श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1401–1410

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1401–1410

पृष्ठ 1401

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द्वयधिकद्विशततमोऽध्यायः उत्तङ्कका राजा बृहदश्वसे धुन्धुका वध करनेके लिये आग्रह मार्कण्डेय उवाच

इक्ष्वाकौ संस्थिते राजन् शशादः पृथिवीमिमाम् ।

प्राप्तः परमधर्मात्मा सोऽयोध्यायां नृपोऽभवत् ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! महाराज इक्ष्वाकुके देहावसानके पश्चात् उनके परम

धर्मात्मा पुत्र शशाद इस पृथ्वीपर राज्य करने लगे। वे अयोध्यामें रहते थे ॥ १ ॥

शशादस्य तु दायादः ककुत्स्थो नाम वीर्यवान् ।

अनेनाश्चापि काकुत्स्थः पृथुश्चानेनसः सुतः ॥ २ ॥

शशादके पुत्र पराक्रमी ककुत्स्थ हुए । ककुत्स्थके पुत्र अनेना और अनेनाके पृथु हुए ॥ २ ॥

विष्वगश्वः पृथोः पुत्रस्तस्मादद्रिश्च जज्ञिवान् ।

अद्रेश्च युवनाश्वस्तु श्रावस्तस्यात्मजोऽभवत् ॥ ३ ॥

पृथुके विष्वगश्व और उनके पुत्र अद्रि हुए। अद्रिके पुत्रका नाम युवनाश्व था ।

युवनाश्वका पुत्र श्राव नामसे विख्यात हुआ ॥ ३ ॥

तस्य श्रावस्तको ज्ञेयः श्रावस्ती येन निर्मिता ।

श्रावस्तकस्य दायादो बृहदश्वो महाबलः ॥ ४ ॥

श्रावका पुत्र श्रावस्त हुआ, जिसने श्रावस्तीपुरी बसायी थी । श्रावस्तके ही पुत्र महाबली बृहदश्व थे ॥ ४ ॥

बृहदश्वस्य दायादः कुवलाश्व इति स्मृतः ।

कुवलाश्वस्य पुत्राणां सहस्राण्येकविंशतिः ॥ ५ ॥

बृहदश्वके ही पुत्रका नाम कुवलाश्व था । कुवलाश्वके इक्कीस हजार पुत्र हुए ॥ ५ ॥

सर्वे विद्यासु निष्णाता बलवन्तो दुरासदाः ।

कुवलाश्वश्च पितृतो गुणैरभ्यधिकोऽभवत् ॥ ६ ॥

वे सब - के - सब सम्पूर्ण विद्याओंमें पारंगत, बलवान् और दुर्धर्ष वीर थे । कुवलाश्व उत्तम गुणोंमें अपने पितासे बढ़कर निकले ॥ ६ ॥

समये तं पिता राज्ये बृहदश्वोऽभ्यषेचयत् ।

कुवलाश्वं महाराज शूरमुत्तमधार्मिकम् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1402

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महाराज! राजा बृहदश्वने यथासमय अपने उत्तम धर्मात्मा शूरवीर पुत्र कुवलाश्वको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ७ ॥

पुत्रसंक्रामितश्रीस्तु बृहदश्वो महीपतिः ।

जगाम तपसे धीमांस्तपोवनममित्रहा ॥ ८ ॥

शत्रुओंका संहार करनेवाले बुद्धिमान् राजा बृहदश्व राजलक्ष्मीका भार पुत्रपर छोड़कर स्वयं तपस्याके लिये तपोवनमें चले गये ॥ ८ ॥

अथ शुश्राव राजर्षि तमुत्तङ्को नराधिप ।

वनं सम्प्रस्थितं राजन् बृहदश्वं द्विजोत्तमः ॥ ९ ॥

राजन्! तदनन्तर द्विजश्रेष्ठ उत्तङ्कने यह सुना कि राजर्षि बृहदश्व वनको चले जा रहे हैं ॥ ९ ॥

