दुर्वासउपाख्यान : सङ्कट के समय ईश्वर की शरण कैसे प्राप्त होती है?

श्रद्धा और शरणागति का फल

महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।

वनपर्व → द्रौपदीहरणपर्व · अध्याय 262–263 · पृष्ठ 1752–1767

वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा

पाण्डवों के प्रति दुर्योधन की दुर्भावना और उनके सङ्कट की कथा सुनाने हेतु

राजा जनमेजय ने पूछा— 'हे महामुनि वैशम्पायन! जब महात्मा पाण्डव वन में रहकर मुनियों के साथ विचित्र कथा-वार्ता द्वारा मनोरञ्जन करते थे और जब तक द्रौपदी भोजन न कर ले, तब तक सूर्य द्वारा दिए गए अक्षयपात्र से वे उन ब्राह्मणों को तृप्त करते थे जो भोजन के लिए उनके पास आते थे; उन दिनों दुःशासन, कर्ण और शकुनि के मत के अनुसार चलने वाले पापाचारी दुरात्मा दुर्योधन आदि ने उन पाण्डवों के साथ कैसा बर्ताव किया?'

वैशम्पायनजी बोले— 'महाराज! जब दुर्योधन ने सुना कि पाण्डव वन में भी उसी प्रकार दान-पुण्य करते हुए आनन्द से रह रहे हैं जैसे नगर के निवासी रहते हैं, तब उसने उनका अनिष्ट करने का विचार किया। वह छल-कपट की विद्या में निपुण कर्ण और दुःशासन आदि के साथ पाण्डवों को सङ्कट में डालने की युक्तियाँ सोच ही रहा था कि तभी महायशस्वी धर्मात्मा तपस्वी महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्यों को लेकर वहाँ स्वेच्छा से आ पहुँचे।

नानोपायैरघं तेषु चिन्तयत्सु दुरात्मसु ॥

अभ्यागच्छत् स धर्मात्मा तपस्वी सुमहायशाः ।
शिष्यायुतसमोपेतो दुर्वासा नाम कामतः ॥

इस प्रकार सोचकर छल- कपटकी विद्यामें निपुण कर्ण और दुःशासन आदिके साथ जब वे दुरात्मा धृतराष्ट्र - पुत्र भाँति- भाँतिके उपायोंसे पाण्डवोंको संकटमें डालनेकी युक्तिका विचार कर रहे थे, उसी समय महायशस्वी धर्मात्मा तपस्वी महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्योंको साथ लिये हुए वहाँ स्वेच्छासे ही आ पहुँचे ।

महाभारत · वनपर्व · द्रौपदीहरणपर्व · अध्याय 262 · श्लोक 6-7पृष्ठ 1754

अतिथियों के आगमन पर राजा दुर्योधन ने अपनी इन्द्रियों को काबू में रखकर, नम्रतापूर्वक और विनीत भाव से उनका अतिथिसत्कार किया। वह स्वयं दास की भाँति उनकी सेवा में खड़ा रहा और विधिपूर्वक पूजा की। मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा कई दिनों तक वहाँ ठहरे रहे। दुर्योधन श्रद्धा से नहीं, बल्कि महाराज के शाप से डरकर दिन-रात आलस्य छोड़कर उनकी सेवा में लगा रहा। वे मुनि कभी कहते— "राजन्! मैं बहुत भूखा हूँ, मुझे शीघ्र भोजन दो" और फिर स्नान करने चले जाते। बहुत देर बाद लौटकर वे कह देते— "मैं नहीं खाऊँगा; आज मुझे भूख नहीं है" और अदृश्य हो जाते। फिर कहीं से अकस्मत आकर वे कहते— "हमलोगों को जल्दी भोजन कराओ" और पूर्ववत् भोजन बनवाकर उसकी निन्दा करते हुए खाने से इनकार कर देते।

