विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र — पृष्ठ 91–100

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100

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तीनों २६८ ता-I रूप, चा-मस्तं को ( ८७ ) यानी उनका फल देनेवाले, ९ ८२ यज्ञगुह्यम् - यज्ञों में 1. गुप्त ज्ञानस्वरूप और निष्काम यशस्वरूप, ९ ८३ अन्नम् -समस्त प्राणियों के अन्न यानी अन्नकी भाँति उनकी सब प्रकारसे तुष्टि- पुष्टि करनेवाले तथा ९ ८४ अन्नादः-समस्त अन्नोंके भोक्ता भी ॥ ११८ ॥

आत्मयोनिः स्वयं जातो वैखानः सामगायनः । देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः । ११ ९ । ९ ८५ आत्मयोनिः - जिनका कारण दूसरा कोई. नहीं - ऐसे स्वयं योनिस्वरूप, ९ ८६ स्वयं जातः - स्वयं अपने आप स्वेच्छापूर्वक प्रकट होनेवाले, ९ ८७ वैखानः-:: पातालवासी हिरण्याक्षका वध करनेके लिये पृथ्वीको खोदनेवाले, ९ ८८ सामगायनः - सामवेदका गान करने-८ ॥ वाले, ९ ८ ९ देवकीनन्दनः - देवकीपुत्र, ९९ ० स्रष्टा-ले समस्त लोकों के रचयिता, ९९ १ क्षितीशः- पृथ्वीपति, मस्त ९९ २ पापनाशनः - स्मरण, कीर्तन, पूजन और ध्यान -७ ९, आदि करनेसे रामस्त पापसमुदायका नाश करने-: नं - वाले ॥ ११ ९ ॥ धन वाले

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( ८८ )

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।

रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ १२० ॥

- ९९ ३ शङ्खभृत् - पाञ्चजन्य शङ्खको धारण करनेवाले, ९९ ४ नन्दकी - नन्दकनामक खड्ग धारण करनेवाले, ९९ ५ चक्री - संसार - चक्रको चलानेवाले, ९९ ६ शार्ङ्ग-धन्वा - शार्ङ्गधनुषधारी, ९९ ७ गदाधरः - कौमोदकी नामकी गदा धारण करनेवाले, ९९ ८ रथाङ्गपाणिः-भीष्मकी प्रतिज्ञा रखने के लिये सुदर्शन चक्रको हाथमें धारण करनेवाले, ९९९ अक्षोभ्यः- जो किसी प्रकार भी विचलित नहीं किये जा सके, ऐसे, १००० सर्व प्रहरणायुधः - ज्ञात और अज्ञात जितने भी युद्धादिमें काम आनेवाले हथियार हैं, उन सबको धारण करने-वाले ॥ १२० ॥

॥ सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ॥ यहाँ हजार नामोंकी समाप्ति दिखलानेके लिये अन्तिम नामको दुबारा लिखा गया है, मङ्गलवाची होनेसे ॐकारका स्मरण किया गया है, अन्तमें नमस्कार करके भगवान् की पूजा की गयी है । इती नाम दिव्य य नाश है औ उसक नहीं वेदा वैश्य करने निषद विजय सुख

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२० || निवाले, नेिवाले, शार्ङ्ग-मोदकी णिः--धारण भी -सर्व-दादिमें करने लिये करके ( ८ ९ ) इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः । नाम्नां सहस्रं दिव्या नामशेषेण प्रकीर्तितम् । १२१ । इस प्रकार यह कीर्तन करनेयोग्य महात्मा केशव के दिव्य एक हजार नामका पूर्णरूप से वर्णन कर दिया । १२१ । य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् । नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः १२२ जो मनुष्य इस विष्णुसहस्रनामका सदा श्रवण करता है और जो प्रतिदिन इसका कीर्तन या पाठ करता है, उसका इस लोकमें तथा परलोकमें कहीं भी कुछ अशुभ नहीं होता ॥ १२२ ॥

वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ।

वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥

इस विष्णुमहस्रनामका पाठ करनेसे अथवा कीर्तन करनेसे ब्राह्मण वेदान्तपारगामी हो जाता है यानी उप-निषदों के अर्थरूप परब्रह्मको पा लेता है । क्षत्रिय युद्धमें विजय पाता है, वैश्य व्यापार में धन पाता है और शूद्र सुख पाता है ॥ १२३ ॥

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( ९ ० ) उस धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् । है औ-कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात्प्रजाम् ॥ रोग धर्मकी इच्छावाला धर्मको पाता है, अर्थकी इच्छा-वाला अर्थ पाता है, भोगोंकी इच्छावाला भोग पाता है । भय और प्रजाकी इच्छावाला प्रजा पाता है ॥ १२४ ॥

भक्तिमान्यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः । हुअ सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ १२५ ॥ है जात॥

यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च । दुर्ग अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् १२६ स्तुव न भयं क्वचिदानोति वीर्य तेजश्च विन्दति । भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥१२७ ॥ पुरुष

जो भक्तिमान् पुरुष सदा प्रातःकालमें उठकर स्नान ही करके पवित्र हो मनमैं विष्णुका ध्यान करता हुआ इस वास वासुदेव सहस्रनामका भली प्रकार पाठ करता है, वह सर्वप महान् यश पाता है, जातिमें महत्त्व पाता है, अचल सम्पत्ति पाता है और अति उत्तम कल्याण पाता है तथा

