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Shraadha Vigyana Part I Atma Vigyanopanishad 1 Webpage 1
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॥ ओंतत्सद्ब्रह्मणे नमः ॥
श्राद्धविज्ञान
Shradh (shraadha, sradh, sraadha, sraadh) Vigyan by Pandit Motilal Shastri
[ आत्मविज्ञानोपनिषत् ]
Atma Vigyanopanishad
मङ्गलपाठ
नि षु सीद गणपते गणेषु त्वामाहुविप्रतमं । न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे महामार्कं मघवञ्चित्रमर्च॥१॥ — ऋक्सं० १०।११२।९
वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः । वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी ॥२॥ —तै ० ब्रा ० २।८।८।४
हे गणपते ! आप गरणों में ( मरुद्गरणों , तथा स्तोतृगणों में ) विराजिए , क्योंकि ( विद्वान्लोग )आप ही को कवियों में श्रेष्ठतम मेधावी समझते हैं । अपिच बिना आपके ( अनुग्रह के ) लौकिक ,अथवा वैदिक , कोई भी कर्म्म नहीं किया जा सकता ( इसलिए प्रत्येक कार्य के आरम्भ में आपकाप्रथमस्मरण नितान्त अपेक्षित है ) । हे महनीय गणपते ! ” त्रिवृत् ( ६ ) , पञ्चदश ( १५ ) , सप्तदश( १७ ) , एकविंश ( २१ ) , त्रिरणव ( २७ ) , त्रयस्त्रिश ( ३३ ) ” इत्यादि विविध वाङ्मयस्तोमों से युक्त ,अतएव विद्वानों की दृष्टि में आदरणीय जो हमारा यह वाङ्मयस्तोम ( श्राद्धविज्ञान ) है , उसे प्रापनिर्विघ्न पूर्ण करने का अनुग्रह करें ॥१ ॥( १ ) “ ८ वसु , ११ रुद्र , १२ आदित्य , २ अश्विनीकुमार ” भेदभिन्न ३३ यज्ञिय आग्नेय देवदेवता ,यच्चयावत् ( २ ) सौम्यदेवता , ( ३ ) कर्म्मदेवता , ( ४ ) आत्मदेवता , ( ५ ) अभिमानी देवता , ( ६ ) पुरुषविध -चेतन ( मनुष्य ) देवता , ( ७ ) मन्त्रदेवता , ( ८ ) चान्द्रदेवता , ये अष्टविध देवता एकमात्र वाक्तत्त्व को
[ १३ ]
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड मंगलपाठ
वागक्षरं प्रथमजा ऋतस्य वेदानां माताऽमृतस्य नाभिः ।
सा नो जुषारणोपयज्ञमागावन्ती देवी सुहवा मेऽस्तु || ३ ||
– तं ० ब्रा ० २१८१८५
स इज्जनेन स विशा स जन्मना स पुत्रैर्वाजं धना नृभिः |
देवानां य पितरमाविवासति श्रद्धामना हविषा ब्रह्मरणस्पतिम् ॥४ ॥
– ऋक्स ० २ | २६ | ३ |
आधार बना कर ही स्वस्वरूप से प्रतिष्ठत हैं , अर्थात् ‘ देवपात्रं वा यदेष वषट्कार : ‘ के अनुसार वाङ्मयवषट्कार ही इनकी आधारभूमि है । २७ गन्धर्ब , ” पुरुष – श्रश्व – गौ – प्रवि – प्रज ” भेदभिन्न ५ पशु ,‘ ‘ श्रण्डज – पिण्डज – स्वेदज- उद्भिज्ज ” भेदभिन्न चतुविध मनु , ये सब ( भी ) वाक्तत्त्व को प्रतिष्ठा बना करही जीवित हैं । ‘ रोदसी – क्रन्दसी संयतो ‘ नामक त्रैलोक्य त्रिलोकीरूप , “ भूः- भुवः – स्वः – महः – जनत् – तपःसत्यम् ” इन सात लोकों की समष्टिरूप सम्पूर्ण भुवन ( लोक ) वाक् – सूत्र में ही प्रोत हैं । इस प्रकार मेंदेवता , गन्धर्व , पशु , मनु , लोक , आदि रूप से जो वाक् ‘ श्रयो वागेवेदं सर्वम् ‘ के अनुसार सर्वत्र व्याप्तहो रही है , ‘ इन्द्रपत्नी ‘ नाम से प्रसिद्ध वह वाग्देवी ( हमारे इस वाङ्मय पितृयज्ञतक्षण श्राद्धविज्ञाननिर्माण में ) हमारी प्रार्थना सुनें || २ ||” अक्षरमिति [ ( १ ) – ( २ ) ( ३ ) रम् इति ] व्यक्षरम् ” ( तां ० म ० ब्रा ० १० | ५ | १० )“ वाग् – इत्येकाक्षरम् ” – “ एकाक्षराव वाक् ” इत्यादि श्रौत सिद्धान्तों के अनुसार वाग्रूप एकाक्षर ब्रह्म ,किंवा एकाक्षररूप वाग्ब्रह्म ऋततत्त्व ( प्रारणतत्त्व ) से सर्वप्रथम उत्पन्न होने के कारण ‘ ऋतस्यप्रथमजा ‘ नाम से प्रसिद्ध है । ऋत की प्रथमजा यह वाग्देवी अनन्त वेदों की जननी है , अमृत ( सोम )की उद्भवभूमि है । ऐसी यह वाग्देवी अमृत की वर्षा करती हुई ( पितरप्रारणतर्पक इस ) वाग्यज्ञपधारे । अपिच हमारी ( अपने अर्थविवर्त्त द्वारा ) रक्षा करने वाली वाग्देवी हमारी यह वाङ्मयीप्रार्थना सुनने का अनुग्रह करे || ३ ||( पोमय – पारमेष्ठ्य मण्डल में प्रतिष्ठत ‘ पवित्र ‘ नाम से प्रसिद्ध आङ्गिरस -आग्नेय – देवताओं कातृप्तिकारक ब्रह्मणस्पति सोम आग्नेय – देवाहुति होने से देवमूर्ति है , एवं स्वस्वरूप से – सौम्यरूप से -पितरप्राणात्मक है ) इस प्रकार आग्नेय देवताओं तथा सौम्य पितरों के पालयिता ( आवासभूमिलक्षण )इस परमेष्ठ्य ब्रह्मणस्पति का जो यजमान हविद्रव्य से यजन करता है , वह ” सर्वमापोमयं जगत् – लोकाह्यप्सु प्रतिष्ठिता : ” के अनुसार पोमयसम्पूर्ण लोकों से ( जनसे- ‘ लोकस्तु भुवने जने ‘ ) , सम्पूर्ण प्रजा
[ १४ ]
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड मङ्गलपाठ
अन्वारभेथामनुसंरभेथामेतं लोकं श्रद्दधानां सचन्ते । यद् वां पक्वं परिविष्टमग्नौ तस्य गुप्तये दम्पत्ती सं श्रयेथाम् ॥५ ॥ – अथर्व सं ० ६।१२२ | ३ |
एतद्वो ज्योतिः पितरस्तृतीयं पञ्चौदनं ब्रह्मणेजं ददाति । प्रजस्तमांस्यप हन्ति दूरर्मास्मिल्लोके श्रद्दधानेन दत्तः ॥ ६ ॥ – अथर्व सं ० ६।५
से , अपने ग्राप से , अपने पुत्रादिवंशजों से , तथा अपने सेवकवर्ग से अभीष्ठ सम्पत्ति प्राप्त करने में समर्थहो जाता है । ब्रह्मणस्पति द्वारा पारमेष्ठ्य अग्नेय- देवदेवता , तथा सौम्य – पितृदेवता , दोनों के यजनयजनकर्ता सम्पूर्ण सम्पत्ति का अधिकारी बन जाता है , यही मन्त्रार्थ निष्कर्ष है || ४ ||
‘ हे दम्पती ! ( यजमान , तथा यजमानपत्नी ) आप दोनों परलोकहितसाधक कर्म्म को , तथाकर्म्म द्वारा प्राप्तव्य परलोक – फल को अपना लक्ष्य बना कर कर्म का प्रारम्भ कीजिए , प्रारब्ध कर्म्म मेंमनसा – वाचा – कर्म्मणा संयुक्त हो जाइए , क्योंकि देव- पितृयजनात्मक कर्म्म से प्राप्त होने वाले परलोक – फलको लक्ष्य बना कर ही , इस इन्द्रियातीत परलोकफल पर श्रद्धा करने वाले श्रद्धालुजन ही कर्म्म काअनुगमन करते हैं । इसलिए आप भी श्रद्धापूर्वक देवताओं तथा पितरों का यजन कीजिए | आप दोनोंके लिए स्थालीपाका दिलक्षरण सुसंस्कृत , जो पत्रव अन्न हविरूप से ग्रग्नि में प्रक्षिप्त हुआ है , उसकी रक्षाके लिए आप प्रयत्नशील बनिए । अर्थात् अग्नि में प्रदत्त आहुतिद्रव्य द्वारा ‘ यावद्धित्तं तावदात्मा ‘ केअनुसार आपके लिए परलोक – प्रतिष्ठात्मक जिस सुसं कृत दैवात्मा का स्वरूप सम्पन्न हुआ है , उसे अपनेश्रद्धाकर्म्म से आप सुरक्षित रखिए || ५ ||जो यजमान अपने पिण्डपितृयज्ञ में अनन्य श्रद्धापूर्वक ब्रह्मोदनलक्षण ‘ पञ्चौदन ‘ द्रव्य की आहुतिदेता है , उसकी इस प्रदत्त आहुति से इस भूलोक के अतिविदूर प्रतिष्ठित ‘ तृतीयद्यनाम ‘ से प्रसिद्धसौम्य- पितरप्राणमय पारमेष्ठघलोक से सम्बन्ध रखने वाली पितृज्योति प्राप्त हो जाती है , जो कि पितृज्योति स्वगत २८ कल पितृसहोभाग द्वारा सप्तपुरुषपर्य्यन्त सन्तानभाव से वितत होती हुई ( सन्तानभावमें परिणत होती हुई ) लोकप्राप्तिबाधक तमः पुञ्जों का एकान्ततः विनाश कर देती है । पिण्डपितृयज्ञात्मक श्राद्धकर्म्म श्रद्धापूर्वक किये जाने से तृतीयद्य निवासी पितरों का ज्योतिर्भाग सहोरूप से शुक्र मेंप्रतिष्ठित हो जाता है , एवं तद्द्वारा होनेवाली सन्तानपरम्परा से लोकप्रतिष्ठा सुरक्षित रहती है , यहीतात्पर्य्य है || ६ ||
[ १५ ]
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड मङ्गलपाठ
30-424
श्रद्धयाऽग्निः समिध्यते श्रद्धया हूयते हविः | श्रद्धां भगस्य मूर्द्धनि वचसा वेदयामसि ॥७ ॥
-ऋक् मं ० १० / १५ ९ १ | १
श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते | श्रद्धां हृदय्ययाकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु || ८ | – ऋक् सं ० १०।१५१।४ ।
श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यन्दिनं परि | श्रद्धां सूर्य्यस्य निम्त्रचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः ॥ ९ ॥ – ऋक् सं ० १०1१७१५
ऋरिव क्लोग श्रषने देवयज्ञ – कर्म्म में श्रद्धा के द्वारा ही सौर – दिव्याग्नि का आकर्षण कर इसकेसमाबेश से इद्ध आहवनीयाग्नि का समिन्नन किया करते हैं , श्रद्धा से इस अग्नि में खुलोकस्य प्रहादेवताओं के लिए आहुति दी जाती है , ऐसी श्रद्धा का , जो कि ऐश्वर्य के शिरोभाग में ( ऐश्वर्य्यात्मकश्रीभाव की प्रतिष्ठारूप सूयं के ऊर्ध्वभाग में सौम्य परमेष्ठी में ) प्रतिष्ठित है , में अपनी इस वाद्वारा ( इस श्रद्धामय – श्राद्ध विज्ञानात्मक निबन्ध- रचनाकर्म में ) विस्तार कर रहा हूँ || ७ ||यज्ञकर्त्ता यजमान ( मनुष्य ) , तथा पार्थिव ब्रवर्ग्यभाग से यजन करने वाले दिव्यप्रारणात्मकदेवता वायु से ( वायुद्वारा प्रदत्त आहुतिद्रव्य से ) सुरक्षित रहते हुए ( अपनी इस रक्षा के लिए प्राणवाय्बात्मिका ) इस श्रद्धा की ही उपासना किया करते हैं । सम्पूर्ण प्राणी हृदयावच्छिन्न मन के संकल्पसे ( संकल्पसिद्धि के लिए ) इसी श्रद्धा की उपासना किया करते हैं । क्योंकि श्रद्धा से ही ग्रभीष्टफल सिद्धि होती है , ( अतएव सब इसी श्रद्धा का अनुगमन करते हैं ) ॥८ ॥त्रिपाकम्मस्वरूप सम्पादनानुगत ग्रहःकाल में ( प्रातः से सायं पर्यन्त ) हमप्रातःसवनात्मक प्रातःकाल में भी इसी श्रद्धा की आराधना करते हैं ,इसी श्रद्धा का अनुगमत करते हैं , एवं सायंसवनात्मक सूर्य्यास्तकालहे श्रद्धे ! आप तत्तत् कर्मानुष्ठानों के प्रति हमें श्रद्धावान् ६ नाइएप्रार्थना है ) || माध्यन्दिनसवनात्मक मध्याह्न में भी
में भी इसी का अनुगमन करते हैं ।
यही उस श्रद्धा से हमारी विनम्र
[ १६ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड मङ्गलपाठ
प्रियं श्रद्धे ददतः प्रियं श्रद्धे दिदासतः ।
प्रियं भोजेषु यज्वस्विदं म उदितं कृधि ॥ १० ॥
— ऋक्सं ० १०।१५१।२ ।
श्रद्धा देवानधिवस्ते ” श्रद्धाविश्वमिदं जगत् ” ।
श्रद्धां कामस्य मातरं हविषा वर्द्धयामसि ॥११ ॥
– तै ० ० ब्रा ० २ | ८ | ८ ||
पितरो मा विश्वमिदं च पृश्निमातरो मरुतः स्वर्काः ।
ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रास्ते नो देवाः सुहवाः शर्म्म यच्छत || १२ ||
– ऐ ० आ ० ५।१२।११ ।
हे श्रद्धे ! दान देने वालों के लिए , तथा दान देने की इच्छा रखने वालों के लिए , दोनों के लिएआप अभीष्टफल प्रदान करें । हे श्रद्धे ! ग्राप मेरा , मत्सम्बन्धी भोगार्थी बन्धुओं का , यज्ञकर्ता यजमानोंका , सबका कल्याण करें ( आपसे यही हमारी विनम्र प्रार्थना है ) ।।१० ।।उक्त लक्षण यह सौम्य श्रद्धातत्त्व अपने सोमात्मक आहुतिभाव से सदा आग्नेय प्राणात्मक यज्ञियदेवदेवताओं का अनुगामी बना रहता है ( श्रद्धा द्वारा ही देवप्राण की अव्यात्म में प्रतिष्ठा होती है ) ।अपने आपोमय पारमेष्ठ्य ‘ श्रत् ‘ लक्षण सत्यरूप से लोकसृष्टि की प्रवृत्तिका भी यही श्रद्धा है , एवंपञ्चाहुति – क्रम से लोकप्रतिष्ठ प्रजासृष्टि की मूलप्रभवा भी यही श्रद्धा है । अतएव यह सम्पूर्ण विश्व( स्थावर सृष्टि ) भी श्रद्धामय है , एवं सम्पूर्ण जगत् ( जङ्गमलक्षरणा प्राणिसृष्टि ) भी श्रद्धात्मक हीहै । हृदयस्थ सौम्य मन में चान्द्रनाड़ी द्वारा प्रतिष्ठित होती हुई यही श्रद्धा मानस कामनाओं की जननीहै । ऐसी सर्वरूपा इस श्रद्धा को इस वाङ्मय ( श्राद्धविज्ञानरूप ) हविःप्रदान द्वारा मैं समृद्ध कररहा हूं ।।११ ।।अग्निप्वात्ता – सोमसत् – बहिषत् नामक अन्नपितर , प्राज्यपा- सोमपा- हविर्भुक – नामक अन्नादपितर , तथा’ सुकाली ‘ नाम के अनुभवपितर मेरी , तथा सम्पूर्ण विश्व की रक्षा करें । सूर्य्यरश्मिगत पृश्नि तत्व सेउत्पन्न पितरप्राण- सहयोगी मरुद्देवता भलीभाति पूजनीय हैं , ( क्योंकि इन्हीं के द्वारा पितृकर्म्म सम्पन्नहोता है ) । साथ ही अग्निद्वारा प्रतिग्रहण करने वाले ‘ हुताद ‘ देवता , तथा यजत्र प्रहुत द ‘ देवता ,दोनों स्वसहयोगी मरुद्गणों के साथ , एवं मरुद्गणावच्छिन्न सर्वविध पितरों के साथ प्रार्थना पूर्वक इसवाग्यज्ञ में बुलाए जाते हुए हमारे लिए लोकसम्पत्यवाप्तिलक्षण सुख प्रदान करें । में
[ १७ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
ओष्ठापिधाना न कुली दन्तैः परिवृता पविः |
सर्वस्यै वाच ईशाना चारु मामिह वादयेन् ॥ १३ ॥
ऐ ० आ ० ३।२।५ ।कृमि – कीट – पक्षी – पशु – मनुष्य – यक्ष – राक्षस – गन्धर्व – पिशाच – इन्द्र- पितर – ब्रह्म – प्रजापति , आदि यवयावत्( चतुर्दशविध ) भूतसर्गों के वाङ्मय प्रपञ्च की अधिष्ठात्री ( ‘ पितरो वाक्यमिच्छन्ति ‘ के अनुसारपितृप्राणाकर्षिणी ) , वस्त्राच्छादन की भांति श्रेष्ठद्वय से सुरक्षित , छिद्ररहित प्रतएव वज्रसदृश दृढदन्तपक्ति से घिरी हुई यह वाग्देवी इस वाग्यज्ञ ( श्राद्धविज्ञान – निबन्ध ) में मुझ से प्रिय हित – मितसत्य – वाणी का प्रयोग करावे || १३ ||
।। इति मङ्गलपाठ : ।।
‘ किमपि प्रास्ताविकम् ‘
जि स १ ‘ श्रद्धा ‘ तत्त्व की आहुति से २ ‘ सोम ‘ ३ ‘ वृष्टि ‘ ४ ‘ प्रश्न ‘ ५ ‘ रेत : ‘ क्रम से पाचवीं आहुति
में पुरुषसृष्टि का विकास हुआ है , जो ‘ श्रद्धा ‘ तत्त्व अपने आप रूप से सम्पूर्णविश्व तथा विश्वप्रजापति का उपादान कारण है , जो ‘ श्रद्धा ‘ तत्त्व त्रयीलक्षण सत्यमूत्ति प्रतिष्ठाब्रह्म के साथ
युक्त हो कर सम्पूर्ण विश्व की प्रतिष्ठा बना हुआ है , जिस ‘ श्रद्धा ‘ तत्त्व की माहुति
से दिव्यलोकस्थ प्रारणदेवता अपने सम्वत्सराग्नि को समिद्ध रखने में समर्थ हो रहे
हैं , द्युलोकस्थ सूर्य्य – केन्द्र से भू- केन्द्र पर्य्यन्त वितत जिस ‘ श्रद्धा ‘ मूत्र के द्वारा श्रद्धा – संस्मरणद्य लोकस्थ प्रारणदेवता , तथा द्य लोकस्थ ( ‘ प्रद्यौ ‘ नामक द्य लोक में प्रतिष्ठित ) पितर भूलोकस्य यजमानोंसे प्रदत्त स्व – स्व आहुतिद्रव्य प्राप्त करने में समर्थ बन रहे हैं , जिस ‘ श्रद्धा ‘ तत्त्व के आधार पर अग्नीषोमात्मक पाश्चमहाभौतिक विश्व का स्वरूपसम्पादक आधिदैविक ( प्राकृतिक ) अग्नीषोमीय अग्निहोत्रप्रतिष्ठित है , जिस ‘ श्रद्धा ‘ तत्त्व की अपनी स्वरूपरक्षा के लिए वायु से सुरक्षित ( वायुमय – प्राणमय )देवता निरन्तर उपासना किया करते हैं , जो ‘ श्रद्धा ‘ हृदयस्थ मन में प्रतिष्ठित होती हुई सर्वविधकामनाओं की जननी वन रही है — जो ‘ श्रद्धा ‘ अपने ‘ अत् ‘ लक्षण सत्यधर्म्म से सत्यभाव की मूलप्रतिष्ठाबन रही है , जो ‘ श्रद्धा ‘ सूत्र अवरपुरुषों के शुक्र में प्रतिष्ठित महानात्मा के द्वारा चन्द्रोर्ध्वभाग में प्रतिष्ठितप्रत – परपुरुषों के महानात्माओं को तृप्त कर पिण्डदान द्वारा ‘ श्राद्धकर्म्म ‘ की मूलप्रतिष्ठा बन रहा है , जिस’ भद्धा ‘ तत्त्व के संस्काराभाव – प्रशिक्षा – कुशिक्षा पर शिक्षा – निषिद्धकम्मनु – गमन -इत्यादि कारणों से अभिभूतहो जाने के कारण मानववर्ग सत्यधर्म से विमुख से हो जाता है , – के* – ” इति तु पञ्चाम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ” – छां ० उप ० ८।६।१ ।
[ १८ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
वैदिक विज्ञान के अस्तप्राय हो जाने से , कुछ एक शताब्दियों से पुप्पित – पल्लवित होने वालेवर्णाश्रमधर्म्मविरोधी ‘ सन्तमत ‘ के आक्रमरण से , आर्षधर्मविलुप्ति से व्याजधर्मानुगामी अर्वाचीनवेदभक्तों की काल्पनिक वेदव्याख्याओं से , परराजतन्त्रानुगता आर्षसंस्कृतिविरोधिनी परशिक्षा के प्रबलआक्रमण से , सर्वोपरि अचिन्त्याप्रमेय कालपुरुष की महिमा के अनुग्रह से श्रद्धानुगत श्राद्धतत्त्व से सर्वथाअनभिज्ञ , ‘ श्राद्धेतिकर्त्तव्यता ‘ से एकान्ततः पराङ्मुख , भ्रान्त भारतीयों के मानसक्षेत्र में श्राद्धसूत्र प्रतिष्ठितकरने के लिए ‘ श्राद्धविज्ञान निबन्ध ‘ के आरम्भ में उसी विश्वरूपा ‘ श्रद्धादेवी ‘ का संस्मरण करते हुए’ श्राद्धविज्ञान ‘ आरम्भ किया जाता है ।
श्रार्षप्रजाभिमत श्राद्धकर्म – ब्राह्म – अहोरात्र की एकोत्तरसप्तति ( ७१ ) चतुर्युगी में से प्रकान्त अष्टाविंशतितमा ( २८ वीं )चतुर्युगी के सत्ययुग आरम्भ काल से कलियुग के आज के भोग्यकाल से लगभग ६० – ७० वर्ष पहले तक
भारतीय आस्तिक प्रजा का ‘ श्राद्धकर्म के सम्बन्ध में जो श्रद्धा
विश्वास था दुर्भाग्य से इन प्रतीत ६० – ७० वर्षों से किसी एक आकस्मिक
कलिवात्याहित भञ्झावात से वह शिथिल हो गया । फलतः ‘ देवकार्थ्याद्द्विजातीनां पितृकार्य्यं विशिष्यते ‘ के अनुसार अग्निहोत्र – दर्श पूर्णमासादि लक्षण देवकार्य्य से भी कहींविशेष महत्त्व रखनेवाला पिण्डपितृयज्ञात्मक पितृकार्य्य परप्रत्ययनेय कतिपय महाशयों की दृष्टि में अश्रद्धेयबन गया , जिसका दुष्परिणाम सङ्ग – दोष से आस्तिकश्रद्धालु प्रजावर्ग को भी भोगना पड़ रहा है ।प्रजा का श्राद्धकर्म की इतिकर्त्तव्यता के सम्बन्ध में शास्त्राभिमत जो चिरन्तन श्रद्धा विश्वास है ,उसका निम्नलिखित शब्दों में अभिनय किया जा सकता है—
” स्थूलशरीर परित्यागानन्तर प्रतिवाहिक – अङ्गष्ठमात्र सूक्ष्मशरीर धारण कर – ‘ ये वै केचास्माल्लोकात् प्रयन्ति , चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति ‘ ( कौषीतकि ० उप ० १ | २ | २ | ) इत्यादि कौषीतकिसिद्धान्तानुसार प्रेतसंज्ञक ‘ प्रत्यगात्मा ‘ ( भोक्तात्मा ) कर्म्मफल भोगने से पहले एक बार चान्द्रसम्वत्सरानुगत १३ महीनों में चन्द्रलोक में पहुंचता है । इसके साथ साथ ही आकृति – प्रकृति- अहंकृतिभाव – त्रयीका अधिष्ठाता , सत्त्व – रज – स्तमोगुणक , चतुरशीति ( ८४ ) कल ऋण धनात्मक पित्र्य – सह पिण्डों सेनित्ययुक्त , शुक्रप्रतिष्ठ , ‘ पितर ‘ संज्ञक ‘ महानात्मा ‘ भी स्वप्रभव चन्द्रलोक के उर्ध्व भाग में उसी एकचान्द्रसम्वत्सर में प्रतिष्ठित हो जाता है । उत्तरायणानुगता स्वर्गलोकगति , तथा दक्षिणायनानुगतानरकलोकगति , दोनों आत्मगतियों के विभाजन , अतएव ‘ एतद्वै लोकस्य द्वारं , यच्चन्द्रमा : ‘ ( कौ ० उप ०११२ १३ ) इस श्रुति के अनुसार ‘ द्वार ‘ ( उभयलोकद्वार ) नाम से प्रसिद्ध चन्द्रमा में जब प्रत्यगात्मातथा महानात्मा , दोनों प्रेतात्मा पहुंच जाते हैं , तो अनन्तर महानात्मा तो स्त्रप्रतिष्ठालक्षण विधूर्ध्व भागमें ही प्रतिष्ठित रह जाता है , एवं कर्म्मभोक्ता प्रत्यगात्मा शुभाशुभ – कर्म्मफल भोगार्थ शुभाशुभ उत्तरदक्षिण – मार्गों में से किसी एक मार्ग को स्वगति का निमित्त बनाता हुआ ‘ देही कर्म्मगत गतः ‘ के अनुसारलोकान्तरानुगामी बन जाता है ।
