श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1391–1400

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1391–1400

पृष्ठ 1391

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जाते हैं ॥ ११३ ॥

शुष्कं तर्क परित्यज्य आश्रयस्व श्रुतिं स्मृतिम् ।

एकाक्षराभिसम्बद्धं तत्त्वं हेतुभिरिच्छसि ।

बुद्धिर्न तस्य सिद्धयेत साधनस्य विपर्ययात् ॥ ११४ ॥

प्रणवसे सम्बन्ध रखनेवाले परमात्मतत्त्वको यदि तुम युक्तिपूर्वक अर्थात् निःसंदेहभावसे समझना चाहते हो तो कोरा तर्कवाद छोड़कर श्रुति तथा स्मृतिके वचनोंका आश्रय लो । क्योंकि जो उपर्युक्त साधनका आश्रय नहीं लेता उसकी बुद्धि तत्त्वका निश्चय करनेमें समर्थ नहीं हो सकती ॥ ११४ ॥

वेदपूर्वं वेदितव्यं प्रयत्नात् तत् वै वेदस्तस्य वेदः शरीरम् । वेदस्तत्त्वं तत्समासोपलब्धौ क्लीबस्त्वात्मा तत् स वेद्यस्य वेद्यम् ॥ ११५ ॥

इसलिये जाननेयोग्य परमात्मतत्त्वका ज्ञान वेदोंके द्वारा ही यत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि वह परमात्मतत्त्व वेदस्वरूप है । वेद उसका शरीर है । उस परमात्मतत्त्वको सहजभावसे प्राप्त करानेमें वेद हेतु है । यह जीवात्मा स्वयं समर्थ नहीं है; क्योंकि वह तत्त्व वेद्यका भी वेद्य है, अर्थात् जाननेमें बड़ा ही गहन है ॥

वेदोक्तमायुर्देवानामाशिषश्चैव कर्मणाम् ।

फलत्यनुयुगं लोके प्रभावश्च शरीरिणाम् ॥ ११६ ॥

देवताओंकी आयु और कर्मोंका शुभाशुभ फल आदि बातें वेदमें कही गयी हैं । उसके अनुसार ही देहधारियोंका प्रभाव संसारमें प्रत्येक युगमें फलित होता है ॥ ११६ ॥

इन्द्रियाणां प्रसादेन तदेतत् परिवर्जयेत् ।

तस्मादनशनं दिव्यं निरुद्धेन्द्रियगोचरम् ॥ ११७ ॥

अतः मनुष्यको इन्द्रियोंकी शुद्धिके द्वारा इन विषयभोगोंको त्याग देना चाहिये । यह इन्द्रियोंकी निर्मलता और निरोधसे होनेवाला अनशन ( विषयोंका अग्रहण ) दिव्य होता है ॥ ११७ ॥

तपसा स्वर्गगमनं भोगो दानेन जायते ।

ज्ञानेन मोक्षो विज्ञेयस्तीर्थस्नानादघक्षयः ॥ ११८ ॥

तपसे स्वर्गलोकमें जानेका सौभाग्य प्राप्त होता है । दानसे भोगोंकी प्राप्ति होती है । ज्ञानसे मोक्ष मिलता है, यह जानना चाहिये तथा तीर्थस्नानसे पापोंका क्षय हो जाता है ॥ ११८ ॥

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु राजेन्द्र प्रत्युवाच महायशाः ।

पृष्ठ 1392

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भगवन् श्रोतुमिच्छामि प्रधानविधिमुत्तमम् ॥ ११ ९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! मार्कण्डेयजीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी युधिष्ठिर बोले — ‘ भगवन्! अब मैं ( दानकी ) उत्तम एवं प्रधान विधि सुनना चाहता ॥ ११ ९ ॥ मार्कण्डेय उवाच

यत् त्वमिच्छसि राजेन्द्र दानधर्मं युधिष्ठिर ।

इष्टं चेदं सदा मह्यं राजन् गौरवतस्तथा ॥ १२० ॥

मार्कण्डेयजीने कहा – महाराज युधिष्ठिर! तुम मुझसे जिस दान - धर्मको सुनना चाहते हो वह गौरवयुक्त होनेके कारण मुझे सदा ही प्रिय है ॥ १२० ॥

