धुन्धुमारोपाख्यान : असुर धुन्धु का वध करने वाले राजा को 'धुन्धुमार' क्यों कहा गया?
कर्तव्य और धर्म की विजय
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 201–204 · पृष्ठ 1394–1420
मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा
इक्ष्वाकुवंश के राजा कुवलाश्व के नाम परिवर्तन और उनके 'धुन्धुमार' कहलाने के यथार्थ कारण की जिज्ञासा हेतु
वैशम्पायनजी ने कहा— हे भरतश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिर ने पापरहित, दीर्घायु तथा तपोवृद्ध महात्मा मार्कण्डेय से इक्ष्वाकुवंश के राजा कुवलाश्व के नाम परिवर्तन और उनके 'धुन्धुमार' कहलाने के यथार्थ कारण को जानने की जिज्ञासा प्रकट की।
महामुनि मार्कण्डेय ने कथा का आरम्भ करते हुए कहा— हे भरतनन्दन! इक्ष्वाकुवंश में महर्षि उत्तङ्क अत्यन्त प्रसिद्ध थे। मरु के रमणीय प्रदेश में उनका आश्रम था, जहाँ उन्होंने भगवान् विष्णु की आराधना के लिए वर्षों तक अत्यन्त दुष्कर तपस्या की। उनकी इस कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान् विष्णु ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए। दर्शन पाते ही उत्तङ्क नम्रता से झुक गए और नाना प्रकार के स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति करने लगे।
यथा स राजा इक्ष्वाकुः कुवलाश्वो महीपतिः ।
धुन्धुमारत्वमगमत् तच्छृणुष्व महीपते ॥
महाराज! इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्व जिस प्रकार धुन्धुमार नामसे विख्यात हुए, वह सब श्रवण करो ।
उत्तङ्क ने हाथ जोड़कर कहा— "हे देव! देवता, असुर, मनुष्य आदि समस्त प्रजा आपसे ही उत्पन्न हुई है। सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राणियों की सृष्टि आपने ही की है। हे महातेजस्वी परमेश्वर! आकाश आपका मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र हैं, वायु आपकी श्वास है तथा अग्नि आपका तेज है। सम्पूर्ण दिशाएँ आपकी भुजाएँ हैं और महासागर आपका कुक्षिस्थान है। पृथ्वीदेवी आपके चरण हैं और ओषधियाँ आपके रोएँ। हे मधुसूदन! इन्द्र, सोम, अग्नि, वरुण जैसे देवता, असुर और बड़े-बड़े नाग आपके सामने नतमस्तक होकर हाथ जोड़कर आपको प्रणाम करते हैं। हे पुरुषोत्तम! आपके सन्तुष्ट होने पर ही संसार सुखी रहता है, अन्यथा इसे महान् भय का सामना करना पड़ता है। आपने तीन पगों द्वारा तीनों लोकों को हर लिया है और समृद्धिशाली असुरों का संहार किया है।"
उत्तङ्क की इस स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने कहा— "सहर्ष! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो।"
उत्तङ्क ने अत्यन्त विनय के साथ उत्तर दिया— "हे भगवन्! समस्त संसार की सृष्टि करने वाले दिव्य सनातन पुरुष, जो मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए, वही मेरे लिए सबसे महान् वर है।"
यदि मे भगवन् प्रीतः पुण्डरीकनिभेक्षण ॥
धर्मे सत्ये दमे चैव बुद्धिर्भवतु मे सदा ।