जब दुर्योधन के मन में इन सब बातों से न तो विकार आया और न ही क्रोध, तब वे दुर्धर्ष मुनि उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले— "राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मन में जो इच्छा हो, उसके लिए वर माँगो। मेरे प्रसन्न होने पर जो धर्मानुकूल वस्तु होगी, वह तुम्हारे लिए अलभ्य नहीं रहेगी"। दुर्योधन ने मन ही मन सोचा मानो उसका नया जन्म हुआ हो। कर्ण और दुःशासन की सलाह के बाद उसने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह वर माँगा— "ब्रह्मन्! हमारे कुल में महाराज युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हैं। वे इस समय अपने भाइयों के साथ वन में निवास कर रहे हैं। वे बड़े गुणवान् और सुशील हैं। जिस प्रकार आप मेरे अतिथि हुए, उसी तरह शिष्यों सहित आप उनके भी अतिथि होइये। यदि आपकी मुझ पर कृपा हो, तो आप वहाँ ऐसे समय में जाइयेगा, जब सुन्दरी राजकुमारी द्रौपदी समस्त ब्राह्मणों तथा पाँचों पतियों को भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करने के पश्चात् सुखपूर्वक बैठकर विश्राम कर रही हो"। \दुर्वासा ने कहा— "तुम पर प्रेम होने के कारण मैं वैसा ही करूँगा" और वे जैसे आए थे, वैसे ही चले गए। दुर्योधन ने स्वयं को कृतार्थ मानकर कर्ण का हाथ थाम लिया। कर्ण हर्षित होकर बोला— "कुरुनन्दन! सौभाग्य से हमारा काम बन गया। तुम्हारा अभ्युदय हो रहा है और तुम्हारे शत्रु विपत्ति के अपार महासागर में डूब गए"।

तथा करिष्ये त्वत्प्रीत्येत्येवमुक्त्वा सुयोधनम् ॥

दुर्वासा अपि विप्रेन्द्रो यथागतमगात् ततः ।
कृतार्थमपि चात्मानं तदा मेने सुयोधनः ॥

' तुमपर प्रेम होनेके कारण मैं वैसा ही करूंगा ', दुर्योधनसे ऐसा कहकर विप्रवर दुर्वासा जैसे आये थे, वैसे ही चले गये । उस समय दुर्योधनने अपने- आपको कृतार्थ माना ।

महाभारत · वनपर्व · द्रौपदीहरणपर्व · अध्याय 262 · श्लोक 23-24पृष्ठ 1756

कुछ समय पश्चात, एक दिन महर्षि दुर्वासा ने यह पता लगाकर कि पाण्डव भोजन करके सुखपूर्वक बैठे हैं और द्रौपदी भी भोजन से निवृत्त होकर आराम कर रही है, अपने दस हजार शिष्यों के साथ उस वन में पहुँच गए। श्रीमान राजा युधिष्ठिर भाइयों सहित उनके सम्मुख आए, उन्हें श्रेष्ठ आसन पर बैठाया और हाथ जोड़कर प्रणाम किया। उन्होंने विधिपूर्वक पूजा करके कहा— "भगवन्! अपना नित्य नियम पूरा करके शीघ्र पधारिये"। यह सुनकर वे निष्पाप मुनि अपने शिष्यों के साथ स्नान करने चले गए। उन्होंने यह विचार नहीं किया कि वे इस समय शिष्यों सहित भोजन कैसे कर सकेंगे। पूरी मुनि-मण्डली ने जल में गोता लगाया और एकाग्रचित्त होकर ध्यान करने लगी। इसी बीच, युवतियों में श्रेष्ठ पतिव्रता द्रौपदी को अन्न के लिए बड़ी चिन्ता होने लगी।'

वैशम्पायन उवाच

दृष्ट्वाऽऽयान्तं तमतिथिं स च राजा युधिष्ठिरः ॥

जगामाभिमुखः श्रीमान् सह भ्रातृभिरच्युतः ।
तस्मै बद्ध्वाञ्जलिं सम्यगुपवेश्य वरासने ॥

विधिवत् पूजयित्वा तमातिथ्येन न्यमन्त्रयत् ।
आह्निकं भगवन् कृत्वा शीघ्रमेहीति चाब्रवीत् ॥

श्रीमान् राजा युधिष्ठिर अतिथिको आते देख भाइयोंसहित उनके सम्मुख गये । वे अपनी मर्यादासे कभी च्युत नहीं होते थे । उन्होंने उन अतिथिदेवताको लाकर श्रेष्ठ आसनपर आदरपूर्वक बैठाया और हाथ जोड़कर प्रणाम किया । फिर विधिपूर्वक पूजा करके उन्हें अतिथिसत्कारके रूपमें निमन्त्रित किया और कहा - ' भगवन्! अपना नित्य नियम पूरा करके ( भोजनके लिये ) शीघ्र पधारिये '

