सन्ध्योपासन रहस्यम् १ Sandhya Rahasya 1

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॥ श्रीः ।।

समीक्षाचक्रवर्ति विद्यावाचस्पति-महामहोपदेशक विद्वद्वर्य स्व० पं० मधुसूदन ओझा — विरचितम्

Sandhya Rahasya (Sandhyopasana rahasya)

सन्ध्योपासन रहस्यम् १

तदिदं

हिन्दीमापायामन्य

पं० सुरजनदास स्वामिना एम० ए०

साहित्य – व्याकरण – वेदान्त-सांख्य-योगाचार्येण सम्पादितम्

ग्रन्थकतृ सूनुना पं० प्रद्युम्न ओझा शर्मणा

प्रकाशितम्

प्रथमावृत्तिः ।

वि० सं० २०२१

सर्वेऽधिकाराः प्रकाशकाधीनाः |

प्रास्ताविक

वेदविद्योद्धारक, वेदरहस्यप्रकाशक, समीक्षाचकवर्ती, विद्यावाचस्पति, स्वर्गीय, पूज्य गुरुवर्ष पं० श्रीमधुसुदनजी महाराज ने वैदिक ग्रन्थों का सम्यक् परिशीलन कर सदस्राब्दियों से विलुप्त वैदिक विज्ञान को प्रकाश में लाने के लिए यावज्जीवन भागीरथ प्रयास किया तत्तच्छास्त्रीय परिभाषाओं के ज्ञान के बिना किसी भी शास्त्र के हृदय ( मर्म) को हृदयकम नहीं किया जा सकता, इसलिए उन्होंने वेदों की व्याख्या आदि न लिख कर उनके रहस्यों का उद्घाटन करने वाली वैदिक परिभाषाओं के परिहानार्थ परिभाषासम्बन्धी अन्थों का प्रणयन किया एतदर्थ १५० से भी अधिक ग्रन्थों की रचना की। इन ग्रन्थों को उन्होंने ब्रह्मविज्ञान, यशविज्ञान, पुराणसमीक्षा. वेदाङ्ग समीक्षा इन प्रधान चार विभागों में विभक्त किया।

स्वर्गीय पं० जी महाराज की यह मान्यता रही है कि भारतीयों के जितने भी आचार विचार, पर्व व दैनिक कृत्य हैं वे सब वैज्ञानिक भित्ति पर आधारित हैं, क्योंकि इनके उद्भावक महर्षियों ने आधिदैविक ( प्राकृतिक ) तस्त्रों का अपनी प्रातिभ आदृष्टि से साक्षात्कार कर तदनुसार ही मानवकल्याणार्थ इन आचारों, पर्वो व धार्मिक क्रियाकलापों की इतिकर्तव्यता का उद्भावन किया था ‘जायमानो वै जायते सर्वाभ्य एताभ्यो देवताभ्यः’ ‘यद्देवा अकुर्वस्तत् करवाणि’ ‘यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह’ इत्यादि श्रुतिवचन तथा यथाऽण्डे तथा पिण्डे इत्यादि लोकोक्तियाँ आधिदैविक, आध्यात्मिक तथा आधिभौतिक पदार्थों की एकरूपता को व्यक्त कर रही हैं। भारतीयों का प्रत्येक धार्मिक कार्य सोपपत्तिक व तर्कमूलक है। यह कार्य इस प्रकार क्यों होता है ? इस ‘क्यों’ का समाधान ही उस कार्य की उपपत्ति कहलाती है। इसीलिये भर्तृहरि ने धर्म का ज्ञान वेदशाखाविरोधी तर्क के द्वारा प्राप्त करने का स्पष्ट उल्लेख किया है। जैसे:

