धुन्धुमारोपाख्यान : कुवलाश्व का नाम धुन्धुमार कैसे पड़ा?
असुर वध और नाम परिवर्तन
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 201–204 · पृष्ठ 1394–1420
2,816 शब्द · 15 मिनटका पाठ · 30 श्लोक
मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा
राजा इक्ष्वाकु के वंशज कुवलाश्व के नाम परिवर्तन का रहस्य बताते हुए
वैशम्पायनजी ने कहा— हे भरतश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! जब धर्मराज युधिष्ठिर ने पापरहित, दीर्घायु तथा तपोवृद्ध महात्मा मार्कण्डेय से राजा इन्द्रद्युम्न की स्वर्गप्राप्ति का वृत्तान्त सुना, तब उनके मन में एक जिज्ञासा जागी। उन्होंने मुने से पूछा— 'धर्मज्ञ मुने! आप देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर और अप्सराओं सहित समस्त संसार के दिव्य कथाओं को जानते हैं। इस लोक में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो आपसे अज्ञात हो। हे भृगुश्रेष्ठ! मैं यथार्थ रूप से यह जानना चाहता हूँ कि इक्ष्वाकुवंश में जो कुवलाश्व नाम से विख्यात विजयी राजा हुए, वे क्यों नाम बदलकर 'धुन्धुमार' कहलाने लगे? मैं उनके नाम परिवर्तन का वास्तविक कारण जानना चाहता हूँ।'
श्रुत्वा तु राजा राजर्षेरिन्द्रद्युम्नस्य तत् तथा ।
मार्कण्डेयान्महाभागात् स्वर्गस्य प्रतिपादनम् ॥
युधिष्ठिरो महाराज पप्रच्छ भरतर्षभ ।
मार्कण्डेयं तपोवृद्धं दीर्घायुषमकल्मषम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! महाभाग मार्कण्डेय मुनिके मुखसे राजर्षि इन्द्रद्युम्नको पुनः स्वर्गप्राप्ति होनेका वृत्तान्त ( तथा दानमाहात्म्य ) सुनकर राजा युधिष्ठिरने पापरहित, दीर्घायु तथा तपोवृद्ध महात्मा मार्कण्डेयसे इस प्रकार पूछा - ।
वैशम्पायनजी बोले— हे भारत! युधिष्ठिर के इस प्रश्न पर महामुनि मार्कण्डेय ने धुन्धुमार की कथा प्रारम्भ की। महाराज! इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्व जिस प्रकार 'धुन्धुमार' नाम से विख्यात हुए, वह सब श्रवण करें। महर्षि उत्तङ्क का नाम बहुत प्रसिद्ध है। मरु के रमणीय प्रदेश में उनका आश्रम है। प्रभावशाली उत्तङ्क ने भगवान विष्णु की आराधना करने के लिए कई वर्षों तक अत्यन्त दुष्कर तपस्या की। उनकी इस घोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान विष्णु ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए।
यथा स राजा इक्ष्वाकुः कुवलाश्वो महीपतिः ।
धुन्धुमारत्वमगमत् तच्छृणुष्व महीपते ॥
महाराज! इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्व जिस प्रकार धुन्धुमार नामसे विख्यात हुए, वह सब श्रवण करो ।
दर्शन पाते ही महर्षि उत्तङ्क अत्यन्त नम्रता से झुक गए और नाना प्रकार के स्तोत्रों द्वारा प्रभु की स्तुति करने लगे। उत्तङ्क बोले— 'देव! देवता, असुर, मनुष्य आदि समस्त प्रजा आपसे ही उत्पन्न हुई है। हे महातेजस्वी परमेश्वर! ब्रह्मा, वेद और जानने योग्य सभी वस्तुएँ आपने ही उत्पन्न की हैं। देव! आकाश आपका मस्तक है; चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र हैं; वायु आपकी श्वास है तथा अग्नि आपका तेज है। अच्युत! सम्पूर्ण दिशाएँ आपकी भुजाएँ हैं और महासागर आपका कुक्षिस्थान है। देव! मधुसूदन! पर्वत आपके ऊरु हैं और अन्तरिक्ष-लोक आपकी नाभि है। पृथ्वीदेवी आपके चरण हैं तथा ओषधियाँ आपके रोएँ हैं।