शृणु दानरहस्यानि श्रुतिस्मृत्युदितानि च ।

छायायां करिणः श्राद्धं तत् कर्णपरिवीजिते ।

दश कल्पायुतानीह न क्षीयेत युधिष्ठिर ॥ १२१ ॥

श्रुतियों और स्मृतियोंमें जो दानके रहस्य बताये गये हैं, उनका वर्णन सुनो — युधिष्ठिर! गुरुवारको अमावस्याके योगमें पीपलके वृक्षकी छायाको गजच्छाया- पर्व कहते हैं । गजच्छायामें जहाँ पीपलके पत्तोंकी हवा लगती हो, उस प्रदेशमें जलके समीप जो श्राद्ध किया जाता है, वह एक लाख कल्पों तक नष्ट नहीं होता ॥ १२१ ॥

जीवनाय समाक्लिन्नं वसु दत्त्वा महीयते ।

वैश्यं तु वासयेद् यस्तु सर्वयज्ञैः स इष्टवान् ॥ १२२ ॥

जो जीविकाके लिये राँधा हुआ अन्नका दान करता है, वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है । जो आश्रयकी खोज करनेवाले राहगीर- अतिथिको ठहरनेके लिये जगह दे वह सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान पूर्ण कर लेता है ॥

प्रतिस्रोतश्चित्रवाहाः पर्जन्योऽन्नानुसंचरन् ।

महाधुरि यथा नावा महापापैः प्रमुच्यते ॥ १२३ ॥

विप्लवे विप्रदत्तानि दधिमस्त्वक्षयाणि च । पूर्वकी ओर बहनेवाली नदीका प्रवाह जहाँ पश्चिमकी ओर मुड़ गया हो, वह प्रतिस्रोत तीर्थ कहलाता है, उसमें किया हुआ उत्तम अश्वोंका दान अक्षय पुण्यको देनेवाला होता है । अन्नके लिये विचरनेवाले अतिथिरूपी इन्द्रको यदि भोजनसे संतुष्ट किया जाय तो वह भी अक्षयपुण्यका जनक होता है । नदियोंके महान् प्रवाहमें ग्रहणके समय ब्राह्मणोंको दिये हुए दधिमण्ड तथा पूर्वोक्त पदार्थ भी अक्षय पुण्यकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं । इसी प्रकार नदियोंके महान् प्रवाहमें स्नान करनेवाला पुरुष बड़े - बड़े पापोंसे मुक्ता हो जाता है ॥ १२३ ¾ ॥ पर्वसु द्विगुणं दानमृतौ दशगुणं भवेत् ॥ १२४ ॥

पृष्ठ 1393

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अयने विषुवे चैव षडशीतिमुखेषु च ।

चन्द्रसूर्योपरागे च दत्तमक्षयमुच्यते ॥ १२५ ॥

पर्वके अवसरपर दिया हुआ दान दुगुना तथा ऋतु आरम्भ होनेके समय दिया हुआ दान दस गुना पुण्यदायक होता है । उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ होनेके दिन, विषुव- योग ( तुला और मेषकी संक्रान्ति ) -में, मिथुन, कन्या, धनु और मीनकी संक्रान्तियोंमें तथा चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर दिया हुआ दान अक्षय बताया गया है ॥ १२४-१२५ ॥ ऋतुषु दशगुणं वदन्ति दत्तं

शतगुणमृत्वयनादिषु ध्रुवम् ।

भवति सहस्रगुणं दिनस्य राहो- र्विषुवति चाक्षयमश्नुते फलम् ॥ १२६ ॥

विद्वान् पुरुष ऋतु प्रारम्भ होनेके दिन दिये हुए दानको दस गुना तथा अयन आदिके दिन सौ गुना बताते हैं । इसी प्रकार ग्रहणके दिन दिये हुए दानका फल सहस्रगुना होता है और विषुवयोगमें दान करनेसे मनुष्य उसके अक्षय पुण्य फलका उपभोग करता है ॥ १२६ ॥

नाभूमिदो भूमिमश्नाति राजन् नायानदो यानमारुह्य याति । यान् यान् कामान् ब्राह्मणेभ्यो ददाति तांस्तान् कामान् जायमानः स भुङ्क्ते ॥ १२७ ॥