आप धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना | –

यस्त कॅणानुसन्धते स धर्म वेद नेतरः ॥ इति ।

महाभारत में इसी रहस्य का प्रतिपादन किया गया है। जैसे

नाकारण हि शास्त्रेऽस्ति धर्मः सूक्ष्मोऽपि जाजले ।

कारणाद् धर्ममन्विच्छन् स लोकानाप्नुते शुभान् ॥ इति ।

और धार्मिक किशकलापों की उपपत्ति किसी भौतिक विज्ञान के द्वारा नहीं बतलायी आ सकती । किन्तु उसकी उपपत्ति का यही प्रकार है कि उसकी मूलभूत प्राकृतिक उपपत्ति का निर्देश करना । अर्थात् प्रकृति में ऐसा हो रहा है अतः तदनुसार यहाँ भी ऐसा किया जारहा है। प्रकृति में अमुक कार्य के लिये ऐसा होरहा है अतः लोक में भी उस तत्व व विज्ञान की प्राप्ति के लिए प्राकृतिक आधार पर ऐसा करना चाहिए इत्यादि । प्राकृतिक तत्वों को ही वेद में देवता शब्द से व्यवहृत किया गया है। अतः प्रकृति को अधिदेव तथा प्राकृतिक को आधिदैविक कहा जाता है। प्रकृत पुस्तक में सन्ध्या क्यों करनी चाहिए? तथा उसके उपकरणभूत, आचमन, अर्थ प्रदान, सूर्योपस्थान, प्राणायाम, अघमर्षण आचमन आदि क्यों किये जाते हैं? तथा इनसे आध्यात्मिक किन किन तत्वों का पोषण होता है ? सावित्री को गायत्री क्यों कहा जाता है ? सन्ध्या सन्ध्या फालों में ही क्यों की जाती है। सन्ध्याकाल कितने हैं ? आदि विषयों का मार्मिक व वैज्ञानिक विश्लेषण श्रुतिमूलक उपपत्तियों के आधार पर किया गया है। तर्कप्रधान तथा विज्ञानप्रधान इस युग में किसी भी पुरुष का किसी भी धार्मिक क्रिया में तब तक श्रद्धा व विश्वास उत्पन्न नहीं होता जब तक कि ऐसा क्यों किया जाता है? इसका क्या रहस्य है। इस जिज्ञासा का समाधान नहीं कर दिया जाता । यह पुस्तक एतदर्थ द्विजातियों के लिए, न केवल द्विजातियों के लिए, अपितु प्रत्येक भारतीय संस्कृति के अनुरागी भारतीय के लिए अवश्य उपादेय व संग्राह्य है।

इस पुस्तक में प्रारंभिक भाग, जिसमें गायत्री आदि के वैज्ञानिक रहस्य का प्रतिपादन किया गया है, महर्षि कुलवैभव ग्रन्थ के ‘विश्वामित्र ऋषि के निरूपणपरक कोडपत्रों से सङ्कलित किया गया है। तथा उत्तरभाग (संस्कृतमय) पं० जी महाराज के वेदाङ्गसमीक्षा के अन्तर्गत तृतीय आत्मसंस्कारकल्प के अवान्तर पाँच ग्रन्थों में ‘शुद्धिसिद्धान्त पञ्जिका’ ग्रन्थ के प्रथम ‘नित्याचारपञ्जीग्रन्थ का प्रकरणविशेष’ है । इस भाग में सन्ध्योपासनविधि तथा तत्प्रतिपादक ऋषिवचनों का संग्रह है। इस प्रकार ‘संस्कृतमय’ यह पुस्तक ३० पृष्ठों में समाप्त हुई है। इसके पश्चात् इस ग्रन्थ के संस्कृत भाषामय होने से संस्कृतानभिश जनों को इन तत्वों के परिज्ञान के लिए इसका हिन्दी रूपान्तर भी पाठकों के समक्ष उपस्थित किया गया है, जिसमें यथामति मूल पुस्तक के आशय को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। और अन्त में हिन्दी में ही सन्ध्योपासन से सम्बद्ध ‘यज्ञोपवीत’ का रहस्य भी सोपपत्तिक बतलाया गया है। ‘यज्ञोपवीत’ के विषय में स्वर्गीय पं० जी महाराज की मूल पुस्तक तो उपलब्ध नहीं हुई है किन्तु उनने पढ़ाते समय इस विषय के विस्तृत सोपपत्तिक रहस्य का प्रतिपादन किया था। उसके नोट अब भी पं० श्रीनवलकिशोरजी काङ्कर, प्राध्यापक-संस्कृतविभाग, पारीक कालेज, जयपुर तथा अन्य विद्यार्थियों के पास विद्यमान हैं। स्वर्गीय वेदवीथीपथिक पंडितवर्य श्रीमोतीलालजी के पास भी इसके नोट थे जिनके आधार पर उनने भी इस विषय का प्रतिपादन कर्मयोगसमीक्षा ग्रन्थ में किया है। इससे यह भी स्पष्ट है कि स्वर्गीय पं० जी महाराज का एतद्विययक ग्रन्थ था, किन्तु किसी कारण से वह किसी के द्वारा ले लिया गया और पुनः नहीं लौटाया गया। इसी प्रकार का एक अभूतपूर्व ग्रन्थ और है जिसे स्वर्गीय पं० जी महाराज हमें पढ़ाया करते थे। जितना पढ़ाते थे उतना हम मूल ग्रन्थ से उतार लेते थे। उसका नाम है ‘वेदसमीक्षा’। किन्तु आज पं० जी महाराज की मुद्रित व अमुद्रित पुस्तकों में वह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। वह भी किसी महानु भाव की कृपा से कालकवक्षित हो चुका है। यही दशा अन्य ग्रन्थों की भी होती, यदि स्वर्गीय पं० जी महाराज के सुपुत्र पं० श्रीप्रद्युम्रजी श्रोभा अपने जीवन का उत्सर्ग इस अद्वितीय ग्रन्थराशि के सुरक्षार्थ के व प्रकाशनार्थ न करते । उनने सब प्रकार के सुख, ऐश्वर्व आदि को तिलाञ्जलि देकर यावज्जीवन इन ग्रंथों की सुरक्षार्थ व प्रकाशनार्थ कार्य किया जिससे अब तक ६० से अधिक ग्रन्थों का प्रकाशन हो चुका है और वे पाठकों के हाथों में पहुंच चुके हैं। कौटुम्बिक आर्थिक तथा जराजन्य अनेक बाधाओं का सामना करते हुए आज भी ने इसी कार्य में दत्तचित्त हैं। उनकी यही एक निष्ठा व चिन्तन है।