अभ्यासश्च भवेद् भक्त्या त्वयि नित्यं ममेश्वर ॥
‘ भगवन्! कमलनयन! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरी बुद्धि सदा धर्म, सत्य और इन्द्रियनिग्रहमें लगी रहे। मेरे स्वामी! आपके भजनका मेरा अभ्यास सदा बना रहे '
भगवान् विष्णु ने कहा— "सज्जनशिरोमणे! मैं तुम्हारी लोभशून्यता और उत्तम भक्ति से प्रसन्न हूँ। तुम्हें मुझसे कोई वर अवश्य लेना चाहिए।"
श्रीभगवानुवाच सर्वमेतद्धि भविता मत्प्रसादात् तव द्विज ।
प्रतिभास्यति योगश्च येन युक्तो दिवौकसाम् ॥
त्रयाणामपि लोकानां महत् कार्यं करिष्यसि । श्रीभगवान् बोले— ब्रह्मन्! मेरी कृपासे यह सब कुछ तुम्हें प्राप्त हो जायगा । इसके सिवा तुम्हारे हृदयमें उस योगविद्याका प्रकाश होगा जिससे युक्त होकर तुम देवताओं तथा तीनों लोकोंका महान् कार्य सिद्ध कर सकोगे ।
तब उत्तङ्क ने हाथ जोड़कर माँगा— "हे कमलनयन! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरी बुद्धि सदा धर्म, सत्य और इन्द्रियनिग्रह में लगी रहे और आपके भजन का मेरा अभ्यास सदा बना रहे।"
भगवान् बोले— "ब्रह्मन्! मेरी कृपा से यह सब तुम्हें प्राप्त होगा। इसके अतिरिक्त तुम्हारे हृदय में उस योगविद्या का प्रकाश होगा, जिससे युक्त होकर तुम देवताओं तथा तीनों लोकों का महान् कार्य सिद्ध कर सकोगे। सुनो! धुन्धु नाम से एक महान् असुर है, जो तीनों लोकों के संहार के लिए घोर तपस्या कर रहा है। जो वीर उस असुर का वध करेगा, मैं उसका परिचय देता हूँ— तुम्हारे आदेश से नृपश्रेष्ठ कुवलाश्व मेरे योगबल का आश्रय लेकर उस धुन्धु राक्षस का वध करेंगे और लोक में 'धुन्धुमार' नाम से विख्यात होंगे।" इतना कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गए।
स योगबलमास्थाय मामकं पार्थिवोत्तमः ।
शासनात् तव विप्रर्षे धुन्धुमारो भविष्यति ।
एवमुक्त्वा तु तं विप्रं विष्णुरन्तरधीयत ॥
ब्रह्मर्षे! तुम्हारे आदेशसे वे नृपश्रेष्ठ कुवलाश्व ही मेरे योगबलका आश्रय लेकर धुन्धु राक्षसका वध करेंगे और लोकमें धुन्धुमार नामसे विख्यात होंगे । उत्तङ्कसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये ।
मार्कण्डेयजी ने आगे कहा— महाराज इक्ष्वाकु के देहावसान के पश्चात उनके पुत्र शशाद अयोध्या में राज्य करने लगे। उनके बाद ककुत्स्थ, फिर अनेन, फिर पृथु, फिर विश्वगश्व और अद्रि हुए। अद्रि के पुत्र युवनाश्व थे, जिनके पुत्र श्राव और उसके पश्चात श्रावस्त हुए। श्रावस्त ने ही श्रावस्तीपुरी बसायी थी। श्रावस्त के पुत्र महाबली बृहदश्व थे और बृहदश्व के पुत्र कुवलाश्व थे। कुवलाश्व के इक्कीस हजार पुत्र थे जो समस्त विद्याओं में पारङ्गत, बलवान् और दुर्धर्ष वीर थे। कुवलाश्व अपने पिता से भी उत्तम गुणों वाले थे।