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नात् ।

आम् ॥

इच्छा-है २५ || I १२६ २७ ॥ लान इस • वह अचल - तथा ( ९ १ ) उसको कहीं भय नहीं होता । वह वीर्य और तेजको पाता है तथा आरोग्यवान्, कान्तिमान्, चलवान्, रूपवान् और सर्वगुणसम्पन्न हो जाता है ॥ १२५–१२७ ॥ रोगार्तो मुच्यते रोगाद्वद्धो मुच्येत बन्धनात् । भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः । १२८ । रोगातुर पुरुष रोगसे छूट जाता है, बन्धनमें पड़ा हुआ पुरुष बन्धनसे छूट जाता है, भयभीत भयसे छूट जाता है और आपत्ति में पड़ा हुआ आपत्तिसे छूट जाता है ॥ १२८ ॥

दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।

स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ १२ ९ ॥

जो पुरुष भक्तिसम्पन्न होकर इस विष्णुसहस्रनामसे पुरुषोत्तम भगवान्की प्रतिदिन स्तुति करता है, वह शीघ्र ही समस्त संकटोंसे पार हो जाता है ॥ १२ ९ ॥ वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः । सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ।१३० ।

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( ९ २ ) जो मनुष्य वासुदेवके आश्रित और उनके परायण है, वह समस्त पापोंसे छूटकर विशुद्ध अन्तःकरणवाला आ हो सनातन परब्रह्मको पाता है ॥ १३० ॥ उन

न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते कचित् । द्यौ जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥१३१ ॥ वास

वासुदेवके भक्तोंका कहीं कभी भी अशुभ नहीं होता है तथा उनको जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिका भी भय दिश नहीं रहता है ॥ १३१ ॥ केव

' इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । सस युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः १३२ जग जो पुरुष श्रद्धापूर्वक भक्तिभाव से इस विष्णुसहस्र-नामका पाठ करता है, वह आत्मसुख, क्षमा, लक्ष्मी, यह धैर्य, स्मृति और कीर्तिको पाता है ॥ १३२ ॥ रहक

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः । इन्द्र भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥१३३ ॥ वास

पृष्ठ 97

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परायण णवाला -३१ ॥ हीं होता भी भय नः १३२ सहस्र-लक्ष्मी,

तिः ।

_३३ ॥

( ९ ९ ३ ३ ) ) पुरुषोत्तमके पुण्यात्मा भक्तोंको किसी दिन क्रोध नहीं आता, ईर्ष्या उत्पन्न नहीं होती, लोभ नहीं होता और उनकी बुद्धि कभी अशुद्ध नहीं होती ॥ १३३ ॥

द्यौः सचन्द्रार्क नक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः ।

वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥१३४ ॥

स्वर्ग, सूर्य, चन्द्रमा तथा नक्षत्रसहित आकाश, दस दिशाएँ, पृथ्वी और महासागर - – ये सब महात्मा वासुदेव-के वीर्यसे धारण किये गये हैं ॥ १३४ ॥

ससुरासुरगन्धर्व सयक्षोरगराक्षसम् ।

जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥१३५ ॥

देवता, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, सर्प और राक्षससहित यह स्थावर - जङ्गमरूप सम्पूर्ण जगत् श्रीकृष्णके अधीन रहकर यथायोग्य बरत रहे हैं ॥ १३५ ॥

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ।

वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥१३६ ॥

पृष्ठ 98

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( ९ ४ ) इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सत्त्व, तेज, बल, ( शरीर ) और क्षेत्रज्ञ ( आत्मा ) – ये सब रूप हैं, ऐसा वेद कहते हैं ॥ १३६ ॥

सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः - सब शास्त्रों में आचारको प्रथम माना धीरज, क्षेत्र श्रीवासुदेवके शा । The ॥१३७ ॥ एक

जाता है, त्रीं आचारसे ही धर्मकी उत्पत्ति होती है और धर्मके स्वामी भगवान् अच्युत हैं ॥ १३७ ॥

एक ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः । भूर्ता जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥१३८ ॥ त्रिलो

ऋषि, पितर, देवता, पञ्च महाभूत, धातुएँ और स्थावर - जङ्गमात्मक सम्पूर्ण जगत् – ये सब नारायणसे इमं र ही उत्पन्न हुए हैं ॥ १३८ ॥ पठेह

योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्याः शिल्पादि कर्म च । वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् १३ ९ भगवा पाठ

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ज, क्षेत्र सुदेवके २३७ ॥ ता है, स्वामी ३८ ॥ और यणसे च । १३ ९ ( ९ ५ ) योग, ज्ञान, सांख्य, विद्याएँ, शिल्प आदि कर्म, वेद, शास्त्र और विज्ञान - – ये सब विष्णुसे उत्पन्न हुए हैं ॥ १३ ९ ॥ एको विष्णुर्महद्भुतं पृथग्भूतान्यनेकशः

त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्यूयः॥

वे. समस्त विश्वके भोक्ता और अविनाशी विष्णु ही एक ऐसे हैं, जो अनेक रूपों में विभक्त होकर भिन्न - भिन्न भूतविशेषोंके अनेकों रूपोंको धारण कर रहे हैं तथा त्रिलोकीमें व्याप्त होकर सबको भोग रहे हैं ॥ १४० ॥

इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् । पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च । १४१ । जो पुरुष परम श्रेय और सुख पाना चाहता हो, वह भगवान् व्यासजीके कहे हुए इस विष्णुसहस्रनामस्तोत्रका पाठ करे ॥ १४१ ॥

पृष्ठ 100

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( ९ ६ ) विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभवाप्ययम् । भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् १४२ जो विश्वके ईश्वर जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करनेवाले जन्मरहित कमललोचन भगवान् विष्णु-का भजन करते हैं, वे कभी पराभव नहीं पाते हैं ॥ १४२ ॥

ॐ तत्सदिति श्रीमहाभारते शतसाहस्रयां संहितायां वैयासिक्यामानुशासनिके पर्वणि भीष्मयुधिष्ठिर-संवादे श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रम्