तमुत्तङ्को महातेजाः सर्वास्त्रविदुषां वरम् ।

न्यवारयदमेयात्मा समासाद्य नरोत्तमम् ॥ १० ॥

वे नरश्रेष्ठ नरेश सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंके विद्वानोंमें सर्वोत्तम थे । विशाल हृदयवाले महातेजस्वी उत्तङ्कने उनके पास जाकर उन्हें वनमें जानेसे रोका और इस प्रकार कहा ॥ १० ॥

उत्तङ्क उवाच

भवता रक्षणं कार्यं तत् तावत् कर्तुमर्हसि ।

निरुद्विग्ना वयं राजंस्त्वत्प्रसादाद् भवेमहि ॥ ११ ॥

उत्तङ्क बोले – महाराज! प्रजाकी रक्षा करना आपका कर्तव्य है । अतः पहले वही आपको करना चाहिये जिससे आपके कृपाप्रसादसे हमलोग निर्भय हो जायँ ॥ ११ ॥

पृष्ठ 1403

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त्वया हि पृथिवी राजन् रक्ष्यमाणा महात्मना ।

भविष्यति निरुद्विग्ना नारण्यं गन्तुमर्हसि ॥ १२ ॥

राजन्! आप -जैसे महात्मा राजासे सुरक्षित होकर ही यह पृथ्वी सर्वथा भयशून्य हो जायगी । अतः आप वनमें न जाइये ॥ १२ ॥

पालने हि महान् धर्मः प्रजानामिह दृश्यते ।

न तथा दृश्यतेऽरण्ये माभूत् ते बुद्धिरीदृशी ॥ १३ ॥

क्योंकि आपके लिये यहाँ रहकर प्रजाओंका पालन करनेमें जो महान् धर्म देखा जाता है, वैसा वनमें रहकर तपस्या करनेमें नहीं दिखायी देता । अतः आपकी ऐसी समझ नहीं होनी चाहिये ॥ १३ ॥

ईदृशो न हि राजेन्द्र धर्मः क्वचन दृश्यते ।

प्रजानां पालने यो वै पुरा राजर्षिभिः कृतः ॥ १४ ॥

राजेन्द्र! पूर्वकालके राजर्षियोंने जिस धर्मका पालन किया है, वह प्रजाजनोंके पालनमें ही सुलभ है । ऐसा धर्म और किसी कार्यमें नहीं दिखायी देता ॥ १४ ॥

रक्षितव्याः प्रजा राज्ञा तास्त्वं रक्षितुमर्हसि ।

निरुद्विग्नस्तपश्चर्तुं न हि शक्नोमि पार्थिव ॥ १५ ॥

राजाके लिये प्रजाजनोंका पालन करना ही धर्म है । अतः आपको प्रजावर्गकी रक्षा ही करनी चाहिये । भूपाल! मैं शान्तिपूर्वक तपस्या नहीं कर पा रहा हूँ ॥

पृष्ठ 1404

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ममाश्रमसमीपे वै समेषु मरुधन्वसु ।

समुद्रो बालुकापूर्ण उज्जालक इति स्मृतः ॥ १६ ॥

मेरे आश्रमके समीप समस्त मरुप्रदेशमें एक बालूसे पूर्ण अर्थात् बालुकामय समुद्र है, उसका नाम है उज्जालक ॥ १६ ॥

बहुयोजनविस्तीर्णो बहुयोजनमायतः ।

तत्र रौद्रो दानवेन्द्रो महावीर्यपराक्रमः ॥ १७ ॥

मधुकैटभयोः पुत्रो धुन्धुर्नाम सुदारुणः ।

अन्तर्भूमिगतो राजन् वसत्यमितविक्रमः ॥ १८ ॥

उसकी लंबाई- चौड़ाई कई योजनकी है । वहाँ महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न एक भयंकर दानवराज रहता है, जो मधु और कैटभका पुत्र है । वह क्रूर स्वभाववाला राक्षस धुन्धु नामसे प्रसिद्ध है । राजन्! वह अमित पराक्रमी दानव धरतीके भीतर छिपकर रहा करता है ॥ १७-१८ ॥