जब राजा बृहदश्व ने अपने योग्य पुत्र कुवलाश्व को राज्य का अभिषेक कर दिया, तब वे राजलक्ष्मी का भार पुत्र पर छोड़कर स्वयं तपस्या के लिए तपोवन की ओर चल दिए। यह सुनकर महातेजस्वी उत्तङ्क उनके पास पहुँचे और उन्हें वन जाने से रोकते हुए कहा— "महाराज! प्रजा की रक्षा करना आपका कर्तव्य है। अतः पहले वही आपको करना चाहिए जिससे हम लोग आपके कृपाप्रसाद से निर्भय हो सकें।"
पालने हि महान् धर्मः प्रजानामिह दृश्यते ।
न तथा दृश्यतेऽरण्ये माभूत् ते बुद्धिरीदृशी ॥
क्योंकि आपके लिये यहाँ रहकर प्रजाओंका पालन करनेमें जो महान् धर्म देखा जाता है, वैसा वनमें रहकर तपस्या करनेमें नहीं दिखायी देता । अतः आपकी ऐसी समझ नहीं होनी चाहिये ।
कौरवश्रेष्ठ! उत्तङ्क के इस प्रकार आग्रह करने पर अपराजित वीर राजर्षि बृहदश्व ने उनसे हाथ जोड़कर कहा— "ब्रह्मन्! आपका यह आगमन निष्फल नहीं होगा। मेरा यह पुत्र कुवलाश्व भूमण्डल में अनुपम वीर है। वह धैर्यवान् और फुर्तीला है। परिघ-जैसी मोटी भुजाओं वाले अपने समस्त शूरवीर पुत्रों के साथ जाकर वह आपका यह सारा अभीष्ट कार्य सिद्ध कर देगा, इसमें संशय नहीं है। ब्रह्मन्! आप मुझे छोड़ दीजिये। मैंने अब अस्त्र-शस्त्रों को त्याग दिया है।"
तथास्तु! अत्यन्त तेजस्वी उत्तङ्क मुनि ने राजा को यह वचन कहा और उन्हें वन जाने की आज्ञा दे दी। तत्पश्चात् राजर्षि बृहदश्व ने महात्मा उत्तङ्क को अपना वह पुत्र सौंप दिया और उत्तम तपोवन की ओर प्रस्थान कर गए।
युधिष्ठिर ने पूछा— "तपस्या के धनी मुनीश्वर! यह पराक्रमी दैत्य कौन था? किसका पुत्र और नाती था? मैं यह सब जानना चाहता हूँ। महामते! आप यह सारी कथा विस्तारपूर्वक बताइये।"
मार्कण्डेयजी बोले— "राजन्! तुम बड़े बुद्धिमान हो। यह सारा वृत्तान्त मैं यथार्थरूप से विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो। भरतश्रेष्ठ! बात उस समय की है जब सम्पूर्ण चराचर जगत् एकार्णव के जल में डूबकर नष्ट हो चुका था। समस्त प्राणी काल के गाल में चले गये थे।
शृणु राजन्निदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप ।
कथ्यमानं महाप्राज्ञ विस्तरेण यथातथम् ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं -राजन्! तुम बड़े बुद्धिमान् हो । यह सारा वृतान्त मैं यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो ।
उस समय वे भगवान् विष्णु एकार्णव के जल में अमित तेजस्वी शेषनाग के विशाल शरीर की शय्या पर योगनिद्रा का आश्रय लेकर शयन करते थे। उन्हीं भगवान् को सिद्ध, मुनिगण सबकी उत्पत्तिका कारण, लोकस्रष्टा, सर्वव्यापी, सनातन, अविनाशी तथा सर्वलोकमहेश्वर कहते हैं।
प्रभवं लोककर्तारं विष्णुं शाश्वतमव्ययम् ।
यमाहुर्मुनयः सिद्धाः सर्वलोकमहेश्वरम् ॥
सुष्वाप भगवान् विष्णुरप्सु योगत एव सः ।
नागस्य भोगे महति शेषस्यामिततेजसः ॥
उस समय वे भगवान् विष्णु एकार्णवके जलमें अमित तेजस्वी शेषनागके विशाल शरीरकी शय्यापर योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते थे । उन्हीं भगवान्को सिद्ध, मुनिगण सबकी उत्पत्तिका कारण, लोकस्रष्टा, सर्वव्यापी, सनातन, अविनाशी तथा सर्वलोकमहेश्वर कहते हैं ।