राजन्! जिसने भूमिदान नहीं किया है, वह परलोकमें पृथ्वीका उपभोग नहीं कर सकता । जिसने सवारीका दान नहीं किया है, वह सवारीपर चढ़कर नहीं जा सकता । इस जन्ममें मनुष्य जिन -जिन पदार्थोंका ब्राह्मणोंको दान करता है, भावी जन्ममें वह उन- उन पदार्थोंको उपभोगके लिये पाता है ॥ १२७ ॥

अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णं भूर्वेष्णवी सूर्यसुताश्च गावः । लोकास्त्रयस्तेन भवन्ति दत्ता यः काञ्चनं गाश्च महीं च दद्यात् ॥ १२८ ॥

सुवर्ण अग्निकी प्रथम संतान है । भूमि भगवान् विष्णुकी पत्नी है तथा गौएँ भगवान् सूर्यकी कन्याएँ हैं, अतः जो कोई सुवर्ण, गौ और पृथ्वीका दान करता है, उसके द्वारा तीनों लोकोंका दान सम्पन्न हो जाता है ॥ परं हि दानान्न बभूव शाश्वतं भव्यं त्रिलोके भवते कुतः पुनः । तस्मात् प्रधानं परमं हि दानं

पृष्ठ 1394

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वदन्ति लोकेषु विशिष्टबुद्धयः ॥ १२ ९ ॥ त्रिलोकीमें दानसे बढ़कर शाश्वत पुण्यदायक कर्म दूसरा पहले कभी नहीं हुआ, अब कैसे हो सकता है? इसीलिये उत्तम बुद्धिवाले पुरुष संसारमें दानको ही सर्वोत्कृष्ट पुण्यकर्म बताते हैं ॥ १२ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि दानमाहात्म्ये द्विशततमोऽध्यायः ॥ २०० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें दानमाहात्म्यविषयक दो सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०० ॥

* यहाँ जो पिता आदि गुरुजन, सेवक और स्त्रियोंको दिया दान व्यर्थ कहा है, इसका अभिप्राय यह है कि माता- पिता आदि गुरुजनोंकी सेवा करना तथा स्त्री और नौकरोंका पालन - पोषण करना तो मनुष्यका कर्तव्य ही है । अतः उनको देना तो अपने कर्तव्यका ही पालन है, इसलिये वह उनको देना दानकी श्रेणीमें नहीं है ।

पृष्ठ 1395

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एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः उत्तङ्ककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्‌का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा तु राजा राजर्षेरिन्द्रद्युम्नस्य तत् तथा ।

मार्कण्डेयान्महाभागात् स्वर्गस्य प्रतिपादनम् ॥ १ ॥

युधिष्ठिरो महाराज पप्रच्छ भरतर्षभ ।

मार्कण्डेयं तपोवृद्धं दीर्घायुषमकल्मषम् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! महाभाग मार्कण्डेय मुनिके मुखसे राजर्षि इन्द्रद्युम्नको पुनः स्वर्गप्राप्ति होनेका वृत्तान्त ( तथा दानमाहात्म्य ) सुनकर राजा युधिष्ठिरने पापरहित, दीर्घायु तथा तपोवृद्ध महात्मा मार्कण्डेयसे इस प्रकार पूछा - ॥ १-२ ॥

विदितास्तव धर्मज्ञ देवदानवराक्षसाः ।

राजवंशाश्च विविधा ऋषिवंशाश्च शाश्वताः ॥ ३ ॥

' धर्मज्ञ मुने! आप देवता, दानव तथा राक्षसोंको भी अच्छी तरह जानते हैं । आपको नाना प्रकारके राजवंशों तथा ऋषियोंकी सनातन वंशपरम्पराका भी ज्ञान है ॥ ३ ॥

न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदस्मिँल्लोके द्विजोत्तम ।

कथां वेत्सि मुने दिव्यां मनुष्योरगरक्षसाम् ॥ ४ ॥

देवगन्धर्वयक्षाणां किन्नराप्सरसां तथा । ‘ द्विजश्रेष्ठ! इस लोकमें कोई ऐसी वस्तु नहीं जो आपसे अज्ञात हो । मुने! आप मनुष्य, नाग, राक्षस, देवता, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा अप्सराओंकी भी दिव्य कथाएँ जानते हैं ॥ ४ इदमिच्छाम्यहं श्रीतुं तत्त्वेन द्विजसत्तम ॥ ५ ॥

