Mahabharata Vol 1 Page 600-900 Webpage 10

।। श्रीहरिः ।।

श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत

महाभारत (प्रथम खण्ड)

MAHABHARATA

[आदिपर्व और सभापर्व]

(सचित्र, सरल हिंदी-अनुवाद)

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वं मम देवदेव ।।

पञ्चनवतितमोऽध्यायः

दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन

जनमेजय उवाच

श्रुतस्त्वत्तो मया ब्रह्मन् पूर्वेषां सम्भवो महान् ।

उदाराश्चापि वंशेऽस्मिन् राजानो मे परिश्रुताः ।। १ ।।

जनमेजय बोले-ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे पूर्ववर्ती राजाओंकी उत्पत्तिका महान्वृत्तान्त सुना। इस पूरुवंशमें उत्पन्न हुए उदार राजाओंके नाम भी मैंने भलीभाँति सुनलिये ।। १ ।।

किंतु लघ्वर्थसंयुक्तं प्रियाख्यानं न मामति ।

प्रीणात्यतो भवान् भूयो विस्तरेण ब्रवीतु मे ।। २ ।।

एतामेव कथां दिव्यामाप्रजापतितो मनोः ।

तेषामाजननं पुण्यं कस्य न प्रीतिमावहेत् ।। ३ ।।

परंतु संक्षेपसे कहा हुआ यह प्रिय आख्यान सुनकर मुझे पूर्णतः तृप्ति नहीं हो रही है।अतः आप पुनः विस्तारपूर्वक मुझसे इसी दिव्य कथाका वर्णन कीजिये। दक्ष प्रजापति औरमनुसे लेकर उन सब राजाओंका पवित्र जन्म-प्रसंग किसको प्रसन्न नहीं करेगा? ।। २-३ ।।

सद्धर्मगुणमाहात्म्यैरभिर्वर्धितमुत्तमम् ।

विष्टभ्य लोकांस्त्रीनेषां यशः स्फीतमवस्थितम् ।। ४ ।।

उत्तम धर्म और गुणोंके माहात्म्यसे अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त हुआ इन राजाओंका श्रेष्ठऔर उज्ज्वल यश तीनों लोकोंमें व्याप्त हो रहा है ।। ४ ।।

गुणप्रभाववीर्यौजःसत्त्वोत्साहवतामहम् ।

न तृप्यामि कथां शृण्वन्नमृतास्वादसम्मिताम् ।। ५ ।।

ये सभी नरेश उत्तम गुण, प्रभाव, बल-पराक्रम, ओज, सत्त्व ( धैर्य ) और उत्साहसेसम्पन्न थे। इनकी कथा अमृतके समान मधुरहै, उसे सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं हो रहीहै ।। ५ ।।

वैशम्पायन उवाच

शृणु राजन् पुरा सम्यङ्मया द्वैपायनाच्छरुतम् ।

प्रोच्यमानमिदं कृत्स्नं स्ववंशजननं शुभम् ।। ६ ।।

वैशम्पायनजीने कहा-राजन्! पूर्वकालमें मैंने महर्षि कृष्णद्वैपायनके मुखसेजिसका भलीभाँति श्रवण किया था, वह सम्पूर्ण प्रसंग तुम्हें सुनाता हूँ। अपने वंशकीउत्पत्तिका वह शुभ वृत्तान्त सुनो ।। ६ ।।

दक्षाददितिरदितेर्विवस्वान् विवस्वतो मनुर्मनो-रिला इलायाः पुरूरवाः ।

पुरूरवसआयुरायुषो नहुषो नहुषाद् ययातिः; ययातेद्द्े भार्ये बभूवतुः ।। ७ ॥

उशनसो दुहिता देवयानी; वृषपर्वणश्च दुहिता शर्मिष्ठा नाम ।। ८।।

दक्षसे अदिति, अदितिसे विवस्वान् (सूर्य), विवस्वान्से मनु, मनुसे इला, इलासेपुरूरवा, पुरूरवासे आयु, आयुसे नहुष और नहुषसे ययातिका जन्म हुआ। ययातिकी दोपत्नियाँ थीं पहली शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा दूसरी वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा ।। ८ ।।

अत्रानुवंशश्लोको भवति-यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।

दुहां चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥ ९॥

यहाँ उनके वंशका परिचय देनेवाला यह श्लोक कहा जाता है-देवयानीने यदु और तुर्वसु नामवाले दो पुत्रोंको जन्म दिया और वृषपर्वाकी पुत्रीशर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु तथा पूरु-ये तीन पुत्र उत्पन्न किये ।। ९ ।।

तत्र यदोर्यादवाः; पूरोः पौरवाः ।। १० ।।

इनमें यदुसे यादव और पूरुसे पौरव हुए ।। १० ।।

पूरोस्तु भार्या कौसल्या नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे जनमेजयो नाम;

यस्त्रीनश्वमेधानाजहार, विश्वजिता चेष्ट्वा वनं विवेश ।। ११ ।।

पूरुकी पत्नीका नाम कौसल्या था (उसीको पौष्टी भी कहते हैं)। उसके गर्भसे पूरुकेजनमेजय नामक पुत्र हुआ (इसीका दूसरा नाम प्रवीर है); जिसने तीन अश्वमेध यज्ञोंकाअनुष्ठान किया था और विश्वजित् यज्ञ करके वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया था।। ११ ।।

जनमेजयः खल्वनन्तां नामोपयेमे माधवीम् ।

तस्यामस्य जज्ञे प्राचिन्वान्; यःप्राचीं दिशं जिगाय यावत् सूर्योदयात्, ततस्तस्य प्राचिन्वत्त्वम् ।। १२ ।।

जनमेजयने मधुवंशकी कन्या अनन्ताके साथ विवाह किया था । उसके गर्भसे उनकेप्राचिन्वान् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसने उदयाचलसे लेकर सारी प्राची दिशाको एक हीदिनमें जीत लिया था; इसीलिये उसका नाम प्राचिन्वान् हुआ ।। १२ ।।

प्राचिन्वान् खल्वश्मकीमुपयेमे यादवीम् ।

तस्यामस्य जज्ञे संयातिः ।। १३ ।।

प्राचिन्वान्ने यदुकुलकी कन्या अश्मकीको अपनी पत्नी बनाया। उसके गर्भसे उन्हेंसंयाति नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।। १३ ।।

संयातिः खलु दृषद्वतो दुहितरं वराङ्गीं नामोपयेमे ।

तस्यामस्य जज्ञे अहंयातिः ।।१४ ।।

संयातिने दृषद्वान्की पुत्री वरांगीसे विवाह किया। उसके गर्भसे उन्हें अहंयाति नामकपुत्र हुआ ।। १४ ।।

अहंयातिः खलु कृतवीर्यदुहितरमुपयेमे भानुमरतीं नाम ।

तस्यामस्य जज्ञेसार्वभौमः ।। १५ ।।

अहंयातिने कृतवीर्यकुमारी भानुमतीको अपनी पत्नी बनाया। उसके गर्भसे अहंयातिकेसार्वभौम नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ।। १५ ।।

सार्वभौमः खलु जित्वा जहार कैकेयीं सुनन्दां नाम ।

तामुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञेजयत्सेनो नाम ।। १६ ।।

सार्वभौमने युद्धमें जीतकर केकयकुमारी सुनन्दाका अपहरण किया और उसीकोअपनी पत्नी बनाया। उससे उनको जयत्सेन नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।। १६ ।।

जयत्सेनो खलु वैदर्भीमुपयेमे सुश्रवां नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे अवाचीनः ।। १७ ।।

जयत्सेनने विदर्भराजकुमारी सुश्रवासे विवाह किया। उसके गर्भसे उनके अवाचीननामक पुत्र हुआ ।। १७ ।।

अवाचीनोऽपि वैदर्भीमपरामेवोपयेमे मर्यादां नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे अरिहः ।।१८ ।।

अवाचीनने भी विदर्भराजकुमारी मर्यादाके साथ विवाह किया, जो आगे बतायीजानेवाली देवातिथिकी पत्नीसे भिन्न थी। उसके गर्भसे उन्हें ‘अरिह’ नामक पुत्रहुआ ।। १८ ।।

अरिहः खल्वाङ्गीमुपयेमे ।

तस्यामस्य जज्ञे महाभौमः । १९ ।।

अरिहने अंगदेशकी राजकुमारीसे विवाह किया और उसके गर्भसे उन्हें महाभौम नामकपुत्र प्राप्त हुआ ।। १९ ।।

महाभौमः खलु प्रासेनजितीमुपयेमे सुयज्ञा नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे अयुतनायी;यः पुरुषमेधानामयुतमानयत्, तेनास्यायुतनायित्वम् । २० ।।

महाभौमने प्रसेनजित्की पुत्री सुयज्ञासे विवाह किया। उसके गर्भसे उन्हें अयुतनायीनामक पुत्र प्राप्त हुआ; जिसने दस हजार पुरुषमेध ‘यज्ञ’ किये। अयुत यज्ञोंका आनयन(अनुष्ठान) करनेके कारण ही उनका नाम अयुतनायी हुआ ।। २० ।।

अयुतनायी खलु पृथुश्रवसो दुहितरमुपयेमे कामां नाम ।

तस्यामस्य जज्ञेअक्रोधनः ।। २१ ।।

अयुतनायीने पृथुश्रवाकी पुत्री कामासे विवाह किया, जिसके गर्भसे अक्रोधनका जन्महुआ ।। २१ ।।

स खलु कालिङ्गीं करम्भां नामोपयेमे ।

तस्यामस्य जज्ञे देवातिथिः ।। २२ ।।

अक्रोधनने कलिंगदेशकी राजकुमारी करम्भासे विवाह किया। जिसके गर्भसे उनकेदेवातिथि नामक पुत्रका जन्म हुआ ।। २२ ।।

देवातिथिः खलु वैदेहीमुपयेमे मर्यादां नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे अरिहो नाम ।। २३।।

देवातिथिने विदेहराजकुमारी मर्यादासे विवाह किया, जिसके गर्भसे अरिह नामक पुत्रउत्पन्न हुआ ।। २३ ।।

अरिहः खल्वाङ्गेयीमुपयेमे सुदेवां नाम ।

तस्यां पुत्रमजीजनदृक्षम् ।। २४ ।

अरिहने अंगराजकुमारी सुदेवाके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे ऋक्ष नामकपुत्रको जन्म दिया ।। २४ ।।

ऋक्षः खलु तक्षकदुहितरमुपयेमे ज्वालां नाम ।

तस्यां पुत्रं मतिनारंनामोत्पादयामास ।। २५ ।।

ऋक्षने तक्षककी पुत्री ज्वालाके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे मतिनार नामकपुत्रको उत्पन्न किया ।। २५ ।।

मतिनारः खलु सरस्वत्यां गुणसमन्वितं द्वादशवार्षिकं सत्रमाहरत् ।

समाप्ते चसत्रे सरस्वत्य-भिगम्य तं भर्तारं वरयामास ।

तस्यां पुत्रमजीजनत् तंसुं नाम ।। २६ ।।

मतिनारने सरस्वतीके तटपर उत्तम गुणोंसे युक्त द्वादशवार्षिक यज्ञका अनुष्ठान किया।उसके समाप्त होनेपर सरस्वतीने उनके पास आकर उन्हें पतिरूपमें वरण किया। मतिनारनेउसके गर्भसे तंसु नामक पुत्र उत्पन्न किया ।। २६ ।।

अत्रानुवंशश्लोको भवति-

तंसुं सरस्वती पुत्रं मतिनारादजीजनत् ।

ईलिनं जनयामास कालिंग्यां तंसुरात्मजम् ।। २७ ।।

यहाँ वंशपरम्पराका सूचक श्लोक इस प्रकार है- सरस्वतीने मतिनारसे तंसु नामक पुत्र उत्पन्न किया और तंसुने कलिंगराजकुमारीकेगर्भसे ईलिन नामक पुत्रको जन्म दिया ।। २७ ।।

ईलिनस्तु रथन्तर्या दुष्यन्ताद्यान् पञ्च पुत्रानजीजनत् ।। २८ ।।

ईलिनने रथन्तरीके गर्भसे दुष्यन्त आदि पाँच पुत्र उत्पन्न किये ।। २८ ।।

दुष्यन्तः खलु विश्वामित्रदुहितरं शकुन्तलां नामोपयेमे ।

तस्यामस्य जज्ञे भरतः ॥२९ ।।

दुष्यन्तने विश्वामित्रकी पुत्री शकुन्तलाके साथ विवाह किया; जिसके गर्भसे उनके पुत्रभरतका जन्म हुआ ।। २९ ।।

अत्रानुवंशश्लोकौ भवतः-

भस्त्रा माता पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ।

भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम् ।। ३० ।।

यहाँ वंशपरम्पराके सूचक दो श्लोक हैं-

‘माता तो भाथी (धौंकनी)-के समान है। वास्तवमें पुत्र पिताका ही होता है; जिससेउसका जन्म होता है, वही उस बालकके रूपमें प्रकट होता है। दुष्यन्त! तुमभरण-पोषण करो; शकुन्तलाका अपमान न करो ।। ३० ।।

अपने पुत्रकारेतोधाः पुत्र उन्नयति नरदेव यमक्षयात्।

त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ।। ३१ ।।

‘गर्भाधान करनेवाला पिता ही पुत्ररूपमें उत्पन्न होता है। नरदेव! पुत्र यमलोकसेपिताका उद्धार कर देता है। तुम्हीं इस गर्भके आधान करनेवाले हो। शकुन्तलाका कथनसत्य है’ ।। ३१ ।।

ततोऽस्य भरतत्वम् ।

भरतः खलु काशेयीमुपयेमे सार्वसेनीं सुनन्दां नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे भुमन्युः ।। ३२ ।।

आकाशवाणीने भरण-पोषणके लिये कहा था, इसलिये उस बालकका नाम भरतहुआ। भरतने राजा सर्वसेनकी पुत्री सुनन्दासे विवाह किया। वह काशीकी राजकुमारी थी।उसके गर्भसे भरतके भुमन्यु नामक पुत्र हुआ ।। ३२ ।।

भुमन्युः खलु दाशाहींमुपयेमे विजयां नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे सुहोत्रः ।॥ ३३ ।।

भुमन्युने दशार्हकन्या विजयासे विवाह किया; जिसके गर्भसे सुहोत्रका जन्महुआ ।। ३३ ।।

सुहोत्रः खल्विक्ष्वाकुकन्यामुपयेमे सुवर्णां नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे हस्ती; य इदंहास्तिनपुरं स्थापयामास ।

एतदस्य हास्तिनपुरत्वम् ।। ३४ ।।

सुहोत्रने इक्ष्वाकुकुलकी कन्या सुवर्णासे विवाह किया। उसके गर्भसे उन्हें हस्ती नामकपुत्र हुआ; जिसने यह हस्तिनापुर नामक नगर बसाया था। हस्तीके बसानेसे ही यह नगर’हास्तिनपुर’ कहलाया ।। ३४ ।।

हस्ती खलु त्रैगतर्तीमुपयेमे यशोधरां नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे विकुण्ठनो नाम ।। ३५

हस्तीने त्रिगर्तराजकी पुत्री यशोधराके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे विकुण्ठननामक पुत्र उत्पन्न हुआ ।। ३५ ।।

विकुण्ठनः खलु दाशाहींमुपयेमे सुदेवां नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे अजमीढो नाम ।।३६ ।।

विकुण्ठनने दशार्हकुलकी कन्या सुदेवासे विवाह किया और उसके गर्भसे उन्हेंअजमीढ नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।। ३६ ।।

अजमीढस्य चतुर्विंशं पुत्रशतं बभूव कैकेय्यां गान्धार्यां विशालायामृक्षायां चेति ।

पृथक् पृथक् वंशधरा नृपतयः ।

तत्र वंशकरः संवरणः ।। ३७ ।।

अजमीढके कैकेयी, गान्धारी, विशाला तथा ऋक्षासे एक सौ चौबीस पुत्र हुए।पृथक्-पृथक् वंशप्रवर्तक राजा हुए । इनमें राजा संवरण कुरुवंशके प्रवर्तक हुए ।। ३७ ।।

संवरणः खलु वैवस्वतीं तपतीं नामोपयेमे ।

तस्यामस्य जज्ञे कुरुः ।। ३८ ।।

संवरणने सूर्यकन्या तपतीसे विवाह किया; जिसके गर्भसे कुरुका जन्म हुआ ३८ ।।

कुरुः खलु दाशाह्हीमुपयेमे शुभाङ्गीं नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे विदूरः ।। ३९ ।।

वे सबकुरुने दशार्हकुलकी कन्या शुभांगीसे विवाह किया। उसके गर्भसे विदूर नामक पुत्रहुआ ।। ३९ ।।

विदूरस्तु माधवीमुपयेमे सम्प्रियां नाम ।

तस्या-मस्य जज्ञे अनश्वा नाम ।। ४० ।।

विदूरने मधुवंशकी कन्या सम्प्रियासे विवाह किया; जिसके गर्भसे अनश्वा नामक पुत्रप्राप्त हुआ ।। ४० ।।

अनश्वा खलु मागधीमुपयेमे अमृतां नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे परिक्षित् ।। ४१ ।।

अनश्वाने मगधराजकुमारी अमृताको अपनी पत्नी बनाया। उसके गर्भसे परिक्षित्नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ।। ४१ ।।

परिक्षित् खलु बाहुदामुपयेमे सुयशां नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे भीमसेनः ।। ४२ ।।

परिक्षित्ने बाहुदराजकी पुत्री सुयशाके साथ विवाह किया; जिसके गर्भसे भीमसेननामक पुत्र हुआ ।। ४२ ।।

भीमसेनः खलु कैकेयीमुपयेमे कुमारीं नाम ।

तस्यामस्य जज्ञे प्रतिश्रवा नाम ।।४३ ।।

भीमसेनने केकयदेशकी राजकुमारी कुमारीको अपनी पत्नी बनाया; जिसके गर्भसेप्रतिश्रवाका जन्म हुआ ।। ४३ ।।

प्रतिश्रवसः प्रतीपः खलु । शैब्यामुपयेमे सुनन्दां नाम ।

तस्यां पुत्रानुत्पादयामासदेवापिं शान्तनुं बाह्लीकं चेति ।। ४४ ।।

प्रतिश्रवासे प्रतीप उत्पन्न हुआ। उसने शिबि-देशकी राजकन्या सुनन्दासे विवाह कियाऔर उसके गर्भसे देवापि, शान्तनु तथा बाह्नीक-इन तीन पुत्रोंको जन्म दिया |। ४४ ।।

देवापिः खलु बाल एवारण्यं विवेश |

शान्तनुस्तु महीपालो बभूव ।। ४५ ।।

देवापि बाल्यावस्थामें ही वनको चले गये, अतः शान्तनु राजा हुए ।। ४५ ।।

अत्रानुवंशश्लोको भवति-

यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं स सुखमश्रुते ।

पुनर्युवा च भवति तस्मात् तं शान्तनुंविदुः ।।

इति तदस्य शान्तनुत्वम् ।। ४६।

शान्तनुके विषयमें यह अनुवंशश्लोक उपलब्ध होता है-

वे जिस-जिस बूढ़ेको अपने दोनों हाथोंसे छू देते थे, वह बड़े सुख और शान्तिकाअनुभव करता था तथा पुनः नौजवान हो जाता था। इसीलिये लोग उन्हें शान्तनुके रूपमेंजानने लगे। यही उनके शान्तनु नाम पड़नेका कारण हुआ ।। ४६ ।।