साक्षात् लोकगुरु ब्रह्माजी, पद्मे सूर्यसमप्रभः, महाभाग! अपनी महिमा से कभी च्युत न होने वाले लोककर्ता भगवान् श्रीहरि, नाग के विशाल फण द्वारा धारण की हुई इस पृथ्वी का सहारा लेकर शेषनाग पर सो रहे थे। उस समय उन दिव्यस्वरूप नारायण की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जो सूर्य के समान प्रकाशित हो रहा था। उसी में सम्पूर्ण लोकों के गुरु साक्षात् पितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए, जो सूर्य के समान तेजस्वी थे। वे चारों वेदों के विद्वान् हैं; जरायुज आदि चतुर्विध जीव उन्हीं के स्वरूप हैं। उनके चार मुख हैं और वे अपने प्रभाव से दुर्धर्ष हैं।
ब्रह्माजी के प्रकट होने के कुछ काल बाद मधु और कैटभ नामक दो पराक्रमी दानवों ने सर्वसामर्थ्यवान् भगवान् श्रीहरि को देखा। वे शेषनाग के शरीर की दिव्य शय्या पर शयन किये हुए थे। उनका तेज महान् था; जिस शय्या पर वे शयन कर रहे थे, उसकी लम्बाई-चौड़ाई कई योजनों की थी। भगवान् के मस्तक पर किरीट और कण्ठ में कौस्तुभमणि शोभायमान थी। उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था।
राजन्! वे अपनी कान्ति और तेज से दीप्त हो रहे थे। उनके शरीर से सहस्रों सूर्यों के समान प्रकाश फूट रहा था। उनकी वह झाँकी अद्भुत और अनुपम थी। भगवान् को देखकर मधु और कैटभ दोनों को बड़ा आश्चर्य हुआ। तत्पश्चात् उनकी दृष्टि कमल में बैठे हुए कमलनयन पितामह ब्रह्माजी पर पड़ी। उन्हें देखकर वे दोनों दैत्य उन अमित तेजस्वी ब्रह्माजी को डराने लगे। उन दोनों के द्वारा बार-बार डराये जाने पर महायशस्वी ब्रह्माजी ने उस कमल की नाल को हिलाया, जिससे भगवान् गोविन्द जाग उठे।
शयानं शयने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् ॥
बहुयोजनविस्तीर्णे बहुयोजनमायते ।
किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेयवाससम् ॥
वे शेषनागके शरीरकी दिव्य शय्यापर शयन किये हुए थे । उनका तेज महान् है । वे जिस शय्यापर शयन करते हैं, उसकी लंबाई- चौड़ाई कई योजनोंकी है । भगवान्के मस्तकपर किरीट और कण्ठमें कौस्तुभमणिकी शोभा हो रही थी । उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था ।
जागने पर उन्होंने उन दोनों महापराक्रमी दानवों को देखा। उन महाबली दानवों को देखकर भगवान् विष्णु ने कहा— 'तुम दोनों बड़े बलवान् हो। तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम दोनों को उत्तम वर दे रहा हूँ; क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे प्रसन्नता होती है'।"
'सुरश्रेष्ठ! हम दोनों तुम्हें वर देते हैं। देव! तुम्हीं हमलोगोंसे वर माँगो | हम दोनों तुम्हें तुम्हारी इच्छाके अनुसार वर देंगे । तुम बिना सोचे - विचारे जो चाहो, माँग लो’
श्रीभगवान् बोले — 'वीरो! मैं तुमसे अवश्य वर लूँगा । मुझे तुमसे वर प्राप्त करना अभीष्ट है; क्योंकि तुम दोनों बड़े पराक्रमी हो । तुम्हारे जैसा दूसरा कोई पुरुष नहीं है। सत्यपराक्रमी वीरो! तुम दोनों मेरे हाथसे मारे जाओ । मैं सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये तुमसे यही मनोरथ प्राप्त करना चाहता हूँ'