हे भुवनेश्वर! आपने सम्पूर्ण भूतों को व्याप्त कर रखा है। महान शक्तिशाली योगी और महर्षि आपका स्तवन करते हैं। पुरुषोत्तम! आपके सन्तुष्ट होने पर ही संसार स्वस्थ एवं सुखी होता है, और आपके कुपित होने पर इसे महान भय का सामना करना पड़ता है। एकमात्र आप ही सम्पूर्ण भय का निवारण करने वाले हैं। देव! आप देवताओं, मनुष्यों तथा सम्पूर्ण भूतों को सुख पहुँचाने वाले हैं। आपने तीन पगों द्वारा ही तीनों लोकों को हरण कर लिया था। समृद्धिशाली असुरों का संहार भी आपने ही किया और आपके पराक्रम से देवता परम सुख-शान्ति के भागी हुए हैं। हे महाद्युते! आपकी आराधना करके ही सम्पूर्ण देवता सुख एवं समृद्धि प्राप्त करते हैं।'
पराभूताश्च दैत्येन्द्रास्त्वयि क्रुद्धे महाद्युते ।
त्वं हि कर्ता विकर्ता च भूतानामिह सर्वशः ॥
आराधयित्वा त्वां देवाः सुखमेधन्ति सर्वशः । महाद्युते! आपके रुष्ट होनेसे ही दैत्यराज देवताओंके सामने पराजित हो जाते हैं । आप इस जगत्के सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं । प्रभो! आपकी आराधना करके ही सम्पूर्ण देवता सुख एवं समृद्धि- लाभ करते हैं ।
उत्तङ्क की इस स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कहा— 'सहर्ष! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो।' उत्तङ्क ने उत्तर दिया— 'भगवन्! समस्त संसार की सृष्टि करने वाले दिव्य सनातन पुरुष, आप सर्वशक्तिमान श्रीहरि मुझे दर्शन दे चुके हैं, यही मेरे लिए सबसे महान वर है।' भगवान विष्णु ने पुनः आग्रह किया— 'सज्जनशिरोमणे! मैं तुम्हारी लोभशून्यता और उत्तम भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें मुझसे कोई वर अवश्य लेना चाहिए।'
एवं स छन्द्यमानस्तु वरेण हरिणा तदा ॥
उत्तङ्कः प्राञ्जलिर्वव्रे वरं भरतसत्तम । मार्कण्डेयजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान् विष्णुके द्वारा वर लेनेके लिये आग्रह होनेपर उत्तङ्कने हाथ जोड़कर इस प्रकार वर माँगा ।
भगवान के बार-बार कहने पर उत्तङ्क ने हाथ जोड़कर कहा— 'हे कमलनयन भगवन्! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरी बुद्धि सदा धर्म, सत्य और इन्द्रियनिग्रह में लगी रहे। मेरे स्वामी! आपके भजन का मेरा अभ्यास सदा बना रहे।' भगवान बोले— 'ब्रह्मन्! मेरी कृपा से यह सब तुम्हें प्राप्त हो जाएगा। इसके अतिरिक्त तुम्हारे हृदय में उस योगविद्या का प्रकाश होगा जिससे युक्त होकर तुम देवताओं तथा तीनों लोकों का महान कार्य सिद्ध कर सकोगे। सुनो, धुन्धु नाम से प्रसिद्ध एक महान असुर है, जो तीनों लोकों का संहार करने के लिए घोर तपस्या कर रहा है। जो वीर उस महान असुर का वध करेगा, मैं उसका परिचय देता हूँ। हे ब्रह्मर्षे! तुम्हारे आदेश से राजा कुवलाश्व मेरे योगबल का आश्रय लेकर धुन्धु राक्षस का वध करेंगे और लोक में 'धुन्धुमार' नाम से विख्यात होंगे।' इतना कहकर भगवान विष्णु अन्तर्धान हो गए।
स योगबलमास्थाय मामकं पार्थिवोत्तमः ।
शासनात् तव विप्रर्षे धुन्धुमारो भविष्यति ।
एवमुक्त्वा तु तं विप्रं विष्णुरन्तरधीयत ॥
ब्रह्मर्षे! तुम्हारे आदेशसे वे नृपश्रेष्ठ कुवलाश्व ही मेरे योगबलका आश्रय लेकर धुन्धु राक्षसका वध करेंगे और लोकमें धुन्धुमार नामसे विख्यात होंगे । उत्तङ्कसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये ।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— महाराज इक्ष्वाकु के देहावसान के पश्चात उनके धर्मात्मा पुत्र शशाद ने अयोध्या में राज्य किया। उसके बाद ककुत्स्थ, अनेन और फिर पृथु हुए। पृथु के वंश में अद्रि और उसके पुत्र युवनाश्व हुए। श्रावस्त के पुत्र महाबली बृहदश्व थे और बृहदश्व के पुत्र कुवलाश्व थे। कुवलाश्व के इक्कीस हजार पुत्र थे, जो सभी विद्याओं में पारङ्गत, बलवान और दुर्धर्ष वीर थे। राजा बृहदश्व ने अपने उत्तम गुणों वाले पुत्र कुवलाश्व को राज्य सौंपकर स्वयं तपस्या के लिए तपोवन की ओर प्रस्थान किया।
बृहदश्वस्य दायादः कुवलाश्व इति स्मृतः ।