शान्तनुः खलु गङ्गां भागीरथीमुपयेमे ।

तस्यामस्य जज्ञे देवव्रतो नामःयमाहुर्भीष्ममिति ।। ४७ ।।

शान्तनुने भागीरथी गंगाको अपनी पत्नी बनाया; जिसके गर्भसे उन्हें देवव्रत नामकपुत्र प्राप्त हुआ, जिसे लोग ‘भीष्म’ कहते हैं ।। ४७ ।।

भीष्मः खलु पितुः प्रियचिकीर्षया सत्यवरतीं मातरमुदवाहयत्;यामाहुर्गन्धकालीति ।। ४८ ।।

भीष्मने अपने पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे उनके साथ माता सत्यवतीका विवाहकराया; जिसे गन्धकाली भी कहते हैं ।। ४८ ।।

तस्यां पूर्वं कानीनो गर्भः पराशराद् द्वैपायनोऽभवत् ।

तस्यामेव शान्तनोरन्यौ द्वौपुत्रौ बभूवतुः ।। ४९ ।।

सत्यवतीके गर्भसे पहले कन्यावस्थामें महर्षि पराशरसे द्वैपायन व्यास उत्पन्न हुए थे।फिर उसी सत्यवतीके राजा शान्तनुद्वारा दो पुत्र और हुए ।। ४९ ।।

विचित्रवीर्यश्चित्राङ्गदश्च ।

तयोरप्राप्तयौवन एव चित्राङ्गदो गन्धर्वेण हतः;विचित्रवीर्यस्तु राजाऽऽसीत् ।। ५० ।।

जिनका नाम था, विचित्रवीर्य और चित्रांगद। उनमेंसे चित्रांगद युवावस्थामें पदार्पणकरनेसे पहले ही एक गन्धर्वके द्वारा मारे गये; परंतु विचित्रवीर्य राजा हुए ।। ५० ।।

विचित्रवीर्यः खलु कौसल्यात्मजे अम्बिकाम्बालिके काशिराजदुहितरावुपयेमे ।।५१ ।।

विचित्रवीर्यने अम्बिका और अम्बालिकासे विवाह किया । वे दोनों काशिराजकी पुत्रियाँथीं और उनकी माताका नाम कौसल्या था ।। ५१ ।।

विचित्रवीर्यस्त्वनपत्य एव विदेहत्वं प्राप्तः ।

ततः सत्यवत्यचिन्तयन्मा दौष्यन्तोवंश उच्छेदं व्रजेदिति ।। ५२ ।।

विचित्रवीर्यके अभी कोई संतान नहीं हुई थी, तभी उनका देहावसान हो गया। तबसत्यवतीको यह चिन्ता हुई कि ‘राजा दुष्यन्तका यह वंश नष्ट न हो जाय’ ।। ५२ ।।

सा द्वैपायनमृषिं मनसा चिन्तयामास ।

स तस्याः पुरतः स्थितः, किं करवाणीति।। ५३ ।।

उसने मन-ही-मन द्वैपायन महर्षि व्यासका चिन्तन किया। फिर तो व्यासजी उसकेआगे प्रकट हो गये और बोले-‘क्या आज्ञा है?’ ।। ५३ ।।

सा तमुवाच-भ्राता तवानपत्य एव स्वरयातो विचित्रवीर्यः ।

साध्वपत्यंतस्योत्पादयेति ।। ५४ ।।

सत्यवतीने उनसे कहा-‘बेटा! तुम्हारे भाई विचित्रवीर्य संतानहीन अवस्थामें हीस्वर्गवासी हो गये। अतः उनके वंशकी रक्षाके लिये उत्तम संतान उत्पन्न करो’ ।। ५४ ।।

स तथेत्युक्त्वा त्रीन् पुत्रानुत्पादयामास; धृतराष्ट्रं पाण्डुं विदुरं चेति ।। ५५ ।

उन्होंने ‘तथास्तु’ कहकर धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर- इन तीन पुत्रोंको उत्पन्नकिया ।। ५५ ।।

तत्र धृतराष्ट्रस्य राज्ञः पुत्रशतं बभूव गान्धार्यां वरदानाद् द्वैपायनस्य ।। ५६ ।।

उनमेंसे राजा धृतराष्ट्रके गान्धारीके गर्भसे व्यासजीके दिये हुए वरदानके प्रभावसे सौपुत्र हुए ।। ५६ ।।

तेषां धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां चत्वारः प्रधाना बभूवुः; दुर्योधनो दुःशासनोविकर्णश्चित्रसेनश्चेति ।। ५७ ।।

धृतराष्ट्रके उन सौ पुत्रोंमें चार प्रधान थे – दुर्योधन, दुःशासन, विकर्ण औरचित्रसेन ।। ५७ ।।

पाण्डोस्तु द्वे भार्े बभूवतुः कुन्ती पृथा नाम माद्री च इत्युभे स्त्रीरत्ने ।। ५८ ।।

पाण्डुकी दो पत्नियाँ थीं; कुन्तिभोजकी कन्या पृथा और माद्री। ये दोनों ही स्त्रियोंमेंरत्नस्वरूपा थीं ।। ५८ ।।

पाण्डुर्मृगयां मैथुनगतमृषिमपश्यन्मृग्यां वर्तमानम् अथ चरन्

तथैवाद्भुतमनासादितकामरसमतृप्तं च बाणेनाजघान ।। ५९ ।।

एक दिन राजा पाण्डुने शिकार खेलते समय एक मृगरूपधारी ऋषिकोमृगीरूपधारिणी अपनी पत्नीके साथ मैथुन करते देखा। वह अद्भुत मृग अभी काम-रसकाआस्वादन नहीं कर सका था। उसे अतृप्त अवस्थामें ही राजाने बाणसे मार दिया।। ५९ ।।

स बाणविद्धकामरसस्याहमनवाप्तकामरसोत्वमप्येतामवस्थामासाद्यानवाप्तकामरसः पञ्चत्वमाप्स्यसि क्षिप्रमेवेति ।

विवर्णरूपस्तथा पाण्डुः शापं परिहरमाणो नोपासर्पत भार्ये । वाक्यं चोवाच धर्ममिमं येन त्वयाभिज्ञेन निहतस्तस्मात् उवाच पाण्डुम्-चरता स| ६० ।।

बाणसे घायल होकर उस मुनिने पाण्डुसे कहा – ‘राजन्! तुम भी इस मैथुन धर्मकाआचरण करनेवाले तथा काम-रसके ज्ञाता हो, तो भी तुमने मुझे उस दशामें मारा है, जबकि मैं काम-रससे तृप्त नहीं हुआ था। इस कारण इसी अवस्थामें पहुँचकर काम-रसकाआस्वादन करनेसे पहले ही शीघ्र मृत्युको प्राप्त हो जाओगे।’ यह सुनकर राजा पाण्डुउदास हो गये और शापका परिहार करते हुए पत्नियोंके सहवाससे दूर रहने लगे। उन्होंनेकहा-।। ६० ।।

स्वचापल्यादिदं प्राप्तवानहं शृणोमि च नानपत्यस्य लोकाः सन्तीति ।

सा त्वंमदर्थे पुत्रानुत्पादयेति कुन्तीमुवाच ।

सा तथोत्ता पुत्रानुत्पादयामास ।

धर्माद् युधिष्ठिरंमारुताद् भीमसेनं शक्रादर्जुनमिति ।॥ ६१ ।।

‘देवियो! अपनी चपलताके कारण मुझे यह शाप मिला है। सुनता हूँ, संतानहीनकोपुण्यलोक नहीं प्राप्त होते हैं। अतः तुम मेरे लिये पुत्र उत्पन्न करो।’ यह बात उन्होंने कुन्तीसेकही। उनके ऐसा कहनेपर कुन्तीने तीन पुत्र उत्पन्न किये – धर्मराजसे युधिष्ठिरको,वायुदेवसे भीमसेनको और इन्द्रसे अर्जुनको जन्म दिया|। ६१ ।।

तां संहृष्टः पाण्डुरुवाच-इयं ते सपत्न्यनपत्या; साध्वस्या अपत्यमुत्पाद्यतामिति ।

एवमस्त्विति कुन्ती तांविद्यां माद्रयाः प्रायच्छत् ।। ६२ ।।

इससे पाण्डुको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने कुन्तीसे कहा – ‘ यह तुम्हारी सौत माद्री तोसंतानहीन ही रह गयी, इसके गर्भसे भी सुन्दर संतान उत्पन्न होनेकी व्यवस्था करो।’ ‘ऐसाही हो’ कहकर कुन्तीने अपनी वह विद्या (जिससे देवता आकृष्ट होकर चले आते थे)माद्रीको भी दे दी ।। ६२ ।।

माद्रयामश्विभ्यां नकुलसहदेवावुत्पादितौ ।। ६३ ।।

माद्रीके गर्भसे अश्विनीकुमारोंने नकुल और सहदेवको उत्पन्न किया ६३ ।।

माद्रीं खल्वलंकृतां दृष्ट्वा पाण्डुर्भावं चक्रे च तां स्पृष्ट्वैव विदेहत्वंप्राप्तः ।। ६४ ।।

तत्रैनं चिताग्निस्थं माद्री समन्वारुरोह उवाच कुन्तीम्; यमयोरप्रमत्तया त्वयाभवितव्यमिति ।। ६५ ।।

एक दिन माद्रीको शृंगार किये देख पाण्डु उसके प्रति आसक्त हो गये और उसका स्पर्शहोते ही उनका शरीर छूट गया। तदनन्तर वहाँ चिताकी आगमें स्थित पतिके शवके साथमाद्री चितापर आरूढ़ हो गयी और कुन्तीसे बोली – ‘ बहिन ! मेरे जुड़वें बच्चोंके भी लालन-पालनमें तुम सदा सावधान रहना’ ।। ६४-६५ ।।

ततस्ते पाण्डवाः कुन्त्या सहिता हास्तिनपुर-मानीय तापसैर्भीष्मस्य च विदुरस्यच निवेदिताः ।

सर्ववर्णानां च निवेद्यान्तर्हितास्तापसा बभूवुः प्रेक्ष्य- माणानांतेषाम् ।। ६६ ।।

इसके बाद तपस्वी मुनियोंने कुन्तीसहित पाण्डवोंको वनसे हस्तिनापुरमें लाकर भीष्मतथा विदुरजीको सौंप दिया। साथ ही समस्त प्रजावर्गके लोगोंको भी सारे समाचार बताकरवे तपस्वी उन सबके देखते-देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गये।। ६६ ।।

तच्च वाक्यमुपश्रुत्य भगवतामन्तरिक्षात् पुष्पवृष्टिः पपात; देवदुन्दुभयश्च प्रणेदुः।। ६७ ।।

उन ऐश्वर्यशाली मुनियोंकी बात सुनकर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी औरदेवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं ।। ६७ ।।

प्रतिगृहीताश्च पाण्डवाः पितुर्निधनमावेदयन् तस्यौध्ध्वंदेहिकं न्यायतश्च कृतवन्तः ।

तांस्तत्र निवसतः पाण्डवान् बाल्यात् प्रभृति दुर्योधनो नामर्षयत् ।। ६८ ।।

भीष्म और धृतराष्ट्रके द्वारा अपना लिये जानेपर पाण्डवोंने उनसे अपने पिताकीमृत्युका समाचार बताया, तत्पश्चात् पिताकी औध्ध्वदैहिक क्रियाको विधिपूर्वक सम्पन्न करकेपाण्डव वहीं रहने लगे। दुर्योधनको बाल्यावस्थासे ही पाण्डवोंका साथ रहना सहन नहींहुआ ।। ६८ ।।

व्यवसितः; पापाचारो भावित्वाच्चार्थस्य न शकितास्ते समुद्धर्तुम् ।। ६९ ।।

पापाचारी दुर्योधन राक्षसी बुद्धिका आश्रय ले अनेक उपायोंसे पाण्डवोंकी जड़ उखाड़नेका प्रयत्न करता रहता था। परंतु जो होनेवाली बात है, वह होकर ही रहती है; इसलिये दुर्योधन आदि पाण्डवोंको नष्ट करनेमें सफल न हो सके ।। ६९ ।।

ततश्च धृतराष्ट्रेण व्याजेन वारणावतमनुप्रेषिता गमनमरोचयन् ।। ७० ।।

इसके बाद धृतराष्ट्रने किसी बहानेसे पाण्डवोंको जब वारणावत नगरमें जानेके लिये प्रेरित किया, तब उन्होंने वहाँसे जाना स्वीकार कर लिया ।। ७० ।।

तत्रापि जतुगृहे दग्धुं समारब्धा न शकिता विदुरमन्त्रितेनेति ।। ७१ ।।

वहाँ भी उन्हें लाक्षागृहमें जला डालनेका प्रयत्न किया गया; किंतु पाण्डवोंके विदुरजीकी सलाहके अनुसार काम करनेके कारण विरोधीलोग उनको दग्ध करनेमें समर्थ न हो सके ।। ७१ ।।

तस्माच्च हिडिम्बमन्तरा हत्वा एकचक्रां गताः ।। ७२ ।।

पाण्डव वारणावतसे अपनेको छिपाते हुए चल पड़े और मार्गमें हिडिम्ब राक्षसका वध करके वे एकचक्रा नगरीमें जा पहुँचे ।। ७२ ।।

तस्यामप्येकचक्रायां बकं नाम राक्षसं हत्वा पाञ्चालनगरमधिगताः ।। ७३ ।।

एकचक्रामें भी बक नामवाले राक्षसका संहार करके वे पांचाल नगरमें चले गये ।। ७३ ।।

तत्र द्रौपदीं भार्यामविन्दन्, स्वविषयं चाभिजग्मुः ।। ७४ ।।

वहाँ पाण्डवोंने द्रौपदीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और फिर अपनी राजधानी हस्तिनापुरमें लौट आये ।। ७४ ।।

कुशलिनः पुत्रांश्चोत्पादयामासुः ।

प्रतिविन्ध्यं युधिष्ठिरः, सुतसोमं वृकोदरः, श्रुतकीर्तिमर्जुनः, शतानीकं नकुलः, श्रुतकर्माणं सहदेव इति ।। ७५ ।।

वहाँ कुशलपूर्वक रहते हुए उन्होंने द्रौपदीसे पाँच पुत्र उत्पन्न किये। युधिष्ठिरने प्रतिविन्ध्यको, भीमसेनने सुतसोमको, अर्जुनने श्रुतकीर्तिको, नकुलने शतानीकको और सहदेवने श्रुतकर्माको जन्म दिया ।। ७५ ।।

युधिष्ठिरस्तु गोवासनस्य शैब्यस्य देविकां नाम कन्यां स्वयंवरे लेभे ।

तस्यां पुत्रं जनयामास यौधेयं नाम ।। ७६ ।।

भीमसेनोऽपि काश्यां बलन्धरां नामोपयेमे वीर्य-शुल्काम् ।

तस्यां पुत्रं सर्वगं नामोत्पादयामास ।। ७७ ।।

युधिष्ठिरने शिबिदेशके राजा गोवासनकी पुत्री देविकाको स्वयंवरमें प्राप्त किया और उसके गर्भसे एक पुत्रको जन्म दिया; जिसका नाम यौधेय था। भीमसेनने भी काशिराजकी कन्या बलन्धराके साथ विवाह किया; उसे प्राप्त करनेके लिये बल एवं पराक्रमका शुल्क राक्षसीं बुद्धिमाश्रितोऽनेकैरुपायैरुद्धर्तं चरखा गया था अर्थात् यह शर्त थी कि जो अधिक बलवान् हो, वही उसके साथ विवाह करसकता है। भीमसेनने उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न किया, जिसका नाम सर्वगथा ।। ७६-७७ ।।

अर्जुनः खलु द्वारवतीं गत्वा भगिनीं वासुदेवस्य सुभद्रां भद्रभाषिणींभार्यामुदावहत् ।

स्वविषयं चाभ्याजगाम कुशली ।

तस्यां पुत्रमभिमन्युमतीवगुणसम्पन्नं दयितं वासुदेवस्याजनयत् ।। ७८ ।।

अर्जुनने द्वारकामें जाकर मंगलमय वचन बोलनेवाली वासुदेवकी बहिन सुभद्राकोपत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसे लेकर कुशलपूर्वक अपनी राजधानीमें चले आये वहाँउसके गर्भसे अत्यन्त गुणसम्पन्न अभिमन्यु नामक पुत्रको उत्पन्न किया; जो वसुदेवनन्दनभगवान् श्रीकृष्णको बहुत प्रिय था ।। ७८ ।।

नकुलस्तु चैद्यां करेणुमतीं नाम भार्यामुदावहत् ।

तस्यां पुत्रं निरमित्रं नामाजनयत्। ७९ ।।

नकुलने चेदिनरेशकी पुत्री करेणुमतीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसके गर्भसेनिरमित्र नामक पुत्रको जन्म दिया ।। ७९ ।।

सहदेवोऽपि माद्रीमेव स्वयंवरे विजयां नामोपयेमे मद्रराजस्य द्युतिमतोदुहितरम् ।

तस्यां पुत्रमजनयत् सुहोत्रं नाम ।। ८० ।।

सहदेवने भी मद्रदेशकी राजकुमारी विजयाको स्वयंवरमें प्राप्त किया। वह मद्रराजद्युतिमान्की पुत्री थी। उसके गर्भसे उन्होंने सुहोत्र नामक पुत्रको जन्म दिया।। ८० ।।

भीमसेनस्तु पूर्वमेव हिडिम्बायां राक्षसं घटोत्कचं पुत्रमुत्पादयामास ।। ८१ ।।

भीमसेनने पहले ही हिडिम्बाके गर्भसे घटोत्कच नामक राक्षसजातीय पुत्रको उत्पन्नकिया ।। ८१ ।।

इत्येत एकादश पाण्डवानां पुत्राः ।

तेषां वंशकरोऽभिमन्युः ।। ८२ ।।

इस प्रकार ये पाण्डवोंके ग्यारह पुत्र हुए। इनमेंसे अभिमन्युका ही वंश चला ।। ८२ ।।

स विराटस्य दुहितरमुपयेमे उत्तरां नाम ।

तस्यामस्य परासुर्गर्भोऽभवत् ।

तमुत्सङ्गेन प्रतिजग्राह पृथा नियोगात् पुरुषोत्तमस्य वासुदेवस्य, षाण्मासिकंगर्भमहमेनं जीवयिष्यामीति ।। ८३ ।।

अभिमन्युने विराटकी पुत्री उत्तराके साथ विवाह किया था । उसके गर्भसे अभिमन्युकेएक पुत्र हुआ; जो मरा हुआ था। पुरुषोतम भगवान् श्रीकृष्णके आदेशसे कुन्तीने उसेअपनी गोदमें ले लिया। उन्होंने यह आश्वासन दिया कि छः महीनेके इस मरे हुए बालककोमैं जीवित कर दूँगा ।। ८३ ।।

स वासुदेवेनासंजातबलवीर्य-पराक्रमोऽकालजातोऽस्त्राग्निना भगवतादग्धस्तेजसा स्वेन संजीवितः ।

जीवयित्वा चैनमुवाच-परिक्षीणे कुले जातो भवत्वयंपरिक्षिन्नामेति ।। ८४ ।।

परिक्षित् खलु माद्रवतीं नामोपयेमे त्वन्मातरम् ।

तस्यां भवान् जनमेजयः ।। ८५

अश्वत्थामाके अस्त्रकी अग्निसे झुलसकर वह असमयमें (समयसे पहले) ही पैदा होगया था। उसमें बल, वीर्य और पराक्रम नहीं था। परंतु भगवान् श्रीकृष्णने उसे अपने तेजसेजीवित कर दिया। इसको जीवित करके वे इस प्रकार बोले – ‘इस कुलके परिक्षीण ( नष्ट)होनेपर इसका जन्म हुआ है; अतः यह बालक परिक्षित् नामसे विख्यात हो’। परिक्षित्नेतुम्हारी माता माद्रवतीके साथ विवाह किया, जिसके गर्भसे तुम जनमेजय नामक पुत्रउत्पन्न हुए ।। ८४-८५ ।।