परलोकात्मक चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित पिता – पितामह प्रपितामहादि के महानात्मा ही ‘ प्रेत – पितर ‘कहलाए हैं | इन्हें ही ‘ मृतपितर ‘ कहा गया है । इन मृतपितरों के लिये , दूसरे शब्दों में परलोकगत
[ १६ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनाप्रेतसंज्ञक स्ववंशजों के लिये श्रद्धापूर्वक पिण्डदान करना ही श्राद्धकर्म्म है । इस सम्बन्ध में प्रार्षप्रजा कायह दृढ़ विश्वास है कि , शास्त्रोक्त पद्धति से पुत्र – पौत्रादि वंशजों के द्वारा प्रदत्त पिण्ड – रस इन्द्रियातीत श्रद्धासूत्र द्वारा परलोकस्थ पितृ – पितामह प्रपितामहादि की तृप्ति का कारण बनता है । प्रदत्त पिण्डरस( प्राणात्मक रस ) से सबल बनता हुआ प्रेतात्मा पार्थिवाकर्षरण जनित दुःख से युक्त अपनी ‘ अश्रुमुखा’वस्थाको छोड़ता हुआ सुखपूर्वक चन्द्रलोक में पहुँच कर सापिण्डयभाव को प्राप्त हो जाता है । ‘ गजच्छाया ‘ सेसम्बन्ध रहनेवाले कन्यागत महालय श्राद्धपक्ष में तत्तत प्रेतपितरों की तत्तन्निधन – तिथियों में पुत्रादि द्वारासम्पादित पिण्डदानादिलक्षण श्राद्धकर्म से तत्तत प्रेतपितर प्रतिवर्ण तृप्त हुआ करते हैं । श्राद्धान्न से तृप्तपितर श्रद्धासुत्र द्वारा भूपिण्डस्थ स्व – पुत्रादि के शुक्रस्थ पित्र्यसहः – पिण्डात्मक महानात्मा में जीवनीयसन्ततिवितानात्मक – पित्र्यरस का प्रधान करते रहते हैं । इस ग्रहित रस से प्रजातन्तुवितान अक्षुण्ण बनारहता है , फलतः वंशोच्छेद का अवसर नहीं आने पाता । जो अभिनिविष्ट परलोक जाते हुए , तथा परलोकमें पहुँचे हुए प्रेतपितरों के निमित्त पिण्डदानादिलक्षरण श्राद्धकर्म्म नहीं करते , उनके प्रेतपितरों के पित्र्यसहःपिण्ड क्षीण हो जाते हैं । उनके क्षीरण हो जाने से तदभिन्न ततपुत्रादि के शुक्र में प्रतिष्ठित महानात्मा केपित्र्यसहः – पिण्ड क्षीण हो जाते हैं , शुक्र निर्बल हो जाता है । यही पिण्डक्षयअन्यतम कारण बनता है । इस वंशोच्छित्ति के साथ – साथ बुभुक्षित पितरों केसे भी वश्चित रहते हैं । आवश्यक है कि , प्रजातन्तुवितान के लिये इनके वंशोच्छेद का एक
अभिशाप से ये लोकसमृद्धि
तथा प्रेतात्मा को तृप्त करउस तृप्ति के द्वारा उभयविध सोख्य प्राप्ति के लिये प्रत्येक श्रद्धालु श्रद्धानुसार परिग्रहों का संग्रह करयथाविधि पिण्डानादि लक्षण श्राद्धकर्म्म का अनुगमन करता रहे । पिण्डदानादि लक्षण श्राद्धकर्म्म केइन्हीं अतिशयों का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है –
स्वर्गं – ह्यपत्य – मोजश्च – शोर्य्यं- क्षेत्रं – बलं
तथा ।
पुत्रं श्रेष्ठ्यं च सौभाग्यं समृद्धि मुख्यतां शुभाम् ॥ १ ॥
प्रवृत्तचक्रतां चैव वारिणज्यप्रभृतीनपि ।
रोगित्त्वं यशो वीतशोकतां परमां गतिम् ॥२ ॥
धनं वेदान् भिषसिद्धि कुप्यं गा अप्यजाविकम् ।
अश्वानायुश्च विधिवद्यः श्राद्धं सम्प्रयच्छति ॥ ३ ॥
कृत्तिकादि – भरण्यन्तं स कामानाप्नुयादिमान् ।
आस्तिकः श्रद्दधानश्च व्यपेतमदमत्सरः ॥४ ॥
[ २० ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
वसुरुद्रादितिसूताः पितरः श्राद्धदेवताः ।
प्रणयन्ति मनुष्यारणां पितृन् श्राद्धेन तपिताः ॥५ ॥
आयुः , प्रजां , धनं , विद्यां , स्वर्ग , मोक्षं , सुखानि च ।
प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पतामहाः ॥ ६ ॥
— याज्ञवल्क्यस्मृति : प्रा ० श्रा ० १० ।“ गतानुगतिको लोको न लोक : पारमार्थिकः ” इस लोकसूक्ति से सम्बन्ध रखने वाली प्रचलितपरिपाटी के अनुसार ग्रन्थारम्भ करने से पहले उसकी आवश्यकता के सम्बन्ध में भी कुछ निवेदन कर
देना आवश्यक हो जाता है । इसी आवश्यकता का अनुभव करते हुए हमें इस
सम्बन्ध में नाप्राप्त अप्रिय सत्य को लक्ष्य बनाते हुए निबन्ध रचनाकारणत्रयी निबन्ध की आवश्यकतातथा तत्सम्बन्ध में प्रथमकाररण निदर्शन का स्पष्टीकरण करना पड़ रहा है । उन तीनों कारणों में से प्रथम कारण की
ओर ही विज्ञ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है ।श्राद्धकर्म्म के आर्षप्रजाभिमत स्वरूप के सम्बन्ध में पूर्व में जो कुछ कहा गया है , धाम्मिक जगतसदा से उसी वक्तव्य का अनुगमन करता आ रहा है । पिण्डदानादि – लक्षरण श्राद्धकर्म की वैदिकता में उसेकभी सन्देह नहीं हुआ । परन्तु विगत अर्द्धशताब्दी से इस आवश्यकतम वैदिक कर्म्म के सम्बन्ध में अनेकप्रकार के ऊहापोह होने लगे हैं । यों तो ऐसे ऐसे परोक्ष विषयों के सम्बन्ध में साधारण प्रज्ञजनों कोसदा से ही व्यामोह होता चला आ रहा है , फलस्वरूप भारतीय आर्षधर्म्मानुगता ( सनातनधर्म्मानुगता )आर्षप्रजा को सदा से ही सामयिक धर्म्मविप्लवों का सामना करना पड़ता है । तथापि वर्तमान शताब्दीका घर्म्मविप्लव अपना एक विशेष महत्त्व रखता है । साथ ही विगत शताब्दियों में परमतवादियों केधर्म्म पर जितने भी आक्रमण हुए हैं , उन सबकी अपेक्षा आज का आक्रमण अपेक्षाकृत कहीं अधिकभयाबह बन रहा है । कारण यही है कि , आज तक इस मानवधर्म्म पर केवल बाह्य आक्रमण हुआ था ,दूसरे शब्दों में अब तक सनातनधर्म को विधम्मयों का ही सामना करना पड़ा था , परन्तु दुर्भाग्य सेआज उसे स्वधर्मानुयायियों के ही ग्राक्रमण का लक्ष्य बनना पड़ रहा है , एवं इसी दृष्टि से यह आक्रमणअतीत आक्रमणों की तुलना में कहीं ज्येष्ठ बन रहा है । इस धाम्मिक विप्लव के जहां अन्यान्य कई एकसामान्य कारण हैं , वहां यदि हम भूल नहीं कर रहे , तो सर्वश्री स्वामी दयानन्दजी ही एक मुख्य कारणमाने जा सकते हैं । ‘ अनूतसंहिता वै मनुष्या : ‘ ( शत ० १११११११ ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसारमनुष्य जन्मतः अनुतसंहित होते हैं , स्वप्रभव ऋत के अनुग्रह से भ्रान्ति हो जाना मनुष्य का स्वाभाविकधर्म्म है । अतीतानागतज्ञ , विदितवेदितव्य , साक्षात्कृतधर्म्मा महर्षियों की दिव्य दृष्टि जहां सर्वथानिर्भ्रान्त होती है , वहां केवल बाह्यदृष्टि के अनुगामी सामान्य मनुष्य इन्द्रियातीत विषयों के सम्बन्ध मेंकेवल अपनी बाह्यदृष्टि के आधार पर ‘ इदमित्थमेव ‘ निर्णय करने में सर्वथा असमर्थ हैं । यदि वेस्वकल्पना के आधार पर इन परोक्ष विषयों के सम्बन्ध में हठाब कुछ निर्णय करने की अनाधिकार
[ २१ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनचेष्टा करने लगते हैं , तो उनकी यह चेष्टा आर्षप्रजा की में सर्वथा भ्रान्त , अतएवअप्रामाणिक ही उद्घोषित होती है । तत्त्वतः स्वामीजी मनुष्य थे , उनके पास ऋषिदृष्टि काग्रात्यन्तिक अभाव था । अतएव अपनी विशुद्ध बाह्यदृष्टि के आधार पर उन्होंने बाह्यजगत से सम्बन्धरखने वाली सामाजिक त्रुटियों के प्रति जहां हिन्दू जाति का उपकाराभास किया , वहां अपने मानवसुलभ अनार्ष अनृतभाव के कारण वेदशास्त्रसिद्ध धाम्मिक इतिकर्त्तव्यताओं के ( वेदसिद्ध प्रतिमापूजन , (अवतारवाद , श्राद्ध , षोडश संस्कार , आदि के ) सम्बन्ध में स्वयं वेदशास्त्र को ही आधार बना कर अपनीविशुद्ध – अनार्ष – अनृतभावापन्ना- कल्पना के आधार पर कुछ एक ऐसी भयङ्कर भूलें कर डाली हैं , जिनकेप्रभाव से क्रियात्मक सनातनधर्म का एक प्रकार से गला घुट गया है । यह कौन जानता था कि , प्राच्यआर्षधर्म्म , आर्षसंस्कृति , सभ्यता आदि प्राच्यविभूतियों के अन्तःप्रकाश को अपने चाकचिक्चयुक्तबाह्यप्रकाश से अभिभूत करने वाले पाश्चात्यशिक्षात्मक सौभाग्य सूर्य को पूर्णरूपेण विकसित होने के लिएएक भारतीय वेदभक्त ब्राह्मण के ही द्वारा इस प्रकार का सुपरिष्कृत धरातल उपलब्ध हो जायेगा । आत्मपरमात्मसत्ताज्ञान से वञ्चित , प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानने वाले वेदविरोधी चार्वाक लोग अज्ञानतावश –
” मृतानामिह जन्तूनां श्राद्धं चेत्त प्तिकारणम् |
गच्छतामिह जन्तूनां व्यर्थं पाथेयकल्पना ॥ ” *इत्यादि जिन कुतर्कमूलक कारणाभासों को सामने रखते हुए ‘ पिण्डदानादिलक्षण ‘ श्राद्धकर्म्म काउपहास किया करते हैं , स्वामीजी ने उसी चार्वाकमूलक नास्तिकवाद जैसे जधन्यवाद का पोषरण करतेहुए मृतपितृनिमित्तक पिण्डदानादिलक्षण श्राद्धकर्म्म का खण्डन करने का दुस्साहस किया है । चार्वाकमतकी समालोचना करते हुए , उक्त श्लोक को चार्वाक मत में उद्धृत करते हुए , चार्वाक के इस कथनकी पुष्टि करते हुए उत्तरपक्ष में आगे जाकर स्वामीजी कहते हैं – ब्रह्मरणों ने प्रेतकर्म्म अपना जीविकार्यबना लिया है , परन्तु वेदोक्त न होने से खण्डनीय है ‘ ( देखिये – सत्यार्थ प्रकाश , १२ स ० । चा ०मतमीमांसा , २१ वां संस्करण , २६४ पृ ० , प्वीं पंक्ति ) ।
इसी प्रकार ग्रार्षसभ्यता के अन्य पक्षपाती , अनुगकरी ऋषिभाषा के अपने आपको पृष्ठपोपक मानने वाले , किन्तु उसी चार्वाकमतमीमांसा में सुप्रसिद्ध वेदव्याख्याता श्रद्वेय महीधरादि वेदभाष्यकारो के प्रति – ‘ हां भांड धूर्त निशाचरवत् महीधरादि टीकाकार हुए है , उनकी धूर्त्तता है , वेदों कीनहीं ( सत्या ० २६४ पृ ० १० , ११ पंक्तियां ) इस प्रकार की अशिष्ट – असभ्य भाषा का प्रयोग करते
* मरे हुए प्राणियों की तृप्ति का साधन यदि श्राद्ध ( श्राद्धकर्म में मृतपितरों के लिए प्रदत्तपिण्डादिरूप श्राद्धान्न ) है , तो विदेश यात्रा करने वाले जीवित प्राणियों के लिए पाथेय ( मार्ग के भोजन )
की कल्पना व्यर्थ है । फिर तो जिस द्वार से परलोकगत मृतप्राणियों को भोजन पहुंचा दिया जाता है ,
उसी द्वार से विदेशस्थ प्राणियों को भी तृप्त किया जा सकता है ।
[ २२ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
हुए शिष्टतम उन्हीं स्वामीजी ने अपने विश्वविख्यात ‘ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ‘ नामक ग्रन्थराज में पंच
महायज्ञान्तर्गत पितृयज्ञ का निरूपण करते हुए अपने निम्नलिखित वेदशास्त्रसम्मत , – हां विशुद्ध वेदशास्त्रसम्मत ? – उद्गार प्रकट किए हैं—
” तस्य ( पितृयज्ञस्य ) द्वौ भेदस्तः – एकस्तर्परगाख्यो , द्वितीयो श्राद्धाख्यश्च |तत्र येन कर्म्मणा विदुषो देवान् पितृ श्च तर्पयन्ति , सुखयन्ति , तत्तर्पणम् । तथायत्तेषां श्रद्धया सेवन क्रियते , तच्छ्राद्धं वेदितव्यम् । तत्र विद्वत्सु विद्यमानेष्वेतत्कर्म्म संघट्यते , नंव मृतकेषु । कुतः । तेषां प्राप्त्यभावेन सेवनाशक्यत्वात् ।तदर्थकृत कर्म्मणः प्राप्त्यभाव इति व्यर्थापत्तश्च । तस्माद्विद्यमानाभिप्रायेणंतत्
कर्म्मोपदिश्यते । सेव्यसेवकसंनिकर्षात् सर्वमेतत् कर्तुं शक्यते । ” *
( ऋ ० भा ० भू ० पितृयज्ञ विषय )
उक्त निदर्शन से प्रकृत में बतलाना यही है कि , जन्मानुगता जाति के अनुग्राहक परम्परा प्राप्तशुभसंस्कारों की कृपा से ‘ श्राद्ध ‘ शब्द से तो स्वामीजी को प्रेम अवश्य है । परन्तु वेद – तत्त्वानभिज्ञतानुगत स्वाभाविक अनृतसंस्कार के अनुग्रह से श्रुति स्मृतिशास्त्रसम्मता पिण्डदानादि – लक्षण मृत – प्रेतात्मानुगता चिरकाल से चली आने वाली श्राद्धतिकर्त्तव्यता से आप सहमत नहीं हैं , एवं इस अपनी प्रमान्यता की मान्यता के सम्बन्ध में मुख्य कारण आप यह बतला रहे हैं कि ” वेदशास्त्र में श्राद्ध का विधाननहीं है ” । शास्त्राभिमत तर्क ( सु ) से सम्बंन्ध रखने वाले वाद का अनुगमन ‘ वादे वादे जायते तत्त्वबोध : ‘ .के अनुसार जहां तत्त्वनिर्णायक माना गया है , वहां शास्त्रविरुद्ध तर्क ( कु ) से सम्बन्ध रखने वाला वाददूर से ही प्ररणम्य है । अतएव ऐसे खण्डन – मण्डनात्मक वाद से हमारे अन्तर्जगत् का कोई सम्बन्ध नहीं है ।प्रतिपाद्य विषय का युक्ति , तर्क , विज्ञान , सर्वोपरि प्राप्तप्रमाण के आधार पर प्रतिपादन कर देना हीहमारे कर्त्तव्य की कृतकृत्यता है । ऐसी दशा में स्वामीजी के श्राद्धकर्म्मविषयक शास्त्रीय कल्पित सिद्धा
* ” इस पितृयज्ञ के तर्पर , और श्राद्ध , नामक दो भेद हैं । जिस कर्म से ( मनुष्य ) विद्वानों ,देवताओं , ऋषियों , तथा पितरों का तृप्त करते हैं , उन्हें सुख पहुंचाते हैं , वह सुख कर्म्म तर्पण है । एवंजिस कर्म्म से श्रद्धापूर्वक इनकी सेवा की जाती है , उसे श्राद्धकर्म्म समझना चाहिए | यह कर्म्म जीवितपितर आदि के सम्बन्ध में ही उत्पन्न है , मरे हुओों के लिए नहीं । कारण ? मृत पितर जब हैं ही नहीं ,तो उनकी सेवा करना , उनके लिए किए गए कर्म की उनके न रहने से व्यर्थता भी है । इसलिए श्राद्ध ,तर्पण का उपदेश विद्यमान ( जीवित ) पितरों के लिए ही हुआ है । इस स्थिति में सेवक , और सेव्य( स्वामी ) के सामने रहने से ( विद्यमान रहने से ) सेवादि सब काम चरितार्थ हो जाते हैं । “
[ २३ 1श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनान्ताभास का इस विज्ञान प्रधान शास्त्रीय निबन्ध में उल्लेख करना यद्यपि सर्वथा असामयिक , साथ ही कुछएक अभिनिविष्ट सन्मित्रों के लिए उद्वेगकर था , तथापि किसी कारण- विशेष से ही हमें इस निबन्धरचना – कारण- निदर्शन में ऐसे अप्रिय सत्य का आश्रय लेना पड़ा है । वेदशास्त्रसम्मत धर्म से विरोधरखने वाले चार्वाकादि नास्तिक ही यदि पिण्डदानादिलक्षण श्राद्धकर्म के विरोधी होते , तो कोई हानिन थी । क्योंकि उनकी सहजसिद्धा प्रासुरी बुद्धि सदा से ही शाश्वत देवासुरसंग्राम की भांति दिव्य कमके साथ प्रतिद्वन्द्विता करती आई है । हानि की क्या कथा , उस परिस्थिति में तो ‘ श्राद्धविज्ञान ‘ का रचनाप्रयास भी अनावश्यक था । परन्तु जब हम अपने ही समाज में अपनी ही जाति में श्राद्धकर्म केसम्बन्ध में विरोध पाते हैं , दूसरे शब्दों में एक ही वेदशास्त्र को प्रमाणाधार मानने वाला धार्मिक जगत्ही जब श्राद्धकर्म्म के सम्बन्ध में अपना विभिन्न दृष्टिकोण रखता है , तो उस परिस्थिति में- ‘ एकस्मिन्धम्मिरिण विरुद्धनाना कोट्यवगाहि ज्ञानं संशय : * इस लौकिक न्याय के अनुसार साधारण तटस्थ जिज्ञासुमनुष्य सन्देह में पड़ जाते हैं ।
अपने आपको ‘ सनातनधर्मावलम्बी ‘ कहने वाले आर्ष- महानुभाव भी श्राद्धकर्म को वैदिक कर्म्ममान रहे हैं , एवं तदनुसार अनुगमन कर रहे हैं । उधर अपने आपको ‘ आर्यसमाजी ‘ उद्घोषित करने वालेमहाशय – गण भी श्राद्ध की वैदिकता में यथाकथश्चित् निष्ठा रख रहे हैं । मानते दोनों हैं , परन्तु इसमान्यता के प्रवृत्तिनिमित्त भिन्न भिन्न हैं । एक ( स ० ) कहते हैं- मृतपितरों के लिए पुत्रादि का श्रद्धा – सूत्रद्वारा पिण्डप्रदान करना श्राद्ध है । ‘ दूसरे ( प्रा ० ) कह रहे हैं- ‘ जीवित पितरों को अन्न – वस्त्रादि से श्रद्धापूर्वक तृप्त करना ही श्राद्ध है । ‘ निर्विवाद है कि इस मतविरोध ने , किंवा धर्म ( सनातनधर्म ) , तथा
( ) की प्रतिस्पर्द्धा ने आज जनसाधारण को संशयास्पद् बना रक्खा है । इस ‘ गृहकलह , ‘किंवा दो ग्रहों के पारस्परिक ‘ ग्रहकलह को शांत करने के लिए ही इस निबन्ध की आवश्यकता समझीगई है ।
हमारा यह विश्वास ही नहीं , अपितु दृढ़ निश्चय है कि , यदि पाठकों ने दोषदृष्टि से भी एकबार’ श्राद्धविज्ञान – निबन्ध ‘ को आद्योपान्त देखने का कष्ट उठाया , तो उनके श्राद्ध कर्म सम्बन्धी सम्पूर्ण सन्देहदूर हो जायंगे । अज्ञानता ही मतभेद की जननी है , मतभेद ही सामाजिक संगठन का विच्छेदक है , समाजविच्छेद ही राष्ट्रीय निर्वलता का प्रवर्त्तक है , एवं निर्वल राष्ट्र ही सर्वस्वविघातिका परतन्त्रता के पाशमें बद्ध होता है , जिसका प्रत्यक्ष निदर्शन श्राज का परतन्त्र भारतवर्ष है । हम ज्ञानबल के अनुग्रह सेनिष्पक्षपात बनते हुए यथार्थस्थिति पर पहुंच कर परस्पर का विरोध छोड़ दें , विरोध – परिहार द्वारा अपनेप्रसंगठित समाज को सुसंगठित बनाते हुए स्वतन्त्र ह्नान करने के अधिकारी बनें श्राद्धविज्ञान रचना कीकारणत्रयी में यही प्रथम कारण – निदर्शन है ।
* ” एक ही धर्म्म , किंवा धर्मों में स्थाणु , तथा पुरुषलक्षण अनेक विरुद्ध ज्ञानों का जब उदय होजाता है , तो ऐसी दशा में – ‘ स्थाणुर्वा वा ‘ इत्याकारक सन्देह उत्पन्न हो जाता है । “
T २४ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
द्वितीयकारण निदर्शन– पाञ्चभौतिक विश्व में जितने भी जङ्गम प्राणी हैं , उन सब में ‘ मनुष्य ‘ प्राणी का स्थान सर्वोच्चमाना गया है । इस सर्वोच्चता का एकमात्र कारण यही है कि , अन्य जङ्गम – प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य
में ज्ञानशक्ति विशेष मात्रा से विकसित रहती है । इसी ज्ञानशक्ति के प्रभाव
से अपने ज्ञानानुगत पराक्रम से अपना प्रभुत्त्व जमा लेता है । किं बहुना , स्वज्ञान
बल से ही इसने विश्व की समस्त चर – अचर विभूति को अपना भोग्य बनारक्खा है । ज्ञानशक्ति ही पुरुषत्व है , ज्ञानविहीन पुरुष पुच्छविषाणहीन पशु है । जिस प्रकार सप्तवितस्तिकायात्मक , वैश्वानर – हिरण्यगर्भ – सर्वज्ञमूत्ति ईशप्रजापति अपने ज्ञानबल से सम्पूर्ण विश्व का भोक्ता बनरहा है , एवमेव ईश्वरसंस्था में भुक्त यच्चयावत् ईश्वरांशों का प्रवर्ग्यरूप से अपनी अध्यात्मसंस्था में संग्रहकरता हुआ – पुरुषो वं प्रजापदिष्ठम् ‘ ( शत ० १ कां ० ।५ ० १ कं ० । ) इत्यादि ब्राह्मण श्रुति केअनुसार प्रजापति के समकक्ष बन कर यह पुरुष सर्वत्र स्वसत्ता की व्याप्त किए हुए है ।
यद्यपि सृष्टि – विज्ञानानुसार पुरुष में जन्म से ही इतर प्राणियों की अपेक्षा ज्ञानशक्ति का आधिक्यरहता है , तथापि इसके पूर्ण विकास के लिए शिक्षाशास्त्र का प्राश्रय ग्रहण करना आवश्यक हो जाता है ।ऊर्ध्व – प्ररोहित होने की जन्मतः शक्ति रखते हुए भी वृक्षादि जैसे जलसिञ्चन के बिना विकसित नहीं होसकते , एवमेव बिना बाह्यशिक्षा के जन्मतः प्रतिष्ठित भी ज्ञानशक्ति का विकास असम्भव है | अशिक्षितमनुष्य की ज्ञानशक्ति मुकुलित रहती है , मेघाच्छन्न सूर्य्यवत् उसकी स्वज्ञानरश्मियों का प्रसार अवरुद्धरहता है । जो दशा एक पशु की है , वही दशा एक यथाजात अशिक्षित मनुष्य की है । कर्त्तव्यविवेकशून्यऐसे मनुष्य की दृष्टि किसी पूर्ण ( वास्तविक ) तत्त्व की ओर न जाकर शून्य ( निरर्थक ) भावों कीओर ही मुहुर्मुहुः आकर्षित होती रहती है , अतएव ( मुहुर्मु हुरनुगता शून्यसमतुलिता ‘ ख ‘ दृष्टि से ) ऐसाअशिक्षित यथाजात ‘ मूर्ख ‘ कहलाया है ।