वध्यत्वमुपगच्छेतां मम सत्यपराक्रमौ ।
एतदिच्छाम्यहं कामं प्राप्तुं लोकहिताय वै ॥
सत्यपराक्रमी वीरो! तुम दोनों मेरे हाथसे मारे जाओ । मैं सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये तुमसे यही मनोरथ प्राप्त करना चाहता हूँ ।
मधु और कैटभ ने कहा - 'पुरुषोत्तम! हमलोगोंने पहले कभी स्वच्छन्द बर्ताव में भी झूठ नहीं कहा है, फिर और समय में तो हम झूठ बोल ही कैसे सकते हैं? आप हम दोनोंको सत्य और धर्म में अनुरक्त मानिये। बल, रूप, शौर्य और मनोनिग्रह में हमारी समता करनेवाला कोई नहीं है। धर्म, तपस्या, दान, शील, सत्त्व तथा इन्द्रियसंयम में भी हमारी कहीं तुलना नहीं है। किन्तु केशव! हमलोगोंपर यह महान् सङ्कट आ पहुँचा है। अब आप भी अपनी कही हुई बात पूर्ण कीजिये। काल का उल्लङ्घन करना बहुत ही कठिन है।'
मधुकैटभावूचतुः अनृतं नोक्तपूर्वं नौ स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ।
सत्ये धर्मे च निरतौ विद्धयावां पुरुषोत्तम ॥
मधु और कैटभने कहा - पुरुषोत्तम! हमलोगोंने पहले कभी स्वच्छन्द ( मर्यादारहित ) बर्तावमें भी झूठ नहीं कहा है, फिर और समयमें तो हम झूठ बोल ही कैसे सकते हैं? आप हम दोनोंको सत्य और धर्ममें अनुरक्त मानिये ।
'आवामिच्छावहे देव कृतमेकं त्वया विभो। अनावृतेऽस्मिन्नाकाशे वधं सुरवरोत्तम'
'देव! सुरश्रेष्ठ! विभो! हम दोनों आपके द्वारा एक ही सुविधा चाहते हैं। वह यह है कि आप इस खुले आकाश में ही हमारा वध कीजिये।'
स विचिन्त्याथ गोविन्दो नापश्यद् यदनावृतम् ।
अवकाशं पृथिव्यां वा दिवि वा मधुसूदनः ॥
स्वकावनावृतावूरू दृष्ट्वा देववरस्तदा ।
मधुकैटभयो राजन् शिरसी मधुसूदनः ।
चक्रेण शितधारेण न्यकृन्तत महायशाः ॥
भगवान् विष्णुने बहुत सोचनेपर जब कहीं खुला आकाश न देखा और स्वर्ग अथवा पृथ्वीपर भी जब उन्हें कोई खुली जगह न दिखायी दी, तब महायशस्वी देवेश्वर मधुसूदनने अपनी दोनों जाँघोंको अनावृत ( वस्त्ररहित) देखकर मधु और कैटभके मस्तकोंको उन्हींपर रखकर तीखी धारवाले चक्रसे काट डाला ।
'अनृतं मा भवेद् देव यद्धि नौ संश्रुतं तदा। सुन्दर नेत्रोंवाले देवेश्वर! हम दोनों आपके पुत्र हों। हमने आपसे यही वर माँगा है। आप इसे अच्छी तरह समझ लें। सुरश्रेष्ठ देव! हमने जो प्रतिज्ञा की है, वह असत्य नहीं होनी चाहिये।'
श्रीभगवान् बोले- 'बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा। यह सब कुछ तुम्हारी इच्छा के अनुसार होगा।'
भगवान् विष्णु ने बहुत सोचने पर जब कहीं खुला आकाश न देखा और स्वर्ग अथवा पृथ्वी पर भी उन्हें कोई खुली जगह न दिखाई दी, तब महायशस्वी देवेश्वर मधुसूदन ने अपनी दोनों जाँघों को अनावृत देखकर मधु और कैटभ के मस्तकों को उन्हीं पर रखकर तीखी धार वाले चक्र से काट डाला।