कुवलाश्वस्य पुत्राणां सहस्राण्येकविंशतिः ॥
बृहदश्वके ही पुत्रका नाम कुवलाश्व था । कुवलाश्वके इक्कीस हजार पुत्र हुए ।
जब महान तेजस्वी उत्तङ्क को यह ज्ञात हुआ कि राजर्षि बृहदश्व वन जाने वाले हैं, तो वे उनके पास पहुँचे और उन्हें रोकते हुए कहा— 'महाराज! प्रजा की रक्षा करना आपका परम कर्तव्य है। अतः पहले वही आपको करना चाहिए जिससे हम लोग आपके कृपाप्रसाद से निर्भय हो सकें।'
'महाराज! प्रजा की रक्षा करना आपका परम कर्तव्य है। अतः पहले वही आपको करना चाहिए जिससे हम लोग आपके कृपाप्रसाद से निर्भय हो सकें।' उत्तङ्क के इन वचनों ने राजर्षि बृहदश्व को रोक लिया। उत्तङ्क ने अत्यन्त व्याकुल होकर कहा— 'महाराज! आप वन में न जाइये। आपके लिये यहाँ रहकर प्रजाओं का पालन करने में जो महान धर्म देखा जाता है, वैसा वन में रहकर तपस्या करने में नहीं दिखता। पूर्वकाल के राजर्षियों ने जिस धर्म का पालन किया है, वह प्रजाजनों के पालन में ही सुलभ है। राजा के लिये प्रजाजनों का पालन करना ही धर्म है। भूपाल! मैं शान्तिपूर्वक तपस्या नहीं कर पा रहा हूँ।'
पालने हि महान् धर्मः प्रजानामिह दृश्यते ।
न तथा दृश्यतेऽरण्ये माभूत् ते बुद्धिरीदृशी ॥
क्योंकि आपके लिये यहाँ रहकर प्रजाओंका पालन करनेमें जो महान् धर्म देखा जाता है, वैसा वनमें रहकर तपस्या करनेमें नहीं दिखायी देता । अतः आपकी ऐसी समझ नहीं होनी चाहिये ।
उत्तङ्क ने उस भयानक सङ्कट का दृश्य आँखों के सामने खींच दिया— 'ममाश्रमसमीपे वै समेषु मरुधन्वसु... उसका आश्रम समीप एक समुद्र है जो बालू से भरा है। वहाँ महान बल और पराक्रम से सम्पन्न एक भयङ्कर दानवराज रहता है, जो मधु और कैटभ का पुत्र है। वह क्रूर स्वभाव वाला राक्षस धुन्धु नाम से प्रसिद्ध है। राजन्! वह अमित पराक्रमी दानव धरती के भीतर छिपकर रहा करता है। उसका नाश करके ही आपको वन में जाना चाहिये। वह सम्पूर्ण लोकों और देवताओं के विनाश के लिये कठोर तपस्या का आश्रय लेकर पृथ्वी में शयन करता है।'
बहुयोजनविस्तीर्णो बहुयोजनमायतः ।
तत्र रौद्रो दानवेन्द्रो महावीर्यपराक्रमः ॥
मधुकैटभयोः पुत्रो धुन्धुर्नाम सुदारुणः ।
अन्तर्भूमिगतो राजन् वसत्यमितविक्रमः ॥
उसकी लंबाई- चौड़ाई कई योजनकी है । वहाँ महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न एक भयंकर दानवराज रहता है, जो मधु और कैटभका पुत्र है । वह क्रूर स्वभाववाला राक्षस धुन्धु नामसे प्रसिद्ध है । राजन्! वह अमित पराक्रमी दानव धरतीके भीतर छिपकर रहा करता है ।
उत्तङ्क की वाणी में भय और चिन्ता स्पष्ट थी— 'राजन्! वह सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्माजी से वर पाकर देवताओं, दैत्यों, राक्षसों, नागों, यक्षों और समस्त गन्धर्वों के लिये अवध्य हो गया है। महाराज! आपका कल्याण हो। आप उस दैत्य का विनाश कीजिये। उसका वध करके आप सदा बनी रहनेवाली अक्षय एवं महान कीर्ति प्राप्त करेंगे। वह क्रूर राक्षस एक वर्ष में एक ही बार साँस लेता है; जिस समय वह साँस लेता है, उस समय पर्वत, वन और काननों सहित यह सारी पृथ्वी डोलने लगती है। उसके साँस की आँधी से धूल का इतना ऊँचा बवण्डर उठता है कि वह सूर्य के मार्ग को भी ढक लेता है और सात दिनों तक वहाँ भूकम्प होता रहता है। आग की चिनगारियाँ, ज्वालाएँ और धुआँ उठकर अत्यन्त भयङ्कर दृश्य उपस्थित करते हैं। राजन्! इस कारण मेरा अपने आश्रम में रहना कठिन हो गया है। सब लोगों के हित के लिये आप उस राक्षस को नष्ट कीजिये। उसका मारे जाने पर सब लोग स्वस्थ एवं सुखी हो जायेंगे। मेरा विश्वास है कि आप अकेले ही उसका नाश करने के लिये पर्याप्त हैं।'