भवतो वपुष्टमायां द्वौ पुत्रौ जज्ञाते; शतानीकः शङ्कुकर्णश्च ।

शतानीकस्यवैदेह्यां पुत्र उत्पन्नोऽश्व-मेधदत्त इति ।। ८६ ।।

तुम्हारी पत्नी वपुष्टमाके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए हैं- शतानीक और शंकुकर्ण।शतानीककी पत्नी विदेहराजकुमारीके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्रका नाम है।अश्वमेधदत्त ।। ८६ ।।

एष पूरोर्वशः पाण्डवानां च कीर्तितः; धन्यः पुण्यः परमपवित्रः सततं श्रोतव्योब्राह्मणैर्नियम-वद्भिरनन्तरं क्षत्रियैः स्वधर्मनिरतैः प्रजापालन-तत्परैर्वैश्यैरपि च श्रोतव्योऽधिगम्यश्च तथा शूद्रैरपि त्रिवर्णशुश्रूषुभिः श्रद्दधानैरिति ।। ८७ ।।

यह पूरु तथा पाण्डवोंके वंशका वर्णन किया गया; जो धन और पुण्यकी प्राप्तिकरानेवाला एवं परम पवित्र है, नियमपरायण ब्राहम्मणों, अपने धर्में स्थित प्रजापालक क्षत्रियों, वैश्यों तथा तीनों वर्णोंकी सेवा करनेवाले श्रद्धालु शूद्रोंको भी सदा इसका श्रवण एवं स्वाध्याय करना चाहिये ।। ८७ ।।

इतिहासमिमं पुण्यमशेषतः श्रावयिष्यन्ति ये नराः श्रोष्यन्ति वा नियतात्मानो

विमत्सरा मैत्रा वेद-परास्तेऽपि स्वर्गजितःदेवब्राह्मणमनुष्याणां मान्याः सम्पूज्याश्च ।। ८८ ।।

जो पुण्यात्मा मनुष्य मनको वशमें करके ईष्ष्या छोड़कर सबके प्रति मैत्रीभावको रखतेहुए वेदपरायण हो इस सम्पूर्ण पुण्यमय इतिहासको सुनावेंगे अथवा सुनेंगे वे स्वर्गलोककेअधिकारी होंगे और देवता, ब्राह्मण तथा मनुष्योंके लिये सदैव आदरणीय तथा पूजनीयहोंगे ।। ८८ ।।

परं हीदं भारतं भगवता व्यासेन प्रोक्तं पावनं ये ब्राह्मणादयो वर्णाः श्रद्दधानाअमत्सरा मैत्रा वेदसम्पन्नाः श्रोष्यन्ति, तेऽपि स्वर्गजितः सुकृतिनोऽशोच्याः कृताकृतेभवन्ति ।। ८९ ।।

पुण्यलोका भवन्ति सततं

जो ब्राह्मण आदि वर्णोंके लोग मात्सर्यरहित, मैत्रीभावसे संयुक्त और वेदाध्ययनसेसम्पन्न हो श्रद्धापूर्वक भगवान् व्यासके द्वारा कहे हुए इस परम पावन महाभारत ग्रन्थकोसुनेंगे, वे भी स्वर्गके अधिकारी और पुण्यात्मा होंगे तथा उनके लिये इस बातका शोक नहींरह जायगा कि उन्होंने अमुक कर्म क्यों किया और अमुक कर्म क्यों नहीं किया।। ८९ ।।

भवति चात्र श्लोकः-इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् ।धन्यं यशस्यमायुष्यं श्रोतव्यं नियतात्मभिः ॥ ९० ।।

इस विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है-‘यह महाभारत वेदोंके समान पवित्र, उत्तम तथा धन, यश और आयुकी प्राप्तिकरानेवाला है। मनको वशमें रखनेवाले साधु पुरुषोंको सदैव इसका श्रवण करनाचाहिये’ ।। ९० ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पूरुवंशानुकीर्तने पञ्चनवतितमोऽध्यायः ।। ९५ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पूरुवंशानुवर्णनविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९५ ।।

षण्णवतितमोऽध्यायः

महाभिषको ब्रह्माजीका शाप तथा शापग्रस्त वसुओंके

साथ गंगाकी बातचीत

वैशम्पायन उवाच

इक्ष्वाकुवंशप्रभवो राजाऽऽसीत् पृथिवीपतिः ।

महाभिष इति ख्यातः सत्यवाक् सत्यविक्रमः ।। १ ।।

सोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च ।

तोषयामास देवेशं स्वर्गं लेभे ततः प्रभुः ।। २ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! इश्वाकु-वंशमें उत्पन्न महाभिष नामसे प्रसिद्धएक राजा हो गये हैं, जो सत्यवादी होनेके साथ ही सत्यपराक्रमी भी थे। उन्होंने एक हजारअश्वमेध और एक सौ राजसूय यज्ञोंद्वारा देवेश्वर इन्द्रको संतुष्ट किया और उन यज्ञोंकेपुण्यसे उन शक्तिशाली नरेशने स्वर्गलोग प्राप्त कर लिया ।। १-२ ।।

ततः कदाचिद् ब्रह्माणमुपासांचक्रिरे सुराः ।

तत्र राजर्षयो ह्यासन् स च राजा महाभिषः ॥ ३ ।।

तदनन्तर एक समय सब देवता ब्रह्माजीकी सेवामें उनके समीप बैठे हुए थे। वहाँबहुत-से राजर्षि तथा पूर्वोक्त राजा महाभिष भी उपस्थित थे ।। ३ ।।

अथ गङ्गा सरिच्छ्रेष्ठा समुपायात् पितामहम् ।

तस्या वासः समुद्धुतं मारुतेन शशिप्रभम् ।। ४ ।।

इसी समय सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा ब्रह्माजीके समीप आयी। उस समय वायुके झोंकेसेउसके शरीरका चाँदनीके समान उज्ज्वल वस्त्र सहसा ऊपरकी ओर उठ गया ।। ४ ।।

ततोऽभवन् सुरगणाः सहसावाङ्मुखास्तदा ।

महाभिषस्तु राजर्षिरशङ्को दृष्टवान् नदीम् ।। ५ ।।

यह देख सब देवताओंने तुरंत अपना मुँह नीचेकी ओर कर लिया; किंतु राजर्षिमहाभिष निःशंक होकर देवनदीकी ओर देखते ही रह गये ।। ५ ।।

सोऽपध्यातो भगवता ब्रह्मणा तु महाभिषः ।

उक्तश्च जातो मत्त्येषु पुन्लोकानवाप्स्यसि ।। ६ ।।

ययाऽऽहृतमनाश्चासि गङ्गया त्वं हि दुर्मते ।

सा ते वै मानुषे लोके विप्रियाण्याचरिष्यति ।। ७ ।।

तब भगवान् ब्रह्माने महाभिषको शाप देते हुए कहा-‘दुर्मते! तुम मनुष्योंमें जन्मलेकर फिर पुण्यलोकोंमें आओगे। जिस गंगाने तुम्हारे चित्तको चुरा लिया है, वहीमनुष्यलोकमें तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करेगी ।। ६-७ ।।

‘जब तुम्हें गंगापर क्रोध आ जायगा, तब तुम भी शापसे छूट जाओगे।

वैशम्पायन उवाच

यदा ते भविता मन्युस्तदा शापाद् विमोक्ष्यसे ।

स चिन्तयित्वा नृपतिर्नृपानन्यांस्तपोधनान् ।।८ ।।

प्रतीपं रोचयामास पितरं भूरितेजसम् ।

महाभिषं तु तं दृष्ट्वा नदी धैर्याच्च्युतं नृपम् ।। ९ ।।

तमेव मनसा ध्यायन्त्युपावर्तत् सरिद्वरा ।

सा तु विध्वस्तवपुषः कश्मलाभिहतान् नृप ।। १० ।।

ददर्श पथि गच्छन्ती वसून् देवान् दिवौकसः ।

तथारूपांश्च तान् दृष्ट्वा पप्रच्छ सरितां वरा ।। ११ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तब राजा महाभिषने अन्य बहुत -से तपस्वीराजाओंका चिन्तन करके महातेजस्वी राजा प्रतीपको ही अपना पिता बनानेके योग्य चुना-उन्हींको पसंद किया। महानदी गंगा राजा महाभिषको धैर्य खोते देख मन-ही – मनउन्हींका चिन्तन करती हुई लौटी। मार्गसे जाती हुई गंगाने वसुदेवताओंको देखा । उनकाशरीर स्वर्गसे नीचे गिर रहा था। वे मोहाच्छन्न एवं मलिन दिखायी दे रहे थे। उन्हें इस रूपमेंदेखकर नदियोंमें श्रेष्ठ गंगाने पूछा-।। ८-११ ।।

किमिदं नष्टरूपाः स्थ कच्चित् क्षेमं दिवौकसाम् ।

तामूचुर्वसवो देवाः शप्ताः स्मो वै महानदि ।। १२ ।।

अल्पेऽपराधे संरम्भाद् वसिष्ठेन महात्मना ।

विमूढा हि वयं सर्वे प्रच्छन्नमृषिसत्तमम् ।। १३ ।।

संध्यां वसिष्ठमासीनं तमत्यभिसृताः पुरा।

तेन कोपाद् वयं शप्ता योनौ सम्भवतेति ह ।॥ १४ ।।

तुमलोगोंका दिव्य रूप नष्ट कैसे हो गया? देवता सकुशल तो हैं न? तब वसुदेवताओंनेगंगासे कहा-‘महानदी! महात्मा वसिष्ठने थोड़़े-से अपराधपर क्रोधमें आकर हमें शाप देदिया है। पहलेकी बात है एक दिन जब वसिष्ठजी पेड़ोंकी आड़में संध्योपासना कर रहे थे,हम सब मोहवश उनका उल्लंघन करके चले गये (और उनकी धेनुका अपहरण कर लिया)।इससे कुपित होकर उन्होंने हमें शाप दिया कि ‘तुमलोग मनुष्ययोनिमें जन्म लो’ ।। १२ -१४ ।।

न निवर्तयितुं शक्यं यदुक्तं ब्रह्मवादिना ।

त्वमस्मान् मानुषी भूत्वा सृज पुत्रान्-वसून् भुवि ।। १५ ।।

‘उन ब्रह्मवादी महर्षिने जो बात कह दी है, वह टाली नहीं जा सकती; अतः हमारीप्रार्थना है कि तुम पृथ्वीपर मानवपत्नी होकर हम वसुओंको अपने पुत्ररूपसे उत्पन्नकरो ।। १५ ।।

न मानुषीणां जठरं प्रविशेम वयं शुभे ।

इत्युक्ता तैश्च वसुभिस्तथेत्युक्त्वाब्रवीदिदम् ।। १६ ।।

‘शुभे! हमें मानुषी स्त्रियोंके उदरमें प्रवेश न करना पड़े, इसीलिये हमने यह अनुरोधकिया है।’ वसुओंके ऐसा कहनेपर गंगाजी ‘तथास्तु’ कहकर यों बोलीं ।। १६ ।।

गङ्गोवाच

मर्त्येषु पुरुषश्रेष्ठः को वः कर्ता भविष्यति ।

गंगाजीने कहा-वसुओ! मत्त्यलोकमें ऐसे श्रेष्ठ पुरुष कौन हैं; जो तुमलोगोंके पिताहोंगे।

वसव ऊचुः

प्रतीपस्य सुतो राजा शान्तनुलोंकविश्रुतः ।

भविता मानुषे लोके स नः कर्ता भविष्यति ।। १७ ।।

वसुगण बोले-प्रतीपके पुत्र राजा शान्तनु लोकविख्यात साधु पुरुष होंगे।मनुष्यलोकमें वे ही मारे जनक होंगे ।। १७ ।।

गङ्गोवाच

ममाप्येवं मतं देवा यथा मां वदतानघाः ।

प्रियं तस्य करिष्यामि युष्माकं चैतदीप्सितम् ।। १८ ।।

गंगाजीने कहा-निष्पाप देवताओ! तुमलोग जैसा कहते हो, वैसा ही मेरा भी विचारहै। मैं राजा शान्तनुका प्रिय करूँगी और तुम्हारे इस अभीष्ट कार्यको भी सिद्धकरूँगी ।। १८ ।।

वसव ऊचुः

जातान् कुमारान् स्वानप्सु प्रक्षेप्तुं वै त्वमहर्हसि ।

यथा न चिरकालं नो निष्कृतिः स्यात् त्रिलोकगे ।। १९ ।।

वसुगण बोले-तीनों लोकोंमें प्रवाहित होनेवाली गंगे! हमलोग जब तुम्हारे गर्भसेजन्म लें, तब तुम पैदा होते ही हमें अपने जलमें फेंक देना; जिससे शीघ्र ही हमारामर्त्यलोकसे छुटकारा हो जाय ।। १९ ।।

गङ्गोवाच

एवमेतत् करिष्यामि पुत्रस्तस्य विधीयताम् ।

नास्य मोघः संगमः स्यात् पुत्रहेतोर्मया सह ।। २० ।।

गंगाजीने कहा-ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगी; परंतु उस राजाका मेरे साथ पुत्रके लियेकिया हुआ सम्बन्ध व्यर्थ न हो जाय, इसलिये उनके लिये एक पुत्रकी भी व्यवस्था होनीचाहिये ।। २० ।।

वसव ऊचुः

तुरीयार्धं प्रदास्यामो वीर्यस्यैकैकशो वयम् ।

तेन वीर्येण पुत्रस्ते भविता तस्य चेप्सितः ।। २१ ।।

वसुगण बोले-हम सब लोग अपने तेजका एक-एक अष्टमांश देंगे। उस तेजसे जोतुम्हारा एक पुत्र होगा, वह उस राजाकी इच्छाके अनुरूप होगा ।। २१ ।।

न सम्पत्स्यति मत्त्येषु पुन्तस्य तु संततिः ।

तस्मादपुत्रः पुत्रस्ते भविष्यति स वीर्यवान् ।। २२ ।।

किंतु मर्त्यलोकमें उसकी कोई संतान न होगी। अतः तुम्हारा वह पुत्र संतानहीन होनेकेसाथ ही अत्यन्त पराक्रमी होगा ।। २२ ।।

एवं ते समयं कृत्वा गङ्गया वसवः सह ।

जग्मुः संहृष्टमनसो यथासंकल्पमञ्जसा ।। २३ ।।

इस प्रकार गंगाजीके साथ शर्त करके वसुगण प्रसन्नतापूर्वक अपनी इच्छाके अनुसारचले गये ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि महाभिषोपाख्याने षण्णवतितमोऽध्यायः ।। ९६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें महाभिषोपाख्यानविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९६ ।।

सप्तनवतितमोऽध्यायः

राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करनाऔर शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रतीपो राजाऽऽसीत् सर्वभूतहितः सदा ।

निषसाद समा बह्वीर्गङ्गाद्वारगतो जपन् ।। १ ।

वैशम्पायनजी कहते हैं-तदनन्तर इस पृथ्वीपर राजा प्रतीप राज्य करने लगे। वेसदा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते थे। एक समय महाराज प्रतीप गंगाद्वार(हरिद्वार)-में गये और बहुत वर्षोंतक जप करते हुए एक आसनपर बैठे रहे ।। १ ।।

तस्य रूपगुणोपेता गङ्गा स्त्रीरूपधारिणी ।

उत्तीर्य सलिलात् तस्माल्लोभनीयतमाकृतिः ।। २ ।।

अधीयानस्य राजर्षेर्दिव्यरूपा मनस्विनी ।

दक्षिणं शालसंकाशमूरुं भेजे शुभानना।। ३ ।।

उस समय मनस्विनी गंगा सुन्दर रूप और उत्तम गुणोंसे युक्त युवती स्त्रीका रूप धारणकरके जलसे निकलीं और स्वाध्यायमें लगे हुए राजर्षि प्रतीपके शाल-जैसे विशाल दाहिनेऊरु (जाँघ)-पर जा बैठीं। उस समय उनकी आकृति बड़ी लुभावनी थी; रूप देवांगनाओंकेसमान था और मुख अत्यन्त मनोहर था ।। २-३ ।।

प्रतीपस्तु महीपालस्तामुवाच यशस्विनीम् ।

करोमि किं ते कल्याणि प्रियं यत् तेऽभिकाङ्क्षितम् ।। ४ ।।

अपनी जाँघपर बैठी हुई उस यशस्विनी नारीसे राजा प्रतीपने पूछा-‘कल्याणि! मैंतुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करू? तुम्हारी क्या इच्छा है?’ ।। ४ ।।

स्त्युवाच

त्वामहं कामये राजन् भजमानां भजस्व माम् ।

त्यागः कामवतीनां हि स्त्रीणां सद्धिर्विगर्हितः ।। ५ ।।

स्त्री बोली-राजन्! मैं आपको ही चाहती हूँ। आपके प्रति मेरा अनुराग है, अतः आपमुझे स्वीकार करें; क्योंकि कामके अधीन होकर अपने पास आयी हुई स्त्रियोंका परित्यागसाधु पुरुषोंने निन्दित माना है ।। ५ ।।

प्रतीप उवाच

नाहं परस्त्रियं कामाद् गच्छेयं वरवर्णिनि ।

न चासवर्णां कल्याणि धर्म्यमेतद्धि मे व्रतम् ।। ६ ।।

प्रतीपने कहा-सुन्दरी! मैं कामवश परायी स्त्रीके साथ समागम नहीं कर सकता। जोअपने वर्णकी न हो, उससे भी मैं सम्बन्ध नहीं रख सकता। कल्याणि! यह मेरा धमानुकूलव्रत है ।। ६ ।।

स्त्रयुवाच

नाश्रेयस्यस्मि नागम्या न वक्तव्या च कहिंचित् ।

भजन्तीं भज मां राजन् दिव्यां कन्यां वरस्त्रियम् ।। ७ ।।

स्त्री बोली-राजन्! मैं अशुभ या अमंगल करनेवाली नहीं हूँ, समागमके अयोग्य भीनहीं हूँ और ऐसी भी नहीं हूँ कि कभी कोई मुझपर कलंक लगावे। मैं आपके प्रति अनुरक्तहोकर आयी हुई दिव्य कन्या एवं सुन्दरी स्त्री हूँ। अतः आप मुझे स्वीकार करें ।। ७ ।।

प्रतीप उवाच

त्वया निवृत्तमेतत् तु यन्मां चोदयसि प्रियम् ।

अन्यथा प्रतिपन्नं मां नाशयेद् धर्मविप्लवः ।। ८।।

प्रतीपने कहा-सुन्दरी! तुम जिस प्रिय मनोरथकी पूर्तिके लिये मुझे प्रेरित कर रहीहो, उसका निराकरण भी तुम्हारे द्वारा ही हो गया। यदि मैं धर्मके विपरीत तुम्हारा यहप्रस्ताव स्वीकार कर लूँ तो धर्मका यह विनाश मेरा भी नाश कर डालेगा ।। ८ ।।

प्राप्य दक्षिणमूरु मे त्वमाश्लिष्टा वराङ्गने ।

अपत्यानां स्नुषाणां च भीरु विद्धयेतदासनम् ।। ९ ।।

वरांगने! तुम मेरी दाहिनी जाँघपर आकर बैठी हो। भीरु! तुम्हें मालूम होना चाहिये कियह पुत्र, पुत्री तथा पुत्रवधूका आसन है ।। ९ ।।

