विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र — पृष्ठ 81–90

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, पृष्ठ 81 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जगत्-०३ ॥ ०४ । रको नहा-पका गंत नस्त को : -४ यु- ॥ ( ७७ ) धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः । अपराजितः सर्वसहो नियन्तानियमोऽयमः १०५ ८५७ धनुर्धरः - धनुषधारी श्रीराम, ८५८ धनुर्वेदः-धनुर्विद्याको जाननेवाले श्रीराम, ८५ ९ दण्डः दमन करनेवालोंकी दमनशक्ति, ८६० दमयिता - यम और राजा आदि के रूपमें दमन करनेवाले, ८६१ दमः - दण्डका कार्य यानी जिनको दण्ड दिया जाता है, उनका सुधार, ८६२ अपराजितः - शत्रुओं द्वारा पराजित न होनेवाले, ८६३ सर्वसहः - सब कुछ सहन करनेकी सामर्थ्यसे युक्त, अतिशय तितिक्षु, ८६४ नियन्ता - सबको अपने - अपने कर्तव्यमें नियुक्त करनेवाले, ८६५ अनियमः - नियमोंसे न बँधे हुए जिनका कोई भी नियन्त्रण करनेवाला नहीं ऐसे परमस्वतन्त्र, ८६६ अयमः - जिनका कोई शासक नहीं अथवा मृत्युरहित ॥ १०५ ॥

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः । अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियक्कृत्प्रीतिवर्धनः १०६

पृष्ठ 82

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, पृष्ठ 82 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( ७८ ) ८६७ सस्वचान् - वल, वीर्य, सामर्थ्य आदि समस्त सत्त्वोंसे सम्पन्न, ८६८ सात्त्विकः - सत्त्वगुणप्रधान विग्रह, ८६ ९ सत्यः - सत्यभाषणस्वरूप, ८७० सत्यधर्म-परायणः - यथार्थ भाषण और धर्मके परम आधार, ८७१ अभिप्रायः - प्रेमीजन जिनको चाहते हैं- ऐसे परम इष्ट, ८७२ प्रियार्हः - अत्यन्त प्रियवस्तु समर्पण करनेके लिये योग्य पात्र, ८७३ अर्हः - सबके परम पूज्य, ८७४ प्रियकृत्-भजनेवालोंका प्रिय करनेवाले, ८७५ प्रीतिवर्धनः- अपने प्रेमियोंके प्रेमको बढ़ानेवाले ॥ १०६ ॥

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।

रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ १०७ ॥

१. ८७६ - विहायसगतिः - आकाश में गमन करनेवाले, ८७७ ज्योतिः - स्वयंप्रकाशस्वरूप, ८७८ सुरुचिः-सुन्दर रुचि और कान्तिबाले, ८७ ९ हुतभुक् - यज्ञमें हवन की हुई समस्त हविको अग्निरूपसे भक्षण करनेवाले, ८८० विभुः - सर्वव्यापी, ८८१ रविः - समस्त रसोंका शोषण करनेवाले सूर्य, ८८२ विरोचनः - विविध प्रकारसे प्र वा क अ अ हु देव प्रक रूप सा जन्म जन्म के क्षम आध

पृष्ठ 83

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, पृष्ठ 83 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नस्त नह र्म-७१ १२ नय 11 ( ७ ९ ) प्रकाश फैलानेवाले, ८८३ सूर्यः -शोभाको प्रकट करने-वाले, ८८४ सविता - समस्त जगत्‌को प्रसव यानी उत्पन्न करनेवाले, ८८५ रविलोचनः - सूर्यरूप नेत्रोंवाले ॥ १०७ ॥