उत्तङ्क ने राजा को ढाढस बँधाते हुए कहा— 'भूपाल! भगवान् विष्णु अपने तेज से आपके तेज को बढ़ाएंगे। उन्होंने पूर्वकाल में मुझे यह वर दिया था कि जो राजा उस भयानक एवं महान असुर का वध करने को उद्यत होगा, उस दुर्धर्ष वीर के भीतर मेरा वैष्णव तेज प्रवेश करेगा। अतः आप भगवान् का दुःसह तेज धारण करके पृथ्वी पर रहने वाले उस भयानक पराक्रमी दैत्य को नष्ट कीजिये। राजन्! धुन्धु महातेजस्वी असुर है; साधारण तेज से सौ वर्षों में भी कोई उसे नष्ट नहीं कर सकता।'
तेजसा तव तेजश्च विष्णुराप्याययिष्यति ।
विष्णुना च वरो दत्तः पूर्वं मम महीपते ॥
यस्तं महासुरं रौद्रं वधिष्यति महीपतिः ।
तेजस्तं वैष्णवमिति प्रवेक्ष्यति दुरासदम् ॥
भूपाल! भगवान् विष्णु अपने तेजसे आपके तेजको बढ़ायेंगे। उन्होंने पूर्वकालमें मुझे यह वर दिया था कि जो राजा उस भयानक एवं महान् असुरका वध करनेको उद्यत होगा, उस दुर्धर्ष वीरके भीतर मेरा वैष्णव तेज प्रवेश करेगा ।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— कौरवश्रेष्ठ! उत्तङ्क के इस प्रकार आग्रह करने पर अपराजित वीर राजर्षि बृहदश्व ने उनसे हाथ जोड़कर कहा— 'ब्रह्मन्! आपका यह आगमन निष्फल नहीं होगा। मेरा यह पुत्र कुवलाश्व भूमण्डल में अनुपम वीर है। वह धैर्यवान् और फुर्तीला है; परिघ जैसी मोटी भुजाओं वाले अपने समस्त शूरवीर पुत्रों के साथ जाकर यह आपका सारा अभीष्ट कार्य सिद्ध करेगा, इसमें संशय नहीं है। ब्रह्मन्! आप मुझे छोड़ दीजिये। मैंने अब अस्त्र-शस्त्रों को त्याग दिया है।'
तथास्तु कहकर तेजस्वी मुनि ने राजा को आज्ञा दी। तत्पश्चात् राजर्षि बृहदश्व ने अपना वह पुत्र कुवलाश्व उत्तङ्क को सौंप दिया और उत्तम तपोवन की ओर प्रस्थान कर गए।
तेन राजन् न शक्नोमि तस्मिन् स्थातुं स्व आश्रमे ।
तं विनाशय राजेन्द्र लोकानां हितकाम्यया ॥
राजन्! इस कारण मेरा अपने आश्रममें रहना कठिन हो गया है । महाराज! सब लोगोंके हितके लिये आप उस राक्षसको नष्ट कीजिये ।
युधिष्ठिर ने जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा— 'तपोधन! भगवन्! यह पराक्रमी दैत्य कौन था? किसका पुत्र और नाती था? मैं यह सब जानना चाहता हूँ। महामते! आप यह सारी कथा विस्तारपूर्वक बताइये।'
मार्कण्डेयजी बोले— 'राजन्! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। यह सारा वृतान्त मैं यथार्थ रूप से विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो। भरतश्रेष्ठ! बात उस समय की है जब सम्पूर्ण चराचर जगत् एकार्णव के जल में डूबकर नष्ट हो चुका था। समस्त प्राणी काल के गाल में चले गये थे। उस समय वे भगवान् विष्णु एकार्णव के जल में अमित तेजस्वी शेषनाग के विशाल शरीर की शय्या पर योगनिद्रा का आश्रय लेकर शयन करते थे। उन्हीं भगवान् को सिद्ध, मुनिगण सबकी उत्पत्तिका कारण, लोकस्रष्टा, सर्वव्यापी, सनातन, अविनाशी तथा सर्वलोकमहेश्वर कहते हैं।
एकार्णवे तदा लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
प्रणष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ! बात उस समयकी है जब सम्पूर्ण चराचर जगत् एकार्णवके जलमें डूबकर नष्ट हो चुका था । समस्त प्राणी कालके गाल में चले गये थे ।
साक्षात् लोकगुरु ब्रह्माजी, जो पद्मे सूर्यसमप्रभः हैं, अपनी महिमा से कभी च्युत न होने वाले भगवान् श्रीहरि नाग के विशाल फण के द्वारा धारण की हुई इस पृथ्वी का सहारा लेकर शयन कर रहे थे। उस समय उन दिव्य स्वरूप नारायण की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जो सूर्य के समान प्रकाशित हो रहा था। उसी में सम्पूर्ण लोकों के गुरु साक्षात् पितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए। वे चारों वेदों के विद्वान् हैं; उनके चार मुख हैं और वे अपने प्रभाव से दुर्धर्ष हैं।