महाभारत · वनपर्व · द्रौपदीहरणपर्व · अध्याय 263 · श्लोक 2–4पृष्ठ 1758

द्रौपदी की आँखों में चिन्ता की लकीरें उभर आई थीं। उसने मन ही मन अपने आराध्य को पुकारा और व्याकुल होकर स्तुति करने लगी— 'हे कृष्ण! हे महाबाहु श्रीकृष्ण! हे देवकीनन्दन! हे अविनाशी वासुदेव! चरणों में पड़े हुए दुखियों का दुःख दूर करने वाले हे जगदीश्वर! तुम्हीं सम्पूर्ण जगत् के आत्मा हो। अविनाशी प्रभो! तुम्हीं इस विश्व की उत्पत्ति और संहार करने वाले हो। शरणागतों की रक्षा करने वाले गोपाल! तुम्हीं समस्त प्रजा का पालन करने वाले परात्पर परमेश्वर हो। आकूति और चित्ति के प्रेरक परमात्मन्! मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ।

कृष्ण कृष्ण महाबाहो देवकीनन्दनाव्यय ॥

वासुदेव जगन्नाथ प्रणतार्तिविनाशन ।
विश्वात्मन् विश्वजनक विश्वहर्तः प्रभोऽव्यय ॥

प्रपन्नपाल गोपाल प्रजापाल परात्पर ।
आकूतीनां च चित्तीनां प्रवर्तक नतास्मि ते ॥

'हे कृष्ण! हे महाबाहु श्रीकृष्ण! हे देवकीनन्दन! हे अविनाशी वासुदेव! चरणोंमें पड़े हुए दुखियोंका दुःख दूर करनेवाले हे जगदीश्वर! तुम्हीं सम्पूर्ण जगत्के आत्मा हो । अविनाशी प्रभो! तुम्हीं इस विश्वकी उत्पत्ति और संहार करनेवाले हो । शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले गोपाल! तुम्हीं समस्त प्रजाका पालन करनेवाले परात्पर परमेश्वर हो । आकूति ( मन) और चित्ति ( बुद्धि ) -के प्रेरक परमात्मन्! मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ ।

महाभारत · वनपर्व · द्रौपदीहरणपर्व · अध्याय 263 · श्लोक 8–10पृष्ठ 1760

हे अनन्त! आओ, जिन्हें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई सहायता देने वाला नहीं है, उन असहाय भक्तों की सहायता करो। प्रभो! मैं तुम्हारी शरण में आयी हूँ। शरणागतवत्सल देव! कृपा करके मुझे बचाओ। नीलकमल दल के समान श्यामसुन्दर! पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण! तुम्हारे वक्षःस्थल पर कौस्तुभमणिमय आभूषण शोभा पाता है। हे देवेश्वर! यदि तुम मेरे रक्षक हो तो मुझपर सारी विपत्तियाँ टूट पड़ें, तो भी मुझे उनसे भय नहीं है। भगवन्! पहले कौरव सभामें दुःशासन के हाथ से जैसे तुमने मुझे बचाया था, उसी प्रकार इस वर्तमान सङ्कट से भी मेरा उद्धार करो।'

वरेण्य वरदानन्त अगतीनां गतिर्भव ।
पुराणपुरुष प्राणमनोवृत्त्याद्यगोचर ॥

सर्वाध्यक्ष पराध्यक्ष त्वामहं शरणं गता ।
पाहि मां कृपया देव शरणागतवत्सल ॥

' सबके वरण करने योग्य वरदाता अनन्त! आओ । जिन्हें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई सहायता देनेवाला नहीं है, उन असहाय भक्तोंकी सहायता करो । पुराणपुरुष! प्राण और मनकी वृत्ति आदि तुम्हारे पासतक नहीं पहुँच सकती। सबके साक्षी परमात्मन्! मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ । शरणागतवत्सल देव! कृपा करके मुझे बचाओ '