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैफनोऽग्रजः । अनिर्विण्णः सदामप लोकाधिष्ठानमद्भुतः १०८ ' ८८६ अनन्तः - सब प्रकार से अन्तरहित, ८८७ हुतभुक - यज्ञमें हवन की हुई सामग्रीको उन - उन... देवताओंके रूपमें भक्षण करनेवाले, ८८ ९ भोका-प्रकृतिको भोगनेवाले, ८८ ९ सुखदः - भक्तोंको दर्शन-रूप परम सुख देनेवाले, ८ ९ ० नैकजः - धर्मरक्षा, साघुरक्षा आदि परम विशुद्ध हेतुओंसे स्वेच्छापूर्वक अनेक जन्म धारण करनेवाले, ८ ९ १ अग्रजः - सबसे पहले जन्मनेवाले आदि पुरुष, ८ ९ २ अनिर्विण्णः - पूर्णकाम होने-के कारण विरक्तिसे रहित, ८ ९ ३ सदामर्षी - सत्पुरुषोंपर क्षमा करनेवाले, ८ ९ ४ लोकाधिष्ठानम् - समस्त लोकोंके आधार, ८ ९ ५ अद्भुतः- अत्यन्त आश्चर्यमय ॥ १०८ ॥

पृष्ठ 84

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, पृष्ठ 84 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( ८० )

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरप्ययः ।

स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥

८ ९ ६ सनात् - अनन्तकालस्वरूप, ८ ९ ७ सनातन-तमः - सबके कारण होनेसे ब्रह्मादि पुरुषोंकी अपेक्षा भी श परम पुराणपुरुष, ८ ९ ८ कपिलः - महर्षि कपिल, ८ ९९ कपिः - सूर्यदेव, ९ ०० अप्ययः - सम्पूर्ण जगत् के लयस्थान, ९ ०१ स्वस्तिदः - परमानन्दरूप मङ्गल देनेवाले, ९ ०२ स्वस्तिकृत् - आश्रितजनोंका कल्याण करनेवाले, ९ ०३ स्वस्ति: - कल्याणस्वरूप, ९ ०४ स्वस्तिभुक् - भक्तों के परम कल्याणकी रक्षा करनेवाले, ९ ०५ स्वस्तिदक्षिणः - कल्याण करने में समर्थ और शीघ्र कल्याण करनेवाले ॥ १० ९ ॥ अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः । शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ११० ९ ०६ अरौद्रः – सब प्रकारके रुद्र ( क्रूर ) भावोंसे रहित शान्तमूर्ति, ९ ०७ कुण्डली - सूर्य के समान प्रकाशमान मकराकृति कुण्डलोंको धारण करनेवाले, ९ ०८ चक्री-अ वि ९ ho हो सम कर संह

पृष्ठ 85

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, पृष्ठ 85 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

क्षणः ॥ नातन-तभी ८ ९९ स्थान, ९ ०२ ९ ०३ परम ल्याण ॥ १० चों से मान ती-( ८१ ) सुदर्शनचक्रको धारण करनेवाले, ९ ० ९ विक्रमी - सबसे विलक्षण पराक्रमशील, ९ १० ऊर्जितशासनः - जिनका श्रुति स्मृतिरूप शासन अत्यन्त श्रेष्ठ है - ऐसे अति श्रेष्ठ शासन करनेवाले, ९ ११ शब्दातिगः - शब्दकी जहाँ पहुँच नहीं, ऐसे वाणीके अविषय, ९ १२ शब्द सहः- समस्त वेद-शास्त्र जिनकी महिमाका बखान करते हैं, ऐसे, ९ १३ शिशिरः- त्रितापपीड़ितों को शान्ति देनेवाले शीतलमूर्ति, ९ १४ शर्वरीकरः - ज्ञानियोंकी रात्रि संसार और अज्ञानियों-की रात्रि ज्ञान- इन दोनोंको उत्पन्न करनेवाले ॥११० ॥

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।

विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ १११ ॥

९ १५ अक्रूरः - सब प्रकार के क्रूरभावोंसे रहित, ९ १६ पेशलः - मन, वाणी और कर्म - सभी दृष्टियोंसे सुन्दर होनेके कारण परम सुन्दर, ९ १७ दक्षः - सब प्रकारसे समृद्ध, परमशक्तिशाली और क्षणमात्र में बड़े - से - बड़ा कार्य कर देनेवाले महान् कार्यकुशल, ९ १८ दक्षिणः-संहारकारी, ९ १ ९ क्षमिणां वरः- क्षमा करनेवालोंमें