स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम् ।
नाभ्यां विनिःसृतं दिव्यं तत्रोत्पन्नः पितामहः ॥
साक्षाल्लोकगुरुर्ब्रह्मा पद्मे सूर्यसमप्रभः । महाभाग! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले लोककर्ता भगवान् श्रीहरि नागके विशाल फणके द्वारा धारण की हुई इस पृथ्वीका सहारा लेकर ( शेषनागपर ) सो रहे थे, उस समय उन दिव्यस्वरूप नारायणकी नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जो सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था । उसीमें सम्पूर्ण लोकोंके गुरु साक्षात् पितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए, जो सूर्यके समान तेजस्वी थे ।
ब्रह्माजी के प्रकट होने के कुछ काल बाद मधु और कैटभ नामक दो पराक्रमी दानवों ने सर्वसामर्थ्यवान् भगवान् श्रीहरि को देखा। वे शेषनाग के शरीर की दिव्य शय्या पर शयन किये हुए थे। उनका तेज महान है; वे जिस शय्या पर शयन कर रहे थे उसकी लम्बाई-चौड़ाई कई योजनों की थी। भगवान् के मस्तक पर किरीट और कण्ठ में कौस्तुभमणि शोभा दे रही थी। उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था।
शयानं शयने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् ॥
बहुयोजनविस्तीर्णे बहुयोजनमायते ।
किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेयवाससम् ॥
वे शेषनागके शरीरकी दिव्य शय्यापर शयन किये हुए थे । उनका तेज महान् है । वे जिस शय्यापर शयन करते हैं, उसकी लंबाई- चौड़ाई कई योजनोंकी है । भगवान्के मस्तकपर किरीट और कण्ठमें कौस्तुभमणिकी शोभा हो रही थी । उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था ।
राजन्! वे अपनी कान्ति और तेज से उदीप्त हो रहे थे; उनके शरीर से सहस्रों सूर्यों के समान प्रकाश निकल रहा था। उनकी झाँकी अद्भुत और अनुपम थी। भगवान् को देखकर मधु और कैटभ दोनों को बड़ा आश्चर्य हुआ। तत्पश्चात् उनकी दृष्टि कमल में बैठे हुए कमलनयन पितामह ब्रह्माजी पर पड़ी। उन्हें देखकर वे दोनों दैत्य उन अमित तेजस्वी ब्रह्माजी को डराने लगे। उन दोनों के द्वारा बार-बार डराये जाने पर महायशस्वी ब्रह्माजी ने उस कमल की नाल को हिलाया, जिससे भगवान् गोविन्द जाग उठे।
अकम्पयत् पद्मनालं ततोऽबुध्यत केशवः ।
अथापश्यत गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ ॥
भगवान्को देखकर मधु और कैटभ दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ । तत्पश्चात् उनकी दृष्टि कमलमें बैठे हुए कमलनयन पितामह ब्रह्माजीपर पड़ी । उन्हें देखकर वे दोनों दैत्य उन अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको डराने लगे । उन दोनोंके द्वारा बार- बार डराये जानेपर महायशस्वी ब्रह्माजीने उस कमलकी नालको हिलाया । इससे भगवान् गोविन्द जाग उठे । जागनेपर उन्होंने उन दोनों महापराक्रमी दानवोंको देखा ।
जागने पर उन्होंने उन दोनों महापराक्रमी दानवों को देखा। उन महाबली दानवों को देखकर भगवान् विष्णु ने कहा— 'तुम दोनों बड़े बलवान् हो। तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम दोनों को उत्तम वर दे रहा हूँ; क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे प्रसन्नता होती है।'
दृष्ट्वा तावब्रवीद् देवः स्वागतं वां महाबलौ ।
ददामि वां वरं श्रेष्ठं प्रीतिर्हि मम जायते ॥
उन महाबली दानवोंको देखकर भगवान् विष्णुने कहा- ' तुम दोनों बड़े बलवान् हो । तुम्हारा स्वागत है । मैं तुम दोनोंको उत्तम वर दे रहा हूँ; क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे प्रसन्नता होती है '
महाराज! वे दोनों महाबली दानव बड़े अभिमानी थे। उन्होंने हँसकर इन्द्रियों के स्वामी भगवान् मधुसूदन से एक साथ कहा—'