इस सम्बन्ध में यह भी स्मरण रखना आवश्यक होगा कि , मनुष्य जैसी शिक्षा का प्राश्रय लेताहै , उसका हृदयावच्छिन्न मन , एवं ततप्रतिष्ठिता बुद्धि , दोनों का विकास तदनुरूप ही होता है । शिक्षामनुष्य के हृद्य जगत का निर्माण करनेवाला एक अव्यर्थ – यन्त्र है । भारतवर्ष सभ्यतासंस्कृति – साहित्य के विकासकाल से आरम्भ कर अद्यावधि अनेक आक्रमणों का सामना किया । उदाहरणके लिये वेदविरोधी- बौद्धमत को ही लीजिये । शताब्दियों तक बौद्धसंस्कृति की छत्रच्छाया में रहता हुआभी भारतवर्ष अपनी वैदिक संस्कृति से पराङ्मुख न हुआ । इसका एकमात्र कारण था ‘ शिक्षायन्त्र परउसका अपना आधिपत्य ‘ । यही कारण था कि , बौद्धमत में दीक्षित ‘ देवानांप्रिय ‘ प्रियदर्शी सम्राट् अशोककी राजसभा में जो सम्मान बौद्ध भिक्षुत्रों को प्राप्त था , वही सम्मान आर्षधर्मानुयायी ब्राह्मणों को प्राप्तहुआ | अपने प्रबल तर्कवाद से नास्तिकों के युक्तिवाद का समूल विनाश कर विलुप्तप्राय प्राधकोपुनः स्थापित करनेवाले भगवान शङ्कराचार्य , प्रातःस्मरणीय कुमारिलभट्ट , श्रद्धेय मण्डनमिश्र , जगदीश्वरके प्रति
[ २५ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
ऐश्वर्य्यमदमत्तो हि मामज्ञाय वर्त्तसे ।
उपस्थितेषु बौद्धेषु मदधीना तव स्थितिः ॥ ॐ
” इस प्रकार की गर्वोक्ति का प्रयोग करनेवाले अपने सुप्रसिद्ध ‘ कुसुमाञ्जलि ‘ ग्रन्थ द्वारा ईश्वरसत्ता के संस्थापक , तर्कशास्त्रपारङ्गत सर्वश्री उदयनाचार्य , आदि कई एक महापुरुषों को उसी परम्परासिद्धस्वशिक्षा – सन्तान के बल पर तत्कालीन भारतवर्ष ने जन्म दिया | आगे जाकर दुर्भाग्य से इसश्रार्षसंस्कृति को यवनमत का सामना करना पड़ा । यह आक्रमण बौद्ध आक्रमण से कहीं भयङ्कर सिद्धहुआ | कला के अन्यतम शत्रु नरराक्षसों ने कला को विध्वस्त किया , देवप्रतिमाएं तोडी गई , देश कामौलिक साहित्य अग्निज्वाला को समृद्ध करने में सहायक बनाया गया , ललनाओं का सतीत्त्व छीनागया , अबोध बच्चे जीवितदशा में ही दीवारों में चुना दिए गए । यह सभी कुछ प्रकाण्ड ताण्डव हुआ ,परन्तु सौभाग्य से इस युग में भी आततायियों की दृष्टि से हमारा शिक्षायन्त्र यथाकथञ्चित् बचा रहगया । फलतः इस युग में भी हमारी मौलिक सभ्यता इस आक्रमण को सहने में सर्वात्मना समर्थ होगई । प्रतिभासम्पन्न कवियों के अतिरिक्त वर्णाश्रमधम्मत्मिक आधर्म के अनन्य समर्थक महात्मातुलसीदास , भक्तप्रवर सूरदास , सर्वश्री सन्त तुकाराम , समर्थ रामदास स्वामी , श्रीज्ञानेश्वर महाराज ,सूक्तिवर कबीर आदि महापुरुषों ने उसी भयावह युग में उसी शिक्षानुग्रह से इस देश को अलंकृत किया ।स्वनामधन्य हम्मीर , प्रताप , छत्रसाल , शिवाजी , गुरुगोविन्दसिंह , आदि क्षत्रियवीरों ने अपनी इसीआशिक्षा के बल से यवनों की प्रबलशक्ति को छिन्न भिन्न किया और इस प्रकार ‘ स्वधर्मे निधनं श्रय :परधर्मो भयावहः ‘ श्रादर्श की अनुगामिनी आप्रजा ने इस भवबन्धन से पुनः मुक्तिलाभ प्राप्त करलिया | परन्तु ….. |
इस ‘ परन्तु ‘ का अतीत इतिहास सभी इतिहासों की सीमा का अतिक्रमण करने वाला सिद्धहुआ । कहने के लिए यवनाक्रमणजनित भय से हमारा त्राण करने वाले , अतएव हमारे परम हितैषीपाश्चात्य महानुभावों की किसी शुभ मुहूर्त में भारत वसुन्धरा के वक्षस्थल पर पादप्रतिष्ठा हुई । जिस
} * ऐसी किंवदन्ती है कि एक बार उदयनाचार्य श्रीजगदीश के दर्शनार्थ पधारे । उनकी यहप्रबल इच्छा थी कि , जगदीशविग्रह ( मूर्ति ) उन्हें साक्षात्रूप से दर्शनों का सौभाग्य प्रदान करें । अनेकबार मानसिक प्रार्थना करने पर भी जब उन्हें साक्षात् दर्शन न हुए , तो अन्त में प्रवेश के कारण उनकेमुख से निकल पड़ा कि – ” हे जगदीश ! आज तू अपने ऐश्वर्य के मद में पड़ कर मेरा तिरस्कार( उपेक्षा ) कर रहा है । परन्तु तुझे यह नहीं भुला देना चाहिए कि , जब बौद्धलोग तेरी सत्ता ( ईश्वरसत्ता ) उखाड़ने के लिए सामने आते हैं , तो उस समय तेरी सत्ता मेरे अधीन रहती है ” । अर्थात् मैं नरहूं , तो संसार तुझे मानना छोड़ दे । सुनते हैं- भक्त की इस शुद्धहृदय से निकलने वाली भक्तिपूर्णअन्तर्वेदना के बल से भगवत्प्रतिमा ने साक्षाररूप से उदयनाचार्य को दर्शन दिए ।
[ २६ ]श्रोद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनाप्रकार सप्तगोलकयोग से , किंवा ऐन्द्रविद्य त् के आघात से समस्त भूपिण्ड कम्पित हो उठी | कहना नहींहोगा कि , यह आक्रमरण पूर्व के दोनों आक्रमणों से कही भयङ्कर था । परम राजनीतिज्ञ लार्ड मेकॉलेमहोदय ने भारतवर्ष की पावनभूमि पर पाश्चात्य शिक्षा प्रसार के साधनभूत भवन निर्माण की मूलभित्ति( नींव ) रखने के अनन्तर स्वदेश ( इंग्लैन्ड ) वासी अपने किसी बन्धु को निम्नलिखित आशय का एकपत्र प्रेषित किया था —
‘ मित्र ! आज मैंने भारतवर्ष ऐसा शिक्षालय स्थापित कर दिया है ,जिस में शिक्षा ग्रहण करने वाले भारतीय आचार , व्यवहार , सभ्यता , आदिमें सर्वात्मना यूरोपियन बन जायेंगे । रह जायेंगे केवल नाममात्र के लिएभारतीय ‘ ।
सचमुच उस दूरदर्शी राजनीतिज्ञ की उक्त भविष्यवाणी आगे जाकर सर्वथा चरितार्थ हुई |पाश्चात्यशिक्षा ने भारतीय नवयुवकों का हृदय और का और ही बना दिया , जोकि हृदयस्थान सभ्यता ,संस्कृति , जातीयता , आदि स्व – भावों की मूलप्रतिष्ठा माना गया है । इन शिक्षालयों में अपनी आयु केसारभाग की आहुति देने वाले , अपने जन्मदाता- अभिभावकों की सञ्चित सम्पत्ति का सदुपयोग ( ? ) करनेवाले हमारे इन नवयुवकों ने प्रतिफल में प्राप्त क्या किया ? श्रूयताम् !
‘ तुम्हारे पूर्वज निरे जङ्गली थे , विज्ञानशून्य थे , असभ्य थे , अग्नि – वायु – वृष्टि – आदि जड़ पदार्थों केपूजक थे । जो कुछ भी उन्नति हुई है , इसी युग में , एकमात्र हमारे अनुग्रह से ही हुई है । खाना , पीना ,सोना , उठना , चलना , फिरना , वेषभूषा धारण करना , सभ्यसमाज में बैठ कर सभ्यता का बर्ताव करना ,आदि सम्पूर्ण मानवधर्मों ( सभ्यताओं के प्रथम प्रवर्तक एकमात्र हम ही हैं । हमने तुम्हें पशु सेमनुष्य बनाया है , हमने तुम्हारे देश की अराजकता दूर की है , जो अराजकता तुम्हारे यहां आनेसे आज तक दूर न हुई थी । हां , स्मरण रखना , भारतवर्ष तुम्हारी प्रातिस्विक सम्पत्ति नहीं । तुम लोगोंने बाहर ( पामीर ) से आकर इस देश पर अपना अधिकार जमा लिया है ( इसलिए आज हम भीअपने पूर्व गुण – बल से इस पर अपना अधिकार प्रतिष्ठित करने में कोई आपत्ति नहीं समझते !!! ) ।तुम्हारा धर्म्म ब्राह्मणों की स्वार्थलीलामात्र है । इसी अवैज्ञानिक कल्पित धर्म के अनुगमन से आज तकतुम उन्नति से वश्चित रहे । अब इस हमारे शिक्षा साम्राज्य के आश्रय से तुम्हें जीवन की सफलता काअनुभव होगा ‘ ।
आचार – व्यवहार में परतन्त्रता का आदेश देने वाली , किन्तु विचार स्वातन्त्र्य प्रदान करने वाली ,प्रतएव मानवीयमन के विकास की अनन्य साधनभूता भारतीयबाना पहन कर उपस्थित होने वाली पाश्चात्य शिक्षा नेबनाया । इस ने आचार – व्यवहार में पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की , प्रार्षशिक्षा की प्रतिद्वन्द्विता में राजनीति का
शिक्षा से ठीक विपरीत प्रपना दृष्टिकोण
तथा विचारों में पूर्णरूप से परतन्त्र बना
[ २७ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
डाला । आचार – व्यवहार की स्वतन्त्रता से एक ओर जहां हमने भारतीय आचार – व्यवहारों का एकान्ततःपरित्याग कर प्रतीच्यदेशाभिमत आचार – व्यवहारों का अनुगमन करते हुए व्यक्तिगत रूप से अपने आपकोपरतन्त्र बना डाला , वहाँ दूसरी ओर स्वविचारपारतन्त्र्य से उन्हीं के विचारों का अनुगमन करते हुएहमने अपने आध्यात्मिक जगत् को भी परतन्त्रता के निविड़पाश में बद्ध कर डाला । इस प्रकार बाह्य ,तथा अन्तः , उभयथा हम परतन्त्र बन गए । आज न हमारे पास अपने आचार – व्यवहार हैं , न अपनेविचार | उभयविध दासता से आज हमें अपनी प्रतीत स्मृतियाँ भी मिथ्या प्रतीत होने लगी हैं । इसप्रकार वर्तमान शिक्षा यन्त्र के अनुग्रह से आज हम स्व – भाव से एकान्ततः विदूर पहुँच चुके है , एवं यहीवर्तमान शिक्षा की सबसे बड़ी देन है ।
से आचार – व्यवहारपारतन्त्र्यगर्भिता विचारस्वतन्त्रतात्मिका स्वतन्त्रता मानवीय मन का जन्म सिद्धअधिकार है । संसार की कोई भी प्रासुरीशक्ति ( भौतिकवल ) अधिक समय तक इस पर अपना अधिकारनहीं रख सकती । फलतः चरमसीमा पर पहुँच कर भारतीयक्षेत्र ने भी करवट बदली , और देश ने एकस्वर से सस्यश्यामला मातृभूमि का यशोगान प्रारम्भ किया । परन्तु एक सब से बड़ी भूल , हां सब सेबड़ी भूल उन गायकों ने कर डाली , अथवा तो चिरकाल से विकृत संस्कारों के अनुग्रह से स्वतः एव वहभूल हो पड़ी । जिनकी हृत्तन्त्री से स्वतन्त्रता का झङ्कार विनिर्गत हुआ , उनकी हृत्तन्त्री पूर्वकथनानुसारशिक्षादोष से आक्रान्त थी । मलिन दर्पण से विनिर्गत रश्मियाँ जिस प्रकार स्वस्वरूप से स्वच्छ शुक्लरहती हुई भी संसर्गदोष से मलिन रहती हैं , एवमेव परशिक्षाकान्ता हृत्तन्त्री से विनिर्गत स्वतन्त्रता कानिनाद भी कालान्तर में परतन्त्रता का ही साधक सिद्ध हुआ । इस परतन्त्रतात्मिका स्वतन्त्रता का पहलामुष्टिप्रहार उस ग्राभ्यसता पर ही हुआ , जिस की रक्षा ही एतद्देशीय स्वातन्त्र्य का बीजमन्त्र है ।
आज भारतवर्ष में स्वतन्त्रता की लहर ‘ वीचितरङ्ग ‘ न्याय से इतस्तत : प्रवाहित है | आबालवृद्ध वनिता , सभी स्वतन्त्रता प्राप्त करना चाहते है । इस प्रकार देश आज स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए व्यग्रहो रहा है । परिणामस्वरूप वर्त्तमान राज्यसत्ता के साथ सहयोग किया जा रहा है , तत्प्रदर्शनार्थविदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हो रहा है । ‘ सुस्वागत् ‘ ! ! ! । परन्तु साथ – साथ स्वतन्त्रता के अनन्यपोषक आधर्म्म का , तदनुगामिनि आशिक्षा का उपहास करना भी परमपुरुषार्थ माना जा रहा है ।‘ महद्दळुःखास्पदम् ‘ ! ! ! । सर्वत्र एक स्वर से यही सुनाई पड़ रहा है कि , – ‘ हमारे पतन का , हमारीपरतन्त्रता का एकमात्र कारण हमारा धर्म ( सनातनधर्म ) , तथा तत्प्रवर्त्तक- पोषक – समर्थक ब्राह्मरण हीहैं । स्पृश्यास्पृश्य , सहशिक्षा , विधवा परिगम , आदि को धर्म्माबिरुद्ध उद्घोषित करने वाले स्वार्थमूलक इसीसनातनधर्म्म ने , एवं तत्पृष्टपोषक स्वार्थी पण्डितों ने ही समाजस्वरूप का मूलोच्छेद करते हुए राष्ट्रपारतन्त्र्य का बीजवपन किया है । कलकत्ता में होने वाली कांग्रेस में देश के एक प्रमुख व्यक्ति ने तोयहां तक आगे बढ़ने का दुस्साहस कर डाला था कि , – ‘ जब तक इन शास्त्रों को अग्नि में नहीं जलादिया जायगा , तब तक देश कभी स्वतन्त्र न हो सकेगा ‘ ।
भगवान् चतुर्मुख ब्रह्मा ने लोक , प्रजासृष्टि निर्माण के लिए सर्वप्रथम वेदशास्त्र का आविर्भावकिया । सहसा वेदशास्र को छीन कर असुर पाताल में जा छुपे । वेदशास्त्र के बिना सृष्टिक्रम अवरूद्ध हो
[ २८ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
वेदशास्र का उद्धार करना पड़ा । एवं तब
दृष्टिकोण से जो शास्त्र ( वेदशास्त्र )
स्वरूपरक्षक बन रहा है , उसे अग्निसात् करके
प्रलयकाल को निमन्त्रण नहीं दे रहे ? जिसशास्त्र सिद्ध यज्ञकर्म के बल से देवताओं ने असुरों को परास्त कर अपनी विलुप्त स्वतन्त्रता पुनः प्राप्तकी , वही आर्षशास्त्र आज इन स्वतन्त्रता प्रेमियों की दृष्टि में अन्य बाधक प्रतीत होता हुआ क्या’ विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ‘ को चरितार्थ नहीं बना रहा ? गया । अन्तोगत्वा भगवान् विष्णु को मत्स्यावतार धारण करकहीं ब्रह्मा विश्वनिम्मरण कर्म्म में समर्थ हो सके । इस प्रकारन केवल भारतवर्ष का ही , अपितु सम्पूर्ण त्रैलोक्य कास्वतन्त्रता का आह्वान करने वाले ये स्वतन्त्रतावादी क्या
स्वतन्त्रता – प्रो मियों की वह कौन सी सभा न होगी , जहां प्राशास्त्र , तत्प्रवर्तक ऋषिगण , तन्मूलकसनातनधर्म्म , तत्पोषक पण्डितवर्ग , तदनुगामिनी प्रजा का अवाच्यवादों से सत्कार ( ? ) न कियाजाता हो ? साथ ही आषधपोषक विद्वानों को पुराणपन्थी ‘ रूढ़ियों के गुलाम स्वतन्त्रता के शत्रु ‘आदि सदुपाधियों से विभूषित न किया जाता हो ? आज तो यह धर्म्मविरोध यहां तक बढ़ गया है कि ,जिन देश के सर्वमान्य नेताओं का अपना प्रधान लक्ष्य एकमात्र असहयोगानुगमन था , वे भी इसी रसर्वतोभावेन झुक रहे हैं । पवित्र देवमन्दिरों में अवरवर्णों का बलात्कार से प्रवेश कराने में , उनके हितव्याज से धारासभाओं ( Legislativ Assembly ) में राजनियम ( Law ) बनवाने में ही आज हमारेइन देशनेताओं की सम्पूर्ण शक्ति का अपव्यय , किंवा निरर्थक क्षम हो रहा है । यह सब प्रकाण्डताण्डवक्यों हो रहा है ? उत्तर एकमात्र वही शिक्षामन्त्र | वर्तमान शिक्षा ने प्रजा के दिव्य – संस्कारपुञ्ज कोश्रावृत कर लिया है । आज हमारे उक्थ ( बिम्ब ) का स्वरूप दूषित हो गया है । दूषित उक्थ से दूषितअर्क ( मनोभावनाएं ) निकल रहे हैं * स्वसंस्कृतिरक्षक श्राशास्त्र ( वेदशास्त्र ) ज्ञान से एकान्ततः शून्य , शास्त्रसिद्ध – मनःसंस्थास्वरूपनिम्मपिक हार – विहारादिलक्षण प्राचार पारतन्त्र्य का सर्वथा तिरस्कार करने वाले ,अन्नदोष को गुरणपक्ष में स्थापित करने वाले , सर्वोपरि यावज्जीवन परशिक्षास्त्रोत में प्रवाहित रहने वालेमहानुभावों के उक्थ से यदि उक्त प्रकार के धर्म – बिरोधी अर्क निकलें , तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है ।वर्चस्व – तेजोयुक्त ज्ञानबल ही हमारे अन्तर्जगत का ‘ स्व ‘ भाग है , एवं ‘ स्व – तन्त्र ‘ से सम्बन्ध रखने वालीआचार – व्यवहार – पारतन्त्र्यगर्भिता विचारस्वातन्त्र्यमूला स्वतन्त्रता ही ‘ स्व – तन्त्र ‘ ( आत्मतन्त्र ) को सुरक्षित रखने वाली वास्तविक स्वतन्त्रता है , जिसकी मूलप्रतिष्ठा एकमात्र प्राशास्त्र तथा तदनुगामिनीआर्षशिक्षा ही मानी गई है । शिक्षानुगत ज्ञानबल ही ब्रह्मबल है , ( ज्ञानगुप्ति से ) श्रोजपूर्ण बना हुआकर्म्मबल ही क्षत्रबल है , ब्रह्म – क्षत्र ( ज्ञान कर्म्म ) से सुगुप्त अर्थबल ही विड्वल है । जहां वर्तमान शिक्षाविशुद्ध अर्थतन्त्र को अपना प्रधान लक्ष्य बनाती हुई जड़तामुलिका साम्राज्य – लिप्सा का समर्थन कर रहीहै , वहां आर्षशिक्षा ब्रह्म के ( ज्ञान के ) आधार पर क्षत्र ( कर्म ) द्वारा विड् ( अर्थ ) का नियन्त्रण करती )
* अनभ्यासेन वेदानामाचारस्य च वर्जनात् ।
श्रालस्यादन्नदोषाच्च मृत्युविप्राञ्जिघांसति ॥ ( मनुः ५१४ )
[ २६ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनाहुई धर्म्म , अर्थ , काम , मोक्ष , इन चारों पुरुषार्थों का समर्थन कर रही है , एवं यही भारतीय शिक्षाकी संक्षिप्त रूपरेखा है , जिसका अन्य निबन्धों में विस्तार से प्रतिपादन हुआ है । हमारा यह केवल विश्वासही नहीं ,, अपितु दृढ़ निश्चय है कि जब तक मानसिक दासता से देश उन्मुक्त नहीं हो जाता , तब तक अन्यप्रयत्नसहस्रों से भी वास्तविक स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं हो सकती । भारतीय दृष्टिकोण से मानसिकदासता सेत्राण पाने का एकमात्र उपाय है – अध्यात्ममूलिका सहजज्ञानशक्ति का विकास ज्ञानशक्ति विकास का एकमात्रउपाय है – अध्यात्ममूला आर्ष शिक्षा का अनुगमन , जो शिक्षा एकमात्र शास्त्र ( वेदशास्त्र ) में , एवं तन्मूलकस्मृति , पुराणादितर शास्त्रों में उपवृहित हुई है । जब तक उक्तलक्षण प्रार्षशिक्षा का अनुगमन न कियाजायगा , तब तक स्वयं जगदीश्वर भी हमें स्वतन्त्र न बना सकेंगे । देश का सौभाग्य है कि , देशनेता भीवर्त्तमान शिक्षा से आज संत्रस्त दिखाई देने लगे हैं । जैसा कि उक्थार्कस्वरूप द्वारा पूर्व में कहा गया है ,नेताओं का ध्यान अभी केवल शिक्षा प्रणाली की आकर्षित हुआ है । परन्तु वह प्रणाली कैसी हो ?शिक्षा कौनसी हो ? इत्यादि प्रश्न अभी उनके लिए असमाधेया प्रश्नावली ही बन रही है ।
व्यक्तितन्त्ररक्षक स्वानुगत प्रचार , व्यवहार , सभ्यता , संस्कृति , शिक्षा , साहित्य , आदि को जलाञ्जलि समर्पित करते हुए अपनी मौलिक जातीयता को स्मृतिगर्भ में विलीन कर हमें जो ‘ स्वतन्त्रता ‘ प्राप्तहोगी , उससे हमारा स्वतन्त्र सुरक्षित रहेगा ? अथवा विनष्ट हो जायगा ? इन प्रश्नों की मीमांसा मुकुलितनयन बन कर उन स्वतन्त्रता प्रेमियों को ही करना चाहिए । ‘ हम हम बने रहें , और फिर स्वतन्त्रताप्राप्त करें ‘ यही वास्तविक स्वतन्त्रता कहलाएगी । हमारी सामान्य दृष्टि में एक परतन्त्र अश्व कागर्दभ बनकर स्वतन्त्रता प्राप्त करने की अपेक्षा उसका अपने प्रश्वरूप से स्वतन्त्रता के लिए प्रयास करनाकहीं अधिक श्रेयः पन्था है । ‘ अस्तु इस पराधिकार चर्चा करने का न तो हमें अधिकार ही है , न योग्यताही है । प्रस्तुत वक्तव्य से निवेदन केवल यही करना है कि , जिस क्षण से हमारा शिक्षायन्त्र परायत्त बनाहै , उसी क्षरण से हमारी परतन्त्रता का श्रीगणेश हुग्रा । वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने , शिक्षाप्ररणाली मेंस्वीकृत वर्तमान ऐतिहासिक ग्रन्थों ने , वर्त्तमान ( पाश्चात्य ) विज्ञान के आधार पर समुद्भूत विविध प्राविष्कारों ने भारतीय प्रजा के मानस जगत में इस विश्वास को दृढ़मूल बना दिया है कि , यदि उन्नति का कोईश्रेष्ठ मार्ग है , तो वह है एकमात्र पाश्चात्यशिक्षा ! पाश्चात्य सभ्यता ! ! पाश्चात्य आचारव्यवहार ! ! !