अस्तु अन्त में इतना ही निवेदन कर देना चाहता हूँ कि इस ग्रन्थ में सन्ध्योपासनाविषयक तथा यज्ञोपवीतविषयक अभूतपूर्व रहस्यों का उद्घाटन किया गया है। पाठकमहानुभावों को इससे अभिनव रहस्य ज्ञात होंगे जो कि कालप्रभाव के कारण सदस्राब्दियों से लुप्तप्राय थे और जिनकी आज भी नितान्त उपादेयता है। इस संस्करण में जो भी विषयसम्बन्धी तथा प्रकाशनसम्बन्धी त्रुटियाँ प्रेस के तथा मेरे प्रमाद से रह गई हैं उनको बतलाने की कृपा करें जिससे आगामी संस्करण में उनका • परिमार्जन किया जा सके।

अथ सन्ध्योपासनरहस्यम्

विश्वामित्राभिधमायुः प्राणमा राषयितु तद्वद्वारा च दीर्घमायुरखाप्तुम् उभयोः सन्ध्ययो सूर्यमुपतिष्ठन्ते ब्राह्मणाः, सावित्रों गायत्रीं च वैश्वामित्रों ध्यायन्तः प्रजपन्ति । अतः विश्वामित्रप्राणस्य सन्ध्योपासनेन सह सम्बन्धात् सर्वतः प्रथमं तस्य राणस्य स्वरूपं निरूप्यते ततः सोपपत्तिकं तदीय मितिकर्तव्यतारहस्यम्, तदनन्तरं चेतिकर्तव्यताविधिः ।

विश्वामित्र मागास्वरूपम्

(१) “यथाग्निगर्भा पृथिवी तथा धोरिन्द्रेण गर्मिणी” इति मन्वश्ववणात्, “इन्द्र इति होतमा चक्षते य एष तपति” (शत ४५ प्र० प्रा० ११) इति ब्राह्मणश्रवणाच सूर्यगतं प्राणभिन्द्र इत्याचक्षते । सूद विनिःसृता चैन्द्री वाक् परितः साहब नाम मण्डलं तनुते । “एतद्वै सहस्रं बाचः प्रजातं यदेष त्रयो वेदाः” ( शत० ५ । ४ प्र० । ७ वा० । १२० ) इति श्रुतेः । साहस्रस्य विभक्तयोऽहानीत्याख्यायन्ते । तत्रैतत्साहनं तावत् त्रेया विभज्यते -महोक्यं महाव्रतं पुरुषञ्चेति । तान्यस्मिन् सूर्ये शक्सामयजूषि प्रति पद्यन्ते । उत्तरोत्तरं ह्रस्वीभवन्तीनां परितः प्रथितानामनन्तमूर्तीनां समुद्रो महोक्यम् । तदध्येकेकमकॅरशिती रादत्ते । अथ परितो दिग्भ्यो ऽभिनाभि समायान्तं सोममयमन्त्रमअन्नाप्यायितः प्रतप्यमानो मिसमुद्रो महा व्रतम् । यस्त्वग्निसमुद्रो देवानां भूतानां च सृष्टये सर्वजगदर्थोपादान नेणोपयुज्यते स पुरुषो नाम । इत्थ मिमानि त्रीण्यहानि त्रयः समुद्रा अन्योन्यसमदेशा अन्योन्यतो ऽसंसक्तास्त्रीणि सहस्राणि जनयन्ति। तेषु यदिदं महाव्रतमहस्तेन रूपेण विश्वतोऽभिव्याको विश्वतश्चान्नं सोममयमश्चन् प्रतपत्ययं त्रयीमयः सूर्यप्राणः । तमे तमिन्द्रप्राणं महावतेनाहोपलक्षित विश्वामित्र इत्याहुः । तथा चेतरेयारण्यके श्रूयते । “विश्वामित्रं ह्येतदहर शंसिष्यन्तमिन्द्र उपनिषसाद । स हान्नमित्यमिव्याहृत्य त्रिवृहतीसहस्रं शशंस | तमिन्द्र उवाच ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः । वरं ते ददानीति । स होवाच-स्वामेव जानीयामिति । तमिन्द्र उवाच प्राणो वा अहमस्मि ऋषे, प्राणस्त्वं प्राण सर्वाणि भूतानि । प्राणो होष य एष तपति स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि । तस्य मेऽनं मित्रं दक्षिणं तद्वैश्वामित्रम् । एष तपन्नेवास्मीति होवाच” ( आ० २ अ० २ खं० ३ ) इति । छन्दानुवृत्तिसंवर्द्धनं च दक्षिणम् । तदन्नं प्राणस्य विश्वाविष्टस्य मित्रं संलग्न भवतीति वैश्वामित्रं नाम तद्विशिष्टोऽयं महावताहरात्मकः सौर: प्राणो विश्वामित्रः प्राणस्पेत्य विश्वा मित्रत्वाख्याने “वाग् वै विश्वामित्रः” इत्येवं वाचो विश्वामित्रत्व भावयन्त्याः कौषीतकिबुतेस्तु (१९९१) विरोधो नाशङ्ख्यः । तद्वा एतत् सहस्रं वाचः प्रजातं द्वे इन्द्रस्तृतीये, तृतीयं विष्णुः ऋचश्च सामानि चेन्द्रो यजूषि बिष्णुः” ( शत० ४।५ प्र । ६ वा० । ३० ) इति श्रुत्या बागात्मक सहस्रविभक्त रहो वागरूपत्वान् ।