कुवलाश्व इति ख्यात इक्ष्वाकुरपराजितः ।

कथं नामविपर्यासाद् धुन्धुमारत्वमागतः ॥ ६ ॥

‘ विप्रवर! अब मैं यथार्थरूपसे यह सुनना चाहता हूँ कि इक्ष्वाकुवंशमें जो कुवलाश्व नामसे विख्यात विजयी राजा हो गये हैं, वे क्यों नाम बदलकर ' धुन्धुमार' कहलाने लगे? ॥ ५-६ ॥ एतदिच्छामि तत्त्वेन ज्ञातुं भार्गवसत्तम ।

पृष्ठ 1396

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विपर्यस्तं यथा नाम कुवलाश्वस्य धीमतः ॥ ७ ॥

‘ भृगुश्रेष्ठ! बुद्धिमान् राजा कुवलाश्वके इस नाम परिवर्तनका यथार्थ कारण मैं जानना चाहता हूँ ॥ ७ ॥

वैशम्पायन उवाच

युधिष्ठिरेणैवमुक्तो मार्कण्डेयो महामुनिः ।

धौन्धुमारमुपाख्यानं कथयामास भारत ॥ ८ ॥

वैशम्पायनजीने कहा – भारत! धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर महामुनि मार्कण्डेयने धुन्धुमारकी कथा प्रारम्भ की ॥ ८ ॥

मार्कण्डेय उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि शृणु राजन् युधिष्ठिर ।

धर्मिष्ठमिदमाख्यानं धुन्धुमारस्य तच्छृणु ॥ ९ ॥

मार्कण्डेयजी बोले – राजा युधिष्ठिर! सुनो । धुन्धुमारका आख्यान धर्ममय है । अब इसका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो ॥ ९ ॥

यथा स राजा इक्ष्वाकुः कुवलाश्वो महीपतिः ।

धुन्धुमारत्वमगमत् तच्छृणुष्व महीपते ॥ १० ॥

महाराज! इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्व जिस प्रकार धुन्धुमार नामसे विख्यात हुए, वह सब श्रवण करो ॥ १० ॥

महर्षिर्विश्रुतस्तात उत्तङ्क इति भारत ।

मरुधन्वसु रम्येषु आश्रमस्तस्य कौरव ॥ ११ ॥

भरतनन्दन! कुरुकुलरत्न! महर्षि उत्तङ्कका नाम बहुत प्रसिद्ध है । तात! मरुके रमणीय प्रदेशमें उनका आश्रम है ॥ ११ ॥

उत्तङ्कस्तु महाराज तपोऽतप्यत् सुदुश्चरम् ।

आरिराधयिषुर्विष्णुं बहून् वर्षगणान् विभुः ॥ १२ ॥

महाराज! प्रभावशाली उत्तङ्कने भगवान् विष्णुकी आराधनाकी इच्छासे बहुत वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या की थी ॥ १२ ॥

तस्य प्रीतः स भगवान् साक्षाद् दर्शनमेयिवान् ।

दृष्ट्वैव चर्षिः प्रह्वस्तं तुष्टाव विविधैः स्तवैः ॥ १३ ॥

उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया । उनका दर्शन पाते ही महर्षि नम्रतासे झुक गये और नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1397

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उत्तङ्क उवाच

त्वया देव प्रजाः सर्वाः ससुरासुरमानवाः ।

स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि तथैव च ॥ १४ ॥

उत्तङ्क बोले — देव! देवता, असुर, मनुष्य आदि सारी प्रजा आपसे ही उत्पन्न हुई है ।

समस्त स्थावर- जंगम प्राणियोंकी सृष्टि भी आपने ही की है ॥ १४ ॥

ब्रह्म वेदाश्च वेद्यं च त्वया सृष्टं महाद्युते ।

शिरस्ते गगनं देव नेत्रे शशिदिवाकरौ ॥ १५ ॥

निःश्वासः पवनश्चापि तेजोऽग्निश्च तवाच्युत ।

बाहवस्ते दिशः सर्वाः कुक्षिश्चापि महार्णवः ॥ १६ ॥

ऊरू ते पर्वता देव खं नाभिर्मधुसूदन ।

पादौ ते पृथिवी देवी रोमाण्योषधयस्तथा ॥ १७ ॥

महातेजस्वी परमेश्वर! ब्रह्मा, वेद और जाननेयोग्य सभी वस्तुएँ आपने ही उत्पन्न की हैं । देव! आकाश आपका मस्तक है । चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं । वायु श्वास है तथा अग्नि आपका तेज है । अच्युत! सम्पूर्ण दिशाएँ आपकी भुजाएँ और महासागर आपका कुक्षिस्थान है । देव! मधुसूदन! पर्वत आपके ऊरु और अन्तरिक्ष- लोक आपकी नाभि है । पृथ्वीदेवी आपके चरण तथा ओषधियाँ रोएँ हैं ॥ १५–१७ ॥ इन्द्रसोमाग्निवरुणा देवासुरमहोरगाः ।