तं निहत्य महाराज वनं त्वं गन्तुमर्हसि ।

शेते लोकविनाशाय तप आस्थाय दारुणम् ॥ १ ९ ॥

त्रिदशानां विनाशाय लोकानां चापि पार्थिव । महाराज! उसका नाश करके ही आपको वनमें जाना चाहिये । भूपाल! वह सम्पूर्ण लोकों और देवताओंके विनाशके लिये कठोर तपस्याका आश्रय लेकर ( पृथ्वीमें) शयन करता है ॥ १ ९ ॥ अवध्यो दैवतानां हि दैत्यानामथ रक्षसाम् ॥ २० ॥

नागानामथ यक्षाणां गन्धर्वाणां च सर्वशः ।

अवाप्य स वरं राजन् सर्वलोकपितामहात् ॥ २१ ॥

राजन्! वह सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीसे वर पाकर देवताओं, दैत्यों, राक्षसों, नागों, यक्षों और समस्त गन्धर्वोंके लिये अवध्य हो गया है ॥ २०-२१ ॥

तं विनाशय भद्रं ते मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा ।

प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं शाश्वतीमव्ययां ध्रुवाम् ॥ २२ ॥

महाराज! आपका कल्याण हो । आप उस दैत्यका विनाश कीजिये । इसके विपरीत आपको कोई विचार नहीं करना चाहिये । उसका वध करके आप सदा बनी रहनेवाली अक्षय एवं महान् कीर्ति प्राप्त करेंगे ॥ २२ ॥

क्रूरस्य तस्य स्वपतो बालुकान्तर्हितस्य च ।

संवत्सरस्य पर्यन्ते निःश्वासः सम्प्रवर्तते ॥ २३ ॥

बालूके भीतर छिपकर रहनेवाला वह क्रूर राक्षस एक वर्षमें एक ही बार साँस लेता है ॥ २३ ॥

यदा तदा भूश्चलति सशैलवनकानना ।

पृष्ठ 1405

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तस्य निःश्वासवातेन रज उद्धूयते महत् ॥ २४ ॥

आदित्यपथमाश्रित्य सप्ताहं भूमिकम्पनम् ।

सविस्फुलिङ्गं सज्वालं धूममिश्रं सुदारुणम् ॥ २५ ॥

जिस समय वह साँस लेता है, उस समय पर्वत, वन और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी डोलने लगती है । उसके साँसकी आँधीसे धूलका इतना ऊँचा बवंडर उठता है कि वह सूर्यके मार्गको भी ढक लेता है और सात दिनोंतक वहाँ भूकम्प होता रहता है । आगकी चिनगारियाँ, ज्वालाएँ और धूआँ उठकर अत्यन्त भयंकर दृश्य उपस्थित करते हैं ॥ २४-२५ ॥

तेन राजन् न शक्नोमि तस्मिन् स्थातुं स्व आश्रमे ।

तं विनाशय राजेन्द्र लोकानां हितकाम्यया ॥ २६ ॥

राजन्! इस कारण मेरा अपने आश्रममें रहना कठिन हो गया है । महाराज! सब लोगोंके हितके लिये आप उस राक्षसको नष्ट कीजिये ॥ २६ ॥

लोकाः स्वस्था भविष्यन्ति तस्मिन् विनिहतेऽसुरे ।

त्वं हि तस्य विनाशाय पर्याप्त इति मे मतिः ॥ २७ ॥

उस असुरके मारे जानेपर सब लोग स्वस्थ एवं सुखी हो जायँगे । मेरा विश्वास है कि आप अकेले ही उसका नाश करनेके लिये पर्याप्त हैं ॥ २७ ॥