पृष्ठ 86

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, पृष्ठ 86 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( ८२ ) सर्वश्रेष्ठ ९ २० विद्वत्तमः - विद्वानों में सर्वश्रेष्ठ परम विद्वान्, ९ २१ वीतभयः - सब प्रकार के भय से रहित, ९ २२ पुण्यश्रवणकीर्तनः - जिनके नाम, गुण, महिमा और स्वरूपका श्रवण और कीर्तन परंम पुण्य यानी परमपावन हैं ऐसे ॥ १११ ॥

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःखप्ननाशनः । वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः । ११२ । ९ २३ उत्तारणः - संसार - सागर से पार करनेवाले, ९ २४ दुष्कृतिहा- पापों का और पापियों का नाश करनेवाले, ९ २५ पुण्यः - स्मरण आदि करनेवाले समस्त पुरुषों को पवित्र कर देनेवाले, ९ २६ दुःस्वप्ननाशनः - ध्यान, स्मरण, कीर्तन और पूजन करनेसे बुरे स्वप्नोंका और संसाररूप दुःस्वप्नका नाश करनेवाले, ९ २७ वीरहा - शरणागत की विविध गतियोंका यानी संसार - चक्रका नाश करनेवाले, ९ २८ रक्षणः - सब प्रकारसे रक्षा करनेवाले, ९ २ ९ सन्तः -विद्या और विनयका प्रचार करनेके लिये संतोंके रूपमें प्रकट होनेवाले १३० जीवन: - समस्त प्रजाको प्राणरूपसे जीव व्याप्त अन चतुर अनन ' युक्त, वाले, चार गभीर अधिक प्रकारक योग्य समस्त | अनाव जननो

पृष्ठ 87

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, पृष्ठ 87 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

परम दहित, हिमा यानी १२ । वाले, ( ८३ ) जीवित रखनेवाले, ९ ३१ पर्यवस्थितः समस्त विश्वको व्याप्त करके स्थित रहनेवाले ॥ ११२ ॥

अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः

चतुरस्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥

९ ३२ अनन्तरूपः - अनन्त- अमितरूपवाले, ९ ३३ अनन्तश्रीः - अनन्तश्री यानी अपरिमित पराशक्तियों से वाले, " युक्तः ९ ३४ जितमन्युः - सब प्रकारसे क्रोध को जीत लेने-नको वाले, ९ ३५ भयापहः - भक्तभयहारी, ९ ३६ चतुरस्रः-रण, चार वेदरूप कोणवाले मङ्गलमूर्ति और न्यायशील, ९ ३७ गभीरात्मा - गम्भीर मनवाले, ९ ३८ विदिशः-रूप अधिकारियोंको उनके कर्मानुसार विभागपूर्वक नाना कीाले, प्रकारके फल देनेवाले, ९ ३ ९ व्यादिशः- सबको यथा-योग्य विविध आज्ञा देनेवाले, ९ ४० दिशः- वेदरूपसे 7 नः- : -पमें X समस्त कर्मों का फल बतलानेवाले ॥ ११३ ॥

पसे अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।

जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥११४ ॥

पृष्ठ 88

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, पृष्ठ 88 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( ८४ ) ९ ४१ अनादिः - जिसका आदि कोई न हो ऐसे सबके कारणस्वरूप, ९ ४२ भूर्भुवः - पृथ्वी के भी आधार, ९ ४३ लक्ष्मी: - समस्त शोभायमान वस्तुओंकी शोभा, ९ ४४ सुवीरः- आश्रित जनोंके अन्तःकरणमें सुन्दर कल्याण-मयी विविध स्फुरणा करनेवाले, ९ ४५ रुचिराङ्गदः-परम रुचिकर कल्याणमय बाजूबंदोंको धारण करनेवाले, ९ ४६ जननः - प्राणीमात्रको उत्पन्न करनेवाले, ९ ४७ जनजन्मादिः - जन्म लेनेवालोंके जन्म के मूल कारण, ९ ४८ भीमः - सबको भय देनेवाले, ९ ४ ९ भीमपराक्रमः-अतिशय भय उत्पन्न करनेवाले, पराक्रमसे युक्त || ११४ || आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः । सब माग प्रा ९ ५ व्य = प्रम तव स्वर प्राण प्राण रखन ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः । ११५ । तत्त्व ९ ५० आधारनिलयः - आधारस्वरूप पृथ्वी आदि एका समस्त भूतोंके स्थान, ९ ५१ अघाता- जिसका कोई भी जन्म बनानेवाला न हो ऐसे स्वयंस्थित, ९ ५२ पुष्पहासः- अती पुष्पकी भाँति विकसित हास्यवाले, ९ ५३ प्रजागरः-. भलीप्रकार जाग्रत् रहनेवाले नित्यप्रबुद्ध, ९ ५४ ऊर्ध्वगः- यज्ञो