मार्कण्डेयजी कहते हैं - 'महाराज! उन्हीं दोनों मधु और कैटभ का पुत्र धुन्धु है जो बड़ा तेजस्वी और महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न है। उसने बड़ी भारी तपस्या की। वह दीर्घकाल तक एक पैर से खड़ा रहा। उसका शरीर इतना दुर्बल हो गया कि नस-नाड़ियों का जाल दिखाई देने लगा। ब्रह्माजी ने उसकी तपस्या से सन्तुष्ट होकर उसे वर दिया। धुन्धु ने भगवान् ब्रह्मासे इस प्रकार वर माँगा- 'भगवन्! मैं देवता, दानव, यक्ष, सर्प, गन्धर्व और राक्षस किसी के हाथ से न मारा जाऊँ।' तब ब्रह्माजी ने उससे कहा - 'ऐसा ही होगा। जाओ।' उनके ऐसा कहने पर धुन्धु ने मस्तक झुकाकर उनके चरणों का स्पर्श किया और वहाँ से चला गया।
देवदानवयक्षाणां सर्पगन्धर्वरक्षसाम् ।
अवध्योऽहं भवेयं वै वर एष वृतो मया ॥
‘ भगवन्! मैं देवता, दानव, यक्ष, सर्प, गन्धर्व और राक्षस किसीके हाथसे न मारा जाऊँ । मैंने आपसे यही वर माँगा है '
जब धुन्धु वर पाकर महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न हो गया, तब उसे अपने पिता मधु और कैटभ के वध का स्मरण आया और वह शीघ्रतापूर्वक भगवान् विष्णु के पास गया। धुन्धु अमर्ष में भरा हुआ था। उसने गन्धर्व सहित सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर भगवान् विष्णु तथा अन्य देवताओं को बार-बार महान् कष्ट देना प्रारम्भ किया।
भरतश्रेष्ठ! वह दुष्टात्मा बालूकामय प्रसिद्ध उच्चालक समुद्र में आकर रहने और उस देश के निवासियों को सताने लगा। राजन्! वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर धरती के भीतर बालू में छिपकर वहाँ उत्तङ्क के आश्रम में भी उपद्रव करने लगा। वह तपोबल का आश्रय लेकर सम्पूर्ण लोकों का विनाश करने के लिये मरुप्रदेश में शयन करता था और आश्रम के पास साँस लेकर आग की चिनगारियाँ फैलाता था।
समुद्रे बालुकापूर्णे उज्जालक इति स्मृते ।
आगम्य च स दुष्टात्मा तं देशं भरतर्षभ ॥
बाधते स्म परं शक्त्या तमुत्तङ्काश्रमं विभो ।
अन्तर्भूमिगतस्तत्र बालुकान्तर्हितस्तथा ॥
भरतश्रेष्ठ! वह दुष्टात्मा बालुकामय प्रसिद्ध उच्चालक समुद्रमें आकर रहने और उस देशके निवासियोंको सताने लगा । राजन्! वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर धरतीके भीतर बालूमें छिपकर वहाँ उत्तंकके आश्रममें भी उपद्रव करने लगा ।
इसी समय राजा कुवलाश्व अपनी सेना, सवारी तथा पुत्रों के साथ प्रस्थान किया। उनके साथ विप्रवर उत्तङ्क भी थे। शत्रु मर्दन महाराज कुवलाश्व अपने इक्कीस हजार बलवान् पुत्रों को साथ लेकर चले थे। तदनन्तर उत्तङ्क के अनुरोध से सम्पूर्ण जगत् का हित करने के लिये सर्वसमर्थ भगवान् विष्णु ने अपने तेजोमय स्वरूप से कुवलाश्व में प्रवेश किया।
