विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र — पृष्ठ 11–20

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

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॥ जगत्की रचना करनेवाले ( ७ ब्रह्मा ) के तथा ब्राह्मण, तंप ॥५ ॥ और श्रुतिके हितकारी, सब धर्मोंको जाननेवाले, प्राणियोंकी

कीर्तिको ( उनमें अपनी शक्तिसे प्रविष्ट होकर ) बढ़ानेवाले, भक्ति से सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी, समस्त भूतोंके उत्पत्ति - स्थान एवं स तथा संसारके कारणरूप परमेश्वरका स्तवन करनेसे मनुष्य सब नमस्कार दुःखोंसे छूट जाता है ॥ ७ ॥

है ॥५ ॥ एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः

न् । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥८ ॥

त् ॥६ ॥ - * विधिरूप सम्पूर्ण धर्मो में मैं इसी धर्मको सबसे बड़ा

• मानता हूँ कि मनुष्य अपने हृदयकमलमें विराजमान रहित, कमलनयन भगवान् वासुदेवका भक्तिपूर्वक तत्परतासहित देवकी गुण - संकीर्तनरूप स्तुतियोंसे सदा अर्चन करे ॥ ८ ॥

पार हो परमं परमं यो यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः

- परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥९ ॥

EL जो देव परम तेज, परम तप, परम ब्रह्म और परम - ॥७ ॥ परायण है, वही समस्त प्राणियोंकी परम गति है ॥ ९ ॥

पृष्ठ 12

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( ८ )

पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।

दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥१० ॥

यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।

यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥११ ॥

तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।

विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥१२ ॥

पृथ्वीपते! जो पवित्र करनेवाले तीर्थादिकों में परम पवित्र है, मङ्गलोंका मङ्गल है, देवोंका देव है तथा जो भूत-प्राणियोंका अविनाशी पिता है, कल्पके आदिमें जिससे सम्पूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं और फिर युगका क्षय होनेपर महाप्रलय में जिसमें वे विलीन हो जाते हैं, उस लोकप्रधान, संसारके स्वामी, भगवान् विष्णुके पाप और संसारभयको दूर करनेवाले हजार नामको मुझसे सुन ॥ १०-१२ ॥ यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः । ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये । १३ । जो प्र सर्वत्र महात करता ॐॐ f भूतक कारण उद्देश्य ४ भ स्वामी सम्पूर्ण आश्रय भावः ८ भूट भूतभ

पृष्ठ 13

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( ९ ) जो नाम गुणके कारण प्रवृत्त हुए हैं, उनमें से जो -१० ॥ जो प्रसिद्ध हैं और मन्त्रद्रष्टा मुनियोंद्वारा जो जहाँ - तहाँ सर्वत्र भगवत्कथाओं में गाये गये हैं, उस अचिन्त्यप्रभाव महात्मा के उन समस्त नामोंको पुरुषार्थ सिद्धि के लिये वर्णन ११ ॥ करता हूँ ॥ १३ ॥

ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।

१२ ॥

- परम भूत-जिससे होने पर वधान, भयको २२ ॥ भूतकृद् भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ।१४ । ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १ विश्वम्- समस्त जगत्के कारणरूप, २ विष्णुः- सर्वव्यापी, ३ वषट्कारः - जिनके उद्देश्यसे यज्ञमें वषट् क्रिया की जाती है, ऐसे यज्ञस्वरूप, ४ भूतभव्यभवत्प्रभुः - भूत, भविष्यत् और वर्तमानके स्वामी, ५ भूतकृत् - रजोगुणका आश्रय लेकर ब्रह्मारूपसे सम्पूर्ण भूतोंकी रचना करनेवाले, ६ भूतभृत् - सत्वगुणका आश्रय लेकर सम्पूर्ण भूतोंका पालन - पोषण करनेवाले, ७ भावः - नित्यस्वरूप होते हुए भी स्वतः उत्पन्न होनेवाले, नः । ८ भूतात्मा - सम्पूर्ण भूतों के आत्मा अर्थात् अन्तर्यामी, ९ -१३ । भूतभावनः- भूतों की उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाले ॥१४ ॥

पृष्ठ 14

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( १० ) पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः । स्वामी अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ १५ ॥ शरीर

वक्षःस्थ १० पूतात्मा - पवित्रात्मा, ११ परमात्मा - परमश्रेष्ठ ( क ) नित्य शुद्ध - बुद्ध - मुक्तस्वभाव, १२ मुक्तानां परमा गतिः-प्रकार मुक्त पुरुषकी सर्वश्रेष्ठ गतिस्वरूप, १३ अव्ययः - कभी इन दो विनाशको प्राप्त न होनेवाले, १४ पुरुषः - पुर अर्थात् शरीरमें शयन करनेवाले, १५ साक्षी - बिना किसी व्यवधानके सब सर्व कुछ देखनेवाले, १६ क्षेत्रज्ञः - क्षेत्र अर्थात् समस्त प्रकृतिरूप सम्भव शरीरको पूर्णतया जाननेवाले, १७ अक्षरः - कभी क्षीण न होनेवाले ॥ १५ ॥