वर्त्तमान शिक्षा की अतिगति के अनुग्रह से हम अपने स्वरूप को भूल गए , आत्मविस्मृतिमूलकहमारे दुर्भाग्य का यह पहला , तथा मुख्य कारण । भारतीय विद्वानों की अनन्य कृपा का प्रहार दूसराकारण । आर्व साहित्यमूला आर्वशिक्षा प्रार्षशिक्षामूलक धर्म ( वर्णाश्रमध ) , आचार , व्यवहार ,संस्कृति , सभ्यता , आदि ऐसे दृढ दुर्ग माने गए हैं , जिन्हें विश्व की कोई भी प्रवलशक्ति स्थानच्युत नहीं करसकती । ऐसी स्थिति में प्रश्नोत्थान स्वाभाविक बन जाता है कि , जबकि हम अपनी प्रतिष्ठापर प्रतिष्ठित थे , तो प्रतिष्ठा की तुलना में सर्वथा अप्रतिष्ठित पाश्चात्यप्रतिष्ठा ने में प्रतिष्ठा का
[ ३० ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
प्रासन क्यों , एवं कैसे छीन लिया ? यह एक माना हुआ सिद्धान्त है किसाफल्य का प्रधान कारण है । अवश्य हो जिस युग में पाश्चात्य शिक्षा नेकिया , हम अपनी अपनी निर्बलता ही पराक्रमण
हमारे यहाँ का आतिथ्य ग्रहरण
शिक्षा को या तो भुला चुके होंगे , अथवा तो उसका व्याज से प्राचरण कर रहे होंगे ।अन्यथा आगन्तुक परशिक्षाक्रमण कभी हमें अपनी आशिक्षा प्रतिष्ठा से च्युत नहीं कर सकता था ।
हमारे उपदेशक विद्वान् अपने उपदेशों की प्रथम भूमिका में ही यह घोषणा करते हैं कि , पाश्चात्यशिक्षा के प्रभाव से भारतीय नवयुवकों का श्रद्धा विश्वास सनातनधर्म्मादेशों से हट गया है । ‘ इस सम्बन्धमें हमारे विद्वान् बन्धु यह भूल जाते हैं कि , पाश्चात्यशिक्षा के साथ साथ स्वयं हमारा भी इस प्रश्रद्धानमें परोक्ष तथा प्रत्यक्षरूप से पूर्ण सहयोग हैं । पहले तो हमारा उपदेश ही केवल वाचिक है , उस परआशास्त्र को हमने दूर से ही प्रणम्य मानते हुए अपने उपदेशों को और भी अधिक शून्यं शून्यं बना लियाहै । कर्तव्य की प्रतिच्छाया से भी वश्चित , आर्षशास्त्र की सर्वथा उपेक्षा करने वाले , सर्वोपरि सामयिकसन्तमत ( सम्प्रदायवाद ) के अभिनिवेश से सम्पुटित ऐसे उपदेशों , तथा उपदेशक विद्वानों के रहते यदिपाश्चात्य शिक्षा स्वाक्रमण में सफल हो जाय , तो इसमें क्या प्राचर्य है ।
भूशास्त्र ( वेदशास्त्र ) के रहस्य ज्ञान का अधिकार प्रदान करने के किए जिन ‘ शिक्षा ,कल्प , व्याकरण , निरुक्त , छन्द , ज्यौतिष ‘ इन ६ अङ्ग शास्त्रों ने जन्म लिया था , कुछ एक शताब्दियों सेसे भारतीय विद्वानों ने इन अङ्ग शास्त्रों के , उनमें भी विशेषतः व्याकरणशास्त्र के अध्ययनाध्यापन को हीप्रधानता दे रक्खी है । वेदाङ्ग ज्योतिष का स्थान मयासुरोप हित अर्वाचीन ज्योतिष ने ग्रहण कर रक्खाहै । षडङ्गों में से शिक्षा , कल्प , निरुक्त , छन्द , ये चारों श्रङ्गशास्त्र भी स्मृतिगर्भ में विलीन हैं । इसके अतिरिक्त काव्य – साहित्यादि ने भी अपनी प्रभुता प्रतिष्ठित कर रक्खी है । इस प्रकार ज्ञान – विज्ञानप्रधान श्रङ्गीभूत वेदशास्त्र का सर्वथा तिरस्कार कर नाममात्र के लिए अङ्गशास्त्र , विशेषतः काव्य – साहित्य परिशीलनमें ही अपने सम्पूर्ण जीवन की आहुति देने वाना आज का विद्वतसमाज आर्यधर्म के मौलिकरहस्यज्ञान( उपपत्तिज्ञान ) से सर्वथा पराङ मुख हो रहा है । यदि विशेष अनुग्रह हुआ , तो स्मृति ग्रन्थों पर धर्म परिशीलन की सीमा समाप्त मान ली जाती है । सम्भवतः हमारे उन मान्य विद्वानों से यह तिरोहित नहींहै कि , स्मृतिग्रन्थ केवल अनुशासक ग्रन्थ हैं | ‘ ऐसा करो , ऐसा न करो , जब करो , तब करो ‘ इत्यादि रूपसे तत्तदुपादेय कम्मों की विधि ( आज्ञा ) बतलाने वाला , तथा तत्तदनुपादेव शास्त्रविरुद्ध कर्मों का निषेधकरने वाला विधिनिषेधात्मक ग्रन्थ है । वहाँ आपकी- ‘ ऐसा ही क्यों करें , ऐसा क्यों न करें इन जिज्ञामात्रों का समाधान प्राप्त नहीं हो सकता । कारण उपपत्ति बतलाना स्मृतिशास्त्र के अधिकार से सर्वथावहिभूत है । यदि भूल से कोई स्मृतिशास्त्र से ‘ क्यों ? ‘ प्रश्न कर बैठता है , तो वह – ‘ नास्तिको वेदनिन्दकः ‘कह कर उसका तिरस्कार कर देता है ।
बात यथार्थ है । प्रधान न्यायालय अपने कनिष्ठ अधिकारी ( मातहत ) को यह आज्ञा देता हैकि , तुम इस आशय का एक आज्ञापत्र प्रजा में वितीर्ण कर दो कि , ‘ आज से एक सप्ताह पन्त कोईभी व्यक्ति रात्रि के ११ बजे पीछे मकान से बाहर न निकाले । यदि कोई इस राजाज्ञा का उल्लङ्घन
[ ३१ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनाकरेगा , तो वह दण्डनीय समझा जायगा । आज्ञानुसार कनिष्ठ अधिकारी प्रजा में आज्ञापत्र वितीर्ण करदेता है । कोई भी व्यक्ति इस कनिष्ठ अधिकारी से , जिसका एकमात्र कर्त्तव्य है – प्रधान न्यायालय से निकलेआज्ञापत्र को वितरण कर देना – यह नहीं पूछता कि ‘ अमुक आज्ञापत्र क्यों निकाला गया , क्यों आज्ञा दीगई ? ‘ यदि कोई मूर्खतावश पूछ बैठता है , तो इसे यही उत्तर मिलता है कि ‘ मैं नहीं जानता , प्रधानन्यायालय से पूछो ‘ । ठीक यही परिस्थिति श्रुति – स्मृतिशास्त्रों के सम्बन्ध में समझिए । श्रुतिशास्त्र अपनीअपौरुषेयता के सम्बन्ध से स्वतः प्रमाण बनता हुआ जहाँ प्रधान न्यायालय है , वहाँ स्मृतिशास्त्र ‘ श्रु तेरिवास्मृतिरन्वगच्छत् ‘ के अनुसार तज्ञका अनुगवन करता हुआ कनिष्ठ अधिकारी है । वेदविहित से( वेदाज्ञासिद्ध ) धर्म का प्रदेशमात्र देना ही उसके अपने अधिकारक्षेत्र की अन्तिम सीमा है । यदि उससे कोई जिज्ञासु सद्भावना से उपपत्तिज्ञान के सम्बन्ध प्रश्न करता है , तो वह उत्तर देता है –
अर्थकामेष्वसक्तानां धर्म्मज्ञानं विधीयते ।
धर्म्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ||
– मनुः २।१३ ।
तात्पर्य्य मनुवचन का यही है कि , ” जिन्हें धर्म के धमत्त्वलक्षण उपपत्तिज्ञान – रहस्यज्ञान कीजिज्ञासा है , उन्हें वेदशास्त्र का ही स्वाध्याय करना चाहिए । वहीं से प्रत्येक स्मार्त्त – धर्म्मादेश के ‘ क्यों ‘ ?का समाधान प्राप्त हो सकेगा ” । जैसा कि निवेदन किया गया है , भारतीय विद्वानों ने वेदार्थ केअध्ययनाध्यापन से अपने आपको उदासीन बना रक्खा है । व्याकरणादि का सामान्य ज्ञान प्राप्त करइधर – उधर की कुछ एक स्मृतियों का आलोडन – विलोडन कर ऐसे ही अर्द्धदग्ध महानुभाव देश के धर्म्माचार्य्य बने हुए हैं । संशय करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है । साथ ही जब तक संशयनिवृत्ति नहींहो जाती , तब तक संदिग्ध विषय पर श्रद्धा एवं विश्वास का उदय भी सम्भव नहीं है । एक ऐसानवयुवक , जिसने यावज्जीवन पाश्चात्य – शिक्षा का अनुगमन किया हो , जिसे प्रत्येक विषय युक्ति- तर्क – विज्ञानके आधार पर ही समझाए गए हों , तब तक स्वधर्म सिद्धान्तों पर कभी पूर्ण श्रद्धा नहीं कर सकता ,जब तक कि उसे धर्म्म का वैज्ञानिकरहस्य युक्ति- तर्क द्वारा नहीं समझा दिया जाता । स्वयं मनुभगवान्ने भी ‘ यस्तकरणानुसंधत्ते स धर्म वेद नेतर : ‘ ( मनुः १२ १०६ ) इत्यादि रूप से स्पष्ट शब्दों मेंवेदार्थोपयोगी तर्कवाद को धर्म्मपरिज्ञान के सम्बन्ध में एक आवश्यक साधन स्वीकार किया है ।
नवशिक्षा – दीक्षित एक नवयुवक स्वभावतः उत्पन्न सन्देह – निवृत्ति के उद्देश्य से जिज्ञासा रूप सेधम्मोचार्यों की सेवा में विनीतभाव से , अथवा तो अपने स्वाभाविक उच्छ ङ्खलभाव से पहुँचता है , औरप्रश्न करने लगता है कि – ” भगवान् ! मृतप्राणियों को निमित्त बनाकर श्राद्धकर्म्म क्यों किया जाताहै ? लाखों कोस दूर बैठे प्राणी ( पितर ) ब्राह्मणभोजन से क्यों कर तृप्त हो जाते हैं ? पूर्व शरीर कोछोड़ कर प्राणी जब तत्काल नवीन शरीर धारण कर लेता है , तो ऐसी अवस्था में श्राद्ध किस की तृप्तिके लिए किया जाता है ? एक के उत्पन्न होने से , तथा एक के मर जाने से उस जात मृत के सभी वंशजअस्पृश्य क्यों मान लिए जाते हैं ” ? उत्तर में हमारे आचार्य महोदय शास्त्रीय ( स्मार्त्त ) प्रमाण उद्धृत में
[ ३२ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
करते हुए– “ शास्त्र ऐसा आदेश देता है , इसलिए ऐसा ही करना न्याय है ” इस सूक्ति से वे उस त्रागन्तुकजिज्ञासु की जिज्ञासा शान्त करना चाहते हैं । ” शास्त्र ऐसा आदेश क्यों देता है ? ” इस सम्बन्ध में ग्रापसर्वथा तटस्थ बने रहते हैं । यदि जिज्ञासु अधिक आग्रह करता है , तो आचार्य महोदय कुद्ध हो पड़तेहैं , एवं भूताविष्ट वनकर – “ तुम तो पाश्चात्य शिक्षा संसर्ग में पड़ कर नास्तिक वन गए , तुम्हें शास्त्रों परविश्वास नहीं रहा , जाम्रो तुम्हारे साथ सम्भाषण करने में भी हमें प्रायश्चित का भागी होना पड़ेगा ” इसप्रकार मत्तप्रलाप करने लगते हैं । इस भर्त्सना का परिणाम यह होता है कि , उस जिज्ञासु को यहविश्वास कर लेना पड़ता है कि , “ वास्तव में सनातनधर्म केवल काल्पनिक जग [ है , ब्राह्मणों के स्वार्थसाधन का द्वार मात्र है । भला यावज्जीवन धर्मशास्त्र का स्वाध्याय – मनन करने वाले विद्वान् भी जबधर्म्माज्ञात्रों के सम्बन्ध में युक्तियुक्त समाधान नहीं कर सकते , तो ऐसी दशा में इस धर्म की काल्पनिकतामें क्या सन्देह रह जाता है ” । सचमुच ग्राज इस एक महत्त्वपूर्ण कारण से भी धर्म – विश्वास उत्तरोत्तरशिथिल होता जा रहा है ।
यद्यपि हम मानते हैं कि उपपत्तिविज्ञानात्मक रहस्यज्ञान सर्वसाधारण के परिज्ञान की वस्तु नहींहै । प्रत्येक व्यक्ति रहस्पज्ञान प्राप्त करके ही धर्म का आचरण करे , यह सर्वथा असम्भव है ।’ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्य्या कार्य्यव्यवस्थितौ ( गी ० १६०२४ ) इत्यादि भगवदादेशानुसार शास्त्रीयवचनों पर अनन्यनिष्ठा रखते हुए – ‘ महाजनो येन गतः स पन्थाः ‘ इस न्याय के अनुगमन में हीसर्वसाधारण का कल्याण है । लक्ष्यंकचक्षुष्कता की तुलना में लक्षणकचक्षुष्कता ही सिद्धि का अन्यतमद्वार माना गया है । यह सब कुछ जानते हुए भी वर्त्तमान युग के लिए हम उपपत्तिज्ञान – प्रचार कोआवश्यकतम साधन माने विना नहीं रह सकते । इसके अतिरिक्त यदि उपपत्तिज्ञान सर्वथा अनावश्यक हीहोता , तो स्वयं वेदशास्र में , तथा वेदशास्र के ब्राह्मएभाग में स्थान – स्थान पर उपपत्तिज्ञान का स्पष्टीकरणही उपलब्ध न होता । ब्राह्मणग्रन्थ प्रतिपादित प्रत्येक ऋत्यर्थ कर्म्म , तथा पुरुषार्थकम की इतिकर्त्तव्यताके साथ – साथ ‘ तद्यत् – अप उपस्पृशति , मेध्या वा आपः पवित्रं वा आपः ‘ मेध्यो भूत्वा व्रतमुपायानीति ,
* हवनीय , तथा , गार्हपत्य के मध्य में खड़े होकर आचमन करना ही ‘ अप – उपस्पर्श ‘ कर्म्म है |क्यों आचमन किया जाता है ? इसी प्रश्न का समाधान करती हुई श्रुति कहती है कि , पानी मेध्य( सङ्गमनीय ) है , पवित्र ( दोपमार्जक ) है । उधर अपने स्वाभाविक अमृतभाव से पुरुष अमेध्य , तथाअपवित्र है । ऐसी ग्रमेध्य अपवित्र अध्यात्मसंस्था में मेध्य पवित्र यज्ञसंस्कार तब तक प्रतिष्ठित नहीं होसकता , जब तक कि वह किसी उपाय विशेष से मेध्य , तथा पवित्र न बना ली जाय । इसी उद्देश्य सेग्रष – उपस्पर्श कर्म्म किया जाता है , जिसका विशद वैज्ञानिक विवेचन ‘ शतपथब्राह्मरण – विज्ञानभाष्य ‘ मेंनिरूपित है ।
२ नाकारणं हि शास्त्रेऽस्ति धर्म्मः सूक्ष्मोऽपि जाजले !
काररणाद्धर्म्म मन्विच्छन् स लोकानाप्नुते शुभान् ॥
ज्ञात्त्वा कर्म्मारिण कुर्वीत नाज्ञात्त्वा कर्म्म प्राचरेत् ।
प्रज्ञानेन प्रवृत्तस्य स्खलनं स्यात् पदे पदे |
[ ३३ ]प्रस्तावना श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डपवित्रपूतो व्रतमुपायानीति , तस्माद्वा श्रप उपस्पृशति ‘ ( शत ० १ | १ | १ | १ ९ ) इत्यादि रूप से उपपत्तिप्रकरणभी समाविष्ट रहता है । यही क्यों , स्वयं वेदशास्त्र ने ही एक स्थान पर यह स्पष्ट किया है कि , ” जोकर्म्म मनोयोगलक्षणा ‘ श्रद्धा ‘ के , कार्य्य – कारण – सम्बन्धपरिज्ञानात्मिका ‘ विद्या ‘ के तथा उपपत्तिज्ञानलक्षणा’ उपनिषत् ‘ के सहयोग से किया जाता है , वह अतिशयरूप से फलप्रद होता है , जैसा कि – ‘ यवेव विद्ययाकरोति , श्रद्धयोपनिषदा , तदेव वीर्य्यवत्तरं भवति ‘ ( छां ० उप ० ११ ११० ) इत्यादि उपनिषच्छु ति सेप्रमाणित है । इसी आधार पर कारणविज्ञान को श्रेयः प्राप्ति का तथा कर्म्मसौष्ठव का अन्यतम कारणमाना गया है । जिस वर्त्तमानयुग में प्राच्य प्रतीच्य सभ्यताओं का संघर्ष चल रहा हो , भौतिक , अतएवक्षणिक , अतएव दुःखप्रवर्त्तक , अतएव शून्यं शून्यं – लक्षण जिस विज्ञानशास्त्र को लेकर प्रतीच्य – संस्कृति कानिगरण करने के लिए आज मुंह बाए खड़ी हो , ऐसे विषम युग में ‘ विषस्य विषमौषधम्’– ‘ कण्टकंकष्टकेनैवोद्धरेत् ‘ इत्यादि लोकन्यायों का अनुगमन करते हुए तो यह सर्वथा आवश्यक हो जाता है कि ,प्राणात्मक – अतएव नित्य , अतएव आनन्दप्रवर्तक , अतएव पूर्ण – पूर्ण – लक्षण भारतीय वेदविज्ञानात्र काश्रय ग्रहण किया जाय । बिना ऐसा किए उक्त संघर्ष से प्राच्यसंस्कृति का त्राण पाना कठिन ही नहीं ,
अपितु सर्वथा असम्भव है । भौतिक महासंग्राम के कारण आज भारतवर्ष संत्रस्त है । परमात्मानुग्रह सेजिस दिन संग्रामसाधक घातक शस्त्रप्रपञ्च निधनावस्था को प्राप्त हो जायगा , उसी दिन संसार कुछ क्षणोंके लिए एक बार शान्ति का श्वास ले सकेगा । परन्तु कुछ ही समय पीछे इस अतीत युद्ध से भी कहींभयङ्कर सांस्कृतिक – संघर्ष का सूत्रपात होगा | तत्तद्राष्ट्र अपनी अपनी संस्कृतियाँ लेकर इस संघर्ष में भागलेंगे । इस अहममिका में जिस राष्ट्र की संस्कृति सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगी , वही प्रमुख स्थान पा सकेगी ,शेष संस्कृतियाँ उस प्रमुख संस्कृति के उदर में समाविष्ट हो जायँगों , एवं वही समय युद्ध का अन्तिमनिर्णायक समय माना जायगा | क्या उस सांस्कृतिक संघर्ष से भारतराष्ट्र अपने आप को बचा सकेगा ?कभी नहीं , इसे इच्छा से नहीं , तो अनिच्छा से योग देना पड़ेगा , एवं तब इसके सामने यह प्रश्न उपस्थितहोगा कि , ” मैं इस संघर्ष में विजय प्राप्त करने के लिए कौन सी संस्कृति का अनुगमन करू ” । वर्तमानबुग के देशनेता भले ही हमारे कथन की आज उपेक्षा कर दें , परन्तु उन्हें कालान्तर में ही यह अनुभवकरना पडेगा कि , भावी संघर्ष में विजय प्राप्त करने का एकमात्र साधन होगा नित्य विज्ञानप्रधानशाश्वतशान्तिप्रदाता प्रासाहित्य एवं तन्मूला संस्कृति | इस भावी दृष्टिकोण की दृष्टि से भी यहआवश्यक है कि , कारण विज्ञानात्मक साहित्य का अधिक से अधिक प्रचार किया जाय । सांस्कृतिकसंघर्ष को थोड़ी देर के लिए उपेक्षणीय भी मान लिया जाय , तब भी अपने अभ्युदय के नाते भी इसकीआवश्यकता का अपलाप नहीं किया जा सकता ।
वैज्ञानिक तत्त्वों के विलुप्तप्राय हो जाने से ही ईश्वरीय प्राकृतिक नित्य – सनातन – मानवधर्म आजमतवादरूप में परिणत होता हुआ शान्ति प्रवृत्ति के स्थान में कलहप्रवृत्ति का कारण बन रहा है । एक’ वाह गुरुजी ‘ के नाम पर समस्त सिक्ख सम्मिलित हो जाते हैं , एक पैगम्बर के नाम पर सम्पूर्ण यवनप्रजा का संघटन सम्भव है । परन्तु सनातनधर्म के पास ऐमा आज एक भी उद्घोष नहीं है , जिस केआधार पर वह समस्त सम्प्रदायों का एकसूत्र में संगठन कर सके । केवल वैदिक विज्ञान ही एक ऐसा
३४ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनाशङ्ख नाद है , जिस के आह्वान पर सम्पूर्ण सम्प्रदाएं समवेत हो सकती हैं । इस प्रकार साम्प्रदायिकसंगठन के नाते भी विज्ञानतत्त्व का प्रचार – प्रसार आवश्यक बना रहा है ।
इस विज्ञाननिधि के विस्मृतप्राय हो जाने से ही उस परम वैज्ञानिक अनादि सनातनधर्म कीआज ‘ ख्रीष्ट ‘ -जैन – बौद्ध – मोहम्मदीय ‘ आदि मतवादों के साथ तुलना की जा रही है । उस वृद्धातिवृद्धप्रपितामह को इन वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रों की कक्षा में लाकर इन के साथ उसके औचित्य – अनौचित्य कासमतुलन किया जा रहा है । सीमा यहीं समाप्त नहीं हो जाती । उसी के सुपूतों द्वारा इन मतवादों कीतुलना में इसे न केवल स्थान ही नीचा दिया जाता , अपितु उसका अपमान भी किया जा रहा है , उसकेप्रति अवाच्यवादों का प्रयोग किया जा रहा है । ‘ ईसामसीह कैसे थे ? बड़े महात्मा थे , बुद्ध कैसे थे ?अहिंसा , दया के अवतार थे , ‘ सुस्वागतम् । हां , तो आर्षधर्म्म प्रवर्त्तक ऋषि कैसे थे ? बड़े स्वार्थी थे ,मानव सभ्यता के अन्यतम शत्रु थे , पक्षपाती थे , यह है आज की उस समालोचना का निष्कर्ष , जिसकेसमर्थक निबन्धों को पढ़कर आज भारतीय नवयुवक अपनी प्रतिभा का सदुपयोग ( ? ) कर रहे हैं ।सौभाग्य कहिए अथवा दुर्भाग्य , कोई सा ही सामयिकपत्र ( समाचारपत्र ) बचा होगा , जो आए दिनधर्म्माज्ञाओं की , तत्प्रवर्त्तक महर्षियों की , तदनुगामी सनातनधर्म्मावलम्वियों की निन्दा से अपने श्रीमुखपर कालिख न पोतता होगा ? वह समाचारपत्र ही क्या , जिस के प्रत्येक अङ्क में धर्म्मविरुद्ध कार्यों केदो चार समाचार समाविष्ट न हों । आज तो हमारा यहाँ तक पतन हो गया है कि हमने अपने मनोरञ्जकचित्रपटों में भी धर्म्मनिन्दा को अपना प्रधान लक्ष्य बना लिया है , और ऐसे ही चित्रपट आज हमारे लिएविशेष आकर्षण की वस्तु बने हुए हैं । देश – नेताओं के कर – कमलों के द्वारा उद्घाटित कतिपय सामाजिकचित्रपटों में रुढ़िवाद के नाश पर भारतीयवर्णाश्रमधर्म पर उसी के प्रसूनों द्वारा जो प्रसूनवृष्टि देखनेसुनने में आती है , वह एक प्रकार से हमारी संस्कृति की पतन की ही सूचिका मानी जायगी । एवमेवपाश्चात्य – संस्कृति की अरुणप्रतिभा से युक्त भारतीय नवयुवकों में से कोई सा ही ऐसा सौभाग्यशाली युवकबच रहा होगा , जो प्रातः सायं उठते – सोते अपने इस पूज्य का उपहासादि साधनों से सत्कार न करताहोगा ।
से छोड़िए पाश्चात्यशिक्षा दीक्षितों की बात । विद्वानों में से भी ऐसा कोई विरला ही विद्वान् होगा ,जो अन्तःकरण से सनातनधर्म के प्रत्येक आदेश के सामने अपना मस्तक विनम्र कर देता होगा | जोविद्वान् अपने आपको प्राच्य संस्कृति के अनन्यपोषक कहते हैं , जो ‘ कट्टर सनातनधर्मी ‘ उपाधि से अपनेआपको गौरवान्वित मानते हैं , जो आए दिन सभामस्वकाष्ठों का अपने ताण्डवनृत्य से दर्पदलन करते हुएअहमहमिका कर्म्म से चारमुष्टिप्रसङ्ग का स्मरण कराते हुए अर्थशून्य सनातनधर्मसभाओं को ऋणग्रस्तबनाने का पुण्यसञ्चय करते रहते हैं , धर्म के जयघोषों से जो द्यावापृथिवी ( आकाशपाताल ) के विच्छेदको हटाते रहते हैं , ऐसे उपदेशकों से यदि उनका ही कोई अन्तरङ्ग व्यक्ति धर्म्माज्ञाओं के जब कभी सन्देहात्मक प्रश्न कर बैठता है , तो उनके मुखविवर से भी यही उत्तर निकलता है कि , ‘ ऐसा प्रश्न करनाव्यर्थ है | हम स्वयं जब कभी विचार करते हैं , तो ऐसा ही प्रतीत होता है , मानो यह सब केवल कल्पनाका ही साम्राज्य हो । परन्तु क्या करें , सर्वसाधारण के द्वारा प्राप्त प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए , तथा
[ ३५ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनाआजीविका निर्वाह के लिए जान बूझ कर आत्मा को धोका देना ही पड़ता है । जब अपने घर की हीयह दुर्दशा है , तो नवशिक्षित तथा अन्यमताबलम्बी सनातनधर्म्म पर यदि पेक्ष करते हैं , तो इस मेंउनका क्या अपराध है । बे तो जिज्ञासू हैं , वास्तविक तत्त्वपिपासू हैं । जव विद्वान् उन्हें सन्तुष्ट नहीं करसकते , श्रपितु पुरस्कार में विद्वानों की ओर से उन्हें ‘ नास्तिक ‘ की उपाधि प्राप्त होती है , तो वे क्यों नसनातनधर्म्म से विमुख होंगे । इसी परिस्थिति के आधार पर हम कह सकते हैं कि आज सनातनधर्म्मपर जनता का जो अविश्वास बढ़ता जा रहा है , उसका एक कारण वेदतत्त्वानभिज्ञ , अतएव उपपत्तिज्ञानशून्य ( रहस्यज्ञानशून्य ) इन पण्डितम्मन्यों के तथा ‘ आचार्य ‘ उपाधि – विभूषित धर्माध्यक्षों के द्वाराधर्मोपदेश का सञ्चालित होना भी है । .