'सुरश्रेष्ठ! हम दोनों तुम्हें वर देते हैं। देव! तुम्हीं हमलोगोंसे वर माँगो | हम दोनों तुम्हें तुम्हारी इच्छाके अनुसार वर देंगे । तुम बिना सोचे - विचारे जो चाहो, माँग लो’
श्रीभगवान् बोले — 'वीरो! मैं तुमसे अवश्य वर लूँगा । मुझे तुमसे वर प्राप्त करना अभीष्ट है; क्योंकि तुम दोनों बड़े पराक्रमी हो । तुम्हारे जैसा दूसरा कोई पुरुष नहीं है। सत्यपराक्रमी वीरो! तुम दोनों मेरे हाथसे मारे जाओ । मैं सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये तुमसे यही मनोरथ प्राप्त करना चाहता हूँ'
वध्यत्वमुपगच्छेतां मम सत्यपराक्रमौ ।
एतदिच्छाम्यहं कामं प्राप्तुं लोकहिताय वै ॥
सत्यपराक्रमी वीरो! तुम दोनों मेरे हाथसे मारे जाओ । मैं सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये तुमसे यही मनोरथ प्राप्त करना चाहता हूँ ।
मधु और कैटभ ने कहा — 'पुरुषोत्तम! हमलोगोंने पहले कभी स्वच्छन्द बर्ताव में भी झूठ नहीं कहा है, फिर और समय में तो हम झूठ बोल ही कैसे सकते हैं? आप हम दोनोंको सत्य और धर्म में अनुरक्त मानिये। बल, रूप, शौर्य और मनोनिग्रह में हमारी समता करनेवाला कोई नहीं है। धर्म, तपस्या, दान, शील, सत्त्व तथा इन्द्रियसंयम में भी हमारी कहीं तुलना नहीं है। किन्तु केशव! हमलोगोंपर यह महान् सङ्कट आ पहुँचा है। अब आप भी अपनी कही हुई बात पूर्ण कीजिये। काल का उल्लङ्घन करना बहुत ही कठिन है। आवामिच्छावहे देव कृतमेकं त्वया विभो। अनावृतेऽस्मिन्नाकाशे वधं सुरवरोत्तम। देव! सुरश्रेष्ठ! विभो! हम दोनों आपके द्वारा एक ही सुविधा चाहते हैं। वह यह है कि आप इस खुले आकाश में ही हमारा वध कीजिये। अनृतं मा भवेद् देव यद्धि नौ संश्रुतं तदा। सुन्दर नेत्रोंवाले देवेश्वर! हम दोनों आपके पुत्र हों। हमने आपसे यही वर माँगा है। आप इसे अच्छी तरह समझ लें। सुरश्रेष्ठ देव! हमने जो प्रतिज्ञा की है, वह असत्य नहीं होनी चाहिये'
मधुकैटभावूचतुः अनृतं नोक्तपूर्वं नौ स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ।
सत्ये धर्मे च निरतौ विद्धयावां पुरुषोत्तम ॥
मधु और कैटभने कहा - पुरुषोत्तम! हमलोगोंने पहले कभी स्वच्छन्द ( मर्यादारहित ) बर्तावमें भी झूठ नहीं कहा है, फिर और समयमें तो हम झूठ बोल ही कैसे सकते हैं? आप हम दोनोंको सत्य और धर्ममें अनुरक्त मानिये ।
श्रीभगवान् बोले— 'बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा। यह सब कुछ तुम्हारी इच्छा के अनुसार होगा'
श्रीभगवानुवाच बाढमेवं करिष्यामि सर्वमेतद् भविष्यति ॥
श्रीभगवान् बोले- बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा । यह सब कुछ ( तुम्हारी इच्छाके अनुसार ) होगा ।
भगवान् विष्णु ने बहुत सोचने पर जब कहीं खुला आकाश न देखा और स्वर्ग अथवा पृथ्वी पर भी उन्हें कोई खुली जगह न दिखाई दी, तब महायशस्वी देवेश्वर मधुसूदन ने अपनी दोनों जाँघों को अनावृत देखकर मधु और कैटभ के मस्तकों को उन्हीं पर रखकर तीखी धार वाले चक्र से काट डाला।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— 'महाराज! उन्हीं दोनों मधु और कैटभ का पुत्र धुन्धु है जो बड़ा तेजस्वी और महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न है। उसने बड़ी भारी तपस्या की। वह दीर्घकाल तक एक पैर से खड़ा रहा। उसका शरीर इतना दुर्बल हो गया कि नस-नाड़ियों का जाल दिखाई देने लगा। ब्रह्माजी ने उसकी तपस्या से सन्तुष्ट होकर उसे वर दिया। धुन्धु ने भगवान् ब्रह्मासे इस प्रकार वर माँगा— 'भगवन्! मैं देवता, दानव, यक्ष, सर्प, गन्धर्व और राक्षस किसी के हाथ से न मारा जाऊँ।' मैंने आपसे यही वर माँगा है। तब ब्रह्माजी ने उससे कहा— 'ऐसा ही होगा। जाओ।' उनके ऐसा कहने पर धुन्धु ने मस्तक झुकाकर उनके चरणों का स्पर्श किया और वहाँ से चला गया।