महाभारत · वनपर्व · द्रौपदीहरणपर्व · अध्याय 263 · श्लोक 11-12पृष्ठ 1760

द्रौपदी की इस व्याकुल स्तुति को सुनकर अचिन्त्यगति परमेश्वर भगवान् केशव को ज्ञात हो गया कि उन पर कोई सङ्कट आ गया है। वे तुरन्त अपनी शय्या पर सोयी हुई रुक्मिणी को छोड़कर वहाँ पहुँच गए। भगवान् को सामने देखकर द्रौपदी हर्षित हो उठी और उसने उन्हें दुर्वासा मुनि के आगमन का सारा वृत्तान्त सुनाया। तभी श्रीकृष्ण ने हठ करते हुए कहा— 'कृष्णे! इस समय मुझे बड़ी भूख लगी है; मैं भूख से अत्यन्त पीड़ित हो रहा हूँ। पहले मुझे जल्दी भोजन करा।'

वैशम्पायन उवाच

एवं स्तुतस्तदा देवः कृष्णया भक्तवत्सलः ।
द्रौपद्याः संकटं ज्ञात्वा देवदेवो जगत्पतिः ॥

पार्श्वस्थां शयने त्यक्त्वा रुक्मिणीं केशवः प्रभुः ।
तत्राजगाम त्वरितो ह्यचिन्त्यगतिरीश्वरः ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - द्रौपदीके इस प्रकार स्तुति करनेपर अचिन्त्यगति परमेश्वर देवाधिदेव जगन्नाथ भक्तवत्सल भगवान् केशवको यह मालूम हो गया कि द्रौपदीपर कोई संकट आ गया है, फिर तो शय्यापर अपने पास ही सोयी हुई रुक्मिणीको छोड़कर तुरंत वहाँ आ पहुँचे ।

महाभारत · वनपर्व · द्रौपदीहरणपर्व · अध्याय 263 · श्लोक 17-18पृष्ठ 1761

द्रौपदी लज्जित होकर बोली— 'भगवन्! सूर्यनारायण की दी हुई बटलोई से तभी तक भोजन मिलता है जब तक मैं भोजन न कर लूँ। आज तो मैं भी भोजन कर चुकी हूँ; अतः अब उसमें अन्न नहीं रह गया है।' यह सुनकर कमलनयन भगवान् ने फिर कहा— 'कृष्णे! मैं तो भूख और थकावट से आतुर हो रहा हूँ और तुझे हँसी सूझती है। यह परिहास का समय नहीं है। जल्दी जा और बटलोई लाकर मुझे दिखा।'

द्रौपदी ने जब बटलोई मङ्गवाई, तो उसके गले में जरा-सा साग लगा हुआ था। श्रीकृष्ण ने उसे लेकर खा लिया और कहा— 'इस साग से सम्पूर्ण विश्व के आत्मा यज्ञभोक्ता सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरि तृप्त और सन्तुष्ट हों।' इसके बाद उन्होंने सहदेव से मुनियों को भोजन के लिए बुलाने को कहा। सहदेव जब उन मुनियों को बुलाने गए, तो उन्हें पता चला कि सभी मुनि अत्यन्त तृप्त महसूस कर रहे हैं।

उपयुज्याब्रवीदेनामनेन हरिरीश्वरः ।
विश्वात्मा प्रीयतां देवस्तुष्टश्चास्त्विति यज्ञभुक् ॥

यह सुनकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने द्रौपदीसे फिर कहा - ' कृष्णे! मैं तो भूख और थकावटसे आतुर हो रहा हूँ और तुझे हँसी सूझती है । यह परिहासका समय नहीं है । जल्दी जा और बटलोई लाकर मुझे दिखा । इस प्रकार हठ करके भगवान्ने द्रौपदीसे बटलोई मँगवायी । उसके गलेमें जरा- सा साग लगा हुआ था। उसे देखकर श्रीकृष्णने लेकर खा लिया और द्रौपदीसे कहा - ' इस सागसे सम्पूर्ण विश्वके आत्मा यज्ञभोक्ता सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरि तृप्त और संतुष्ट हों'

