रात्मनः परब्रह्मणो निधेयरत्नत्वमाख्यातम् । तदनुसारेण प्रकृतेऽपि शङ्कराचार्यप्रभृतयो दार्शनिका अन्नप्राणमनःप्रभृतीनां पूर्वपूर्वेषामनात्मत्वमपरब्रह्मत्वं चापेक्ष्योत्तरोत्तराणां निधयरत्नत्वमपेक्षन्ते- अन्नमये प्राणमयः, तत्र मनोमयः, तत्र विज्ञान- मयः, तत्रानन्दमय इति । अथैतस्मिन्नध्यानन्दमये कोशेऽन्तर्निहितं कञ्चिदन्यं भावविशुद्ध- मानन्दमात्रं परब्रह्माऽचक्षते । तैत्तिरीयोपनिषद्यपि च तथैव चापाततः स्वरसो लभ्यते । तथापीदं मतमश्रद्धयमिति ब्रमः- अव्यय की कलाओं के अध्यात्म में पांच कोश अव्यय पुरुष के पांच भेद पांच कोश कहे जाते हैं - अन्नमयकोप, प्राणमयकोष, कोष, विज्ञानमयकोष, आनन्दमयकोष । यह विस्तार तैत्तिरीय में हुआ है । यद्यपि- - "हिरण्मय परम कोश में निष्कल विरज ब्रह्म है" - इत्यादि वाक्य में अनात्मभूत अवर ब्रह्म की कोश बतलाकर उसमें परमात्मा परब्रह्म को स्थापित रत्न के समान बतलाया गया है । उसी के अनुसार यहां भी शङ्करा- चार्य आदि दार्शनिक अन्न, प्राण, मन आदि पूर्व पूर्व को अनात्मा या अवर ब्रह्म कह कर आगे के भाग को स्थापित रत्न की तरह कहते है - अन्नमय में प्राणमय, उसमें मनोमय, उसमें विज्ञानमय उसमें श्रानन्दमय यह क्रम मानते है । इस आनन्दमय कोश में भी अन्त- निहित किसी अन्य भाव को विशुद्ध आनन्द मात्र परब्रह्म कहते हैं 1। तैत्तिरीय उपनिषद में भी आपाततः यही अर्थ प्रतीत होता है । परन्तु फिर भी यह मत श्रद्धा के योग्य नहीं, ऐसा हमारा मन्तव्य है ।

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--विज्ञानविद्य त् ७३. "मया ततमिदं सर्व जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ " "यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रमो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ '

"यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ।

पुरुषः स परः पार्थ! भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ॥ 11

"ये चैव सात्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । मत्त एवेति तान् विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ " इत्येवमनेकधा भगवद्गीतोपनिषदादौ भूतानामवर ब्रह्मणा मव्ययपुरुषनिध यत्त्व- माख्याय तस्याव्ययपुरुषस्य सर्वालम्बनत्वाख्यानात् पञ्चानामध्येषां कोशानां सर्वजगद्वि- कारालम्बनत्वेन परब्रह्मत्त्वावगमात् । "एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्" इति श्रुत्या परमात्मनः सर्वाधारत्वावगमाच्च । श्रव्ययपुरुषस्य तु स्वजन्यभूतव- र्गनिध यत्वं स्पष्टशब्देन प्रत्याख्यातम् । तस्मादव्ययपुरुषस्यैव परब्रह्मणः सर्वालम्बनत्वात् तद्भक्तीनां वाङ्ममनःप्राणप्रभृतीनां कोशत्वमाख्यातुं युज्यते । तैत्तिरीयोप निषदुक्तस्तेषां कोशानामन्तरान्तरीभावः सूक्ष्मत्वाभिप्रायो द्रष्टव्यो न वाधाराधेयभावनिबन्धनः अथवा अन्नजनित मौलिक मर्त्य कोशाभिप्राय वा स उपपद्यते । वस्तुतस्तु स एक एवायमव्ययः सर्वेषामक्षरक्ष रादीनामालम्बनत्वात् कोशभूत प्रासीत् । स एकोऽहं बहुस्यामि- तीच्छा-तपः श्रमयोगादेकस्यैव विवर्तरूपेणानेकधात्वं प्राप्तास्ताएता वाक्प्राणमनोविज्ञाना- नन्दलक्षणा अव्ययभक्तयः सर्वजगदर्थानां नामरूपकर्मादीनां कोशभूताः सन्तीत्यवगन्तव्यम् । तदित्थं सर्वालम्बनभूतोऽयमव्ययपुरुषो व्याख्यातः । -" अव्यक्त मूर्ति वाले मैंने इस समस्त जगत् का विस्तार किया है । समस्त भूत मुझ में स्थित हैं, मैं उनमें समाया हुआ नहीं हूँ ।" — "जैसे महान् सर्वत्र जाने वाला वायु आकाश में नित्य स्थित रहता है, वैसे ही समस्त भूत मुझमें स्थित हैं यह तुम जान लो । ” -" जिसके भीतर समस्त भूत स्थित हैं जिसने इन सब का विस्तार किया है, हे पार्थ वह परम पुरुष अनन्य भक्ति के द्वारा प्राप्तव्य होता है । "