सन्ध्योपासनरहस्ये

“उभा जिग्यपुर्न पराजयेथे न पराजिग्ये कतरथ नैनोः । इन्द्रव्य विष्णो यदपस्पृधेचां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम्” ( ऋ० ६ ।६।९।८)

इति मन्त्रव्याख्यायामेतरेयब्राह्मणे अष्टाविंशे ऽध्याये “कि तत् सहस्रमिति इमे लोका, इमे वेदाः, अथो वागिति छूयाद्” इति श्रुत्वा च वाव एव सहस्रतया तद्विभक्तिरस्याहोऽपि तदनतिरिक्तत्वात् । स इत्थमय मधिदैवत व्याख्यातः । एवमेवायमध्यात्मं द्रष्टव्यः । “तद् योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहम्” तदुक्तमृषिणा “सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्चेति” इत्यैतरेयारण्यकश्रुतेः सूर्यरसादुद्भूयमान एवाय मध्यात्म विज्ञानमयः क्षेत्रज्ञ आत्मा । सोऽपि बहिर्वत् त्रयाणां समुद्राणामन्तः शेते इत्यस्मादिन्द्राद विश्वतः प्रथितोऽयमन्तःस्थो महाव्रताहात्मकोऽन्नमभन् प्राणो विश्वामित्रः ।