तेजसा तव तेजश्च विष्णुराप्याययिष्यति ।

विष्णुना च वरो दत्तः पूर्वं मम महीपते ॥ २८ ॥

यस्तं महासुरं रौद्रं वधिष्यति महीपतिः ।

तेजस्तं वैष्णवमिति प्रवेक्ष्यति दुरासदम् ॥ २ ९ ॥

भूपाल! भगवान् विष्णु अपने तेजसे आपके तेजको बढ़ायेंगे। उन्होंने पूर्वकालमें मुझे यह वर दिया था कि जो राजा उस भयानक एवं महान् असुरका वध करनेको उद्यत होगा, उस दुर्धर्ष वीरके भीतर मेरा वैष्णव तेज प्रवेश करेगा ॥ २८-२९ ॥

तत् तेजस्त्वं समाधाय राजेन्द्र भुवि दुःसहम् ।

तं निषूदय राजेन्द्र दैत्यं रौद्रपराक्रमम् ॥ ३० ॥

महाराज! अतः आप भगवान्‌का दुःसह तेज धारण करके पृथ्वीपर रहनेवाले उस भयानक पराक्रमी दैत्यको नष्ट कीजिये ॥ ३० ॥

न हि धुन्धुर्महातेजास्तेजसाल्पेन शक्यते ।

निर्दग्धुं पृथिवीपाल स हि वर्षशतैरपि ॥ ३१ ।

राजन्! धुन्धु महातेजस्वी असुर है । साधारण तेजसे सौ वर्षोंमें भी कोई उसे नष्ट नहीं कर सकता ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1406

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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने द्वयधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौदोवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २०२ ॥

पृष्ठ 1407

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त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ब्रह्माजीकी उत्पत्ति और भगवान् विष्णुके द्वारा मधु- कैटभका वध मार्कण्डेय उवाच

स एवमुक्तो राजर्षिरुत्तङ्केनापराजितः ।

उत्तङ्कं कौरवश्रेष्ठ कृताञ्जलिरथाब्रवीत् ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं – कौरवश्रेष्ठ! उत्तङ्कके इस प्रकार आग्रह करनेपर अपराजित वीर राजर्षि बृहदश्वने उनसे हाथ जोड़कर कहा— ॥ १ ॥

न तेऽभिगमनं ब्रह्मन् मोघमेतद् भविष्यति ।

पुत्रो ममायं भगवन् कुवलाश्व इति स्मृतः ॥ २ ॥

धृतिमान् क्षिप्रकारी च वीर्येणाप्रतिमो भुवि । ‘ब्रह्मन्! आपका यह आगमन निष्फल नहीं होगा । भगवन्! मेरा यह पुत्र कुवलाश्व

भूमण्डलमें अनुपम वीर है । यह धैर्यवान् और फुर्तीला है ॥ २३ ॥

प्रियं च ते सर्वमेतत् करिष्यति न संशयः ॥ ३ ॥

पुत्रैः परिवृतः सर्वैः शूरैः परिघबाहुभिः ।

विसर्जयस्व मां ब्रह्मन् न्यस्तशस्त्रोऽस्मि साम्प्रतम् ॥ ४ ॥

परिघ - जैसी मोटी भुजाओंवाले अपने समस्त शूरवीर पुत्रोंके साथ जाकर यह आपका सारा अभीष्ट कार्य सिद्ध करेगा, इसमें संशय नहीं है । ब्रह्मन्! आप मुझे छोड़ दीजिये । मैंने अब अस्त्र- शस्त्रोंको त्याग दिया है ' ॥