पृष्ठ 1398

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प्रह्वास्त्वामुपतिष्ठन्ति स्तुवन्तो विविधैः स्तवैः ॥ १८ ॥

भगवन्! इन्द्र, सोम, अग्नि, वरुण देवता, असुर और बड़े - बड़े नाग — ये सब आपके सामने नतमस्तक हो नाना प्रकारके स्तोत्र पढ़कर आपकी स्तुति करते हुए आपको हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं ॥ १८ ॥

त्वया व्याप्तानि सर्वाणि भूतानि भुवनेश्वर ।

योगिनः सुमहावीर्याः स्तुवन्ति त्वां महर्षयः ॥ १ ९ ॥

भुवनेश्वर! आपने सम्पूर्ण भूतोंको व्याप्त कर रखा है । महान् शक्तिशाली योगी और महर्षि आपका स्तवन करते हैं ॥ १ ९ ॥

त्वयि तुष्टे जगत् स्वास्थ्यं त्वयि क्रुद्धे महद् भयम् ।

भयानामपनेतासि त्वमेकः पुरुषोत्तम ॥ २० ॥

पुरुषोत्तम! आपके संतुष्ट होनेपर ही संसार स्वस्थ एवं सुखी होता है और आपके कुपित होनेपर इसे महान् भयका सामना करना पड़ता है । एकमात्र आप ही सम्पूर्ण भयका निवारण करनेवाले हैं ॥ २० ॥

देवानां मानुषाणां च सर्वभूतसुखावहः ।

त्रिभिर्विक्रमणैर्देव त्रयो लोकास्त्वया हृताः ॥ २१ ॥

देव! आप देवताओं, मनुष्यों तथा सम्पूर्ण भूतोंको सुख पहुँचानेवाले हैं । आपने तीन पगोंद्वारा ही ( बलिके हाथसे ) तीनों लोक ( दानद्वारा ) हरण कर लिये थे ॥ २१ ॥

असुराणां समृद्धानां विनाशश्च त्वया कृतः ।

तव विक्रमणैर्देवा निर्वाणमगमन् परम् ॥ २२ ॥

आपने समृद्धिशाली असुरोंका संहार किया है । आपके ही पराक्रमसे देवता परम सुख-शान्तिके भागी हुए हैं ॥ २२ ॥

पराभूताश्च दैत्येन्द्रास्त्वयि क्रुद्धे महाद्युते ।

त्वं हि कर्ता विकर्ता च भूतानामिह सर्वशः ॥ २३ ॥

आराधयित्वा त्वां देवाः सुखमेधन्ति सर्वशः । महाद्युते! आपके रुष्ट होनेसे ही दैत्यराज देवताओंके सामने पराजित हो जाते हैं । आप इस जगत्के सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं । प्रभो! आपकी आराधना करके ही सम्पूर्ण देवता सुख एवं समृद्धि- लाभ करते हैं ॥ २३ ॥

एवं स्तुतो हृषीकेश उत्तङ्केन महात्मना ॥ २४ ॥

उत्तङ्कमब्रवीद् विष्णुः प्रीतस्तेऽहं वरं वृणु । महात्मा उत्तङ्कके इस प्रकार स्तुति करनेपर सम्पूर्ण इन्द्रियोंके प्रेरक भगवान् विष्णुने

उनसे कहा — ‘ सहर्ष! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । तुम कोई वर माँगो' ॥ २४३ ॥

उत्तङ्क उवाच

पृष्ठ 1399

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पर्याप्तो मे वरो ह्येष यदहं दृष्टवान् हरिम् ॥ २५ ॥