( २ ) स एष प्राणो बृहत्यात्मको द्रष्टव्यः । थाग् वा अनुष्टुप् प्राणो बृहतीति श्रुतेः । “सर्वं हीदं प्राणेनावृतम् । सोऽयमाकाश: प्राणेन गृहत्या विष्टब्धः। एवं सर्वाणि भूतान्यापिपीलिकाभ्यः प्राणेन बृहत्या विष्टन्धानीत्येवं विद्यात्” (आ० २।१।६ ) इत्यैतरेयश्रुतेश्च पत्रिशदक्षरत्वाचेतस्य बृहतीत्वमदोपपद्यते एकेक चेदमक्षर दशिनी विराट् तेन षष्टिशतत्रयमक्षराणां लभ्यते । एतावन्ति च संवत्सरस्याहानि, ततः संवत्सरादुपेतत्वात् तावद्विभागोऽऽयं प्राणो न आत्मा। संवत्सरात्मकस्याप्यस्य बृहतो त्वमक्षराणां विरादत्वापेक्षया द्रष्टव्यम् अपि चायं प्राणः शरीरे दशधा भवति। “अयं वै प्राणो योऽयं पवते । यो वै प्रायः स आयुः । सोऽयमेक इवैव पवते । सोऽयं पुरुषेऽन्तः प्रविष्टो दशधा विहितः” (५। २ । ३।१०) इति वाजिश्रुतेः । बृहतीत्वात् षद्भिशदक्ष रोऽयमिन्द्रः प्राणो विराजोपसंपद्यमानो दशवा विहितः सन् षष्टिशतत्रयात्मको लक्ष्यते । स पुनर्दशधाकृतो यदि भूयो दशघा क्रियते तहि स पत्रिंशत् सहस्रात्मक संपद्यते । न हि तत्सहस्रं दशत्वादतिरिच्यते । “तदेतत् सहस्रं तत् सर्वम् । तानि दश दशेति वै सर्वम्। पतावती हि संख्या, दशदशवस्तच्छुतम् दशशतानि तत् सहस्रम्, तत् सर्वम्” (ऐ० ब्रा० २ | ३ | ४) इति श्रुतेः । स एष बृहतोसहसात्मकः प्राणो न आत्मा। तस्यारम्भकाणामेषां सर्वेषा मक्षराणां शरीरादुत्थाय परज्योतिष्युपसंपत्तो स्वेन रूपेणाभिनिष्पत्तावयमात्मा त्यकशरी: सूर्य्यं गतो भवती त्यत एवास्य प्राणस्य पुरुषायुषत्वमाहू तथा च भूयते ” इति ब्रह्म तत्रागतमद्दमिति ।तद्वा इदं बृहतीसहस्रं संपन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य संपन्नस्य षट्त्रिंशतमक्षगणां सहस्राणि भवन्ति । तावन्ति पुरुषायुषोऽह्नां सहस्राणि भवन्ति । जीवाक्षरेणैव जीवशहराप्रोति । जीवाला जीवाक्षरम्” इति (ऐ० आ० २३८) “प्राणो वा आयुः । प्राण उ हामृतम् | यावद्धयस्मिन् शरीरे प्राणो वसति तावदायुः” ( कौ० बा० उ० ) इति च । अयमर्थ:- पत्रिंशत्सहस्राक्ष राज्जीवात्मनोऽस्माद् वित्रस्त मेकैकमक्षरमहरहः स्वर्गं गच्छद्दिव्याधीयते । विरिक्ते च तत्स्थाने सूर्योदयास्तपरिच्छिन्नमेकैकमहात्म व्याधीयते । आहितानां तु नात्मत्वमुपपद्यते प्रज्ञात्मनो भूतात्मनस्तत्रागन्तुकेषु संपरिष्वङ्गायोगात् प्रज्ञात्मना लिष्टेन शरीरेणेषामसंधानात्तदनभिमानात् । तस्माच्छ्शत संवत्सरान्ते सर्वेषामात्माक्षराणां विसनाच्छरीरमात्मना होनं विपद्यते । विस्तानि च सर्वाणि एवात्मातराणि शरीरादुत्याय सूर्य्यं गतानि भवन्ति । सूर्य्यररूप विशुद्धं ब्रह्मविज्ञान मकारेण लक्ष्यते तत्र हम्मतीति व्युत्पत्त्याऽयमध्यात्मं विज्ञानमयोऽक्षरव्यूह आत्मा “अह” मिति समाख्यायते । तदाह — “श्र इति ब्रह्म । तत्रागतमहमितीति ।

अथ खलु प्राण एव प्रक्षात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति । यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः । स ह ह्येतावस्मिन् शरीरे वसतः सहोत्तिष्ठतः” इति कौषीतकिश्तेरिन्द्रप्राण

विश्वम

व्युत्थानेन सहैवार्य प्रज्ञात्मापि शरीराद् व्युत्याय कर्मर्गात गतो भवति । पृथिवीगृहीताच्छरीरात् संबन्ध मुच्छिव लोकान्तरं गते प्रज्ञात्मनि विधर्वभावादिदं शरीरं पृथिव्याकृष्टं निपतति पञ्चत्वं याति ।

( ३ ) प्राशस्त्वयमात्माप्यक्षराणां संघातेऽमुष्मिन्निन्द्रप्राणे बृहतीसहस्राक्षरसंघात रूपे संपरिष्वज्यते । तत्र मनःप्राणवा चामेकात्म्येऽक्षरशब्दः । तं चाक्षरप्राणमाचक्षते । प्राज्ञे चायमचरप्राणः सप्तविधः संहत्येकमात्मा नमारमते मनो, वाक्, प्राणः चक्षुः श्रोत्रं, कर्मानिरिति । प्रत्येकस्यैपामुनयस्य षत्रिंशत् सहलाप्यर्काः श्रयन्ते वाजिश्रुतौ तदिदं मनः सृष्टमादिग्दुभूषत् निरुततरं मूर्त्ततरम् । तदात्मानमन्वेच्छत् । तत्तपोऽतप्यत, तत् प्रामूर्खत् तत् पत्रिंशतं सहस्राण्यपश्यदात्मनोऽग्रीनर्कान् मनोमयान्मनश्चितः । तद् यत् किमानि भूतानि मनसा संकल्पयन्ति तेषामेव सा कृतिः। पतायती वै मनसो विभूतिः । एतावती विसृष्टिः । पतावन्मनः षट्त्रिंशत्सहन्नायझयोर्का.” (१०।४ । १) इति । एषैवानुविधा वाक्प्राणादिष्वपि तत्र श्रूयते । तथा च मनो वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमिति पञ्चधा विभक्तः प्राणः प्रशारमा, तेजसः प्राण: कम्मत्मा, वैश्वानरः” प्राणोऽन्यात्मा इतीत्यं त्रेधा विभक्तः सप्तत्रा विभक्तो वा भूतात्मा । तत्राभिरयं द्वेषा-चित्यश्चितेनिधेयश्च लोमत्वगङ्मांस मेदोऽस्मिन शुभेत चल्कल- निर्व्यास दारु-सार रसेव , किसास्तु षफलो करण किक्रसकंसा रेर्यवधा स्वग्रसमूढ़ बालवीजमज्जभिः फले, तथान्यत्रान्यैश्चयनीयैरवयवैश्वीयमानश्चित्यः तच्छरीरम् । तत्र दृष्टोऽयमूष्या वैश्वानरविते निधेयः, तदन्तर्गतो वयोऽवस्थानिर्वर्तकः प्राणः कर्मात्मा । तदन्तर्गतः प्रजात्मा ! तत्र जित्येन चितेनिषेयेन चात्मनाऽऽत्मन्विनोऽसंज्ञा जीवा रनधातूपधातुरसोपरसादयः । ताभ्यां च तैजसेन चात्मन्विनोऽन्तः संज्ञा जीवास्तृणगुल्मौष धवनसत्यादयः । तेन प्रज्ञात्मना चात्मन्विनः ससंज्ञा जीवाः कृमि कीट-पति-पशु-मनुष्यादयः।