महाभारत · वनपर्व · द्रौपदीहरणपर्व · अध्याय 263 · श्लोक 25पृष्ठ 1762

मुनि आपस में कहने लगे— 'ब्रह्मर्षे! हम लोग राजा युधिष्ठिर को रसोई बनवाने की आज्ञा देकर स्नान करने के लिये आये थे, परन्तु इस समय इतनी तृप्ति हो रही है कि कण्ठ तक अन्न भरा हुआ जान पड़ता है। अब हम कैसे भोजन करेंगे?' तभी दुर्वासा मुनि ने भयभीत होकर कहा— 'सब पाण्डव महामना, धर्मपरायण, विद्वान् और तपस्वी हैं। वे सदाचारपरायण तथा भगवान् वासुदेव को अपना परम आश्रय मानते हैं। वे कुपित होने पर हमको उसी प्रकार भस्म कर सकते हैं जैसे रूई के ढेर को आग। अतः शिष्यों! पाण्डवों से बिना पूछे ही तुरन्त भाग चलो!'

मुनि के इस आदेश पर सभी ब्राह्मण दसों दिशाओं में भाग गए। जब सहदेव ने उन्हें कहीं नहीं देखा, तो वे वापस लौटकर युधिष्ठिर को सारा वृत्तान्त सुना दिया। पाण्डव चिन्ता में डूबे थे कि कहीं दुर्वासा मुनि आधी रात को आकर उन्हें छल न दें। उनकी यह दशा देखकर श्रीकृष्ण स्वयं प्रकट हुए और बोले— 'कुन्तीकुमारो! परम क्रोधी महर्षि दुर्वासा से आप लोगों पर सङ्कट आता जानकर द्रौपदी ने मेरा स्मरण किया था, इसीलिए मैं तुरन्त यहाँ आ पहुँचा। अब आप लोगों को दुर्वासा मुनि से तनिक भी भय नहीं है; वे आपके तेज से डरकर पहले ही भाग गये हैं। जो लोग सदा धर्म में तत्पर रहते हैं, वे कभी कष्ट में नहीं पड़ते। अब मैं आपसे जाने की आज्ञा चाहता हूँ। यहाँ से द्वारकापुरी जाऊँगा।'

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वेरितं केशवस्य बभूवुः स्वस्थमानसाः ।
द्रौपद्या सहिताः पार्थास्तमूचुर्विगतज्वराः ॥

त्वया नाथेन गोविन्द दुस्तरामापदं विभो ।
तीर्णाः प्लवमिवासाद्य मज्जमाना महार्णवे ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर द्रौपदीसहित पाण्डवोंका चित्त स्वस्थ हुआ । उनकी सारी चिन्ता दूर हो गयी और वे भगवान्से इस प्रकार बोले — ' विभो! गोविन्द! तुम्हें अपना सहायक और संरक्षक पाकर हम बड़ी - बड़ी दुस्तर विपत्तियोंसे उसी प्रकार पार हुए हैं, जैसे महासागरमें डूबते हुए मनुष्य जहाजका सहारा पाकर पार हो जाते हैं ।

महाभारत · वनपर्व · द्रौपदीहरणपर्व · अध्याय 263 · श्लोक 45-46पृष्ठ 1766

श्रीकृष्ण के इस आश्वासन से पाण्डवों का चित्त स्वस्थ हो गया। उन्होंने कहा— 'विभो! गोविन्द! तुम्हें अपना सहायक पाकर हम बड़ी-बड़ी विपत्तियों से उसी प्रकार पार हुए हैं, जैसे महासागर में डूबते हुए मनुष्य जहाज का सहारा पाकर पार हो जाते हैं। तुम्हारा कल्याण हो!' पाण्डवों को आशीर्वाद देकर श्रीकृष्ण द्वारका चले गए और द्रौपदी सहित पाण्डव प्रसन्नचित्त होकर वन में सुख से रहने लगे।

In English

Duryodhana, Durvasa, and the Pandavas

Duryodhana hosts the sage Durvasa and asks him to visit the Pandavas in the forest to cause them trouble. When Durvasa and his disciples arrive, they feel full after eating and flee before the Pandavas can serve them. Krishna arrives to comfort Draupadi and the Pandavas, explaining that the sages fled out of fear of their spiritual power.

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  • What happened when the sages arrived at the pandavas camp?

Also written: Durvasaupakhyana, Durvasa, Duryodhana, Karna, Yudhishthira, Draupadi, Shrikrishna, Sahadeva, Dhritarashtra, Duhshasana, Shakuni, दुर्वासउपाख्यान