देवदानवयक्षाणां सर्पगन्धर्वरक्षसाम् ।
अवध्योऽहं भवेयं वै वर एष वृतो मया ॥
‘ भगवन्! मैं देवता, दानव, यक्ष, सर्प, गन्धर्व और राक्षस किसीके हाथसे न मारा जाऊँ । मैंने आपसे यही वर माँगा है '
जब धुन्धु वर पाकर महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न हो गया, तब उसे अपने पिता मधु और कैटभ के वध का स्मरण आया और वह शीघ्रतापूर्वक भगवान् विष्णु के पास गया। धुन्धु अमर्ष में भरा हुआ था। उसने गन्धर्व सहित सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर भगवान् विष्णु तथा अन्य देवताओं को बार-बार महान् कष्ट देना प्रारम्भ किया। वह दुष्टात्मा बालूकामय प्रसिद्ध उच्चालक समुद्र में आकर रहने लगा और उस देश के निवासियों को सताने लगा। वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर धरती के भीतर बालू में छिपकर उत्तङ्क के आश्रम में भी उपद्रव करने लगा। वह आश्रम के पास साँस ले-लेकर आग की चिनगारियाँ फैलाता था।
इसी समय राजा कुवलाश्व ने अपनी सेना, सवारी तथा पुत्रों के साथ प्रस्थान किया। उनके साथ विप्रवर उत्तङ्क भी थे। शत्रु मर्दन महाराज कुवलाश्व अपने इक्कीस हजार बलवान् पुत्रों को साथ लेकर चले थे। उत्तङ्क के अनुरोध से सम्पूर्ण जगत् का हित करने के लिये सर्वसमर्थ भगवान् विष्णु ने अपने तेजोमय स्वरूप से कुवलाश्व में प्रवेश किया।
तमाविशत् ततो विष्णुर्भगवांस्तेजसा प्रभुः ।
उत्तङ्कस्य नियोगेन लोकानां हितकाम्यया ॥
तदनन्तर उत्तंकके अनुरोधसे सम्पूर्ण जगत्का हित करनेके लिये सर्वसमर्थ भगवान् विष्णुने अपने तेजोमय स्वरूपसे कुवलाश्वमें प्रवेश किया ।
जब कुवलाश्व यात्रा कर रहे थे, तब देवलोक में हर्षपूर्ण कोलाहल होने लगा। देवता कहने लगे— 'ये श्रीमान् नरेश अवध्य हैं, आज धुन्धु को मारकर ये धुन्धुमार नाम धारण करेंगे।' शीतल वायु चलने लगी और देवराज इन्द्र ने धरती की धूल शान्त करने के लिये वर्षा की। जहाँ महान् असुर धुन्धु रहता था, वहीं आकाश में देवताओं के विमान दिखाई देने लगे। कुवलाश्व और धुन्धु का युद्ध देखने के लिये देवताओं, गन्धर्वों और महर्षियों ने वहाँ आकर दृष्टिपात किया।
तस्मिन् प्रयाते दुर्धर्षे दिवि शब्दो महानभूत् ।
एष श्रीमानवध्योऽद्य धुन्धुमारो भविष्यति ॥
उन दुर्धर्षवीर कुवलाश्वके यात्रा करनेपर देवलोकमें अत्यन्त हर्षपूर्ण कोलाहल होने लगा । देवता कहने लगे — ' ये श्रीमान् नरेश अवध्य हैं, आज धुन्धुको मारकर ये ' ' धुन्धुमार ' नाम धारण करेंगे ।
राजा कुवलाश्व भगवान् नारायण के तेज से परिपुष्ट होकर अपने पुत्रों के साथ वहाँ पहुँचे और शीघ्र ही चारों ओर से उस बालूकामय समुद्र को खुदवाने लगे। सात दिनों तक खुदाई करने के बाद उनके पुत्रों ने उस महाबली धुन्धु को देखा। वह बालू के भीतर छिपा हुआ सूर्य के समान तेजस्वी था। वह पश्चिम दिशा को घेरकर सो रहा था, जिसकी कान्ति प्रलयकालीन अग्निके समान थी।
तक्षण कुवलाश्व के पुत्रों ने सब ओर से घेरकर उस पर आक्रमण किया। तीखे बाण, गदा, मुसल, पट्टिश, परिघ, प्रास और चमचमाते हुए तेज धार वाले खड्गों से चोट खाकर महाबली धुन्धु क्रोधित हो गया। उसने उन समस्त अस्त्र-शस्त्रों को खा लिया और अपने मुख से प्रलयकालीन अग्निके समान आग की चिनगारियाँ उगलना आरम्भ कर दिया। जैसे पूर्वकाल में भगवान् कपिल ने राजा सगर के पुत्रों को दग्ध किया था, वैसे ही क्रोध में भरे हुए धुन्धु ने कुवलाश्व के समस्त राजकुमारों को जलाकर भस्म कर दिया।
आस्याद् वमन् पावकं स संवर्तकसमं तदा ।
तान् सर्वान् नृपतेः पुत्रानदहत् स्वेन तेजसा ॥
