नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्यापो न शोषयति मारुतः। गीता 2.23।।
एनं (अव्ययं आत्मानं) शस्त्राणि न छिन्दन्ति। पावकः एनं न दहति। आपः एनं न क्लेदयन्ति। च मारुतः एनं न शोषयति।
शस्त्र इस शरीरी (अव्यय आत्मा) को काट नहीँ सकते। अग्नि इसको जला नहीं सकती। जल इसको गीला नहीं कर सकता। और वायु इसको सुखा नहीं सकती। परन्तु क्यों और कैसे ?
छेदन, दाह, क्लेदन, शोषण आदि भौतिकगुणों का प्रभाव प्राणमात्रा, प्रज्ञामात्रा, भूतमात्रा से निर्मित भूतात्मा का एकभाग भूतमात्रा से सम्बन्ध रखनेवाले पाञ्चभौतिक पिण्डरूप शरीरात्मा पर ही पडता है। न कि अन्तर्निगूढ कार्यकारण रहित निर्लेप उस अव्ययात्मा पर। सर्वाकाशव्यापी लोकत्रयाधार ज्ञानज्योतिरूप उस अव्ययात्मा पर सूर्य-चन्द्र-अग्नि-विद्युत रूप भौतिक ज्योति का प्रभाव नहीं पडता (न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तिमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति – कठोपनिषद 3-5-15)। अव्ययात्मा से सूर्य-चन्द्र-अग्नि-विद्युत आदि सवको प्रकाश मिलता है, न कि यह अव्ययात्मा को प्रकाशित करते हैं। अव विस्तार से समझाते हैं।
ईश्वर (शुक्र, ब्रह्म, अमृत)
अविनाशी ईश्वर तीनोंलोकों में प्रविष्ट होकर सवका भरणपोषण करते हैं (गीता 15 – 16,17)। कठोपनिषद 2-2-8 में कहागया है – “तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते। तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन” ॥ ईश्वर में शुक्र, ब्रह्म, अमृत – यह तीन विभाग है। अमृत भाग में परात्पर, अव्यय, अक्षर, क्षर – यह आत्म चतुष्टयी है। ब्रह्मभाग में स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य, पृथिवी, चन्द्रमा – यह 5 प्राकृतात्मा है। शुक्रभाग में मर्त्यामृत वाग्-आपः-अग्निः, अग्निः-आपः-वाक्, समष्टि है। सव मिलाकर दशाक्षरा विराट् है।
जीव (आत्मग्राम, देवग्राम, भूतग्राम)
गीता (15-7) में कहागया है “ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः”। इसीलिये जीव में भी तद्वत् आत्मग्राम, देवग्राम, भूतग्राम – यह तीन विभाग है। आत्मग्राम में परात्पर, अव्यय, अक्षर, क्षर – यह एक गूढोत्मा कहलाते हैं। यह जीव का अमृतभाग है। शान्तात्मा, महानात्मा, विज्ञानात्मा, प्रज्ञानात्मा, भूतात्मा – यह अव्यक्त, त्रैगुण्य, बुद्धि, मन, शरीर नाम के अध्यात्म के पाञ्च प्राकृतात्मा ब्रह्मसत्य कहे जाते हैं। पञ्चभूतों का समष्टि शरीर भूतात्मा कहलाता है, जिसे बाह्यात्मा भी कहते हैं। सव मिलकर दशात्म समष्टि जीवप्रजापति का स्वरूप है।
परात्पर निःसङ्ग है। गूढोत्मा का अव्यय सर्वालम्वन है। सर्वशक्तिधन, सर्वकर्ता, जगन्निर्माता अक्षर है। विपरिणामी उपादानकारण क्षर है। पञ्च विश्वसृज (ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम), उनके पञ्चीकरण से जात पञ्च पञ्चजन (प्राण, आपः, वाक्, अन्नाद, अन्न), उनके पञ्चीकरण से जात पञ्च पुरञ्जन (वेद, लोक, प्रजा, भूत, पशु), यह मिलकर एक शान्तात्मा है। पञ्च पुरञ्जन आगे चलकर पञ्चीकरण से पञ्च पुर (स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य, पृथिवी,चन्द्रमा) को जन्म देते हैं। इन्ही पञ्च पुरों में सिमट कर व्याप्त हो कर शयन (शीङ् स्वप्ने॑) करने वाला तत्त्व को पुरुष कहते हैं। जैसे मनुष्य स्वप्नमें अपनेको विचित्रगति करतेहुये देखता है, परन्तु स्वप्नसे उठने के पश्चात् उपने को पूर्ववत् पाता है, उसीप्रकार पुरुष सवकुछ सृष्टि करतेहुये भी, प्रलय के पश्चात् अपनेको पूर्ववत् पाता है। अतः सृष्टि के प्रसव के निमित्तकारण उसे पुरुष कहते हैं। सत्व-रज-तम अथवा आत्मा-प्राणाः-पशवः भेद से त्रिपर्वा त्रैगुण्यात्मा है।
धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऐश्वर्य, विद्याबुद्धि-अस्मिता-रागद्वेष-अभिनिवेश, अविद्याबुद्धि से विज्ञानात्मा का स्वरूप वनता है। पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पञ्च कर्मेन्द्रिय, पञ्चप्राण से प्रज्ञानात्मा का स्वरूप वनता है। पञ्च भूतमात्रा, पञ्च प्राणमात्रा, पञ्च प्रज्ञामात्रा मिलकर भूतात्मा वनता है।