सव्योरुः कामिनीभोग्यस्त्वया स च विवर्जितः ।

तस्मादहं नाचरिष्ये त्वयि कामं वराङ्गने ।। १० ।।

पुरुषकी बायीं जाँघ ही कामिनीके उपभोगके योग्य है; किंतु तुमने उसका त्याग करदिया है। अत: वरांगने! मैं तुम्हारे प्रति कामयुक्त आचरण नहीं करूँगा ।। १० ।।

स्नुषा मे भव सुश्रोणि पुत्रार्थं त्वां वृणोम्यहम् ।

स्नुषापक्षं हि वामोरु त्वमागम्य समाश्रिता ।। ११ ।।

सुश्रोणि! तुमक्योंकि वामोरु! तुमने यहाँ आकर मेरी उसी जाँघका आश्रय लिया है, जो पुत्रवधूके पक्षकीहै ।। ११ ।।

मेरी पुत्रवधू हो जाओ। मैं अपने पुत्रके लिये तुम्हारा वरण करता हूँ;

स्त्रयुवाच

एवमप्यस्तु धर्मज्ञ संयुज्येयं सुतेन ते ।

त्वद्भक्त्या तु भजिष्यामि प्रख्यातं भारतं कुलम् ।। १२ ।।

स्त्री बोली-धर्मज्ञ नरेश! आप जैसा कहते हैं, वैसा भी हो सकता है। मैं आपकेपुत्रके साथ संयुक्त होऊँगी। आपके प्रति जो मेरी भक्ति है, उसके कारण मैं विख्यातभरतवंशका सेवन करूँगी ।। १२ ।।

पृथिव्यां पार्थिवा ये च तेषां यूयं परायणम् ।

गुणा न हि मया शक्या वक्तुं वर्षशतैरपि ।। १३ ।।

पृथ्वीपर जितने राजा हैं, उन सबके आपलोग उत्तम आश्रय हैं । सौ वर्षोंमें भीआपलोगोंके गुणोंका वर्णन मैं नहीं कर सकती ।। १३ ।।

कुलस्य ये वः प्रथितास्तत्साधुत्वमरथोत्तमम् ।

समयेनेह धर्मज्ञ आचरेयं च यद् विभो ।। १४ ।।

तत् सर्वमेव पुत्रस्ते न मीमांसेत कह्हिचित् ।

एवं वसन्ती पुत्रे ते वर्धयिष्याम्यहं रतिम् ।। १५ ।।

आपके कुलमें जो विख्यात राजा हो गये हैं, उनकी साधुता सर्वोपरि है। धर्मज्ञ! मैं एकशर्तके साथ आपके पुत्रसे विवाह करूँगी। प्रभो! मैं जो कुछ भी आचरण करूँ, वह सबआपके पुत्रको स्वीकार होना चाहिये। वे उसके विषयमें कभी कुछ विचार न करें। इसशर्तपर रहती हुई मैं आपके पुत्रके प्रति अपना प्रेम बढ़ाऊँगी। मुझसे जो पुण्यात्मा एवं प्रियपुत्र उत्पन्न होंगे, उनके द्वारा आपके पुत्रको स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी ।। १४-१५ ।।

वैशम्पायन उवाच

पुत्रैः पुण्यैः प्रियैश्चैव स्वर्गं प्राप्स्यति ते सुतः।

तथेत्युक्ता तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीयत ।। १६ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! राजा प्रतीपने ‘तथास्तु’ कहकर उसकी शर्तस्वीकार कर ली। तत्पश्चात् वह वहीं अन्तध्धान हो गयी।। १६ ।।

पुत्रजन्म प्रतीक्षन् वै स राजा तदधारयत् ।

एतस्मिन्नेव काले तु प्रतीपः क्षत्रियर्षभः ।॥ १७ ।।

इसके बाद पुत्रके जन्मकी प्रतीक्षा करते हुए राजा प्रतीपने उसकी बात याद रखी।कुरुनन्दन! इन्हीं दिनों क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ प्रतीप अपनी पत्नीको साथ लेकर पुत्रके लिये तपस्याकरने लगे ।। १७ ।।

(प्रतीपस्य तु भार्यायां गर्भः श्रीमानवर्धत।

श्रिया परमया युक्तः शरच्छुक्ले यथा शशी ।।

ततस्तु दशमे मासि प्राजायत रविप्रभम् ।

कुमारं देवगर्भाभं प्रतीपमहिषी तदा ।।)

तपस्तेपे सुतस्यार्थे सभार्यः कुरुनन्दन ।

तयोः समभवत् पुत्रो वृद्धयोः स महाभिषः ।। १८ ।।

प्रतीपकी पत्नीकी कुक्षिमें एक तेजस्वी गर्भका आविर्भाव हुआ, जो शरद्-ऋतुकेशुक्ल पक्षमें परम कान्तिमान् चन्द्रमाकी भाँति प्रतिदिन बढ़ने लगा । तदनन्तर दसवाँ मासप्राप्त होनेपर प्रतीपकी महारानीने एक देवोपम पुत्रको जन्म दिया, जो सूर्यके समानप्रकाशमान था। उन बूढ़े राजदम्पतिके यहाँ पूर्वोक्त राजा महाभिष ही पुत्ररूपमें उत्पन्नहुए ।। १८ ।।

शान्तस्य जज्ञे संतानस्तस्मादासीत् स शान्तनुः ।

शान्त पिताकी संतान होनेसे वे शान्तनु कहलाये।

(तस्य जातस्य कृत्यानि प्रतीपोऽकारयत् प्रभुः ।

जातकर्मादि विप्रेण वेदोत्तैः कर्मभिस्तदा ।।

शक्तिशाली राजा प्रतीपने उस बालकके आवश्यक कृत्य (संस्कार) करवाये। ब्राह्मणपुरोहितने वेदोतक्त क्रियाओंद्वारा उसके जात- कर्म आदि सम्पन्न किये।

नामकर्म च विप्रास्तु चक्रुः परमसत्कृतम् ।

शान्तनोरवनीपाल वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा ।।

जनमेजय! तदनन्तर बहुत-से ब्राह्मणोंने मिलकर वेदोक्त विधियोंके अनुसार शान्तनुकानामकरण-संस्कार भी किया।

ततः संवर्धितो राजा शान्तनुल्लोकपालकः ।

स तु लेभे परां निष्ठां प्राप्य धर्मविदां वरः ।॥

धनुर्वेदे च वेदे च गतिं स परमां गतः ।

यौवनं चापि सम्प्राप्तः कुमारो वदतां वरः ।।)

तत्पश्चात् बड़े होनेपर राजकुमार शान्तनु लोकरक्षाका कार्य करने लगे। वे धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठथे। उन्होंने धनुर्वेदमें उत्तम योग्यता प्राप्त करके वेदाध्ययनमें भी ऊँची स्थिति प्राप्त की।वक्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ वे राजकुमार धीरे-धीरे युवावस्थामें पहुँच गये।

संस्मरंश्चाक्षयाँल्लोकान् विजातान् स्वेन कर्मणा ।। १९ ।।

पुण्यकर्मकृदेवासीच्छान्तनुः कुरुसत्तमः ।

प्रतीपः शान्तनुं पुत्रं यौवनस्थं ततोऽन्वशात् ।। २० ।।

अपने सत्कर्मोद्वारा उपार्जित अक्षय पुण्यलोकोंका स्मरण करके कुरुश्रेष्ठ शान्तनु सदापुण्यकर्मोके अनुष्ठानमें ही लगे रहते थे। युवावस्थामें पहुँचे हुए राजकुमार शान्तनुको राजाप्रतीपने आदेश दिया-।। १९-२० ।।

पुरा स्त्री मां समभ्यागाच्छान्तनो भूतये तव ।

त्वामाव्रजेद् यदि रहः सा पुत्र वरवर्णिनी ॥ २१ ।।

कामयानाभिरूपाढ्या दिव्या स्त्री पुत्रकाम्यया ।

सा त्वया नानुयोक्तव्या कासि कस्यासि चाङ्गने ।। २२ ।।

‘शान्तनो! पूर्वकालमें मेरे समीप एक दिव्य नारी आयी थी। उसका आगमन तुम्हारेकल्याणके लिये ही हुआ था। बेटा! यदि वह सुन्दरी कभी एकान्तमें तुम्हारे पास आवे,तुम्हारे प्रति कामभावसे युक्त हो और तुमसे पुत्र पानेकी इच्छा रखती हो, तो तुम उत्तमरूपसे सुशोभित उस दिव्य नारीसे ‘अंगने! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? इत्यादि प्रश्न नकरना ।। २१-२२ ।।

यच्च कुर्यान्न तत् कर्म सा प्रष्टव्या त्वयानघ ।

मन्नियोगाद् भजन्तीं तां भजेथा इत्युवाच तम् ।। २३ ।।

‘अनघ! वह जो कार्य करे, उसके विषयमें भी तुम्हें कुछ पूछताछ नहीं करनी चाहिये।यदि वह तुम्हें चाहे, तो मेरी आज्ञासे उसे अपनी पत्नी बना लेना।’ ये बातें राजा प्रतीपनेअपने पुत्रसे कहीं ।। २३ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवं संदिश्य तनयं प्रतीपः शान्तनुं तदा ।

स्वे च राज्येऽभिषिच्यैनं वनं राजा विवेश ह ।। २४ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-अपने पुत्र शान्तनुको ऐसा आदेश देकर राजा प्रतीपने उसीसमय उन्हें अपने राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं वनमें प्रवेश किया ।। २४ ।।

स राजा शान्तनुर्धीमान् देवराजसमद्युतिः ।

बभूव मृगयाशीलः शान्तनुर्वनगोचरः ।। २५ ।।

बुद्धिमान् राजा शान्तनु देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी थे। वे हिंसक पशुओंको मारनेकेउद्देश्यसे वनमें घूमते रहते थे ।। २५ ।।

स मृगान् महिषांश्चैव विनिघ्नन् राजसत्तमः ।

गङ्गामनुचचारैकः सिद्धचारणसेविताम् ।। २६ ।।

राजाओंमें श्रेष्ठ शान्तनु हिंसक पशुओं और जंगली भैंसोंको मारते हुए सिद्ध एवंचारणोंसे सेवित गंगाजीके तटपर अकेले ही विचरण करते थे ।। २६ ।।

स कदाचिन्महाराज ददर्श परमां स्त्रियम् ।

जाज्वल्यमानां वपुषा साक्षाच्छ्रियमिवापराम् ।। २७ ।।

महाराज जनमेजय! एक दिन उन्होंने एक परम सुन्दरी नारी देखी, जो अपने तेजस्वीशरीरसे ऐसी प्रकाशित हो रही थी, मानो साक्षात् लक्ष्मी ही दूसरा शरीर धारण करके आगयी हो ।। २७ ।।

सर्वानवद्यां सुदतीं दिव्याभरणभूषिताम् ।

सूक्ष्माम्बरधरामेकां पद्मोदरसमप्रभाम् ।। २८ ।।

उसके सारे अंग परम सुन्दर और निर्दोष थे। दाँत तो और भी सुन्दर थे। वह दिव्यआभूषणोंसे विभूषित थी। उसके शरीरपर महीन साड़ी शोभा पा रही थी और कमलकेभीतरी भागके समान उसकी कान्ति थी, वह अकेली थी ।। २८ ।।

तां दृष्ट्वा हृष्टरोमाभूद् विस्मितो रूपसम्पदा ।

पिबन्निव च नेत्राभ्यां नातृप्यत नराधिपः ।। २९ ।।

उसे देखते ही राजा शान्तनुके शरीरमें रोमांच हो आया, वे उसकी रूप-सम्पत्तिसेआश्चर्यचकित हो उठे और दोनों नेत्रोंद्वारा उसकी सौन्दर्य – सुधाका पान करते हुए– से तृप्तनहीं होते थे ।। २९ ।।

सा च दृष्टुवैव राजानं विचरन्तं महाद्युतिम् ।

स्नेहादागतसौहार्दा नातृप्यत विलासिनी ।। ३० ।।

वह भी वहाँ विचरते हुए महातेजस्वी राजा शान्तनुको देखते ही मुग्ध हो गयी । स्नेहवशउसके हृदयमें सौहार्दका उदय हो आया। वह विलासिनी राजाको देखते-देखते तृप्त नहींहोती थी ।। ३० ।।

तामुवाच ततो राजा सान्त्वयञ्शलक्ष्णया गिरा ।

देवी वा दानवी वा त्वं गन्धर्वी चाथ वाप्सराः ।। ३१ ।।

यक्षी वा पन्नगी वापि मानुषी वा सुमध्यमे ।

याचे त्वां सुरगर्भाभे भार्या मे भव शोभने ॥ ३२ ।।

तब राजा शान्तनु उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें बोले-‘सुमध्यमे! तुम देवी,दानवी, गन्धर्वी, अप्सरा, यक्षी, नागकन्या अथवा मानवी, कुछ भी क्यों न होओ;देवकन्याके समान सुशोभित होनेवाली सुन्दरी! मैं तुमसे याचना करता हूँ कि मेरी पत्नी होजाओ’ ।। ३१-३२ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शान्तनूपाख्याने सप्तनवतितमोऽध्यायः।। ९७ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शान्तनूपाख्यानविषयक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९७ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं)

अष्टनवतितमोऽध्यायः

शर्तोंके साथ सम्बन्ध, वसुओका शान्तनु और गंगाका कुछ

जन्म और शापसे उद्धार तथा भीष्मकी उत्पत्ति

वैशम्पायन उवाच

(यशस्विनी च साऽऽगच्छच्छान्तनोर्भूतये तदा ।

सा च दृष्ट्वा नृपश्रेष्ठं चरन्तं तीरमाश्रितम् ।। )

एतच्छरुत्वा वचो राज्ञः सस्मितं मृदु वल्गु च।

वसूनां समयं स्मृत्वाथाभ्यगच्छदनिन्दिता ।। १ ।।

(प्रजार्थिनी राजपुत्रं शान्तनुं पृथिवीपतिम् ।

प्रतीपवचनं चापि संस्मृत्यैव स्वयं नृप ।।

कालोऽयमिति मत्वा सा वसूनां शापचोदिता ।)

उवाच चैव राज्ञः सा ह्लादयन्ती मनो गिरा ।

भविष्यामि महीपाल महिषी ते वशानुगा ।। २ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! राजा शान्तनुका मधुर मुसकानयुक्त मनोहरवचन सुनकर यशस्विनी गंगा उनकी ऐश्वर्य-वृद्धिके लिये उनके पास आयीं। तटपर विचरतेहुए उन नृपश्रेष्ठको देखकर सती साध्वी गंगाको वसुओंको दिये हुए वचनका स्मरण होआया। साथ ही राजा प्रतीपकी बात भी याद आ गयी । तब यही उपयुक्त समय है, ऐसामानकर वसुओंको मिले हुए शापसे प्रेरित हो वे स्वयं संतानोत्पादनकी इच्छासे पृथ्वीपतिमहाराज शान्तनुके समीप चली आयीं और अपनी मधुर वाणीसे महाराजके मनको आनन्दप्रदान करती हुई बोलीं-‘भूपाल! मैं आपकी महारानी बनूँगी एवं आपके अरधीनरहूँगी ।। १-२ ।।

यत् तु कुर्यामहं राजञ्छुभं वा यदि वाशुभम् ।

न तद् वारयितव्यास्मि न वक्तव्या तथाप्रियम् ।। ३ ।।

‘(परंतु एक शर्त है-) राजन्! मैं भला या बुरा जो कुछ भी करू, उसके लिये आपकोमुझे नहीं रोकना चाहिये और मुझसे कभी अप्रिय वचन भी नहीं कहना चाहिये ।। ३ ।।

एवं हि वर्तमानेऽहं त्वयि वत्स्यामि पार्थिव ।

वारिता विप्रियं चोत्ता त्यजेयं त्वामसंशयम् ।। ४ ।।

‘पृथ्वीपते! ऐसा बर्ताव करनेपर ही मैं आपके समीप रहूँगी। यदि आपने कभी मुझेकिसी कार्यसे रोका या अप्रिय वचन कहा तो मैं निश्चय ही आपका साथ छोड़ दूँगी’ ।। ४ ।।

तथेति सा यदा तूत्ता तदा भरतसत्तम ।

प्रहर्षमतुलं लेभे प्राप्य तं पार्थिवोत्तमम् ।। ५ ।।

भरतश्रेष्ठ! उस समय बहुत अच्छा कहकर राजाने जब उसकी शर्त मान ली, तब उननृपश्रेष्ठको पतिरूपमें प्राप्त करके उस देवीको अनुपम आनन्द मिला ।। ५ ।।

(रथमारोप्य तां देवीं जगाम स तया सह ।

सा च शान्तनुमभ्यागात् साक्षाल्लक्ष्मीरिवापरा ।।)

तब राजा शान्तनु देवी गंगाको रथपर बिठाकर उनके साथ अपनी राजधानीको चलेगये। साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान सुशोभित होनेवाली गंगादेवी शान्तनुके साथ गयीं।

आसाद्य शान्तनुस्तां च बुभुजे कामतो वशी ।

न प्रष्टव्येति मन्वानो न स तां किंचिदूचिवान् ।। ६ ।।

इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले राजा शान्तनु उस देवीको पाकर उसका इच्छानुसारउपभोग करने लगे। पिताका यह आदेश था कि उससे कुछ पूछना मत; अतः उनकी आज्ञामानकर राजाने उससे कोई बात नहीं पूछी ।। ६ ।।

स तस्याः शीलवृत्तेन रूपौदार्यगुणेन च ।

उपचारेण च रहस्तुतोष जगतीपतिः ।। ७ ।।

उसके उत्तम शील-स्वभाव, सदाचार, रूप, उदारता, सद्गुण तथा एकान्त सेवासेमहाराज शान्तनु बहुत संतुष्ट रहते थे ।। ७ ।।

दिव्यरूपा हि सा देवी गङ्गा त्रिपथगामिनी।

मानुषं विग्रहं कृत्वा श्रीमन्तं वरवर्णिनी ।। ८।॥

भाग्योपनतकामस्य भार्या चोपनताभवत् ।

शान्तनोर्नुपसिंहस्य देवराजसमद्युतेः ।। ९ ।।

त्रिपथगामिनी दिव्यरूपिणी देवी गंगा ही अत्यन्त सुन्दर मनुष्य-देह धारण करकेदेवराज इन्द्रके समान तेजस्वी नृपशिरोमणि महाराज शान्तनुको, जिन्हें भाग्यसे इच्छानुसारसुख अपने-आप मिल रहा था, सुन्दरी पत्नीके रूपमें प्राप्त हुई थीं ।। ८-९ ।।

सम्भोगस्नेहचातुर्येर्हावभावसमन्वितैः ।

राजानं रमयामास यथा रेमे तथैव सः ।। १० ।।

गंगादेवी हाव-भावसे युक्त सम्भोग-चातुरी और प्रणय-चातुरीसे राजाको जैसे-जैसेरमातीं, उसी-उसी प्रकार वे उनके साथ रमण करते थे ।। १० ।।

स राजा रतिसक्तत्वादुत्तमस्त्रीगुणैर्हतः ।

संवत्सरानृतून् मासान् बुबुधे न बहून् गतान् ।। ११ ।।

उस दिव्य नारीके उत्तम गुणोंने उनके चित्तको चुरा लिया था; अतः वे राजा उसके साथरति-भोगमें आसक्त हो गये। कितने ही वर्ष, ऋतु और मास व्यतीत हो गये, किंतु उसमेंआसक्त होनेके कारण राजाको कुछ पता न चला ।। ११ ।।