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II विज्ञानविद्यत् - "जो सात्विक, राजस तथा तामस भाव हैं तुम जान लो कि वें सभी मुझसे ही उत्पन्न हैं, मैं उनमें नहीं हूं, वे मुझमें हैं" - इस प्रकार अनेक प्रकार से भगवद् गीता उपनिषद आदि में जो अवर ब्रह्म भूत रूप हैं उनकी अव्यय पुरुष में स्थिति बतलाते हुए उस अव्यय पुरुष को सब का आलम्बन बतलाने के कारण इन पांचों कोशों को भी समस्त जगत् के विकारों का आलम्बन कहते हुए इन्हें परब्रह्म ही माना गया है । - "यही श्रेष्ठ आलम्बन है, यही परम आलम्बन है इस आलम्बन को जान लेनें पर जो व्यक्ति जो कुछ चाहता है, उसे वह प्राप्त हो जाता है" - इस श्रुति के द्वारा परमात्मा को सबका आधार बतलाया गया है । अव्यय पुरुष का अपने से उत्पन्न होने वाले भूतवर्गों को अपना आधार बनाकर रहना तो स्पष्ट शब्दों से निषिद्ध किया गया है । इसलिए अव्यय पुरुष के ही सब का आलम्बन होने से उसके वाक्, मन आदि भेदों को कोश कहना ही ठीक होता है । तैत्तिरीय उपनिषद् में इन कोशों की एक के बाद दूसरे की भीतर स्थिति जो बतलाई गई है । उसका अभिप्राय उनका उत्त- रोत्तर सूक्ष्म होना है, न कि उनमें पहिले के आधेय हैं और आगे के आधार ऐसा अभि- प्राय है । अथवा अन्न से उत्पन्न जो मौलिक मर्त्य कोश है उन्हें आधेय बनाकर समझते हुए उसकी उपपत्ति की जा सकती है । वस्तुतः यह एक ही अव्यय समस्त अक्षर क्षर आदि का आलम्बन होने के कारण कोश भूत था । "मैं एक हूं, बहुतों में प्रकट हो जाऊ ' ' -- इस प्रकार के इच्छा तप और श्रम के योग से एक के ही विवर्त रूप से ( अविकृत परिणाम रूप से) अनेक रूपों में प्रकट होने वाली वाक्, प्राण, मन, विज्ञान, आनन्द रूप अव्यय पुरुष की कलाएं या श्रव्यय पुरुष के भेद समस्त जगत् के अर्थ स्वरूप नाम रूप कर्म आदि के कोश भूत हैं, यह समझना चाहिए । इस प्रकार सब का आलम्बनभूत यही अव्यय पुरुष है यह व्याख्यान किया गया ।