( ४ ) सोऽयं भूतात्मा यमन्यमात्मानमध्याश्रित्य पुरुषायुषमनुजीवन् शरीरेण संवर्तते स बृहती सहस्रात्मायमिन्द्रः प्राणः । तदा इदं बृहतीसहस्रं संपन्नं तयशः स इन्द्रः स भूतानामधिपतिः” ( ऐ० आ० २ ३ ७) इति श्रुतेः “स आयुः मामेव विजानीहि । एतदेवाहं मनुष्याय दिततमं मन्ये यन्मां बिजानीयात् । प्राणोऽस्मि प्रक्षात्मा । तं मामायुरमृतमित्युपास्त्र” इति कोषको प्रतीन्द्रोक्तेः । तमन्नेवाध्याधिता इमे प्रज्ञादयो भूतारभारम्भका भागाः सन्ति। “तस्य वा एतस्य बृद्दवी सहस्रस्य संपन्नस्य परस्तात् प्रक्षामयो देवतामयो ब्रह्ममयोऽमृतमयः संभय देवता अप्येति य एवं वेद” इति श्रुतेः (ऐ० आ० २ २४) तत्रेतस्मिन् प्रज्ञात्मनि विज्ञानात्मनो यावदधिक संवात् प्रतिष्ठा स्यात् तावदयं प्रज्ञात्मा तेनैव ब्रह्मणा विद्यया सर्वक पायदाहा द्विशुद्धिमागतः पाप्ममिविरहितो विज्ञानात्मरूपे णामिनिष्पद्यते । स कर्मभिः कामैश्च विमुच्यते । न स कर्मभोगाय लोकान् परिभ्रमति । तदेतत्सर्वं पश्यतां प्राचां महर्षीणां श्लोकानाह भगवानंतरेयः-

“यददरं पञ्चविधं समेति, युजो युक्ता श्रभि यत् संवहन्ति ।

सत्यस्य सत्यमनु यन्त्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ॥ १ ॥

यदक्षरादचरमेति युक्तं युजो युक्ता अभि यत् संवहन्ति ।

सत्यस्य सत्यमनु यन्त्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ॥ २ ॥

यस्मिन्नामा समतृप्यन् श्रुतेऽधि तत्र देवाः सर्वयुजो भवन्ति ।

तेन पाप्मानमपह्त्य ब्रह्मणा स्वर्ग लोकमप्येति विद्वान् ॥ ३ ॥ इति ।

सन्ध्योपासनरहस्ये

अयमर्थ:- शरीररूपेण परिणतं पचविषं भूतजातं वा इन्द्रियरूपेण परिणतं पञ्चविधं देवजातं वा यदक्षरं मुख्यप्राणमनु समन्वेति । युञ्जानाः सन्तो युज्यमाना इमे रश्मिस्याः सर्वे प्राणा अपि अन्योन्यसंश्लिष्टा यदक्षरं मुख्यप्राणमभिसंवाह्यन्ति। “अथ नामधेयं सत्यस्य सत्यमिति । प्राण वे सत्यं तेषामेष सत्यम्’ – इति वाजिभुतेः शरीराधारभूत प्राणाना माघारभूत मुख्यप्राणमनुलक्ष्य यत्र भागे सर्वोदेवेयुज्यते तत्रेतस्मिन् मुख्यप्राणभागे सर्वे देवा अविस्पष्टभेदत्वादेकत्वं यान्ति ।। १ ।।