रममाणस्तया सार्धं यथाकामं नरेश्वर: ।

अष्टावजनयत् पुत्रांस्तस्याममरसंनिभान् ।। १२ ।।

उसके साथ इच्छानुसार रमण करते हुए महाराज शान्तनुने उसके गर्भसे देवताओंकेसमान तेजस्वी आठ पुत्र उत्पन्न किये ।। १२ ।।

जातं जातं च सा पुत्रं क्षिपत्यम्भसि भारत ।

प्रीणाम्यहं त्वामित्युक्त्वा गङ्गा स्रोतस्यमज्जयत् ।। १३ ।।

भारत! जो-जो पुत्र उत्पन्न होता, उसे वह गंगाजीके जलमें फेंक देती और कहती- (वत्स! इस प्रकार शापसे मुक्त करके ) मैं तुम्हें प्रसन्न कर रही हूँ।’ ऐसा कहकर गंगाप्रत्येक बालकको धारामें डुबो देती थी ।। १३ ।।

तस्य तन्न प्रियं राज्ञः शान्तनोरभवत् तदा ।

न च तां किंचनोवाच त्यागाद् भीतो महीपतिः ।। १४ ।।

पत्नीका यह व्यवहार राजा शान्तनुको अच्छा नहीं लगता था, तो भी वे उस समयउससे कुछ नहीं कहते थे। राजाको यह डर बना हुआ था कि कहीं यह मुझे छोड़कर चलीन जाय ।। १४ ।।

अथैनामष्टमे पुत्रे जाते प्रहसतीमिव ।

उवाच राजा दुःखार्तः परीप्सन् पुत्रमात्मनः ।। १५ ।।

तदनन्तर जब आठवाँ पुत्र उत्पन्न हुआ, तब हँसती हुई-सी अपनी स्त्रीसे राजाने अपनेपुत्रका प्राण बचानेकी इच्छासे दुःखातुर होकर कहा-।। १५ ।।

मा वधीः कस्य कासीति किं हिनत्सि सुतानिति ।

पुत्रघ्नि सुमहत् पापं सम्प्राप्तं ते सुग्हितम् ।। १६ ।।

‘अरी! इस बालकका वध न कर, तू किसकी कन्या है? कौन है? क्यों अपने ही बेटोंकोमारे डालती है। पुत्रघातिनि! तुझे पुत्रहत्याका यह अत्यन्त निन्दित और भारी पाप लगाहै’ ।। १६ ।।

स्त्रयुवाच

पुत्रकाम न ते हन्मि पुत्रं पुत्रवतां वर ।

जीर्णस्तु मम वासोऽयं यथा स समयः कृतः ।। १७ ।।

स्त्री बोली-पुत्रकी इच्छा रखनेवाले नरेश! तुम पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ हो। मैं तुम्हारे इसपुत्रको नहीं मारूँगी; परंतु यहाँ मेरे रहनेका समय अब समाप्त हो गया; जैसी कि पहले हीशर्त हो चुकी है ।। १७ ।।

अहं गङ्गा जहनुसुता महर्षिगणसेविता ।

देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थमुषिताहं त्वया सह ।। १८ ।।

मैं जह्रुकी पुत्री और महर्षियोंद्वारा सेवित गंगा हूँ। देवताओंका कार्य सिद्ध करनेकेलिये तुम्हारे साथ रह रही थी ।। १८ ।।

इमेऽष्टौ वसवो देवा महाभागा महौजसः ।

वसिष्ठशापदोषेण मानुषत्वमुपागताः ।। १९ ।।

ये तुम्हारे आठ पुत्र महातेजस्वी महाभाग वसु देवता हैं। वसिष्ठजीके शाप-दोषसे येमनुष्य-योनिमें आये थे ।। १९ ।।

तेषां जनयिता नान्यस्त्वदृते भुवि विद्यते ।

मद्विधा मानुषी धात्री लोके नास्तीह काचन ।। २० ।।

तुम्हारे सिवा दूसरा कोई राजा इस पृथ्वीपर ऐसा नहीं था, जो उन वसुओंका जनक होसके। इसी प्रकार इस जगतमें मेरी-जैसी दूसरी कोई मानवी नहीं है, जो उन्हें गर्भमें धारणकर सके ।। २० ।।

तस्मात् तज्जननीहेतोर्मानुषत्वमुपागता ।

जनयित्वा वसूनष्टौ जिता लोकास्त्वयाक्षयाः ।। २१ ।।

अतः इन वसुओंकी जननी होनेके लिये मैं मानवशरीर धारण करके आयी थी। राजन्!तुमने आठ वसुओंको जन्म देकर अक्षय लोक जीत लिये हैं ।। २१ ।।

देवानां समयस्त्वेष वसूनां संश्रुतो मया।

जातं जातं मोक्षयिष्ये जन्मतो मानुषादिति ।। २२ ।।

वसु देवताओंकी यह शर्त थी और मैंने उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली थी कि जो-जोवसु जन्म लेगा, उसे मैं जन्मते ही मनुष्य-योनिसे छुटकारा दिला दूँगी ।। २२ ।।

तत् ते शापाद् विनिर्मुक्ता आपवस्य महात्मनः ।

स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि पुत्रं पाहि महाक्रतम् ।। २३ ।।

इसलिये अब वे वसु महात्मा आपव (वसिष्ठ)-के शापसे मुक्त हो चुके हैं। तुम्हाराकल्याण हो, अब मैं जाऊँगी। तुम इस महान् व्रतधारी पुत्रका पालन करो ।। २३ ।।

(अयं तव सुतस्तेषां वीर्येण कुलनन्दनः ।

सम्भूतोऽति जनानन्यान् भविष्यति न संशयः ।। )

यह तुम्हारा पुत्र सब वसुओंके पराक्रमसे सम्पन्न होकर अपने कुलका आनन्द बढ़ानेकेलिये प्रकट हुआ है। इसमें संदेह नहीं कि यह बालक बल और पराक्रममें दूसरे सब लोगोंसेबढ़कर होगा।एष पर्यायवासो मे वसूनां संनिधौ कृतः ।मत्प्रसूतिं विजानीहि गङ्गादत्तमिमं सुतम् ।। २४ ।।

यह बालक वसुओंमेंसे प्रत्येकके एक-एक अंशका आश्रय है– सम्पूर्ण वसुओंके अंशसे इसकी उत्पत्ति हुई है। मैंने तुम्हारे लिये वसुओंके समीप प्रार्थना की थी कि ‘राजाका एकपुत्र जीवित रहे’। इसे मेरा बालक समझना और इसका नाम ‘गंगादत्त’ रखना ।। २४ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मोत्पत्तावष्टनवतितमोऽध्यायः ।।९८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्मोत्पत्तिविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९८ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २८ श्लोक हैं)

नवनवतितमोऽध्यायः

महर्षि वसिष्ठद्वारा वसुओंको शाप प्राप्त होनेकी कथा

शान्तनुरुवाच

आपवो नाम को न्वेष वसूनां किं च दुष्कृतम् ।

यस्याभिशापात् ते सर्वे मानुषीं योनिमागताः ।। १ ।।

शान्तनुने पूछा-देवि! ये आपव नामके महात्मा कौन हैं? और वसुओंका क्याअपराध था, जिससे आपवके शापसे उन सबको मनुष्य-योनिमें आना पड़ा ।। १ ।।

अनेन च कुमारेण त्वया दत्तेन किं कृतम् ।

यस्य चैव कृतेनायं मानुषेषु निवत्स्यति ।। २ ।।

और तुम्हारे दिये हुए इस पुत्रने कौन-सा कर्म किया है, जिसके कारण यह मनुष्यलोकमें निवास करेगा ।। २ ।।

ईशा वै सर्वलोकस्य वसवस्ते च वै कथम् ।

मानुषेषूदपद्यन्त तन्ममाचक्ष्व जाह्ववि ।। ३ ।।

जाह्नवि! वसु तो समस्त लोकोंके अधीश्वर हैं, वे कैसे मनुष्यलोकमें उत्पन्न हुए? यहसब बात मुझे बताओ ।। ३ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्ता तदा गङ्गा राजानमिदमब्रवीत् ।

भर्तारं जाह्ववी देवी शान्तनुं पुरुषर्षभ ।। ४ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-नरश्रेष्ठ जनमेजय! अपने पति राजा शान्तनुके इस प्रकारपूछनेपर जह्नुपुत्री गंगादेवीने उनसे इस प्रकार कहा ।। ४ ।।

गङ्गोवाच

यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भरतसत्तम।

वसिष्ठनामा स मुनिः ख्यात आपव इत्युत ।। ५ ।।

गंगा बोलीं-भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालमें वरुणने जिन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त किया था , वे वसिष्ठनामक मुनि ही ‘आपव’ नामसे विख्यात हैं ।। ५ ।।

तस्याश्रमपदं पुण्यं मृगपक्षिसमन्वितम् ।

मेरोः पार्श्वे नगेन्द्रस्य सर्वर्तुकुसुमावृतम् ।। ६ ।।

गिरिराज मेरुके पार्श्वभागमें उनका पवित्र आश्रम है; जो मृग और पक्षियोंसे भरा रहताहै। सभी ऋतुओं में विकसित होनेवाले फूल उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते हैं ।। ६ ।।

स वारुणिस्तपस्तेपे तस्मिन् भरतसत्तम ।

वने पुण्यकृतां श्रेष्ठः स्वादुमूलफलोदके ।। ७ ।।

भरतवंशशिरोमणे! उस वनमें स्वादिष्ट फल, मूल और जलकी सुविधा थी, पुण्यवानोंमेंश्रेष्ठ वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठ उसीमें तपस्या करते थे ।। ७ ।।

दक्षस्य दुहिता या तु सुरभीत्यभिशब्दिता ।

गां प्रजाता तु सा देवी कश्यपाद् भरतर्षभ ।। ८ ।।

महाराज! दक्ष प्रजापतिकी पुत्रीने, जो देवी सुरभि नामसे विख्यात है, कश्यपजीकेसहवाससे एक गौको जन्म दिया।। ८ ।।

अनुग्रहार्थं जगतः सर्वकामदुहां वरा ।

तां लेभे गां तु धर्मात्मा होमधेनुं स वारुणिः ।। ९ ।।

वह गौ सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह करनेके लिये प्रकट हुई थी तथा समस्त कामनाओंकोदेनेवालोंमें श्रेष्ठ थी। वरुणपुत्र धर्मात्मा वसिष्ठने उस गौको अपनी होमधेनुके रूपमें प्राप्तकिया ।। ९ ।।

सा तस्मिंस्तापसारण्ये वसन्ती मुनिसेविते ।

चचार पुण्ये रम्ये च गौरपेतभया तदा । १० ।।

वह गौ मुनियोंद्वारा सेवित उस पवित्र एवं रमणीय तापसवनमें रहती हुई सब ओरनिर्भय होकर चरती थी ।। १० ।।

अथ तद् वनमाजग्मुः कदाचिद् भरतर्षभ।

पृथ्वाद्या वसवः सर्वे देवा देवर्षिसेवितम् ।। ११ ।।

भरतश्रेष्ठ! एक दिन उस देवर्षिसेवित वनमें पृथु आदि वसु तथा सम्पूर्ण देवतापधारे ।। ११ ।।

ते सदारा वनं तच्च व्यचरन्त समन्ततः ।

रेमिरे रमणीयेषु पर्वतेषु वनेषु च ।। १२ ।।

वे अपनी स्त्रियोंके साथ उस वनमें चारों ओर विचरने तथा रमणीय पर्वतों और वनोंमेंरमण करने लगे ।। १२ ।।

तत्रैकस्याथ भार्या तु वसोर्वासवविक्रम ।

संचरन्ती वने तस्मिन् गां ददर्श सुमध्यमा ।। १३ ।।

इन्द्रके समान पराक्रमी महीपाल! उन वसुओंमेंसे एककी सुन्दरी पत्नीने उस वनमेंघूमते समय उस गौको देखा ।। १३ ।।

नन्दिनीं नाम राजेन्द्र सर्वकामधुगुत्तमाम् ।

सा विस्मयसमाविष्टा शीलद्रविणसम्पदा ।। १४ ।।

राजेन्द्र! सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवालोंमें उत्तम नन्दिनी नामवाली उस गायको देखकरउसकी शीलसम्पत्तिसे वह वसुपत्नी आश्चर्यचकित हो उठी ।। १४ ।।

द्यवे वै दर्शयामास तां गां गोवृषभेक्षण ।

आपीनां च सुदोग्ध्रीं च सुवालधिखुरां शुभाम् ।। १५ ।।

उपपन्नां गुणैः सर्वैः शीलेनानुत्तमेन च ।

एवंगुणसमायुक्तां वसवे वसुनन्दिनी ।। १६ ।।

दर्शयामास राजेन्द्र पुरा पौरवनन्दन ।

द्यौस्तदा तां तु दृष्ट्वैव गां गजेन्द्रेन्द्रविक्रम ।। १७ ।।

उवाच राजंस्तां देवीं तस्या रूपगुणान् वदन् ।

एषा गौरुत्तमा देवी वारुणेरसितेक्षणा ।। १८ ।।

ऋषेस्तस्य वरारोहे यस्येदं वनमुत्तमम् ।

अस्याः क्षीरं पिबेन्मत्त्यः स्वादु यो वै सुमध्यमे ।। १९ ।।

दशवर्षसहस्राणि स जीवेत् स्थिरयौवनः ।

एतच्छुत्वा तु सा देवी नृपोत्तम सुमध्यमा ।। २० ।।

तमुवाचानवद्याङ्गी भर्तारं दीप्ततेजसम् ।

अस्ति मे मानुषे लोके नरदेवात्मजा सखी ।। २१ ।।

वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले महाराज! उस देवीने द्यो नामक वसुको वह शुभ गायदिखायी, जो भलीभाँति हृष्ट-पुष्ट थी। दूधसे भरे हुए उसके थन बड़े सुन्दर थे, पूँछ और खुरभी बहुत अच्छे थे। वह सुन्दर गाय सभी सद्गुणोंसे सम्पन्न और सर्वोत्तम शील- स्वभावसेयुक्त थी। पूरुवंशका आनन्द बढ़ानेवाली सम्राट्! इस प्रकार पूर्वकालमें वसुका आनन्दबढ़ानेवाली देवीने अपने पति वसुको ऐसे सद्गुणोंवाली गौका दर्शन कराया। गजराजकेसमान पराक्रमी महाराज! द्योने उस गायको देखते ही उसके रूप और गुणोंका वर्णन करतेहुए अपनी पत्नीसे कहा-‘यह कजरारे नेत्रोंवाली उत्तम गौ दिव्य है। वरारोहे! यह उनवरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठकी गाय है, जिनका यह उत्तम तपोवन है। सुमध्यमे! जो मनुष्यइसका स्वादिष्ट दूध पी लेगा, वह दस हजार वर्षोंतक जीवित रहेगा और उतने समयतकउसकी युवावस्था स्थिर रहेगी।’ नृपश्रेष्ठ! सुन्दर कटि-प्रदेश और निर्दोष अंगोंवाली वह देवीयह बात सुनकर अपने तेजस्वी पतिसे बोली – ‘प्राणनाथ! मनुष्यलोकमें एक राजकुमारीमेरी सखी है’ ।। १५-२१ |।

नाम्ना जितवती नाम रूपयौवनशालिनी ।

उशीनरस्य राजर्षेः सत्यसंधस्य धीमतः ॥ २२ ॥

दुहिता प्रथिता लोके मानुषे रूपसम्पदा ।

तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां ममेप्सिताम् ।। २३ ।।

‘उसका नाम है जितवती। वह सुन्दर रूप और युवावस्थासे सुशोभित है । सत्यप्रतिज्ञबुद्धिमान् राजर्षि उशीनरकी पुत्री है। रूपसम्पत्तिकी दृष्टिसे मनुष्यलोकमें उसकी बड़ीख्याति है। महाभाग! उसीके लिये बछड़ेसहित यह गाय लेनेकी मेरी बड़ी इच्छाहै ।। २२-२३ ।।

आनयस्वामरश्रेष्ठ त्वरितं पुण्यवर्धन ।

यावदस्याः पयः पीत्वा सा सखी मम मानद ।। २४ ।।

मानुषेषु भवत्वेका जरारोगविवर्जिता ।

एतन्मम महाभाग कर्तुमर्हस्यनिन्दित । २५ ।।

‘सुरश्रेष्ठ! आप पुण्यकी वृद्धि करनेवाले हैं। इस गायको शीघ्र ले आइये। मानद!जिससे इसका दूध पीकर मेरी वह सखी मनुष्यलोकमें अकेली ही जरावस्था एवं रोग-व्याधिसे बची रहे। महाभाग! आप निन्दारहित हैं; मेरे इस मनोरथको पूर्णकीजिये ।। २४-२५ ।।

प्रियं प्रियतरं ह्यस्मान्नास्ति मेऽन्यत् कथंचन ।

एतच्छ्रृत्वा वचस्तस्या देव्याः प्रियचिकीर्षया ।। २६ ।।

पृथ्वाद्यैभ्भ्रातृभिः सार्धं द्यौस्तदा तां जहार गाम् ।

तया कमलपत्राक्ष्या नियुक्तो द्यौस्तदा नृप ।। २७ ।।

ऋषेस्तस्य तपस्तीव्रं न शशाक निरीक्षितुम् ।

हृता गौः सा सदा तेन प्रपातस्तु न त्कितः ।। २८ ।।

‘मेरे लिये किसी तरह भी इससे बढ़कर प्रिय अथवा प्रियतर वस्तु दूसरी नहीं है।’

उस देवीका यह वचन सुनकर उसका प्रिय करनेकी इच्छासे द्यो नामक वसुने पृथुआदि अपने भाइयोंकी सहायतासे उस गौका अपहरण कर लिया। राजन्! कमलदलकेसमान विशाल नेत्रोंवाली पत्नीसे प्रेरित होकर द्योने गौका अपहरण तो कर लिया; परंतु उससमय उन महर्षि वसिष्ठकी तीव्र तपस्याके प्रभावकी ओर वे दृष्टिपात नहीं कर सके और नयही सोच सके कि ऋषिके कोपसे मेरा स्वर्गसे पतन हो जायगा ।। २६ – २८ ।।

अथाश्रमपदं प्राप्तः फलान्यादाय वारुणिः ।

न चापश्यत् स गां तत्र सवत्सां काननोत्तमे ।। २९ ।।

कुछ समयके बाद वरुणनन्दन वसिष्ठजी फल-मूल लेकर आश्रमपर आये; परंतु उससुन्दर काननमें उन्हें बछड़ेसहित अपनी गाय नहीं दिखायी दी।। २९ ।।

ततः स मृगयामास वने तस्मिंस्तपोधनः ।

नाध्यगच्छच्च मृगयंस्तां गां मुनिरुदारधीः ।॥ ३० ।।

तब तपोधन वसिष्ठजी उस वनमें गायकी खोज करने लगे; परंतु खोजनेपर भी वेउदारबुद्धि महर्षि उस गायको न पा सके ।। ३० ।।

ज्ञात्वा तथापनीतां तां वसुभिर्दिव्यदर्शनः ।

ययौ क्रोधवशं सद्यः शशाप च वसूंस्तदा ।। ३१ ।।

तब उन्होंने दिव्य दृष्टिसे देखा और यह जान गये कि वसुओंने उसका अपहरण कियाहै। फिर तो वे क्रोधके वशीभूत हो गये और तत्काल वसुओंको शाप दे दिया-।। ३१ ।।

यस्मान्मे वसवो जहुर्गा वै दोग्ध्रीं सुवालधिम् ।

तस्मात् सर्वे जनिष्यन्ति मानुषेषु न संशयः ।। ३२ ।।

‘वसुओंने सुन्दर पूँछवाली मेरी कामधेनु गायका अपहरण किया है, इसलिये वे सब -के-सब मनुष्य-योनिरें जन्म लेंगे, इसमें संशय नहीं है’ ।। ३२ ।।