और प्र योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः । संहार नारसिंहवपुः श्रीमान्केशवः पुरुषोत्तमः ॥१६ ॥ स्वरूप,

१८ योगः - मनसहित सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंके निरोधरूप कारण, योगसे पास होनेवाले, १ ९ योगविदां नेता - योगको लीन ह . जाननेवाले भक्तोंके योगक्षेमादिका निर्वाह करनेमें अग्रसर इच्छा स रहनेवाले, २० प्रधानपुरुषेश्वरः - प्रकृति और पुरुषके भोक्ता =

पृष्ठ 15

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( ११ ) स्वामी, २१ नारसिंहवपुः - मनुष्य और सिंह दोनोंके जैसा ॥१५ ॥ शरीर धारण करनेवाले नरसिंहरूप, २२ श्रीमान्-वक्षःस्थलमें सदा श्रीको धारण करनेवाले, २३ केशवः-( क ) ब्रह्मा, ( अ ) विष्णु और ( ईश ) महादेव - इस

तिः- प्रकार त्रिमूर्तिस्वरूप, २४ पुरुषोत्तमः - क्षर और अक्षर ' : -कभी इन दोनोंसे सर्वथा उत्तम ॥ १६ ॥

शरीरमेंब सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।

कुतिरूप सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ १७ ॥

वीण न २५ सर्वः - असत् और सत् - सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्थान, २६ शर्वः - सारी प्रजाका प्रलयकालमें संहार करनेवाले, २७ शिवः - तीनों गुणोंसे परे कल्याण-१६ ॥ स्वरूप, २८ स्थाणुः - स्थिर, २ ९ भूतादिः - भूतोंके आदि दोधरूप कारण, ३० निधिरव्ययः- प्रलयकालमें सब प्राणियोंके योगको लीन होनेके अविनाशी स्थानरूप, ३१ सम्भवः - अपनी अग्रसर इच्छासे भली प्रकार प्रकट होनेवाले, ३२ भावनः- समस्त लुरुषके भोक्ताओंके फलोंको उत्पन्न करनेवाले, ३३ भर्ता - सबका

पृष्ठ 16

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( १२ ) भरण करनेवाले, ३४ प्रभवः - उत्कृष्ट ( दिव्य ) जन्मवाले, ३५ प्रभुः - सबके स्वामी, ३६ ईश्वरः - उपाधिरहित ऐश्वर्यवाले ॥ १७ ॥

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।

अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥१८ ॥

३७ स्वयम्भूः स्वयं उत्पन्न होनेवाले, ३८ शम्भुः -भक्तोंके लिये सुख उत्पन्न करनेवाले, ३ ९ आदित्यः - द्वादश आदित्यों में विष्णुनामक आदित्य, ४० पुष्कराक्षः - कमलके समान नेत्रवाले, ४ ९ महास्वनः - वेदरूप अत्यन्त महान् घोषवाले, ४२ अनादिनिधनः - जन्म - मृत्युसे रहित, ४३ धाता - विश्वको धारण करनेवाले, ४४ विधाता - कर्म और उसके फर्लोकी रचना करनेवाले, ४५ धातुरुत्तमः-कार्यकारणरूप सम्पूर्ण प्रपञ्चको धारण करनेवाले एवं सर्वश्रेष्ठ ॥ १८ ॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।

विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ १ ९ ॥

४७६ कारण अमर जगत् ५२ वाले, अति अग्रा प्रभूत ५६: सबके करने = वाले, करनेव

पृष्ठ 17

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वाले, रहित नः । १८ || -भुः-दश मलके महान् ४३ और म : -एवं ९ ॥ ( १३ ) ४६ अप्रमेयः - प्रमाणादिसे जाननेमें न आ सकनेवाले, ४७ हृषीकेशः - इन्द्रियों के स्वामी, ४८ पद्मनाभः - जगत्के कारणरूप कमलको अपनी नाभि में स्थान देनेवाले, ४ ९ अमरप्रभुः - देवताओंके स्वामी, ५० विश्वकर्मा- सारे जगत् की रचना करनेवाले, ५१ मनुः - प्रजापति मनुरूप, ५२ त्वष्टा - संहार के समय सम्पूर्ण प्राणियोंको क्षीण करने-वाले, ५३ स्थविष्ठः - अत्यन्त स्थूल, ५४ स्थविरो ध्रुवः-अति प्राचीन एवं अत्यन्त स्थिर ॥ १ ९ ॥