अपि च एतत्पथविधं भूतजातं वा एतस्मान्मुख्यप्राणादक्षरात् कमेणोपसृष्य यदन्यदक्षरं प्रशा युक्तमभ्येति । रश्मयञ्च प्राणा अन्योन्ययुक्ता यत् प्रज्ञानमभि संवहन्ति । सत्यस्य सत्यं मुख्यप्राणोऽपि पस्मिन् प्रज्ञानेऽनुयज्यते तस्मिन् प्रज्ञाने सर्वे देवाः संहत्येकध्वमायान्ति ॥ २ ॥ यद्यप्येवं विज्ञानात्मनि प्रज्ञानामनि चोभयत्रेव सर्वे देवाः एकं भवन्ति तथापि यस्मिन्नारमनि श्रुते नामानि सर्वाणि स्त्रीत्वपु स्त्वक्लीनत्व भेदितानि संतृप्यन्ते समर्थन्ते न व्यावर्तन्ते तत्र स्त्रीषु क्लीबेष्व विशेषरूपे विज्ञानात्मन्येव देवाः सर्वथा युक्ता द्रष्टव्याः । सर्वे देवा इन्द्रियरूपाः प्रज्ञात्मनि दृष्टा अपि मुख्यतया विज्ञानात्मन्येव प्रतिष्ठिताः सन्ति । प्रज्ञात्मारम्भक जयन्तहितं विज्ञानात्मानमेवाश्रित्य प्रज्ञेऽपि सर्वे देवाः संहन्यन्ते इत्यर्थः । विज्ञानस्यैव सूर्य्यरसस्य कश्चिदंशो भूगर्भममितृप्तः पृथिव्यात्मभूतः पार्थिवमिदं प्राणिशरीरम भिसंपद्यमानः पाप्मभिः शरीरधर्मः कामशुकादिभिः संसृज्यते । ततः स प्रज्ञानात्मा नामोपपद्यते । तस्मिञ्च पृथीरसात्मनि प्रज्ञाने सूर्य्यरसात्मनो विज्ञानस्पे तस्यातितरां समन्वयात् तेन ब्रह्मणा विज्ञानेन सर्वेषां पाप्मनां कामशुक्रायविद्याकषायाणामुच्छेदाद्विशुद्ध विज्ञानात्मनामिनिष्पत्ती प्रज्ञात्मा स्वर्गं याति सूयँ नाम स प्रज्ञानत्वाद्विमुच्यते । सूर्य्यरसरूपं विशुद्धं चिन्मयं मनोमयं विज्ञानमकारेण लक्ष्यते इत्युक्तम् । तत्र हम्मतीति व्युत्पत्त्याऽयं प्रज्ञात्माऽप्यहमित्माख्यायते इति बोध्यम् ।

(५) एव च विज्ञानात्मा बृहतीसहस्राक्षरः सौर: प्राणोऽध्यात्ममप्यधिदेवतवद् विश्वतः प्राणान् धत्ते । “तस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राणाः । दक्षिणा दिक् दक्षिणे प्राणाः । प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः प्राणाः । उदीची दिगुञ्चः प्राणाः । ऊर्ध्वादिगुर्ध्वाः प्राणाः अवाचीदिगवाञ्चः प्राणाः । सर्वा दिशः सर्वे प्राणाः” (१४।६।११) इति वाजिश्रुतेः । विश्वतो होमे प्राणा अस्मिन्नामेदन्ते, मेद्यन्ति चामुष्मिन् विश्वतोऽन्नानि, तस्मादयं महावताहःप्राणो विश्वामित्रो नामाख्यायते तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोऽषिशरीरमाविश्य विज्ञानमय आत्मा संपद्यते त्रियो नः प्रचोदयति । तमेत प्राणमनुवर्णयति कौषीतकिः । “एष होवैतं साधु कर्म कारयति तं यमुश्विनीपति, एष एवैनमसाधु कर्म्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्यो नुनुत्सते यमधो पतिसम आत्मेति विद्यात्” ( कौ० उ० ३) इति हितं प्रियं च कर्म कर्तुं प्रवर्तय तोत्येष प्राणो विश्वेषां मित्रं तस्मात् विश्वामित्र “यावद्धयस्मिन् शरीरे प्राणो वसति तावदायुः” इति कौषीत किश्रुते रायुःस्वरूपं तमेव प्राणमाराषयितुमुभयोः सन्ध्ययोः सूर्य्यमुपतिष्ठन्ते ब्राह्मणाः सावित्रों च गायत्रीं वैश्वामित्रों ध्यायन्तः प्रजपन्ति । स हि गायन्तं त्रायते गयांच प्राणांस्त्रायते । आराधयन्तस्तत्संपत्त्या दीर्घायुषो भवन्ति । तथा च समर्प्यते- “ऋषयो दीर्घसंध्यात्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुयुः” इति । ये त्वेनामयथा कुर्वते न ते फलेन संपद्यन्ते । तस्मात् सावहितोऽहरह संध्यामुपासीतेति महतामादेशः । इत्यमयं