तथास्त्विति च तेनोक्तो मुनिनामिततेजसा ।

स तमादिश्य तनयमुत्तङ्काय महात्मने ॥ ५ ॥

क्रियतामिति राजर्षिर्जगाम वनमुत्तमम् । तब अमित तेजस्वी उत्तङ्क मुनिने ' तथास्तु ' कहकर राजाको वनमें जानेकी आज्ञा दे दी । तत्पश्चात् राजर्षि बृहदश्वने महात्मा उत्तङ्कको अपना वह पुत्र सौंप दिया और धुन्धुका वध करनेकी आज्ञा दे उत्तम तपोवनकी ओर प्रस्थान किया ॥ ५३ ॥

युधिष्ठिरउवाच क एष भगवन् दैत्यो महावीर्यस्तपोधन ॥ ६ ॥

कस्य पुत्रोऽथ नप्ता वा एतदिच्छामि वेदितुम् । युधिष्ठिरने पूछा — तपोधन! भगवन्! यह पराक्रमी दैत्य कौन था? किसका पुत्र और नाती था? मैं यह सब जानना चाहता हूँ ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 1408

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एवं महाबलो दैत्यो न श्रुतो मे तपोधन ॥ ७ ॥

एतदिच्छामि भगवन् याथातथ्येन वेदितुम् ।

सर्वमेव महाप्राज्ञ विस्तरेण तपोधन ॥ ८ ॥

तपस्याके धनी मुनीश्वर! ऐसा महाबली दैत्य तो मैंने कभी नहीं सुना था, अतः भगवन्! मैं इसके विषयमें यथार्थ बातें जानना चाहता हूँ। महामते! आप यह सारी कथा विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ७-८ ॥ मार्कण्डेय उवाच

शृणु राजन्निदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप ।

कथ्यमानं महाप्राज्ञ विस्तरेण यथातथम् ॥ ९ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं -राजन्! तुम बड़े बुद्धिमान् हो । यह सारा वृतान्त मैं यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो ॥ ९ ॥

एकार्णवे तदा लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे ।

प्रणष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ॥ १० ॥

भरतश्रेष्ठ! बात उस समयकी है जब सम्पूर्ण चराचर जगत् एकार्णवके जलमें डूबकर नष्ट हो चुका था । समस्त प्राणी कालके गाल में चले गये थे ॥ १० ॥

प्रभवं लोककर्तारं विष्णुं शाश्वतमव्ययम् ।

यमाहुर्मुनयः सिद्धाः सर्वलोकमहेश्वरम् ॥ ११ ॥

सुष्वाप भगवान् विष्णुरप्सु योगत एव सः ।

नागस्य भोगे महति शेषस्यामिततेजसः ॥ १२ ॥

उस समय वे भगवान् विष्णु एकार्णवके जलमें अमित तेजस्वी शेषनागके विशाल शरीरकी शय्यापर योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते थे । उन्हीं भगवान्‌को सिद्ध, मुनिगण सबकी उत्पत्तिका कारण, लोकस्रष्टा, सर्वव्यापी, सनातन, अविनाशी तथा सर्वलोकमहेश्वर कहते हैं ॥ ११-१२ ॥

लोककर्ता महाभाग भगवानच्युतो हरिः ।

नागभोगेन महता परिरभ्य महीमिमाम् ॥ १३ ॥

स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम् ।

नाभ्यां विनिःसृतं दिव्यं तत्रोत्पन्नः पितामहः ॥ १४ ॥

साक्षाल्लोकगुरुर्ब्रह्मा पद्मे सूर्यसमप्रभः ।

पृष्ठ 1409

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महाभाग! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले लोककर्ता भगवान् श्रीहरि नागके विशाल फणके द्वारा धारण की हुई इस पृथ्वीका सहारा लेकर ( शेषनागपर ) सो रहे थे, उस समय उन दिव्यस्वरूप नारायणकी नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जो सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था । उसीमें सम्पूर्ण लोकोंके गुरु साक्षात् पितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए, जो सूर्यके समान तेजस्वी थे ॥ १३-१४३ ॥ चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिस्तथैव च चतुर्मुखः ॥ १५ ॥