तत्पश्चात् उसने अपने मुँहसे प्रलयकालीन अग्निके समान आगकी चिनगारियाँ उगलना आरम्भ किया और उन समस्त राजकुमारोंको अपने तेजसे जलाकर भस्म कर दिया ।
जब सभी राजकुमार धुन्धुकी क्रोधाग्नि से दग्ध हो गये, तब महातेजस्वी राजा कुवलाश्व ने उस जगे हुए महाकाय दानव पर आक्रमण किया। उस समय धुन्धु के शरीर से बहुत-सा जल प्रवाहित होने लगा, किन्तु राजा कुवलाश्व ने योगी होने के कारण योगबल से उस जलमय तेज को पी लिया और जल प्रकट करके धुन्धुकी मुखाग्नि को बुझा दिया। तत्पश्चात् सम्पूर्ण लोकों के कल्याण के लिये राजर्षि कुवलाश्व ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके उस क्रूर पराक्रमी दैत्य धुन्धु को दग्ध कर दिया।
ब्रह्मास्त्रेण च राजेन्द्र दैत्यं क्रूरपराक्रमम् ॥
ददाह भरतश्रेष्ठ सर्वलोकभवाय वै ।
सोऽस्त्रेण दग्ध्वा राजर्षिः कुवलाश्वो महासुरम् ॥
सुरशत्रुममित्रघ्नं त्रैलोक्येश इवापरः । राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् सम्पूर्ण लोकोंके कल्याणके लिये राजर्षि कुवलाश्वने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके उस क्रूर पराक्रमी दैत्य धुन्धुको दग्ध कर दिया । इस प्रकार ब्रह्मास्त्रद्वारा शत्रुनाशक, देववैरी महान् असुर धुन्धुको दग्ध करके राजा कुवलाश्व दूसरे इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे ।
इस प्रकार ब्रह्मास्त्र द्वारा शत्रुनाशक असुर धुन्धु को मारकर राजा कुवलाश्व 'धुन्धुमार' नाम से विख्यात हो गये। तदनन्तर महर्षियों सहित सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होकर वहाँ आये और राजा से वर माँगने का अनुरोध करने लगे। कुवलाश्व ने हाथ जोड़कर कहा— 'देवताओं! मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणों को धन दान करूँ, शत्रुओं के लिये दुर्जय रहूँ, भगवान् विष्णु के साथ सख्य भाव से मेरा प्रेम हो और किसी भी प्राणी के प्रति मेरे मन में द्रोह न रह जाय। धर्म में मेरा सदा अनुराग हो और अन्त में मेरा स्वर्गलोक में नित्य निवास हो।' देवताओं ने कहा— 'महाराज! ऐसा ही होगा।'
दद्यां वित्तं द्विजाग्रयेभ्यः शत्रूणां चापि दुर्जयः ।
सख्यं च विष्णुना मे स्याद् भूतेष्वद्रोह एव च ॥
' देवताओं! मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धन दान करूँ, शत्रुओंके लिये दुर्जय बना रहूँ, भगवान् विष्णुके साथ सख्य भावसे मेरा प्रेम हो और किसी भी प्राणीके प्रति मेरे मनमें द्रोह न रह जाय ।
ऋषियों, गन्धर्वों और महर्षि उत्तङ्क ने भी राजा को नाना प्रकार के आशीर्वाद दिए। इसके बाद देवता अपने स्थान को चले गये। उस युद्ध में कुवलाश्व के तीन ही पुत्र शेष रह गये थे— दृढाश्व, कपिलाश्व और चन्द्राश्व। उन्हींसे इक्ष्वाकुवंशी महामना नरेशों की वंश-परम्परा चालू हुई। इस प्रकार मधु-कैटभ कुमार महादैत्य धुन्धु कुवलाश्व के हाथ से मारा गया और राजा कुवलाश्व 'धुन्धुमार' नाम से विख्यात हुए।
धुन्धुर्नाम महादैत्यो मधुकैटभयोः सुतः ।
कुवलाश्वश्च नृपतिर्धुन्धुमार इति स्मृतः ॥
सज्जनशिरोमणे! इस प्रकार मधुकैटभ कुमार महादैत्य धुन्धु कुवलाश्वके हाथसे मारा गया और राजा कुवलाश्वकी धुन्धुमार नामसे प्रसिद्धि हुई ।
In English
The Story of Kuvalashva and the Demon Dhundhu
The sage Utanka prays to Lord Vishnu and receives a vision regarding a dangerous demon named Dhundhu. To protect the world, Utanka asks King Brihadashva to send his son Kuvalashva to kill the demon. Kuvalashva eventually kills Dhundhu using divine power, earning the name Dhundhumara.
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