शुक्रवर्गीय भूतात्मा के तीन विभाग है जिसे शरीरात्मा (भूतमात्रा), हंसात्मा (श्वास-प्रश्वास), दिव्यात्मा (प्रज्ञामात्रा) कहते हैं। इनमें दिव्यात्मा के तीन विभाग है जिसे वैश्वानर-तैजस-प्राज्ञ कहते हैं। प्राज्ञांश के तीन विभाग है जिसे कर्मात्मा-चिदाभास-ईश्वर कहते हैं। ईश्वरांश के तीन विभाग है जिसे ऊर्ज्-श्री-विभूतिः कहते हैं। इसीलिये गीता (10-41) में कहागया है “यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा | तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्”।
इन में वैशेषिक का क्षेत्र रूप शरीरात्मा (भूतात्मा – इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते – गीता 13-1) का आलम्वन सांख्य का क्षेत्र रूप विज्ञानात्मा है (…अहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च … एतत्क्षेत्रं समासेन … गीता 13-5,6)। उस विज्ञानात्मा का आलम्वन अव्यक्तात्मा अक्षरात्मा है। यह शारीरक सिद्धान्त है। पुनः गीता 15-17 में कहा गया है कि सर्वालम्वन अव्ययात्मा है (यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः)।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि
भौतिक पिण्डसमूहों के अवयवादि विश्लेषण (वि + श्लि॒षँ आ॒लिङ्ग॑ने + घञ्, अयोगः) को छेदन कहते हैं। यथा वृक्ष से उसका शाखा का अयोग – अलग कर देना। क्या हम सूर्यकिरण जैसे व्यापक पदार्थ को किसी शस्त्र से काट सकते है ? सौरप्रकाश से भी अधिक सर्वव्यापी अव्ययात्मा को कैसे छेदन किया जा सकता है ?
नैनं दहति पावकः
भौतिकपदार्थों (macro particles) के साथ सौरपदार्थों (quantum particles) का विश्लेषण (decoupling leading to recombination) को दाह (भस्मीकरणम् – दः॒अँ भस्मी॒कर॑णे, भसँ भर्त्सनदी॒प्त्योः, भर्त्सँ॒ स॒न्तर्ज॑ने, तर्ज॑ने वा) कहते हैं।
- भौतिकअग्नि का लक्षण है ताप का संक्रमण (conduction)।
- सौरअग्नि का लक्षण है ताप का विकीरण (radiation)।
- आन्तरिक्षअग्नि का लक्षण है उभयमन्तरेण – दोनों का मध्यस्थ उपस्खलन (convection – अथातो निर्भुजपवादाः पृथिव्यायतनं निर्भुज दिवायतनं प्रतुण्णमन्तरिक्षायतनमुभयमन्तरेण… शाङ्ख्यायनारण्यकम्)।
साधारण अवस्थामें भौतिकअग्नि तथा सौरअग्नि, दोनों मिलेहुये रहते हैं। परन्तु अग्निसंयोगसे उनमें गति उत्पन्नहोकर विश्लेषण (decoupling) हो जाता है और नुतनवस्तुका निर्माण हो जाता है। उसीको दाह (transition states of chemical reaction) कहते हैं। सर्वव्यापी अव्ययात्मा में गति सम्भव नहीं है। अतः उसका दहन भी सम्भव नहीं है।
न चैनं क्लेदयन्यापः
आपः (जल का मूलरूप) के द्वारा वारुणपदार्थों का संश्लेषण (सं + श्लि॒षँ आ॒लिङ्ग॑ने + घञ्, आलिङ्गनम् – coupling) को क्लेदन (क्लिदूँ आद्रीभा॒वे) कहते हैं, जिससे दुर्गन्ध आदि होते हैं। जैसे इन्द्र विक्षेपणधर्मा है, उसीप्रकार वरुण (वृणोति सर्वं, व्रियते अन्यैरिति वा, वृञ् आ॒वर॑णे, वृञ् वर॑णे, वृङ् सम्भ॑क्तौ च) पिण्डीकरण धर्मा है (पटरो विक्लिधः पिङ्गः एतद्वरुणलक्षणम् – तैत्तिरीयारण्यकम् – प्रथमप्रश्नः)। जैसे इन्द्र का प्रतिष्ठा मध्यप्राण है, उसीप्रकार वरुण का प्रतिष्ठा जलराशि के मध्य – जहाँ गहराइ का पराकाष्ठा है – में है। वारुणपदार्थों का संश्लेषण से श्लेष्माजातीय पदार्थों का सृष्टि होता है, जिसमें दुर्गन्ध आदि हो जाते हैं। गन्ध पार्थिवलक्षण है। सर्वालम्वन अव्ययमें शुक्रवर्गीय पार्थिवलक्षण का सर्वथा अभाव है। अतः उसका क्लेदन सम्भव नहीं है।
न शोषयति मारुतः।
मारुत (वायु) द्वारा रुक्षता (रूक्षँ पारु॑ष्ये, अभिवाद, प्रत्यक्षदोषवर्णनम्) धर्म प्रयोजक रौद्र (संहारक) पदार्थों का संश्लेषण को शोषण (शु॒षँ शोष॑णे – रसाकर्षणम्) कहते हैं। जब दो विरुद्ध धर्मवाला पदार्थ (particle-antiparticle) मिलते हैं, ते बलवान पदार्थ निर्बल का रसाकर्षण कर के संहारक वन जाता है। उसी रससंहनन (annihilation of mass) को शोषण कहते हैं। सर्वधर्मोपपन्न अव्ययपुरुष का विरुद्ध धर्मवाला पदार्थ हो नहीं सकता। अतः उसका शोषण सम्भव नहीं है।