एवं शशाप भगवान् वसूंस्तान् भरतर्षभ ।

वशं क्रोधस्य सम्प्राप्त आपवो मुनिसत्तमः ।। ३३ ।।

भरतर्षभ! इस प्रकार मुनिवर भगवान् वसिष्ठने क्रोधके आवेशमें आकर उन वसुओंको शाप दिया ।। ३३ ।।

शप्त्वा च तान् महाभागस्तपस्येव मनो दधे ।

एवं स शप्तवान् राजन् वसूनष्टौ तपोधनः ।। ३४ ।।

महाप्रभावो ब्रह्मर्षिर्देवान् क्रोधसमन्वितः ।

अथाश्रमपदं प्राप्तास्ते वै भूयो महात्मनः ।। ३५ ।।

शप्ताः स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमुः ।

प्रसादयन्तस्तमृषिं वसवः पार्थिवर्षभ ।। ३६ । ।

लेभिरे न च तस्मात् ते प्रसादमृषिसत्तमात् ।

आपवात् पुरुषव्याघ्र सर्वधर्मविशारदात् ।। ३७ ।।

उन्हें शाप देकर उन महाभाग महर्षिने फिर तपस्यामें ही मन लगाया। राजन्! धनी ब्रह्मर्षि वसिष्ठका प्रभाव बहुत बड़ा है। इसीलिये उन्होंने क्रोधमें भरकर देवता होनेपर भी उन आठों वसुओंको शाप दे दिया। तदनन्तर हमें शाप मिला है, यह जानकर वे वसु पुनः महामना वसिष्ठके आश्रमपर आये और उन महर्षिको प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगे। नृपश्रेष्ठ! महर्षि आपव समस्त धर्मोंके ज्ञानमें निपुण थे। महाराज ! उनको प्रसन्न करनेकी पूरी चेष्टा करने-पर भी वे वसु उन मुनिश्रेष्ठसे उनका कृपाप्रसाद न पा सके ।। ३४-३७ ।।

उवाच च स धर्मात्मा शप्ता यूयं धरादयः ।

अनुसंवत्सरात् सर्वे शापमोक्षमवाप्स्यथ ।। ३८ ।।

उस समय धर्मात्मा वसिष्ठने उनसे कहा- ‘मैंने धर आदि तुम सभी वसुओंको शाप दे दिया है; परंतु तुमलोग तो प्रति वर्ष एक-एक करके सब-के-सब शापसे मुक्त हो जाओगे ।। ३८ ।।

अयं तु यत्कृते यूयं मया शप्ताः स वत्स्यति ।

द्यौस्तदा मानुषे लोके दीर्घकालं स्वकर्मणा ।। ३९ ।।

‘किंतु यह द्यो, जिसके कारण तुम सबको शाप मिला है, मनुष्यलोकमें अपने कर्मानुसार दीर्घकालतक निवास करेगा ।। ३९ ।।

नानृतं तच्चिकीर्षामि क्रुद्धो युष्मान् यदब्रुवम्

न प्रजास्यति चाप्येष मानुषेषु महामनाः ।। ४० ।।

तपस्याके’मैंने क्रोधरमें आकर तुमलोगोंसे जो कुछ कहा है, उसे असत्य करना नहीं चाहता। येमहामना द्यो मनुष्यलोकमें संतानकी उत्पत्ति नहीं करेंगे ।। ४० ।।

भविष्यति च धर्मात्मा सर्वशास्त्रविशारदः ।

पितुः प्रियहिते युक्तः स्त्रीभोगान् वर्जयिष्यति ।। ४१ ।।

‘और धर्मात्मा तथा सब शास्त्रोंमें निपुण विद्वान् होंगे; पिताके प्रिय एवं हितमें तत्पररहकर स्त्री-सम्बन्धी भोगोंका परित्याग कर देंगे’ ।। ४१ ।।

एवमुक्त्वा वसून् सर्वान् स जगाम महानृषिः ।

ततो मामुपजग्मुस्ते समेता वसवस्तदा ।। ४२ ।।

उन सब वसुओंसे ऐसी बात कहकर वे महर्षि वहाँसे चल दिये। तब वे सब वसु एकत्रहोकर मेरे पास आये ।। ४२ ।।

अयाचन्त च मां राजन् वरं तच्च मरया कृतम् ।

जाताञ्जातान् प्रक्षिपास्मान् स्वयं गङ्गे त्वमम्भसि ।। ४३ ।।

राजन्! उस समय उन्होंने मुझसे याचना की और मैंने उसे पूर्ण किया। उनकी याचनाइस प्रकार थी-गंगे! हम ज्यों-ज्यों जन्म लें, तुम स्वयं हमें अपने जलमें डालदेना’ ।। ४३ ।।

एवं तेषामहं सम्यक् शप्तानां राजसत्तम् ।

मोक्षार्थं मानुषाल्लोकाद् यथावत् कृतवत्यहम् ।। ४४ ।।

राजशिरोमणे! इस प्रकार उन शापग्रस्त वसुओंको इस मनुष्यलोकसे मुक्त करनेकेलिये मैंने यथावत् प्रयत्न किया है ।। ४४ ।।

अयं शापादृषेस्तस्य एक एव नृपोत्तम ।

द्यौ राजन् मानुषे लोके चिरं वत्स्यति भारत ।। ४५ ।।

भारत! नृपश्रेष्ठ! यह एकमात्र द्यो ही महर्षिके शापसे दीर्घकालतक मनुष्यलोकमेंनिवास करेगा ।। ४५ ।।

(अयं देवव्रतश्चैव गङ्गादत्तश्च में सुतः ।

द्विनामा शान्तनोः पुत्रः शान्तनोरधिको गुणैः ।।

अयं कुमारः पुत्रस्ते विवृद्धः पुनरेष्यति ।

अहं च ते भविष्यामि आह्वानोपगता नृप ।।)

राजन्! मेरा यह पुत्र देवव्रत और गंगादत्त- दो नामोंसे विख्यात होगा। आपका बालकगुणोंमें आपसे भी बढ़कर होगा। (अच्छा, अब जाती हूँ) आपका यह पुत्र अभी शिशु-अवस्थामें है। बड़ा होनेपर फिर आपके पास आ जायगा और आप जब मुझे बुलायेंगे तभीमैं आपके सामने उपस्थित हो जाऊँगी।

वैशम्पायन उवाच

एतदाख्याय सा देवी तत्रैवान्तरधीयत ।

आदाय च कुमारं तं जगामाथ यथेप्सितम् ।। ४६ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! ये सब बातें बताकर गंगादेवी उस नवजातशिशुको साथ ले वहीं अन्तर्धान हो गयीं और अपने अभीष्ट स्थानको चली गयीं ।। ४६ ।।

स तु देवव्रतो नाम गाङ्गेय इति चाभवत्।

द्युनामा शान्तनोः पुत्रः शान्तनोरधिको गुणैः ।। ४७ ।।

उस बालकका नाम हुआ देवव्रत। कुछ लोग गांगेय भी कहते थे। द्यु नामवाले वसुशान्तनुके पुत्र होकर गुणोंमें उनसे भी बढ़ गये।। ४७ ।।

शान्तनुश्चापि शोकात्तो जगाम स्वपुरं ततः ।

तस्याहं कीर्तयिष्यामि शान्तनोरधिकान् गुणान् ।। ४८ ।।

इधर शान्तनु शोकसे आतुर हो पुनः अपने नगरको लौट गये। शान्तनुके उत्तम गुणोंकामैं आगे चलकर वर्णन करूँगा ।। ४८ ।।

महाभाग्यं च नृपतेर्भारतस्य महात्मनः ।

यस्येतिहासो द्युतिमान् महाभारतमुच्यते ।। ४९ ।।

उन भरतवंशी महात्मा नरेशके महान् सौभाग्यका भी मैं वर्णन करूँगा, जिनकाउज्ज्वल इतिहास ‘महाभारत’ नामसे विख्यात है ।। ४९ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि आपवोपाख्याने नवनवतितमोऽध्यायः। ९९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें आपवोपाख्यानविषयक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९९ I।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५१ श्लोक हैं)

*’द्यु’ का ही नाम ‘द्यो’ है, जैसा कि पहले कई बार आ चुका है।

शततमोऽध्यायः

शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीकेद्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा

वैशम्पायन उवाच

स राजा शान्तनुर्धींमान् देवराजर्षिसत्कृतः ।

धर्मात्मा सर्वलोकेषु सत्यवागिति विश्रुतः ।। १ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! राजा शान्तनु बड़े बुद्धिमान् थे; देवता तथाराजर्षि भी उनका सत्कार करते थे। वे धर्मात्मा नरेश सम्पूर्ण जगत्में सत्यवादीके रूपमेंविख्यात थे ।। १ ।।

दमो दानं क्षमा बुद्धिह्ीर्धृतिस्तेज उत्तमम् ।

नित्यान्यासन् महासत्त्वे शान्तनौ पुरुषर्षभे ।। २ ।।

उन महाबली नरश्रेष्ठ शान्तनुमें इन्द्रियसंयम, दान, क्षमा, बुद्धि, लज्जा, धैर्य तथा उत्तमतेज आदि सद्गुण सदा विद्यमान थे ।। २ ।।

एवं स गुणसम्पन्नो धर्मार्थकुशलो नृपः ।

आसीद् भरतवंशस्य गोप्ता सर्वजनस्य च ।। ३ ।।

इस प्रकार उत्तम गुणोंसे सम्पन्न एवं धर्म और अर्थके साधनमें कुशल राजा शान्तनुभरतवंशका पालन तथा सम्पूर्ण प्रजाकी रक्षा करते थे ।। ३ ।।

कम्बुग्रीवः पृथुव्यंसो मत्तवारणविक्रमः ।

अन्वितः परिपूर्णार्थेः सर्वैर्नृपतिलक्षणैः ।। ४ ।।

उनकी ग्रीवा शंखके समान शोभा पाती थी। कंधे विशाल थे। वे मतवाले हाथीके समानपराक्रमी थे। उनमें सभी राजोचित शुभ लक्षण पूर्ण सार्थक होकर निवास करते थे ।। ४ ।।

तस्य कीर्तिमतो वृत्तमवेक्ष्म सततं नराः।

धर्म एव परः कामादर्थाच्चेति व्यवस्थिताः ।। ५ ।।

उन यशस्वी महाराजके धर्मपूर्ण सदाचारको देखकर सब मनुष्य सदा इसी निश्चयपरपहुँचे थे कि काम और अर्थसे धर्म ही श्रेष्ठ है ।। ५ ।।

एतान्यासन् महासत्त्वे शान्तनौ पुरुषर्षभे ।

न चास्य सदृशः कश्चिद् धर्मतः पार्थिवोऽभवत् ।। ६ ।।

महान् शक्तिशाली पुरुषश्रेष्ठ शान्तनुमें ये सभी सद्गुण विद्यमान थे। उनके समानधर्मपूर्वक शासन करनेवाला दूसरा कोई राजा नहीं था।। ६ । ।

वर्तमानं हि धर्मेषु सर्वधर्मभृतां वरम् ।

तं महीपा महीपालं राजराज्येऽभ्यषेचयन् ।। ७ ।।

वे धर्ममें सदा स्थिर रहनेवाले और सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे; अतः समस्तराजाओंने मिलकर राजा शान्तनुको राजराजेश्वर (सम्राट्)-के पदपर अभिषिक्त करदिया ।। ७ ।।

वीतशोकभयाबाधाः सुखस्वप्ननिबोधनाः ।

पतिं भारत गोप्तारं समपद्यन्त भूमिपाः ।। ८ ।।

जनमेजय! जब सब राजाओंने शान्तनुको अपना स्वामी तथा रक्षक बना लिया, तबकिसीको शोक, भय और मानसिक संताप नहीं रहा। सब लोग सुखसे सोने और जागनेलगे ।। ८ ।।

तेन कीर्तिमता शिष्टाः शक्रप्रतिमतेजसा।

यज्ञदानक्रियाशीलाः समपद्यन्त भूमिपाः ।। ९ ।।

इन्द्रके समान तेजस्वी और कीर्तिशाली शान्तनुके शासनमें रहकर अन्य राजालोग भीदान और यज्ञ कर्मोंमें स्वभावतः प्रवृत्त होने लगे ।। ९ ।।

शान्तनुप्रमुखैर्गुप्ते लोके नृपतिभिस्तदा ।

नियमात् सर्ववर्णानां धर्मोत्तरमवर्तत ।। १० ।।

उस समय शान्तनुप्रधान राजाओंद्वारा सुरक्षित जगत्में सभी वर्णोंके लोग नियमपूर्वकप्रत्येक बर्तावमें धर्मको ही प्रधानता देने लगे ।। १० ।।

ब्रह्म पर्यचरत् क्षत्रं विशः क्षत्रमनुव्रताः ।

ब्रह्मक्षत्रानुरक्ताश्च शूद्राः पर्यचरन् विशः ।। ११ ।।

क्षत्रियलोग ब्राह्मणोंकी सेवा करते, वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रियोंमें अनुरक्त रहते तथा शूद्रब्राह्मण और क्षत्रियोंमें अनुराग रखते हुए वैश्योंकी सेवामें तत्पर रहते थे ।। ११ ।।

स हास्तिनपुरे रम्ये कुरूणां पुटभेदने ।

वसन् सागरपर्यन्तामन्वशासद् वसुन्धराम् ।। १२ ।।

महाराज शान्तनु कुरुवंशकी रमणीय राजधानी हस्तिनापुरमें निवास करते हुएसमुद्रपर्यन्त पृथ्वीका शासन और पालन करते थे ।। १२ ।।

स देवराजसदृशो धर्मज्ञः सत्यवागृजुः ।

दानधर्मतपोयोगाच्छ्रिया परमया युतः ।। १३ ।।

वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी, धर्मज्ञ, सत्यवादी तथा सरल थे। दान, धर्म औरतपस्या तीनोंके योगसे उनमें दिव्य कान्तिकी वृद्धि हो रही थी ।। १३ ।।

अरागद्वेषसंयुक्तः सोमवत् प्रियदर्शनः ।

तेजसा सूर्यकल्पोऽभूद् वायुवेगसमो जवे ।

अन्तकप्रतिमः कोपे क्षमया पृथिवीसमः ।। १४ ।।

उनमें न राग था न द्वेष। चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सबको प्यारा लगता था। वेतेजमें सूर्य और वेगमें वायुके समान जान पड़ते थे; क्रोधमें यमराज और क्षमामें पृथ्वीकीसमानता करते थे ।। १४ ।।

वधः पशुवराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम् ।

शान्तनौ पृथिवीपाले नावर्तत तथा नृप ।। १५ ।।

जनमेजय! महाराज शान्तनुके इस पृथ्वीका पालन करते समय पशुओं, वराहों, मृगोंतथा पक्षियोंका वध नहीं होता था ।। १५ ।।

ब्रह्मधर्मोत्तरे राज्ये शान्तनुर्विनयात्मवान् ।

समं शशास भूतानि कामरागविवर्जितः ।। १६ ।।

उनके राज्यमें ब्रह्म और धर्मकी प्रधानता थी। महाराज शान्तनु बड़े विनयशील तथाकाम-राग आदि दोषोंसे दूर रहनेवाले थे। वे सब प्राणियोंका समानभावसे शासन करतेथे ।। १६ ।।

देवर्षिपितृयज्ञार्थमारभ्यन्त तदा क्रियाः ।

न चाधर्मेण केषांचित् प्राणिनामभवद् वधः ।। १७ ।।

उन दिनों देवयज्ञ, ऋषियज्ञ तथा पितृयज्ञके लिये कर्मोंका आरम्भ होता था। अधर्मकाभय होनेके कारण किसी भी प्राणीका वध नहीं किया जाता था ।। १७ ।।

असुखानामनाथानां तिर्यग्योनिषु वर्तताम् ।

स एव राजा सर्वेषां भूतानामभवत् पिता ।। १८ ।।

दुःखी, अनाथ एवं पशु-पक्षीकी योनिमें पड़े हुए जीव-इन सब प्राणियोंका वे राजाशान्तनु ही पिताके समान पालन करते थे ।। १८ ।।

तस्मिन् कुरुपतिश्रेष्ठे राजराजेश्वरे सति ।

श्रिता वागभवत् सत्यं दानधर्माश्रितं मनः । १९ ।।

कुरुवंशी नरेशोंमें श्रेष्ठ राजराजेश्वर शान्तनुके शासन-कालमें सबकी वाणी सत्यकेआश्रित थी-सभी सत्य बोलते थे और सबका मन दान एवं धर्ममें लगता था ।। १९ ।।

स समाः षोडशाष्टौ च चतस्रोऽष्टौ तथापराः ।

रतिमप्राप्नुवन् स्त्रीषु बभूव वनगोचरः ।। २० ।।

राजा शान्तनु सोलह, आठ, चार और आठ कुल छत्तीस वर्षोंतक स्त्रीविषयकअनुरागका अनुभव न करते हुए वनमें रहे ।। २० ।।

तथारूपस्तथाचारस्तथावृत्तस्तथाश्रुतः ।

गाङ्गेयस्तस्य पुत्रोऽभून्नाम्ना देवव्रतो वसुः ।। २१ ।।

वसुके अवतारभूत गांगेय उनके पुत्र हुए, जिनका नाम देवव्रत था। वे पिताके समान हीरूप, आचार, व्यवहार तथा विद्यासे सम्पन्न थे ।। २१ ।।

सर्वास्त्रेषु स निष्णातः पार्थिवेष्वितरेषु च ।

महाबलो महासत्त्वो महावीर्यों महारथः ॥ २२ ।

लौकिक और अलौकिक सब प्रकारके अस्त्रशस्त्रोंकी कलामें वे पारंगत थे। उनके बल,सत्त्व (धैर्य) तथा वीर्य (पराक्रम) महान् थे। वे महारथी वीर थे ।। २२ ।।

स कदाचिन्मृगं विद्ध्वा गङ्गामनुसरन् नदीम् ।

भागीरथीमल्पजलां शान्तनुर्दृष्टवान् नृपः ।। २३ ।।

एक समय किसी हिंसक पशुको बाणोंसे बींधकर राजा शान्तनु उसका पीछा करते हुएभागीरथी गंगाके तटपर आये। उन्होंने देखा कि गंगाजीमें बहुत थोड़ा जल रह गयाहै ।। २३ ।।

तां दृष्ट्वा चिन्तयामास शान्तनुः पुरुषर्षभः ।

स्वन्दते किं त्वियं नाद्य सरिच्छ्रेष्ठा यथा पुरा ।। २४ ।।

उसे देखकर पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज शान्तनु इस चिन्तामें पड़ गये कि यह सरिताओंमेंश्रेष्ठ देवनदी आज पहलेकी तरह क्यों नहीं बह रही है ।। २४ ।।

ततो निमित्तमन्विच्छन् ददर्श स महामनाः ।

कुमारं रूपसम्पन्नं बृहन्तं चारुदर्शनम् ।। २५ ।।

दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं यथा देवं पुरन्दरम् ।

कृत्स्नां गङ्गां समावृत्य शरैस्तीक्ष्णैरवस्थितम् ।। २६ ।।

तदनन्तर उन महामना नरेशने इसके कारणका पता लगाते हुए जब आगे बढ़कर देखा,तब मालूम हुआ कि एक परम सुन्दर मनोहर रूपसे सम्पन्न विशालकाय कुमार देवराजइन्द्रके समान दिव्यास्त्रका अभ्यास कर रहा है और अपने तीखे बाणोंसे समूची गंगाकीधाराको रोककर खड़ा है ।। २५-२६ ।।