जब कुवलाश्व यात्रा कर रहे थे, तब देवलोक में हर्षपूर्ण कोलाहल होने लगा। देवता कहने लगे— 'ये श्रीमान् नरेश अवध्य हैं, आज धुन्धुको मारकर ये धुन्धुमार नाम धारण करेंगे।' शीतल वायु चलने लगी और देवराज इन्द्र धरती की धूल शान्त करने के लिये वर्षा करने लगे। जहाँ महान् असुर धुन्धु रहता था, वहीं आकाश में देवताओं के विमान आदि दिखाई देने लगे। कुवलाश्व और धुन्धुका युद्ध देखने के लिये देवताओं, गन्धर्वों और महर्षियों ने वहाँ आकर दृष्टिपात किया।
शीतश्च वायुः प्रववौ प्रयाणे तस्य धीमतः ।
विपांसुलां महीं कुर्वन् ववर्ष च सुरेश्वरः ॥
उन बुद्धिमान् राजा कुवलाश्वके यात्राकालमें शीतल वायु चलने लगी । देवराज इन्द्र धरतीकी धूल शान्त करनेके लिये वर्षा करने लगे ।
भगवान् नारायण के तेज से परिपुष्ट होकर राजा कुवलाश्व अपने पुत्रों के साथ वहाँ जा पहुँचे और शीघ्र ही चारों ओर से उस बालूकामय समुद्र को खुदवाने लगे। सात दिनों तक खुदाई करने के बाद उन राजकुमारों ने उस बालू के भीतर छिपे हुए महाबली धुन्धु को देखा। उसका शरीर विशाल एवं भयङ्कर था और वह सूर्य के समान उद्दीप्त हो रहा था। वह पश्चिम दिशा को घेरकर सोया हुआ था और उसकी कान्ति प्रलयकालीन अग्निके समान थी।
ततपश्चात् कुवलाश्व के पुत्रों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। तीखे बाण, गदा, मुसल, पट्टिश, परिघ, प्रास और चमचमाते हुए तेज धार वाले खड्गों से आक्रमण किया। उन समस्त अस्त्र-शस्त्रों को उस क्रोधी असुर ने खा लिया। फिर उसने अपने मुँह से प्रलयकालीन अग्निके समान आग की चिनगारियाँ उगलना आरम्भ कर दिया और उन समस्त राजकुमारों को जलाकर भस्म कर दिया। जैसे पूर्वकाल में भगवान् कपिल ने राजा सगर के पुत्रों को दग्ध किया था, वैसे ही क्रोध में भरे धुन्धु ने कुवलाश्व के पुत्रों को जला दिया।
मुखजेनाग्निना क्रुद्धो लोकानुद्वर्तयन्निव ।
क्षणेन राजशार्दूल पुरेव कपिलः प्रभुः ॥
सगरस्यात्मजान् क्रुद्धस्तदद्भुतमिवाभवत् । नृपश्रेष्ठ! जैसे पूर्वकालमें भगवान् कपिलने कुपित होकर राजा सगरके सभी पुत्रोंको क्षणभरमें दग्ध कर दिया था, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए धुन्धुने, मानो वह सम्पूर्ण लोकोंको नष्ट कर देना चाहता हो, अपने मुखसे आग प्रकट करके कुवलाश्वके पुत्रोंको जला दिया । यह एक अद्भुत- सी घटना घटित हुई ।
जब सभी राजकुमार धुन्धुकी क्रोधाग्नि से दग्ध हो गये, तब महातेजस्वी राजा कुवलाश्व ने उस जगे हुए महाकाय दानव पर आक्रमण किया। उस समय धुन्धु के शरीर से बहुत सारा जल प्रवाहित होने लगा, किन्तु राजा कुवलाश्व ने योगी होने के कारण योगबल से उस जलमय तेज को पी लिया और जल प्रकट करके धुन्धुकी मुखाग्नि को बुझा दिया। तत्पश्चात् सम्पूर्ण लोकों के कल्याण के लिये राजर्षि कुवलाश्व ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके उस क्रूर पराक्रमी दैत्य धुन्धु को दग्ध कर मारा।
ब्रह्मास्त्रेण च राजेन्द्र दैत्यं क्रूरपराक्रमम् ॥
ददाह भरतश्रेष्ठ सर्वलोकभवाय वै ।
सोऽस्त्रेण दग्ध्वा राजर्षिः कुवलाश्वो महासुरम् ॥
