पण्डित श्रीमद्गङ्गाधर पाठक ‘मैथिल’
चाकचिक्य वाले वर्णधर्मविहीन बड़े बड़े संस्थानों में वेद और वेदशास्त्रज्ञों का कोई महत्त्व नहीं। जिन वेदज्ञों को विशेष रूप से सम्मानित शुद्धासन मिलना चाहिए; उन्हें टेंट की दरी पर बैठने के लिए बाध्य होना सनातन परम्परा के लिए बहुत घातक है! पूज्यो! आप वेदरक्षकों का सम्मान नहीं करना चाहते; तो भी उनके अन्दर विराज रहे वेद भगवान् का तिरस्कार न करें। वेद भगवान् ही आपके व्यापार का मूलाधार हैं और प्रमुदित वेदज्ञ ब्राह्मण ही भविष्य के वेदरक्षक की व्यवस्था कर सकते हैं। अत: वेद की रक्षा और वेद का सम्मान करें…
विप्रै: संवर्द्धितो विष्णुर्जपहोमार्चनादिभि:। भगवद्रक्षका एते वीरा एव न संशय:।। (श्रीमद्भागवत ५।९।१७ ‘भगवत्कलावीरकुलं’ की व्याख्या में वंशीधरटीकोद्धृत संहितावचन) वेदज्ञ विप्रों के द्वारा किये जप, होम, अर्चन आदि से भगवान् विष्णु का संवर्द्धन होता है; इसलिए साक्षाद् भगवान् विष्णु का भी संरक्षक होने के कारण वेदज्ञ ब्राह्मण ही ‘वीर’ सिद्ध होते हैं। इसमें किञ्चिदपि संशय नहीं। मनुष्यो! “बलं विष्णो: प्रवर्द्धताम्” श्रीविष्णु आदि की बलवृद्धि के लिए भी ब्रह्मकुल की रक्षा करो…