‘ विद्यायानन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः ।
दंद्रभ्यमारणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ‘
– कठोपनिषत् – १ | २५उक्त औपनिषद् सिद्धान्त के अनुसार स्वय लक्ष्यच्युत ये धर्म्मरक्षक अन्य मुग्ध श्रद्धालु समाज काभी अन्धकूप में निक्षेप कर रहे हैं । सभी क्षेत्रों में आज उक्त वचन चरितार्थ हो रहा है । सभी नेता हैं ,सभी पण्डित हैं , सभी उपदेशक हैं , सभी सुधारक हैं , सभी सब कुछ हैं । अन्धों का समुदाय अन्धों को मार्गदिखा रहा है । ऐसी स्थिति में ‘ कुतस्तत्र प्रतीकारो रक्षको यत्र भक्षकः ‘ के अनुसार इन रक्षकों से भक्षितसंस्कृति अद्यावधि कैसे बच रही , यही एक महाप्राचर्य है ।
वेदस्वाध्याय का शिक्षा हमारे हाथ से जाती रही , यह अविश्वास का पहला कारण ।परित्याग कर अन्य ग्रन्थों में आयुः समाप्त करने वाले अयोग्य विद्वानों , तथा धर्माचार्यों के हाथ मेंधर्म्मसूत्र ( धर्म्म की बागडोर ) का चला जाना अश्विास का दूसरा कारण । इन दोनों कारणों में सेप्रथम कारण की चिकित्सा कई एक प्रतिबन्धकों से शीघ्र सम्भव नहीं है । देश अपनी पादप्रतिष्ठा परप्रतिष्ठित होकर स्वस्वरूप को सुरक्षित रखता हुआ जब पहले स्वतन्त्रता प्राप्त करले , तब इसे शिक्षास्वातन्त्र्य उपलब्ध हो , एवं आर्षसाहित्य का जब पूर्ण प्रचार हो , तब कहीं स्वतन्त्रताप्रापक प्रतिष्ठावलप्राप्त हो । ऐसी परिस्थिति में ‘ वर्त्तमान दशा में वर्तमान शिक्षा पर हमारा स्वतन्त्ररूप से नियन्त्रण होजायगा , एवं हम उसमें ऐच्छिक परिवर्तन कर सकेंगे यह खपुष्पसम केवल कल्पना ही रह जाती है ।दूसरा उपाय है — वैदिक – विज्ञान का प्रचार प्रसार । इस नवीन युग के सम्मुख जब तक धर्म के प्रत्येककी उपपत्ति ( वैज्ञानिक रहस्य ) उपस्थित नहीं करदी जायगी , तब तक उबड़ा हुआ धर्म्मविश्वास
पुनः प्रतिष्ठित न हो सकेगा | ‘ नवीनमार्गानुयायी अपने मौलिक साहित्य की वैज्ञानिकता का स्वरूपसमझते हुए उसकी आवश्यकतम उपादेयता स्वीकार करें , तद्द्वारा प्राप्त प्रतिष्ठाबल पर स्वलक्ष्य सिद्धिमें सफलता प्राप्त करें , तथा विद्वानों की वैदिक- विज्ञान की ओर प्रवृत्ति हो , एवं तवाश्रयद्वारा वेजनता की वास्तविक धर्म्मभावनाओं को पुष्पित – पल्लवित करें , ‘ श्राद्धविज्ञान ‘ व्याज से इन्हीं उद्देश्यों
[ ३६ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे प्रस्तावनोकी सिद्धि के लिए ‘ श्राद्धविज्ञाननिबन्ध ‘ उपस्थित हो रहा है ‘ यही श्राद्धविज्ञान रचना – कारणत्रयी में सेदूसरे कारण का संक्षिप्त निदर्शन है ।
सनातनधर्मावलम्बी
बृतीय कररण निदर्शन प्रवर्ग का आज हम तीन भागों में श्रेणि विभाग मान सकते हैं , एवंउन्हें क्रमशः राष्ट्रीयवर्ग , विद्वद्वर्ग , साधारण श्रद्धालुवर्ग , इन नामों से व्यवहृत किया जा सकता है | राष्ट्रीयवर्ग की दृष्टि में राष्ट्र निर्माण में , राष्ट्रोन्नति में , किंवा राष्ट्र के स्वतन्त्रतायज्ञ में धर्म्म सर्वथा अनपेक्षित
तत्त्व है । प्रत्युत यह वर्ग धर्म को राष्ट्रोन्नति तथा समाजोन्नति , दोनों का
एक महान् प्रतिबन्धक मानने की भूल कर रहा है , जबकि राष्ट्र शब्द का सर्व
प्रथम जन्मदाता ही सनातनधर्म्म माना गया है । इस सम्बन्ध में हमारा अपनातो यह भी विश्वास है कि , सनातनशास्त्र , तथा तदनुगत सनातनधर्म्म को मूलप्रतिष्ठा बनाए बिना कम सेकम भारतराष्ट्र का अभ्युदय तो एकान्ततः असम्भव ही है । सामान्य राष्ट्रीय विधानों के अतिरिक्त आर्षशास्त्र प्रवर्त्तक महर्षियों ने प्राकृतिक विज्ञान के आधार पर कुछ एक ऐसे गुप्त कारणों का अन्वेषण कियाहै , जिनके रहते राष्ट्र कभी स्वतन्त्र नहीं हो सकता । साथ ही उन कारणों को दूर कर राष्ट्र – स्वातन्त्र्य केलिए एक विशेष प्रकार के वैज्ञानिक – कम का भी आविष्कार किया है , जो कि कर्म्म ब्राह्मणग्रन्थों में’ राष्ट्रभृत् ‘ नाम से प्रसिद्ध हुआ है ।
राष्ट्र क्यों निर्बल हो जाता है ? निर्बल- राष्ट्र पराक्रमण का सामना करने में असमर्थ होता हुआकैसे परतन्त्र हो जाता है ? ब्राह्मण -श्रुति ने पहिले इन प्रश्नों का समाधान किया है । बतलाया गया हैकि , अर्थशक्तिशा विड्त्री राष्ट्र का वास्तविक स्वरूप है । अर्थ ही राष्ट्र है । जिस राष्ट्र का अर्थवलक्षीण हो जाता है , निश्चयेत वह राष्ट्र अभाव में पराक्रमण सहने के साधनों से वश्चित होता हुआ परतन्त्र बन जाता है । अतः राष्ट्र स्वरूप रक्षा के लिए अर्थ- स्वातन्त्र्य सर्वप्रथम अपेक्षित है । प्रश्न उपस्थितहोता है कि , राष्ट्र का अर्थवल कैसे सुरक्षित रक्खा जाय ? इस प्रश्न का समाधान करते हुए श्रुति ने‘ ब्रह्म – क्षत्र ‘ नामक द्वन्द्व की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है । ब्रह्मवीर्य राष्ट्र का ज्ञानबल है , क्षत्रवीर्य्य राष्ट्र का कर्म्मबल है । ज्ञान – सहकृत कर्म्म ही अर्थरूप राष्ट्र का , किंवा राष्ट्ररूप अर्थ का स्वरूप—रक्षक है | जब राष्ट्र का ज्ञानवल अभिभूत हो जाता है , तो ज्ञानानुगत कर्म्मबल सर्वथा उच्छृङ्खल बनजाता है । ज्ञानवश्चित ऐसा उच्छृङ्खल कर्म्म अर्थरक्षा में असमर्थ होता हुआ निश्वयेन राष्ट्रपारतन्त्र्य काप्रवर्त्तक वन जाता है । अतएव आवश्यक है कि , अर्थरक्षा के लिए कर्मगुप्ति का आश्रय लिया जाय , एवंकर्म्मसौष्ठव के लिए ज्ञानगुप्ति को मूलप्रतिष्ठा बनाया जाय । इस प्रकार ज्ञानशक्तिरूप ब्रह्म , तथा क्रियाशक्तिरूप क्षेत्र , इन दो रक्षकों की सत्ता में ही अर्थशक्तिरूप बिट् ( राष्ट्र ) सुगुप्त रहता हुआ बलवान्रह सकता है , एवं ऐसे ब्रह्म – क्षत्रानुगृहीत अर्थलक्षण राष्ट्र की स्वतन्त्रता पर कोई भी शक्ति आक्रमणनहीं कर सकती ।
विचार करने पर वर्तमान परतन्त्रता का यही एक मुख्य कारण हमारे सम्मुख उपस्थित हो रहाहैं । भारतवर्ष के पास आज भी अर्थवल ( कोप ) की कमी नहीं है । परन्तु दुःख है कि , वह अपनी इस
[ ३७ ]श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्डं प्रस्तावनाअर्थशक्ति का अपने राष्ट्रनिर्माण में अणुमात्र भी उपयोग नहीं कर सकता । क्यों हमारी अर्थशक्ति परपरराष्ट्रों का एकान्त स्वत्त्वाधिकार प्रतिष्ठित हो गया ? इस प्रश्न का उत्तर भी स्पष्ट है । तमोगुणप्रधानाअर्थशक्ति सभी राष्ट्रों के लिए आकर्षण की वस्तु है । जब तक यह अर्थशक्ति रजोगुणप्रधाना क्रियाशक्ति ,तथा सत्त्वगुणप्रधाना ज्ञानशक्ति से सुरक्षित रहती है , दूसरे शब्दों में जब तक राष्ट्र के ज्ञानबल , सेनाबल ,दोनों अपने अधिकार में रहते हैं , तब तक उसका अर्थबल सुरक्षित रहता है , एवं तब तक राष्ट्र कीस्वतन्त्रता अक्षुण्ण बनी रहती है । ज्ञानबलप्रवर्त्तक देश के ब्राह्मणवर्ग ने जिस दिन से वेदगुप्ति का परित्याग किया , उसी दिन से ज्ञानानुगत क्षत्रबल क्षत्रियों के हाथ से निकल गया । दोनों से वश्चित अर्थ -अरक्षित रहता हुआ पर – गिद्धों का बलि बन गया । इस विवेचना से यह स्पष्ट है कि , अर्थलक्षणराष्ट्रकी स्वरूपरक्षा एकमात्र ब्रह्म क्षेत्र मिथुन पर ही अवलम्बित है ।
भारतवर्ष का ब्रह्म – क्षत्र बलात्मक मिथुनभाव क्यों निर्बल हो गया ? इस प्रश्न का तात्त्विककारण बतलाती हुई श्रुति आगे जाकर कहती है कि , जिस राष्ट्र में से प्राकृतिक प्राणदेवताओं काविनिर्गम हो जाता है , उस राष्ट्र का ब्रह्म – क्षत्रात्मक मिथुनभाव निर्बल बन जाता है । ‘ १ अग्नि२ श्रौषधि , १ सूर्य्य – २ मरीचि , १ चन्द्रमा – २ नक्षत्र , १ वात – २ श्रापः , १ यज्ञ – २ दक्षिणा , १ मन – २ ऋक्साम , ‘ये ६ युग्म ब्रह्म – क्षत्र मिथुन के स्वरूप रक्षक माने गये हैं । अतएव ‘ एते देवा राष्ट्रभृत : ‘ के अनुसार येही प्राणदेवता राष्ट्रस्वरूप के धारण करने वाले माने गए हैं । इनमें अग्नि , सूर्य , चन्द्रमा , वात , यज्ञ ,मन , ये ६ देवता ब्रह्मवीर्य के संरक्षक है , एवं औषधि , मरीचि , नक्षत्र , प , दक्षिणा , ऋक्साम , ये ६देवता क्षत्रवीर्य्य के संरक्षक हैं । ऋषि कहते हैं कि , जिस राष्ट्र को परतन्त्र देखो , विश्वास करो उसराष्ट्र का ज्ञानानुगत ब्रह्मवल , तथा कर्म्मानुगत क्षत्रबल , दोनों जर्ज्जरित हैं । एवं जिस राष्ट्र को ब्रह्मक्षत्र – वीर्यों से वञ्चित देखो , विश्वास करो उस राष्ट्र के ब्रह्म – क्षत्रवीर्य संरक्षक दोनों बल उक्त ६ ओंद्वन्द्वदेवताओं के अनुग्रह से वञ्चित हो गए हैं । ऐसी स्थिति में यदि तुम्हें अपनी राष्ट्र की प्रतिष्ठा पुनःअपेक्षित है , तो राष्ट्र में ब्रह्म क्षत्र को पुनर्जीवित करना पड़ेगा । इसके लिए उन द्वन्द्वदेवताओं काअपने राष्ट्र में समावेश करना आवश्यक होगा , एवं इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए ‘ राष्ट्रभृत् ‘ नामकयज्ञप्रक्रिया का अनुगमन करना पड़ेगा , जिसका निम्नलिखित शब्दों में स्पष्टीकरण हुआ है—
‘ अथातो राष्ट्रभृतो जुहोति – राजानो वै राष्ट्रभृतः । ते हि राष्ट्राणि बिभ्रति ।एता ह देवताः सुता एतेन सवेन येनैतत् सोष्यमाणो भवति , ता एवंतत्प्रोणाति । तस्या इष्टाः प्रीता एतं सवमनुमन्यन्ते , ताभिरनुमतः सूयते ।यस्मै वै राजानो राज्यमनुमन्यन्ते , स राजा भवति ।नस यस्मै , न तत् ।राजानो राष्ट्रारिग बिभ्रति , राजान उडएते देवाः , तस्मादेता राष्ट्रभृतः ॥ १ ॥
[ ३८ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना’ मिथुनानि जुहोति । मिथुनाद्वाऽअधि प्रजातिः । यो वै प्रजायते , सराष्ट्रंभवति । राष्ट्रं वै स भवति , यो न प्रजायते । तद्यन्मिथुनानि राष्ट्रं बिभ्रति ,मिथुना उडएते देवाः | तस्मादेता राष्ट्रभृतः ॥२ ॥
E रतस्य • अग्निर्गन्धर्वः , २ तस्यौषधयोऽप्सरसः I १ सूर्य्यो गन्धर्वः ,मरीचयोऽप्सरसः । १ चन्द्रमा गन्धर्वः तस्य नक्षत्राण्यप्सरसः । वातो गन्धर्वः ,तस्य पोऽप्सरसः | १ यज्ञो गन्धर्वः तस्य दक्षिणा अप्सरसः । १ मनोगन्धर्वः , तस्य ऽऋक्सामान्यप्सरसः । प्रशासते – इति – नोऽस्त्वित्थं । स न इदं “ब्रह्म क्षत्रं पातु – इति । तस्योक्तो बन्धुः || ३ ||
— शत ० ६ कां ० । ४० | १ ब्रा ० ।
सर्वप्रथम ज्ञानशक्ति प्रवर्तक ब्रह्मबल , तदनुगत क्रियाशक्ति प्रवर्तक क्षत्रबल , ब्रह्म – क्षत्रानुगृहीतअर्थशक्तिप्रवर्त्तक विड्बल , तीनों राष्ट्र की प्रधान सम्पत्तियाँ है , यह उक्त कथन से भलीभाँति सिद्ध होजाता है । साथ ही यह भी स्वतः सिद्ध है कि , अर्थबलापेक्षया क्रियाबल श्रेष्ठ है , सर्वापेक्षया ज्ञानबल ‘ज्येष्ठ तथा श्रेष्ठ है | ज्ञानबलोपासक ब्रह्मवीर्य्यप्रधान ( जात्याब्राह्मण ) ब्राह्मणवर्ग वेदगुप्ति द्वारास्वब्रह्मवर्चसे राष्ट्र की ज्ञानानुगता ब्रह्मविभूति सुरक्षित रखने वाला माना गया है । क्रियावलोपासकक्षत्रवीर्य्यप्रधान क्षत्रियवर्ग ब्रह्मद्वारा ( ब्राह्मण द्वारा ) प्राप्त ज्ञानप्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होता हुआ । रथ ,श्व आदि वाहनबल के द्वारा , धनुषादि शस्त्रवल के द्वारा बाह्य ऋण से राष्ट्र की रक्षा करता हुआराष्ट्र की क्रियानुगता क्षेत्र – विभूति का रक्षक माना गया है | ब्रह्म क्षत्रबलों से सुगुप्त , प्रतएव ‘ गुप्त ‘ इसउपाधि से विभूषित अर्थबलोपासक विड्वीर्य्यप्रधान वैश्यवर्ग कृषि – गोरक्षा – वाणिज्य – द्वारा स्व – सञ्चितअर्थ का ब्रह्म – क्षत्र के आदेशानुसार राष्ट्रनिर्माण में उपयोग करता हुआ राष्ट्र की विड्विभूति कासंरक्षक माना गया है । इन तीनों पुरुषविभूतियों के अतिरिक्त कृषिकर्मोपयुक्ता दुधारी गाएं , सवलअनड्वान् , आदिलक्षण पशुसम्पत् भी नितान्त अपेक्षित है । वीर्य्यानुगता द्विजातिप्रजा ( ब्रा ० क्ष ० वै ०प्रजा ) की रक्तशुद्धि के लिए राष्ट्र की नारी सम्पत्ति का भी निर्दुष्ट रहना परम अपेक्षित है ।सर्वोपरि प्रकृति का निरापद बना रहना भी अत्यावश्यक है , जिसके लिए प्राकृतवर्म्म ( सनातनधर्म )का अनुगमन सतत अपेक्षित माना गया है | धर्मानुष्ठान से प्रकृति राष्ट्र के अनुकूल रहती है , पूर्वोक्तब्रह्म – क्षत्रप्रवर्तक देवताद्वन्द्वों का अनुग्रह सुरक्षित रहता है , फलतः समय पर वृष्टि होती है , औौषधिवनस्पतियों का परिपाक होता रहता है । इसी प्राकृतिक अनुग्रह ब्रह्मक्षत्र – विड्वलत्रयी , पशुबल , आदिराष्ट्रोपयोगी सभी साधन पुष्पित पल्लवित बने रहते हैं । और इन सब साधन – सामग्रियों से राष्ट्र का योग( सम्पप्राप्ति ) , तथा क्षेम ( प्राप्तसम्पत्ति का संरक्षण ) भलीभांति होता रहता है । एक स्वतन्त्र
[ ३ ९ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनाराष्ट्र की स्वतन्त्रतासाधक इन्हीं यच्चयावत् साधन – सामग्रियों का केवल अपने एक स्तुतिमन्त्र से विश्लेषणकरते हुए राष्ट्रस्वातन्त्र्य के अनन्यप्रेमी वेदमहर्षि कहते हैं
* — ब्रह्मन् ! ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्
श्रा राष्ट्र राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्
दोग्ध्रीधेनुः , वोढानड्वान् , प्राशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा , जिष्णू रथेष्ठाः
“
सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम्
निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु
फलवत्यो न औषधयः पच्यन्ताम्
योग – क्षेमो नः कल्पताम् ‘
– यजुःसहिता २२ प्र ० । २२ मं ० ।जिस प्रकृति के द्वारा सम्पूर्ण चराचर – विश्व का एक सुव्यस्थित क्रम से सञ्चालन हो रहा है ,वही प्रकृतितत्त्व उपनिषच्छास्त्र में ‘ अन्तर्यामी ‘ कहलाया है । प्रत्येक वस्तु के केन्द्र में प्रतिष्ठित रहनेवाले इसी प्रकृतितत्त्व से चूकि तद्बस्तु – विवर्त्त का नियतभाव से नियमन होता रहता है , अतएवइसे – ‘ अन्तस्तिष्ठन् नियमयति ‘ निर्वचन से ‘ अन्तर्यामी ‘ कहना अन्वर्थ बनता है । वस्तुकेन्द्र ‘ हृदयम् ‘कहलाया है | इस हृदय में प्रतिष्ठित अन्तर्य्यामी ‘ हृ ‘ लक्षण प्रदानधर्म से ‘ द ‘ लक्षण विसर्गधर्म्म से ,एवं ‘ यम् ‘ लक्षण नियमनधर्म से प्रगति गति स्थिति – भावों द्वारा अग्नीषोमात्मक वस्तुपिण्डों कास्वरूपरक्षक वन रहा है | हृदय में ‘ हृ – इ – य ‘ रूप से प्रतिष्ठित यही अन्तर्यामी अपनी नियत – एकरूपवृत्ति से ‘ नियतिः सत्यम् ‘ कहलाया है । यही अनिरुक्त हृद्य प्रजापति ‘ है , जिसका – प्रजापतिश्चरति गर्भे ० ‘( यजुः स ० ३१ | १ ९ ) इत्यादि मन्त्र से स्पष्टीकरण हुआ है । इसी अन्तर्ग्याभी , हृत्प्रतिष्ट , हृ – द – य – मूत्तिप्रजापति ( प्रकृतित्त्व ) का विश्लेषण करते हुए ब्राह्मणश्रुति ने कहा है – ने’ एष प्रजापतिर्यत् – हृदम । एतद् ब्रह्म , एत सर्वम् । तदेतत्त्र्यक्षरं – ‘ हृदय ‘मिति ( हृ द – यम् इति ) । ‘ हृ ‘ इत्येकमक्षरम् । अभिहरन्त्यस्मैस्वाश्चान्ये च ,य एवम् वेद । ‘ द ‘ इत्येकमक्षरम् | ददन्त्यस्मै – स्वाश्चान्ये च , य एवं वेद । ‘ यूम ‘* मन्त्र की विशद् वैज्ञानिक व्याख्या ‘ गीताविज्ञानभाष्यभूमिका – बहिरङ्गपरीक्षात्मक – प्रथमखण्ड ‘में देखनी चाहिए ।
[ ४० ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनाइत्येकमक्षरम् । एति स्वर्ग – लोकं , य एवं वेद । तद्वै तदेतदेव तदास – सत्यमेव ।स यो हैवमेतन्महद्यक्षं प्रथमजं वेद ‘ सत्यं ब्रह्म ‘ ‘ ति , जयतीमाँल्लोकान् । सत्यंह्येव ब्रह्म । ‘
– शत ० १४ कां ८ अ ० ४,५ व्रा ०वेत्थ नु त्वं तमन्तर्यामिणं- य इमं च लोकं , परं च लोकं , सर्वारिण चभूताति अन्तरो यमयति , इति । यः ( हृदये ) तिष्ठन् अन्तरो यमयतीति , स तश्रात्मा अन्तर्यामी , अमृतः ‘ ।
– शत ० १४।६।७ । ब्रा ०
हृदयस्थित ‘ हृ – द – य ’ मूत्ति इस सत्यप्रजापति की नियत्तिवृत्ति ही ‘ धर्म्म ‘ है । जिस वस्तु के केन्द्रमें उपाधि – भेदभिन्न जैसा अन्तर्यामी सत्य प्रतिष्ठित है , वह वस्तु तदनुरूपावृत्ति से ही युक्त रहता है ।पानी अपने सत्यधर्म्म से सदा निम्नगामी ही रहता है , अग्नि अपने सत्यधर्म से सदा ऊर्ध्वगामी हीरहता है , वायु तिग्गामी ही रहता है । यही उपाधिकृत प्राकृतिक नित्य धर्म्मभेद है , यही स्व – धर्म्म है ,यही स्वधर्म्म तद्वस्तु का स्वरूप रक्षक है । प्राकृतिक अविचाली भाव ही सत्य है , यही धर्म्म है ।अतएब ‘ यो वै धर्म्मः , सत्यं वै ( शत ०१४ | ४ | २६ ) इत्यादि रूप से उक्थरूपेण हृदय में प्रतिष्ठितसत्यलक्षण अन्तर्य्यामी का तथा अर्करूप से बहिविनिःसृत धर्म्मलक्षणा बाह्यवृत्ति का अभेद मान लियागया है । अन्तर्य्यामी – सत्य के धर्मलक्षण प्राकृतिक तत्त्व का विश्लेषण करने वाला प्राकृतिक शास्त्र हीशास्त्र ( वेदशास्त्र ) है , अतएव यह शास्त्र अपौरुषेय माना गया है । इस अपौरुषेयशास्त्र के आधार पर प्रतिष्ठित श्रीतस्मार्त्तलक्षण सनातनधर्म ही प्राकृतिक धर्म्म है , जिसकी नित्यसिद्धा वर्णावसृष्टि के आधार पर धर्म्मभेदरूपेण व्यवस्था हुई है । वर्णानुगति से ही यहवेदाज्ञासिद्ध प्राकृतिक सनातनधर्म्म ‘ वरर्णाश्रमधर्म्म ‘ नाम से व्यवहृत हुआ है । इस प्राकृतिक नित्यधर्मका जब आर्षप्रजा परित्याग कर देती है , तो तत्सम्बद्धा प्रकृति कुपित हो जाती है । प्रकृतिक्षोभ सेशान्तिसंवाहक देवता – द्वन्द्व कुपित हो जाते हैं । फलतः राष्ट्रसमृद्धि विनाशोन्मुखा बन जाती है , जिसकाप्रत्यक्ष निदर्शन समृद्धि शून्य वर्त्तमान भारतराष्ट्र बन रहा है । इस दृष्टिकोण से भी धर्म की राष्ट्र समृद्धिमें भली भांति उपयोगिता सिद्ध हो जाती है । जो राष्ट्रवादी भारतीय धर्म के इस मौलिक प्राकृतिकसत्य – स्वरूप से अपरिचित रहते हुए सनातनधर्म्म तथा धर्म्मरहस्यप्रतिपादक वेदशास्त्र को राष्ट्र केअभ्युदय में प्रतिबन्धक मान रहे हैं , क्या यह उनका राष्ट्र समृद्धि – विनाशक प्रौढिवाद नहीं है ?
