विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र — पृष्ठ 1–10
विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10
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फ ३५ न hp. 10. 343 751 ॥ श्रीः ॥ श्रीविष्णुसे होनामस्तोत्रम् ( हिन्दी अनुवादसहित ) त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा. त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेवं त्वमेव सर्व मम देवदेव ॥ गीताप्रेस गोरखपुर
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फ 222 I 343 11 eft: 11 श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् ( हिन्दी अनुवादसहित ) गीताप्रेस, गोरखपुर R
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मुद्रक तथा प्रकाशक- घनश्यामदास जालान, गीताप्रेस, गोरखपुर . सं ० २००० से २००१ तक १५,२५० सं ० २००४ तृतीय संस्करण ५,००० सं ० २००६ चतुर्थ संस्करण १०,००० कुल ३०,२५० मूल्य - ) || सजिल्द = ) ॥
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खपुर पुस्तकालय भवन , अस्सी, काम श्रीविष्णु
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य संसा भूत न अ अनेक श्रीशेषशायी
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श्रीपरमात्मने नमः अथ श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्
यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् ।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
जिनके स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य जन्म - मृत्युरूप संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है, सबकी उत्पत्तिके कारण-भूत उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।
नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते ।
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
सम्पूर्ण प्राणियोंके आदिभूत, पृथ्वीको धारण करनेवाले, अनेक रूपधारी और सर्वसमर्थं भगवान् विष्णुको प्रणाम है ।
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( ४ ) वैशम्पायन उवाच करने श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः । पूजन युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥१ ॥ को
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! धर्मपुत्र राजा किं युधिष्ठिरने सम्पूर्ण विधिरूप धर्म तथा पापका क्षय करनेवाले धर्मरहस्यों को सब प्रकार सुनकर शान्तनुपुत्र भीष्मसे फिर परम पूछा ॥ १ ॥ जीवज
युधिष्ठिर उवाच किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् । जगर स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥२ ॥ स्तुव =
युधिष्ठिर बोले- समस्त जगत् में एक ही देव कौन भी हैं? तथा इस लोकमें एक ही परम आश्रय स्थान कौन है? ब्रह्माव जिसका साक्षात्कार कर लेनेपर जीवकी अविद्यारूप हृदय- क्षर - अ ग्रन्थि टूट जाती है, सब संशय नष्ट हो जाते हैं तथा सम्पूर्ण तत्पर कर्म क्षीण हो जाते हैं । किस देवकी स्तुति - गुण - कीर्तन हो जा
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ः ।
॥१ ॥
राजा रनेवाले से फिर ( ५ ) करनेसे तथा किस देवका नाना प्रकारसे बाह्य और आन्तरिक पूजन करने से मनुष्य कल्याणकी प्राप्ति कर सकते हैं? ॥२ ॥
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥३ ॥
आप समस्त धर्मोंमें पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त किस धर्मको परम श्रेष्ठ मानते हैं? तथा किसका जप करनेसे जननधर्मा " जीव जन्म - मरणरूप संसार - बन्धन से मुक्त हो जाता है ॥३ ॥
भीष्म उवाच म् । जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् ॥ ॥२ ॥ स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥४ ॥
भीष्मजी ने कहा- स्थावर - जङ्गमरूप संसार के स्वामी, है? ब्रह्मादि देवोंके देव, देश, काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न, हृदय- क्षर - अक्षरसे श्रेष्ठ पुरुषोत्तमका सहस्रनामों के द्वारा निरन्तर सम्पूर्ण तत्पर रहकर गुण - संकीर्तन करनेसे पुरुष सब दुःखोंसे पार कीर्तन हो जाता है ॥ ४ ॥
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( ६ ) तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायन्स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥५ ॥ और
कीर्तिक तथा उसी विनाशरहित पुरुषका सब समय भक्तिसे सम्पूर्ण युक्त होकर पूजन करनेसे, उसीका ध्यान करनेसे तथा संसार पूर्वोक्त प्रकारसे सहस्रनामोंके द्वारा स्तवन एवं नमस्कार दुःखों करनेसे पूजा करनेवाला सब दुःखों से छूट जाता है ॥५ ॥ एष स
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । यद्भक लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥६ ॥ वि
• मानता उस जन्म - मृत्यु आदि छः भावविकारोंसे रहित, कमलन सर्वव्यापक, सम्पूर्ण लोकोंके महेश्वर, लोकाध्यक्ष देवकी गुण - संच निरन्तर स्तुति करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे पार हो । परमं जाता है ॥ ६ ॥
- परमं ह्मण्यं सर्वधर्मज्ञ लोकानां कीर्तिवर्धनम् ।.. जो लोकनार्थं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् || ७ || परायण