तां शरैराचितां दृष्ट्वा नदीं गङ्गां तदन्तिके ।

अभवद् विस्मितो राजा दृष्ट्वा कर्मातिमानुषम् । । २७ ।।

राजाने उसके निकटकी गंगा नदीको उसके बाणोंसे व्याप्त देखा। उस बालकका यहअलौकिक कर्म देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ।। २७ ।।

जातमात्रं पुरा दृष्ट्वा तं पुत्रं शान्तनुस्तदा।

नोपलेभे स्मृतिं धीमानभिज्ञातुं तमात्मजम् ।। २८ ।।

शान्तनुने अपने पुत्रको पहले पैदा होनेके समय ही देखा था ; अतः उन बुद्धिमान्नरेशको उस समय उसकी याद नहीं आयी; इसीलिये वे अपने ही पुत्रको पहचान नसके ।। २८ ।।

स तु तं पितरं दृष्ट्वा मोहयामास मायया ।

सम्मोह्य तु ततः क्षिप्रं तत्रैवान्तरधीयत । २९ ।।

बालकने अपने पिताको देखकर उन्हें मायासे मोहित कर दिया और मोहित कर दियाऔर मोहित करके शीघ्र वहीं अन्तर्धान हो गया ।। २९ ।।

तदद्भुतं ततो दृष्ट्वा तत्र राजा स शान्तनुः ।

शङ्कमानः सुतं गङ्गामब्रवीद् दर्शयेति ह ।। ३० ।।

यह अद्भुत बात देखकर राजा शान्तनुको कुछ संदेह हुआ और उन्होंने गंगासे अपनेपुत्रको दिखानेको कहा ।। ३० ।।

दर्शयामास तं गङ्गा बिभ्रती रूपमुत्तमम् ।

गृहीत्वा दक्षिणे पाणौ तं कुमारमलंकृतम् ॥ ३१ ।।

तब गंगाजी परम सुन्दर रूप धारण करके अपने पुत्रका दाहिना हाथ पकड़े सामनेआयीं और दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कुमार देवव्रतको दिखाया ।। ३१ ।।

अलंकृतामाभरणैर्विरजोऽम्बरसंवृताम् ।

दृष्टपूर्वामपि स तां नाभ्यजानात् स शान्तनुः ।। ३२ ।।

गंगा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत हो स्वच्छ सुन्दर साड़ी पहने हुई थीं। इससे उनकाअनुपम सौन्दर्य इतना बढ़ गया था कि पहलेकी देखी होनेपर भी राजा शान्तनु उन्हें पहचानन सके ।। ३२ ।।

गङ्गोवाच

यं पुत्रमष्टमं राजंस्त्वं पुरा मय्यविन्दथाः ।

स चायं पुरुषव्याघ्र सर्वास्त्रविदनुत्तमः ।। ३३ ।।

गंगाजीने कहा-महाराज! पूर्वकालमें आपने अपने जिस आठवें पुत्रको मेरे गर्भसेप्राप्त किया था, यह वही है। पुरुषसिंह ! यह सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें अत्यन्त उत्तमहै ।। ३३ ।।हि

गृहाणेमं महाराज मया संवर्धितं सुतम् ।

आदाय पुरुषव्याघ्र नयस्वैनं गृहं विभो ॥ ३४ ।।

राजन! मैंने इसे पाल-पोसकर बड़ा कर दिया है। अब आप अपने इस पुत्रको ग्रहणकीजिये। नरश्रेष्ठ! स्वामिन्! इसे घर ले जाइये ।। ३४ ।।

वेदानधिजगे साङ्गान् वसिष्ठादेष वीर्यवान् ।

कृतास्त्रः परमेष्वासो देवराजसमो युधि ।। ३५ ।।

आपका यह बलवान् पुत्र महर्षि वसिष्ठसे छहों अंगोंसहित समस्त वेदोंका अध्ययन करचुका है। यह अस्त्र -विद्याका भी पण्डित है, महान् धनुर्धर है और युद्धमें देवराज इन्द्रकेसमान पराक्रमी है ।। ३५ ।।

सुराणां सम्मतो नित्यमसुराणां च भारत ।

उशना वेद यच्छास्त्रमयं तद् वेद सर्वशः ।। ३६ ।।

भारत! देवता और असुर भी इसका सदा सम्मान करते हैं। शुक्राचार्य जिस (नीति)शास्त्रको जानते हैं, उसका यह भी पूर्णरूपसे जानकार है ।। ३६ ।।

तथैवाङ्गिरसः पुत्रः सुरासुरनमस्कृतः ।

यद् वेद शास्त्रं तच्चापि कृत्स्नमस्मिन् प्रतिष्ठितम् ।। ३७ ।।

तव पुत्रे महाबाहौ साङ्गोपाङ्गं महात्मनि ।

ऋषिः परैरनाधृष्यो जामदग्न्यः प्रतापवान् ।। ३८ ।।

यदस्त्रं वेद रामश्च तदेतस्मिन् प्रतिष्ठितम् ।

महेष्वासमिमं राजन् राजधर्मार्थकोविदम् ।। ३९ ।।

इसी प्रकार अंगिराके पुत्र देव-दानव-वन्दित बृहस्पति जिस शास्त्रको जानते हैं, वह भीआपके इस महाबाहु महात्मा पुत्रमें अंग और उपांगोंसहित पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित है। जोदूसरोंसे परास्त नहीं होते, वे प्रतापी महर्षि जमदग्निनन्दन परशुराम जिस अस्त्र – विद्याकोजानते हैं, वह भी मेरे इस पुत्रमें प्रतिष्ठित है। वीरवर महाराज ! यह कुमार राजधर्म तथाअर्थशास्त्रका महान् पण्डित है। मेरे दिये हुए इस महाधनुर्धर वीर पुत्रको आप घर लेजाइये ।। ३७-३९।।

वैशम्पायन उवाच

(इत्युक्त्वा सा महाभागा तत्रैवान्तरधीयत ।)

मया दत्तं निजं पुत्रं वीरं वीर गृहं नय ।

तयैवं समनुज्ञातः पुत्रमादाय शान्तनुः ।। ४० ।।

भ्राजमानं यथादित्यमाययौ स्वपुरं प्रति ।

पौरवस्तु पुरी गत्वा पुरन्दरपुरोपमाम् ।। ४१ ।।

सर्वकामसमृद्धार्थं मेने सोऽऽत्मानमात्मना ।

पौरवेषु ततः पुत्रं राज्यार्थमभयप्रदम् ।। ४२ ।।

गुणवन्तं महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ।

पौरवाज्छान्तनोः पुत्रः पितरं च महायशाः ।। ४३ ।।

राष्ट्रं च रञ्जयामास वृत्तेन भरतर्षभ ।

स तथा सह पुत्रेण रममाणो महीपतिः । ४४ ।।

वर्तयामास वर्षाणि चत्वार्यमितविक्रमः ।

स कदाचिद् वनं यातो यमुनामभितो नदीम् ।। ४५ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-ऐसा कहकर महाभागा गंगादेवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं।|गंगाजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर महाराज शान्तनु सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले अपनेपुत्रको लेकर राजधानीमें आये। उनका हस्तिनापुर इन्द्रनगरी अमरावतीके समान सुन्दर था।पूरुवंशी राजा शान्तनु पुत्रसहित उसमें जाकर अपने- आपको सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्नएवं सफलमनोरथ मानने लगे। तदनन्तर उन्होंने सबको अभय देनेवाले महात्मा एवं गुणवान्पुत्रको राजकाजमें सहयोग करनेके लिये समस्त पौरवोंके बीचमें युवराज-पदपर अभिषिक्तकर दिया। जनमेजय! शान्तनुके उस महायशस्वी पुत्रने अपने आचार- व्यवहारसे पिताको,पौरवसमाजको तथा समूचे राष्ट्रको प्रसन्न कर लिया। अमितपराक्रमी राजा शान्तनुने वैसेगुणवान् पुत्रके साथ आनन्दपूर्वक रहते हुए चार वर्ष व्यतीत किये। एक दिन वे यमुनानदीके निकटवर्ती वनमें गये ।। ४०-४५ ।।

महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद् गन्धमुत्तमम् ।

तस्य प्रभवमन्विच्छन् विचचार समन्ततः ।। ४६ ।।

वहाँ राजाको अवर्णनीय एवं परम उत्तम सुगन्धका अनुभव हुआ। वे उसकेउद्गमस्थानका पता लगाते हुए सब ओर विचरने लगे ।। ४६ ।

स ददर्श तदा कन्यां दाशानां देवरूपिणीम् ।

तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्यामसितलोचनाम् ।। ४७ ।।

घूमते-घूमते उन्होंने मल्लाहोंकी एक कन्या देखी, जो देवांगनाओंके समान रूपवतीथी। श्याम नेत्रोंवाली उस कन्याको देखते ही राजाने पूछा-।। ४७ ।।

कस्य त्वमसि का चासि किं च भीरु चिकीर्षसि ।

साब्रवीद् दाशकन्यास्मि धर्मार्थं वाहये तरिम् ॥। ४८ ।।

पितुर्नियोगाद् भद्रं ते दाशराज्ञो महात्मनः।

रूपमाधुर्यगन्धैस्तां संयुक्तां देवरूपिणीम् ।। ४९ ।।

समीक्ष्य राजा दाशेयीं कामयामास शान्तनुः ।

स गत्वा पितरं तस्या वरयामास तां तदा ।। ५० ।।

‘भीरु! तू कौन है, किसकी पुत्री है और क्या करना चाहती है?’ वह बोली – ‘ राजन्!आपका कल्याण हो। मैं निषादकन्या हूँ और अपने पिता महामना निषादराजकी आज्ञासेधर्मार्थ नाव चलाती हूँ। राजा शान्तनुने रूप, माधुर्य तथा सुगन्धसे युक्त देवांगनाके तुल्यउस निषादकन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छा की। तदनन्तर उसके पिताके समीपजाकर उन्होंने उसका वरण किया ।। ४८-५० ।।

पर्यपूच्छत् ततस्तस्याः पितरं सोऽऽत्मकारणात् ।

स च तं प्रत्युवाचेदं दाशराजो महीपतिम् ।। ५१ ।।

उन्होंने उसके पितासे पूछा-‘मैं अपने लिये तुम्हारी कन्या चाहता हूँ।’ यह सुनकरनिषादराजने राजा शान्तनुको यह उत्तर दिया- ।। ५१ ।।

जातमात्रैव मे देया वराय वरवर्णिनी ।

हृदि कामस्तु मे कश्चित् तं निबोध जनेश्वर ।॥ ५२ ।।

‘जनेश्वर! जबसे इस सुन्दरी कन्याका जन्म हुआ है, तभीसे मेरे मनमें यह चिन्ता है किइसका किसी श्रेष्ठ वरके साथ विवाह करना चाहिये; किंतु मेरे हृदयमें एक अभिलाषा है,उसे सुन लीजिये ।। ५२ ।।

यदीमां धर्मपत्नीं त्वं मत्तः प्रार्थयसेऽनघ ।

सत्यवागसि सत्येन समयं कुरु मे ततः ।। ५३ ।।

‘पापरहित नरेश! यदि इस कन्याको अपनी धर्मपत्नी बनानेके लिये आप मुझसे माँग रहे हैं, तो सत्यको सामने रखकर मेरी इच्छा पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कीजिये; क्योंकि आप सत्यवादी हैं ।। ५३ ।।

समयेन प्रदद्यां ते कन्यामहमिमां नृप ।

न हि मे त्वत्समः कश्चिद् वरो जातु भविष्यति ॥ ५४ ।।

‘राजन्! मैं इस कन्याको एक शर्तके साथ आपकी सेवामें दूँगा। मुझे आपके समान दूसरा कोई श्रेष्ठ वर कभी नहीं मिलेगा’ ।। ५४ ।।

शान्तनुरुवाच

श्रुत्वा तव वरं दाश व्यवस्येयमहं तव ।

दातव्यं चेत् प्रदास्यामि न त्वदेयं कथंचन ।। ५५ ।।

शान्तनुने कहा-निषाद! पहले तुम्हारे अभीष्ट वरको सुन लेनेपर मैं उसके विषयमें कुछ निश्चय कर सकता हूँ। यदि देनेयोग्य होगा, तो दूँगा और देनेयोग्य नहीं होगा, तो कदापि नहीं दे सकता ।। ५५ ।।

दाश उवाच अस्यां जायेत यः पुत्रः स राजा पृथिवीपते ।

त्वदूर्ध्वमभिषेक्तव्यो नान्यः कश्चन पार्थिव ।। ५६ ।।

निषाद बोला-पृथ्वीपते! इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, आपके बाद उसीका राजाके पदपर अभिषेक किया जाय, अन्य किसी राजकुमारका नहीं ।। ५६ ।।

वैशम्पायन उवाच नाकामयत तं दातुं वरं दाशाय शान्तनुः ।

शरीरजेन तीव्रेण दह्यमानोऽपि भारत ।। ५७ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! राजा शान्तनु प्रचण्ड कामाग्निसे जल रहे थे, भी उनके मनमें निषादको वह वर देनेकी इच्छा नहीं हुई ।। ५७ ।।

स चिन्तयन्नेव तदा दाशकन्यां महीपतिः ।

प्रत्ययाद्धास्तिनपुरं कामोपहतचेतनः ।। ५८ ।।

कामकी वेदनासे उनका चित्त चंचल था। वे उस निषादकन्याका ही चिन्तन करते हुए उस समय हस्तिनापुरको लौट गये ।। ५८ ।।

ततः कदाचिच्छोचन्तं शान्तनुं ध्यानमास्थितम् ।

पुत्रो देवव्रतोऽभ्येत्य पितरं वाक्यमब्रवीत् ।॥ ५९ ।।

तदनन्तर एक दिन राजा शान्तनु ध्यानस्थ होकर कुछ सोच रहे थे-चिन्तामें पड़े थे। इसी समय उनके पुत्र देवव्रत अपने पिताके पास आये और इस प्रकार बोले- | ५९ ।

सर्वतो भवतः क्षेमं विधेयाः सर्वपार्थिवाः ।

तत् किमर्थमिहाभीक्ष्णं परिशोचसि दुःखितः ।। ६० ।।

‘पिताजी! आपका तो सब ओरसे कुशल-मंगल है, भू-मण्डलके सभी नरेश आपकी आज्ञाके अधीन हैं; फिर किसलिये आप निरन्तर दुःखी होकर शोक और चिन्तामें डूबे रहते हैं ।। ६० ।।

ध्यायन्निव च मां राजन्नाभिभाषसि किंचन ।

न चाश्वेन विनिर्यासि विवर्णो हरिणः कृशः ।। ६१ ।।

‘राजन्! आप इस तरह मौन बैठे रहते हैं, मानो किसीका ध्यान कर रहे हों; मुझसे कोई बातचीततक नहीं करते। घोड़ेपर सवार हो कहीं बाहर भी नहीं निकलते। आपकी कान्ति मलिन होती जा रही है। आप पीले और दुबले हो गये हैं ।। ६१ ।।

व्याधिमिच्छामि ते ज्ञातुं प्रतिकुर्यां हि तत्र वै ।

एवमुक्तः स पुत्रेण शान्तनुः प्रत्यभाषत ।। ६२ ।।

‘आपको कौन-सा रोग लग गया है, यह मैं जानना चाहता हूँ, जिससे मैं उसका प्रतीकार कर सकूँ।’ पुत्रके ऐसा कहनेपर शान्तनुने उत्तर दिया- ।। ६२ ।।

असंशयं ध्यानपरो यथा वत्स तथा शृणु ।

अपत्यं नस्त्वमेवैकः कुले महति भारत । ६३ ।।

तो’बेटा! इसमें संदेह नहीं कि मैं चिन्तामें डूबा रहता हूँ। वह चिन्ता कैसी है, सो बताता हूँ,सुनो। भारत! तुम इस विशाल वंशमें मेरे एक ही पुत्र हो ।। ६३ ।।

शस्त्रनित्यश्च सततं पौरुषे पर्यवस्थितः ।

अनित्यतां च लोकानामनुशोचामि पुत्रक ।। ६४ ।।

‘तुम भी सदा अस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासमें लगे रहते हो और पुरुषार्थके लिये सदैव उद्यतरहते हो। बेटा! मैं इस जगत्की अनित्यताको लेकर निरन्तर शोकग्रस्त एवं चिन्तित रहताहूँ ।। ६४ ।।

कथंचित् तव गाङ्गेय विपत्तौ नास्ति नः कुलम् ।

शयं त्वमेवैकः शतादपि वरः सुतः ।। ६५ ।।

‘गंगानन्दन! यदि किसी प्रकार तुमपर कोई विपत्ति आयी, तो उसी दिन हमारा यह वंशसमाप्त हो जायगा। इसमें संदेह नहीं कि तुम अकेले ही मेरे लिये सौ पुत्रोंसे भी बढ़करहो ।। ६५ ।।

न चाप्यहं वृथा भूयो दारान् कर्तुमिहोत्सहे ।

संतानस्याविनाशाय कामये भद्रमस्तु ते ।। ६६ ।।

‘मैं पुनः व्यर्थ विवाह नहीं करना चाहता; किंतु हमारी वंशपरम्पराका लोप न हो,इसीके लिये मुझे पुनः पत्नीकी कामना हुई है। तुम्हारा कल्याण हो ।। ६६ ।।

(चक्षुरेकं च पुत्रश्च अस्ति नास्ति च भारत ।

चक्षुर्नाशे तनोर्नाशः पुत्रनाशे कुलक्षयः ।।)

अनपत्यतैकपुत्रत्वमित्याहुर्धर्मवादिनः ।

अग्निहोत्रं त्रयीविद्यासंतानमपि चाक्षयम् ।। ६७ ।।

‘धर्मवादी विद्वान् कहते हैं कि एक पुत्रका होना संतानहीनताके ही तुल्य है। भारत!एक आँख अथवा एक पुत्र यदि है, तो वह भी नहींके बराबर है। नेत्रका नाश होनेपर मानोशरीरका ही नाश हो जाता है, इसी प्रकार पुत्रके नष्ट होनेपर कुलपरम्परा ही नष्ट हो जातीहै। अग्निहोत्र, तीनों वेद तथा शिष्य-प्रशिष्यके क्रमसे चलनेवाले विद्याजनित वंशकी अक्षयपरम्परा-ये सब मिलकर भी जन्मसे होनेवाली संतानकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहींहै ।। ६७ ।।

सर्वाण्येतान्यपत्यस्य कलां नाहन्ति षोडशीम् ।

एवमेतन्मनुष्येषु तच्च सर्वप्रजास्विति ।। ६८ ।।

‘इस प्रकार संतानका महत्त्व जैसा मनुष्योंमें मान्य है, उसी प्रकार अन्य सब प्राणियोंमेंभी है ।। ६८ ।।

यदपत्यं महाप्राज्ञ तत्र मे नास्ति संशयः ।

एषा त्रयीपुराणानां देवतानां च शाश्वती ।। ६९ ।।

(अपत्यं कर्म विद्या च त्रीणि ज्योतींषि भारत ।

यदिदं कारणं तात सर्वमाख्यातमञ्जसा ।।)

‘भारत! महाप्राज्ञ! इस बातमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि संतान, कर्म और विद्या-ये तीन ज्योतियाँ हैं; इनमें भी जो संतान है, उसका महत्त्व सबसे अधिक है। यही वेदत्रयीपुराण तथा देवताओंका भी सनातन मत है। तात! मेरी चिन्ताका जो कारण है, वह सबतुम्हें स्पष्ट बता दिया ।। ६९ ।।