अस्तु राष्ट्रीयवर्ग किस अज्ञात कारण से धर्म को प्रतिबन्धक मान रहा है ? इस प्रश्न कीमीमांसा में न पड़ते हुए क्रमप्राप्त दूसरे विद्वर्ग की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है ।संस्कृतज्ञ विद्वान् धर्म का परिशीलन करते हुए भी प्रार्थशास्त्र की उपेक्षा से धर्म के रहस्यज्ञान से वश्चित
[ ४१ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनी
होते हुए एक प्रकार से व्याजपूर्वक धर्माचरण ( धर्माचरण का ढोंग ) कर रहे हैं सच पूछिए तो ऐसेविद्वानों की कृपा से ही राष्ट्रीयवर्ग धर्म से विमुख हुआ एवं होता जा रहा है । अभ्युदय ( ऐहलौकिक ) ,एवं निःश्रेयस ( पारलौकिक ) साधक धर्म के आचरण का उद्घोष करने वाले विद्वानों की जैसी प्रवृत्तिआजदेखी सुनी जाती है , सचमुच वह एक उद्वेगकर समस्या है । मानसिक दासता का जैसा पूर्ण विकासविद्वद्वर्ग में उपलब्ध हो रहा है , खोजने से भी अन्यत्र उपलब्ध न होगा । अर्थपाश में बाँध कर आप विद्वानोंसे यथेच्छ धर्म्मव्यवस्था प्राप्त कर सकते । करणलोभग्रस्त विद्वान् पातकी से पातकी व्यक्ति को भी धर्मरक्षक , धर्म्माचार्ग्य , आदि उपाधियों से लत कर सकते हैं | स्वार्थवश सत्य का गला घोंट देना आजइनकी स्वाभाविकचर्या बन रही है । आत्माभिमान आज इनके लिए दूर से ही प्रणम्य बन रहा है । यहीकारण है कि , आज इस वर्ग के प्रति सभी वर्ग अश्रद्धात्मक अवाच्यवादों का प्रयोग करते नहीं ग्रघा रहे । से
तीसरा क्रमप्राप्त अस्मदादि साधारण मनुष्यों का श्रद्धालुवर्ग है । यह वर्ग शास्त्र पर पूर्ण निष्ठारखता है । कुतर्कियों के तर्कजाल का समुचित उत्तर देने की क्षमता न रखता हुआ भी यह आस्तिक वर्गचिरन्तन संस्कारवश , तथा संस्कारविघातिका पाश्चात्य – शिक्षा संसर्ग के अभावात्मक अनुग्रह से अद्यावधिस्वधर्म्म पर यथाकथञ्चित् प्रतिष्ठित है । वस्तुस्थिति तो यह है कि , इस श्रद्धालु वर्ग की आस्था के वलपर ही अद्यावधि धर्म्मनिष्ठा यथाकथञ्चित् प्रक्रान्त है । आस्तिकवर्ग की इस सहज श्रद्धा का हृदय सेअभिनन्दन करते हुए हम उससे यह निवेदन कर देना आवश्यक समझते हैं कि , जो कर्म्म , जो धर्म्म बिनाज्ञान का आश्रय लिए केवल प्रणाली ( अध : प्ररणाली ) का अनुगामी बना रहता है , कालान्तर में उसमेंशैथिल्या जाता है । उदाहरण के लिए श्राद्धकर्म्म ही पर्याप्त होगा । श्राद्ध के मौलिक रहस्यज्ञानभावसे आज श्राद्धे तिकर्त्तव्यता में अनेक दोषों का समावेश हो गया है । जहाँ श्राद्धकर्म के लिए अपराह्नःपितृरणाम् ‘ के अनुसार अपराह्न ( मध्याहोत्तर ) काल नियत है , वहाँ ‘ पूर्वाह्नो व देवानाम् ‘ के अनुसारदेवकर्म्म के लिए नियत पूर्वाह्न से पहिले ही श्राद्धतिकर्त्तव्यता पूरी करली जाती है । पिण्डप्रदान हीश्राद्धकर्म्म की मुख्य प्रतिष्ठा है । पिण्डगत सौम्यप्राण ही श्रद्धासूत्रद्वारा श्रद्धासूत्र के आधार पर विततपुत्रादिगत श्रद्धाभाव से परलोकस्थ प्रेम पितरों की तृप्ति का कारण माना गया है । इधर आज केवलश्रङ्गकर्म्मात्मक ब्राह्मणभोजन कर्म्म को ही प्रधान रूपेण श्राद्ध का स्वरूपसमर्पक माना जा रहा है । वैधविधि से वश्चित ऐमा कर्म्म न केवल व्यर्थ ही जाता , अपितु ऐसा अवैध कर्म्म अभ्युदय के स्थान में प्रत्यवायजनक बन जाता है । देवता का आह्वान न करना कहीं उत्तम पक्ष है । परन्तु संकल्पद्वार देवता काआह्वान कर उसका सत्कार न करना अनर्थ का बीजवपन करना है । ” मैं आज पिण्डपितृयज्ञ करूंगा “इस मानससंकल्प से प्राणात्मक पितृदेवता श्रद्धासूत्र द्वारा परलोक से त्राकर श्राद्धकर्ता यजमान कीआध्यात्मिक संस्था में प्रतिष्ठित हो जाते हैं । इनकी तृप्ति का प्रधान साधन पिण्डगत सौम्यप्राण है ।यदि इन्हें वह प्राप्त नहीं होता , तो अभिशाप देते हुए पितर पराङ्मुख हो जाते हैं ।
कितने एक महानुभावों के मुख से श्राद्धकर्म्म की उपपत्ति के सम्बन्ध में यह भी कहते सुना गयाहै कि , ‘ सामाजिक मंत्री सुरक्षित रखने के लिए ही वर्ष में १५ दिन भोजन कराने के लिए नियत करदिए गए हैं । इस प्रकार अज्ञानतावश नवीन नवीन कल्पनाओं के आधार पर आज प्रत्येक कर्म्म विरुद्ध
[ ४२ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
भावानुगत होता हुआ श्रभ्युदय के स्थान • सर्वनाश का कारण बन रहा है । जो महानुभाव श्राद्ध – यज्ञादिनहीं करते , लोकसम्पत्ति की दृष्टि से वे सुखी देखे जाते हैं । इधर श्राद्धादि शास्त्रीय कर्मों की अनुगामिनी प्रजा दुःखी देखी सुनी जाती है । इसका क्या कारण ? ‘ यतोभ्युदय निःश्रो यससिद्धिः स धर्मे : ‘कहते हुए महर्षियों ने धर्म – प्रवृत्ति को उभयलोक – सुखावाप्ति का कारण बतलाया है । हो रहा है इसकेठीक विपरीत | इसी विप्रतिपत्तिका बड़ा सुन्दर समाधान करते हुए भगवान् गाज्ञवल्क्य कहते हैं
–
‘ एक बार भारतीय श्रद्धालुवर्ग ने अश्रद्धावश यज्ञकर्म का परित्याग कर दिया । उन्होंने देखा कि ,जो यज्ञानुष्ठान करते हैं – वे दुःखी देखे जाते हैं , एवं जो यज्ञानुष्ठान नहीं करते वे सुखी – समृद्ध देखे जातेहैं । ऐसी स्थिति में उन्होंने यह संकल्प कर डाला कि , आज से अपने किसी भी यज्ञकर्म्म का अनुगमन नकरेंगे । दूसरे शब्दों में यों कह लीजिए कि , जिस प्रकार वर्त्तमान युग में ‘ धर्मात्मा दुःख पा रहे हैं ,पापात्मा लोकभव से युक्त हो रहे हैं ‘ इस भावना से जैसे मानव समाज की धर्म्ममार्ग पर अश्रद्धा बढ़तीजा रही है , ठीक इसी हेतु के आधार पर पुरायुग में भी मानवसमाज यज्ञादि कर्म्म – कलाप के प्रति अश्रद्धाकरता हुआ इसे छोड़ बैठा । जब स्वर्गाधिपति इन्द्र के पास ये समाचार पहुंचे , तो उन्होंने मानवसमाजकी अश्रद्धा दूर करने के लिए स्वगुरु बृहस्पति को भारतवर्ष भेजा । बृहस्पति के सामने जब मनुष्यों नेअपनी अश्रद्धा का ‘ य उ यजन्ते ते पापीयाँसो भवन्ति , य उ न यजन्ते – ते श्रेयांसो भवन्ति । कि काम्यायजमहि , ‘ यह कारण उपस्थित किया , तो बृहस्पति ने अनुमान लगा लिया कि , अवश्य ही इन्होंने यज्ञकर्म्म में किसी विरुद्ध कर्म्म का समावेश कर डाला है । फलतः बृहस्पति ने आदेश दिया कि , अब एकबार तुम हमारे सामने यज्ञ करो । मनुष्यों ने आदेशानुसार का निर्माण किया , त्रेताग्नि कुण्डबनाए । इसी कर्म्म – परम्परा में बृहस्पति ने देखा कि यज्ञसञ्चालक ऋत्त्विजों ने वेदि पर कुशा विछाने सेपहिले ही वेदि का स्पर्श कर डाला है । बृहस्पति बोल पड़े कि , हे मनुष्यो ! इसी दोप अभ्युदय साधकयज्ञ ने तुम्हारा अनिष्ट किया है । कुशास्तरण से पूर्व वेदि का स्पर्श करने से वेदिनिम्मरणार्थ खोदी गईभूमि का हिंस्रक प्राण तुम्हारे अध्यात्मयज्ञ में प्रविष्ट हो गया । इसी से तुम्हारा यज्ञस्वरूप विकृत हो गया ।सावधान ! आगे से भूलकर भी वहिस्तरण से पूर्व वेदि का स्पर्श न करना । दर्भविद्युत् से जब वेदिगत्हिस्रक विद्युत शान्त हो जाय , तभी तुम वेदिका स्पर्श कर सकते हो । आदेशानुसार मनुष्यों ने ऐसा हीकिया , एवं इस वैद्यनवमर्शपूर्वक होने वाले यज्ञानुष्ठान से मनुष्य यज्ञ न करने वालों की अपेक्षा सुसमृद्धवन गए ‘ ( देखिए – शत ० १।२।५ ब्रा ० ) ।।
उक्त ब्राह्मणाख्यान से प्रकृत में हमें यही वतलाना है कि , धर्मतत्त्व का किसी परोक्ष- अचिन्त्याप्रमेय – शक्ति से सम्बन्ध है । इसमें न तो माननीय कल्पना का समावेश ही सम्भव है , एवं न साधारण भीभूल का ही यहाँ समादर है । जिस प्रकार थोड़ी सी असावधानी से विद्य तमन्त्र प्रकाश प्रदान के स्थानमें प्राणों का संग्राहक बन जाता है , एवमेव थोडा भी इतस्ततः करने से वही धाम्मिक कर्म्मकलाप अभ्यु -दय के स्थान में सर्वनाश का कारण वन जाता है । यदि एक स्वर – दोष से इन्द्रशत्रुवृत्र द्वारा इन्द्रवधार्थहोने वाले यज्ञ में इन्द्र के स्थान में स्वयं यज्ञकर्ता वृत्र मारा जा सकता है , तो अवश्यमेव धर्माष्ठानों केसम्बन्ध में होने वाली भूलें हमें अभ्युदय से वश्चित रखने के साथ साथ हमारा महा अनिष्ट भी कर सकती
[ ४३ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
हैं । वही वेदशास्र है , वे ही मन्त्रों में वे ही अव्यर्थ शक्तियां निहित हैं , वे ही पद्धतिग्रन्थ हैं । फिर क्याकारण है कि , आज हमारे अनुष्ठान सफल नहीं होते ? । आज यह कौन विश्वास करा सकता है कि ,ब्राह्मणवर्ग कर्म्म – निर्वाह की कथा तो दूर , मन्त्रों का भी ठीक ठीक उच्चारण कर सकता है ? ऐसी दशामें अपने प्रज्ञापराधजनित दोष से उत्पन्न नाशकारिणी दशा का उत्तरदायित्व धर्म पर डाल देना क्यान्यायपक्ष है ? सनातनधर्मावलम्ब्रियों की इसी भूल ने इन्हें अन्य मतवादियों की तुलना में हीन – वीर्य्यबना रक्खा है | अन्यमतावलम्त्री तात्कालिक लो कवैभव से बाह्य दृष्ट्या तुष्टवत प्रतीत हो रहे हैं । परन्तुहम धर्म का व्याज से करते हुए धर्म को धोका देकर उभयतः भ्रष्ट हो रहे हैं । इस पतन सेत्राण पाने का एकमात्र उपाय है तत्तत् कर्म्मकलापों की मौलिक उपपत्तियों का परिज्ञान प्राप्त करना ।उपपत्तिज्ञान से ही हम कर्म्म के वास्तविक स्वरूप से परिचय प्राप्त कर सकते हैं | तभी कर्म्म की अनुरूपता का अनुगमन सम्भव हो सकता है , एवं तभी कर्म्मानुष्ठान फलप्रद बन सकता है । ‘ श्रद्धालुवर्ग स्वशक्त्यनुसार शास्त्रीय कर्म्म – कलाप के उपपत्तिज्ञान द्वारा यथाविधि कम्मों का अनुष्ठान करे , एवं तद्द्वारायथोक्त फलभाक् बने ‘ यही श्राद्धविज्ञाननिबन्ध की रचनाकारणत्रयी के अन्तिम ( तृतीय ) कारण कासंक्षिप्त निदर्शन है | सर्वान्त में प्रसङ्गात् एक स्वार्थमूलक कारण का दिग्दर्शन करा देना भी प्रासङ्गिकन माना जायेगा । आज से ८ वर्ष पहिले श्रद्धेय पितुःश्री ( बालचन्द्रशास्त्री ) का परलोकगमन हुआ ।ज्येष्ठ भ्रातुःश्री के द्वारा दैहिक – कर्म की इतिर्त्तव्यता सम्पन्न हुई | उस असहायावस्था में यह संकल्पहुआ कि , दिवङ्गत प्रेतात्मा की तृप्ति के लिये तुम्हें भी किसी अर्थानषेक्ष अनुष्ठान का अनुगमन करनाचाहिए । अन्ततोगत्वा – ‘ पितरो वाक्यभिच्छन्ति इस सिद्धान्त के आधार पर यही निश्चय किया गयाकि , पितुःश्री के वार्षिक श्राद्धोपलक्ष में वाङ्मय निवन्ध ही श्रद्धापूर्वक समर्पित किया जाय । पितृप्रजापतिकी सहजसिद्ध अनुकम्पा से वह संकल्प पूरा हुआ , एवं यही श्राद्धविज्ञानरचना – संकल्प का एक मुख्य कारणबना ।
श्राद्धविज्ञान – निबन्ध- रचनाकारण के सम्बन्ध में निवेदन किया गया । अब निबन्ध प्रतिपाद्य विषयोंका संक्षेप से दिग्दर्शन कराती हुई प्रस्तावना उपरत होती है ।प्रतिपाद्यविषयदिग्दर्शन प्रणाली के अनुसार सम्पूर्ण वेदशास्र
( मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदशास्र ) ‘ ज्ञातव्य , कर्त्तव्य , ‘ भेद से दो भागों में विभक्त
हुआ है । वेद के जिस भाग में ज्ञातव्य विषयों का प्रतिपादन हुआ है , वह
‘ ज्ञातव्य – वेद ‘ है । ‘ स्तुति – विज्ञान इतिहास ‘ ये तीन ज्ञातव्य विषय हैं । ‘ ॠक्
यजु : साम – थर्व ‘ नाम की १ ९ ३१ संहिताओं में इन्हीं तीन ज्ञातव्य विषयों कास्पष्टीकरण हुआ है , अतएव संहितात्मक वेदभाग को ‘ ज्ञातव्य वेद ‘ कहा जा सकता है , जोकि ‘ ब्रह्म ‘‘ मन्त्र ‘ आदि नामों से भी व्यवहृत हुआ है । गृहस्थाश्रमानुगत ‘ कर्म्मयोग , वानप्रस्थानुगत ‘ भक्तियोग , ‘एवं संन्यस्ताश्रमानुगत ‘ ज्ञानयोग , ‘ ये तीन योग कर्त्तव्यात्मक हैं । ‘ विधि ‘ नामक ब्राह्मणभाग में कर्म्मयोगका , ‘ श्रारण्यक ‘ नामक ब्राह्मणभाग में भक्तियोग का , तथा ‘ उपनिषत् ‘ नामक ब्राह्मणभाग में ज्ञानयोग काप्रतिपादन हुआ है । शतायुः पुरुष ब्रह्मचर्य्याश्रम में ‘ छन्दांसि नियतः पठेत् ‘ इस मानवा देश के अनुसारज्ञातव्यलक्षण ब्रह्मवेद का , तथा कर्त्तव्यलक्षरण विधि – आरण्यक उपनिषदात्मक ब्राह्मणवेद का अध्ययन समाप्तकर क्रमशः आगे के तीनों आश्रमों में कर्म्म भक्ति ज्ञानस्वरूप कर्त्तव्यो का अनुगमन करता हुआ अपना
[ ४४ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनाजन्म सफल बनाने में समर्थ हो जाता है । इस प्रकार ज्ञातव्य कर्त्तव्यात्मक वेदशास्त्र के द्वारा सर्वस्वसिद्धिहो जाती है , जैसा कि – ‘ सर्व वेदात् प्रसिद्धयति ‘ इत्यादि मनुवचन से प्रमाणित है ।
उक्त कथन से प्रकृत में यही बतलाना अभीष्ट है कि , वेदशास्रसिद्ध ‘ श्राद्ध ‘ पदार्थ भी ज्ञातव्यकर्त्तव्य – भेद से दो भागों में विभक्त किया जा सकता है । श्राद्धपदार्थ की ( कर्म्म की ) इतिकर्त्तव्यता ‘ कर्त्तव्यात्मक श्राद्ध ‘ है , जिसका स्मृति , निबन्धादि ग्रन्थों में विस्तार से प्रतिपादन हुआ है । दूसरे शब्दों में’ श्राद्ध कैसे करना चाहिए ? ‘ इस प्रश्न का समाधान करने वाली श्राद्धमयूख , श्राद्धविवेक , श्राद्धमंजरी ,आदि निबन्ध ग्रन्थों में प्रतिपादित श्राद्धकर्म की पद्धति कर्त्तव्यात्मकश्राद्ध ‘ है । श्राद्धकर्म्मान्तर्गत ऋत्त्वर्थकर्म्मो का मौलिक रहस्य क्या है ? श्राद्धकर्म्म एवंरूपेण व क्यों किया जाता है ? श्राद्ध से पितर कैसेतृप्त हो जाते हैं ? इत्यादि प्रश्नों से सम्बन्ध रखने वाला वेदशास्त्रसिद्ध उपपत्ति- विज्ञान ही ‘ ज्ञातव्यात्मकश्राद्ध ‘ है । दूसरे शब्दों श्राद्धकर्म का मौलिक विज्ञान ही ‘ ज्ञातव्यात्मकश्राद्ध ‘ है । इन उभयविध श्राद्धपदार्थों में से कर्त्तव्यात्मक श्राद्धपदार्थ ( श्राद्धपद्धति ) के लिए स्वतन्त्र निबन्ध लिखना सर्वथा व्यर्थ है ।क्योंकि पद्धति के सम्बन्ध में प्राचीन आचार्यों के द्वारा शतशः निवन्ध लिखे जा चुके हैं । दूसरा ज्ञातव्यभाग बच रहता है । अवश्य ही श्राद्धकर्म की वैज्ञानिक उपपत्ति के सम्बन्ध में आज कोई ऐसा स्वतन्त्रग्रन्थ उपलब्ध नहीं हो रहा , जिसमें श्राद्ध विज्ञान का एकत्र स्पष्टीकरण किया गया हो । एकमात्र इसीलक्ष्य से प्रस्तुत निबन्ध को ‘ श्राद्ध – विज्ञान ‘ का प्रधान लक्ष्य माना गया है । चूंकि इसमें ज्ञातव्यात्मकश्राद्ध – विज्ञान का ही प्रतिपादन हुआ है , अतएव इसे ‘ श्राद्धविज्ञान ‘ नाम से व्ववहृत करना अन्वसमझा गया है ।
‘ श्राद्धविज्ञान ‘ यह खण्डचतुष्टयात्मक सम्पूर्ण ग्रन्थ का नाम है | इस ‘ श्राद्धविज्ञान ‘ नामक एकनिबन्ध ( ग्रन्थ ) में विषयप्रतिपादन सुविधा की , तथा प्रतिपाद्य वि . यावगति की दृष्टि से ‘ चार खण्ड ‘रक्खे गए हैं । प्रत्येक खण्ड में कई एक ‘ अवान्तरप्रकरण ‘ हैं । प्रत्येक प्रवान्तर प्रकरण में अनेक ‘ परिच्छेद ‘हैं , एवं प्रत्येक परिच्छेद में अनेक ‘ वैज्ञानिक तत्त्वों का विश्लेषण हुआ है । इस प्रकार श्राद्धविज्ञान ,तदन्तर्गत चार खण्ड , खण्डान्तर्गत अवान्तर प्रकरण , अवान्तर प्रकरणान्तर्गत परिच्छेद , परिच्छेदान्तर्गतवैज्ञानिकतत्त्व विश्लेषण , इस दृष्टि से विषयों का विभाजन हुआ है । प्रकृत में जिन विषयों का ‘ तत्रतेविषया निरूपिता द्रष्टव्या : ‘ रूप से दिग्दर्शन कराया जाने वाला है , वे वान्तरप्रकरणान्तर्गत ‘ परिच्छेद ‘ हैं ।परिच्छेदान्तर्गत वैज्ञानिक विषयों की सूची प्रत्येक खण्ड के आरम्भ में ‘ विषयसूची ‘ नाम से समाविष्टहुई है ।
‘ श्राद्धविज्ञान ‘ निबन्ध में जितने भी विज्ञानात्मक अवान्तर प्रकरणों का समावेश हुआ है , उन्हें‘ उपनिषत् ‘ नाम से व्यवहृत किया गया है । श्राज दिन विद्वत्समाज में ‘ उपनिषद ‘ शब्द वेद के अन्तिमभागात्मक ‘ ईश – केन – कठ- प्रश्न- मुण्डका ‘ दि ग्रन्थों में ही निरूढ़ माना जा रहा है । परन्तु हमारी दृष्टि में
[ ४५ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
के ‘ उपनिषत् ’ शब्द सर्वथा यौगिक है । मौलिक उपपत्ति लक्षण विज्ञान – सिद्धान्त के सम्यक् परिज्ञान सेहमारा आत्मा प्रतिपाद्य विषय की ओर निश्चितरूप से प्रतिष्ठित हो जाता है । दूसरे शब्दों में मौलिकरहस्य – परिज्ञान से प्रतिपाद्य विषय की सत्यता पर श्रद्धा विश्वास करते हुए उसकी इतिकर्तव्यता ( अनु -ष्ठान ) में हम प्रवृत्त हो जाते हैं । इसी आधार पर उप ( विषयसमीपे ) -नि- ( नितराँ- निश्चयेन ) सीदति( प्रतिष्ठितो भवत्यात्मा ययोपपत्या , सा उपपत्तिस्तस्य विषयस्य , कर्म्म रगो वा – उपनिषत् ‘ इत्यादि निर्वाचनअनुसार विषयप्रवृत्तिहेतुभूता विज्ञानात्मिका मौलिक उपपत्ति को ‘ उपनिषत् ‘ कहना अन्वर्थ बन जाता
है । पाश्चात्य भाषा में जिस अर्थ विशेष के लिए ‘ प्रिन्सिपल ‘ ( Principle ) शब्द प्रयुक्त हुआ है , यावनीभाषा जिस अर्थ में ‘ उसूल ‘ शब्द का प्रयोग कर रही है , ठीक उसी अर्थ में आपभाषा ने ‘ उपनिषत् ‘ शब्दके इस यौगिकार्य को स्वीकार करने से ही ‘ यदेव विद्यया करोति , श्रद्धयोपनिषदा , तदेव वीय्यंवत्तरं भवति -‘ रण्यमियान्न पुनरेयात् ‘ – ‘ तस्योपनिषदह मिति ‘ -सत्यस्योपनिषच्छद्धा ‘ ‘ तस्य वा एतस्याग्नेवगिवोपनिषत् ‘इत्यादि आप्तवचनों में पठित ‘ उपनिषद ‘ शब्द का समन्वय किया जा सकता है । इसी यौगिकार्य केआधार पर गीतास्मृति का ‘ भगवद्गीतोपनिषत् ‘ नाम से व्ववहृत करना मुसङ्गत बनता है । यदि उपनिषच्छब्द केवल वेदान्त ( वेद के अन्तभाग रूप ईशादि ग्रन्थों ) में ही निरूढ होता , तो गीता को उपनिपत् कहना सर्वथा प्रसङ्गत बन जाता । प्रस्तुत श्राद्ध विज्ञाननिबन्ध के सभी अवान्तरप्रकरण चूंकि उपपत्ति – ज्ञान का विश्लेषण करते हुए उपनिषच्छब्द के यौगिकार्थ से समतुलित हैं । एकमात्र इसी आधारपर उन वान्तर प्रकरणों को ‘ आत्मविज्ञानोपनिषत्’- पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् – ‘ सापिण्ड्य विज्ञानोनिषत् ‘ – ‘ श्रात्मगतिविज्ञानोपनिषद् ‘ इत्यादि रूप से ‘ उपनिषत् ‘ नामों से व्यवहृत करना उचित मान लियागया है ।
सम्पूर्ण निबन्ध ४ खण्डों , तथा ( लगभग २० X ३० अठपेजी साइज के ) १८०० ( अठारह सौ )पृष्ठों में सम्पन्न हुआ है । चतुःखण्डात्मक इस श्राद्धविज्ञान में जिन अवान्तर वैज्ञानिक विषयों का स्पष्टीकरण हुआ है , उनका विशेष परिचय तत्तत् खण्डों के स्वाध्याय पर निर्भर है । एवं सामान्य परिचयतत्तत् खण्डों के आरम्भ में उद्यत विषयसूची पर निर्भर है । प्रकृत प्रस्तावना में उनका दिग्दर्शनमात्र करादिया जाता है । निबन्ध समाविष्ट चारों खण्ड क्रमश : निम्नलिखित नामों से व्यवहृत हुए हैंखण्डचतुष्टयात्मक – श्राद्धविज्ञान
१ – आत्मविज्ञानोपनिषत् ( प्रथमखण्ड ) ।
२ – पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् ( द्वितीयखण्ड ) ।
* इस विषय का विशद वैज्ञानिक विवेचन त्रिखण्डा त्मिका – उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका ‘ के प्रथमखण्डान्तर्गत उपनिषच्छब्दरहस्य ‘ नामक श्रवान्तर प्रकरण में देखना चाहिए ।
[ ४६ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
३ – सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषत्
४ – प्रात्मगतिविज्ञानोपनिषत् ( तृतीयखण्ड ) ।
( चतुर्थखण्ड ) ।१ – प्रात्मविज्ञानोपनिषत् ( प्रथमखण्ड ) -एतन्नामक प्रथमखण्ड में आत्मस्वरूप का वैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषण हुआ है । ‘ अखण्डसखण्ड ‘से आत्मा के दो मुख्य विवर्त्त हैं । इन दोनों में अखण्डात्मा सर्वधर्म्मशून्य , सर्वव्यापक , अतएव वाङ्मनसपथातीत , अतएव च एकान्ततः शास्त्रानधिकृत है । दूसरा सखण्ड आत्मा सर्वधर्मोपपन्न है । यह सखण्डआत्मविवर्त्त महामाया , योगमायादि मायिक निबन्धनों से आठ विवर्त्तभावों में परिणत हो रहा है । शरीरभिन्न – आत्मसत्तावाद ही श्राद्धकर्म की मूलप्रतिष्ठा है । अतएव आरम्भ में आत्मा के स्वरूप का परिचयकराना ही आवश्यक समझा गया है । ‘ शरीर ही श्रात्मा है ? अथवा श्रात्मतत्त्व शरीर से पृथक् है ? ‘ —’ यदि आत्मा व्यापक है , तो उसकी परलोकगति कैसे सम्भव है ? ‘ – यदि आत्मा पूर्व शरीर के साथ हीअन्य शरीर धारण कर लेता है , तो पिण्डदानादि लक्षण श्राद्धकर्म्म किस के उद्देश्य से किया जाताहै ? ‘ – ‘ पार्वरणावि श्राद्ध किस श्रात्मा के लिए विहित है ? ‘ – ‘ गया श्राद्ध किस मुक्ति का कारण बनताहै ? ‘ इत्यादि यच्चयावत् आत्मस्वरूपविपयिणी जिज्ञासाओं का वैज्ञानिक समाधान करने वाले ‘ आत्मविज्ञानोपनिषत् ‘ नामक प्रथमखण्ड में निम्नलिखित अवान्तर प्रकरणों तथा परिच्छेदों का समावेशहुआ है :१ – श्रात्मविज्ञानोपनिषदि – ( प्रथम खण्डात्मिकायाम्
१ – अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् – प्रथमा
२. – अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् – द्वितीया
३ – यज्ञात्मविज्ञानोनिषत् – तृतीया
४– विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् चतुर्थी
५ – महदात्मविज्ञानोनिषत् पञ्चमी
६ –प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् – षष्ठी ( तत्र )
१ – बंश्वानरात्मविज्ञानोपनिषत्
२ – तैजसात्मविज्ञानोपनिषत्
३ – प्राज्ञात्मविज्ञानोनिषत्
[ ४७ ] – प्रत्यगात्मोपनिषत् ( १ )श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ४ – हंसात्मविज्ञानोपनिषत् ५- — वाह्यात्म विज्ञानोपनिषत् १ – श्राद्धविज्ञानान्तर्गत- ‘ प्रात्मविज्ञानोपनिषत् ‘ नामक प्रथमखण्ड – आत्मविज्ञानोपनिषदि – ( प्रथमखण्डात्मिकायाम् ) १ – ‘ अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् ‘ – प्रथमा – ( तत्रैते विषया निरुपिता द्रष्टव्याः )प्रात्मविज्ञानोपनिषद १ – श्रात्मस्वरूपजिज्ञासा २- – नास्तिकाभिमत आत्मस्वरूप ३ – आस्तिकाभिमत आत्मस्वरूप ४— ग्रास्तिकों का तत्त्ववाद ५ – – स्वयम्भू प्रजापति का आत्मोपदेश ६ – व्यासाभिमत आत्मतत्त्वपरीक्षा ७ – हमारी अध्यात्मसंस्था -सृष्ट्यनुगता आगमद्वयी ६ – अहोरात्र स्वरूप दिग्दर्शन १०– -मनुतत्त्वस्वरूपदिग्दर्शन ११ – मनु और मन्वन्तर् ८- ● प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयमात्मविज्ञानोपनिषदि- ‘ श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् ‘ प्रथमा २ – ‘ अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् ‘ द्वितीया ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ – ब्रह्म की विकारसृष्टि २ – बाङ्मय अव्यक्तात्मा ३ – अव्यक्तात्मा के तीन विवर्त्त [ -प्रेतात्मोपनिषत् ( २ ) -शरीरात्मोपनिषत ( ३ )
१२ – काल के विचालीभाव १३ – मन्वन्तरविज्ञान १४ – लयकालमीमांसा १५ – नित्यानित्यविवर्त्त १६ – ब्रह्म का त्रेधा वितान १७ – ब्रह्म की अनन्त विभूति १८ – मायोपाधिक पुरुष ब्रह्म १६ – मायोपाधिक प्रकृतिब्रह्म २० – पोडशकल अमृतब्रह्म २१ – प्रणवब्रह्म के चार पाद २२ – अमृतात्मस्वरूपपरिचय
४८ ] ६ – उपलब्धिलक्षरण वेदात्मा ७ – त्रिः सत्यप्रजापति ८ – त्रित्त्वप्रवर्तक अव्यक्तात्मा प्रस्तावनाश्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्डश्रात्मविज्ञानोपनिषद ४ – नियतिलक्षण अन्तर्यामी ६ – [ ग्रव्यक्तात्मा का प्रकृतिभाव ५ – ऋतसत्यलक्षण सूत्रात्मा १० – प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयमात्मविज्ञानोपनिषद ‘ अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् ‘ द्वितीया
३ – ‘ यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् तृतीया ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ — पा रमेष्ठ्यतत्त्व परिचय २ – आत्मसोपानपरम्परा ३ – श्रदः , इदं विवर्त ४ – यज्ञात्मस्वरूप परिचय ७ – परमेष्ठी का प्रथमविवर्त्त ८ – विश्वप्रकृतिभूत यज्ञपुरुष ६ – यज्ञात्मा के विविध विवर्त्त १० – आध्यात्मिक यज्ञात्मा ११ – यज्ञ का योनिभाव ५ – यज्ञात्मा के यज्ञ – चित् नामक दो विवर्त्त ६- यज्ञात्मक विष्णु का स्वरूप परिचय १२ – त्रयीमय त्रिगुणात्मा प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयमात्मविज्ञानोपनिषदि – ‘ यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् ‘ तृतीया४- विज्ञानात्म विज्ञानोपनिषत् चतुर्थी ( तत्रने विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) प्रात्मविज्ञानोपनिषद – प्रस्तावना
६ – सुर्यात्मक क्षत्ररुद्र ७ – सौर अन्नादाग्नि के तीन विवर्त ८ — सूर्य्यमुलक दैवात्मा E – सूर्य्यमूलक विज्ञानात्मा १० – धिपणा तथा प्राणविवर्त १ – परमेष्ठी का अपेक्षाकृत व्यक्तत्त्व २ – विश्वस्य हृदयम् ३ –सोम , चित् , इन्द्र , विभूतियाँ ४– यज्ञप्रवर्तक विश्वात्मा ५ – – यज्ञ के विविध विवर्त्त प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयमात्मविज्ञानोपनिपदि- ‘ विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् ‘ चतुर्थी [ ४ ९ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डश्रात्मविज्ञानोपनिषदि५ – ‘ महानात्म विज्ञानोपनिषत् ‘ पञ्चमी
( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) प्रस्तावना१ — महान् की महत्ता ८ – विश्वयोनिलक्षण ‘ महानात्मा ‘२ – महोदेव , और ‘ महान् ‘ ६ – सुषुप्त्यधिष्ठाता ‘ महानात्मा ‘
१० – आकृति -प्रहंकृतिलक्षरण ‘ महानात्मा ‘
११ – सत्त्व रज- स्तमोलक्षण ‘ महानात्मा ‘ ३ – सोम – चिदात्मक ‘ पितर ‘४ – त्रिविध ज्ञानविवर्त्त५- – प्रजापति विवर्त्तत्रयी६ – त्रिगुणात्मक ‘ पुरुष ब्रह्म ‘ १२ – चान्द्र ‘ महानात्मा ‘
१३ – चान्द्र- ‘ प्रज्ञानात्मा ‘
प्रकरणोपसंहार ७ — एकाक्षरलक्षण ‘ महदुब्रह्म ‘समाप्ता चेयमात्मविज्ञानोपनिषदि- ‘ महानात्म विज्ञानोपनिषत् ‘ पञ्चमीआत्मविज्ञानोपनिषद –
६ – ‘ प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् ‘ षष्ठी( तंत्रता प्रात्मोपनिषदो व्याख्याता द्रष्टव्याः )१ – वैश्वानरात्मविज्ञानोपनिषत्२ — तंजसात्मविज्ञानोपनिषत् • प्रत्यगात्मोपनिषत् ( १ )३ – प्रज्ञात्म विज्ञानोपनिषत्४ – हंसात्म विज्ञानोपनिषत् ] प्रेतात्मोपनिषत् ( २ )५ – बाह्यात्मविज्ञानोपनिषत् ] शरीरात्मोपनिषत् ( ३ )( तस्यामे तस्याँ षष्ठयाँ – पश्वात्मोपनिषदात्मिकायां- ‘ प्रारणात्म विज्ञानोपनिषदि ‘ निम्न विषया निरूपिता द्रष्टव्याः )
६ – सीमाभावप्रवर्त्तक ‘ माया ‘ परिग्रह १ अविज्ञान क्षणिक विज्ञानमूला भ्रान्ति२- विभिन्नपक्षसमर्थन ७ – – कलाप्रवर्तक ‘ कला ‘ परिग्रह
८ – सगुणभावप्रवर्त्तक ‘ गुरण ‘ परिग्रह ३ – व्याख्यादोषमूल आत्मस्वरूपविप्रतिपत्ति४- –आत्मभेदस्वरूपपरिचय ६ सविकारभावप्रवर्तक ‘ विकार ‘ परिग्रह५ आत्मपरिग्रहमूलक प्रात्मस्वरूपभेद १० –सावरणभावप्रवर्तक ‘ आवरण ‘ परिग्रह
[ ५० ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड
३६ – ‘ वाक्साहस्री ‘ का स्वरूप परिचय ४० – वाङ्मयस्तोमविवर्त्त ११ –साञ्जनभावप्रवर्तक ‘ अञ्जनपरिग्रह १२ – विभूति , पाप्मा , परिचय १३ – – विराट् प्रजापति १४ – महेश्वर की सर्वव्याप्ति ४१ – ‘ लोकसाहस्री ‘ का स्वरूप परिचय ४२ – ‘ अदिति दिति – विवर्त्त ४३ – सर्वभूतान्तरात्मा १५ सर्वधर्मोपपन्न पुरुषात्मा १६ – प्रजापतिचतुष्टयी १७ – जीवात्मस्वरूपोपक्रम ४४ – प्रात्मा , ब्रह्म , देव , विवर्त ४५ – ग्रात्मगत्यधिष्ठाता सुपर्णपक्षी १८ – चिदात्मा , चिदंश , चिदाभास , ४६ – परिच्छिन्न मृत्युबन्धन १६ – योग बन्ध- विभूति ४७ – चामत्कारिक पुरुषात्मा २० – विदित , अविदित , उभयातीत , आत्मविवर्त्त ४८ – प्राणात्मोपनिषत् की उपनिषत् २१ – – पृथिवी , अन्तरिक्ष , द्यौः २२ – शब्दब्रह्मविवर्त्त २३ – विश्वामुवनानि २४ – रुद्रत्रैलोक्य २५ – दक्षिणामूत्तिशिवतत्त्व . २६ – वायुवेष्टित भूपिण्ड २७ – अन्नादप्रकृति और भूपिण्ड ” २८ – पार्थिक ‘ ए मूषवराह ‘ २६ – शूद्र और शूकरपशु ३० -अमृत – मृत्युलक्षणा पार्थिवसंस्था ३१ –देवासुरप्रतिस्पर्द्धा ३२ – वित्रस्त पार्थिवप्रजापति ३३ – पट्शुक्रात्मक पार्थिवविवर्त्त ३४ – पार्थिवाग्नि के विविध विवर्त्त ३५ – पार्थिवाग्नि का अनादत्त्व ३६ –कृष्णाजिन , और पुष्करपर्ण – अग्निचितिरहस्य ३७– ३८ – अर्क , महाव्रत , उक्थ्य परिचय प्रस्तावना
४६ – वैश्वानर – हिरण्यगर्भ – सर्वज्ञ – मूर्तिविराट् – दर्शन ५० – अर्थमूत्ति वैश्वानरात्मा ( उपनिषत् ) ५१ – क्रियामूत्ति ‘ तैजसात्मा ‘ ‘ ५२ – ज्ञानमूत्ति ‘ प्राज्ञ प्रात्मा ‘ ( ) ५३ – वायुमूर्ति ‘ हंसात्मा ‘ ( ) ४ – भूतमूर्ति ‘ ब्राहयात्मा ‘ ५५ – सर्वज्ञ अल्पज्ञ समतुलन ५६ – विभूतिलक्षण ‘ ऋषि ‘ तत्त्व ५७ ‘ पितर ‘ तत्त्व ५८ ‘ असुर ‘ तत्त्व ” } ५६ ‘ देव ‘ तत्त्व ” } ६० ‘ मनु ‘ तत्त्व ‘ गन्धर्व ‘ तत्त्व ६१ ६२ – विभूतिलक्षरण ‘ ग्रह ‘ तत्त्व ६३ ‘ पशु ‘ तत्त्व ६४ – विद्याचतुष्टयीलक्षणा ‘ विद्याविभूति ‘ ६५ – महाविभूतिलक्षणा ‘ कामविभूति ‘ ६६ – अनुगमनलक्षण ‘ कर्म्मविभूति ‘श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड
७७ – पारयात्री भोक्तात्मा ६७ — बन्धलक्षणा ‘ शुक्रविभूति ‘ ६८ – गतिलक्षणा ‘ प्राणविभूति ‘ ६६ – साधनलक्षणा ‘ ज्ञान – कर्मेद्रिय विभूति ‘ ७८ – जीवात्मविभूति प्रदर्शन ७६ – षडवस्था स्वरूप परिचय ८० – अविध्या स्वरूप ७० – सर्वव्याप्तिलक्षणा पूर्णेन्द्र विभूति ‘ ८१ – बन्ध स्वरूप ७१ –सत्यसंकल्पत्त्वविभूति ७२ – एकरसत्त्वविभूति ८२ – कर्म्मविपाक स्वरूप ७३ । – एकावस्यत्त्व विभूति ८३ – प्राशय स्वरूप ७४ – विश्वब्यापकत्त्व – सृष्टत्वविभूति ८४ -त्व – स्वरूप ७५ – सर्वसाक्षित्त्व , वशित्व , कर्म्माध्यक्षत्व – विभूति ८५ – संसार ( गमनागमन ) स्वरूप प्रकरणोपसंहार ७६ – पाप्माऽससृष्टत्वविभूति समाप्ता चेयमात्मविज्ञानोपनिषदि पश्चात्म विज्ञानोपनिषदात्मिका – ‘ प्रारणात्म विज्ञानोपनिषत् ‘ पष्ठी समाप्तश्चायमात्मविज्ञानोपनिषदात्मकः श्राद्ध विज्ञानान्तर्गतः
प्रथमः खण्डः२ – पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् ( द्वितीखण्ड ) – एतन्नामक द्वितीय – खण्ड में वैज्ञानिक दृष्टि से ‘ पितृ ‘ तत्त्व का विश्लेषण हुआ हैं । ‘ आत्मविज्ञान पनिषत् ‘ नामक प्रथमखण्ड में जिन आठ ग्रात्मस्वरूपों का विवेचन हुआ है , उनमें से ‘ महानातात्म विज्ञानो ” निषत् ‘ नामक अवान्तर प्रकरण में प्रतिपादित ‘ महानात्मा ‘ ही पिण्डदानादिलक्षरण पार्वरणादिश्राद्धकर्म की प्रतिष्ठा है । सौम्यशुक्राधारेंग प्रतिष्ठित महानात्मा में चतुरशीतिकल पितृप्राण प्रतिष्ठित रहते हैं । इसी पितृप्राणसमप्टि की तृप्ति के लिए श्राद्धकर्म्म विहित है । ‘ अध्यात्म – अधिभूत अधिदैवत – भेद से त्रिसंस्थ बने हुए पितृप्रारण का मौलिक स्वरूप क्या है ? ‘ – नान्दीमुख – पार्वरण- प्रश्रमुख नामक पितरों का क्या स्वरूप है ? ‘ – ‘ निषत- सोमसत् – बहिषत् – नामक अन्नात्मक पितर , श्राज्यपा सोमपा- हविर्भु कुनामक अनादात्मक पितर , सुकाली नामक अनुभय पितर अपना कैसा स्वरूप रखते हुए कहां प्रतिष्ठित रहते हैं ? ‘ क्या करते हैं ? ‘ – ‘ वसन्त – ग्रीष्म – वर्षा – शरत् – हेमन्त शिशिर – भेद भिन्न ऋतुपितरों का का स्वरूप है ? ‘ क्यों उन्हें ‘ ऋतुपितर ‘ कहा गया ? ‘ – ‘ पितृप्रारण की मूलप्रतिष्ठा रूप , प्रतएव ‘ पितृरणां पितरः ‘ नाम से प्रसिद्ध पितृदेवताओं का क्या स्वरूप है इत्यादि प्रश्नों के वैज्ञानिक समाधान के अतिरिक्त प्रारम्भ में ही प्रस्तुत प्रकरण ( २ खण्ड ) में उन श्रीत – स्मार्त्त प्रमाणों का भी संग्रह हुआ है , जो बिस्पष्ट भाषा में ‘ मृत पितृ श्राद्धकर्म्म ‘ का समर्थन कर रहे हैं । श्राद्धविज्ञानान्तर्गत ‘ पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् ‘ नामक इस द्वितीयखण्ड में निम्नलिखित पाँच अवान्तर प्रकरणों , तथा परिच्छेदों का समावेश हुआ है— [ ५२ 1 प्रस्तावनाश्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड २ – पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषद – ( द्वितीयखण्डात्मिकायाम् ) – १ प्रमाणोपनिषत् २- पितृदेवतास्वरूपविज्ञानोपनिषत् ३- दिव्य पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् ४ – ॠतुपितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् ५- प्रेत पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् २ – श्राद्धविज्ञानान्तर्गत – ‘ पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषत् ‘ नामक द्वितीयखण्ड– पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषद – ( द्वितीयखण्डात्मिकायाम् ) . १ – ‘ प्रमारणोपनिषत् ‘ – प्रथमा ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ – प्रजा की शास्त्रनिष्ठा २ – ‘ प्रमाण ‘ शब्द मीमांसा ३ – शाब्दी दृष्टि , युक्ति , ४- स्वतः , परतः प्रामाण्यवाद ५ – प्रत्यक्षप्रमाण के दो विवर्त्त ६ – शब्दप्रामाण्यवाद प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयं पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषदि प्रमारणोपनिषत् ‘ प्रथमा२ – ‘ पितृदेवतास्वरूपविज्ञानोपनिषत्’- द्वितीया ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) ३ – लेखात्मिका पुरविभूति ४ – त्रयीब्रह्म का वैभन ] पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषद१ – अमृतात्मब्रह्म का सिंहावलोकन २ – सृष्टिविवर्त्त समतुलन ७ – प्रमाणचतुष्टयी ८ – वृद्धव्यवहार की प्रामाणिकता ६ – श्राद्धकर्म्मानुगत प्रामाण्यवाद १० – वेदसंहितोक्त प्रामाण्यवाद ११ – ब्राह्मणभागोक्त प्रामाण्यवाद १२ – शास्त्रीय प्रश्नमीमांसा
[ ५३ प्रस्तावनाश्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड५ – ब्रह्म की ‘ स्वात् ‘ विभूति ६ – पितृप्राणप्रतिष्ठात्मकतत्त्व ७ – पितृलक्षण पवित्रसोम ८ – भृगुद्वारा विजातीयप्राणाप्रवृत्ति ६ – अङ्गिरा के ३३ विवर्त्त १० – दाम्पत्यभावमूलक विराट्पुरुष ११ – अमृत , सत्य , यज्ञ – त्रयीमीमांसा १२ – संस्कार्य्य विश्वविवर्त्त १३ – ऋषि – पितृ – देव – प्रारणत्रयी १४ – ब्राह्म जगत् १५ – प्राकृतिकपितृप्राणमीमांसा १६ – पर , मध्यम , अवर पितृत्रयी १७ – त्रिविध्वपितृप्रारण की मूलप्रकृति १८ – ब्रह्म की ॠत सत्य – सृष्टि १६ सत्तास्वरूपपरिचय २० विष्वृतिस्वरूपपरिचय २१ – धृतिस्वरूपपरिचयपितृस्वरूप विज्ञानोपनिषदि २२ – ग्रात्मसत्यस्वरूपपरिचय २३ – नाभि , प्रधि , भावद्वयी २४ – सर्वप्रतिष्ठातत्त्व २५ – सर्वाग्रज सत्यतत्त्व २६ – अग्नित्रयी – मीमांसा २७ – सोमत्रयीमीमांसा २८ – यमस्वरूपपरिचय २६ – अग्नि – सोम की अभिन्नता ३० – अङ्गिरा – भृगु – यम – का पितृत्त्व ३१ – तत्त्वाभिव्यक्ति ३२ – तत्त्वद्वयी की व्यापकता ३३ – अग्निविभूतिप्रदर्शन ३४ – वायुविभूतिप्रदर्शन ३५ – आदित्य विभूतिप्रदर्शन ३६ – मनु , यम , मृत्युविभूतिप्रदर्शन ३७ – दशविध सोमविभूतिप्रदर्शन प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयं पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषदि – ‘ पितृदेवतास्वरूप विज्ञानोपनिषत् ‘ द्वितीया
३ – ‘ दिव्यपितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् तृतीया ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ – दिव्य पितृस्वरूपविज्ञानोपक्रम ५ – सप्त दिव्याः पितर : २ – सौम्यासः पितरः ६ – आत्मब्रह्म की सप्तपुरुषता ३ – अङ्गिरसः पितरः ७ – विरोधाभास एवं तन्निराकरण प्रकरणोपसंहार ४ – सुस्वधाः पितरः समाप्ता चेयं पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषदि – ” दि ० पि ० विज्ञानोपनिषत् ” तृतीया [ ५४ ] प्रस्तावनं ।श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषदि ४ – ‘ ऋतुपितृस्वरूपविज्ञोपनिषत् ‘ चतुर्थी ४ ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ – ऋतुपितृस्वरूपजिज्ञासा ८ – ऋतुसम्बन्धी राशिचक्र २ – दिग्विभागप्रदर्शन e – यज्ञानुगतपञ्चर्तुविज्ञान ३ – ऋतु , और ऋत्विक् ४ – दशविध अग्निविवर्त्त १० – षड्ऋतुस्वरूप विज्ञान ११ – उद्ग्राभ , निग्राभ , तारतम्य ५ – त्रिंशद्विध सोमविवर्त्त १२ ऋतुकालानुगत प्रजाविवर्त्त ६ – प्रयोजिका धमंत्रयी ७ — ऋतुसर्गमीमांसा १३ – ऋतुपितृस्वरूपपरिचय १४ – ऋतुपितरों की सप्तपुरुषता प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयं पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषदि ‘ ऋतुपितृस्वरूप विज्ञानोपनिषत् ‘ चतुर्थी
५- प्रेतपितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत्’- पञ्चमी ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषद१ – लोकानुगत पितृस्वरूपपरिचय २ – आधिकारिक , काम्मिक , पितृषट्क ३ – सौम्य पितृस्वरूपपरिचय ४ — ‘ आयन्तु नः पितरः ‘ ६ — त्रैगुण्यभावानुगत पितर ७ – नान्दीमुख पितृस्व रूपमीमांसा ८ –पार्वण पितृस्वरूपमीमांसा ६ – प्रश्रुमुख पितृस्वरूपमीमांसा १० – प्रेतपितृस्वरूपपरिचय ५ – प्रजोत्पादक पितर प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयं पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषदि – प्रेत पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषत् ‘ पञ्चमी समाप्तश्चायं पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषदात्मकः श्राद्ध विज्ञानन्तर्गतो द्वितीयः खण्डः [ ५५ ] प्रस्तावनाश्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
३ – सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषत् ( तृतीयखण्ड )एतन्नामक तृतीयखण्ड में महानात्मा से सम्बन्ध रखने वाले , बीजीपुरुप से प्रारम्भ कर उसकीसप्तम सन्तति पर्य्यन्त वितत होने वाले साप्तपौरुप- सापिण्ड्यभाव का ही वैज्ञानिक विश्लेषण हुआ है ।सप्त पुरुष पर्य्यन्त वितत प्रजातन्तु का क्या स्वरूप है ? ‘ – पुत्रोत्पादन , पार्वरणादिश्राद्ध , गया श्राद्धावि सेश्राद्धकर्त्ता पितृऋरण से कैसे विमुक्त हो जाता है ? ‘ ‘ गोत्रसापिण्ड्य , विवाहसा पिण्ड्य , दायदसा पिण्ड्य , श्राविसापिण्ड्यभावों को मूलप्रतिष्ठा क्या है ? ” पितृऋरण का वैज्ञानिक स्वरूप क्या है ? – प्रजातन्तुप्रवर्तकपितृप्रारणात्मक सहःपिण्डों का क्या स्वरूप है ? ‘ – ‘ सप्तम पुरुष के अनन्तर सपिण्डता क्यों निवृत्त होजाती है ? ’ —‘गोत्र का वैज्ञानिक स्वरूप क्या है ? ‘ – समानगोत्रों में विवाह सम्बन्ध क्यों निषिद्ध माना गयाहै ? ‘ – पिण्डभाजः – लेषभाज : – प्रेतपितरों का क्या स्वरूप है ? ‘ – ‘ प्रेत पितृ निमित्त प्रवत्त पिण्ड , एवंगोदानावि , विदूरस्थ प्रेतपितरों के समीप कैसे पहुंच जाते हैं ? ‘ – ‘ श्रघाशोच – सूतकाशौच – शावाशौचप्रादि प्राशौचों का वैज्ञानिक स्वरूप क्या है ? — सम्पूर्ण वंशजो में श्राशौच सम्बन्ध कैसे संक्रान्त होजाता है ? – इत्यादि प्रश्नों के वैज्ञानिक समाधान का विश्लेषण करने वाले प्रस्तुत तृतीय खण्ड मेंनिम्नलिखित प्रवान्तर प्रकरणों , तथा परिच्छेदों का समावेश हुआ है ? —३ – सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदि- ( तृतीय खण्डात्मिकायाम् ) –
१ – प्रजातन्तुवितानविज्ञानोपनिषत्
२ – ऋणमोचनोपायविज्ञानोपनिषत्
३ – प्राशौचविज्ञानोपनिषत्३ – श्राद्धविज्ञानान्तर्गत- ‘ सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषत् ‘ नामक तृतीयखण्ड —
सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदि- ( तृतीय खण्डात्मिकायाम् )
१ – ‘ प्रजातन्तुवितानविज्ञानोपनिषत् ‘ प्रथमा
( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः )
६ – ग्रौपपातिक कर्मात्मा
७ – ‘ रेतो ‘ मय कम्मत्मा
८ – ‘ इरा ‘ रसमय कर्मात्मा
६ – प्रपदप्रतिष्ठ कम्मरमा
१० – ‘ करारबिन्देन पदारविन्दम् ‘
५६ ] १ – विषयोपक्रम२ – महानात्मानुगत पितृत्त्व३ – प्रजातन्तुप्रतिष्ठालक्षण महानात्मा४ – भूतसम्परिष्वक्त महानात्मा५ – महानात्मा का आविर्भावक
[श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड११ – कर्मात्मा के तीन जन्म २२ – सहः के आह्निकादि चार पिण्ड १२ – रेत , योनि , रेतोधा , २३ – सहोभाग का पितृप्रारणात्मकत्त्व १३ – कौषीतकि का ‘ विचक्षरण ‘ तत्त्व २४ – शुक्रक्षयमीमांसा १४ –’सम्वत्सरस्य प्रतिष्ठा ‘ २५ – प्रपत्य -पत्य पुरुष मीमांसा १५ – ‘ मासि मासि वोऽशनम् ‘ २६ – पितृसोमयज्ञद्वारा ऋणप्रवृत्ति १६ – दधि , घृत , मधु – लक्षरण कर्मात्मा २७ – पितृधनावापमीमांसा १७ – आत्मविवर्त्तसम्परिष्वक्ति २८ वापपिण्ड , बीजपिण्ड मीमांसा १८ – चन्द्रलोकानुगत महानात्मा २६ – निवाप , पितृ , तन्य , पिण्डत्रयी ३० – आत्मधन , आत्मऋण , स्वरूपमीमांसा १६ – गमनस्थिति विश्लेषण २० – गोत्रसृष्टिमीमांसा २१ – पितृसहः स्वरूप विज्ञान ३१ – तन्तुवितानसम्बन्धी प्रमाणवाद ३२ – महर्षि ‘ बृहदुक्थ ‘ का प्रजातन्तु वितान – विज्ञान प्रकरणोपसहार समाप्ता चेगं सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदि- ‘ प्रजातन्तु विज्ञानोपनिषत् ‘ प्रथमा
२ – ‘ ऋण मोचनोपायविज्ञानोपनिषत् द्वितीया ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषद प्रस्तावना१ – पञ्चविध ऋरणस्वरूप विज्ञान १० – श्राद्धकर्म्मानुगत मनुष्य विज्ञान ( ३ ) ११ – तन्तुलक्षरण श्राद्धकर्ता का स्वरूपपरिचय २ – प्रजोत्पादनानुगत श्रानुष्यविज्ञान ( १ ) ३ – मात्रानुगत ऋरणतत्त्ववितान १२ – देवयज्ञस्वरूपमीमासा ४ – ‘ ऋणमस्मिन् संनमयति ‘ १३ – ‘ श्रद्धा ‘ का तात्त्विक स्वरूप विज्ञान १४ – श्रद्धामय ‘ श्रद्धासूत्र ‘ ५ – द्वादशवध पुत्रस्वरूपपरिचय ६ – प्रजोत्पादनादेश १५ – श्रद्धासूत्रानुगत ‘ श्राद्धकर्म्म ‘ ७ – पुत्रमाहात्म्यप्रदर्शक वैदिक १६ – श्रद्धातारतम्य से श्रद्धासूत्र में तारतम्य ८ – सापिण्डीकरणानुगत आनुष्य विज्ञान ( २ ) १७ – प्राकृतिक हेतु से श्रद्धासूत्र का उपचयापचय ६ – पितृतन्तु का ताना , वाना , १८ – अमावास्या , और पूर्णिमा ] [श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना१६ – प्रमावास्यानुगत श्राद्धकर्म २० – सन्ततिनिरोधक पितृदोष ( १६ ) २१ – श्रोतास्यान द्वारा श्राद्धविज्ञान का स्पष्टीकरण२२ – प्राणबिद्यामूलक श्राद्धकर्म्म २३ – श्राद्धकर्म्मानुगत श्रीतपरिभाषाविज्ञान२४ – श्राद्धोपकरणों की सोमात्मकता २५ — प्रेतात्मतृप्तिप्रवर्त्तक श्राद्धकर्म्म२६ – श्राद्धकर्म्मभेदमीमांसा २८ – श्राद्धानुगत ब्राह्मणभोजन मीमांसा २६ – गया श्राद्धानुगत मनुष्य विज्ञान ( ४ ) ३० खण्डात्माओं का यथास्थान विलयन
३१ – गयाप्रारणात्मक श्रागन्तुक महानात्मा ३२ – गया प्राणात्मक आत्मा की क्लान्ति
३३ – मुग्धप्रेतपितरों की भोग्यसामग्री ३४ – पितृसम्पत् और पितृतुष्टि
३५ – गया क्षेत्र का वैज्ञानिक स्वरूप
३६ – मयाश्राद्धद्वारा प्रेततृप्ति २७ – श्राद्धानुगत कालतत्त्वमीमांसा प्रकरणोपसंहारसमाप्ता चेयं – सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदि – ‘ ऋण मोचनोपाय विज्ञानोपनिषत् द्वितीया३ – ‘ प्राशौचविज्ञानोपनिषत् – तृतीया( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः )
किमपि प्रास्ताविकम् सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषद -१ प्रशोचपात्रस्वरूपमीमांसा ( १ ) विवाहसा पिण्ड्य २ – प्राशौच स्वरूप मीमांसा ३ – प्रघाशीचस्वरूप मीमांसा ४ – माशोदत्रयीमोमासा ५ – स्पर्शास्पर्णमीमांसा ( २ ) दायसा पिण्ड्य ( ३ ) प्रशौचस।पिण्ड्य ( ४ ) पिण्डस्वरूपसिंहावलोकन ख – विद्याकृतसम्बन्धसूत्र ६ कर्तव्याकर्तव्यमीमासा ग – यज्ञकृत सम्बन्ध सूत्र ७ – प्रशोचनिमित्तमीमासा ( अशोचोपपत्तिः ) घ – ससर्गकृतसम्बन्ध सूत्र प्रकरणोपसंहार ८ – सम्बन्धसूत्र मोमांसा क – योनिकृत सम्बन्ध सूत्र
समाप्तश्चायं समाप्ता चेयं सापिण्ड्यविज्ञानोपनिपदि – ‘ प्राशौचविज्ञानोपनिषत् तृतीया सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदात्मकः श्राद्ध विज्ञानान्तर्गतः –
तृतीयः खण्डः
[ ५८ ]श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
४ – श्रात्मगतिविज्ञानोपनिषत् ( चतुर्थखण्ड ) -एतन्नामक चतुर्थ – खण्ड में कर्मात्मा से सम्बन्ध रखने वाली गति का ही वैज्ञानिक विश्लेषणहुआ है । ” नित्य – क्रम – गतियों का क्या स्वरूप है ? ” – आत्मलोक कौन – कौन से हैं ? ” — “ किन कर्मों सेआत्मा किन लोकों में जाकर क्या – क्या फल भोगता है ? ” – ” पन्था , कर्म्म , नाड़ी , प्रकाश , छन्द ,आतिवाहिक , आदि आत्मगतिनिमित्तों का क्या स्वरूप है ? ” — “ ब्रह्मपथ , देवपथ , पितृपथ , यमपथ , -आदि मार्ग कहां कहां व्यवस्थित हैं ? ” — ” परामुक्ति , अपरामुक्ति , समवलय , क्षीणोदर्क , भूमोदर्क , कैवल्य ,सालोक्य , सामीप्य , सारूप्य , सायुज्य आदि उत्तम गतिभावों का क्या स्वरूप है ? ” — ” कृष्ण मार्ग ,शुक्लमार्ग , परोजामार्ग , अगतिमार्ग , आदि मार्ग अपना क्या स्वरूप रखते हैं ? ” – ” ब्रह्मगति – प्रवर्त्तकब्रह्माश्वत्थ , तथा कर्म्मग तिप्रवर्त्तक ” कर्म्माश्वत्थ का वैज्ञानिक स्वरूप क्या है ? ” — इत्यादि प्रश्नों कावैज्ञानिक विवेचन करने वाले प्रस्तुत चतुर्थ ( अन्तिम ) खण्ड में निम्नलिखित एक प्रकरण तथा८ परिच्छेदों का समावेश हुआ है : -४ – भ्राद्धविज्ञानान्तर्गत – ‘ प्रात्मगति विज्ञानोपनिषत् ‘ नामक चतुर्थखण्ड
१ – ‘ आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् ‘ प्रथमैव
( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः )
सन्दर्भसङ्गति
१ — गतिस्वरूपपरिचय ५ – गत्यारूढ़ प्रत्यगात्मा२ – आत्मगतिविषयिणी प्रश्नपरम्परा ६ – आत्मो क्रान्ति के निमित्त३ – आत्मगतिमूलक आत्मस्वरूपपरिचय ७ – प्रात्मोत्क्रान्ति के परिचायक४- प्रश्नपरम्परा का समाधान ८- श्रात्मगति के निमित्तक – पन्थान : घ— छन्दांसिख – कर्म्माणि ङ – देवताःग – नाड्यः च – प्रतिवाहिकाः( १ ) नित्यगतिस्थानम् ( ३ ) गतिगतिस्थानम्
प्रकरणोपसंहार ( २ ) क्रमगतिस्थानम्
समाप्ता चेषं चतुर्थखण्डात्मिका- ‘ श्रात्मगतिविज्ञानोपनिषत् ‘ प्रथमा
समाप्तश्चायमात्मगतिविज्ञानोपनिषदात्मकः श्राद्धविज्ञानन्तर्गतः –
चतुथः खण्डः
[ ५६ ] * प्रतिवाहिकपरिशिष्ट
छ – प्रकाश :
ज – लाकाः ( आत्मगतिस्थानानि )श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
प्रतिपादनशैली तथा भाषादृष्टि – प्रतिपाद्य विषयदिग्दर्शनानन्तर प्रतिपादन शैली , तथा भाषादृष्टि के सम्बन्ध में भी दो शब्द कहदेना आवश्यक प्रतीत होता है , एवं उस समय तो यह आवश्यकता और भी अधिक अपेक्षित हो जाती
है , जब कि कई एक सम्माननीय महानुभावों के इस सम्बन्ध में
अनेक प्रकार के सुझाव हमारे सम्मुख उपस्थित होते रहते हैं ।
‘ हमारे प्रत्येक ग्रन्थ में एक ही विषय की अनेक बार पुनरावृत्तिरहती है । प्रतिपाद्य विपयों के अतिरिक्त समालोचनात्मक अनावश्यक विषयों का समावेश रहता है , जोउभयपक्ष में प्रतिस्पर्द्धा उत्पन्न कराते हैं । भाषा ठेठ ‘ पण्डिताऊ ‘ होती है , संस्कृत शब्द प्रचुरमात्रा सेसमाविष्ट रहते हैं | ग्रन्थ का आकार आवश्यकता से अधिक वृहत् होता है ‘ ये ही वे कतिपय सुझाव हैं ,जिन के लिए हम उन नीर – क्षीरबिवेकी महानुभावों के प्रति हृदय से कृतज्ञ हैं ।
मान्य बन्धुओं द्वारा उद्घाटित दोपों को स्वीकार करते हुए इस सम्बन्ध में हमारी ओर से यहीनिवेदन करना शेष रह जाता है कि , शताब्दियों से ही नहीं , अपितु सहस्त्राब्दियों से विलुप्त प्राप्त जिस’ प्रार्षविज्ञान ‘ को हमने जीवन का लक्ष्य बनाया है , उसके सम्बन्ध में प्रत्येक दशा में हमारा यह आवश्यककर्त्तव्य हो जाता है कि , ग्रामर्थ्यादा की रक्षा के नाते प्रतिपादनशैली , तथा भापादृष्टि , दोनों की मूलप्रतिष्ठा पशैली ही बनाई जाय । इन्द्रियातीतविषयप्रधान आविज्ञान के स्पष्टीकरण के सम्बन्ध मेंआप महर्षियों ने एक ही विषय के पुनः पुनरावर्त्तन को सर्वथा उपादेय माना है । उदाहरण के लिएनिम्नलिखित ब्राह्मण भाग ही पर्याप्त होगा । पाठक देखेंगे आरम्भ में ‘ अन्तर्यामी ‘ के संम्बन्ध में श्रुतिने जो विषय उद्धत किया है , विषय समाप्ति पर्थ्यन्त वही विषय बार – बार उद्धृत हुआ है –
१ – ‘ यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरः , यं पृथिवी न वेद , यस्य पृथिवीशरीरं , यः पृथिवीमन्तरो यमयति , स तऽप्रात्मान्तर्याम्यमृतः ‘ । २ – ‘ यो ऽप्सुतिष्ठन् अद्भ्योऽन्तरः , यमापो न विदुः , यस्यापः शरीरं , योऽपोऽन्तरो यमयति ,स त ऽश्रात्मान्तर्याम्यमृतःः ‘ । ३ – ‘ यो ऽग्नौ तिष्ठन् ० ‘ । ४ – य आकाशे तिष्ठन् ० ‘ ।५ – ‘ यो वायौ तिष्ठन् ० ’ | ६ – ‘ य दिये तिष्ठन् ॰ ‘ । ७ – ‘ यश्चन्द्वतारके तिष्ठन् ० ‘८ – ‘ यो दिक्षु तिष्ठन् ‘ । ९ – ‘ यो विद्युति तिष्ठन् ० ‘ । १० –य स्तनयित्नौतिष्ठन् ० ‘ । ११ – ‘ यः सर्वेषु लोकेषु तिष्ठन् ० ‘ । १२ – ‘ य : सर्वेषु वेदेषु तिष्ठन् ० ‘ ।१३ – यः सर्वेषु यज्ञेषु तिष्ठन् ० ‘ १४ – यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् ० ‘ । १५ – ‘ यःप्राणे तिष्ठन् ० ‘ । १६ – ‘ यो वाचि तिष्ठन् ० ‘ । १७ – ‘ यक्षुषि तिष्ठन् ० ‘ । १८‘ यः श्रोत्रे तिष्ठन् ० ‘ । १ ९ – ‘ यो मनसि तिष्ठन् ० ‘ । २० – यस्त्वचि तिष्ठन् ० ‘
[ ६० ]श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना२१ – ‘ यस्तेजसि तिष्ठन् ० ‘ । २२ – ‘ यस्तमसि तिष्ठन् ० ‘ | २३ – ‘ यो रेतसितिष्ठन् ० ‘ । २४ – ‘ य आत्मनि तिष्ठन् ।
– शत ० ब्रा ० १४।६।७ ।
यद्यपि इसका यह तात्पर्य्य नहीं कि , सर्वलोकोपकारक भाषा – ग्रन्थों में भी ठीक वैदिकशैली काअनुकरण करते हुए प्रत्येक विषय का पुनः पुनः आवर्त्तन किया जाय । तथापि प्रधान तथा स्वतन्त्र विषयनिरूपण करते समय अवश्यमेव कुछ एक सामान्य परिभाषाओं का प्रतिपादन तथा सिंहावलोकन करनाआवश्यक हो जाता है । ऐसा न करने पर ग्रन्थ सर्वथा लक्ष्यहीन बना रह जाता है । हम तो समझते हैं ,दृष्टिकोण भेद से प्रतिपादित ये परिभाषा – प्रकरण सर्वसाधारण के लिए विशेष हितकर ही होते हैं । हां ,जिन महानुभावों का लक्ष्य एकमात्र मनोरञ्जन ही है , साथ ही अन्यान्य अर्थसाधक लौकिक कार्यो मेंअहोरात्र व्यस्त रहने के कारण जिन्हें बुद्धिगम्य , अतएव ‘ यत्तदग्र विषमिव ‘ न्याय से कटुवत् प्रतीयमानप्रासाहित्य स्वाध्याय के लिए समय ही न मिलता हो , उनके लिए अवश्यमेव हमारा प्रयास व्यर्थ वनसकता है , जिस व्यर्थता को हम अपने लिए ‘ इष्टापत्ति ‘ मानते हैं । जो इस विषय के जिज्ञासु हैं , परमात्मानुग्रह से जिन्हें ऐसे साहित्य स्वाध्याय की सुविधा प्राप्त है , साथ ही जन्मान्तरीय , किंवा ऐहिकसंस्कारानुग्रह से जो ग्रार्पशैली से परिचित हैं , उनके लिए पुनरुक्तिमूला यह आशैली कदापि उद्व ग काकारण नहीं बन सकती ।
दूसरे समालोचनात्मक सुझाव के सम्बन्ध में इसलिए विशेष वक्तव्य अनावश्यक है कि , सत्यासत्यविवेक की दृष्टि से शिष्टभाषानुगत समालोचना – प्रसङ्ग ग्रन्थ का आवश्यक अङ्ग माना गया है । ‘ वादेवादे जायते तत्त्वबोध : ‘ न्याय से यत्र तत्र संक्षेप से निरूपित समालोचना – प्रसङ्ग परम्परया मूल विषय कासमर्थन ही कर रहे हैं । यदि श्राद्ध तत्त्व प्रतिपादनप्रसङ्ग में हम श्राद्ध की अवैदिकतासिद्ध करने वालेभावों का दिग्दर्शन करा देते हैं , तो इसमें कोई आपत्ति नहीं की जा सकती । अपना मन्तव्य , भले हीवह शास्त्र विरुद्ध ही क्यों न हो स्वभावतः प्रेयः पदार्थ है । उसका उद्घाटन करना अवश्य ही तत्पक्षानुयायी के लिए थोड़ी देर के लिए उद्वेगकर बन जाता है । परन्तु यही उद्वोग कालान्तर में उसे सत्यनिष्ठाभी बना देता है ।
तीसरे भाषानुगत सुझाव के सम्बन्ध में हम क्या कहें , जब कि भाषाज्ञान से हम सर्वथा वश्चितहै , और सम्भवतः अपने आवश्यक वेदस्वाध्यायकर्म्म में विघ्न उपस्थित कर भाषा पाठशाला में प्रविष्टहोना भी हम अपने लिए असम्भव मानते हैं । वर्त्तमान युग में ‘ हिन्दी ‘ मातृभाषा है , तत्पुत्रत्वेन उसकेक्रोड़ का आश्रय ग्रहण करना स्वाभाविक है । पुत्र जिस वृत्ति से भी माता का आश्रय ग्रहण करे , मातास्वयं उसे संभाल लेती है । जहाँ तक हमारा विश्वास है , दृष्टिकोण से जिस हिन्दी को भारतवर्ष की( न कि हिन्दुस्तान की ) मातृभाषा कहना उचित है , उसका आश्रय हमें प्राप्त हुआ है । हमने प्रयासकिया है कि , कलिवात्याहित भझावातों से मातृभाषा के स्वरूप को यथासम्भव सुरक्षित रक्खा जाय ।यदि समुद्रपार की विदेशी भाषाएँ हमारे अन्तस्तल में स्थान पा सकती हैं , तो कोई कारण नहीं प्रार्षप्रजा
[ ६१ ]श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावनःथोड़े से प्रयास से अपनी चिरसंस्कारानुगता भुसंस्कृता मातृभाषा के अवबोध में सफलता प्राप्त न कर सके ।’ प्राश्राश्च सिक्ताः , पितरश्न प्रीरिणताः ‘ न्याय से हमारे ये निबन्ध प्रतिषाद्य विषयों के साथ साथ – प्रार्षशैली ,आर्षभाषा , आदि के भी परिचायक बनें , यही प्रधान – लक्ष्य है , एवं इस लक्ष्य के प्रति जितने भी सामयिक सुझाव हैं , वे सब आगन्तुकधर्म्मलक्षण पर धर्म्मस्थानीय बनते हुए न केवल भयावह ही हैं , अपितुस्वधर्म ( धर्म ) के स्वरूपविघातक भी हैं । फलतः – स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ‘न्याय से उक्त सुझाव हमारे लिए दूर से ही प्रणम्य हैं ।सर्वान्त में प्रास्ताविक – वक्तव्य समाप्त करते हुए केवल यह कहना शेष रह जाता है कि , प्रस्तुत’ श्राद्ध विज्ञान ‘ ग्रन्थ आज से लगभग ७ वर्ष पहिले ही सम्पन्न हो गया था । परन्तु कई एक सामयिकविप्रतिपत्तियों के कारण इसे प्रकाशित न किया जा सका । पितृदेवता के श्रद्धासूत्रानुगत ग्रव्यर्थ अनुग्रह
से चिरकालानन्तर यह वाङ्मय पिण्डपितृयज्ञ सम्पन्न होने जा रहा है । प्रस्तुतप्रस्तावनोपसंहार प्रस्तावना के साथ ‘ आत्मविज्ञानोपनिषत् ‘ प्रथमखण्ड ही सर्वप्रथम प्रकाशित हो रहा
है | आर्षप्रजा का आवश्यक सहयोग ही आगे के तीन खण्डों के प्रकाशन का प्रधाननिमित्त है , और प्रतीक्षामय दृढ़ विश्वास है कि आप्रजा अवश्य ही इस प्रधान निमित्त का शीघ्र स्वरूपसम्पादन करेगी ।हम अपने इस प्रयास में कहाँ तक सफल हुए हैं ? इसका निर्णय भार तो विचारशील पाठकोंपर ही निर्भर है । हाँ , अपनी ओर से इस सम्बन्ध में यह बलपूर्वक कहा जा सकता है कि , अत्यावश्यकश्राद्धकर्म्म के सम्बन्ध में आज जो कुतर्कवाद प्रक्रान्त हैं , वेद को निमित्त बना कर घाम्मिक जगत् कीश्रद्धा पर जो आघात किया जा रहा है श्रद्धालु जनता इस पर प्रत्यय के मोह जाल में बद्ध होकर जिसपिण्डदानादि लक्षण श्राद्धकर्म से विमुख होती जा रही है , ये सब विप्रतिपत्तियाँ बहुत अशों में इसनिबन्ध से हट जायँगी । किसी पर आक्षेप न करते हुए वैदिक विज्ञानदृष्टि से , प्रधानतः श्रीतप्रमाणों काश्राश्रम लेते हुए , साथ ही तर्क , तथा युक्तिवाद को भी लक्ष्य बनाते हुए ‘ श्राद्धविज्ञान ‘ सम्पन्न हुआ है ।यद्यपि अनृतसंहित मनुष्य से भ्रान्ति हो जाना उसका स्वाभाविक धर्म है । परन्तु सद्भावना , अथवाकुभावना , उभयथा प्रदर्शित उस भ्रान्ति के संशोधन के लिए अन्तरात्मा सदा सन्नद्ध है ।
विधेयः
मोतीलाल शर्मा
भारद्वाजः ( गौड़ः )
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