पृष्ठ 89

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, पृष्ठ 89 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

हो ऐसे आधार , ९ ४४ ल्याण-इन्दुः-निवाले, ९ ४७ ९ ४८ कमः-८१४ ॥ ११५ । आदि ई भी स: --र्वग: -( ८५ ) सबसे ऊपर रहनेवाले, ९ ५५ सत्पथाचारः - सत्पुरुषोंके मार्गका आचरण करनेवाले मर्यादापुरुषोत्तम, ९ ५६ प्राणदः - परीक्षित् आदि मरे हुओंको भो जीवन देनेवाले, ९ ५७ प्रणवः- ॐकार स्वरूप, ९ ५८ पणः - यथायोग्य व्यवहार करनेवाले ॥ ११५ ॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः । तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः । ११६ । ९ ५ ९ प्रमाणम् - स्वतःसिद्ध होनेसे स्वयं प्रमाण-स्वरूप, ९ ६० प्राणनिलयः - प्राणोंके आधारभूत, ९ ६१ प्राणभृत् - समस्त प्राणका पोषण करनेवाले, ९ ६२ प्राणजीवनः - प्राणवायु के सञ्चारसे प्राणियोंको जीवित रखनेवाले, ९ ६३ तंत्त्वम् - यथार्थ तत्त्ररूप, ९ ६४ तत्त्ववित् - यथार्थं तत्त्वको पूर्णतया जाननेवाले, ९ ६५ एकात्मा - अद्वितीयस्वरूप, ९ ६६ जन्ममृत्युजरातिगः-जन्म, मृत्यु और बुढ़ापा आदि शरीरके धर्मोसे सर्वा अतीत ॥ ११६ ॥

भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।

यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥११७ ॥

पृष्ठ 90

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, पृष्ठ 90 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( ८६ ) ९ ६७ भूर्भुवःस्वस्तरुः - भूः भुवः स्वःरूप तीनों लोकोंको व्याप्त करनेवाले और संसारवृक्षस्वरूप, ९ ६८ तारः - संसार - सागरसे पार उतारनेवाले, ९ ६ ९ सविता-सबको उत्पन्न करनेवाले पितामह, ९ ७० प्रपितामहः-पितामह ब्रह्माके भी पिता, ९ ७१ यशः- यज्ञस्वरूप, ९ ७२ यज्ञपतिः - समस्त यज्ञोंके अधिष्ठाता, ९ ७३ यज्वा -यजमानरूपसे यज्ञ करनेवाले, ९ ७४ यज्ञाङ्गः - समस्तं यज्ञरूप अङ्गोंवाले, ९ ७५ यज्ञवाहनः - यज्ञको चलानेवाले ॥११७ ॥

यान गुप्त समस प्रका समस आत्य देवक नहीं-अपने यज्ञभृद्यज्ञकुद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः । m पाता यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ ११८ ॥.

९ ७६ यज्ञभृत् - यज्ञका धारण - पोषण करनेवाले, ९ ७७ यशकृत् - यज्ञोंके रचयिता, ९ ७८ यज्ञी - समस्त यज्ञ जिसमें समाप्त होते हैं— ऐसे यज्ञशेषी, ९ ७ ९, यज्ञभुक् - समस्त यज्ञोंके मोक्ता, ९ ८० यज्ञसाधनः-ब्रह्मयज्ञ, जपयज्ञ आदि बहुत - से यश जिनकी प्राप्तिके साधन हैं, ऐसे, ९ ८१ यज्ञान्तकृत् - यर्शोका अन्त करनेवाले खोदन वाले, समस्त ९९ २ आदि वाले ।