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।

प्रभूतत्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ २० ॥

५५ अग्राह्यः - मनसे ग्रहण न किये जा सकनेवाले, ५६ शाश्वतः - सब कालमें स्थित रहनेवाले, ५७ कृष्णः-सबके चित्तको बलात्कार से अपनी ओर आकर्षित करनेवाले परमानन्दस्वरूप, ५८ लोहिताक्षः -लाल नेत्रों-वाले, ५ ९ प्रतर्दनः - प्रलयकाल में प्राणियोंका संहार करनेवाले, ६० प्रभूतः – ज्ञान, ऐश्वर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न,

पृष्ठ 18

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( १४ ) ६१ त्रिककुब्धाम - ऊपर - नीचे और मध्यभेदवाली तीनों दिशाओं के आश्रयरूप, ६२ पवित्रम् - सबको पवित्र करने-वाले, ६३ मङ्गलं परम्- परम मङ्गल || २० ||

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।

हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥२१ ॥

६४ ईशानः- सर्व भूतों के नियन्ता, ६५ प्राणदः - सबके प्राण संशोधन करनेवाले, ६६ प्राणः - सबको जीवित रखनेवाले प्राणस्वरूप, ६७ ज्येष्ठः - सबके कारण होनेसे सबसे बड़े, ६८ श्रेष्ठः - सबमें उत्कृष्ट होनेसे परम श्रेष्ठ, ६ ९ प्रजापतिः - ईश्वररूपसे सारी प्रजाओंके मालिक, ७० हिरण्यगर्भः - ब्रह्माण्डरूप हिरण्मय अण्डके भीतर ब्रह्मारूपसे व्याप्त होनेवाले, ७१ भूगर्भः - पृथ्वीको गर्भ में रखनेवाले, ७२ माधवः – लक्ष्मीके पति, ७३ मधुसूदनः-मधुनामक दैत्यको मारनेवाले ॥ २१ ॥

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।

अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥२२ ॥

शूर्ख ७७ पक्षीह कारण भीति थोड़ा पत्र- 5 देनेव आ सुरेश अहः दीन-८८ प्रजा

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तीनों करने-1 १ ॥ तबके वित नसे श्रेष्ठ, लिक, नीतर में

नः-।

२ ॥

( १५ ) ७४ ईश्वरः - सर्वशक्तिमान् ईश्वर, ७५ विक्रमी-शूरवीरता से युक्त, ७६ धन्वी - शार्ङ्गधनुष रखनेवाले, ७७ मेधावी - अतिशय बुद्धिमान्, ७८ विक्रमः - गरुड़ पक्षीद्वारा गमन करनेवाले, ७ ९ क्रमः -क्रम - विस्तारके कारण, ८० अनुत्तमः - सर्वोत्कृष्ट, ८१ दुराधर्षः - किसीसे भी तिरस्कृत न हो सकनेवाले, ८२ कृतज्ञः - अपने निमित्तसे थोड़ा - सा भी त्याग किये जानेपर उसे बहुत माननेवाले यानी पत्र - पुष्पादि थोड़ी - सी वस्तु समर्पण करनेवालों को भी मोक्ष दे देनेवाले, ८३ कृतिः - पुरुष प्रयत्नके आधाररूप, ८४ आत्मवान् - अपनी ही महिमामें स्थित ॥ २२ ॥

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।

अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥२३ ॥

८५ सुरेश: - देवताओंके स्वामी, ८६ शरणम्-दीन - दुखियोंके परम आश्रय, ८७ शर्म - परमानन्दस्वरूप, ८८ विश्वरेताः - विश्वके कारण, ८ ९ प्रजाभवः - सारी प्रजाको उत्पन्न करनेवाले, ९ ० अहः - प्रकाशरूप, ९ १

पृष्ठ 20

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( १६ ) संवत्सरः- कालस्वरूप से स्थित, ९ २ व्यालः- सर्प के समान ग्रहण करने में न आ सकनेवाले, ९ ३ प्रत्ययः - उत्तम मनाः बुद्धिसे जाननेमें आनेवाले, ९ ४ सर्वदर्शनः - सबके द्रष्टा ॥ २३ ॥

अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।

वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥२४ ॥

९ ५ अजः - जन्मरहित, ९ ६ सर्वेश्वरः- समस्त ईश्वरों-के भी ईश्वर, ९ ७ सिद्धः - नित्यसिद्ध, ९ ८ सिद्धि: - सबके फलरूप, ९९ सर्वादिः - सब भूतोंके आदि कारण, १०० अच्युतः - अपनी स्वरूप स्थितिसे कभी त्रिकालमें भी च्युत न होनेवाले, १०१ घृषाकपिः- धर्म और वराहरूप, १०२ अमेयात्मा - अप्रमेयस्वरूप, १०३ सर्वयोगविनिःसृतः -नाना प्रकारके शास्त्रोक्त साधनोंसे जानने में आनेवाले ॥२४ ॥

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मासम्मितः समः ।

अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥२५ ॥

समान वाले, सकनेव ११० किये ज प्रदान नेत्रोंवा वृषाक करनेवा रुद्रो अमृत १ देनेवाल बभ्रु: -