सुरशत्रुममित्रघ्नं त्रैलोक्येश इवापरः । राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् सम्पूर्ण लोकोंके कल्याणके लिये राजर्षि कुवलाश्वने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके उस क्रूर पराक्रमी दैत्य धुन्धुको दग्ध कर दिया । इस प्रकार ब्रह्मास्त्रद्वारा शत्रुनाशक, देववैरी महान् असुर धुन्धुको दग्ध करके राजा कुवलाश्व दूसरे इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे ।
इस प्रकार ब्रह्मास्त्र द्वारा शत्रुनाशक महान् असुर धुन्धु को मारकर राजा कुवलाश्व दूसरे इन्द्र की भाँति शोभा पाने लगे। उस समय महामना राजा कुवलाश्व 'धुन्धुमार' नाम से विख्यात हो गये। तदनन्तर महर्षियों सहित सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होकर वहाँ आये और राजा से वर माँगने का अनुरोध करने लगे।
कुवलाश्व ने हाथ जोड़कर कहा- 'देवताओं! मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणों को धन दान करूँ, शत्रुओं के लिये दुर्जय रहूँ, भगवान् विष्णु के साथ सख्य भाव से प्रेम हो और मेरे मन में किसी प्राणी के प्रति द्रोह न रहे। धर्म में मेरा सदा अनुराग हो और अन्त में मेरा स्वर्गलोक में नित्य निवास हो।' देवताओं ने कहा- 'महाराज! ऐसा ही होगा।'
दद्यां वित्तं द्विजाग्रयेभ्यः शत्रूणां चापि दुर्जयः ।
सख्यं च विष्णुना मे स्याद् भूतेष्वद्रोह एव च ॥
' देवताओं! मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धन दान करूँ, शत्रुओंके लिये दुर्जय बना रहूँ, भगवान् विष्णुके साथ सख्य भावसे मेरा प्रेम हो और किसी भी प्राणीके प्रति मेरे मनमें द्रोह न रह जाय ।
ऋषियों और गन्धर्वों ने भी राजा को अनेक आशीर्वाद दिए। उस युद्ध में कुवलाश्व के तीन ही पुत्र शेष रह गये थे— दृढाश्व, कपिलाश्व और चन्द्राश्व। उन्हींसे इक्ष्वाकुवंशी नरेशों की परम्परा चालू हुई। इस प्रकार मधु-कैटभ के पुत्र धुन्धु को कुवलाश्व ने मारा और राजा 'धुन्धुमार' नाम से विख्यात हुए।'
ऋषिभिश्च सगन्धर्वैरुत्तङ्केन च धीमता ।
सम्भाष्य चैनं विविधैराशीर्वादैस्ततो नृप ॥
राजन्! तदनन्तर ऋषियों, गन्धर्वों और बुद्धिमान् महर्षि उत्तंकने भी नाना प्रकारके आशीर्वाद देते हुए राजासे वार्तालाप किया ।
In English
The Story of Kuvalashva and Dhundhu
The sage Utanka receives a boon from Vishnu to help King Kuvalashva defeat the demon Dhundhu. Dhundhu is the son of Madhu and Kaitabha, who were killed by Vishnu. After performing great penance, Dhundhu receives a boon from Brahma that protects him from being killed by any living being.
This page answers
- How did dhundhu get his boon from brahma?
- Who are the parents of dhundhu?
- Why was kuvalashva called dhundhumara?
- How did vishnu kill madhu and kaitabha?
Also written: Dhundhumaropakhyana, Dhundhumara, Markandeya, Yudhishthira, Uttanka, Brihadashva, Kuvalashva, Shashada, Madhu, Kaitabha, Dhundhu, Brahma, Vishnu, धुन्धुमारोपाख्यान