पुरुषं शाश्वतं दिव्यं स्रष्टारं जगतः प्रभुम् । उत्तङ्कने कहा — भगवन्! समस्त संसारकी सृष्टि करनेवाले दिव्य सनातन पुरुष आप सर्वशक्तिमान् श्रीहरिका जो मुझे दर्शन मिला, यही मेरे लिये सबसे महान् वर है ॥ २५३ ॥

विष्णुरुवाच प्रीतस्तेऽहमलौल्येन भक्त्या तव च सत्तम ॥ २६ ॥

अवश्यं हि त्वया ब्रह्मन् मत्तो ग्राह्यो वरो द्विज । भगवान् विष्णु बोले— सज्जनशिरोमणे! मैं तुम्हारी लोभशून्यता एवं उत्तम भक्तिसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। ब्रह्मन्! तुम्हें मुझसे कोई वर अवश्य लेना चाहिये ॥ २६३ ॥

मार्कण्डेय उवाच एवं स छन्द्यमानस्तु वरेण हरिणा तदा ॥ २७ ॥

उत्तङ्कः प्राञ्जलिर्वव्रे वरं भरतसत्तम । मार्कण्डेयजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान् विष्णुके द्वारा वर लेनेके लिये आग्रह होनेपर उत्तङ्कने हाथ जोड़कर इस प्रकार वर माँगा ॥ २७ ॥

यदि मे भगवन् प्रीतः पुण्डरीकनिभेक्षण ॥ २८ ॥

धर्मे सत्ये दमे चैव बुद्धिर्भवतु मे सदा ।

अभ्यासश्च भवेद् भक्त्या त्वयि नित्यं ममेश्वर ॥ २ ९ ॥

‘ भगवन्! कमलनयन! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरी बुद्धि सदा धर्म, सत्य और इन्द्रियनिग्रहमें लगी रहे। मेरे स्वामी! आपके भजनका मेरा अभ्यास सदा बना रहे ' ॥ २८-२९ ॥ श्रीभगवानुवाच

सर्वमेतद्धि भविता मत्प्रसादात् तव द्विज ।

प्रतिभास्यति योगश्च येन युक्तो दिवौकसाम् ॥ ३० ॥

त्रयाणामपि लोकानां महत् कार्यं करिष्यसि । श्रीभगवान् बोले— ब्रह्मन्! मेरी कृपासे यह सब कुछ तुम्हें प्राप्त हो जायगा । इसके सिवा तुम्हारे हृदयमें उस योगविद्याका प्रकाश होगा जिससे युक्त होकर तुम देवताओं तथा तीनों लोकोंका महान् कार्य सिद्ध कर सकोगे ॥ ३० ॥

उत्सादनार्थं लोकानां धुन्धुर्नाम महासुरः ॥ ३१ ॥

तपस्यति तपो घोरं शृणु यस्तं हनिष्यति ।

पृष्ठ 1400

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विप्रवर! धुन्धु नामसे प्रसिद्ध एक महान् असुर है, जो तीनों लोकोंका संहार करनेके लिये घोर तपस्या कर रहा है । जो वीर उस महान् असुरका वध करेगा, उसका परिचय देता हूँ, सुनो ॥ ३१ ॥

राजा हि वीर्यवांस्तात इक्ष्वाकुरपराजितः ॥ ३२ ॥

बृहदश्व इति ख्यातो भविष्यति महीपतिः ।

तस्य पुत्रः शुचिर्दान्तः कुवलाश्व इति श्रुतः ॥ ३३ ॥

तात! इक्ष्वाकुकुलमें बृहदश्व नामसे प्रसिद्ध एक महापराक्रमी और किसीसे पराजित न होनेवाले राजा उत्पन्न होंगे । उनका पवित्र और जितेन्द्रिय पुत्र कुवलाश्वके नामसे विख्यात होगा ॥ ३२-३३ ॥ स योगबलमास्थाय मामकं पार्थिवोत्तमः ।

शासनात् तव विप्रर्षे धुन्धुमारो भविष्यति ।

एवमुक्त्वा तु तं विप्रं विष्णुरन्तरधीयत ॥ ३४ ॥

ब्रह्मर्षे! तुम्हारे आदेशसे वे नृपश्रेष्ठ कुवलाश्व ही मेरे योगबलका आश्रय लेकर धुन्धु राक्षसका वध करेंगे और लोकमें धुन्धुमार नामसे विख्यात होंगे । उत्तङ्कसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये ॥ ३४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०१ ॥

इस प्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०१ ॥