त्वं च शूरः सदामर्षी शस्त्रनित्यश्च भारत।

नान्यत्र युद्धात् तस्मात् ते निधनं विद्यते क्वचित् ।। ७० ।।

‘भारत! तुम शूरवीर हो। तुम कभी किसीकी बात सहन नहीं कर सकते और सदाअस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासमें ही लगे रहते हो; अतः युद्धके सिवा और किसी कारणसे कभीतुम्हारी मृत्यु होनेकी सम्भावना नहीं है ।। ७० ।।

सोऽस्मि संशयमापन्नस्त्वयि शान्ते कथं भवेत् ।

इति ते कारणं तात दुःखस्योत्तमशेषतः ।। ७१ ।।

‘इसीलिये मैं इस संदेहमें पड़ा हूँ कि तुम्हारे शान्त हो जानेपर इस वंशपरम्पराकानिर्वाह कैसे होगा? तात! यही मेरे दुःखका कारण है; वह सब का-सब तुम्हें बतादिया’ ।। ७१ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततस्तत्कारणं राज्ञो ज्ञात्वा सर्वमशेषतः।

देवव्रतो महाबुद्धिः प्रज्ञया चान्वचिन्तयत् ।। ७२ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! राजाके दुःखका वह सारा कारण जानकर परमबुद्धिमान् देवव्रतने अपनी बुद्धिसे भी उसपर विचार किया।। ७२ ।।

अभ्यगच्छत् तदैवाशु वृद्धामात्यं पितुर्हितम् ।

तमपृच्छत् तदाभ्येत्य पितुस्तच्छोककारणम् ।। ७३ ।।

तदनन्तर वे उसी समय तुरंत अपने पिताके हितैषी बूढ़े मन्त्रीके पास गये और पिताकेशोकका वास्तविक कारण क्या है, इसके विषयमें उनसे पूछताछ की ।। ७३ ।।

तस्मै स कुरुमुख्याय यथावत् परिपृच्छते ।

वरं शशंस कन्यां तामुद्दिश्य भरतर्षभ ।। ७४ ।।

भरतश्रेष्ठ! कुरुवंशके श्रेष्ठ पुरुष देवव्रतके भलीभाँति पूछनेपर वृद्ध मन्त्रीने बताया किमहाराज एक कन्यासे विवाह करना चाहते हैं ।। ७४ ।।

(सूतं भूयोऽपि संतप्त आह्वयामास वै पितुः ।।

सूतस्तु कुरुमुख्यस्य उपयातस्तदाज्ञया ।

तमुवाच महाप्राज्ञो भीष्मो वै सारथिं पितुः ।।

उसके बाद भी दुःखसे दुःखी देवव्रतने पिताके सारथिको बुलाया। राजकुमारकी आज्ञापाकर कुरुराज शान्तनुका सारथि उनके पास आया। तब महाप्राज्ञ भीष्मने पिताकेसारथिसे पूछा।

भीष्म उवाच

त्वं सारथे पितुर्मह्यं सखासि रथयुग् यतः।

अपि जानासि यदि वै कस्यां भावो नृपस्य तु ।।

यथा वक्ष्यसि मे पृष्टः करिष्ये न तदन्यथा ।

भीष्म बोले-सारथे! तुम मेरे पिताके सखा हो, क्योंकि उनका रथ जोतनेवाले हो।क्या तुम जानते हो कि महाराजका अनुराग किस स्त्रीमें है? मेरे पूछनेपर तुम जैसा कहोगे,वैसा ही करूँगा, उसके विपरीत नहीं करूगा।

सूत उवाच

दाशकन्या नरश्रेष्ठ तत्र भावः पितुर्गतः ।

वृतः स नरदेवेन तदा वचनमब्रवीत् ।।

योऽस्यां पुमान् भवेद् गर्भः स राजा त्वदनन्तरम् ।

नाकामयत तं दातुं पिता तव वरं तदा ।।

स चापि निश्चयस्तस्य न च दद्यामतोऽन्यथा ।

एवं ते कथितं वीर कुरुष्व यदनन्तरम् ।।)

बोला-नरश्रेष्ठ! एक धीवरकी कन्या है, उसीके प्रति आपके पिताका अनुराग हो सूत गया है। महाराजने धीवरसे उस कन्याको माँगा भी था, परंतु उस समय उसने यह शर्त रखीकि ‘इसके गर्भसे जो पुत्र हो, वही आपके बाद राजा होना चाहिये।’ आपके पिताजीकेमनमें धीवरको ऐसा वर देनेकी इच्छा नहीं हुई। इधर उसका भी पक्का निश्चय है कि यहशर्त स्वीकार किये बिना मैं अपनी कन्या नहीं दूँगा। वीर! यही वृत्तान्त है, जो मैंने आपसेनिवेदन कर दिया। इसके बाद आप जैसा उचित समझें, वैसा करें।

ततो देवव्रतो वृद्धैः क्षत्रियैः सहितस्तदा ।

अभिगम्य दाशराजं कन्यां वकव्रे पितुः स्वयम् ।। ७५ ।।

यह सुनकर कुमार देवव्रतने उस समय बूढ़े क्षत्रियोंके साथ निषादराजके पास जाकरस्वयं अपने पिताके लिये उसकी कन्या माँगी ।। ७५ ।।

तं दाशः प्रतिजग्राह विधिवत् प्रतिपूज्य च ।

अब्रवीच्चैनमासीनं राजसंसदि भारत ।। ७६ ।।

भारत! उस समय निषादने उनका बड़ा सत्कार किया और विधिपूर्वक पूजाआसनपर बैठनेके पश्चात् साथ आये हुए क्षत्रियोंकी मण्डलीमें दाशराजने उनसे करकेकहा ।। ७६ ।।

दाश उवाच

(राज्यशुल्का प्रदातव्या कन्येयं याचतां वर ।

अपत्यं यद् भवेत् तस्याः स राजास्तु पितुः परम् ।।)

दाशराज बोला-याचकोंमें श्रेष्ठ राजकुमार! इस कन्याको देनेमें मैंने राज्यको ही शुल्क रखा है। इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, वही पिताके बाद राजा हो।

त्वमेव नाथः पर्याप्तः शान्तनोर्भरतर्षभ ।

पुत्रः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः किं तु वक्ष्यामि ते वचः।। ७७ ।।

भरतर्षभ! राजा शान्तनुके पुत्र अकेले आप ही सबकी रक्षाके लिये पर्याप्त हैं। शस्त्रधारियोंमें आप सबसे श्रेष्ठ समझे जाते हैं; परंतु तो भी मैं अपनी बात आपके सामने रखूँगा।। ७७ ।।

को हि सम्बन्धकं श्लाघ्यमीप्सितं यौनमीदृशम् ।

अतिक्रामन्न तप्येत साक्षादपि शतक्रतुः ।। ७८ ।।

ऐसे मनोऽनुकूल और स्पृहणीय उत्तम विवाह-सम्बन्धको ठुकराकर कौन ऐसा मनुष्य होगा जिसके मनमें संताप न हो? भले ही वह साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो ।। ७८ ।।

अपत्यं चैतदार्यस्य यो युष्माकं समो गुणैः ।

यस्य शुक्रात् सत्यवती सम्भूता वरवर्णिनी ।। ७९ ।।

यह कन्या एक आर्य पुरुषकी संतान है, जो गुणोंमें आपलोगोंके ही समान हैं और जिनके वीर्यसे इस सुन्दरी सत्यवतीका जन्म हुआ है ।। ७९ ।।

तेन मे बहुशस्तात पिता ते परिकीर्तितः ।

अर्हः सत्यवर्तीं बोढुं धर्मज्ञः स नराधिपः ।। ८० ।।

तात! उन्होंने अनेक बार मुझसे आपके पिताके विषयमें चर्चा की थी। वे कहते थे, सत्यवतीको ब्याहनेयोग्य तो केवल धर्मज्ञ राजा शान्तनु ही हैं ।। ८० ।।

अर्थितश्चापि राजर्षिः प्रत्याख्यातः पुरा मया ।

स चाप्यासीत् सत्यवत्या भृशमर्थी महायशाः ।। ८१ ।।

कन्यापितृत्वात् किंचित् तु वक्ष्यामि त्वां नराधिप।

बलवत्सपत्नतामत्र दोषं पश्यामि केवलम् ।। ८२ ।।

महान् कीर्तिवाले राजर्षि शान्तनु सत्यवतीको पहले भी बहुत आग्रहपूर्वक माँग चुके हैं; किंतु उनके माँगनेपर भी मैंने उनकी बात अस्वीकार कर दी थी। युवराज! मैं कन्याका पिता होनेके कारण कुछ आपसे भी कहूँगा ही। आपके यहाँ जो सम्बन्ध हो रहा है, उसमें मुझे केवल एक दोष दिखायी देता है, बलवान्के साथ शत्रुता ।। ८१-८२ ।।

यस्य हि त्वं सपत्नः स्या गन्धर्वस्यासुरस्य वा ।

न स जातु चिरं जीवेत् त्वयि क्रुद्धे परंतप ।। ८३ ।।

परंतप! आप जिसके शत्रु होंगे, वह गन्धर्व हो या असुर, आपके कुपित होनेपर कभीचिरजीवी नहीं हो सकता ।। ८३ ।।

एतावानत्र दोषो हि नान्यः कश्चन् पार्थिव ।

एतज्जानीहि भद्रं ते दानादाने परंतप ।।८४ ।।

पृथ्वीनाथ! बस, इस विवाहमें इतना ही दोष है, दूसरा कोई नहीं। परंतप! आपकाकल्याण हो, कन्याको देने या न देनेमें केवल यही दोष विचारणीय है; इस बातको आपअच्छी तरह समझ लें ।। ८४ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु गाङ्गेयस्तद्युक्तं प्रत्यभाषत ।

शृण्वतां भूमिपालानां पितुरर्थाय भारत ।।८५ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! निषादके ऐसा कहनेपर गंगानन्दन देवव्रतनेपिताके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये सब राजाओंके सुनते-सुनते यह उचित उत्तर दिया।।८५ ।।

इदं मे व्रतमादत्स्व सत्यं सत्यवतां वर ।

नैव जातो न वाजात ईदृशं वक्तुमुत्सहेत् ।। ८६ ।।

‘सत्यवानोंमें श्रेष्ठ निषादराज! मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा सुनो और ग्रहण करो। ऐसी बातकह सकनेवाला कोई मनुष्य न अबतक पैदा हुआ है और न आगे पैदा होगा ।। ८६ ।।

एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वमनुभाषसे ।

योऽस्यां जनिष्यते पुत्रः स नो राजा भविष्यति ।॥ ८७ ।।

‘लो, तुम जो कुछ चाहते या कहते हो, वैसा ही करूँगा। इस सत्यवतीके गर्भसे जो पुत्रपैदा होगा, वही हमारा राजा बनेगा’ ।। ८७ ।।

इत्युक्तः पुनरेवाथ तं दाशः प्रत्यभाषत।

चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म राज्यार्थे भरतर्षभ ।। ८८ ।

भरतवंशावतंस जनमेजय! देवव्रतके ऐसा कहनेपर निषाद उनसे फिर बोला। वहराज्यके लिये उनसे कोई दुष्कर प्रतिज्ञा कराना चाहता था ।। ८८ ।।

त्वमेव नाथः सम्प्राप्तः शान्तनोरमितद्युते ।

कन्यायाश्चैव धर्मात्मन् प्रभुद्दानाय चेश्वरः ।। ८९ ।।

उसने कहा-‘अमित तेजस्वी युवराज! आप ही महाराज शान्तनुकी ओरसे मालिकबनकर यहाँ आये हैं। धर्मात्मन्! इस कन्यापर भी आपका पूरा अधिकार है। आप जिसेचाहें, इसे दे सकते हैं। आप सब कुछ करनेमें समर्थ हैं ।। ८९ ।।

इदं तु वचनं सौम्य कार्य चैव निबोध मे ।

कौमारिकाणां शीलेन वक्ष्याम्यहमरिन्दम ।। ९० ।।

‘परंतु सौम्य! इस विषयमें मुझे आपसे कुछ और कहना है और वह आवश्यक कार्य है;अतः आप मेरे इस कथनको सुनिये। शत्रुदमन! कन्याओंके प्रति स्नेह रखनेवाले सगे-सम्बन्धियोंका जैसा स्वभाव होता है, उसीसे प्रेरित होकर मैं आपसे कुछ निवेदनकूँगा ।। ९० ।।

यत् त्वया सत्यवत्यर्थे सत्यधर्मपरायण ।

राजमध्ये प्रतिज्ञातमनुरूपं तवैव तत् ।। ९१ ।।

‘सत्यधर्मपरायण राजकुमार! आपने सत्यवतीके हितके लिये इन राजाओंके बीचमें जोप्रतिज्ञा की है, वह आपके ही योग्य है ।। ९१ ।।

नान्यथा तन्महाबाहो संशयोऽत्र न कश्चन ।

तवापत्यं भवेद् यत् तु तत्र नः संशयो महान् ।। ९२ ।।

‘महाबाहो! वह टल नहीं सकती; उसके विषयमें मुझे कोई संदेह नहीं है, परंतु आपकाजो पुत्र होगा, वह शायद इस प्रतिज्ञापर दृढ़ न रहे, यही हमारे मनमें बड़ा भारी संशयहै’ ।। ९२ ।।

वैशम्पायन उवाच

तस्यैतन्मतमाज्ञाय सत्यधर्मपरायणः ।

प्रत्यजानात् तदा राजन् पितुः प्रियचिकीर्षया ।। ९३ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! निषादराजके इस अभिप्रायको समझकरसत्यधर्ममें तत्पर रहनेवाले कुमार देवव्रतने उस समय पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे यह कठोर प्रतिज्ञा की ।। ९३ ।।

गाङ्गेय उवाच

(ऋषयो वाथवा देवा भूतान्यन्तर्हितानि च ।

यानि यानीह शृण्वन्तु नास्ति वक्ता हि मत्समः ।।

इदं वचनमादत्स्व सत्येन मम जल्पतः ।)

दाशराज निबोधेदं वचनं मे नरोत्तम।

शृण्वतां भूमिपालानां यद् ब्रवीमि पितुः कृते ।। ९४ ।।

भीष्मने कहा-नरश्रेष्ठ निषादराज! मेरी यह बात सुनो। जो-जो ऋषि, देवता एवंअन्तरिक्षके प्राणी यहाँ हों, वे सब भी सुनें। मेरे समान वचन देनेवाला दूसरा नहीं है।निषाद! मैं सत्य कहता हूँ, पिताके हितके लिये सब भूमिपालोंके सुनते हुएकहता हूँ, मेरी इस बातको समझो ।। ९४ ।।

राज्यं तावत् पूर्वमेव मया त्यक्तं नराधिपाः।

अपत्यहेतोरपि च करिष्येऽद्य विनिश्चयम् ।। ९५ ।।

राजाओ! राज्य तो मैंने पहले ही छोड़ दिया है; अब संतानके लिये भी अटल निश्चयकर रहा हूँ ।। ९५ ।।

अद्यप्रभृति मे दाश ब्रह्मचर्यं भविष्यति ।

अपुत्रस्यापि मे लोका भविष्यन्त्यक्षया दिवि ।। ९६ ।।

निषादराज! आजसे मेरा आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत चलता रहेगा। मेरे पुत्र नहोनेपर भी स्वर्गमें मुझे अक्षय लोक प्राप्त होंगे ।। ९६ ।।

(न हि जन्मप्रभृत्युक्तं मम किंचिदिहानृतम् ।

मैं जो कुछयावत् प्राणा ध्रियन्ते वै मम देहं समाश्रिताः ।।

तावन्न जनयिष्यामि पित्रे कन्यां प्रयच्छ मे ।

परित्यजाम्बहं राज्यं मैथुनं चापि सर्वशः ।।

ऊर्ध्वरेता भविष्यामि दाश सत्यं ब्रवीमि ते ।)

मैंने जन्मसे लेकर अबतक कोई झूठ बात नहीं कही है। जबतक मेरे शरीरमें प्राणरहेंगे, तबतक मैं संतान नहीं उत्पन्न करूँगा। तुम पिताजीके लिये अपनी कन्या दे दो| दाश!मैं राज्य तथा मैथुनका सर्वथा परित्याग करूंगा और ऊरध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) होकररहूँगा-यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।

ददानीत्येव तं दाशो धर्मात्मा प्रत्यभाषत ।। ९७ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-देवव्रतका यह वचन सुनकर धर्मात्मा निषादराजके रोंगटेखड़े हो गये। उसने तुरंत उत्तर दिया-‘मैं यह कन्या आपके पिताके लिये अवश्य देताहूँ’ ।। ९७ ।।

ततोऽन्तरिक्षेऽप्सरसो देवाः सर्षिगणास्तदा ।

अभ्यवर्षन्त कुसुमैर्भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ।। ९८ ।।

उस समय अन्तरिक्षमें अप्सरा, देवता तथा ऋषिगण फूलोंकी वर्षा करने लगे और बोलउठे-ये भयंकर प्रतिज्ञा करनेवाले राजकुमार भीष्म हैं (अर्थात् भीष्मके नामसे इनकीख्याति होगी)’ ।। ९८ ।।

ततः स पितुरर्थाय तामुवाच यशस्विनीम् ।

अधिरोह रथं मातर्गच्छावः स्वगृहानिति ।। ९९ ।।

तत्पश्चात् भीष्म पिताके मनोरथकी सिद्धिके लिये उस यशस्विनी निषादकन्यासे बोले- ‘माताजी! इस रथपर बैठिये। अब हमलोग अपने घर चलें’ ।। ९९ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा तु भीष्मस्तां रथमारोप्य भाविनीम्।

आगम्य हास्तिनपुरं शान्तनोः संन्यवेदयत् ।। १०० ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! ऐसा कहकर भीष्मने उस भामिनीको रथपरबैठा लिया और हस्तिनापुर आकर उसे महाराज शान्तनुको सौंप दिया ।। १०० ।।

तस्य तद् दुष्करं कर्म प्रशशंसुर्नराधिपाः ।

समेताश्च पृथक् चैव भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ।। १०१ ।।

उनके इस दुष्कर कर्मकी सब राजालोग एकत्र होकर और अलग-अलग भी प्रशंसाकरने लगे। सबने एक स्वरसे कहा, ‘यह राजकुमार वास्तवमें भीष्म है’ ।। १०१ ।।

नच्छुत्वा दुष्करं कर्म कृतं भीष्मेण शान्तनुः ।

स्वच्छन्दमरणं तुष्टो दरदौ तस्मै महात्मने ।। १०२ ।।

भीष्मके द्वारा किये हुए उस दुष्कर कर्मकी बात सुनकर राजा शान्तनु बहुत संतुष्ट हुएऔर उन्होंने उन महात्मा भीष्मको स्वच्छन्द मृत्युका वरदान दिया ।। १०२ ।।

देवव्रत (भीष्म)-की

भीषण प्रतिज्ञान ते मृत्युः प्रभविता यावज्जीवितुमिच्छसि ।

त्वत्तो ह्यनुज्ञां सम्प्राप्य मृत्युः प्रभवितानघ ।। १०३ ।।

वे बोले-‘मेरे निष्पाप पुत्र! तुम जबतक यहाँ जीवित रहना चाहोगे, तबतक मृत्युतुम्हारे ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। तुमसे आज्ञा लेकर ही मृत्यु तुमपर अपनाप्रभाव प्रकट कर सकती है’ ।। १०३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि सत्यवतीलाभोपाख्याने

शततमोऽध्यायः ।। १०० ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें सत्यवतीलाभोपाख्यानविषयक

सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०० ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ११६ श्लोक हैं)

Vyasa Sewaka
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