द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।

उत्तमः पुरुषस्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः”। गीता (15-16/17)

लोके (लोकृँ॒ दर्श॑ने – दृश्यभुवनम्) क्षरः च अक्षरः इमौ द्वौ एव पुरुषौ (पुरयति बलं यः पुर्षु शेते य इति वा) अस्ति। सर्वाणि भूतानि (“भू सत्ता॑याम् + क्तः” – क्षित्यादि पञ्च) क्षरः (विकारजातम्। विकारः प्रकृतेरन्यथाभावः। परिणामः)। कूटस्थः (कूटँ॒ अप्र॑दाने अव॒साद॑ने॒ऽपि। निर्विकारेण एकरूपतया यः देहद्वयावच्छिन्न राशिः इव कालव्यापी तिष्ठति सः) अक्षरः (अविकारी। संसारबीजानन्त्याद् न क्षरति) उच्यते। कूटस्थे कल्पिता बुद्धिस्तत्र चित्प्रतिविम्बकः। प्राणानां धारणाञ्जीवः संसारेण स युज्यते। उत्तमः पुरुषः तु अन्यः यः परमात्मा इति उदाहृतः। आभ्यां क्षराक्षराभ्यां विलक्षणः क्षराक्षरोपाधिद्वय दोषेण अस्पृष्टो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः अव्ययः (अविनाशी) ईश्वरः (ईशँ॒ ऐश्व॑र्ये अथवा अशूँ॒ व्या॑प्तौ सङ्घा॒ते च॑। येन स्थावरादिसर्वभूतानि आज्ञाकारीणि भवन्ति) लोकत्रयम् आविश्य बिभर्ति (भृ॒ञ् भर॑णे। डुभृ॒ञ् धारणपोष॒णयोः॑। प्रपञ्चाधिष्ठानवत्त्वेन भरणात्)।

इस संसारमें क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) यह दो प्रकार के ही पुरुष हैं। सम्पुर्ण प्राणियों के शरीर क्षर और उनके भीतर वसा हुआ जीवात्मा अक्षर कहलाता है। उत्तमपुरुष तो अन्य (विलक्षण) ही है जो परमात्मा – इस नाम से कहागया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनोंलोकों में प्रविष्ट होकर सवका भरणपोषण करते हैं। परन्तु क्यों और कैसे ?

आकाशादि समस्तभूत (वस्तुवाच्य समस्त पञ्चीकृत, अतः युक्त पदार्थ) मूलप्रकृति से नहीं, परन्तु उसके विकार (महत्, अहंकार आदि अन्यथाभावरूपी परिणाम) से जात होते हैं। यह परिणाम नश्वरवस्तु – अकालव्यापी – सदा न रहनेवाला है। इनका आदिकारणको मूलप्रकृति से क्षरित होने से क्षर कहा जाता है। वस्तु ओर उसका शक्ति अविनाभावी है। एक अन्य के विना नहीं रहसकते। वस्तु होगा तो उसका शक्ति अवश्य होगी। परन्तु मूलशक्ति (कार्यजननसामर्थ्य) नश्वरवस्तु नहीं है। वह सदा एकरूप से रहनेवाला – अतः त्रिकालव्यापी – है। वस्तु से अविनाभावी होने के कारण वह वस्तुके भीतर सर्वत्र सर्वदा व्याप्त है। वस्तु के सृष्टि में उसका प्रसवधर्मा पुरुष रूप से योगदान है। वस्तु के स्थिति में भी उसका स्त्री रूप से संस्त्यान (संहनन) धर्मा मायारूपेण सहयोग है (माया विभेदबुद्धिर्निजांशभूतेषु निखिलभूतेषु। नित्यं तस्य निरङ्कुशविभवं वेलेव वारिधीं रुन्धे। स तया परिमितमूर्त्तिः सङ्कुचितसमस्तशक्तिरेष पुमान्। रविरिव सन्ध्यारक्तः संहृतरश्मिः स्वभासनेऽप्यपटुः – शिवरहस्य)।

दो वस्तुओंमें उत्कर्षवाची शब्द को उत्तर तथा दो से अधिक वस्तुओंमें उत्कर्षवाची शब्द को उत्तम कहते हैं। क्षर, अक्षर तथा अव्यय तीनों में उत्तम अव्यय ही है। कारण अव्यय आलम्बन है, अक्षर निमित्तकारण तथा क्षर विश्व का उपादान कारण है। आत्मा शब्द सापेक्ष है। जैसे पुत्र कहने से प्रश्न उठता है किसका पुत्र, उसीप्रकार आत्मा कहने से प्रश्न उठता है किसका आत्मा। जो वस्तु जिसका उक्थ है, साम है, ब्रह्म है, वह वस्तु उसका आत्मा कहलाता है। यदुक्थं सत्, यत् साम सत्, यद् ब्रह्म स्यात् स तस्य आत्मा – आत्माका यह साधारण लक्षण है। यत् उत्तिष्ठति तदुक्थं व्युत्पत्ति से जिससे किसी वस्तु का स्वरूप उठता है – निर्माण होता है – उसे उस वस्तु का उक्थ कहते हैं। यह उपादान कारण है। मृत् (मिट्टी) घट का उपादान कारण है – मिट्टी से ही घट वनता है। अतः मिट्टी ही घट का उक्थ हैं। घट मृण्मय मूर्त्ति है। ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्त्तिमाहुः के अनुसार मूर्त्तियें ऋक् है। अतः घट ऋक् है। ऋक्, साम के योनि है। ऋचां समं मेने – इस व्युत्पत्ति से ऋक् से समानता को साम कहते हैं। घट रूप पात्र (ऋक्) का आकार और मृतिका रूप साम का आकार में जो समानता है, उसे साम कहते हैं।