स्वप्रभावाद् दुराधर्षो महाबलपराक्रमः । वे चारों वेदोंके विद्वान् हैं । जरायुज आदि चतुर्विध जीव उन्हींके स्वरूप हैं । उनके चार

मुख हैं । उनके बल और पराक्रम महान् हैं । वे अपने प्रभावसे दुर्धर्ष हैं ॥ १५३ ॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य दानवौ वीर्यवत्तमौ ॥। १६ ॥

मधुश्च कैटभश्चैव दृष्टवन्तौ हरिं प्रभुम् । ब्रह्माजीके प्रकट होनेके कुछ काल बाद मधु और कैटभ नामक दो पराक्रमी दानवोंने सर्वसामर्थ्यवान् भगवान् श्रीहरिको देखा ॥ १६३ ॥

शयानं शयने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् ॥ १७ ॥

बहुयोजनविस्तीर्णे बहुयोजनमायते ।

किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेयवाससम् ॥ १८ ॥

वे शेषनागके शरीरकी दिव्य शय्यापर शयन किये हुए थे । उनका तेज महान् है । वे जिस शय्यापर शयन करते हैं, उसकी लंबाई- चौड़ाई कई योजनोंकी है । भगवान्के मस्तकपर किरीट और कण्ठमें कौस्तुभमणिकी शोभा हो रही थी । उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था ॥ १७-१८ ॥

दीप्यमानं श्रिया राजंस्तेजसा वपुषा तथा ।

सहस्रसूर्यप्रतिममद्भुतोपमदर्शनम् ॥ १ ९ ॥

राजन्! वे अपनी कान्ति और तेजसे उद्दीप्त हो रहे थे । शरीरसे वे सहस्रों सूर्योंके समान

प्रकाशित होते थे । उनकी झाँकी अद्भुत और अनुपम थी ॥ १ ९ ॥

विस्मयः सुमहानासीन्मधुकैटभयोस्तथा ।

दृष्ट्वा पितामहं चापि पद्मे पद्मनिभेक्षणम् ॥ २० ॥

वित्रासयेतामथ तौ ब्रह्माणममितौजसम् ।

वित्रस्यमानो बहुशो ब्रह्मा ताभ्यां महायशाः ॥ २१ ॥

अकम्पयत् पद्मनालं ततोऽबुध्यत केशवः ।

अथापश्यत गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ ॥ २२ ॥

भगवान्‌को देखकर मधु और कैटभ दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ । तत्पश्चात् उनकी दृष्टि कमलमें बैठे हुए कमलनयन पितामह ब्रह्माजीपर पड़ी । उन्हें देखकर वे दोनों दैत्य उन अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको डराने लगे । उन दोनोंके द्वारा बार- बार डराये जानेपर

पृष्ठ 1410

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महायशस्वी ब्रह्माजीने उस कमलकी नालको हिलाया । इससे भगवान् गोविन्द जाग उठे ।

जागनेपर उन्होंने उन दोनों महापराक्रमी दानवोंको देखा ॥ २०-२२ ॥

दृष्ट्वा तावब्रवीद् देवः स्वागतं वां महाबलौ ।

ददामि वां वरं श्रेष्ठं प्रीतिर्हि मम जायते ॥ २३ ॥

उन महाबली दानवोंको देखकर भगवान् विष्णुने कहा- ' तुम दोनों बड़े बलवान् हो । तुम्हारा स्वागत है । मैं तुम दोनोंको उत्तम वर दे रहा हूँ; क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे प्रसन्नता होती है ' ॥ २३ ॥

तौ प्रहस्य हृषीकेशं महादर्पो महाबलौ ।

प्रत्यब्रूतां महाराज सहितौ मधुसूदनम् ॥ २४ ॥

महाराज! वे दोनों महाबली दानव बड़े अभिमानी थे । उन्होंने हँसकर इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् मधुसूदनसे एक साथ कहा- ॥ २४ ॥