विश्वामित्र: प्राणोऽधिदेवतमध्यात्मं च व्याख्यातः ।

अजाहुः किमिति संध्ययोरेव संध्यामुपासते न सर्वमेवाहरविशेषात् तं प्राणमाराधयन्ते इति । तत्रोच्यते एष हि चाचां संधानकालो यदयमहोरात्रयोः सन्धिः । तस्मात् तत्रैव संध्योपासनमवकल्पते न सर्वमेवाहः ।

गायत्रीस्वरूपम्

तथा हि यदिदं किन्च कुत्रापि दृश्यते तत्सर्वं वागेवेति प्रतिपत्तव्यम्। “अथो वागेवेदं सर्वमित्यैतरेय – श्रुतेः। वाच्यन्तर्हितः प्राणस्तदन्तहितं मन इति वाचो ग्रहणात् तदुभयं गृहीतं भवति । तदव्यावृत्त रूपत्वात् तस्मात् सूर्यभक्तं वान्तरिक्षभक्त वा पृथ्वीभक्तं वा त्रिवात्वेवेदमेक सर्वं विद्यात् । या बाकू प्राणः तन्मनः इति । –

तत्रेतं सूर्य्यरसं नाम वाचमहरित्याचक्षते ॥ ज्योतिगौरायुरिति भेदाच्च तहविषातु भवति । अव्यभिचरिता हीमे त्रयोऽर्धातवः । यत्र ज्योतिरहस्तत्र गोआयुषी अहनी संपृक्त भवतः ॥ तत्र देव सगर्भास्त्रयो वेदा ज्योतींषि यमभिजितं नामान्यं सूर्य्यमयं मे सूर्यः प्रदक्षिणीकुरुते तत आगत्यास्मिन् सूर्य्यरसे समुप्ताः सूर्य्यात्मभूताः । अमृता हीमे प्राणाः । अमृताधिष्ठानभूता मृत्युमयी विराद् गौः ।

वा एतद् रूपं यद्गौरिति ताज्यश्रुतेः (४१६१३) |

प्राणर्षि-देवतु दिशश्र सामच्छन्दोग्रहस्तोमविघाश्च पृष्ठम् ।

एकैकमेभिर्दशभिः परीतं तदन्नसंवाहि- पशुर्विराट् स्पत् १ ॥

राष्टितास्तदायतना अमृताः प्राणा भुञ्जते । सैषा विराडनोकं प्राणाना मन्योन्यपरिग्रहचकसंवाहक इत्यतोऽस्या यज्ञस्वरूपत्वाद् विष्णुत्वम् अन्नोर्क प्राणानामन्योन्यपरिग्रहस्येव यज्ञत्वाद् यशस्य च विष्णुत्वात् । अयेतयोरमृतमृत्युजातयोरुत्पादक मृत्पन्नयोआश्रयभूतमायुः । आयुर्हेन्द्रः । विराड् विष्णु तपोर्यु तयोः सहचारित्वं नियतम् । तदाह मन्त्रभुतिः।

विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे ।

इन्द्रस्य युज्यः सखा” ( १ | २२ । १६ ) | इति ॥

अन्न वै व्रतं, यतोऽन्न स्पाशयांचक्रे इति तद्व्याख्यायां वाजिश्रुतिः ।

( प्र० ७ । १ । २५ )

अन्नादस्त्वमृतात्मा स आयुरिन्द्रों विराजमधितिष्ठति । मनोमयं ज्योतिः । प्राणमयमाथुः । वाङ्मयी गौः । अथवा वागेवेषा त्रयो भवति वाच्येवान्ययोरप्युपपत्तेः ॥

सेवा विधातुर्वाक प्रकारान्तरेण त्रेधा रूप धत्ते उषाः सूर्य्या कृषाकपायी चेति । तदुक्त शौनकेन बृहृदेवतायाम् ।

“पार्थिवी मध्यमा दिव्या वागपि त्रिविधा तु या ।

तस्याः सुक्तानि नामानि यथास्थानं निबोधत”– २ । ७४ ।।

इत्युपक्रम्य- यदा तु वाग् भवत्येषा सूर्य्याऽमु लोकमाश्रिता ।

सन्ध्योपासनरहस्ये

तदा सूक्तमुषा भूत्वा सूर्या च भजतेऽखिलम् ।

वृषाकपाट्यूचं भूत्वा सरण्यूर्वे व ते ध्रुवम् ॥ २३८ ॥१॥ इति ॥

उषाः पुरोदये मृत्वा सूर्या मध्यन्दिने स्थिते ।

भूत्वा वृषाकपायी तु दिनान्तेष्वनुवर्तिनी ॥ ७ । ११७ । इति च ।

वृषाकपायी सुर्थोषाः सूर्य्यस्यैव तु पत्नयः |

अतोऽवग् निवर्तन्ते प्रतिलो मास्तदाश्रयाः | २ | ८ |

पुरोदयात् तामुषसं सूय्या मध्यदिने स्थिते ।

वृषाकपायीं मूर्खास्तकाल आहुः स्तुतिष्वृचि २ || इति च

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