प्रतिष्ठातत्त्व का नाम बृहत्वात् एवं बृंहणत्वात् – सवसे वडा होने से तथा सवको छन्दित कर के रखने से – ब्रह्म है। यह प्रतिष्ठा, आत्म, लोक, विधृति भेद से 3 प्रकार के है। घटोऽस्ति (घट है) में जो अस्ति (है) भाग है, वह आत्मप्रतिष्ठा है। घट मिट्टी में प्रतिष्ठित है। मिट्टी की प्रतिष्ठा भी घट में है। यही लोकप्रतिष्ठा है (लोकृँ॒ दर्श॑ने)। घट पृथिवी पर रखा है। पार्थिवप्रतिष्ठा से यह विधृत है। यही विधृतिप्रतिष्ठा है। इसे परप्रतिष्ठा भी कहते हैं। मिट्टी रूप उक्थ में घट प्रतिष्ठित है। घट को मिट्टी ने धारण कर रखा है। अतएव बिभर्त्ति – इस व्युत्पत्ति से मिट्टी उस घट का ब्रह्म है। उक्थ-साम-ब्रह्म भावक्षयोपेत मिट्टी ही घट का आत्मा है। उक्थ प्रभव है। ब्रह्म प्रतिष्ठा है। अवसानरूप साम परायण है। पार्थिव प्रजाका उक्थ-ब्रह्म-साम अथवा प्रभव-प्रतिष्ठा-परायण पृथिवी है। यही आत्मा का नाम-रूप-कर्म है (त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म। तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थम्। अतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्ति। एतदेतेषां साम एतद्धि सर्वैर्नामभिः समम्। एतदेषां ब्रह्म। एतद्धि सर्वाणि नामानि बिभर्ति – शतपथब्राह्मणम् – 14-4-4-1)। अव्ययपुरुष क्षर और अक्षर का भी प्रभव-प्रतिष्ठा-परायण है (परेऽव्यये सर्वं एकीभवन्तिमुण्डकोपनिषद – 3-2-7)। अतएव उसे परमात्मा कहा जाता है।

मूलरूपसे सर्वव्यापी अखण्ड शक्ति को बल कहा जाता है, जिसका स्वरूपलक्षण कार्यजननसामर्थ्य है। उसे परोरजाप्राण एवं विरजा भी कहते हैं। यह आत्मरूप (जीवात्मा) है। क्रियोन्मुखी अवस्थामें उसे प्राण कहा जाता है। यही आधुनिक विज्ञान के माध्याकर्षण शक्ति है। वस्तुसंसर्ग से खण्डाखण्ड हो कर उसके अन्तर्याम, वहिर्याम, उपयाम, यातयाम सम्बन्ध से चार विभाग हो जाता है, जिसे अपान, समान, व्यान, उदान, कहा जाता है, आगे चल कर जिसे आधुनिक विज्ञान में strong nuclear, beta decay part of weak nuclear interaction, electromagnetic interaction and alpha decay part of radioactive disintegration कहते हैं। जिस शरीर में यह पाञ्चों रहते है, उसे प्राणी कहते हैं। इसी के प्रभाव से मन, बुद्धि आदि अपने कर्म करते हैं। समतुलित होकर कार्यनिवृत्ति अवस्थामें उस सखण्डशक्ति को क्रिया कहा जाता है। इन दोनों से अलग कभी न व्यय होनेवाला (अविनाशी) ईश्वर अपने चैतन्यशक्ति से लोकत्रय – पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यौ तीन लोकों – में प्रविष्ट होकर (तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् – तैत्तिरीयोपनिषद् 2-6) केवल स्वरूप सत्तामात्र से सत्यरूप मे (सच्च त्यच्चाभवत् – तत्रैव) उनको भरण पोषण (धारण) करते हैं।

1) किसी का किसी वस्तु में अन्वित होना (परष्पर आवद्ध हो कर रहना) तथा 2) वह सम्बन्ध यावत्कालस्थायी होना (जव तक एक रहे, तव तक अन्य का रहना) विशेषण कहलाता है। जैसे कपिला गौ। जन्म से ले कर जव तक गौ रहेगी, तव तक उसका कपिलवर्ण रहेगा। यदि इन दोनों में से एक रहे अन्य न रहे, तो उसे उपाधि कहते हैं। जैसे स्नातकोत्तर उपाधि। स्नातक जन्म से नहीं होता। यदि इन दोनों में से एक भी न रहे, तो उसे उपलक्षण कहते हैं। जैसे वृक्ष के उपर वसे पक्षी। अक्षर एवं क्षर अव्यय के साथ अविनाभावी हैं। परन्तु उनका यह स्वरूप साम्यावस्था में लक्षित नहीं होता। अतः यावत्कालस्थायी नहीं होने से, अक्षर एवं क्षर अव्यय के उपाधिमात्र हैं। दृश्य अक्षर एवं क्षर परिचारक मात्र है। द्रष्टा अव्यय स्वामी है। अतः वह ईश्वर है।